May 20, 2024
दूल्हा

दूल्हा देखते समय क्या रखें ध्यान ?

अत्यासन्ने चातिदूरे अत्यादशे धनवार्जिते । वृत्तिहीने च मूर्खे च कन्यादानं न शस्यते ।।
मूढाय च विरलाय भारमसम्भाविताय च । आतुरे प्रमत्ताय कन्यादानं न कारयेत ।।

दूल्हा

सन्दर्भ – ये उस समय की बात है जब सती जी ने पुनर्जन्म लिया पार्वती जी के रूप में और शिव जी की घोर तपस्या कर के उन्हें प्रसन्न किया । शिव जी ने पार्वती जी की परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मण वेश में जा कर शिवनिंदा की, जिस से पार्वती जी ने उन्हें यह कर जाने के लिए कहा की जो मनुष्य महापुरुषों की निंदा सुनते हैं या वहां बैठे रहते हैं वे सर्वथा त्याज्य हैं और पापी हैं । इस पर शिव जी ने प्रसन्न हो कर पार्वती जी के मांगने पर विवाह की स्वीकृति दे दी । किन्तु स्वयं पार्वती जी के पिता हिमालय के पास न जाने की बात कही । इस पर सभी देवताओ ने सप्तर्षियो से यह सन्देश हिमालय के पास पहुचाया । तब गिरिश्रेष्ठ हिमालय ने सप्तर्षियो से यह बात कही ।

अर्थ – “जो अधिक समीप या अधिक दूर रहने वाला हो, (अपने से) अत्यंत धनी अथवा सर्वथा निर्धन हो, जिसकी कोई आजीविका न हो तथा जो मूर्ख हो, ऐसे पुरुष को कन्या देना अच्छा नहीं माना गया है । जो मूर्ख, विरक्त, सवयम ही अपने को बड़ा मान ने वाला, रोगी तथा प्रमादी हो, ऐसे पुरुष को कन्या नहीं देनी चाहिए । “

तब सप्तर्षियों ने हिमालय को समझाया और शिव जी की महानता का वर्णन किया और हिमालय को शिव पार्वती के विवाह के लिए राजी किया ।

नोट – यहाँ ऐसा लगता है जैसे आज काल की लोकोक्ति “शादी बराबर वालो में करनी चाहिए” को स्कन्द पुराण में लिखा गया हो ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page