May 24, 2024

गोपालतापिन्युपनिषत्

उपनिषद

|| श्रीगोपालतापनी उपनिषद ||

               || श्रीकृष्ण उपासना विधि ||  

                   * हिन्दी व्याख्या सहित *

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              || भूमिका || 

यद्यपि इस प्रकार के विशद ग्रन्थ और उपनिषद की भूमिका लिखने के लिए मैं स्वयं को सर्वथा असमर्थ और अयोग्य समझता हूँ, फिर भी आदिष्ट होने के कारण, ऐसी धृष्टता करने का प्रयास करता हूँ | सर्वप्रथम तो स्वामी निर्दोष जी का धन्यवाद, जिन्होंने मुझ अज्ञानी के निवेदन को स्वीकारते हुए, इस ग्रन्थ को हिंदी में अनुवादित तथा व्याख्यायित किया और मुझ जैसे अनेकों श्रद्धालुओं पर कृपा की | 

मेरे निवेदन का कारण था, समाज में धर्म को लेकर मदान्धता | आज के समय में, साधारण मनुष्य, माया के मोह में इस प्रकार फंसा हुआ है कि उसका अध्ययन कम से कम होता जा रहा है | इसकी एक बड़ी वजह है, हिंदी भाषा और उससे भी अधिक संस्कृत भाषा का विद्यालयों में पढाने का चलन कम होना | आज के समय में, जब युवा और बच्चे, बड़ी आसानी से बोल देते हैं कि मेरी हिंदी कमजोर है, वैसे समाज में, अगली 1-2 पीढ़ियों के बाद, समाज में, शास्त्रों को पढने वाले न के बराबर रह जाने वाले हैं | इस ओर किसी का ध्यान नहीं है | हमारी पीढ़ी में यदि कुछ लोग शास्त्राध्ययन कर भी रहे हैं, तो उसका कारण हैं, उनका हिंदी माध्यम के विद्यालयों से पढ़ा हुआ होना | संस्कृत का ज्ञान भले न हो, किन्तु संस्कृत को किसी दूसरे ग्रह की भाषा नहीं समझते और श्लोक/मन्त्र आदि बोल लेते हैं | उस पीढ़ी के लिए, किसी संस्कृत ग्रन्थ, उपनिषद आदि की हिंदी में, सुरुचिपूर्ण व्याख्या यदि हो जाए, तो आने वाली पीढ़ियों पर एक अहसान के तौर पर याद किया जाएगा क्योंकि आने वाले समय में, स्पष्ट है कि संस्कृत भाषा को लिखने, पढने वालों का सर्वथा अभाव होने वाला है और ये बात, मैं स्पष्ट रूप से देख पा रहा हूँ | जब कोई भाषा पढाई ही नहीं जायेगी तो उसमें साहित्य लेखन होना असम्भव है और किसी भाषा को मारने का सबसे आसान तरीका भी यही है कि उसके प्रति समाज को उदासीन बना दिया जाए, उस भाषा को पढाया ही न जाए और यदि पढाया भी जाए, तो एक बोझ की तरह से और यही सब संस्कृत भाषा के साथ हो रहा है | हमारा अमूल्य साहित्य/धर्मग्रन्थ, स्वतः ही धीरे धीरे समाज के इस उपेक्षित व्यवहार के कारण, लुप्त हो जाने वाले हैं | अतः संस्कृत के विद्वानों पर , संस्कृत के मूल ग्रंथों को, हिंदी में शास्त्रोक्त व्याख्या के साथ अनुवादित करने की जिम्मेदारी आ पड़ी है, ऐसा मुझे लगता है, ताकि उन संस्कृत ग्रंथों को अभी कुछ समय और कुछ और पीढ़ियों तक पढ़ा और पढाया जा सके | यही सोच कर, मैंने स्वामी निर्दोष जी से, उनके समर्थ शास्त्रों के ज्ञान को और अधिकार को देखते हुए, निवेदन किया था | मेरे बालहठ को, समय न होने के बाद भी और इस अनुवाद के कार्य को, अपने दैनिक कार्यकलापों में, व्यर्थ जानने के बाद भी, आने वाली पीढ़ियों के लिए, उन्होंने इस के लिए समय निकाला, जिसके लिए, मैं ही नहीं, अपितु भविष्य में भी बहुत लोग, कृतज्ञता का अनुभव करेंगे | 

कुछ जो थोड़े बहुत उपनिषद मैंने स्वल्पज्ञान से पढ़े हैं, वो आत्मतत्व के गूढ़ज्ञान और मोक्षज्ञान के प्रदाता हैं और लगता है कि उनकी समकालीन व्याख्या के लिये एक सुयोग्य गुरु अति आवश्यक है किन्तु जब इस उपनिषद को पढ़ा तो पाया  कि इसकी भाषा और व्याख्या ही इतनी सुरुचिपूर्ण है कि स्वतः ही बुद्धि के कपाटों को खोलते हुए, अंदर प्रवेश कर जाती है | 

इस उपनिषद में, श्रीकृष्ण जी के अमृत स्वरूप को सरल भाषा में, विभिन्न आख्यानों  द्वारा बताया गया है और परमतत्व को दर्शाया गया है | विभिन्न सन्दर्भ ऐसे हैं, जो स्वतः ही ज्ञान चक्षुओं को खोल देते हैं |  जिस प्रकार, शिवजी को कृष्ण जी के चरणोदक को अपने सिर पर धारण करना बताया गया है, वो अद्भुत प्रसंग है | इसी प्रकार, अक्लिष्ट कर्मा और अद्भुत कर्मा नाम के विशेषणों का राम और कृष्ण जी के लिये, जिस प्रकार प्रयोग किया गया है, वह ज्ञानवर्धक के साथ साथ, रोमांचक भी है | विभिन्न व्याख्याओं को तर्क के नियमों से सुशोभित किया गया है, जो इसकी विलक्षणता में, अलग ही चमक बना देते हैं, जैसे गोपीजनवल्लभ का ज्ञान हो जाए तो समस्त संसार का ज्ञान हो जाता है, ठीक वैसे ही , जैसे कारण के जान लेने पर, कार्य का ज्ञान हो जाता है और इसका उदाहरण, देते हुए स्वर्ण को  बताते हैं कि यदि स्वर्ण के बारे में पता चल जाए तो फिर आप उस से अनेकों आभूषण बना सकते हैं, पर पहली बात है, कि आपको स्वर्ण के बारे में, पता होना चाहिए | ऐसे ही गोपीजनवल्लभ के ज्ञान से, सम्पूर्ण संसार का ज्ञान हो जाता है | 

भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और अन्यान्य शास्त्रों के विभिन्न उदाहरणों और सन्दर्भों से, इस उपनिषद के सारतत्व को सुपारिभाषित किया गया है, जिससे कि ये आमजन के लिए भी बोधगम्य रहे | नवधा भक्ति के आचार्यों का जो वर्णन दिया गया है, वो अद्भुत है और उसके बाद नवधा भक्ति की व्याख्या भी मन को आह्लादित कर देती है | बड़ी ही स्पष्टता से, भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति और अन्य देवताओं की भक्ति करने वालों में होने वाले अंतर को समझाया गया है | 

इस उपनिषद को सभी को एक बार अवश्य पढना चाहिये, क्योंकि यदि आपने भगवद्गीता पढ़ी है, भागवत की कथाएं सुनी हैं तो भी, इस उपनिषद में, आपको कृष्ण प्रेम में डुबाने और उस भक्ति रस का आस्वादन कराने की विलक्षण शक्ति है | इसको पूरा पढने के बाद, ऐसा संभव ही नहीं है कि आपको भगवान् श्रीकृष्ण में अनुरक्ति न हो और आपका सांसारिक मोह के भ्रम का जाल न टूटे | आने वाली पीढ़ियों के लिए, इस प्रकार के सराहनीय कार्य की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी ही कम है | 

धन्यवाद | 

अभिनन्दन शर्मा 

लेखक – अघोरी बाबा की गीता, उपन्यास श्रृंखला एवं धार्मिक विचारक

          कृष्णद्वैपायनं व्यासं सर्वलोकहिते रतम् | 

          वेदाब्जभास्करं वन्दे शमादि निलयं मुनिम् ||

              नमो व्यासाय गुरवे सर्वज्ञाय महर्षये | 

            पाराशर्याय शान्ताय नमो नारायणाय ते ||  

                         || श्री हरिः ||

           ||  प्रकाशकीय वक्तव्य || 

यद्यपि सर्वजनविदित गर्भोपनिषदादि अनेक आथर्वण उपनिषदें उपलब्ध हैं तथापि उन सब में गोपालतापनी नाम वाली साक्षात्परब्रह्म श्री कृष्ण का निरूपण करनेवाली यह उपनिषद अन्यतम है| वैश्वानरावतार {महाप्रभु} श्रीमद्वल्लभाचार्यजी ने अपने ब्रह्मसूत्रके  अणुभाष्य में अनेक स्थलों पर इस उपनिषद के वचनोंको उद्धृत किया है इससे इसकी प्राचीनता तथा प्रामाणिकता सुस्पष्ट सिद्ध होती है | उपासना से ब्रह्मज्ञान की ओर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है तथा संसार की आत्यन्तिकी निवृत्तिपूर्वक श्रीकृष्णके स्वरूप की प्राप्ति ही इसका विशेष प्रयोजन है | भगवान और भक्त का क्या सम्बन्ध है इस विषय की  विशद  विवेचना इस उपनिषद में होने के कारण यह सभी उपनिषदों की मुकुट मणि है | इसमें श्रीकृष्णकी लीला, करुणा, सर्वज्ञता, परिपूर्णता, अप्रतिहतस्वातन्त्र्य तथा उनका स्वरूप सम्पूर्णता से समझाया गया है | अप्रकृताकारवत्वं साकारत्वं , प्राकृताकाररहितत्वं निराकारत्वमिति निष्कर्षः |{ निजइच्छा निर्मिततनु माया गुण गोपार } मानसिक सन्तापों का नाशकरनेवाली यह गोपालतापनी श्रुति अथर्ववेदकी पिप्पलाद शाखा के अंतर्गत है |इसमें मुख्यतया पण्डितवर्य  विश्वेश्वर प्रणीत टीका के आधार पर अर्थानुसन्धान किया गया है | तथा गोस्वामी श्रीमदनिरुद्धाचार्यविरचित ब्रह्मामृत भाष्य एवं उन्ही के द्वारा की गयी पीयूषलहरी टीका ही इस स्वाध्याययात्रा में मेरा पाथेय रहा है | और हमारे परम प्रिय चिरञ्जीव , उपनिषत्तत्वानुसंधित्सु श्रीमदभिनन्दनशर्मा जी की प्रेरणा से मैंने इसकी   ” शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या ”  करने का प्रयत्न अपनी लघु मनीषा के अनुसार किया है |

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

 त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।४.९।। 

हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है,  इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत:  जानता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता;  वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।४.१४।। 

कर्म मुझे लिप्त नहीं करते;  न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है, वह भी कर्मों के बंधन में नहीं फंसता  है।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।९.११।।

समस्त भूतों के महान ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीर धारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं। 

मुझे तो इस ग्रन्थ का नाम “वैष्णव सर्वस्व” अधिक समीचीन लगता है | क्योंकि इसमें सर्वत्र अखिलरसामृतमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण की यशमहिमा का वर्णन किया गया है | 

निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रोनिश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः | आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वगतभेदविवर्जितात्मा ||(महाभारत तात्पर्य निर्णयः)  भगवान का दिव्य शरीर भ्रम, प्रमाद, जरा, रोग आदि सभी दोषों से रहित तथा अनन्त कल्याण गुणों का धाम है , वह काल कर्मादि के अधीन नहीं है | पाञ्चभौतिक जड़ प्रकृति से बना हुआ नहीं है | उनके हाथ, पैर, मुख, उदर आदि सभी अंग केवल चिन्मय आनन्द से ही बने हुए हैं| उनमें स्वगत, सजातीय तथा विजातीय भेद नहीं हैं | 

यद्यपि भाषांतर लेखन मैंने अपने स्वाध्याय के लिये ही किया है , अतः स्वाध्यायार्थ होने के कारण इसे करने में सब तरह से सतत सावधान रहने की चेष्टा की है , फिर भी यदि कहीं किसी प्रकार की कोई त्रुटि दीख जाय तो उसे आप मेरी कमजोरी समझते हुए अपनी सहज दयालुता वश क्षमा कर दें | क्योंकि —  दृष्टं किमपि लोकेस्मिन् न निर्दोषं न निर्गुणं | तस्माद् दोषान् परित्यज्य गृह्णन्त्येव गुणान् बुधाः ||  

                                                         निवेदक:-

                                                         स्वामी निर्दोष 

                                    श्री हरिः शरणम् |

                                    विषयानुक्रमणिका |

प्रस्तावना 

वैदिक मंगलाचरणम् 

श्री गोपाल तापनी पूर्व भागः 

श्री गोपाल तापनी उत्तर भागः 

नारायण ऋषि विरचित गोपालाष्टकम् 

नाम महिमा 

नामापराध 

सेवापराध 

गोपाल सहस्रनाम स्तोत्रम् 

                           प्रस्तावना :-

   श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने कहा है कि पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।

यस्यान्तःस्थानिभूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।8.22।। हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।। सेवा और स्मरण ही भक्ति है | श्री कृष्ण की सेवा सदा करनी चाहिए, वह सेवा भी मानसी ही मुख्य है। अब प्रश्न होता है कि, हस्त-पाद आदि से तो सेवा परिचर्या बन सकती है, परन्तु मानसी सेवा कैसे हो? इस पर महानुभावों ने कहा है- “चेतस्तत्प्रवणं सेवा।” अर्थात चित्त की श्रीकृष्णोन्मुखता ही सेवा है अर्थात भगवान की ओर भगवत्स्वरूप के आकार से आकारित मनोवृत्ति प्रवाह ही भगवान की मानसी सेवा है। बस, उसी की सिद्धि के लिये तनुजा और  वित्तजा दोनों  प्रकार की सेवा अपेक्षित होती है। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा। और लोकनाथ गोपाल ही सबके पालक तथा सेव्य हैं | इसलिये पहले गोपाल शब्द का अर्थ समझने का प्रयास करते हैं | गोपाल शब्द का अर्थ है, भूमि, वाणी, वेद, इन्द्रियां, इन सब का पालन करने वाला गोपाल कहलाता है । { गवाम् पालयति इति गोपालः | }   ‘गौ: स्वर्गे च बलीवर्दे रश्मौ कुलिशे पुमान्। स्त्री सौरभेयी दृग्वाणदिग्वाग्भूष्वप्सु भूमि च । विश्व और मेदिनी कोष |    वेदों में गो शब्द अनेक अर्थों प्रयुक्त होता है जैसे कि १. गाय । २. प्रकाश रश्मि । ३. वृषभ राशि । ४. ऋषभ नाम की औषधि । ५. इंद्रिय । ६. वाणी । ७. सरस्वती । ८.  दृष्टि । ९. बिजली ।  १०. पृथ्वी  । ११. दिशा । १२. माता  । १३.  बकरी, भैंस, इत्यादि दूध देने वाले पशु । १४.  । जिह्वा । १५  . चंद्रमा  १६  . स्वर्ग  १७ . ज्योतिष में नक्षत्रों की नौ वीथियों में से एक । १८  . बैल । 

१९ . नंदी नामक शिवगण  । २० . घोड़ा | २१ . सूर्य । २२ .आकाश । २३ . बाण  । २४ . प्रशंसक । २५ .  स्वर्ग । २६.  जल । २७ .  वज्र । २८ .  शब्द । २९ . नौ का अंक ।  ३०. शरीर के रोम । ३१ . पशुजाति |  गम्यते ज्ञायते अनेन करणे, शीघ्रं ज्ञान हेतुत्वात् , इन्द्रिये गोचरः ।  तापनी में जो ‘तप’ शब्द है वो ( तप आलोचने धातु से बनता है )

 [ तत्त्वज्ञानार्थे आलोचने तत्त्वज्ञानफलालोचने हि तत् साधने प्रवृत्तिः स्यात् इति तदालोचनं मोक्षार्थतत्त्वज्ञानसाधनम् ] अर्थात् विचार के द्वारा परमात्मा का अनुभव होता है |  गोपाल शब्द { गवाम् पालयति इति गोपालः }  जो ब्रह्म तत्व है उसको उद्भासित करने वाली यह विद्या माने समझ । [ तपनीयस्य स्वर्णस्य विकारः अण् । ]  तापनीय स्वर्ण को भी कहते हैं [ चित्त रूपी स्वर्ण को तपाकर शुद्ध करने वाली विद्या अर्थात् 

 “आत्म वैराग्य”  से अन्तःकरण शुद्ध होने पर परतत्व गोपाल रूपी सच्चिदानन्दघन का प्रकाश होता है | तापयति इति  तापनी । कर्तरि ल्युट् । टित्वान्ङीप् । { तापः–घर्मः, दुःखम् । तपः–कायकष्टम् । }  अर्थात् अविद्याजन्य दुःखोंको नष्ट करनेवाली विद्या | तप रूपी ताप से चित्त रूपी स्वर्ण पिघल जाता है फिर उसको आप जिस आकार में ढ़ालना चाहें ढ़ाल सकते हैं |  उपनिषद शब्द का अर्थ तो सबको ज्ञात ही है,फिर भी अभ्यास के लिये लिख देते हैं |  ‘उप’ और ‘नि’  ये दो उपसर्ग हैं,  ‘षद्लृ’ धातु है, इसका अर्थ गति ,विसरण  और अवसादन में होता है  मतलब जो परम तत्व का समीपता से ज्ञान करावे और माया के बंधनों को शिथिल करे और अज्ञान का नाश करे उसको उपनिषद  विद्या कहते हैं  |   

गोपाल तापनी उपनिषद के मंगलाचरण का पहला श्लोक है:

श्रीमत्पञ्चपदागारं सविशेषतयोज्ज्वलम् ।

प्रतियोगिविनिर्मुक्तं निर्विशेषं हरिं भजे ॥

जो पंच पद माने पांच शब्द , वे हैं १  क्लीं,  { नाद शक्ति } २ कृष्ण , ३  गोविन्द , ४  गोपीजनवल्लभ , ५ स्वाहा ये  ही  पांच पद माने पांच शब्द हैं  अथवा इन पांच पदों से सूचित भगवान के पंचकृत्य भी समझ लेना चाहिये ,

 { वे पांच हैं सृष्टि, स्थिति, प्रलय , अनुग्रह तथा निग्रह } और आगार माने भण्डार यानी जिसमें पांच पद निहित हैं, पञ्चपदात्मक जो है । वैसे तो ब्रह्म निर्विशेष है, समस्त विशेषणों से रहित परन्तु वही जब माया की उपाधि को स्वीकार कर लेता है तो प्रकट हो जाता है इन्द्रियगोचर हो जाता है इसलिए उसे कहा, सविशेषतयोज्ज्वलं । 

प्रतियोगी, अर्थात् विरुद्ध या विपरीत  यह न्याय शास्त्र का पारिभाषिक शब्द है, जैसे घट का प्रतियोगी घटा भाव है और घटाभाव का प्रतियोगी है घट यानी उसके विपरीत तो सारे अभावों के विरुद्ध, सारे अभावों से , सारे निषेधों से विनिर्मुक्त और वास्तव में जो निर्विशेष हैं ऐसे हरि जो पाप, ताप,अविद्या, दुःख,  दारिद्र्य इनको हरण करने वाले हैं, इसलिए उनको हरि कहते है, उनका मैं चिंतन करता हूँ, विचार करता हूं , ध्यान करता हूँ , भजन करता हूँ ,अनुसंधान करता हूँ ।

उपनिषद के प्रारम्भ में, खासकर के जो अथर्ववेदी उपनिषदें होती हैं उनमें प्रायः यही  मंगलाचरण किया जाता है । इसका भी संक्षिप्त अर्थ बताते हैं :

                  || वैदिक मङ्गलाचरणम् || 

ॐ भद्रं कर्णेभिः श‍ृणुयाम देवाः ॥ भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिः ॥ व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

                           ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

                             || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

      ‘‘भद्रं कर्णेभिः’’ का अर्थ :-   हे देवताओ ऐसी कृपा करो कि  हम कानों से (कानों के देवता हैं (दिक्) दिशा रुपी जो देवता हैं वो हमारे ऊपर ऐसी कृपा करें कि कानों से हम भद्र (यानी कल्याण) का श्रवण करें

 { भगवद्गुणानुवर्णन रूप शास्त्र का श्रवण करें } उसमें प्रतिबंधक रूप आधि व्याधि आदि हमें न सतावें  ।   भद्र और सुभद्र, ये सब भगवान के नाम हैं । श्रीमद्भागवत में कहा है – स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठ-गुणानुवर्णने । करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ॥९.४.१८॥ शुकदेव जी कहते हैं कि राजा अम्बरीष ने अपने मन को श्रीकृष्णचन्द्र के चरणारविन्द युगल में , वाणी को भगवद्गुणानु वर्णन में , हाथों को श्री हरि मंदिर के मार्जन-सेचन में और अपने कानों को भगवान अच्युत की मङ्गलमयी कथा के श्रवण में लगा रखा था |  तथा — यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद् वंदनं यच्छ्रवणं यदर्हणम् । लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥ २.४.१५ ॥  जिनका कीर्तन ,स्मरण , दर्शन ,वंदन , श्रवण और पूजन जीवों के पापों को तत्काल नष्ट कर देता है , उन पुण्य कीर्ति भगवान श्रीकृष्ण को बार-बार नमस्कार है |  एवंच  तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् । श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः ॥ ९ ॥श्रीमद्भागवतपुराणम्/स्कन्धः १०/पूर्वार्धः/अध्यायः ३१ । प्रभो ! तुम्हारी लीलाकथा भी अमृत स्वरूप है | विरह से सताए हुए लोगों के लिये तो वह जीवन सर्वस्व ही है | बड़े-बड़े ज्ञानी महात्माओं —भक्त कवियोंने उसका गान किया है , वह सारे पाप-ताप तो मिटाती ही है , साथ ही श्रवणमात्र से परम मङ्गल —परम कल्याण का दान भी करती है | वह परम सुन्दर परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है | जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं , वास्तव में भूलोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं |   अपरं च – शृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः । हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥ १७ ॥ स्कंध १ अध्याय २ ||  भगवान श्रीकृष्ण के यश का श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं | वे अपनी कथा सुनने वालों के हृदय में आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ वासनाओं को नष्ट कर देते हैं , क्योंकि वे संतों के नित्य सुहृद हैं |  विष्णुसहस्रनाम में भी –   विश्रुतात्मा ;   शुचिश्रवाः ; पुण्यश्रवणकीर्तनः ;   पवित्रं मङ्गलं परम्‌    ऐसे नाम हैं, तो हम कानों से उन परमात्मा का ही परम तत्व का ज्ञान ही श्रवण करें और आँखों से हम केवल भद्र यानी कल्याण ही देखें,  ” मुकुन्द लिंगालय दर्शने दृशौ ” अन्यथा ”  बर्हायिते ते नयने नराणां     लिङ्गानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये ।”दर्शन के बिना तो आँखें , मोर पंख की आँखों के समान बेकार हैं  |  इसलिये “अक्षण्वतां फलमिदं परं विदामः” हमारी दृष्टि मन्द न हो , हमें अन्धत्व की प्राप्ति न हो जब तक हम आपका दर्शन न कर लेवें , क्योंकि दर्शन के बिना तो जीवन  व्यर्थ  ही है |  (देवः) सर्वेषां सुखानां दाता सर्वविद्याद्योतकः। देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा द्युस्थानो भवतीति वा यो देवः सा देवता (निरु॰७.१५) उस परमदेवके लिये हम यज्ञ करें,पूजा करें |

 ( यजि पूजायां,  यज-देवपूजा संगतिकरण दानेषु)  स्थिर अंगों के द्वारा वैषयिक व्यापारोंसे रहित होकर आपकी स्तुति करें । और जब तक हमारी आयु रहे हमारी देह का उपयोग, विनियोग ,प्रयोग हम उस परमात्मा देव की सेवा के लिए ही प्रयत्नशील होकर करें ।  गीता जी में भी  कहा है कि ” अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।9.30।। यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।। क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।।9.31।। हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शांति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।  ” तज्जन्म तानि कर्माणि तदायुस्तन्मनो वचः । नृणां येन हि विश्वात्मा सेव्यते हरिरीश्वरः ॥ ९ ॥ ( श्रीमद्भागवत ४।३१।९ ) इस लोक में मनुष्य का वही जन्म , वही कर्म, वही आयु, वही मन और वही वाणी सफल है, जिसके द्वारा सर्वात्मा सर्वेश्वर श्री हरि का सेवन किया जाता है जिसके द्वारा सर्वेश्वर विश्वात्मा श्रीमन्नारायण हरि का नित्य कैंकर्य ( सेवा ) किया जाता है, उसी मनुष्य का ही जन्म, कर्म,आयु, मन, वाणी सफल है। अतः जिस भाँति हो सके भगवान श्रीमन्नारायण की आराधना में लग जाना चाहिए क्योंकि वह आराधना ही कल्याणकारी है। भगवान की सेवा में ही जीवन की सफलता है अतः ऐसी हितावह आयु हमें प्राप्त हो | 

   ‘‘स्वस्ति न इन्द्रो’’  का अर्थ :- महा यशस्वी इन्द्र हमारे लिए कल्याण साधन उपस्थित करें, हमारे लिए अनुकूल हो जाएं क्योंकि इन्द्र हाथों के देव हैं और हाथों से ही कर्म का अनुष्ठान होता है इसलिये कर्म की ही प्रशंसा होती है अतः इन्द्र से प्रार्थना है कि हमारा कर्म यशस्वी हो , सनातन हो | { स्वस्ति शब्दो सनातन वचनः } सारे विश्व को जानने वाले और पोषण करने वाले नेत्रों के देव  सूर्य देव हैं वे हमारे लिए स्वस्ति या कल्याण का सम्पादन करें । अर्थात् हमारी दृष्टि ठीक रहे क्योंकि दृष्टि ही सृष्टि है | जिनकी गति कहीं अवरुद्ध नहीं होती है, ऐसे अरिष्टनेमि भगवान गरुड़, तार्क्ष्य माने गरुड़, वो हमारे लिए स्वस्ति का, कल्याण का विधान करें । ये गरुड़ जी शब्द के देव हैं , सामवेद स्वरूप हैं क्योंकि व्यापक विष्णु का ज्ञान शब्द के सहारे ही प्राप्त हो सकता है | माने हमारे कान ठीक रहें , हम ठीक ठीक सुनें और समझ सकें |   विस्तृत जो वाणी है, उसके जो पति हैं,   ( बृहती पतिः = बृहस्पतिः= वाक्पतिः ) बृहस्पति वो गुरु तत्व हमारे लिए स्वस्ति या कल्याण का विधान करें ।  बृहस्पति बुद्धि के देव हैं माने हमारे ज्ञान में कोई गड़बड़ न हो | इसके बाद “ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः” ऐसा तीन बार कहते हैं,  ( प्रकर्षेण नव इति प्रणवः जो भक्तोंके नित्यनूतन मनोरथोंकी नित्यही पूर्ति करते हैं  )  प्रणवस्वरूपी देवाधिदेव भगवान हमें शांति प्रदान करें  क्योंकि शांति ही जीवन का परम धन है | हम जो कुछ भी करते हैं शांति के लिये ही करते हैं | उद्विग्न व्यक्ति सेवा , जप, पूजा , ध्यान आदि नहीं कर सकता अतः मन का शान्त होना परमावश्यक है |  तो तीनो तापों की (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) त्रिविधतापों की शांति हो । 

गोपालतापनं कृष्णं याज्ञवल्क्यं वराहकम् ।

शाट्यायनी हयग्रीवं दत्तात्रेयं च गारुडम् ॥

ये जो विभिन्न उपनिषद हैं इनमें उसी गोपाल कृष्ण का परमात्मा रूप से वर्णन किया हुआ है,

 गोपालतापनि उपनिषद, कृष्ण उपनिषद, याज्ञवल्क्य उपनिषद, वराह उपनिषद, शाट्यायनी उपनिषद, हयग्रीव उपनिषद, दत्तात्रेय उपनिषद और गारुड उपनिषद, इनमें मुख्य विषय जो है वही गोपालतापनी उपनिषद में भी है ।

              श्रीगोपालतापनी पूर्वभागः

                             श्रीगणेशायनमः | 

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  || मूल उपनिषद ||

हरिः ॐ सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे ।

नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥ 1 ॥ 

|| संस्कृत व्याख्या || 

 परमकारुणिकतया सगुणोपासनक्रमेणाधिकारिजनानामनर्थनिवृत्तये सच्चिदानन्द –   स्वरूप श्रीकृष्णात्मतावाप्तये च श्रीगोपालविद्यामुद्दीपयन्ती तापनी श्रुतिः  श्रोतृणामविघ्न- विद्यासिद्धये  सदाचारावबोधनाय विषयसौलभ्यप्रकाशनेन तत्प्रवृत्तिसिद्धये च प्रतिपाद्य- परमदैवत प्रणतिलक्षणं मङ्गलं प्रकाशयति , सच्चिदानन्दरूपायेति | ‘कृष्णाय’ ‘नमः’ इति सम्बन्धः | कृषशब्दः सच्चिद्वाचकः, णशब्दश्चानन्दवाचकः, इत्यभिप्रेत्य कृष्णशब्दार्थमाह, सदिति | ‘सच्चिदानन्दः,’ एवं स्वरूपं यस्य सः तस्मै क्लेशकर्षकत्वं, अक्लिष्टेति |

‘अक्लिष्टम्’  अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशलक्षणक्लेशपञ्चकरहितं, भक्तजनं करोति तच्छीलाय {अक्लिष्टं यथा स्यात्तथा गोवर्धनधारणकेशिवधादिलीलां कर्तुं शीलं यस्य तस्मै } तत्सद्भावे प्रमाणमाह | ‘वेदान्तवेद्याय’ लक्षणावृत्या प्रकाश्याय इत्यर्थः |

  ‘‘ तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ’’  ‘‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः’’ इति श्रुतेः स्मृतेश्च | नमस्यतौपयिकं रूपमाह, विशेषणद्वयेन | ‘गुरवे’ सर्वहितोपदेष्ट्रे,  सर्वान्धकारनिरोधकर्त्रे,  ‘बुद्धेः’  सर्वेन्द्रियप्राणमनोधियां  ‘साक्षिणे’ |  एतेन ज्ञानदातृत्वेन प्राधान्यं सूचितम् | वेदान्तवेद्याय, इति विषयः सूचितः | उपनिषच्छब्दवाच्यत्वादपि तापन्या विषयप्रयोजनादिकं सूचितम् | तथा हि ये इमां गोपालविद्यामुपयान्ति मुमुक्षवस्तेषामियं गोपालविद्या गर्भजन्मजरारोगाद्यनर्थव्रातं शातयति , तथा कृष्णाख्यं संसारविनिवर्तकं परं ब्रह्म गमयति | संसारहेत्वविद्यादिकं च अत्यन्तमवसादयति विनाशयतीति व्युत्पत्या गोपालविद्या उपनिषदुच्यते | तद्धेतुत्वाच्च ग्रन्थोऽपि उपनिषदुच्यते |  ‘‘आयुर्वैघृतम्’’ इत्यादिवत् | अत्र मुमुक्षुरधिकारी | कृष्णाख्यं संसारविनिवर्तकं सच्चिदानन्दस्वरूपं विषयः | आत्यन्तिकी संसारनिवृत्तिः कृष्णस्वरूपावाप्तिश्च प्रयोजनम् || १ || 

                         || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

जो सनातन हैं अर्थात् नित्य हैं , ज्ञानस्वरूप हैं, तथा आनन्द स्वरूप हैं | क्लेश रहित होकर कर्म करनेवाले हैं | अर्थात् अक्लिष्टकर्मा हैं उन कृष्ण को जो वेदान्तों { उपनिषदों } द्वारा वेद्य (जानने योग्य ) हैं तथा  जो परमगुरु  और  सबकी बुद्धियों के भी साक्षी हैं उन कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं | भक्तों के पापों का आकर्षण के कारण श्री कृष्ण ही परम देव हैं | 

कृषिर्भू-वाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः ।

तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ।।

परमात्मा सच्चिदानंद स्वरूप हैं अर्थात प्राकृतिक रूप से रहित हैं  |

 ( चिदानंदमय देह तुम्हारीबिगत बिकार जान अधिकारी॥ ) (भगवान की यह देह प्रकृतिजन्य पंच महाभूतों की बनी हुई कर्मबंधन युक्त, स्थूल , सूक्ष्म , कारण शरीर विशिष्ट मायिक नहीं है) और (उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि) सब विकारों से रहित है, इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। उन्हीं का नाम कृष्ण हैं और यहाँ पर एक विशेषण दिया है ‘अक्लिष्ट कर्मणे ‘; ‘अक्लिष्ट कर्मा’,  साधारणतया ये विशेषण ‘राम’ के लिए ज्यादा प्रसिद्ध है । कृष्ण के लिये प्रयुक्त होता है   { कृष्णयाद्भुतकर्मणे }  मतलब अद्भुत कर्मा और राम के लिए कहा जाता है अक्लिष्ट कर्मा, लेकिन राम और कृष्ण दोनों एक ही हैं इसलिए यहाँ कृष्ण को भी अक्लिष्ट कर्मा कहा यानी क्लेश रहित कर्म करने वाला । कर्म करने में भगवान को क्लेश नहीं होता क्योंकि भगवान स्वतंत्र हैं कर्मतन्त्र के पराधीन नहीं हैं | ‘‘ ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः’’ वह ऐश्वर्य ही किस काम का जिसमें दूसरों का आश्रय लेना पड़े |{ जो महाभारत के युद्ध में भी मुस्करा सकता है तथा हजारों पत्नियों के बीच में भी हँसता खेलता रह सकता है वह निश्चित ही अक्लिष्ट कर्मा है }  पांच प्रकार के क्लेश हैं – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश । अविद्या माने – अज्ञान, मूर्खता,नासमझी { ऐसी अविद्या जिनमें नहीं है }  जो पूरी जानकारी प्राप्त करके ही कोई कर्म करते हैं । उनके कर्मो में अहंकार नहीं होता, राग नहीं होता, द्वेष नहीं होता, अभिनिवेश – एक प्रकार का मोह, { मृत्युका भय }  नहीं होता । जैसे तादात्म्य  में अध्याससे  होता है न ये सब वेदान्त के जरा पारिभाषिक शब्द हैं, थोड़े क्लिष्ट लगेंगे परन्तु शास्त्रों के अभ्यास से सरल हो जायेगा ।

 { अध्यास माने उल्टी समझ } अतस्मिन् तद् बुद्धिः अध्यासः | वेदान्तवेद्याय भी एक विशेषण है । वेदान्त के द्वारा ही जिसे जाना जा सकता है { वेदान्त है वेद का अंतिम भाग }  जो गुरु तत्व स्वरूप हैं,  बुद्धि के भी साक्षी हैं  उनको प्रणाम करते हैं । यहाँ सभी विशेषण चतुर्थी विभक्ति में हैं इसलिए मंत्र रूप ही हैं | जैसे कि ॐ सच्चिदानन्द रूपाय नमः ॐ  कृष्णाय नमः  ॐ अक्लिष्टकर्मणेनमः  ॐ  वेदान्तवेद्यायनमः ॐ गुरवे नमः  ॐ बुद्धिसाक्षिणे नमः  | इस उपनिषद का अधिकारी मुमुक्षु है तथा इस उपनिषद का विषय संसार रूपी अविद्या को हटाने वाले सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं  और संसार की आत्यन्तिक निवृत्ति होने के उपरांत श्री कृष्ण के  स्वरूप की प्राप्ति ही इस उपनिषद का प्रयोजन है |  || १ || 

  || मूल उपनिषद ||

मुनयो ह वै ब्रह्माणमूचुः । कः परमो देवः कुतो मृत्युर्बिभेति ।

कस्य विज्ञानेनाखिलं विज्ञातं भवति । केनेदं विश्वं संसरति, इति || २ ||  

तदु होवाच ब्राह्मणः । श्रीकृष्णो वै परमं दैवतम् || ३ || 

गोविन्दान्मृत्युर्बिभेति || ४ || 

 गोपीजनवल्लभ ज्ञानेन तज् ज्ञातं  भवति || ५ || 

 || संस्कृत व्याख्या || 

  ग्रन्थप्रयोजनादीनाञ्च साध्यसाधनभावः सम्बन्ध इत्यभिप्रेत्य गोपालविद्यास्तुत्यर्थमाख्यायिकामारचयति, 

 मुनयो ह वै ब्रह्माणमिति | ह वै इत्यव्ययम् | ‘ह वै’ स्मर्यते | ‘मुनयः’ तत्वमननशीलाः सनकादयः,      ‘ब्रह्माणं,’ प्रति ऊचुः | किम् | ‘कः,’ ‘परमः’ सर्वोत्कृष्टः देवः | ‘कुतः’ कस्मात् , च ‘मृत्युः,’     विभेति , त्रस्यति |  ‘कस्य,’ विज्ञानेन  ‘अखिलं’ सकलं जगत् भाति | केनेदं विश्वं, 

  ‘संसरति’ प्रसरति उत्पद्यते || २ || 

 तदु हेति |   ‘तत्’ तत्र प्रश्नेषु ,   ‘ब्राह्मणः’ छान्दसत्वात् ब्रह्मा,  ‘उ’ अपि, तान् प्रति  ‘ह’ किल , गोपालविद्ययैवोत्तरम्  ‘उवाच’ | किम् |  ‘श्रीकृष्णः,’  ‘वै’ प्रसिद्धं , परमं दैवतं | कृषशब्दः सत्तावाचकः, णकारश्च आनन्दवाचकः, तथाच, सदानन्दः परमं दैवतमित्यर्थः | यद्वा भक्तपापकर्षणात् कृष्णः परमं दैवतमित्यर्थः || ३ || 

  गोविन्दादिति | गवा ज्ञानेन वेद्य उपलभ्यः   ‘गोविन्दः,’ तस्मात् उपलब्धात् , अमृतस्वरूपावाप्तौ  ‘मृत्युः,’  ‘विभेति’ भयेन तदाज्ञाकारी भवति इत्यर्थः | 

 ‘‘भीषाऽस्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः’’ इत्यादि श्रुतेः || ४ || 

  गोपीजनेति |  इदं सकलजगत् नामरूपाभ्यां गोपायति रक्षति , अथवा परं पुमांसं परब्रह्मस्वरूपं गोपायति संवृणोतीति व्युत्पत्या गोपी प्रक्रितिर्म्माया , तस्याः सकाशाज्जातः प्रपञ्चः , ‘गोपीजनः,’ तस्य वल्लभः , स्वामी ईश्वरः उत्पादनपालनसंहरणाधानम् , इत्यधिष्ठानत्वात् तद्विज्ञानेन ‘तत्’ अखिलं  विश्वं , विज्ञातं भवति | 

 { अखिलं प्राकृताप्राकृतं सर्वं वस्तु }  ‘‘यथा एकेन मृत्पिण्डेन अखिलं मृण्मयं विज्ञातं भवति’’ इतिश्रुतिस्मृतीतिहासलोकेषु प्रसिद्धेः || ५ || 

                             || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 इस प्रकार इस ग्रन्थ का प्रयोजन और साध्य साधन भाव सम्बन्ध बताने के बाद गोपाल विद्या की स्तुति में  एक आख्यायिका की रचना करते हैं |  सनकादि मुनी जो निरंतर तत्व  मननशील  हैं ,  ब्रह्मा जी के पास गए और बोले:  कौन परम यानि उत्कृष्ट, अंतिम देव है ? किससे मृत्यु को भी भय  प्राप्त होता है, मृत्यु के देवता भी किससे डरते हैं ? और भय के कारण उसके आज्ञाकारी हो जाते हैं | किसके विज्ञान से किसको जान लेने से सब कुछ जाना जाता है ? किसके  द्वारा, किसकी शक्ति/प्रेरणा से यह संसार संचालित होता है ?

  तब ब्रह्मा जी बोले: कृष्ण नाम से विख्यात जो तत्व हैं वही सर्वोत्कृष्ट देवता हैं | जिनके चरणामृत को भगवान शिव अपने मस्तक पर धारण करते है वे ही श्रेष्ठ देव है |”  गगनाद्गां पतन्तीं वै महापुण्यां महेश्वरः। दधार शिरसा गङ्गां तामेव दिवि सेवते।।७७||  ” भगवान महेश्वर ने आकाश से गिरती हुई परम पवित्र गंगा को सिर पर धारण किया , उन्हीं का वे स्वर्ग में सेवन करते हैं | इस प्रकार श्री कृष्ण का चरणोदक भगवान शिव के शिर का भूषण बना || ७७ ||  तथा  { नारायणादक्षयात्पूर्वजाता विष्णोः पादाच्छिंशुमाराद्ध्रुवाच्च | सोमात्सूर्यान्मेरुरूपाच्च विष्णोः समागता शिवमूर्ध्नो हिमाद्रिम्||९४||अनुशासन पर्व -अध्याय ६५}में बताया कि भगवती गङ्गा पूर्वकाल में अविनाशी भगवान नारायण से प्रकट हुई हैं | वे भगवान विष्णु के चरण,शिशुमारचक्र,ध्रुव,सोम,सूर्य तथा मेरु रूप विष्णु से अवतरित हो भगवान शिव के मस्तक पर आयी हैं और वहाँ से हिमालय पर्वत पर गिरी हैं ||९४||और फिर बताया गोविंद से मृत्यु भी भय प्राप्त करती है। जैसे एक गोपाल अपनी गायों की रक्षा सिंह, व्याघ्र आदि  हिंसक पशुओं से करता है वैसे ही गोविंद अपने भक्त जीवों की मृत्यु से रक्षा करते हैं  | { गोविन्द शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए हरिवंश पुराण में ब्रह्मा आदि देवताओं  ने तथा कामधेनु आदि गौओं ने कहा कि —

 [ तदस्माकं गुरुस्त्वं हि प्राणदश्च महाबलः ।

अद्यप्रभृति नो राजा त्वमिन्द्रो वै भव प्रभो ।। ४३ ।। ‘प्रभो ! आप महान बलशाली प्रभु हमारा परित्राण करने के कारण हमारे गुरु रूप हैं ; अतः आज से आप हम गौओं के राजा इन्द्र हो जायँ ’ || ४३ || इसके बाद इन्द्र ने कहा कि —-

तस्मात्त्वं काञ्चनैः पूर्णैर्दिव्यस्य पयसो घटैः ।

एभिरद्याभिषिञ्चस्व मया हस्तावनामितैः ।। ४४ ।। अतः (गौओं के इस अनुरोध के अनुसार) मेरे द्वारा हाथ पर रखकर प्रस्तुत किये गये इन दिव्य जल से भरे हुए सोने के कलशों द्वारा आप अपना अभिषेक करें || ४४ || 

अहं किलेन्द्रो देवानां त्वं गवामिन्द्रतां गतः ।

गोविन्द इति लोकास्त्वां स्तोष्यन्ति भुवि शाश्वतम्।।४५।।  हरिवंश पुराण ,विष्णु पर्व अध्याय १९ ]  मैं देवताओं का इन्द्र हूँ और आप गौओं के इन्द्र हो गये ! आज से इस भूतल पर सब लोग आप सनातन प्रभु को ‘गोविन्द’ कहकर आपका स्तवन करेंगे || ४५ || और किससे मृत्यु को भी भय  प्राप्त होता है ? इसके उत्तर में कहते हैं कि उस गोविंद को जानकर ही मृत्यु का  अतिक्रमण किया जा सकता है | अजामिल का दृष्टांत इस विषय में प्रसिद्ध ही है |  ” तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥” उस ब्रह्म से अभिन्न आत्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु का अतिक्रमण कर लेता है , इसके अतिरिक्त  दूसरा कोई मार्ग नहीं है |  इस उपनिषद में मुख्य पांच शब्द हैं , क्लीं ,कृष्ण, गोविंद,{ गवा ज्ञानेन वेद्यः उपलभ्यः गोविन्दः}  

 गोपीजनवल्लभ और स्वाहा, ये पांच पद हैं, तो गोपीजनवल्लभ इस पद के ज्ञान से ये सब ज्ञान हो जाता है । गोपी समस्त प्रकृति या माया  का नाम है और उससे उत्पन्न होने वाला जगत [गोपीजन ] है और उसका स्वामी गोपीजनवल्लभ है | यह प्रकृति संपूर्ण जगत को नाम और रूप से ढक देती है और अधिष्ठान स्वरूप सच्चिदानंद ब्रह्म की जगह जगत को दिखाती है |  जो समस्त नाम रूपात्मक प्रपञ्च का गोपन करती है , रक्षा करती है  तथा उत्पत्ति का भी कारण है | गोपन और जनन का कार्य प्रकृति ही करती है  उस प्रकृति के जो वल्लभ हैं स्वामी हैं वे गोपीजनवल्लभ हैं |यदि उन अधिष्ठान स्वरूप गोपीजनवल्लभ का ज्ञान हो जाए तो संपूर्ण विश्व का ज्ञान हो सकता है , क्योंकि कारण के ज्ञान के बिना कार्य का ज्ञान नहीं हो सकता |    जैसे यदि स्वर्ण की पहचान हो जाए तो सोने से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो सकता है |

           || मूल उपनिषद ||

        स्वाहयेदं विश्वं संसरतीति ||६|| 

         तदुहोचुः , कः कृष्णः । गोविन्दश्च कोऽसाविति । गोपीजनवल्लभः कः ।  का स्वाहेति ||७|| 

          तानुवाच ब्राह्मणः। पापकर्षणो गोभूमिवेदविदितो विदिता गोपीजनाविद्याकलाप्रेरकः,   स्तन्मायाचेति ||८||   

  सकलं परं ब्रह्मैव तत् ||९||

  यो ध्यायति ,रसयति ,भजति , सोऽमृतो भवति सोऽमृतो भवतीति ||१०||

 || संस्कृत व्याख्या || 

  स्वाहयेति | सुष्ठु आह आहुतिक्रिया यया सा ‘स्वाहा’ इतिव्युत्पत्या स्वाहाशब्दवाच्यया मायया, 

  ‘इदं’ जीवजातं , ‘संसरति’ संसार वद्भवति, इत्यर्थः ||६||

 एवं गूढार्थे ब्रह्मणा उक्ते तदर्थजिज्ञासवो मुनयः ‘तत्’ तत्र , ‘ उ ह ’ पूर्वं , ‘ऊचुः,’ इत्याह , कः कृष्णः इति || || 

  प्रागुक्तार्थे ब्रह्मा प्राह इत्याह , तानुवाच ब्राह्मण इति | ‘ब्राह्मणः’ ब्रह्मा, ‘तान्’ सनकादीन्, प्रति उवाच | कृष्णस्वरूपमाह , पापेति | पापकर्षकत्वात् प्रागुक्तरीत्या च सच्चिदानन्दरूपत्वात् पापकर्षकसच्चिदानन्द एव कृष्णः अतः परमो देव इत्यर्थः | पापं  चित्तमपि स्वीयलीलया कर्षति पापपुरुषान् पूतनावककेश्यादीन् असुरानपि स्वहतान् मुक्तिदानार्थमाकर्षतीति स एव परमकृपालुः परमदैवतमिति भावः | गोविन्दस्वरूपमाह, गोभूमिवेदविदित इति | गवि भूमौ गोशब्दवाच्यात् वेदात् ‘विदितः,’ ‘विदिता’ वेत्ता द्रष्टा गोविन्दः, अतस्तस्मादधिष्ठानतया ज्ञात्वा मृत्युः विभेति इत्यर्थः | गोपीजनवल्लभस्वरूपमाह , गोपीजनेति | गोपायन्तीति गोप्यः पालनशक्तयः तासां

 ‘जनः’ समूहः, तद्वाच्या ‘अविद्याकलाः,’ च तासां वल्लभः स्वामी ‘प्रेरकः’ ईश्वरः, इति व्युत्पत्या गोपीजनवल्लभस्येश्वरस्य सर्वाधिष्ठानस्य , ज्ञानेन सर्वमारोपितत्वेन विदितं भवति इत्यर्थः | स्वाहास्वरूपमाह, तन्मायेति | प्रागुक्तरीत्या तस्य ईश्वरस्य अधीना ‘माया’ स्वाहा, तया सर्वं संसरति इत्यर्थः ||८|| सकलमन्त्रस्य फलितार्थमाह, सकलमिति | कलया मायया, सहितं ‘सकलं’ परमेश्वराख्यं , परं ब्रह्मैव , ‘तत्’ उक्त मन्त्रप्रतिपाद्यम् ||९||

 एतद्ध्यानादेः फलमाह, यो ध्यायतीति |  ‘यः’ यः , तद्रूपं ‘ध्यायति,’ तथा ‘रसयति’ कामबीजेन पञ्चपदीं जपति, ‘भजति’ पूजयति , ‘सः अमृतो भवति’ मरणात् विवर्जितो भवति, इत्यर्थः || १०||

                         || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 स्वाहा { सुष्ठु आह , आहुति क्रिया जिससे सम्पन्न होती है अर्थात् समर्पण } शब्द की शक्ति से ही सारा विश्व संचालित होता है । ईश्वरके अधीन रहनेवाली मायाशक्ति ही स्वाहा है , जो समस्त जगत का सञ्चालन करती है  | 

तो वह सनकादि ऋषि लोग कहने लगे: कि आप यह थोड़ा सा समझाकर कहिए कि यह कृष्ण क्या है ? गोविन्द कौन है? गोपीजनवल्लभ कौन है ? स्वाहा शब्द का क्या अर्थ है ?

उन सनकादि ऋषियों के प्रति ब्रह्मा जी ने कहा:  कृष्ण शब्द से मतलब है पाप-कर्षण – जो अज्ञान का, पाप का, कपट का आकर्षण कर ले; खींच कर समाप्त कर दे वह ही  कृष्ण है।  अथवा जो कृषक हमारे अंतःकरण में हल चलाता है , खेती करता है वह ही कृष्ण है | एवं कृष  शब्द सत्ता वाचक है और ण शब्द आनंद वाचक है तो कृष्ण शब्द का अर्थ हुआ सदानन्द | ‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृत्ति वाचकः। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते।।’ (महाभारत, उद्योग-पर्व 71/4)  गोविन्द से मतलब है – गो, भूमि , वेद विदितो, इन्द्रियों के द्वारा भूमि के द्वारा और वेद के द्वारा जिनका ज्ञान होता है । जो अधिष्ठान रूप है, भूमि माने अधिष्ठान रूप, इन्द्रिय माने ज्ञान का साधन रूप, प्रमा (ज्ञान) के करण प्रमाण स्वरूप, वेद यानी ज्ञान । और गोपीजन जो हैं वे भक्तजन हैं , वृत्तियाँ हैं  उनको विद्या में और कला में प्रेरणा करने वाला , और ये जो स्वाहा है, यही इनकी माया है और ये सब अधिष्ठान ब्रह्म से भिन्न नहीं हैं, ये सब परब्रह्म स्वरूप ही है। अधिष्ठान से भिन्न अधिष्ठेय नहीं होता है, कारण से भिन्न कार्य नहीं होता है इसलिए जो इनका ध्यान करता है, रसयति यानि रस लेता है अनुसंधान करता है  और भजति ,पूजयति सेवा सत्कारं करोति यानी सेवन करता है, उपासना करता है वह अमृत हो जाता है अर्थात् मरणसे रहित हो जाता है | भागवत में कहा कि —

 यथा यथात्मा परिमृज्यतेऽसौ मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानै: ।

तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम् ॥११.१४. २६॥ अर्थात् मेरी पवित्र गाथाओं के श्रवण और कीर्तन द्वारा जैसे-जैसे यह अन्तरात्मा स्वच्छ होता जाता है वैसे-वैसे ही साधक सूक्ष्म-वस्तु का साक्षात्कार करता जाता है, जैसे अंजन के द्वारा नेत्र के दोष मिटाने पर उनमें सूक्ष्म वस्तुओं को देखने की शक्ति आने लगती है || २६ ||  

सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायना: कथा: ।

तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥३.२५.२५॥   कपिल देव जी ने कहा है  कि – संतो के संग से मेरे पराक्रमों का यथार्थ ज्ञान कराने वाली तथा हृदय और कानों को  प्रिय  लगने वाली कथाएं होती हैं | उनका सेवन करने से शीघ्र ही मोक्ष मार्ग में श्रद्धा , प्रेम और भक्ति का क्रमशः विकास होगा | उसी  श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कन्ध के  चौदहवें  अध्याय में कहा है –  

 यो दुस्त्यजान्क्षितिसुतस्वजनार्थदारान् प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम्

नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट् सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः ||४४||

उन्होंने अति दुस्त्यज पृथ्वी, पुत्र, स्वजन, संपत्ति और स्त्री की तथा जिसके लिये बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं किंतु जो स्वयं उनकी दया दृष्टि के लिये उन पर दृष्टिपात करती रहती थी—उस लक्ष्मी की भी, लेशमात्र इच्छा नहीं की। यह सब उनके लिये उचित ही था; क्योंकि जिन महानुभावों का चित्त भगवान मधुसूदन की सेवा में अनुरक्त हो गया है, उनकी दृष्टि में मोक्षपद भी अत्यंत तुच्छ है ॥ ४४ ॥ 

 न नाकपृष्ठं न च सार्वभौमं  न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम् ।

 न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा वाञ्छन्ति यत्पादरजःप्रपन्नाः ॥ १०.१६.३७ (हे नाथ !) आपके चरणों के धूल की शरण ग्रहण करने वाले (आपके) भक्त जन न स्वर्ग की इच्छा रखते हैं और न चक्रवर्ती साम्राज्य की, न वे ब्रह्मा का पद चाहते हैं, न संपूर्ण पृथ्वी का स्वामित्व और न ही योग की सिद्धियां; यहाँ तक कि (वे) मोक्ष पद को प्राप्त करने की आकांक्षा भी नहीं रखते। अर्थात अपना  मालिकाना  छोड़कर भगवान का  स्वामित्व स्वीकार करना | क्योंकि यह जगत भगवान से  ही  उत्पन्न होता है , भगवान में ही स्थित है , भगवान को ही चाहता है { आनंद को ही चाहता है }  और भगवान में ही लय हो जाता है | क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं ते स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः ।

 कर्तुः प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥८.२२. २०॥

 हे परमेश्वर ! इस संपूर्ण-जगत् की रचना आपने अपनी ‘क्रीडा’ (रमण) के लिये ही की है,किंतु मनुष्य अपनी ‘कुबुद्धि’ के कारण स्वयं को ही इस जगत् का स्वामी मान बैठा है । अपनी इस ‘कुबुद्धि’ के कारण वह यह समझ ही नहीं पाता,कि-‘जब इस जगत् के रचयिता,पालनकर्ता एवं संहर्ता स्वयं आप ही हैं अर्थात् जब सब कुछ आपका ही है और आपके ही अधीन है, तो फिर कोई भी मनुष्य भला आपको क्या समर्पण कर सकता है ?’ आपकी माया से मोहित होकर,स्वयं को ‘कर्ता’ (दाता) मानने वाला यह मोह मूर्छित मनुष्य वास्तव में कितना झूठा और निर्लज्ज है । यही सच्चा आत्मनिवेदन है | इसलिये ब्रह्मसूत्र में आया है मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्” (१| ३ | २)  भगवान को मुक्तपुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बताया गया है  | तो ये श्री गोपाल जी  मुक्तोंके प्यारे हैं। असल में, बद्ध लोग भला क्या भजन करेंगे। पैसे के साथ बँधे है, भोग के साथ बँधे हैं, स्त्री-पुत्र धन के साथ बँधे हैं, खुद तो उनके कैदी हैं हाथ में हथकड़ी पड़ी हैं, पाँव में बेड़ी पड़ी हैं, जेल खाने में बंद हैं , वे भगवान की क्या सेवा करेंगे? सेवा तो असल में मुक्त लोग ही करते हैं।  लेकिन यह सब तत्व रहस्य जानने के लिये गुरुपसत्ति अत्यंत आवश्यक है इसलिये भागवत में ही बताया है कि – आचार्यं मां विजानीयात् नावमन्येत कर्हिचित् ।  न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः ॥ ११.१७.२७ ॥  इस भगवद्वाक्य के अनुसार आचार्य सेवा के बिना इष्ट कृपा  प्राप्त  करना कठिन है | गुरु को मेरा रूप ही जानो अर्थात गुरु और भगवान में कोई भेद नहीं है। गुरु की आज्ञा की अवमानना कभी भी  नहीं करनी चाहिए और मनुष्य समझ कर उनमें कभी भी दोषदर्शन भी नहीं करना चाहिए क्योंकि गुरु सर्वदेवमय है | || १०||

  || मूल उपनिषद ||

 ते होचुः । किं तद्रूपं किं रसनं कथं चाहो तद्भजनं तत्सर्वं विविदिषतामाख्याहीति ||११|| 

तदुहोवाच हैरण्यो गोपवेषमब्भ्राभं  तरुणं  कल्पद्रुमाश्रितम् ||१२|| 

 || संस्कृत व्याख्या || 

    ध्येयं पृच्छन्ति,  तथा रसनादिकञ्च पृच्छन्ति , ते होचुरित्यादिना ||११||

    तत्र ध्येयरूपनिरूपणमवतारयति, तदु होवाचेति | ‘तत्’ तत्र प्रश्नेषु ‘हैरण्यः’ हिरण्यगर्भस्यापत्यं हैरण्यः ब्रह्मा , ध्येयं रूपम् उवाच इत्यर्थः | गोपवेशमिति | गोपायतीति गोपस्तस्य वेशो यस्य तं ‘गोपवेषं’  पालकस्वरूपम् अपो विभर्ति इत्यब्धः समुद्रः तद्वदाभा यस्य तम् 

‘अब्भ्राभं’  समुद्रवद्गम्भीरम्, अपारमित्यर्थः | ‘तरुणं’  जरादिदोषरहितं | ‘कल्पद्रुमः’ वेदः, सर्व पुरुषार्थहेतुत्वात् तम् आश्रितं ’  तत्प्रतिपाद्यम्  | इति तेनैव वा सर्व्वोपासनाकर्मप्रतिपादकेन तत्तत्कर्म्मफलसिद्धये आश्रितम् |  ‘‘ईश्वरायत्तं फलमत उपपत्तेः’’ इति न्यायात् , ‘‘लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हितान्  ’’ इति स्मृतेश्च | यद्वा ‘गोपः’ धेनुपालकः , तस्य वेषः यस्य तम् | 

 ‘अब्भ्राभं’  सजलजलदनीलं | ‘तरुणं’  नवयौवनं | कल्पवृक्षमूले सिहासनस्थाऽम्बुजोपविष्टमित्यर्थः ||१२||

                                          || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

तो फिर ऋषियों ने कहा: उनका स्वरूप क्या है? ध्येय का स्वरूप क्या है ? ये रसन क्या होता है?  भजन क्या होता है? ये सब हम जानने की इच्छा करते हैं । तो हमारे प्रति उनका आख्यान-व्याख्या करें ।

ख्या – ज्ञान , जाहिर करना और आ = संपूर्ण, संपूर्ण रीति से हमें विशेष ज्ञान हो जाए ऐसी व्याख्या आप करें।

तो फिर हैरण्य अर्थात् ब्रह्मा ( हिरण्यगर्भका पुत्र ) जी ने ध्येय का रूप बताया:  गोपायति इति गोपः अर्थात् जो रक्षा करे , पालन करे वह गोप तो गोपाल जी  गोपवेश धारण किये हुए हैं, अब्भ्राभं अर्थात् समुद्र के समान  गम्भीर , अपार और तरुणं  अर्थात् बृद्धावस्थादि दोषोंसे रहित  और वेद से ही सभी कर्म , धर्म तथा  उपासना आदि  का  प्रतिपादन  होता  है एवं उन उन कर्मोंकी फलसिद्धि के लिये वेद का ही आश्रय लेना पड़ता है विष्णु सहस्रनाम में बताया है कि भगवान वेद स्वरूप हैं  वेदो वेदवित्-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः ।। 14 ।। इसका मतलब है कि वेद ही कल्पवृक्ष है और उसी के नीचे बैठे हैं; क्योंकि वेद से ही सभी पुरुषार्थों की सिद्धि होती है | ईश्वर ही फल का विधान करता है | ब्रह्मसूत्र के अनुसार फलमत उपपत्तेः [ब्र.सू.३.२.३८]   यहाँ तो कर्म का फल दाता ईश्वर है- ‘फलमत उपपत्तेः’। यही युक्तियुक्त है कि चेतन परमेश्वर कर्मका फल दे, अपूर्व कर्म स्वयं समय पर फलदान करे। ऐसा कुछ नहीं- न संचित, न क्रियमाण और न प्रारब्ध। ईश्वर यदि प्रसन्न हो जाये तो क्षण भर में सब कर्मों से मुक्त भी कर सकते हैं | गीता में भी भगवान का वचन है कि “लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्।।7.22।।”  मेरे द्वारा ही काम्यकर्मोंकी सिद्धि होती  है  |  उन्ही के संकल्प से ही सारे जगत की रचना हुई है | अथवा अब्भ्राभं का अर्थ है सजल जलद नीलं , सुंदर घनश्याम  गोप , धेनु पालक वेश धारण किये हुए,  तरुण , नव यौवन सम्पन्न  भगवान कृष्ण कल्पवृक्ष के नीचे सिंहासन के मध्य में विरचित कमल के आसन पर विराजमान हैं | तथा स्वयं कल्पवृक्ष हैं तो जो कल्पना करते हैं वो सब सच सिद्ध हो जाती है; तो उनके यशगान के रूप में ये श्लोक प्रकट हुए। इसके आगे ध्यान के श्लोक हैं , अथवा मंत्र हैं | ||१२||

    || मूल उपनिषद ||

  तदिह श्लोका भवन्ति ॥

सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् ।

द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ १॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

 उक्तरूपध्यानं मन्त्रसम्मतिव्याजेन सविस्तरमाह , तदिहेति | ‘तत्’ तत्र ‘इह’ उक्तध्यानरूपे , ‘श्लोकाः’ मन्त्राः, अपि भवन्ति | सत्पुण्डरीकनयनमिति | ‘सत्’ निर्म्मलं , ‘पुण्डरीकं’ हृत्कमलं , ‘नयनं’ प्रापकं यस्य तं | ‘मेघा’ उपतप्तमनसि सच्चिदानन्दस्वरूपा, ‘आभा’ , यस्य तं | विशेषेण द्योतत इति विद्युत्, विद्युदेव ‘वैद्युतम्’ तादृशम् ‘अम्वरं’ स्वप्रकाश चिदाकाशमित्यर्थः | द्वौ हिरण्यगर्भविराडात्मानौ, भुजौ मौक्तिकशिल्पहेतुभूतौ हस्तौ, यस्य तं ‘द्विभुजं’ | ज्ञानमुद्रा तत् त्वमसीति सच्चिदानन्दैकरसाकारा वृत्तिः, तत्र आढ्यं’ प्रकाशमानं | वने विविक्तप्रदेशे स्वभक्तेषु मालते प्रकाशते इति तं वनमालिनम् ’ |

  ‘ईश्वरं’ ब्रह्मादीनामपि नियन्तारम् ||१||

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

भगवान कल्पवृक्ष के नीचे सिंहासन पर बैठे हैं, कमल नयन हैं, सत्पुण्डरीकनयनं सत् माने निर्मल , शुद्ध , पुण्डरीक माने हृदय कमल और नयनं माने ले जाने वाला अर्थात हृदय कमल में नित्य सत्ता का प्रकाश करने वाला | नील आभा है, जिनकी ऐसे मेघाभं , संसार के त्रिविध तापों से संतप्त मन को सच्चिदानन्द रूपी मेघ बनकर छाया करने वाले , सुख ,  शान्ति प्रदान करने वाले उस मेघ के समान आभा है जिनकी ऐसे सुन्दर घनश्याम |   बिजली के जैसे चमकीले पीले पीले वस्त्र पहने हुए हैं, वैद्युताम्बरम्  , विशेष है द्युति जिसकी उसे विद्युत कहते हैं ऐसे स्वप्रकाश , चिदाकाश चिदानन्द घन स्वरूप | दो हाथ वाले-बिलकुल मनुष्य जैसे हैं, [ बिलकुल मैं तेरे जैसा ही हूँ,]  द्विभुजं , हिरण्यगर्भ और  विराट ये ही   भगवान की  दो भुजाएं  हैं  अर्थात् ज्ञान शक्ति  और  क्रिया शक्ति { सूक्ष्म जगत के अंतर्यामी , अधिष्ठाता चेतन को हिरण्यगर्भ कहते हैं  और स्थूल जगत के अंतर्यामी , अधिष्ठाता चेतन को विराट कहते हैं | }   ज्ञान मुद्रा (अंगूठा और तर्जनी मिला कर के जो बनाते हैं, वह, भद्रा-मुद्रा, चिन्-मुद्रा उसके पर्याय शब्द हैं ) में बैठे हुए हैं , ज्ञानमुद्राढ्यं , तत्वमसि महावाक्य का उपदेश करनेवाली मुद्रा इस मुद्रा के द्वारा भगवान संकेत करते हैं कि वृत्तिको सच्चिदानन्दाकार बनाओ |   उस वृत्ति में ही  भगवान प्रकाशमान होते हैं | कहा भी है कि — 

 दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद्ब्रह्ममयं जगत्

   सा दृष्टिः परमोदारा न नासाग्रावलोकिनी॥११६॥ अपरोक्षानुभूति में आचार्य शङ्कर कहते हैं कि साधारण दृष्टि से संसार दीखता है परन्तु ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए वह दृष्टि ही सच्ची दृष्टि है न कि नासाग्रावलोकिनी | 

      ‘‘वनमालिनमीश्वरम्’’  वनमाला पहनी हुई है   | “आजानुलम्बिनी माला सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वला । मध्ये स्थूलकदम्बाद्या वनमालेति कीर्त्तिता”  , (जो पांच फूलों से मिलकर  बनती है, वैजयंती माला भी  जिसे कहते हैं),   { तुलसीकुन्दमन्दारपारिजातसरोरुहैः। पंचभिर्ग्रथिता माला वनमाला प्रकीर्तिता।। } वन माला वन्य पुष्प-स्तवकों की बनी है, उसमें तुलसी मिश्रित है | वनमालिनं  , वने विविक्तप्रदेशे स्वभक्तेषु मालते प्रकाशते इति तं वनमालिनम् |मालते (= शोभते) 

  { विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।१३ .११ ।। गीता } एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना और जन-समुदाय में प्रीतिका न होना। सबका शासन करने वाले हैं, प्रभु हैं । ब्रह्मा आदि को भी नियंत्रित करनेवाले हैं इसलिये कहा ईश्वरम् | 

  || मूल उपनिषद ||

गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रितम् ।

दिव्यालंकरणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ २॥

कालिन्दीजलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् ।

चिन्तयञ्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृतेरिति ॥ ३॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

  आत्मानं गोपायतीति , ‘गोपः’ जीवः, ‘गोपी’ माया , ‘गावः’ वेदाश्च, तैः आवीतं स्वामितया आश्रितं |  ‘सुरद्रुमः’ वेदः, तस्य ‘तलं’ स्वरूपं, ‘आश्रितं’ तत् प्रतिपाद्यम्, इत्यर्थः |     

 ‘दिव्यालंकरणैः’ षड्विधैश्वर्यैर्यः, ‘उपेतम्’ | तथा ‘रत्न’ तुल्यम् अतिस्वच्छं यत् ‘पङ्कजं’ हृदयकमलं , तदन्तःस्थाकाशगतः, तम् | ‘‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।

  वैराग्यस्य च मोक्षस्य   षण्णां भग इतीङ्गना ॥’’ इति ते च षड् धर्म्मा यस्य सन्तीति भगवान् || 

   ‘कालिन्दी’ नाम निर्म्मलोपासना, तस्याः   ‘जलकल्लोलाः’ नानास्फुरणतरङ्गाः, तत्

   ‘सङ्गी,’   ‘मारुतः’ निश्चलप्राणवायुश्च, ताभ्यां   ‘सेवितम्’ आराधितम् |   

    यद्वा – भक्तानुग्रहार्थमाविष्कृतचिद्वनस्य यथाश्रुतमेवेदं ध्यानं | ‘सत्पुण्डरीक’ वदतिनिर्म्मले  ‘नयने’ यस्य तम् |   ‘मेघाभं’ नीरदश्यामलं | तडिदाभम्   ‘अम्वरं’ यस्य तं पीताम्वरम् |  ‘द्विभुजं’ देवकीप्रार्थनया अन्यभुजद्वयस्योपसंहृतत्वात् यद्वा अष्टादशाक्षरे द्विभुजो ध्येय इति सूचितम् |   ‘ज्ञानमुद्रा’ हृद्याश्रिततर्जन्यङ्गुष्ठयोगरूपा, तया,   ‘आढ्यं’ युक्तं | तर्जन्यंगुष्ठको सक्तावग्रतो हृदि विन्यसेत् | वामहस्ताम्बुजं वामे जानुमूर्धनि विन्यसेत् || ज्ञानमुद्रा भवेदेषा रामचन्द्रस्य प्रेयसी | वनमाला नाम नानापुष्पपल्लव रचिता पादतलावलम्विनी माला, विद्यते यस्य तं   ‘वनमालिनम्’ |   ‘ईश्वरम्’ उक्तार्थम् | 

   ‘गोपाः’ श्रीदामादयः ,  ‘गोप्यः’ राधाद्याः,  ‘गावः’ कपिलाप्रभृतयः, ताभिः   ‘आवीतं’ परिवृतम् | कल्पवृक्षाश्रयम् |  ‘दिव्यैः’ अलौकिकैः , आभरणैः,  ‘उपेतं’ | सिंहासनोपरि रत्नमयसुवर्णकमलमध्यस्थितम् | यमुनाजलतरङ्गसम्बन्धिवायुना सेवितम् | एवंविधं श्रीकृष्णं,   ‘चेतसा,’ चिन्तयन्, ध्यायन्, नरः   ‘संसृतेः’ संसारात् ,   ‘मुक्तोभवति’  ‘इति’ शब्दो ध्यानसमाप्त्यर्थः ||३||

                            || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

गोप, गोपी और गायों से घिरे हुए, गोपगोपीगवावीतं  – आत्मानं गोपायतीति  ‘गोपः  जीवः, जो अपनी रक्षा का प्रयत्न करे सो जीव अर्थात श्रीदामा आदि  गोप और राधादि गोपी  ‘गोपी’ माया,  तथा कपिलादि गायें  ‘ गावः ’ वेदाः , तैः ‘आवीतं ’ स्वामितया आश्रितं | इन सबके द्वारा घिरा हुआ , इन सबने जिसका आश्रय लिया हुआ है, वह है { गोपगोपीगवावीतं }  जो देवताओं का वृक्ष (स्वर्गीय कल्पवृक्ष) है |  वेद ही सुर द्रुम है ‘ निगम कल्पतरु तले ’ उस वृक्ष के तल में बैठे हुए हैं, अर्थात् मूल में   बैठे हुए हैं | इसका तात्पर्य है कि वेद के द्वारा प्रतिपाद्य पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही हैं  | क्योंकि हम सब पूर्ण होना ही चाहते हैं |  दिव्य, अति-उत्कृष्ट आभरणों से युक्त हैं | दिव्यालंकरणोपेतं {श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभि कौस्तुभं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम् ॥}   अर्थात् अलौकिक आभरणों से शोभित , अथवा श्रीमद्भागवत के स्कन्धः १०/पूर्वार्ध/अध्याय २१ अनुसार 

  चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज मालानुपृक्तपरिधान विचित्रवेशौ ।

 मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां  रङ्‌गे यथा नटवरौ क्व च गायमानौ ॥ ८ ॥ 

अहो नूतन आम्र पल्लव, मयूरपिच्छ, पुष्प गुच्छ तथा स्थल और जल में उत्पन्न होने वाले कमल की माला को धारण किए हुए बलराम और श्री कृष्ण जब कभी गोप बालों के बीच गान करते हैं तब यही प्रतीत होता कि कोई दो श्रेष्ठ नट रंगभूमि में गा रहे हैं।  तथा षड्विध ऐश्वर्य से युक्त ,ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ समग्र ऐश्वर्य, शौर्य, यश, श्री, ज्ञान, और वैराग्य इन छः गुणों से “भग शब्द ” बनता है । (“भगवान” शब्द की व्युत्पत्ति” भगः अस्य अस्ति इति भगवान्)   और एक रत्न से बना हुआ कमल है रत्न तुल्य अर्थात अति स्वच्छ  पङ्कज  { हृदय कमल } उस हृदय कमल के अन्दर जो आकाश है जिसके मध्य में वे विराजमान  हैं | अथवा भक्त ही रत्न हैं , उनके हृदय में जो विराजते हैं |  रत्नपङ्कजमध्यगम्  निर्मल उपासना की धारा ही कालिन्दी यानी यमुना है { कलिं द्यति ,खण्डयति इति कलिन्दः तस्यापत्यम् स्त्री कालिन्दी } जो कलियुग के दोषों का छेदन भेदन करे सो यमुना ,  उस यमुना के जल की कल्लोल ध्वनि के संग से शीतल हुई वायु से अर्थात निश्चल प्राण वायु से सेवित , आराधित  भगवान कृष्ण को अन्तःकरण की वृत्तियों के द्वारा, मन-बुद्धि के द्वारा उनका चिंतन/धारणा करने से इस संसार (कर्तृत्व  भोक्तृत्व लक्षणो संसारः – संसार का लक्षण है कर्ता और भोक्ता होना, ये अज्ञान के कारण ही है ) के आवागमन से मुक्त हो जाता है || ३ || 

  || मूल उपनिषद ||

तस्य पुना रसनं , जलभूमीन्दुसम्पातकामादि कृष्णायेत्येकं पदं , गोविन्दायेति द्वितीयं , गोपीजनेति तृतीयं , वल्लभायेति तुरीयं , स्वाहेति पञ्चममिति पञ्चपदीं जपन् , पञ्चाङ्गं द्यावाभूमी सूर्याचन्द्रमसौ साग्नी तद्रूपतया ब्रह्म संपद्यते इति ब्रह्म संपद्यत इति  ||१३|| 

 || संस्कृत व्याख्या || 

  द्वितीयप्रश्नोत्तरमाह , तस्य पुना रसनमिति |   ‘तस्य’ कृष्णाख्यब्रह्मणः,   ‘रसनं’ 

    ‘जलभूमीन्दुसम्पातकामादि’ यथा स्यात् तथा पञ्चपदजपनम्, इति शेषः | जलं ककारः, भूमिः लकारः, ईकारः अग्निः, इन्दुः, अनुस्वारः, एतेषां सम्पातरूपं यत् कामबीजं, तत् आदौ प्रथमं यथास्यात्तथेत्यर्थः | तान्येव पञ्च पदानि विवृणोति , कृष्णायेत्येकं पदमित्यादिना | उक्तरसनस्य फलमाह , पञ्चपदीमिति | ‘पञ्चपदीं जपन्,’ पुरुषः 

 ‘पञ्चाङ्गं’ ‘ब्रह्म’ नारायणात्मकं, ‘तद्रूपतया’ पञ्चाङ्गब्रह्मतादात्म्येन, प्राप्नोतीति सम्बन्धः | इदन्तु सकृज्जपफलम् | पञ्चाङ्गान्याह | ‘द्यावाभूमी,’ तथा अग्निना सहितौ ‘साग्नी,’ 

 ‘सूर्याचन्द्रमसौ’ अभ्यासः प्रथमोपनिषत्समात्यर्थः || १३ ||  

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

अब उस कृष्ण नाम वाले ब्रह्म का जो रसन माने कीर्तन,  रसायन या विस्तार है वो समझने की कोशिश  करते हैं | { प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिषेधतः । नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ।। २.१.७ } (परीक्षित! जो  निर्गुण स्वरूप में स्थित हैं और विधि-निषेध की मर्यादा को पार कर चुके हैं, वे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी प्रायः भगवान के अनंत कल्याणमय गुणों के वर्णन में रमण करते रहते हैं  अर्थात् यह गुण कीर्तन ही रसन है | 

ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भयस्तेनात्मनापोऽनलमूर्तिरत्वरन् ।

ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥२.२. २८॥   इसके बाद जैसा कि भागवत जी में क्रम मुक्ति का निरूपण किया  गया  है कि वह निर्भय हुआ योगी अपने सूक्ष्म शरीर को पृथ्वी में मिला देता है फिर क्रम से जल में , अग्नि में , वायु में , आकाश में और फिर स्वाहा नाम वाली ब्रह्मशक्ति में लीन हो जाता है |  ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।१२.६।।  परन्तु जो भक्त जन मुझे ही परम लक्ष्य समझते हुए सब कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्य योग के द्वारा मेरा (सगुण का) ही ध्यान करते हैं।। तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।१२.७।। हे पार्थ ! जिनका चित्त मुझ में ही स्थिर हुआ है ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।।

  जल भूमिं अग्नीन्दुसम्पातकामादि , जल {क} है , भूमि {ल} है , अग्नि {ई} है  और इंदु  अनुस्वार है अब इनका सम्पातरूप संग्रहीत रूप काम बीज अर्थात ( क +ल +ई +म् = क्लीं )  जल , भूमि, अग्नि और चंद्रमा पहले चित्त जल के समान  द्रवीभूत तरल अर्थात प्रेम पूर्ण होना चाहिए फिर जब   जल ही  कठिन हो जाता है , घनीभूत हो जाता है तो भूमि बन जाता है; विचार ही जब सघन रूप धारण कर लेते हैं तो वही पदार्थ बन जाते हैं, ऐसा इसका तात्पर्य है । फिर उसमें  ( ई ) अग्नि , ऊर्जा का संचार तदनन्तर ( अनुस्वार ) चन्द्रमा का संश्लेषण अर्थात  शान्ति , समाधि ,आल्हाद यह सब मिलाकर जो रसायन तैयार होता है वह क्लीं ( कामराज ) बीज मंत्र  है | इसमें जो मुख्य मंत्र है ( क्लीं कृष्णाय , गोविन्दाय, गोपीजन, वल्लभाय, स्वाहा ) इसको पंचपदी कहते हैं  |  उसमें काम शब्द आदि में है , काम माने क्लीं शब्द को पहले रखा है और बाद में कृष्ण कहा तो क्लीं कृष्णाय पहला पद/शब्द है, गोविन्द दूसरा पद है तो कृष्ण तत्व को समझना चाहिए गोविन्द तत्व को समझना चाहिए, गोपीजन तीसरा पद है, वल्लभ  तुरीयं  यानी चौथा पद है।   स्वाहा ये पांचवा  पद, यह पांच मिला कर के इसी को पञ्च पदागार विद्या कहते हैं ।उन उन पदों का स्मरण करके तद्रूप ही हो जाता है और फिर उन उन तत्वों का अतिक्रमण कर जाता है तथा ब्रह्मरूप हो जाता है |अब इस रसायन का फल बताते हैं  पञ्चपदीं जपन् , यह जो नारायणात्मक पञ्चाङ्ग ब्रह्म है इसका जप करते हुए तद्रूपता को प्राप्त हो जाता है | अर्थात् पञ्चाङ्ग ब्रह्म के साथ जप करने वाले का तादात्म्य हो जाता है और तादात्म्य हो जाने से संसार से मुक्त हो जाता है जगत से नहीं क्योंकि जगत तो ब्रह्मरूप  ही है { हरिरेव जगत् जगदेवहरिः } अहंता ममता रूपी संसार मानसिक होता है और जगत भौतिक होता है |  | यही जप का फल है | अब ये पाँच अंग क्या हैं  यह बताते हैं | पञ्चाङ्गं = द्यावाभूमी ,  अग्निना सहितौ साग्नी , सूर्याचन्द्रमसौ   जप करते हुए यह पांच हैं – द्यावा माने आकाशगंगा; जो ऊपर है भूमि माने पृथ्वी,नीचे  है  सूर्य अर्थात् बुद्धि ,  चंद्रमा अर्थात् मन और अग्नि अर्थात् वाणी  ये बीच में हैं; और इन पांचों  का जो संयुक्त समन्वित  रूप  है उसे ब्रह्म नाम से कहते हैं । शरीर में भी मुख्य पांच अंग हैं  १ हृदय २ शिर ३ शिखा ४ कवच यानी बाहुमूल ५ अस्त्र यानी सम्पूर्ण शरीर अन्दर , बाहर और चारों तरफ | इसका न्यासप्रयोग इस प्रकार होगा क्लीं कृष्णाय दिवात्मने हृदयाय नमः २ गोविन्दाय भूम्यात्मने शिरसे स्वाहा ३ गोपीजन सूर्यात्मने शिखायै वषट्  ४ वल्ल्भाय चन्द्रात्मने कवचाय हुं ५  स्वाहा अग्न्यात्मने अस्त्राय फट्  || १३ ||  

  || मूल उपनिषद ||

  तदेष श्लोकः क्लीमित्येतदादावादाय कृष्णाय गोविन्दायेति च गोपीजनवल्लभाय   बृहद्भानव्या  सकृदुच्चरेत्  यो गतिस्तस्यास्ति मङ्क्षु नान्या गतिः स्यादिति ||१४||

 || संस्कृत व्याख्या || 

  उक्त रसने मन्त्रसम्वादमाह, तदेव इति | ‘तत्’ तत्र उक्ते रसने, ‘एषः,’ ‘श्लोकः’ मन्त्रः , वर्तत इति | ‘क्लीमित्येतत्,’ आदौ ‘आदाय’ उच्चार्य, अथ ‘कृष्णाय’,‘गोविन्दाय’, इति, च, पुनः 

  ‘गोपीजनवल्लभाय,’ ‘वृहद्भानव्या’ स्वाहया, इत्यर्थः | इति ‘यः’, ‘सकृत्’ एकवारमपि , उच्चरेत् , तस्य ‘मङ्क्षु’ शीघ्रं, पञ्चाङ्गब्रह्मात्मरूप ‘गतिः’ भवति, ‘अन्या’ चन्द्रमण्डलरूपा, 

 ‘गतिः’ , तस्य ‘न स्यात्’ | ‘इति’ शब्दो रसनसमाप्त्यर्थः ||१४||

                                 || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 तो इन सबके सम्बन्ध से एक श्लोक  अथवा मंत्र बनाया – सबसे पहले क्लीं , ऐसा बोलना , समझना, क्लीं  कामराज बीज को  कहते हैं इसको (क्लींकारी कामरूपिण्यै – कुञ्जिकास्तोत्रं में )। क्लीं  , नम्बर एक;  कृष्णाय नम्बर दो;   गोविन्दाय ; नम्बर तीन; गोपीजनवल्लभाय  नम्बर चार ;   बृहद्भानव्या , स्वाहया   स्वाहा नम्बर पांच इति । सकृदुच्चरेद्योऽसौ   यदि कोई एकबार भी उच्चारण करे  तो  मङ्क्षु  = शीघ्रं  माने तुरंत ही गतिस्तस्यास्ति पञ्चाङ्ग ब्रह्म माने आत्मरूप गति हो जाती है | नान्या गतिः स्यादिति । उसकी अन्य गति यानी चन्द्रमण्डल रूपा गति नहीं होती अर्थात आवागमन से मुक्त हो जाता है  |  इसे लम्बा लम्बा करके बोलना चाहिए, जैसे क्लीं ऽऽऽऽऽम कृष्णाऽऽऽऽऽऽयऽ  गोविन्दाऽऽऽऽऽऽयऽ गोपीजनवल्लभाऽऽऽऽऽयऽ स्वाऽहाऽऽऽ, इस तरह इन्हें  वैखरी वाणी से बोलना चाहिए। तो इससे जो ज्ञान प्राप्त होता है  वो अत्यंत तीव्र, झटपट, शीघ्रता पूर्वक ये परम तत्व में ले जाते हैं, इन शब्दों का जो स्पन्दन है , शब्द शक्ति है , इससे अंतःकरण शुद्ध होने पर  ज्ञान हो जाता है । { गं गति ज्ञानयो }  गति – गमनार्थ  है और ज्ञान भी इसका अर्थ होता  है – गं गतिज्ञानयोः, गं धातु से गति और ज्ञान ये दो अर्थ होते हैं । तो वह स्वयं भी गोविन्दरूप ही हो जाता है । ||१४||

  || मूल उपनिषद ||

  भक्तिरस्य भजनं । एतदिहामुत्रोपाधिनैराश्येनैवामुष्मिन्  मनसः कल्पनमेतदेव च नैष्कर्म्यम् ||१५|   

कृष्णं तं विप्रा बहुधा यजन्ति गोविन्दं सन्तं बहुधाऽऽराधयन्ति । गोपीजनवल्लभो भुवनानि दध्रे ||१६||

 || संस्कृत व्याख्या || 

  कथञ्चाहो तद्भजनमित्यस्योत्तरं वक्तुं भजनशब्दार्थमाह, भक्तिरस्य भजनमिति | पर्यायेणार्थाऽवगमासम्भवात् पुनर्भजनस्य लक्षणमाह, तदिहामुत्रेति | ‘इह’,‘अमुत्र,’ ‘उपाधेः’ ऐहिकपारलौकिकप्रयोजनस्य,  ‘नैरास्येन’ निरसनमेव नैरास्यं तेन  ऐहिकामुष्मिकफल- कामनाराहित्येन, ‘एव,’  ‘अमुष्मिन्’  कृष्णाख्ये ब्रह्मणि   ‘मनसः,’ ‘कल्पनं’ प्रेम्णा तन्मयत्वं, तदेव भजनमुक्तमित्यर्थः | ‘एतत्’ भजनम् ,  ‘एव’,  ‘नैष्कर्म्यं’  ज्ञानम् इत्यर्थः | ||१५||

 कृष्णं तमिति | ‘तं,’  ‘कृष्णम्’  आनन्दात्मानं, ‘विप्राः’ सात्विकाः, ‘वहुधा’ द्रव्ययज्ञ-पाठयज्ञ- योगयज्ञादिभिः ‘यजन्ति’ | गोविन्दमिति | गोभूमिवेदविदितं, ‘सन्तं,’  ‘वहुधा’  श्रवणकीर्तनस्मरणपादसेवनार्चनवन्दनदास्यसख्यात्मनिवेदनादिभिः, विप्रादयः सर्वेऽपि

 ‘आराधयन्ति’ सेवयन्ति | तस्यैव सेव्यत्वे हेतुः गोपीजनवल्लभ इति |  ‘गोप्यः’  पालनशक्तयः, तासां  ‘जनः’  समुदायः तस्य  ‘वल्लभः’ स्वामी प्रेरकः सन् , ‘भुवनानि’  अनन्तकोटिब्रह्माण्डानि ‘दध्रे’ | उपलक्षणमेतत् | अपालयत् पालयति पालयिष्यति च ||१६||  

                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

भक्तिरस्य भजनम् । भक्ति माने भाग , माने अंश,माने एक हिस्सा ,   ईश्वर अंश जीव अविनाशी | 

 चेतन अमल सहज सुख राशी || { ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।}  इसकी जो भक्ति है, यानी विभक्त न होना, एकरूपता को प्राप्त करना, उपासना करना, सेवन करना; भज सेवायां  -धातु से भक्ति शब्द  बनता है  तो उसकी जो भक्ति है , सेवा है  उसी को भजन कहते हैं । इह माने  इस लोक , अमुत्र माने परलोक इन दोनों उपाधियों को हटा देने पर, निरस्त कर देने पर  इस लोक और  पर लोक की  फल कामना से रहित  होकर  ‘‘अमुष्मिन् कृष्णाख्ये ब्रह्मणि मनसः कल्पनं  प्रेम्णा तन्मयत्वं तदेव भजनं उक्तं ’’ इस प्रकार मन की  वृत्ति को कृष्णाकार बना देना ही भजन कहा जाता है ऐसा करने से नैष्कर्म्य अर्थात् ज्ञान की सिद्धि हो जाती है | फिर तो परम तत्व ही शेष रहता है | इहामुत्र की उपाधि को मन की कल्पना मात्र जान लेने से नैराश्य की सिद्धि बड़ी सरलता से होजाती है |और जब आशा ही नहीं रहेगी तो स्वभावतः  नैष्कर्म्य प्राप्त हो जाता है । क्योंकि यह लोक और पर लोक केवल जाग्रत और स्वप्न अवस्था में ही रहते हैं अर्थात् जब मन होता है तब  ही रहते हैं अतः मनसापेक्ष हैं | पहले मन में कामना होती है फिर उस कामना की पूर्ति के लिये कर्ममें प्रवृत्ति होती है और इन दोनों का मूल अज्ञान या मोह है यह बात दर्शन , विज्ञान और व्यावहारिक अनुभव से प्रसिद्ध ही है | गीता में एक श्लोक है: अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१८.१४।।

  इस श्लोक में कर्म के पांच हेतु बताते हैं: अधिष्ठान, मान लो शरीर अधिष्ठान है कर्म का; और कर्ता, जीव; करण, ज्ञानेन्द्रियाँ-कर्मेन्द्रियाँ; चेष्टा, जो है वो प्राण से होती है, एनर्जी से ; दैव, प्रारब्ध कर्म, पूर्व कर्म । लेकिन ये पांच हेतु अविद्या, अज्ञान के ही विलास हैं, क्योंकि आप शरीर नहीं हैं आप मन-इन्द्रिय-प्राण नहीं हैं, आप इन सबके साक्षी हैं, जब साक्षी का ज्ञान हो जायेगा तो  नैष्कर्म्य  की सिद्धि हो जाएगी । ये सब शुरुआत में जरा  complicated  सा लगता है परन्तु गीतादि सत्शास्त्रों का अभ्यास करने से एकदम सरल हो जायेगा।

 तं कृष्णं आनन्द आत्मानं उन आनन्दस्वरूप कृष्ण का  विप्राः सात्विकाः , विप्र वे हैं जिनमें सत्वगुण की अधिकता होती है वेद पाठात् भवेत् विप्रो । वेदपाठी लोग उन कृष्ण का अनेक प्रकार से बहुधा यजन्ति  यजन करते हैं, द्रव्ययज्ञ , पाठ यज्ञ , और योग यज्ञ आदि से पूजन करते हैं, समर्पित होते हैं। यज्ञ ( यज् धातु ) का अर्थ है स्थूल द्रव्य त्याग, परमात्मा की सेवा में आपके पास जो स्थूल सामग्री है उसका विनियोग/उपयोग करना। गीता जी में भी कहा है कि “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।।९.२७।।”  हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।। “चेतस्तत्प्रवणं सेवा।” अर्थात्  चित्त की श्रीकृष्णोन्मुखता ही सेवा है | वह सेवा भी मानसी ही मुख्या है। ‘तत्सिद्वयै तनुवित्तजा’। इसकी सिद्धिके लिये तनुजा यानी देह से और वित्त  यानी द्रव्य से सेवा करनी चाहिए।  कायिक वाचिक आदि सेवा करते-करते अंत में मानसी सेवा की योग्यता प्राप्त होती है। अन्यथा तो भगवान ने अपने ही श्रीमुख से कहा है  कि

  “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।४ .११ ।।  ” जो मुझे जैसे भजते हैं,  मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ;  हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।। सेवा का असली रूप तो गोपियों के जीवन में प्रकट होता है देखिये भागवत जी में –  ‘‘ता नाविदन्मय्यनुषङ्गबद्ध धियः स्वमात्मानमदस्तथेदम्

यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे || ११|१२|१२|| ’’  ग्यारहवें स्कंध में श्री कृष्ण भगवान ने उद्धव से जब गोपियों का वर्णन किया, तो बोले- यथा समाधौ मुनयः– जैसे मुनी समाधि में स्थित होते हैं तब वृत्तियों का संपूर्ण निरोध हो जाता है और सब कुछ भूल जाते हैं { यह और वह का ज्ञान नहीं रहता केवल द्रष्टा मात्र शेष रहता है }  यह अध्यात्म हो गया,  ‘‘ अब्धितोये नद्यः प्रविश्य इव ’’ यह आधिभौतिक हो गया, जैसे नदियाँ जाकर समुद्र में मिलती है। अध्यात्म में वृत्तियाँ जाकर अहं में विलीन होती है। और ता नाविदन् मयि अनुषंगबद्ध– वैसे ये गोपियाँ   सब कुछ छोड़कर मुझ श्रीकृष्ण में तन्मय हो गयीं हैं । यह अधिदैव हो गया। अधिदैव में संपूर्ण वृत्तियाँ- गोपियाँ श्री कृष्ण में जाकर मिलती हैं।  इस प्रकार की गंभीरता जब चित्त में आती है  तब वो ही  सेवा का सच्चा रूप है |  ‘‘सालोक्य सार्ष्टि सामीप्य सारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥ ३|२९|१३॥’’  कपिल भगवान कह रहे हैं, जो तत्वज्ञ है, जो सबसे होशियार है, वे ये पाँचों प्रकार की सार्ष्टि, सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य मुक्ति मेरे द्वारा दिये जाने पर भी नहीं चाहते। केवल मेरी सेवा ही चाहते हैं | 

अब गोविन्द क्या है सो बताते हैं   गोभूमिवेद विदितं , गाय , भूमि और वेद  ये गोविन्द की प्रत्यक्ष मूर्तियां हैं गाय से इन्द्रियों की शुद्धि , भूमि से स्थान शुद्धि और वेद शब्द से बुद्धि की शुद्धि परिलक्षित है | गोविन्द होते हुए, गोविन्द को जानते हुए – गो माने पृथ्वी, वाणी और वेद माने ज्ञान तो इसमें स्थूल और सूक्ष्म सभी आ जाते हैं।  गोः इन्द्रियैः विन्दते लभ्यते इति गोविन्दः – इन्द्रियों के द्वारा, वेद के द्वारा और पदार्थों के त्याग के द्वारा; तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः । तो ये सब जो यज्ञ की प्रक्रिया है, इसके द्वारा परमात्मा की आराधना की जाती है । तो गोविन्द होते हुए; वो कहते है न आत्मा-परमात्मा एक है, आत्मा जब अपने परम या उत्कृष्ट रूप में जान ली जाती है तो उसी को परमात्मा कहते हैं । परमात्मा होते हुए उसकी आराधना करते हैं। यहां भी बहुधा का अन्वय कर लेना चाहिये अर्थात अनेक प्रकार से मुख्यतया जो भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं।

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

  श्रीकृष्णश्रवणे परीक्षिदभवद्वैयासकिः कीर्तने प्रह्लादः स्मरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने।

अक्रूरस्त्वथ वन्दने च हनुमान्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत्कृष्णाप्तिरेषां फलम्॥

श्रवण भक्ति के आदर्श हैं महाराज (परीक्षित), नाम , रूप , गुण , लीला और धाम का कीर्तन करने वालों में आचार्य (शुकदेव), स्मरण करने वालों में भक्त राज (प्रह्लाद), पादसेवन में  (लक्ष्मी), अर्चन में (पृथु राजा), वंदन में (अक्रूर), दास्यभक्ति  में (हनुमान), सख्यभक्ती में (अर्जुन) और आत्मनिवेदन में (बलि राजा) – इन्हें नवधा भक्ति के आदर्श पुरुष  कहते हैं। ये ही नवधा भक्ति के आचार्य हैं | अब नवधा भक्ति का विश्लेषण करते हैं | 

श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।

कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।

स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।

पाद सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्व समझना।

अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।

वंदना: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्त जन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरुजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार  करना या उनकी सेवा करना।

दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।

सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।

आत्मनिवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई है।

गोस्वामी सन्तशिरोमणि श्री तुलसीदासजी ने इसे बड़े ही सरल शब्दों में प्रक्रियात्मक  ढंग से समझाया  है |

 १ – प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।

२ – दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

३ – गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

४ – चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।

५ – मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

६ – छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।

७ – सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।

८ – आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।

९ – नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।। 

गोपीजनवल्लभो भुवनानि दध्रे , धृतवाननित्यर्थः | एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत:।(बृ. ३.८.९)  गोपी माने पालिनी शक्ति और उन शक्तियों का समुदाय माने गोपीजन उनका वल्लभ माने स्वामी , प्रेरक होते हुए ,भुवनानि, माने अनंतकोटी  ब्रह्माण्डों को,  दध्रे ,धारयति माने पालन करता है  ‘‘य इमान् लोकान् ईशत ईशनीभिः’’  गोपीजनवल्लभ शब्द से इङ्गित जो शक्ति है वो तीनों  लोकों को (१४ भुवनों) को धारण करती है। संचालन करती है | चूंकि भगवान पालन करते हैं इसलिये वे सेवनीय हैं , भजनीय हैं |  श्रीमद्भागवत में कहा है कि  ‘‘ तैर्दर्शनीयावयवैरुदार विलासहासेक्षितवामसूक्तैः ।।

हृतात्मनो हृतप्राणांश्च भक्तिरनिच्छतो मे गतिमण्वीं प्रयुङ्क्ते ।।३.२५.३६।।’’ अर्थ:- दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार हास-विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणी से युक्त मेरे उन रूपों की माधुरी में उनका मन और इन्द्रियाँ फँस जाती है । ऐसी मेरी भक्ति न चाहने पर भी उन्हें परम पद  प्राप्त करा देती है ।||३६||  ||१६||  

  || मूल उपनिषद ||

स्वाहाश्रितो जगदेजयत्  सुरेताः ॥ १७॥ 

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो जन्येजन्ये पञ्चरूपो बभूव ।

 कृष्णस्तथैकोऽपि जगद्धितार्थं शब्देनासौ पञ्चपदो विभातीति ॥ १८॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

 एवं पालकत्वात् सेव्यत्वमुक्तम् , अथ जनकत्वादपि तदाह , स्वाहाश्रित इति | ‘स्वाहा’ माया ,

 ‘तदा’श्रितः तदधिष्ठाता सन् ‘जगत्’ अव्यक्तनामरूपम्,  ‘एजयत्’  अचालयत् व्यक्तीभावायोन्मुखमकरोत्, सृष्टिकाले | अत्र हेतुगर्भविशेषणमाह, सुरेता इति | सुष्ठु शोभनं चिद्रूपं मायायां प्रतिविम्बोन्मुखं, रेतो यस्य सः ‘सुरेताः’ ‘‘ रूपं रूपं प्रतिरूपो वभूव ’’  इतिश्रुतेः | 

     ‘‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।’’ इति स्मृतेश्च | ||१७||

  भक्तानामाराधनसौकर्याय गोपालविद्यात्मकशब्दरूपेण भगवान् पञ्चधा भातीति सदृष्टान्तमाह, वायुर्यथैक इति | ‘यथा,’ ‘भुवनं’ ब्रह्माण्डं , ‘प्रविष्टः’ , ‘एकः,’ एव, ‘वायुः,’ ‘जन्ये जन्ये’ शरीरे शरीरे प्रतिशरीरं,  ‘पञ्चरूपः’ प्राणापानव्यानादिरूपः,  ‘वभूव’ | ‘तथा’ एव ‘एकोऽपि,’

  ‘असौ’ कृष्णः, ‘जगद्धितार्थं,’  ‘भुवनं,’ ‘प्रविष्टः,’ ‘शब्देन’ गोपालविद्यात्मकेन, पञ्चपदानि यस्य सः  ‘पञ्चपदः,’ विविधं  ‘भाति’ प्रकाशते , ‘इति’ शब्दो मन्त्रसमाप्त्यर्थः |  || १८ || 

                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

  और सृष्टि काल में वे जनक भी हैं इसलिए कहा {स्वाहा श्रितः} स्वाहा माने अपनी शक्ति मायाका आश्रय लेकर , माया के अधिष्ठाता होकर { मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् } मेरे से ही  सत्ता और स्फूर्ति पाकर  प्रकृति चराचर? जड़ चेतन आदि भौतिक सृष्टि की रचना करती है। जगत् माने अव्यक्त नाम और रूप को एजयत् माने संचालित करते हैं | अर्थात् अव्यक्त भाव से व्यक्त भाव की ओर उन्मुख करते हैं |  ‘‘अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।।८.१८।।’’ ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भकालमें उसी अव्यक्तमें सम्पूर्ण प्राणी लीन हो जाते हैं।||१८||   स्वाहाश्रितो जगदेजयत्  और स्वाहा शब्द में जो शक्ति है, स्वाहा माने द्रव्य-त्याग, दान, समर्पण इसके द्वारा ही यह जगत वीर्य, पराक्रम, शक्ति से संपन्न है अर्थात इसमें क्रिया शक्ति का आधान होता है | सुरेताः { सुष्ठु शोभनं चिद्रूपं मायायां प्रतिविम्वोन्मुखं रेतो यस्य सः } सुरेताः’ सुन्दर वीर्यवान , पराक्रमशाली   यही  सुरेताः शब्द का  तात्पर्य है | ‘‘सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।१४.४ ।।’’ 

 हे कौन्तेय ! समस्त योनियों में जितनी मूर्तियां (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात गर्भ महद् ब्रह्म है ,       (प्रकृति) है और मैं बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ।। 

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ || कठोपनिषद 

”जिस प्रकार एक ही ‘अग्नि’ भुवन में प्रविष्ट हुआ है किन्तु यह जिस रूप के सम्पर्क में आता है उसका ही प्रतिरूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार समस्त भूत-प्राणियों में विद्यमान ‘अन्तरात्मा’ एक ही है परन्तु रूप-रूप के सम्पर्क से वैसा वैसा प्रतिरूप बन जाता है; इसी प्रकार वह उन सबसे बाहर भी रहता है।

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० || कठोपनिषद 

 “जिस प्रकार एक ही ‘वायु’ भुवन में प्रविष्ट हुआ है किन्तु भिन्न-भिन्न रूपों के सम्पर्क से वैसा वैसा प्रतिरूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियों में विद्यमान ‘अंतरात्मा’ एक ही है परन्तु रूप रूप के सम्पर्क से वैसा-वैसा प्रतिरूप धारण करता है; और इसी प्रकार वह उन सबसे बाहर भी रहता है।

त्वय्यग्र आसीत् त्वयि मध्य आसीत् त्वय्यन्त आसीत् इदमात्म तंत्रे ।

 त्वं आदिरन्तो जगतोऽस्य मध्यं घटस्य मृत्स्नेव परः परस्मात् ॥ ८.६.१०॥ श्रीमद्भागवत, आपमें ही पहले यह जगत लीन था ,मध्यमें भी यह आपमें ही स्थित है और अन्त में भी यह पुनः आपमें ही लीन हो जायगा | आप स्वयं कार्य-कारण से परे परम स्वतन्त्र हैं | आप ही इस जगत के आदि ,अन्त और मध्य हैं —- वैसे ही जैसे घड़ेका आदि मध्य और अन्त मिट्टी है || १० || भक्तों की आराधना को सरल बनाने के लिए गोपालविद्यात्मक शब्द रूप से भगवान अपने आपको पाँच रूपों में अभिव्यक्त करते हैं , इस बात को दृष्टान्त के साथ समझाते हैं | जैसे भुवन में , ब्रह्माण्ड में  प्रविष्ट एक ही वायु  उत्पन्न हुए प्रत्येक शरीर में पाँच रूपों में प्रकट हो जाता है { प्राण , अपान , समान , उदान और व्यान } उसी प्रकार ये एक ही कृष्ण जगत के कल्याण के लिए शब्द के द्वारा इस ब्रह्माण्ड भुवन में प्रविष्ट होकर पञ्चपदात्मक गोपालविद्या के रूप में अलग अलग होकर विविध रूपों में प्रकाशित होते हैं | 

जैसे एक ही वायु सारे संसार में प्रविष्ट हो गया और अनेक रूपों में, जन्येजन्ये माने प्रति शरीर में पञ्चरूपो बभूव, पंच रूप माने पंच प्राणों  के रूप में हो गया । इसी प्रकार कृष्ण एक होते हुए भी,जगत के हित लिए ये पाँच शब्दों के रूप में बन गए, जैसे वायु पांच प्राणों के रूप में बन गया, प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान ; ऐसे ही कृष्ण भी जगत के लिए पाँच पदों के रूप में, शब्दों के रूप में बन गए । क्लीं एक , कृष्ण दो , गोविन्द तीन , गोपीजनवल्लभ चार और स्वाहा पांच, इन शब्दों में कृष्ण ही जगत के बीज हैं । ||१७||१८||

    || मूल उपनिषद ||

ते होचुरुपासनमेतस्य परमात्मनो गोविन्दस्याखिलाधारिणो ब्रूहीति ।||१९|| 

तानुवाच यत्तस्य पीठं हैरण्याष्टपलाशमम्बुजं तदन्तरालिकेऽनलास्त्रयुगं तदन्तराद्यार्णाखिलबीजं

 कृष्णाय नम इति बीजाद्यं सब्रह्माणमाधायानङ्गगायत्रीं यथावदालिख्य भूमण्डलं शूलवेष्टितं कृत्वाङ्गवासुदेवादिरुक्मिण्यादिस्वशक्तीन्द्रादिवसुदेवादिपार्थादिनिध्यावीतं यजेत् |  

 सन्ध्यासु प्रतिपत्तिभिरुपचारस्तेनास्याखिलं भवत्यखिलं भवतीति ॥ २०॥

 तदिह श्लोका भवन्ति । एको वशी सर्वगः कृष्ण ईड्य एकोऽपि सन्बहुधा यो विभाति ।

तं पीठस्थं येऽनुभजन्ति धीरा स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ २१ ॥ 

      || संस्कृत व्याख्या ||     

  ‘एतस्य,’ ‘परमात्मनः’ श्रीकृष्णस्य, ‘गोविन्दस्य’ ‘अखिलाधारिणः’, ‘उपासनम्’ आराधनं,  ‘ब्रूहि’ कथय, इत्यर्थः || १९ || 

   तत्राराधनाधिष्ठानभूतं पीठनिरूपणमवतारयति, तानुवाचेति |  ‘यत् तस्य पीठं,’ तत् ‘तान्,’ प्रति ब्रह्मा उवाच इत्यर्थः | स्वगृहे क्षालितं पीठं स्थापयित्वा  ‘हैरण्याष्टपलाशं’ सौवर्णाष्टदलं, 

   ‘अम्बुजं,’ स्थापयेत् गन्धयुतेन चन्दनेन वा लिखेत् इत्यर्थः |  ‘तदन्तरालिके’ तस्य कमलस्य अन्तराल भवे प्रदेशे‘अनलास्रयुगं’ त्रिकोणद्वयं, संलिखेदित्यर्थः | तदन्तराद्यार्णेति | तस्य षट्कोणस्य,  ‘अन्तरा’ मध्ये,  ‘आद्यार्णरूपम्  ‘अखिल’ कार्यस्य  ‘बीजं’ कामबीजं, साध्यनाम कर्मनाम च लिखेदिति शेषः| तदुक्तं सनत्कुमारसंहितायां |  ‘‘कर्णिकायां लिखेद्वन्हिपुटितं मण्डलद्वयं | तस्य मध्ये लिखेद्बीजं साध्याख्यं कर्मसंयुतम् ’’ इति || ‘कृष्णाय नम इति,’   ‘बीजाद्यं’ बीजेन कामबीजेन आद्यं षडस्रं , सन्धिषु षडक्षरं लिखेत्  

‘‘षडस्रं सन्धिषु’’  इति क्रमदीपिकोक्तेः | सब्रह्माणमिति | पूर्वलिखितं कर्णिकास्थमनङ्गबीजं ‘सब्रह्माणम्’ अष्टादशाक्षरमन्त्रोपेतम्,  ‘आधाय,’ इत्यर्थः | मन्त्रतद्द्रष्टोरभेदात् मन्त्रो ब्रह्मा | तदुक्तं संहितायां |   ‘‘ततः शिष्टैर्मनोर्वणैस्तं कामं वेष्टयेत् सुधीः ’’ इति | षट्कोणस्य पूर्वनैऋत्यवायव्यकोणेषु श्रीमिति बीजं लिखेत् | आग्नेयपश्चिमेशानकोणेषु, ह्रीमिति बीजं लिखेदिति शेषः | ‘‘ श्रियं षट्कोण कोणेषु ऐन्द्र नैऋति वायुषु | आलिख्य विलिखेन्मायां वन्हिवारुणशूलिषु ’’ इति संहितोक्तेः | अनङ्गगायत्रीमिति | अष्टदलस्य सर्वजनसम्मोहनकेशरेषु ‘‘अनङ्गगायत्रीं ’’ कामगायत्रीं, ‘यथावत्’  त्रिशः त्रिशः, आलिखेदित्यर्थः |

  ‘‘ कामदेवाय सर्वजनप्रियाय सर्वजनसम्मोहनाय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वजनस्य हृदयं मे वशं कुरु कुरु स्वाहा ’’ इत्यष्टाचत्वारिंशदक्षरं मालामन्त्रं प्रतिदलं षट् षट् अक्षरं क्रमेण लिखेदित्यवबोद्धव्यम् | अष्टदलस्योपरि वृत्तं कृत्वा मातृकाक्षरैर्वेष्टयेदित्यपि बोध्यम् |

  ‘‘अक्षरैः कामगायत्र्या वेष्टयेत् केसरे सुधीः | काममालामनोर्वर्णैर्दलेस्वष्टसु मन्त्रवित् ||’’  लिखेद्गुहाननैर्भक्तैर्मात्रिकां तद्वहिर्लिखेत् |’’ इति संहितोक्तेः | भूमण्डलं शूलवेष्टितं कृत्वेति |  ‘‘भूगृहं चतुरस्रं स्यादष्टवज्रयुतं मुने’’   इति संहितोक्तेः | अस्यैव धारणायन्त्रत्वात् साध्यादिलेखनमप्यादावसूसुचत् | अतएव धारणविधानं तत्फलञ्च संहितायामुक्तं | 

  ‘‘जप्त्वा सहस्रमाज्येन मन्त्रसम्पातपूर्वकं | मार्जयित्वाऽयुतं जप्त्वा धारयेद् यन्त्रमुत्तमं || त्रैलोक्यैश्वर्यमाप्नोति देवैरपि स पूजितः |’’ इत्यादिना | इदन्तु केवलं धारणार्थं यदा यन्त्रं क्रियते तदभिप्रायेणोक्तं , यदा पुनः पूजार्थं यन्त्रं क्रियते तदा तु पूर्वं  ‘‘मण्डूकादि पृथिव्यन्तं पूजयेत् कर्णिकोपरि | अग्न्यादिपीठपादेषु धर्मादींश्चतुरो यजेत् | चतुर्षु पीठगात्रेषु धर्मादींश्चतुरो यजेत् | कर्णिकायां ततोऽनन्तं पद्मान्तंञ्च ततो यजेत् | तारवर्णप्रभिन्नानि मण्डलानि क्रमात् ततः | सत्वं रजस्तम इति यजेतात्मचतुष्टयम् | आत्मान्तरात्मा परमात्मा ज्ञानात्मेति क्रमात् सुधीः | विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगेति पञ्चमी | प्रह्वीं सत्यां तथेशानानुग्रहा नवमी स्मृता | प्रागाद्यष्टसु पत्रेषु कर्णिकायां यजेन्मुने’’ |  ‘‘ॐ नमो विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगयोगपद्मपीठात्मने नमः’’  इति पीठमन्त्रमयमस्योपरिविन्यस्य ,  ‘‘ततः पीठं समभ्यर्च्य देवमावाह्य नारद | अर्घ्यादि धूप दीपादीनुपचारान् प्रकल्पयेत्’’ | अथावरणपूजां कुर्यात् | तत्र प्रथमावरणमाह अङ्गेति | षट्कोणस्याग्नेय नैऋत्य  वायव्येशानेषु हृदय शिरः शिखा कवचानि , अग्रभागे नेत्रं , पूर्वादिदिक्षु च अस्त्रम् , इत्यङ्गानि पूजयेत् | द्वितीयावरणमाह , वासुदेवादीति | पूर्व पश्चिम याम्योत्तर दलेषु , यथाक्रमं वासुदेव सङ्कर्षण प्रद्युम्नानिरुद्धान् पूजयेत् | आग्नेय नैऋत्य वायव्येशानेषु , यथाक्रमं शान्ति श्री सरस्वती रतीः पूजयेत् |तृतीयावरणमाह |

 ‘रुक्मिण्यादि’ ‘ स्वशक्तयः ’ कृष्णशक्तयः | ‘‘दलेषु रुक्मिणी सत्यभामा जाम्ववती तथा | नाग्नजिती मित्रविन्दा कालिन्दी च ततः परा || लक्ष्मणा च सुशीला च पूज्या हेमामितप्रभा   ’’ | इत्यर्थः | चतुर्थपञ्चमाद्यावरणमाह , इन्द्रादि वसुदेवादि पार्थादीति |

 अत्र वसुदेवाद्यावरणमेव चतुर्थं वोध्यम् | पूर्वभागे वसुदेवाय पीतवर्णाय | आग्नेयकोणे देवक्यै श्यामलायै | दक्षिणभागे नन्दाय कर्पूरगौराय | नैऋत्यकोणे यशोदायै कुङ्कुमगौर्यै | पश्चिमे बलदेवाय शङ्खकुन्देन्दुधवलाय | वायव्ये कलापश्यामलायै सुभद्रायै | उत्तरकोणे गोपेभ्यः | ईशानकोणे गोपीभ्यः |   पञ्चमन्तु पार्थाद्यावरणम् | अर्जुननिशठोद्धव दारुक विष्वक्सेन सात्यकि गरुड नारदपर्वतान् पूजयेत् | षष्ठं निध्यावरणम् | पूर्वदिशि इन्द्रनिधये नमः  | आग्नेयदिशि नीलनिधये नमः  | याम्ये कुन्दाय नमः | नैऋत्यकोणे मकराय नमः  | पश्चिमे आनन्दाय नमः | वायव्ये कच्छपाय नमः  | उत्तरे शङ्खनिधये नमः  | ईशानकोणे पद्मनिधये नमः |  सप्तममिन्द्राद्यावरणम् | इन्द्राय पीतवर्णाय पूर्वदले | अग्नये रक्तवर्णाय | 

यमाय नीलोत्पलवर्णाय | रक्षोऽधिपतये कृष्णवर्णाय | वरुणाय शुक्लवर्णाय | वायवे धूम्रवर्णाय | कुवेराय नीलवर्णाय | ईशानाय श्वेतवर्णाय | पूर्वेशानयोर्मध्ये ब्रह्मणे गोरोचनावर्णाय | नैऋत्यपश्चिमयोर्मध्ये शेषनागाय श्वेतवर्णाय | अष्टमं आयुधावरणम्  | पूर्वदले वज्राय पीतवर्णाय | शक्तये शुक्लवर्णाय | दण्डाय नीलवर्णाय | खड्गाय श्वेतवर्णाय | पाशाय विद्युद्वर्णाय | ध्वजाय रक्तवर्णाय | गदायै स्वर्णवर्णायै  | त्रिशूलाय शुक्लवर्णाय | इत्यष्टमावरणम् | आवीतमिति | एतैः आवरणैः ‘ आवीतं ’ , परमेश्वरं , ‘ यजेत् ’  पूजयेत् | ‘ सन्ध्यासु ’ त्रिकालसन्ध्यासु , ‘ प्रतिपत्तिभिः ’ध्यानैः , ‘ उपचारैः ’ षोडशोपचारादिमहाराजोपचारैः , पूजयेदित्यर्थः | तेनेति | ‘ तेन ’ आराधनेन ‘अस्य’ आराधकस्य ‘अखिलं’ पुरुषार्थचतुष्टयं,भवति अभ्यासो द्वितीयोपनिषत् समाप्त्यर्थः||२०||

       उक्तोपासने मन्त्रसम्मतिमाह, तदिहेति | ‘तत्’ तस्मिन् दृष्टे ‘इह’ उक्तोपासने, ‘श्लोकाः’ मन्त्राः , अपि ‘भवन्ति’ वर्तन्ते | एको वशी सर्वग इति | ‘एकः’ सजातीय विजातीय स्वगत भेद रहितः, अत एव वशे सर्व्वमस्यातीति ‘वशी,’ ‘सर्वगः’ सर्वत्र देशतः कालतः वस्तुतश्चापरिच्छिन्नः , ‘कृष्णः’ आनन्दः, अतएव ‘ईड्यः’ ब्रह्मादीनामपि स्तुत्यः | पूर्वोक्तः ‘एकोऽपि सन्,’ ‘यः’ कृष्णः, जगत्पालनाय ‘वहुधा’ पञ्चरूपः, ‘विभाति’ विविधं प्रकाशते, वायुरिव प्राणादिभेदैः | तं पीठस्थमिति | ‘तं’ पञ्चपदात्मकं प्रागुक्तं, ‘पीठस्थम्’ अनुलक्ष्यीकृत्य, ‘ये,’ धीराः एकाग्रचित्ताः, ‘भजन्ति’ ‘तेषाम्,’ एव ‘शाश्वतं’ नित्यानन्दात्मकं, सुखं , न तु ‘इतरेषां’ तद्भक्तिरहितानाम् | अचक्षुष्मतामिव रूपादर्शनम् ||२१||

                                || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 सनकादि ऋषि लोग जो जिज्ञासा लेकर आये थे उसके बारे में उन्होंने प्रश्न किया:  कि ये जो अखिल जगत को धारण करने वाले { अखिल जगत के आधार “अधिष्ठान” श्रीकृष्ण } गोविन्द हैं इनकी उपासना कैसे की जाये ये हमें बताइये ।||१९||

 पहले मन्त्र में बताया था कि गोविन्दं सन्तं बहुधा आराधयन्ति । सन्तजन  अनेक प्रकार से इनकी उपासना करते हैं |  इसमें आराधनात्मक उपासना विषयक प्रश्न है , उसके उत्तर में  ब्रह्मा ने कहा:  कि परमात्मा  श्री कृष्ण ही गोविन्द रूप से अखिल विश्व के आधार हैं तो उनकी आराधना का अधिष्ठानभूत जो पीठ है उसका ही निरूपण पहले करते हैं | उनको उपासना के लिये जिस आसन पर प्रतिष्ठापित करना है , वही उनका पीठ है | पहले अपने घर में लकड़ी  की चौकी को धो कर स्थापित करना और फिर  “हैरण्याष्टपलाशं , सोने का अष्टदल , अम्बुजं माने कमल  सोने के बने हुए अष्टदलकमल की स्थापना करे अथवा गन्धयुक्त चन्दनसे लिखे 

  { तदन्तरालिके } तदनन्तर उस कमल के मध्य भाग में { अनलास्त्रयुगं } दो त्रिकोण अर्थात षट्कोण लिखे फिर उस षट्कोण के मध्य में { आद्यार्णरूपम् , अखिल कार्यस्य बीजं } काम बीज क्लीं , तथा साध्य नाम और कर्म नाम भी लिखे क्योंकि सनत्कुमार संहिता में ऐसा ही बताया है | अथवा आठ पत्रों में क्रम से { १  रं  २ रं  ३ ॐ  ४ कृ  ५ ष्णा  ६ य  ७ न  ८ मः } = रं रं ॐ कृष्णाय नमः,  ऐसा लिखे | 

 कर्णिकायां लिखेद्वन्हिपुटितं मण्डलद्वयं | तस्य मध्ये लिखेद्बीजं साध्याख्यं कर्मसंयुतम् || 

फिर षट्कोण के छः कोणों में छः क्लीं लिखे और फिर सन्धियों में छः अक्षर लिखे १ क्लीं २ कृ ३ ष्णा ४ य ५  न  ६ मः और फिर कर्णिका में {  सब्रह्माणमाधायानङ्गगायत्रीं } सब्रह्माण का मतलब है अष्टादशाक्षर मंत्र और उसके साथ ही  अनंगगायत्री  भी अष्टदल के केसरों में लिखे { अष्टदल को सर्वजनसम्मोहन चक्र भी कहते हैं }  यथा ‘‘ कामदेवाय सर्वजनप्रियाय सर्वजनसम्मोहनाय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वजनस्य हृदयं मे वशं कुरु कुरु स्वाहा  ’’  यह ४८ अड़तालीस अक्षर का मालामन्त्र है | अष्टदल के प्रत्येक दल में छः छः अक्षर लिखने चाहिये  | और फिर अष्टदल के ऊपर एक वृत्त बनाकर मातृकाके अक्षरोंसे { अ से लेकर क्ष तक सम्पूर्ण वर्णमाला से }  उसका वेष्टन भी करना चाहिए | ‘‘अक्षरैः कामगायत्र्या वेष्टयेत् केसरे सुधीः | काममालामनोर्वर्णैर्दलेस्वष्टसु मन्त्रवित् ||’’  क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजन वल्लभाय स्वाहा | 

ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् | 

षट्कोण के पूर्व , नैऋत्य और वायव्य कोणों में श्रीं बीज लिखे तथा आग्नेय , पश्चिम और ईशान कोणों में ह्रीं बीज लिखे |

‘‘श्रियं षट्कोण कोणेषु ऐन्द्र नैऋति वायुषु | आलिख्य विलिखेन्मायां वन्हिवारुणशूलिषु ||’’ लिखेद्गुहातनैर्भक्तैर्मातृकां तद्वहिर्लिखेत् , इति संहितोक्तेः | भूमण्डलं शूलवेष्टितं कृत्वेति

 ‘‘ भूगृहं चतुरस्रं स्यादष्टवज्रयुतं मुने ’’ इति संहितोक्तेः | भूपुर के चारों तरफ आठ त्रिशूल के चिन्ह बनाने चाहिये | अस्यैव धारणयन्त्रत्वात् साध्यादिलेखनमप्यादावसूसुचत् | अतएव धारणविधानं तत्फलञ्च संहितायामुक्तं | यह यन्त्र केवल पूजा के लिये ही नहीं है , पूजा करने के बाद इसको धारण भी किया जा सकता है |  ‘‘हुत्वा सहस्रमाज्येन मन्त्र सम्पात पूर्वकं | मार्जयित्वाऽयुतं जप्त्वा धारयेत् यन्त्र मुत्तमम् ||  त्रैलोक्यैश्वर्यमाप्नोति देवैरपि स पूजितः ’’ इत्यादिना | पहले मूल अष्टादशाक्षर मन्त्र से १००० घी की आहुति देवें फिर दशांश से मार्जन करके इस यंत्र को धारण करना चाहिये | ऐसा करने समग्र ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है , और साधक देवताओं द्वारा भी पूजित होता है |

 इदन्तु केवलं धारणार्थं यदा यन्त्रं क्रियते तदभिप्रायेणोक्तं |

 यह विधि धारण करने के अभिप्राय से बताई  है | परन्तु जहां पूजा का प्रसंग है उसकी विधि आगे बताई जाएगी |

यदा पुनः पूजार्थं यन्त्रं क्रियते तदा तु पूर्वं  ‘‘ मण्डूकादि पृथिव्यन्तं पूजयेत् कर्णिकोपरि | अग्न्यादिपीठपादेषु धर्मादींश्चतुरो यजेत् |  यथा, ॐ मण्डूकासनाय नमः ॐ कूर्माय नमः ॐ अनन्ताय नमः ॐ वराहाय नमः ॐ पृथिव्यै नमः | और  पीठ के चारों पादों में धर्मादि की पूजा करे जैसे कि अग्नि दिशा के पाद में ॐ धर्माय नमः , नैऋत्य दिशा के पाद में ॐ ज्ञानाय नमः , वायव्य दिशा के पाद में ॐ वैराज्ञाय नमः तथा  ईशान दिशा के पाद में ॐ ऐश्वर्याय नमः |  तारवर्णप्रभिन्नानि मण्डलानि क्रमात्ततः | सत्वं रजस्तम इति यजेतात्म चतुष्टयम् | तदुपरान्त पूर्व में  सत्वाय नमः , पश्चिम में  रजसे नमः , उत्तर में  तमसे नमः तथा  दक्षिण में   आत्मने नमः इसी क्रम से मंडल में पहले  पूर्व में  आत्मने नमः , पश्चिम में अन्तरात्मने नमः , उत्तर में  परमात्मने नमः , दक्षिण में  ज्ञानात्मने नमः | 

आत्मान्तरात्मा परमात्मा ज्ञानात्मेति क्रमात् सुधीः |

 विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगेति पञ्चमी |

 प्रह्वीं सत्यां तथेशानानुग्रहा नवमी स्मृता |

 प्रागाद्यष्टसु पत्रेषु कर्णिकायां यजेन्मुने ’’ | 

और कर्णिका में { मध्यभाग में } ९ नौ पीठ शक्तियों का पूजन करे | उनके नाममन्त्र इस प्रकार हैं , १  विमलायैनमः २ उत्कर्षिण्यैनमः ३  ज्ञानायैनमः ४  क्रियायैनमः ५  

योगायैनमः ६ ॐ प्रह्वयैनमः ७  ॐ सत्यायैनमः ८  ईशानायैनमः ९  अनुग्रहायैनमः | इसके बाद पीठमन्त्रसे पीठ पूजा करे | (पीठ मन्त्रः —  ‘‘ॐ नमो विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगयोगपद्मपीठात्मने नमः’’)   इति पीठमन्त्रमयमस्योपरिविन्यस्य , ‘‘ततः पीठं समभ्यर्च्य देवमावाह्य नारद | अर्घ्यादि धूप दीपादीनुपचारान् प्रकल्पयेत्’’ |  इस प्रकार हे नारद पीठ पूजा के बाद मुख्य देव श्री कृष्ण का आवाहन करे तदुपरान्त आवरण पूजा करनी चाहिये | 

 प्रथमावरणमाह | 

अथावरणपूजां कुर्यात् | तत्र प्रथमावरणमाह अङ्गेति | षट्कोणस्याग्नेय नैऋत्य  वायव्येशानेषु हृदय शिरः शिखा कवचानि , अग्रभागे नेत्रं , पूर्वादिदिक्षु च अस्त्रम् , इत्यङ्गानि पूजयेत् | प्रथमावरण में  यन्त्र के अंगों की पूजा करे , जैसे कि षट्कोण के आग्नेय कोण में ॐ हृदयाय नमः , नैऋत्य कोण में ॐ शिरसे स्वाहा , वायव्य कोण में ॐ शिखायै वषट् , ईशान कोण में ॐ कवचाय हुं , सामने के भाग में ॐ नेत्रत्रयाय वौषट् , तथा पूर्व आदि सभी दिशाओं में ॐ अस्त्राय फट् | 

द्वितीयावरणमाह | 

 वासुदेवादीति | पूर्व पश्चिम याम्योत्तर दलेषु , यथाक्रमं वासुदेव सङ्कर्षण प्रद्युम्नानिरुद्धान् पूजयेत् | आग्नेय नैऋत्य वायव्येशानेषु , यथाक्रमं शान्ति श्री सरस्वती रतीः पूजयेत् |

  अब दूसरे आवरण  का  विवरण करते हैं | पूर्व , पश्चिम , दक्षिण और उत्तर दिशाओं में क्रमशः वासुदेव , संकर्षण , प्रद्युम्न और अनिरुद्ध की पूजा करें तथा आग्नेय , नैऋत्य , वायव्य और ईशान कोण में क्रम से शान्ति , श्री , सरस्वती और रति देवी की पूजा करें | 

 तृतीयावरणमाह | 

 ‘ रुक्मिण्यादि ’ ‘ स्वशक्तयः ’ कृष्णशक्तयः |

 ‘‘ दलेषु रुक्मिणी सत्यभामा जाम्ववती तथा |

   नाग्नजिती मित्रविन्दा कालिन्दी च ततः परा || 

  लक्ष्मणा च सुशीला च पूज्या हेमामितप्रभा   ’’ | 

  अब कमल के आठ दलों में रुक्मिणी आदि आठ पटरानियों का पूर्वादिक्रम से आवाहन , स्थापना और पूजन करना चाहिये | उनके नाम हैं रुक्मिणी , सत्यभामा , जाम्बवती , नाग्नजिती , मित्रविन्दा , कालिन्दी , लक्ष्मणा और सुशीला | ये सभी अतुलनीय

 स्वर्ण आभा से युक्त हैं ऐसा ध्यान करना चाहिये |

चतुर्थपञ्चमाद्यावरणमाह , इन्द्रादि वसुदेवादि पार्थादीति | अत्र वसुदेवाद्यावरणमेव चतुर्थं वोध्यम् | पूर्वभागे वसुदेवाय पीतवर्णाय | आग्नेयकोणे देवक्यै श्यामलायै | दक्षिणभागे नन्दाय कर्पूरगौराय | नैऋत्यकोणे यशोदायै कुङ्कुमगौर्यै | पश्चिमे बलदेवाय शङ्खकुन्देन्दुधवलाय | वायव्ये कलापश्यामलायै सुभद्रायै | उत्तरकोणे गोपेभ्यः | ईशानकोणे गोपीभ्यः |

 चतुर्थावरणं | 

चौथे आवरण में { इन्द्रादि } माने पूर्वादि दिशाओं के क्रम से वसुदेव आदि  का  पूजन करना चाहिये  यथा – पूर्व दिशा में पीतवर्ण  के वसुदेवजी , आग्नेय कोण में श्याम वर्ण की देवकी जी , दक्षिण दिशा में कर्पूरगौर नन्द बाबा जी , नैऋत्य कोण में कुङ्कुम गौरी यशोदा जी , पश्चिम दिशा में शङ्ख कुन्देन्दु धवल बलदेव जी ,   वायव्य कोण में  कलापश्यामला सुभद्रा जी  , उत्तर दिशा में सभी गोपगण और ईशान कोण में समस्त  गोपीगण  की पूजा करनी चाहिये | 

  पञ्चमन्तु पार्थाद्यावरणम् | 

अर्जुननिशठोद्धव दारुक विष्वक्सेन सात्यकि गरुड नारदपर्वतान् पूजयेत् | 

पांचवें आवरण में अर्जुन आदि का आवाहन , स्थापन और पूजन करना चाहिये | यथा = पूर्व में अर्जुन , अग्नि में निशठ , दक्षिण में उद्धव , नैऋत्य में दारुक , पश्चिम में विष्वक्सेन , वायव्य में सात्यकि , उत्तर में गरुड़ तथा ईशानकोण में नारद और पर्वत इन दोनों ऋषियों की पूजा करनी चाहिये | 

षष्ठं निध्यावरणम् |

 पूर्वदिशि इन्द्रनिधये नमः  | आग्नेयदिशि नीलनिधये नमः  | याम्ये कुन्दाय नमः | नैऋत्यकोणे मकराय नमः  | पश्चिमे आनन्दाय नमः | वायव्ये कच्छपाय नमः  | 

उत्तरे शङ्खनिधये नमः  | ईशानकोणे पद्मनिधये नमः | 

छठे आवरण में निधियों का पूजन करना चाहिये | पूर्व दिशा में इन्द्र निधि , आग्नेय दिशा में नील निधि , दक्षिण दिशा में कुन्दनिधि , नैऋत्य कोण में मकर निधि , पश्चिम दिशा में आनंद निधि , वायव्य दिशा में कच्छप निधि , उत्तर दिशा में शंख निधि और ईशान कोण में पद्म निधि का आवाहन , स्थापन तथा पूजन करना चाहिये | 

सप्तममिन्द्राद्यावरणम् | इन्द्राय पीतवर्णाय पूर्वदले | अग्नये रक्तवर्णाय | 

यमाय नीलोत्पलवर्णाय | रक्षोऽधिपतये कृष्णवर्णाय | वरुणाय शुक्लवर्णाय | 

वायवे धूम्रवर्णाय | कुवेराय नीलवर्णाय | ईशानाय श्वेतवर्णाय |

 पूर्वेशानयोर्मध्ये ब्रह्मणे गोरोचनावर्णाय | नैऋत्यपश्चिमयोर्मध्ये शेषनागाय श्वेतवर्णाय | 

सप्तम आवरण में इन्द्रादि दिक्पालों का आवाहन , स्थापन , पूजन करना चाहिये | पूर्व दिशा के दल में पीतवर्ण के इन्द्र का , अग्नि कोण में रक्त वर्ण के  अग्नि का , दक्षिण दिशा के दल में नील कमल के समान वर्ण वाले यमराज का , नैऋत्य कोण में राक्षसों के अधिपति नैऋत देव कृष्ण वर्ण के हैं  , पश्चिम दिशा में शुक्ल वर्ण के वरुण का , वायव्य दिशा में धूम्रवर्ण के वायु का , उत्तर दिशा में नील वर्ण कुवेर का , ईशान कोण में श्वेत वर्ण के महेश्वर के संनिधि की भावना करनी चाहिये | 

अष्टमं आयुधावरणम्  |

 पूर्वदले वज्राय पीतवर्णाय | शक्तये शुक्लवर्णाय | दण्डाय नीलवर्णाय | खड्गाय श्वेतवर्णाय | पाशाय विद्युद्वर्णाय | ध्वजाय रक्तवर्णाय | गदायै स्वर्ण वर्णायै | त्रिशूलाय शुक्लवर्णाय | इत्यष्टमावरणम् |

 अब आठवें आवरण में आयुधों की स्थापना करनी है | पूर्व दल में पीतवर्ण के वज्र की , अग्नि कोण में शुक्ल वर्ण के शक्ति नाम वाले आयुध की , दक्षिण में नील वर्ण के दण्ड की , नैऋत्य में श्वेत वर्ण के खड्ग की , पश्चिम में विद्युत वर्ण के पाश की , वायव्य में रक्त वर्ण की ध्वजा की , उत्तर में स्वर्ण वर्ण की गदा की , ईशान कोण में शुक्ल वर्ण के त्रिशूल की पूजा करनी चाहिये | 

 आवीतमिति | एतैः आवरणैः ‘ आवीतं ’ , परमेश्वरं , ‘ यजेत् ’  पूजयेत् | ‘ सन्ध्यासु ’ त्रिकालसन्ध्यासु , ‘ प्रतिपत्तिभिः ’ ध्यानैः , ‘ उपचारैः ’ षोडशोपचारादिमहाराजोपचारैः , पूजयेदित्यर्थः | तेनेति | ‘ तेन ’ आराधनेन ‘अस्य ’ आराधकस्य ‘ अखिलं ’  पुरुषार्थचतुष्टयं , ‘ भवति ’ |

 इन आवरणों से घिरे हुए परमेश्वर श्री कृष्ण की तीनों कालों की संध्याओं में 

{ प्रातः , मध्यान्ह और सायँ } प्रातः सूर्योदय से २४ मिनट पहले और २४ मिनट बाद तक अर्थात् दो घड़ी तक ध्यान एवं पूजा का काल होता है | इसी तरह दोपहर तथा शाम को ४८ अड़तालीस मिनट का समय भगवान की पूजा को समर्पित करने से आराधक को चारों पुरुषार्थों की { धर्म ,अर्थ , काम और मोक्ष की }  सिद्धि प्राप्त  होती है  | अर्थात् वह पूर्ण काम हो जाता है ,उसे  सबकुछ मिल जाता है  | इसका मतलब है कि २४ घंटे के समय में से १० % समय माने १४४ मिनट कल्याण के इच्छुक साधक को आराधना में लगाना चाहिये  | इस प्रकार से प्रेमपूर्वक उपासना करने से (अखिलं भवति)  सबकुछ मिल जाता है | ॥ २० ॥

गोपालतापिन्युपनिषत्
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   भगवान श्री कृष्ण उस पीठ  पर बैठे हुए है । और उनके अंदर राधिका और अनल अर्थात् चन्द्र और अग्नि रुपी दो अस्त्र हैं यानी कि वे  दो शक्तियों से युक्त हैं राधिका आल्हादिनी शक्ति हैं और [अग्नि] शब्द ,वाणी या सरस्वती रूप है |  इन्ही दो को दूसरे शब्दों में आनंद और चित् कह सकते हैं , इन्ही दो शक्तियों  से जगत संचालित होता है |  और उनके अन्दर अखिल अर्ण (अर्ण जैसे – ‘अ’ से ‘क्ष’ तक जितने अक्षर हैं जैसे अं कृष्णाय नमः, आं कृष्णाय नमः, इं कृष्णाय नमः, ईं कृष्णाय नमः आदि ) क्योंकि सभी वर्णों के बीज श्री कृष्ण ही हैं | इस तरह से जो मातृका वर्ण हैं उनके द्वारा सम्पुटित करके, उन्हें बीज बना करके, कृष्ण नाम की जो ब्रह्म विद्या है इसकी उपासना करते हैं । कामदेव गायत्री का जो बीज रूप है वही यह क्लीं है । ये यहां यन्त्र बनाने का प्रकार बता रहे हैं, उस यन्त्र में कामगायत्री को ब्रह्मगायत्री के साथ यथावत लिख कर यहां कहते हैं कि  इस तरह से अष्टदल कमल बनाओ फिर इसमें मात्रिका बीजों को जोड़ो फिर उसके बाद भूमण्डल,जो भूपुर होता है वो बनाओ और आठ दिशाओं में त्रिशूल का चिन्ह बना दो । तो इस प्रकार से उस यन्त्र के अंगो की स्थापना करके, उसमें उनके पिता वसुदेव जी, उनकी पत्नी रुक्मिणी, जो उनकी अपनी शक्ति है । और नन्द, यशोदा  आदि उनके पार्षद कहे जाते हैं, नन्दादि गोप,  वसुदेवादि यादव, पार्थ माने अर्जुन आदि सखा, महापद्मादि निधियों से परिवेष्टित  करके इन सबको मिलाकर के एक मंडल बना करके फिर उनकी प्रातः , मध्यान्ह और सायं संध्या में शरणागति के भाव से और उपचारों (उपचार – गन्ध,पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य  छत्र, चँवर डुलाना, काजल लगाना, पान खिलाना आदि ) से उनकी पूजा करें । इस प्रकार से भजन, उपासना करने से उस साधक को सर्व सिद्धियां प्राप्त होती हैं, यहाँ “अखिलं भवति” दो बार कहने का मतलब है कि यह निश्चित ही परम सत्य है ।

उसके बारे में यह विज्ञान प्रकट होता है। रासपञ्चाध्यायी के आरम्भ में ही यह श्लोक है –

दृष्ट्वा कुमुद्वन्तमखण्डमण्डलं रमाननाभं नवकुंकुमारुणम् ।

वनं च तत्कोमलगोभिरञ्जितं जगौ कलं वामदृशां मनोहरम् ।। १०.२९.३ ।।  उस दिन चन्द्रमाका मण्डल अखण्ड था | पूर्णिमाकी रात्रि थी | श्री कृष्ण नूतन केशरके समान लाल-लाल हो रहे थे, उनका मुखमण्डल लक्ष्मीजीके समान मालूम हो रहा था | उनकी कोमल किरणोंसे सारा वन अनुरागके रंगमें रँग गया था | तब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी बाँसुरीपर व्रजसुन्दरियोंके मनको हरण करनेवाली कामबीज ‘क्लीं’ की मधुर तान छेड़ी || ३ || इसमें  जगौ कलं– कलं का अर्थ है अस्फुट और मधुर। जैसे बच्चे तोतली बोली बोलते हैं तो उसको बोलते हैं कल वाक्य। कल माने होता है मधुर लेकिन अस्फुट। ‘कलं तु मधुरास्फुटे।’ कोशकार कहते हैं – कल माने मधुर और अस्फुट। बहुत मीठी बांसुरी बजायी कृष्ण ने, लेकिन अस्फुट था स्वर! अस्फुट था माने जो भी सुने, उसको यह मालूम पड़े कि हमारा ही नाम ले रहे हैं। जैसे ललिते! विशाखे! राधे! चंद्रावली! एक-एक गोपी को ऐसा मालूम पड़े कि हमारे नाम की रट लगा रहे हैं। ये हुई अस्फुटता और मिठास इतनी कि सबके प्राण खिंच आवें- जगौ कलं। यहाँ नादात्मक शब्द है। भगवान नाद के द्वारा आकृष्ट करते हैं, इसके लिए पहले वंशी कलध्वनि है। भगवान ने बजाया ‘कलं’ कं सुखं लाति इति कलम् | जो सबको सुख दे उसका नाम है कल। गाँव में कहते हैं ‘‘कल पड़ गयी’’ ‘‘चैन आगया’’ – आज तो ‘‘कल’’ ही नहीं मिला, थोड़ा कल मिल जाय, तो सब ठीक हो जाय। कल से कल्य बनता है फिर इसी से कल्याण बन जाता है। ये कल, कल्प , कल्याण शब्दों की परंपरा है। भगवान ने कल बजाया। कल बजाया माने सुखदान प्रारम्भ किया। 

‘क्लीं’। एक अक्षर का मंत्र है ‘क्लीं ’ यदि  कृष्ण के पहले हो, तो क्लीं कृष्ण; पीछे हो तो कृष्ण क्लीं ; यह भी मंत्र हैं। क्लीं कृष्णाय नमः यह भी मंत्र है. क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय  स्वाहा यह भी मंत्र है। यह क्लीं जो है यह काम बीज है। इसका अर्थ होता है- ‘क, माने सुख, ल, माने जीवन;’ ‘ई’ माने शक्ति और ‘म’ माने प्रेम। जब हम भगवान के सामने बोलते हैं- क्लीं, तो इसका अर्थ होता है- तुम मेरे सुख हो, तुम मेरे जीवन-सर्वस्व हो, तुम्हारा ही बल है- भरोसा है, और तुम्हीं मेरे प्यारे हो। भगवान ने जब ‘कल’ गाना  शुरू किया, तो मानो गोपियों से कहा- ‘गोपियों! तुममें ही मेरा सुख है, तुम्हीं मेरी जीवन-सर्वस्व हो, तुम्हीं मेरी शक्ति हो और तुम्हीं मेरी प्यारी हो।’ जब भक्त लोग इसका गान करते हैं तो भगवान को क्लीं बोलते हैं और जब भगवान ही इसका गायन करते हैं तो भक्त ‘क्लीं’ हो जाते हैं। जगौ कलं वामदृशां मनोहरम् – कलं वामदृशां क+ल+ई (वामदृशा माने ई)+ अम (वामदृशां = ईं  में जो ऊपर बिंदी है सो) = क्लीं। तो ‘जगौ कलं वामदृशां’ का अर्थ हुआ कि जहां भगवान ने वंशी में ‘क्लीं’- काम बीज का स्वर बजाया।

ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजन वल्लभाय स्वाहा | 

ॐ क्लींकाराय  विद्महे  कामदेवाय धीमहि तन्नोऽनंगः प्रचोदयात् |

ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि ॥ तन्नोऽनंगः प्रचोदयात् |  ॥ २०॥

   वह परमात्मा एक है { सजातीय , विजातीय और स्वगत भेद से रहित है |} एक ही परमात्मा, सबको नियन्त्रित करनेवाला , सबको वश में रखने वाला होने से उसे वशी कहते हैं, अथवा अपनी शक्तियों को वश में रखने वाला,   “सर्वगः” देश , काल और वस्तु से अपरिच्छिन्न होने के कारण उसको सर्वगः माने   सर्वव्यापक कहते हैं |  कृष्ण माने आनन्द  और आनन्द स्वरूप होने से ही   ईड्य है स्तुत्य है .| ब्रह्मादि देवों के द्वारा भी  नमस्करणीय है ; और जैसा कि पहले बता चुके हैं कि  एक होते हुए भी वह कृष्ण जगत् पालन के लिये  अपने आप को पाँच रूपों विभक्त कर लेता है जैसे एक ही वायु प्राणादि भेद से पाँच रूप वाला हो जाता है |   जो एक होते हुए भी अनेक प्रकार से दिखता है जैसे समुद्र एक है और उसमें अनेकों तरंगों से भिन्न रूप से दिखता है,  अथवा जैसे एक ही स्फटिक नामक पत्थर को यदि अनेक रंगों के फूलों से बने हुए एक रंगीन कपड़े पर रख दिया जाय तो अनेक रंगों वाला दिखता है | एक ही वृक्ष, पत्र, शाखा, पुष्प, फल आदि के रूप में विभिन्न रूप से दिखता है, मूल रस तो एक ही होता है, जो बीज में है वही वृक्ष में है लेकिन फिर भी पत्र पुष्प त्वचा उनमें विभिन्न गुण और रूपों में दिखता है ,लेकिन एक ही है । तं पीठस्थं येऽनुभजन्ति धीरा इनका जो षट्कोण और 

अष्टदलात्मक  पीठ बताया था उसको ध्यान में रखते हुए जो  धीर पुरुष एकाग्र चित्त होकर भजन करते हैं  जिसमें नन्द, वसुदेव, पार्थ, रुक्मिणी, ये सब अलग अलग दिखते हैं परन्तु एक ही तत्व हैं । इस प्रकार से उस पीठ का यानि अधिष्ठान का जो धीरपुरुष ध्यान करते हैं उनको शाश्वती सिद्धि मिलती है , नित्यानंदात्मक सुख मिलता है  दूसरों को नहीं। जो कृष्ण भक्ति से विरहित हैं उन्हें वह नित्यसुख नहीं मिल पाता |

 वासुदेव शब्द की व्युत्पत्ति  (वसुदेवस्य अपत्यं पुमान् वासुदेवः। =श्रीकृष्णः।)  श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में बताया है कि  “प्रागयं वसुदेवस्य क्वचित् जातस्तवात्मजः । वासुदेव इति श्रीमान् अभिज्ञाः संप्रचक्षते ॥ १०.८. १४॥” गर्गाचार्य जी कहते हैं, हे नन्द जी ! यह तुम्हारा पुत्र पहले कभी वसुदेव जी के घर में भी पैदा हुआ था, इसलिए  इस रहस्य को जानने वाले लोग इसे ‘श्रीमान् वासुदेव‘ भी कहते हैं। श्रीमद्भागवत के ही चतुर्थ स्कंध में भगवान शंकर जी माता सती से कहते हैं —

 सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं यदीयते तत्र पुमानपावृतः। 

सत्वे च तस्मिन् भगवान् वासुदेवो ह्यधोक्षजो मे नमसा विधीयते।। ४.३.२३ ।। 

विशुद्ध अन्तःकरण का नाम ही वसुदेव है, उसमें आविर्भूत होने के कारण इनको वासुदेव कहते हैं ,  क्योंकि उसी में भगवान वासुदेव का अपरोक्ष अनुभव होता है। उस शुद्ध चित्त में स्थित इन्द्रियातीत भगवान वासुदेव को ही मैं नमस्कार किया करता हूँ ||२३||

  आदि शंकराचार्य जी विष्णु सहस्रनाम के भाष्य में लिखते हैं – वसति  वासयति आच्छादयति सर्वमिति वा वासुः, दीव्यति क्रीडते विजिगीषते व्यवहरति द्योतते स्तूयते गच्छतीति वा देवः, वासुश्चासौ देवश्चेति वासुदेवः।। अर्थात बसते हैं अथवा सबको वासित यानी आच्छादित करते हैं , इसलिये वासु हैं तथा दीव्यति अर्थात क्रीड़ा करते, व्यवहार करते, प्रकाशित होते, स्तुति किये जाते हैं इसलिये देव हैं। इस प्रकार जो वासु हैं, देव हैं, वे वासुदेव हैं। छादयामि जगद्विश्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥३६॥ (महा. शान्ति . ३५०.३६)  मैं सूर्य के समान होकर अपनी किरणों से सम्पूर्ण जगत् को ढक लेता हूं तथा समस्त भूतों का निवास स्थान भी हूं इसलिए वासुदेव कहलाता हूं।। वसनात्सर्वभूतानां वसुत्वाद्देवयोनितः। वासुदेवस्ततो वेद्यो बृहत्त्वाद्विष्णुरुच्यते ।।  (महा. उद्योग पर्व ६९. 3) समस्त प्राणियों को बसाने से  वसु रूप होने से और देवताओं का उद्भव स्थान होने से भगवान को वासुदेव जानना चाहिए।। सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः । ततः स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यते।। विष्णुपुराण (१.२.१२)  सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि। भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः।। विष्णु पुराण (६ .५  .८०) वह परमात्मा इस सम्पूर्ण लोक में सर्वत्र सब वस्तुओं में बसते हैं इसलिये विद्वत् जन उसे वासुदेव कहते हैं तथा सब भूत उस परमात्मा में बसते हैं तथा सब भूतोंमें वह सर्वात्मा बसता है इसलिये वह वासुदेव कहलाता है।। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के तीसरे अध्याय में बताया कि  ये वासुदेव ही सर्वगुहाशय हैं |  देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः । आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशि इन्दुरिव पुष्कलः ॥ ८ ॥ इन्ही की सर्वतोभावेन षड्विधा शरणागति करनी चाहिये क्योंकि गीता जी में बताया है कि  दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।7.14।। यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।। अर्थात कृष्ण ही माया निवर्तक हैं |  शरणागति के ६ लक्षण होते हैं : “अनुकूलस्य संकल्प: प्रतिकूलस्य वर्जनम् | रक्षिस्यतीति विश्वासो, गोप्तृत्व वरणं तथा आत्मनिक्षेप कार्पण्यं षड्विद्या शरणागति:।।”  ॥ ३,४१.७६ ॥ ब्रह्माण्डपुराण उत्तर भाग 

 १) अनुकूलस्य संकल्प: – प्रभु की शरण प्राप्ति में जो बातें अनुकूल हों केवल मात्र उन्हीं वस्तुओं को स्वीकार करना |

२) प्रतिकूलस्य वर्जनम् : – शुद्ध भक्ति के प्रतिकूल सभी वस्तुओं का त्याग करना |

३) रक्षिष्यति इति विश्वासः  – हमेशा यह दृढ़ विश्वास रखना कि कृष्ण सभी परिस्थितियों में मेरी रक्षा करेंगे |

४) गोपतृत्व वरणं – रक्षक रूप से श्री कृष्ण का ही वरण करना |

५) आत्म-निक्षेप – ( आत्मसमर्पण )अपनी आत्माको प्रभु चरणों में समर्पित कर देना (कृष्ण तवास्मि) मैं भगवान श्री कृष्ण का हूँ |{हे कृष्ण मैं तुम्हारा हूँ} 

६) कार्पण्य – ( दैन्य ) सब प्रकार के भौतिक अभिमानों को छोड़ कर अपनी दीनता निवेदित करना ही सच्ची शरणागति है |  इसीलिये गीता जी में बताया कि 

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।९.२२।। अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।१८.६६।।  सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।  श्रीमद् भागवत के ग्यारहवें स्कंध के बीसवें अध्याय में बताया है कि   “सर्वं मद्‍ भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा ।  स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथञ्चिद् यदि वाञ्छति ॥ ३३ ॥ ” यद्यपि मेरे भक्तों को किसी प्रकार की कोई भी अभिलाषा नहीं है, तथापि भक्ति की उपयोगिता के निमित्त कथञ्चित् यदि वे स्वर्ग, अपबर्ग और मदीय धाम की वाञ्छा करते हैं, तो वे वह सब भी शीघ्र ही अनायास प्राप्त कर सकते हैं | इस प्रकार ज्ञान और सेवा के प्रकारों का निरूपण करने के बाद अब थोडा  सा विशेष  विचार  “एको वशी सर्वगः कृष्ण ईड्य एकोऽपि सन्बहुधा यो विभाति । तं पीठस्थं येऽनुभजन्ति धीरा स्तेषां सिद्धिः  शाश्वती  नेतरेषाम् ॥ २१ ॥  का करते हैं | इसमें सबसे पहले  “एक ” शब्द आया है उसके विषय में महोपनिषद कहता है कि ” एको ह वै नारायण आसीत्। न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निः न वायुः नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यः। स एकाकी नर एव। सृष्टि से पूर्व सर्व प्रथम एक मात्र नारायण ही थे। न ब्रह्मा और न ही ईशान (शिव) थे। इनके अतिरिक्त पृथ्वी, वायु, आकाश, नक्षत्र एवं सूर्य आदि में से कोई भी नहीं था। वह एक मात्र अकेला ‘नर’ (विराट् पुरुष) ही था। और श्वेताश्वतरोपनिषद ने कहा कि 

  न तस्य कार्यं करणंच विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च।। (श्वे. उ. 6/8)

उन परब्रह्म परमात्माकी कोई भी क्रिया प्राकृत नहीं होती, क्योंकि उनका कोई भी करण-हस्त पादादि इन्द्रियाॅ प्राकृत नहीं होती। वे अप्राकृत शरीरसे एकही समय सब जगह विराजमान रहते हैं। इसलिए उनसे बड़ा तो दूर रहा  उनके समान भी कोई दूसरा नहीं है। उस परमेश्वरकी अलौकिकी शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है, जिनमें ज्ञानशक्ति, बलशक्ति और क्रिया शक्ति ये तीन प्रधान हैं। इन तीनोंको क्रमशः चित्शक्ति या सम्वित्शक्ति, सत्शक्ति या सन्धिनीशक्ति और आनन्दशक्ति या ह्लादिनीशक्ति कहते । उनका शारीरिक रूप सामान्य जीव जैसा नहीं होता | उनके शरीर तथा आत्मा में कोई अंतर नहीं है | वे परम हैं |  उनकी सारी इंद्रियां दिव्य हैं | उनकी कोई भी इंद्रिय अन्य किसी भी इन्द्रिय का कार्य संपन्न कर सकती है | अतः न तो कोई उनसे बढ़कर है और न ही उनके तुल्य है |  उनकी शक्तियां बहुरूपिणी हैं , फलतः उनके सारे कार्य प्राकृतिक अनुक्रम के अनुसार संपन्न हो जाते हैं | और जो वशी है अर्थात सब जिसके वश में हैं , जो जगन्नियंता हैं | इसके बाद       (सर्वगः) जिनकी सर्वत्र गति है, जो  सर्वगुहाशय हैं | (ईड्यः) स्तुत्यः , सभी वेदों और शास्त्रों के द्वारा स्तूयमान , सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्‌ ॥– कठोपनिषद अध्याय १- वल्ली – २ – मंत्र १५  यमराज कहते हैं ː 

” सभी वेद जिस (परम) पद की महिमा का गान करते हैं तथा सभी तपस्याएं जिसके विषय में बताती हैं, जिसकी इच्छा करते हुए मनुष्य ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, ‘उसे’ मैं तुम्हें संक्षेप से बताता हूँ। हे नचिकेता! वह परम पद है ‘ॐ’। तथा श्री गीता जी में भी यही बताया कि  सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। (अर्थात जाग्रत , स्वप्न और सुषुप्ति मुझ से ही होती हैं )  समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।। “वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा। आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते।।”  (वेद, रामायण, पुराण और महाभारत आदि समस्त शास्त्रों के आदि, मध्य और अन्त में सर्वत्र एकमात्र पापापहारी भगवान हरि के ही गुण, लीला आदि का गान है) इत्यादि वचनों से यही विदित होता है कि सभी शास्त्रों के एकमात्र प्रतिपाद्य भगवान श्रीकृष्ण ही हैं।

 ‘‘प्र तत्ते अद्य शिपिविष्ट नामार्यः शंसामि वयुनानि विद्वान् । तं त्वा गृणामि तव समतव्यान् क्षयन्तमस्य रजसः पराके ॥५॥’’ (ॠ.७.१००,५), शिपिविष्ट  यह भगवान श्रीकृष्ण का ही एक नाम है । हे “शिपिविष्ट रश्मिभिराविष्ट विष्णो “ते तव “तत् प्रसिद्धं विष्णुरिति प्रख्यातं “नाम “अर्यः मम स्वामी  मदनुग्रहायसमर्थः स्तुतीनां हविषां वा तथा “वयुनानि , ज्ञानानि , ज्ञानोपायांश्च , ज्ञातव्यान्यर्थजातानि “विद्वान् जानन्नहम् “अद्य इदानीं “प्र “शंसामि प्रकर्षेण स्तौमि । “तवसं प्रवृद्धं “तं “त्वा त्वां विष्णुम् “अतव्यान् अतवीयानवृद्धतरोऽहं “गृणामि स्तौमि । कीदृशम् । “अस्य “रजसः लोकस्य “पराके दूरदेशे “क्षयन्तं निवसन्तम् ॥ इसका अर्थ है कि स्तुति के योग्य श्रीगोपालजी ही हैं | शिपिविष्ट शब्द शिव ,सूर्य और विष्णु तीनों के लिये वेदों में प्रयुक्त हुआ है | नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो”  विष्णु बोधक होने पर तैत्तिरीय संहिताको प्रमाण माना जाता है– यज्ञो वै विष्णु: पशवः: शिपि यज्ञ एव पशुषु प्रतितिष्ठति। ” शिवस्य हृदयं विष्णुः विष्णोश्च हृदयं शिवः “।। अयमेव सूर्यः यदा रश्मिभिः विषितः-व्याप्तः भवति तदा विष्णुः इत्युच्यते अथवा यतोऽयं रश्मिभिः सर्वतः आविष्टो भवति तस्माद्विशतेः साध्यः। अथवा रश्मिभिरयं सर्वं व्यश्नुते व्याप्नोति तस्माद विष्णु: ।। “आदित्यञ्च शिवं विन्द्याच्छिवमादित्यरूपिणम्। उभयोरन्तरं नास्ति आदित्यस्य शिवस्य च॥  महाभारत के शांतिपर्व के ३५२ वें अध्याय में शिपिविष्ट शब्द की निरुक्ति इस प्रकार दी है –

 ‘‘ नष्टां च धरणीं पूर्वमविन्दं वै गुहागताम्। 

गोविन्द इति तेनाहं देवैर्वाग्भिरभिष्टुतः।। ५ ।।

 यास्को मामृषि रव्यग्रो नैकयज्ञेषु गीतवान्।

शिपिविष्ट इति ह्यस्माद्गुह्यनामधरो ह्यहम्।। ७ ।। 

स्तुत्वा मां शिपिविष्टेति यास्क ऋषिरुदारधीः।

मत्प्रसादादधो नष्टं निरुक्तमभिजग्मिवान्।। ८ ।।  ’’ मैंने पूर्वकाल में नष्ट होकर रसातलमें

 धंसी  हुई पृथ्वी को पुनः वराह रूप धारण करके प्राप्त किया था, इसलिए  देवताओं ने अपनी वाणी द्वारा ‘गोविन्द’ कहकर मेरी स्तुति की थी (गां विन्दति इति गोविन्दः- जो पृथ्वी को प्राप्त करे, उसका नाम गोविन्द है)। मेरे ‘शिपिविष्ट’ नाम की व्याख्या इस प्रकार है। रोमहीन प्राणी को शिपि कहते हैं- तथा विष्ट का अर्थ है व्यापक। मैंने निराकार रूप से समस्त जगत् को  व्याप्त कर रखा है, इसलिये मुझे ‘शिपिविष्ट’ कहते हैं। यास्कमुनि ने शान्तचित्त होकर अनेक यज्ञों में शिपिविष्ट कहकर मेरी महिमा का गान किया है; अतः मैं इस गुह्यनाम को धारणकरता हूँ। उदारचेता यास्क मुनि ने शिपिविष्ट नाम से मेरी स्तुति करके मेरी ही कृपा से पाताल लोक में नष्ट हुए निरुक्तशास्त्र को पुनः प्राप्त  किया था। उसी महाभारत के शान्तिपर्व के  ४२ वें अध्याय में में युधिष्ठिर जी कहते हैं कि  वराहोऽग्निर्बृहद्भानुर्वृषभस्तार्क्ष्यलक्षणः। अनीकसाहः पुरुषः शिपिविष्ट उरुक्रमः।।८।। ‘वराह, अग्नि, वृहद भानु ( सूर्य ), वृषभ ( धर्म ), गरुड़ध्वज, अनीकसाह ( शत्रु सेना का वेग सह सकने वाले ), पुरुष ( अन्तर्यामी ), शिपिविष्ट ( सबके शरीर में आत्मा रूप से प्रविष्ट ) और उरुक्रम ( वामन ) – ये सभी आपके ही नाम और रूप हैं। मत्स्य ,वामन , वराह , नृसिंह आदि रूपों से प्रकट होकर भी उन उन देवताओं द्वारा भगवान ही भक्तों की इच्छा पूरी करते हैं |

 “ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।७.२१।।” 

जो-जो (सकामी) भक्त जिस-जिस (देवता के) रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस (भक्त) की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।। सभी को उनके अधिकार के अनुसार फल दिया जाता है |  “स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्।।७ .२२ ।।” वह (भक्त) उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उससे मेरे द्वारा विधान किये हुये इच्छित भोगों को नि:संदेह प्राप्त करता है।। फिर भी उनके द्वारा दिया हुआ वह फल चिरस्थाई नहीं होता क्योंकि  “अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।७.२३ ।। ” परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।। जो मेरे भक्त हैं  उन्हें ही सायुज्य सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती | पूर्ण फल को देने वाले श्री कृष्ण गोपाल ही हैं | इस प्रकार विभूति की उपासना और साक्षात गोपाल की उपासना में साधन और फल का भेद है | अब यदि किसी को यह शंका हो कि अन्य देवताओं की उपासना का फल नाशवान क्यों होता है ? तो इसका उत्तर भी वहीं श्री गीता जी में ही दिया हुआ है  | हे अर्जुन ! ब्रह्मलोक तक के सभी लोक  पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं। परन्तु, हे कौन्तेय ! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।।”आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।८ .१६ ।।”  इस वाक्य से ब्रह्मलोक पर्यंत गति करने वालों की पुनरावृत्ति कही गयी है और  “न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।१५ .६ ।।”  उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है।।  इस प्रकार जो मेरे धाम में निवास करते हैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती | तो ठीक है जब दूसरे देवताओं की उपासना का फल भी भगवान ही देते हैं तो उन देवताओं की उपासना करने वालों को अल्पबुद्धि क्यों कहा गया ? वो इसलिए , कि वे लोग यह नहीं जानते कि हमें फल देने वाले गोपाल कृष्ण ही हैं , यह उनका अल्पमेधसत्व है अतः सायुज्य सिद्धि तो केवल कृष्णोपासक को ही मिलती है अन्य किसी कर्ममार्गी या ज्ञानमार्गी को नहीं | यदि कोई निष्काम भाव से उपासना करता है तो उसे आत्मसुख का लाभ होता है और यदि सकाम भाव से उपासना करता है तो स्वर्ग आदि लोकों  की प्राप्ति होती है परन्तु सायुज्यता नहीं मिलती | क्योंकि  “पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।८.२२।। ” हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।। ॥ २१॥

   || मूल उपनिषद ||

नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना

मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।

तं पीठगं येऽनुभजन्ति धीरा

स्तेषां सिद्धिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ २२॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

   मन्त्रान्तरमाह , नित्यो नित्यानामिति | ‘नित्यानाम्’ इव मध्ये यो वस्तुगत्या ‘नित्यः,’ तथा 

  ‘चेतनानाम्’ इव बुध्यादीनां, मध्ये वस्तुतः ‘चेतनः’, तथा ‘यः’ ‘एकः,’ सन् , पञ्चपदरूपेण 

 ‘बहूनां,’ ‘कामान्,’ ‘विदधाति’ | ‘पीठगं,’ ‘ये,’ ‘अनुभजन्ति,’ ‘धीराः,’ ‘तेषां सिद्धिः’, ‘शाश्वती’ अनपायिनी, ‘न’ , तु इतरेषाम्, इति पूर्ववत् ||२२||

                             || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || अब फिर उसी परमात्म तत्व के बारे में ( नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां ) इस मन्त्र के द्वारा बताते हैं कि वो परम तत्व कैसा है – अनित्यों के बीच में नित्य जैसे घड़े में मिट्टी नित्य है और घड़ा अनित्य अथवा शरीर अनित्य है और पंचभूत नित्य हैं | अथवा जो नित्य शब्द से मार्कण्डेय, हनुमानादि जिनको चिरंजीवी कहते हैं अथवा ब्रह्मा (जिनकी बहुत लम्बी उम्र है) तो वो नित्य जैसे ही दिखते हैं, उनसे भी ज्यादा अमृत, उनसे भी ज्यादा नित्य । नित्य माने अविनाशी, तो ब्रह्मा-शंकर जिन्हें  अविनाशी कहा जाता है ये उनसे भी ज्यादा अविनाशी है । जो अनित्य हैं, क्षणभंगशील हैं , उनमें जो नित्य है, जैसे शरीर और भोग  अनित्य हैं और द्रष्टा , साक्षी नित्य है ।आविर्भाव तिरोभाव वाले पदार्थों में  जो सर्वदा सत्ता रूप से एकरस  रहता है तथा जो त्रिकालाबाधित रूप से सदा वर्तमान रहता है उसी को नित्य कहा जाता है |जैसे यदि हम एक कपड़े के कैनवास पर एक चित्र बनावें और फिर उस चित्र में स्त्री पुरुष आदि की आकृतियाँ बनावें और उन्हें अलग अलग ढ़ंग के कपड़े पहनावें किसी को बंगाली , किसी अन्य को राजस्थानी , गुजराती , पंजाबी  , तिवेटियन ,अफगानी , महाराष्ट्रियन आदि पोशाकें पहनावें तो बच्चों को उसमें अनेक प्रकार के कपड़े दिखेंगे परन्तु ज्ञानी पुरुष जानता है कि जो कैनवास का वस्त्र है वही असली वस्त्र है अन्य सभी वस्त्राभास हैं बैसे ही जोआत्मचैतन्य है वही सच्चा चित् है और बाकी चक्षु आदि इन्द्रियोंसे तथा अन्तःकरण में प्रतीयमान स्मृतियों के और कल्पनाओं के जो दृश्य हैं वे चिदाभास हैं अतः नश्वर हैं ,मायिक हैं, अनित्य हैं,  आरोपित हैं , वास्तविक नहीं  हैं |  ‘‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥’’ यह जो कुछ वर्तमान में है, जो पूर्व में हो चुका है और जो आगे भविष्य में होगा, वह सब पुरुष (परमेश्वर) ही है। इस अमर जीव-जगत् के भी वही स्वामी हैं। जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वही स्वामी हैं।   ‘‘स सर्वं भवति’’  ‘‘स वा एष पुरुषः पञ्चधा पञ्चात्मा येन सर्वमिदं प्रोतं पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च दिशश्चावान्तरदिशाश्च स वै सर्वमिदं जगत् सभूतꣳ स भव्यं ’’ जो प्राणों का आत्मा, जिस से यह सर्व जगत् ओतप्रोत व्याप्त हो रहा है। वह सब जगत् का कर्त्ता, वही पूर्व कल्प और उत्तर कल्प में भी जगत् को बनाता है। ॥ महानारायणोपनिषत् ॥ इत्यादि श्रुति वाक्यों से दृश्यमान सर्व जगत ही प्रवाह रूप से नित्य है लेकिन वह परमात्मा अंतर्यामी से भी आंतर होने से नित्यों का भी नित्य है {य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद? यस्यात्मा शरीरम्? य आत्मानमन्तरो यमयति? स त आत्मान्तर्याम्यमृतः (श0 प0 १४. ५. ३०) अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा (तै0 आ0 ३.११.३)  इत्यादिषु। } भागवत जी के स्कंध ११ अध्याय ७ में इसका बहुत सुन्दर स्पष्टीकरण किया गया है  “यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः | नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम् || ७ ||” इस जगत् में जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से कहा जाता है, नेत्रों से देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान है। सपने की तरह मन का विलास है। इसलिये माया मात्र है, मिथ्या है-ऐसा समझना चाहिए। वहीं ग्यारहवें स्कंध के प्रथम अध्याय में  “ब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्यं वृद्धोपसेविनाम् । विप्रशापः कथमभूद्वृष्णीनां कृष्ण चेतसाम् ॥८॥” वृष्णिवंशी यादव गण जो कि ब्राह्मणों के परम भक्त थे, उदार थे फिर भी उन्हें विप्र शाप क्यों लगा ? यह सब भगवान की इच्छा मात्र से हुआ |  दशम स्कन्ध के प्रथम अध्याय में   “नन्दाद्या ये व्रजे गोपा याश्चामीषां च योषित: । वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रिय: ॥ ६२ ॥ सर्वे वै देवताप्राया उभयोरपि भारत । ज्ञातयो बन्धु सुहृदो ये च कंसमनुव्रता: ॥ ६३ ॥”  समग्र देवताओं का समूह माया से मनुष्य रूप धारण करके यदुकुल में प्रादुर्भूत हुआ अतः उस कुल का माया से  मानव रूप धारण करना माया ,मनोमय मात्र है | तुलसीदासजी भी कहते हैं  ‘‘गो गोचर जहाँ लगि मन जाई सो सब माया जानेहु भाई ’’  इंद्रियों के विषयों को और जहां तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना।  मूल स्वरूपभूत वस्तु में तो  ‘‘आविर्भाव तिरोभावाः स्वपदे तिष्ठन्ति’’ – गोपालतापनी  “कर्ता कारयिता हरि: |” काथबोधः   ‘‘तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशात्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्प आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदँसर्वमिति ॥ १ ॥’’   (छान्दोग्य उपनिषद – 7/26/1)  आविर्भाव तिरोभावौ पदार्थानां यतस्तत: || नानित्यता तु विज्ञेया शास्त्रविद्भिःर्विचक्षणै: ||14|| तिरोभावे तु कार्यं हि वर्तते कारणात्मना || आविर्भावे तु कार्यं हि यथा मृदि घटादयः ||15|| { शुद्धाद्वैत मार्तण्ड } पवनमयि पावकमयि क्षोणी मयि गगनमयि कृपीट मयि । रवि मयि शशि मयि दिङ्मयि समयमयि प्राणमयि शिवे पाहि ॥ ३॥ {महर्षि दुर्वासा प्रणीतं श्री ललिता स्तव रत्नम् } इत्यादि श्रुति तथा स्मृतियों के प्रमाण से  आविर्भाव तिरोभाव

वाले पदार्थों में चक्षु आदि इन्द्रियों से अज्ञान पूर्वक जो नश्वरत्वादि ग्रहण किया जाता है , वह माया, मनोमय है | नश्वरता का भान ही माया, मनोमय है | ज्ञान हो जाने पर तो ‘‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’’ का ही दर्शन होता है | आविर्भाव और तिरोभाव तो पदार्थों का होता , मूल तत्व का नहीं | मूल तत्व तो  त्रिकालाबाधित है | ‘‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ।’’   ‘‘नारायणो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मानेशानः’’  ‘‘अहमेवासमेकोऽग्रे नान्यत् यत्सदसत्परम् ।

 पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥२.९.३२॥’’

 ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।

 तद्विद्याद् आत्मनो मायां यथाभासो यथा तमः ॥२.९.३३ ॥’’ भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा जी से कहा- सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही मैं था।  मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न दोनों का कारण अज्ञान। जहाँ यह सृष्टि है, वहाँ मैं ही मैं हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ और जो कुछ (प्रलय होने के बाद) बचा रहेगा, वह भी मैं ही हूँ । वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु , मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चन्द्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश-मण्डल के नक्षत्रों में राहु की भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, उसे मेरी माया समझना चाहिए। इस प्रकार श्रुति तथा भागवत के प्रमाणों से सिद्ध होता है कि विश्व भगवद् रुप है और भगवान विश्वरूप हैं  | 

 ’’इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवा: ।

तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि ते प्रादेशमात्रं भवत: प्रदर्शितम् ॥१.५. २०॥ ’’ नारद जी व्यास जी से  कहते हैं कि जिन से जगत की उत्पत्ति , स्थिति और प्रलय होते हैं , वे भगवान ही इस विश्व के रूप में भी हैं | ऐसा होने पर भी वे इससे विलक्षण हैं , इस बात को आप स्वयं जानते हैं , तथापि मैंने आपको संकेत मात्र कर दिया है | ‘‘यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य । तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं  नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ ११.२८.१९॥ ’’ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं , उद्धव ! सोने के कंगन , कुंडल आदि बहुत – से आभूषण बनते हैं , परन्तु जब वे गहने नहीं बने थे , तब भी सोना था और जब नहीं रहेंगे , तब भी सोना रहेगा | इसलिये जब बीचमें उसके कंगन – कुंडल आदि अनेकों नाम रखकर व्यवहार करते हैं तब भी वह सोना ही है | ठीक ऐसे ही जगत का आदि , अंत और मध्य मैं ही हूँ | वास्तव में मैं ही सत्य तत्व हूँ | इत्यादि भागवत के वचनों से भगवान की  विश्वरूपता सिद्ध होती है | 

अब {चेतनश्चेतनानाम्} पर विचार करते हैं | यह परमात्मा ही सभी प्राणियों को चैतन्य प्रदान करता है |  “तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१५॥” कठोपनिषद् [ जो  कुछ  भी  इस संसार  में  भासित  है, अनुभव  का  विषय  है  सब कुछ   उस  परमेश्वर   की  आभा  से   भासित  है ! ]  ‘‘स यथोर्णनाभि स्तन्तुनोच्चरेद्यथा अग्नेः क्षुद्रा विष्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति । तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ बृह. २,१.२० ॥’’  अर्थात, जिस प्रकार मकड़ी से तन्तु निकलते है , अग्नि से स्फुलिंग प्रकटित होते हैं, उसी प्रकार वाक् आदि इन्द्रियाँ, सुख-दुःख आदि कर्म फल, सभी देवता, ब्रह्मा से लेकर चींटी तक समस्त प्राणी मुझ परमात्मा से प्रकट होते हैं। यह परमात्मा सत्य का भी सत्य है | ‘‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७॥’’ छान्दोग्योपनिषद अध्याय ५ -दशमः खण्डः     ‘उन जीवों में जो अच्छे आचरण वाले होते हैं, वे शीघ्र ही श्रेष्ठ योनि को प्राप्त होते हैं और जो बुरे आचरण वाले होते हैं, वे तत्काल अशुभ योनि को प्राप्त होते हैं। वे कुत्ते की योनि, सूकरयोनि या चण्डाल योनि को प्राप्त करते हैं।’ इस श्रुति के वाक्य से  सभी जीव उसी चिद्घन के चिदंश सिद्ध होते हैं | 

 ”एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म { छान्दोग्य ६ / २ / १ } अर्थात वह एक है और दूसरे की साझेदारी के बिना है |  एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनु प्रभूतः । एकैवोषाः सर्वमिदं विभात्येकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ॥२॥ ऋग्वेद मण्डल ८. सूक्त ५८ | 

तथा विष्णुसहस्रनाम में भी कहा कि —  “एको नैकः सवः कः किं यत् -तत् -पदमनुत्तमम् । लोकबंधु: लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।।७८।।”  

 ‘‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।’’ 

 जो चेतन हैं जैसे वृक्ष, मनुष्य, प्राणी, कुत्ते, हाथी आदि और देव लोक की जो जातियां  हैं जो कि चेतना की अति-उत्कृष्ट कक्षा में है , उन चेतनों  में भी जो सर्वोत्तम चेतन तथा  अचेतनों  में जो में चेतना का संचार करने वाला है । एक होते हुए भी जो पञ्चपदात्मक रूप से अनेकों की कामना पूरी करता है जैसे सभी जीना चाहते हैं तो भगवान वायुरूप हो करके सबको जिलाता है, सब भोग करना चाहते हैं तो अन्न होकर के भगवान सभी को भोग देता है। एक होते हुए भी अनेकों की इच्छाओं को पूरा करना । विरोधी इच्छाओं  को भी पूरी करता है, रावण की  इच्छा भी पूरी करता है और राम की इच्छा भी पूरी करता है । गीता में भगवान प्रतिज्ञा करते हैं कि —

“मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।१८.६५ ।।”  तुम मच्चित्त , मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होओगे; यह मैं तुम्हें सत्य वचन देता हूँ, (क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो।। “यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥१||{छान्दोग्य ७/२३/1}” भूमा तत्व में यानी व्यापक में , जो (अनंत) है विराट है उसी में सुख है, अल्पता में सुख नहीं है | जो भूमा है, व्यापक है वह सुख है| कम में सुख नहीं है | ब्रह्मविद्या के आचार्य भगवान सनत्कुमार से उनके शिष्य देवर्षि नारद ने पूछा ..” सुखं भगवो विजिज्ञास इति ” | जिसके  उत्तर में  भगवान् श्री सनत्कुमारजी का प्रसिद्ध वाक्य है .” यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति ” | अर्थात् व्यापकता में ही सुख है, अल्प में सुख नहीं हैं, सुख ‘भूमा ही है अतः भूमा की विशेष रूप से जिज्ञासा करनी चाहिए । इस प्रकार उन व्यापनशील विष्णु के स्वरूप की प्राप्ति में ही परम सुख है क्योंकि वे ही महेश्वर हैं | ” इस प्रकार जो भूमा है (व्यापक) है वही सुखस्वरूप है , उन महेश्वर के चरणों की प्राप्ति कैसे हो सकती है इसका उपाय अगले मन्त्र में बताते हैं | ऐसे उन भगवान को पीठ के मध्य में विराजमान करके शाण्डिल्य आदि महर्षियों के निर्देशानुसार जो धीर पुरुष भजन करते हैं  , क्योंकि धर्म का पहला लक्षण धैर्य ही है {धृतिः क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् । । } धृति (धैर्य) , क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना) , दम (अपनी भावनाओं , कामनाओं पर नियंत्रण करना) , अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश में रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग) , विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा) , सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये दस धर्म के लक्षण हैं। इस प्रकार इन दस लक्षणों वाले धर्म का जो लोग सावधानी से पालन करते हैं   उन्हीं को शाश्वती सिद्धि  { अनपायिनी सिद्धि } और शाश्वत सुख प्राप्त होता है ,दूसरों को नहीं |   ||२२ ||

  || मूल उपनिषद ||

एतद्  विष्णोः परमं पदं ये

नित्योद्युक्तास्तं यजन्ति  न कामान् ।

तेषामसौ गोपरूपःप्रयत्नात्

प्रकाशयेत्  आत्मपदं तदैव ॥ २३ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

मन्त्रान्तरमाह ,  एतद् विष्णोरिति | ‘ये’ साधकाः,  ‘एतत्’ यन्त्रात्मकं, ‘विष्णोः पदं,’ ‘नित्ययुक्ताः’ सततं प्रयत्नवन्तः, ‘संयजन्ते’ सम्यगाराधयन्ति,  ‘न,’ तु ‘कामान्,’ कामयन्ते | ‘तेषां’ साधकोत्तमानां , ‘असौ,’ गोपालक  ‘रूपः’ गोपवेषो वा ‘प्रयत्नात्’ , ‘आत्मपदं’ स्वरूपं, 

 ‘तदा’ ‘एव’ भजनाव्यवहितसमये एव, ‘प्रकाशयेत्’ प्रत्यक्षं दर्शयेत् | ||२३||

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

अब इन विष्णु के माहेश्वर पद की चर्चा करते हैं  |  “यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।१०.३।।” जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों के (महेश्वर) महान ईश्वर के रूप में जानता है, मर्त्य मनुष्यों में ऐसा संमोहरहित (ज्ञानी) पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।। 

  “अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।९ .११ ।।” समस्त भूतों के महान ईश्वर (महेश्वर) रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी समझ कर मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।। यहां गीता के नौवें और दसवें अध्याय के वाक्यों से भगवान ने अपने ही श्रीमुख से अपने महेश्वरत्व का निरूपण किया है | और जिनमें ज्ञान का अभाव है उनका मूढ़त्व भी स्फुट किया है | तथा नरसिंह पुराण के चालीसवें अध्याय में शिवजी ने स्वमुख से ही इस सिद्धान्तका प्रतिपादन किया है “पुरुषः पुष्कलः पुण्यः पुष्कराक्षो महेश्वरः ।” शान्तः शान्तिकरः शास्ता शङ्करः शंतनुस्तुतः ।”त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देव त्वं सुधा पुरुषोत्तम  । नमो देवादिदेवाय विष्णवे शाश्वताय च ॥ १७॥” महाभारत के भीष्म पर्व के पैंसठवें अध्याय में दुर्योधन को समझाते हुए भीष्म जी कहते हैं कि पहले की बात है , समस्त देवता और महर्षि  एकवार गन्धमादन पर्वत पर आकर पितामह ब्रह्माजी के पास आकर बैठे उस समय उनके बीच में बैठे हुए प्रजापति ब्रह्माने आकाशमें खड़ा हुआ एक श्रेष्ठ विमान देखा , जो अपने तेज से प्रज्वलित होरहा था | अपने मनको संयममें रखनेवाले ब्रह्माजीने ध्यानसे यथार्थ बातको जानकर हाथ जोड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उन परमपुरुष को नमस्कार किया | ऋषि तथा देवता ब्रह्माजीको खड़े (और हाथ जोड़े ) हुए देख स्वयं भी उस परम अद्भुत तेजका दर्शन करते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गये | ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ , परम धर्मज्ञ , जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने उन तेजोमय परम पुरुषका यथावत पूजन करके उनकी स्तुति की | ” विश्वावसुर्विश्वमूर्तिर्हि विश्वे विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च। विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्माद्योगात्मानं दैवतं त्वामुपैमि ।।४७ ।।  प्रभो ! आप सम्पूर्ण विश्व को आच्छादित करने वाले विश्वस्वरूप और विश्व के स्वामी हैं |  सब ओर आपकी सेना है | यह विश्व आपका कार्य है | आप सबको अपने वश में रखने वाले हैं | इसलिए आपको विश्वेश्वर और वासुदेव कहते हैं | आप योग स्वरूप देवता हैं , मैं आपकी शरण में आया हूँ | || ४७ || आगे इसी स्तुति में कहते हैं   “जय विश्व महादेव जय लोकहिते रत। जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर ।।४८ ।।”  विश्वरूप महादेव ! आपकी जय हो , लोकहित में लगे रहने वाले परमेश्वर ! आपकी जय हो | सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले योगीश्वर ! आपकी जय हो | योग के आदि और अन्त ! आपकी जय हो | || ४८ ||  “निसर्ग सर्ग निरत कामेश परमेश्वर । अमृतोद्भव सद्भाव मुक्तात्मन्विजयप्रद ।।५७।।” आप स्वभावतः संसार की सृष्टि में प्रवृत्त रहते हैं , आप ही सम्पूर्ण कामनाओं के स्वामी परमेश्वर हैं | अमृत की उत्पत्ति के स्थान , सत्य स्वरूप , मुक्तात्मा और विजय देनेवाले आप ही हैं | उसी महाभारत के भीष्म पर्व के छियासठ वें अध्याय में भीष्म जी ने बताया  “स एष शाश्वतो देवः  सर्वगुह्यमयः शिवः । वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत ।।३७।। ” हे भारत ! जिनके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे हो , वे सनातन देवता सर्व गुह्यमय कल्याण स्वरूप परमात्मा ही  ‘वासुदेव’ नाम से जानने योग्य हैं |   इस प्रकार इन सभी महाभारत के श्लोकों में विश्वेश्वर, महादेव , परमेश्वर तथा शिव आदि नामों से गोपाल तत्व ही व्यक्त  किया गया है | अनुशासन पर्व के बयालीसवें अध्याय में भी  “नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च। भूतभव्यभवेशाय शिवाय शिवमूर्तये।।३३।।” शिवयोनेः शिवाद्याय शिवपूज्यतमाय च। घोररूपाय महते युगान्त करणाय च।।३४ ।।” इत्यादि वाक्यों के द्वारा शिव, घोर आदि नाम लेकर {शिवयोनेः} शिव के भी  कारण रूप, { शिवाद्य } शिव से भी पहले ,{ शिव पूज्यतमाय } शिव के भी पूज्यतम, आदि शब्दों द्वारा स्तुति की गयी है | अतः परमेश्वर , महादेव आदि पदों का कृष्ण के लिये प्रयोग औपचारिक नहीं अपितु मुख्य अर्थ में ही है | क्योंकि वहीं पर “नमश्चकार तुष्टात्मा पुरुषं परमेश्वरम्” ऐसा कहकर श्रीकृष्ण का उपक्रम करके और उनका परमेश्वरत्व बताकर ‘‘ऋषियों और देवताओं ने पूछा कि आपके द्वारा किसकी स्तुति की गयी ? ’’ ऐसा प्रश्न होने पर ब्रह्माजी ने बताया कि- यत्तत्परं भविष्यं च भवितव्यं च यत्परम् । भूतात्मा च प्रभुश्चैव ब्रह्म यच्च परं पदम् ।।६।। तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः । जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः ।।७ ।। (भीष्म पर्व अध्याय ६६) हे श्रेष्ठ देवताओ ! जो परम तत्व है , भूत, भविष्य और वर्तमान— तीनों जिनके उत्कृष्ट स्वरूप हैं तथा जो इन सबसे विलक्षण हैं , जिन्हें सम्पूर्ण भूतों का आत्मा और सर्वशक्तिमान प्रभु कहा गया है , जो परब्रह्म और परम पद के नाम से विख्यात हैं , उन्हीं परमात्मा ने मुझे दर्शन देकर मुझसे प्रसन्न हो बातचीत की है | और मैंने उन जगदीश्वर से सम्पूर्ण जगत पर कृपा करने के लिये प्रार्थना की है |  “इन वचनों से अनौपचारिकता की सुव्यवस्था हो जाती है | और भी नृसिंह तापनी में ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्॥ यहां से शुरू करके आगे कहा है कि ‘‘एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्’’ इत्यादि से उनके स्वरूप का निरूपण करके  ‘‘प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते’’ इससे विष्णु का शिवत्व सिद्ध किया है |  तथा नारायणोपनिषद में  ‘‘ सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् । विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥ १॥ विश्वतः परमान्नित्यं विश्वं नारायणꣳ हरिम् । विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति ॥ २॥ पतिं विश्वस्यात्मेश्वरꣳ शाश्वतꣳ शिवमच्युतम् । ’’ आदि में उन्हें ही शिवादि के नाम से कहा है | एवं च कूर्मपुराण के सोलहवें अध्याय में भी ‘‘दृष्ट्वा देवं जगद्योनिं विष्णुं विश्वगुरुं शिवम् ।१६.२७ मा निन्दस्वैनमीशानं भूतानामेकमव्ययम् । कथं देवो महादेवः शाश्वतः कालवर्जितः ।१६.७१॥’’ काल, ईशान और महादेव आदि पदों का विष्णु परक अर्थ होने से इन शब्दों के वाचक मुख्यतया विष्णु ही ” महेश्वर ” (पदवाच्य) हैं | क्योंकि लोकोक्ति तथा काव्योक्ति से पुराण और वेद के वाक्य ज्यादा बलवान होते हैं | गीता में भी ‘‘रुद्राणां शङ्करश्चास्मि’’ भागवत के चौथे स्कंध के पन्द्रहवें अध्याय में आदिराज भगवान पृथुका तलवार देकर शंकर जी ने सत्कार किया ‘‘दशचन्द्रमसिं रुद्रः शतचन्द्रं तथाम्बिका । सोमोऽमृतमयानश्वान् त्वष्टा रूपाश्रयं रथम् ॥ १७ ॥’’ रुद्रने दस चन्द्राकार चिन्होंसे युक्त कोषवाली तलवार , अम्बिकाजीने सौ चंद्राकार चिन्होंवाली ढाल , चन्द्रमाने अमृतमय अश्व , त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने सुन्दर रथ उपहार में दिया | यदि कहें कि ये पृथुजी महाराज तो विष्णु के अंशावतार हैं ‘‘एष साक्षात् हरेरंशो जातो लोकरिरक्षया । इयं च तत्परा हि श्रीः अनुजज्ञेऽनपायिनी ॥ ६ ॥’’ पृथु के रूप में साक्षात श्री हरि के अंश ने ही संसार की रक्षा के लिये अवतार लिया है और अर्चि के रूप में , निरंतर भगवान की सेवा में रहने वाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं | तो फिर हरिरूपमें शंकर ही महेश्वर हैं ऐसा मानें तो ठीक नहीं है क्योंकि  ‘‘ब्रह्मा जगद्‍गुरुर्देवैः सहासृत्य सुरेश्वरैः । वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ट्वा चिह्नं गदाभृतः ॥ ९ ॥  पादयोः अरविन्दं च तं वै मेने हरेः कलाम् ।’’ जगद्गुरु ब्रह्माजी देवताओं के साथ और अन्य देवेश्वरों के साथ वहां पधारे | उन्होंने वेन कुमार पृथु के दाहिने हाथ में भगवान विष्णु की हस्तरेखाऐं और चरणों में कमल का चिन्ह देखकर उन्हें श्रीहरि का अंश समझा, क्योंकि जिसके हाथ में  दूसरी रेखाओं से बिना कटा हुआ चक्र का चिन्ह होता है वह भगवान का ही अंश होता है | इस वाक्य से पृथु महाराज भगवान की कला मात्र सिद्ध होते हैं , लेकिन आगे का वाक्य देखिये  ‘‘सरित्समुद्रा गिरयो नागा गावः खगा मृगाः ।‘द्यौः क्षितिः सर्वभूतानि समाजह्रुरुपायनम् ॥ १२ ॥ ’’ उस समय नदी , समुद्र , पर्वत , सर्प , गौ , पक्षी , मृग , स्वर्ग , पृथ्वी तथा अन्य सब प्राणियों ने भी उन्हें तरह -तरहके उपहार भेंट किए | यानी आकाश से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सभी चराचर प्राणी जिसकी सेवा में उपस्थित हों वह महेश्वर ही है | 

 “हरिर्यथैकः पुरुषोत्तमः स्मृतो महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः । तथा विदुर्मां मुनयः शतक्रतुं द्वितीयगामी न हि शब्द एष नः । । ३.४९ । । रघुवंश” हरि भगवान् ही पुरुषोत्तम हैं, त्र्यंबक ही महेश्वर हैं। ऐसे ही इन्द्र ही शतक्रतु हैं | आदि में जो लोक प्रसिद्ध रूढ़ शब्दार्थ का प्रयोग हुआ है वह सभी जगह मान्य नहीं होता कहीं कहीं योगज व्युत्पत्ति भी करनी पड़ती है |  “काव्यादीनामसत्यत्वान्नोपयोगः कथंचन  ||”  

जो साधक  इस  यन्त्रात्मक ये जो विष्णु का परम पद है, इसमें नित्ययुक्ताः सतत प्रयत्नवान् होकर इस विषय में जो नित्य उत्साह युक्त होकर “संयजन्ते  सम्यक्तया आराधना करते हैं , अनुसंधान करते हैं, इस परम पद का पूजन करते हैं , अजस्र आराधना करते हैं , अर्थात बीच में किसी  विघ्न के बिना क्योंकि भगवत्सेवा में आलस्य आदि दोष नहीं आने चाहिए | महर्षि पतञ्जलि ने चौदह प्रकार के विघ्नों को बताया है | 

व्याधि-स्त्यान-संशय-प्रमाद-आलस्य-अविरति-भ्रान्तिदर्शन-अलब्धभूमिकत्व-अनवस्थितत्वानिचित्तविक्षेपस्तेअंतराया:.योगसूत्र,समाधिपाद,सूत्र३०  दु:ख-दौर्मनस्य-अङ्गमेजयत्व‌-श्वास-प्रश्वासा विक्षेप सह्भुवः । योगसूत्र, समाधिपाद, सूत्र३१ 

  १. व्याधि :- शरीर एवं इन्द्रियों में किसी प्रकार का रोग उत्पन्न हो जाना। 

  २. स्त्यान :- सत्कर्म अथवा साधनाके प्रति होने वाली ढिलाई, अप्रीति, जीचुराना .

  ३. संशय :- अपनी शक्ति या योग प्राप्ति में संदेह उत्पन्न होना .

  ४. प्रमाद :- योग साधना में लापरवाही बरतना (यम-नियम आदि का ठीक से पालन नहीं करना या भूल जाना)

  ५. आलस्य :- शरीर व मन में एक प्रकार का भारीपन आ जाने से योगसाधना नहीं कर पाना .  आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः |

  ६.  अविरति :- वैराग्य की भावना को छोड़कर सांसारिक विषयों की ओर पुनः भागना . 

  ७. भ्रान्ति दर्शन :- योग साधना को ठीक से नहीं समझना , विपरीत अर्थ समझना . सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझ लेना।  

  ८.  अलब्धभूमिकत्व :- योग के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होना , योगाभ्यास के बावजूद भी साधना में विकास नहीं दिखता है। इससे उत्साह कम हो जाता है। 

  ९.  अनवस्थितत्व :-  चित्त की विशेष स्थिति बन जाने पर भी उस स्थिति में स्थिर नहीं होना।  

  १०. दुःख :- तीन प्रकार के दुःख आध्यात्मिक , आधिभौतिक और आधिदैविक। 

  ११. दौर्मनस्य :- इच्छा पूरी नहीं होने पर मन का उदास हो जाना या मन में क्षोभ उत्पन्न होना। 

  १२. अङ्गमेजयत्व :- शरीर के अंगों का कांपना।  

  १३. श्वास :-  श्वास लेने में कठिनाई या तीव्रता होना। 

  १४.  प्रश्वास :- श्वास छोड़ने में कठिनाई या तीव्रता होना , इसलिए भगवान ने गीता में कहा कि   “ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।१२.६ ।।”  परन्तु जो भक्तजन मुझे ही परम लक्ष्य समझते हुए सब कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्य योग के द्वारा मेरा (सगुण का) ही ध्यान करते हैं।  “तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।१२ .७ ।।” हे पार्थ ! जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर हुआ है ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।। इसलिये “मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।१२.८।।” तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।।   “यजन्ति”  माने अपनी अंतर वृत्तियों को उनके लिए समर्पित करते हैं  | ‘न,तु कामान् कामयन्ते। अन्य भोग की कामना नहीं करते उन उत्तम साधकों के लिए यह गोपाल रूप धारी ये जो लीला से गोपाल वेश  रूप हैं वो प्रयत्न के द्वारा,माने सतत अभ्यास के द्वारा अपने कृपापात्रों को अपनी ही अंतरात्मा के रूप में , स्वरूप रूप से , ब्रह्मरूप से ही प्रत्यक्ष भासते हैं, दर्शन देते हैं | जो आत्म-पद है, उस आत्मा शब्द से जो उद्भासित  लक्ष्य है  उसका प्रकाश कर देते हैं।  ‘तदा एव’ माने उसी समय अर्थात भजन के समकालीन ही   ‘प्रकाशयेत्’  प्रत्यक्ष दर्शन करा देते हैं | आत्मा शब्द की व्युत्पत्ति इस श्लोक में बहुत ही स्पष्ट रूप से समझाई है |

 यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।

 यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति कीर्त्यते । 

     इसका साम्प्रदायिक अर्थ यह है कि जो आत्मा  अवस्था में प्राज्ञ रूप से सबको व्याप्त करके रहता है “आप्ल्रि” व्याप्तौ + मनिँन्। स्वादि गण पठित धातु से (आप्नोति = व्याप्नोति ) और स्वप्न अवस्था में तैजस रूप से सब कुछ ग्रहण करता है |  ( आदत्ते = गृह्णाति =स्वीकरोति ) और जाग्रत अवस्था में वैश्वानर रूप से सभी विषयों का भोग करता है  अद भक्षणे  ( अत्ति = भुङ्क्ते  ) और चौथा लक्षण है सन्तत भाव  ( अतति = अत , सातत्यगमने ) तुरीय रूप से तीनों अवस्थाओं में सतत वर्तमान रहता है , व्याप्त रहता है ,  हमेशा ज्ञान स्वरूप ही रहता है।  अत्यते ,गम्यते, प्राप्यते,लभ्यते  तपोऽनुष्ठानादिभिः यः स आत्मा | लिङ्गपुराण के पूर्वार्ध में पाठान्तर भेद से यह श्लोक मिलता है। 

   यदाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानयम्।।

   यच्चास्य सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते।। ७०.९६ ।।                                       

      आप् व्याप्तौ + मनिँन्।  आ + दा दाने + मनिँन् । अत् भक्षणे + मनिँन्।

  अत् सातत्य-गमने + मनिँन्। अतति सातत्येन गच्छति, इति आत्मा। ||   ||२३|| 

  || मूल उपनिषद ||

 यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं

यो विद्यास्तस्मै गोपायति स्म कृष्णः ।

तं ह देवमात्मबुद्धि प्रकाशं

मुमुक्षुर्वै शरण मनुव्रजेत् ॥ २४ ॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

     ननु तत्प्रकाशे सति किं स्यादित्याशङ्क्य मुमुक्षुशरण्योक्त्यैव तस्य मोक्षपदत्वमाह , यो ब्रह्माणमिति |   ‘यः’ परमेश्वरः कृष्णः ‘पूर्वं’ सृष्टिसमये, ‘ब्रह्माणं,’  ‘विदधाति’ रचयति,  ‘यः’ कृष्णः,

 ‘तस्मै’  तदर्थं,  ‘विद्याः’ वेदान्, प्रलयपयोधिजले मत्स्यहयग्रीवादिरूपेण  ‘गोपायति’ तस्मै उपदिशति वा |  ‘तं’ , ‘देवं’ द्योतनात्मकं, ‘आत्मबुद्धिप्रकाशं’ स्वप्रकाशं,  ‘मुमुक्षुः’ मोक्षार्थी, शरणमनुव्रजेत्  || २४ || 

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

   अब भगवत्प्राप्ति  का मुख्य उपाय शरणागति का निरूपण करते हैं | तो इस प्रकार आत्म तत्व के प्रकाश हो जाने पर क्या  होगा इस शङ्का के निवारण के लिये  “यो ब्रह्माणं   इस मंत्र में बताते हैं कि उसे मोक्ष पद का लाभ होगा | जो परमेश्वर कृष्ण जिन्होंने पहले सृष्टि के समय हिरण्यगर्भ की  { ब्रह्मा की } रचना की, ब्रह्मा को उत्पन्न किया और जिन्होंने प्रलय पयोधि के जल में मत्स्य , हयग्रीव आदि रूपों से  ‘गोपायति’ रक्षति, रक्षा की | ब्रह्मा जी के लिए विद्याओं का , वेदों का उपदेश दिया और विद्या का रहस्य समझा कर जगत की रक्षा , दीक्षा में समर्थ बनाया ‘तं’ लीलाधृत गोपालस्वरूपं “देवं” { क्रीडा शीलं } भागवत के दशम स्कन्ध में

 ” न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं विना विनोदं बत तर्कयामहे । भवो निरोध: स्थितिरप्यविद्यया कृता यतस्त्वय्यभयाश्रयात्मनि ॥ १०.२.३९ ॥”

 हे ईश! नित्यमुक्त आप जन्मरहित हैं, आपके जन्म धारण करने का लीला के सिवा दूसरा कोई कारण हमारे तर्क में नहीं आता। हे नित्यमुक्त! आपके जन्म का कारण नहीं है यह वार्ता तो अलग रही किन्तु जीवात्मा में भी ये जन्म आदि नहीं है, फिर आपके विषय में जो यह जन्म, मरण और स्थिति की प्रतीति होती है वह भी अविद्याकृत ही है (परमार्थतः नहीं है)।।३९ ।। उन्ही द्योतनशील  देव को, हमें आत्मज्ञान सम्बन्धिनी  ‘ आत्मबुद्धिप्रकाशं ’  ” तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१०. १० ।।” उन (मुझ से) नित्य युक्त हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को, मैं वह ‘बुद्धियोग’ देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।। “भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।१८.५५।। ” (उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात मेरा ही स्वरूप बन जाता है।। { अपने आप को जानने के लिये , स्वप्रकाश के लिये }   बुद्धि को जाग्रत करने के लिये 

{ आत्मज्ञान के लिए } ।  यानी कि जैसे वृत्तियाँ स्वभाव से ही बहिर्गामी होती हैं, बाहर की तरफ ही विषय देश में जाती हैं ये उनका स्वभाव है, परन्तु कोई धीर पुरुष उनका प्रत्याहार करके, उनको लौटा कर उनके बाहरी मार्ग को अवरुद्ध करके अंदर की तरफ अगर प्रवाहित कर लेता है , तब मनोवृत्ति जब आत्मसम्बन्धिनी हो जाती है तब आत्मा का प्रकाश होता है, उस प्रकाश के लिए मुमुक्षु , (संसार सागर से पार जाने की इच्छा रखने वाला )  मोक्षार्थी { जो अज्ञान और दुख के बंधन से मुक्त होना चाहता है }  उसकी शरण में जाए । उसी की शरण में जाने से आत्मज्ञान का प्रकाश होता है | माने अपने केंद्र की तरफ लौटे , साक्षी भाव में स्थिर होवे | इसी बात को दृढ़ करने के लिये श्री भगवान जी गीता में कहते हैं  “ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।१२ .६ ।।” परन्तु जो भक्तजन मुझे ही परम लक्ष्य समझते हुए सब कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्य योग के द्वारा मेरा (सगुण का) ही ध्यान करते हैं।।  “तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।१२ .७।।” हे पार्थ ! जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर हुआ है ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।।  “मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।१२ .८।।” तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।।  ‘‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।१८.६२ ।।’’  गीता ,  हे भारत तू सर्वभाव से उस ईश्वर की ही शरणमें जा अर्थात् संसारके समस्त क्लेशोंका नाश करनेके लिये मन , वाणी और शरीरद्वारा सब प्रकारसे उस ईश्वरका ही आश्रय ग्रहण कर। फिर उस ईश्वर के अनुग्रह से परम — उत्तम शान्तिको अर्थात् उपरति को और शाश्वत स्थानको अर्थात् मुझ विष्णुके परम नित्यधामको प्राप्त करेगा। क्योंकि ब्रह्मा , शंकर आदि भी श्रीकृष्ण का आश्रय लेकर ही संसार का हित करने में समर्थ होते हैं। अतः  माया निवृत्ति के लिये श्रीकृष्ण की ही शरण अति आवश्यक है |  भागवत के नवम स्कंध में (अम्बरीष चरित्र में ) महादेव जी ने दुर्वासा जी को कहा कि ——

“अहं सनत्कुमारश्च नारदो भगवानज: । कपिलोऽपान्तरतमो देवलो धर्म आसुरि: ॥ ५७ ॥ मरीचिप्रमुखाश्चान्ये सिद्धेशा: पारदर्शना: । विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययावृता: ॥ ५८ ॥ तस्य विश्वेश्वरस्येदं शस्त्रं दुर्विषहं हि न: । तमेवं शरणं याहि हरिस्ते शं विधास्यति ॥ ५९ ॥” मैं , सनत्कुमार , नारद , भगवान ब्रह्मा , कपिल देव , अपान्तरतमा ,देवल ,धर्म , आसुरि , तथा मरीचि आदि दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्वर — ये हम सभी भगवान की माया को नहीं जान सकते | क्योंकि हम उसी माया के घेरे में हैं || ५७ – ५८ || यह चक्र उन विश्वेश्वर का शस्त्र है | यह हम लोगों के लिये असह्य है | अतः तुम उन्हीं की शरण में जाओ | वे भगवान् ही तुम्हारा मङ्गल करेंगे || ५९ || और भी भागवत के आठवें स्कंध के  बारहवें अध्याय में शंकर जी  कहते हैं कि —

 नाहं परायुर्ऋषयो न मरीचिमुख्याजानन्ति यद्विरचितं खलु सत्त्वसर्गा: । यन्मायया मुषितचेतस ईश दैत्य-मर्त्यादय: किमुत शश्वदभद्रवृत्ता:॥१०॥

  प्रभो !  मैं , ब्रह्मा और मरीचि आदि ऋषि —- जो सत्वगुण की  सृष्टि के अन्तर्गत हैं —जब आपकी बनाई हुई सृष्टि का भी रहस्य नहीं जान पाते , तब आपको तो जान ही कैसे सकते हैं | फिर जिनका चित्त मायाने अपने वश में कर रखा है और जो सर्वदा रजोगुणी और तमोगुणी कर्मों में लगे रहते हैं , वे असुर और मनुष्य आदि तो भला जानेंगे ही क्या ||१०|| तथा जिस समय भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप को देखने की इच्छा से  उमा सहित शंकर जी ने बैकुंठ में  भगवान से प्रार्थना की तब जैसे ही भगवान विष्णु ने अपनी स्त्रीरूपा माया को  दिखाया तो शंकर जी सब कुछ भूल गए और मदोन्मत्त होकर उस मोहिनी रूपके पीछे दौड़ने लगे तो शंकरजीको मायाके वशीभूत हुआ जानकर विष्णुजीने अपने उस मायामय स्त्रीरूपको तिरोहित करदिया  तब कहीं शंकरजी स्वस्थ हो पाये | तब भगवान विष्णुने बड़े प्रेमसे शंकरजी को कहा कि यद्यपि मेरी यह —- “सेयं गुणमयी माया न त्वामभिभविष्यति । मया समेता कालेन कालरूपेण भागश: ॥८.१२. ४० ॥” गुणमयी माया बड़ों-बडोंको मोहित करदेती है, फिर भी अब यह आपको कभी मोहित नहीं करेगी | क्योंकि सृष्टि आदि के लिये समयपर उसे शोभित करनेवाला काल मैं ही हूँ , इसलिये मेरी इच्छा के विपरीत वह रजोगुण आदि की सृष्टि नहीं कर सकती || ४० || इसप्रकार इस वाक्यके द्वारा कृष्णचन्द्रने शंकरजी को आशीर्वाद दिया कि अब इसके बाद आप माया के पराधीन कभी न होओगे | इससे सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण ही शरण्य हैं | अब आगे इसी प्रसंग में श्रीशुकदेवजी कहते हैं —- परीक्षित ! इस प्रकार भगवान विष्णु ने भगवान शंकर का सत्कार किया | तब उनसे विदा लेकर एवं परिक्रमा करके वे अपने गणों के साथ कैलाश को चले गये || ४१ || भरतवंशशिरोमणे !  भगवान शङ्कर ने बड़े -बड़े ऋषियोंकी सभामें अपनी अर्द्धांगिनी सती देवीसे अपने विष्णुरूपकी अंशभूता मायामयी मोहिनीका इस प्रकार बड़े प्रेमसे वर्णन किया || ४२ ||  ‘देवि ! तुमने परम पुरुष परमेश्वर भगवान विष्णु की माया देखी ? देखो , यों तो मैं समस्त कला -कौशल विद्या आदि का स्वामी और स्वतंत्र हूँ  , फिर भी उस माया से विवश होकर मोहित हो जाता हूँ | फिर दूसरे जीव तो परतन्त्र हैं ही ;   अतः वे मोहित हो जायँ —-इसमें कहना ही क्या है || ४३ ||  

” यं मां अपृच्छस्त्वमुपेत्य योगात् समासहस्रान्त उपारतं वै । स एष साक्षात् पुरुषः पुराणो  न यत्र कालो विशते न वेदः ॥ ८.१२.४४ ॥”  जब मैं एक हजार वर्ष की समाधि से उठा था , तब तुमने मेरे पास आकर पूछा था कि तुम किसकी उपासना करते हो | वे यही साक्षात सनातन पुरुष हैं | न तो काल ही उन्हें अपनी सीमा में बांध सकता है और न वेद ही इनका वर्णन कर सकता है | इनका वास्तविक स्वरूप अनन्त और अनिर्वचनीय है || ४४ || इस प्रकार पार्वती के प्रति शंकर ने अपने ध्येय का निरूपण किया |  श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में भी  

  “ब्रह्मा भवश्च तत्रैत्य मुनिभिर्नारदादिभि: ।

 देवै: सानुचरै: साकं गीर्भिर्वृषणमैडयन् ॥ १०। २। २५ ॥”  श्री शुकदेव जी कहते हैं — परीक्षित !  भगवान शंकर और ब्रह्मा जी कंस के कारागार में आये। उनके साथ अपने अनुचरों के सहित समस्त देवता और नारद आदि ऋषि भी थे। वे लोग सुमधुर वचनों से सबकी अभिलाषा पूर्ण करने वाले श्रीहरि की इस प्रकार स्तुति करने लगे || २५ ||   “सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये। सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना:।। (श्रीमद्भागवत -१०.२.२६ ) श्री देवकी माताजी के गर्भ में श्रीमन्नारायण भगवान का दर्शन करते हुए परमेष्ठी ब्रह्मा, महादेव शिव, देवर्षि नारद आदि कहते हैं – हे प्रभो !  आप सत्यव्रत हैं। आपकी प्रतिज्ञा सर्वथा सत्य है, सत्य जिसका व्रत है, आप  सत्यसंकल्प हैं | (सत्यपरं) सत्य ही आपकी प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है | (त्रिसत्यं) सृष्टि के पूर्व , प्रलय के पश्चात और संसार की  स्थिति के समय —इन असत्य अवस्थाओं में भी आप ही सत्य हैं | (सत्यस्य योनिं) पृथ्वी , जल , तेज, वायु ,और आकाश इन पाँच दृश्यमान सत्योंके आप ही कारण हैं | अथवा   जगत् के निमित्त और उपादान कारण आप ही हैं। (निहितं च सत्ये) और उनमें अन्तर्यामी रूप से विराजमान भी हैं |  (सत्यस्य) आप इस दृश्यमान जगत के परमार्थ स्वरूप हैं | (सत्यमृतसत्यनेत्रं)  आप ही मधुर वाणी और समदर्शन के प्रवर्तक हैं | अथवा  सत्य और ऋत जिनके नेत्र हैं, (सत्यात्मकं) भगवन् ! आप तो बस , सत्य स्वरूप ही हैं | हम सब आपकी शरण में आये हैं |  आप सत्य के भी सत्य हैं तथा आप ही सत्यनारायण हैं। प्रभो, हम लोग आपकी शरणागति एवं प्रपत्ति करते हैं। शरणागति उसे कहते हैं कि जब श्रीभगवान् के दिव्य पाद पद्मों के नीचे अपने हाथों को डालकर कर प्रार्थना की जाय कि  प्रभो,आप इसे दबा लीजिये, जिससे कि हम आपसे दूर न जाने पायें। तब  श्रीभगवान् उसे अपना लेते हैं। बिल्ली जिसप्रकार से अपने बच्चे को पकड़े रहती है, तब उसका बच्चा निर्भय रहता है क्योंकि उसकी माँ उसे पकड़े हुए है, ठीक उसी प्रकार से श्रीभगवान् जब अपने भक्त को अपना लेते हैं तब वह भक्त निर्भय हो जाता है। ‘जिसे श्रीभगवान् ने पकड़ रखा हैं वह शरणागत है  ‘जबकि ‘जिसने श्रीभगवान् को पकड़ रखा है वह प्रपन्न ‘है। प्रपद कहते हैं उपरवाले पंजे को। जिस प्रकार से बन्दरी का बच्चा अपनी माँ को पकड़कर निर्भय रहता है कि मैं अपनी माँ को पकड़ रखा हूँ अब माँ मुझे गिरने नहीं देगी उसी प्रकार से भगवान के श्रीचरणों (प्रपद ) को भक्त पकड़कर निर्भय हो जाता है वही ‘प्रपन्न’ है।  देवगण कहते हैं – ‘ शरणं प्रपन्ना: ‘ हम लोग आपकी ‘शरण’ भी हैं तथा ‘प्रपन्न भी  हैं।  इसलिए गीता जी में भगवान कृष्ण ने कहा कि    “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।१८ .६६।।”  सम्पूर्ण  धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत कर।  || २४ || 

  || मूल उपनिषद ||

ओङ्कारेणान्तरितं ये जपन्ति

गोविन्दस्य पञ्चपदं मनुम् ।

तेषामसौ दर्शयेदात्मरूपं

तस्मान्मुमुक्षुरभ्यसेन्नित्यशान्तिः ॥ २५ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

     पञ्चपदमन्त्रस्य मन्त्रान्तरमूलत्वं विवक्षुः प्रणवपुटितं पञ्चपदरसनफलमाह, ओङ्कारेणान्तरितमिति |  ‘ओङ्कारेण,’ ‘अन्तरितं’ पुटितं, ‘गोविन्दस्य’ , ‘पञ्चपदं’ ,‘मनुं’ मन्त्रं , ‘ये जपन्ति’ , ‘तेषाम्’ ,

  ‘असौ’  गोविन्दः, ‘आत्मरूपं’  , दर्शयेत् |  ‘तस्मात्’ कारणात्, ‘मुमुक्षुः’ पुरुषः,    ‘नित्यशान्त्यै’  संसारानर्थशान्त्यै, गोविन्दमन्त्रम्  ‘अभ्यसेत्’ पुनःपुनर्जपेत्  ॥ २५ ॥

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

   अब अगले मंत्र में पञ्चपदमन्त्र के मन्त्रान्तर मूल को बताने की इच्छा से पञ्च पदमन्त्रको  प्रणव पुटित करके पंच पद मंत्र के रसन का फल बताते हैं  | ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजन वल्लभाय स्वाहा ॐ  |   अर्थात् ओंकारगर्भित होने से जो रसास्वाद होगा उसका परिणाम बताते हैं | ओंकार से अन्तरित करके अर्थात पुटित करके , युक्त करके गोविन्द का ये जो पञ्चपदात्मकमन्त्र है | (ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजन वल्लभाय स्वाहा ॐ) ये जो पांच पद वाला मंत्र है जो इसका जाप करते हैं (जाप करने का मतलब है कि कोई दूसरा सुनने न पाए)  उन लोगों के लिए ये गोविन्द अपना रूप दिखाते हैं | ऐसे भक्तों को ही श्रीहरि स्वात्मानंद देते हैं , न कि सकाम को या अन्य देव उपासकों को | क्योंकि  “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।१४ .११ ।।”  जो मुझे जैसे भजते हैं,  मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ;  हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।। इस गीता वाक्य से काम्य पदार्थों को ही देते हैं न कि स्वात्मानंद को  |  और भी कहा है कि  “अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।९ .३० ।।” यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।। “क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।।९ .३१ ।।”  हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शांति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।। इस भगवद्वाक्य से निश्चय ही उसे पुरुषोत्तम की प्राप्ति होती है |  “पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।८ .२२ ।।” हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।।

  जो इनका “आनन्द मात्रकरपादमुखोदरादि विग्रह है”  सच्चिदानंद स्वरूप है उस अपने स्वरूप का प्रकाश तो निष्काम भजन करनेवाले को ही करते हैं । इसलिये  मुमुक्षु पुरुष  नित्य शान्ति के लिये , 

 “त्रिकालाबाधित शान्ति के लिये”  संसार के समस्त अनर्थों की निवृत्ति के लिये गोविंद के मंत्र का अभ्यास करें , बार बार , निरंतर जप करें   | अतः मुमुक्षु को समाहित हो करके इस विद्या का नित्य अभ्यास करना चाहिए । नित्य ही शम युक्त होकर , शांत होकर बार बार मन्त्रार्थ का चिंतन करना चाहिये |  तज्जपस्तदर्थभावनम् : उस मंत्र का जप करते समय उस मंत्र के अर्थ का भावन करना , भावन का मतलब है बार बार चित्त में स्थापित करना | ऐसा करने से शाश्वती , अनपायिनी शांति का लाभ होता है |   || २५ || 

  || मूल उपनिषद ||

एतस्मादन्ये पञ्चपदादभूवन्

  गोविन्दस्य मनवो मानवानाम् ।

दशार्णाद्यास्तेऽपि संक्रन्दनाद्यै

रभ्यस्यन्ते भूतिकामैर्यथावत् ॥ २६ ॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

     एतस्मादन्ये मन्त्रा वभूवुरित्याह | ‘एतस्मात्’ पञ्चपदमन्त्रात्, ‘अन्ये’ दशाक्षराद्याः,  ‘गोविन्दस्य मनवः’ , ‘मानवानां’ सनकादीनां, स्फुरिताः वभूवुः | ‘तेऽपि,’  ‘संक्रन्दनाद्यैः’ संक्रन्दन इन्द्रः ‘‘संक्रन्दनो निमिष ऽ एकवीरः शतꣳ सेना ऽ अजयत् साकमिन्द्रः ॥’’ इतिश्रुतेः,  ‘‘संक्रन्दनो दुश्व्यवनस्तुराषाण्मेघवाहनः (१.१.१०७) ’’  इत्यमरकोषाच्च तत्प्रमुखैः, ‘भूतिकामैः’ 

  ‘यथावत्’ विध्युक्तप्रकारेण ‘अभ्यस्यन्ते’ ॥ २६ ॥

                                            || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 इसी पञ्चपदात्मक मन्त्र से गोविन्दके दूसरे दशाक्षरादि मन्त्रोंकी उत्पत्ति हुई | ‘ मानवानां ’ सनकादीनां , स्फुरिताः { सनकादि महर्षियों के अंतःकरण में स्फुरित हुए } और फिर उन्हीं मन्त्रों का 

संक्रन्दनाद्यै”  संक्रन्दन माने इन्द्र |  “सङ्क्रन्दयति रिपुस्त्रीरिति व्युत्पत्या सङ्क्रन्दनः इन्द्रः” जो शत्रुओं रुलाता है अथवा अपने शत्रुओं की स्त्रियों को रुलाता है | संक्रन्दनो ऽनिमिष एकवीरः शतꣳ सेना अजयत् साकम् इन्द्रः ॥  शुक्लयजुर्वेद.१७ .३३ .१ , संक्रन्दनो दुश्च्यवनस्तुराषाण्मेघवाहनः ।। आखण्डलो हरिहयो नमुचिप्राणनाशनः ।। ५५ ।।  ब्रह्मवैवर्तपुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड, संक्रन्दनो दुश्च्यवनस्तुराषाण्मेघवाहनः ।। १.१.१०६ ।। अमरकोशः / प्रथमकाण्डम् | अर्थात् इन्द्रादि देवताओं द्वारा इन मन्त्रोंका अभ्यास किया जाता है | 

    ” संक्रन्दनाद्यैरभ्यस्यन्ते ” ‘ भूतिकामैः ’ ऐश्वर्य की कामना से , ‘ यथावत् ’ विध्युक्त प्रकार से ,अर्थात इन्द्रादि देवगण भी ऐश्वर्य की कामना से यथाविधि इन मंत्रों का  अभ्यास करते हैं |  श्रीकृष्ण के दशाक्षरीमन्त्र  इसी पञ्चपदात्मक मन्त्रसे उद्भूत हुए हैं जैसे कि “गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ” इस मंत्र से समस्त अभीष्ट सिद्ध होते हैं | इसका विस्तृत विवरण तो मन्त्रमहोदधि के चतुर्दश तरंग में है , यहाँ थोड़ा संक्षेप से वर्णन करते हैं | 

गोपालतापिन्युपनिषत्
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  इस मंत्र के ऋषि नारद हैं , विराट् छन्द है , श्रीकृष्ण देवता हैं , काम (क्लीं) बीज है तथा स्वाहा शक्ति है | विनियोग – अस्य श्री गोपाल मन्त्रस्य नारद ऋषिः विराट् छन्दः श्रीकृष्णो देवता क्लीं बीजं स्वाहा शक्तिः आत्मनः अभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः | पञ्चाङ्ग न्यास कहते हैं – आचक्राय हृदयाय नमः , विचक्राय शिरसे स्वाहा , सुचक्राय शिखायै वषट् , त्रैलोक्य रक्षणचक्राय कवचाय हुं , असुरान्तक चक्राय अस्त्राय फट् , इसके बाद मूल मंत्र को “गोपीजनवल्लभाय स्वाहा”   तीन बार पढ़ कर सर्वाङ्गन्यास करना चाहिये  | फिर मस्तक, नेत्र, कान, नासिका, मुख, हृदय, उदर, लिङ्ग, जानु ,  (दोनों घुटने) एवं दोनों पैरों में प्रणव संपुटित नमः सहित सानुस्वार मूल मंत्र के एक एक वर्णों से उक्त दशों स्थानों पर न्यास करना चाहिये | विमर्श – वर्णन्यास – ॐ गों ॐ नमः मस्तके , ॐ पीं ॐ नमः नेत्रयोः, ॐ जं ॐ नमः कर्णयोः , ॐ नं ॐ नमः नसोः , ॐ वं ॐ नमः मुखे , ॐ ल्लं ॐ नमः हृदि , ॐ भां ॐ नमः जठरे , ॐ यं ॐ नमः लिङ्गे , ॐ स्वां ॐ नमः जान्वोः , ॐ हां ॐ नमः पादयोः || अब गोपाल का ध्यान कहते हैं – 

वृन्दारण्यग कल्पपादपतले सद्रत्नपीठेम्बुजे  शोणाभे वसुपत्रके स्थितमजं पीताम्बरालंकृतम् | जीमूताभमनेक भूषणयुतं गोगोपगोपीवृतं गोविन्दं स्मरसुन्दरं मुनियुतं वेणुं रणन्तं स्मरेत् || 

  वृन्दावन में कल्पवृक्ष के नीचे निर्मित सुन्दर मणिपीठ पर , रक्तवर्ण के अष्टदल कमल पर विराजमान पीतांबरालंकृत , बादलों के समान कान्ति वाले , अनेक आभूषणों को धारण किये हुए , गो ,गोप एवं गोपियों से घिरे हुए , कामदेव से भी अधिक सुन्दर , मुनिगणों से संयुक्त वंशी बजाते हुए श्री गोविन्द का स्मरण करना चाहिये | इस प्रकार गोविन्द का ध्यान कर एक लाख जप करना चाहिये तथा पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर नन्दनन्दन श्री गोपाल कृष्ण का पूजन करना चाहिये |  आग्नेय आदि चार कोणों में हृदय आदि चार अंगों की , फिर दिशाओं में अस्त्र का पूजन करना चाहिए | इस प्रकार पञ्चाङ्ग पूजा कर अष्टदल में गोपाल की ८ महिषियों का पूजन करना चाहिए | १ रुक्मिणी , २ सत्यभामा , ३ नाग्नजिती , ४ कालिन्दी , ५ मित्रविन्दा , ६ लक्ष्मणा , ७ जाम्बवती , तथा ८ सुशीला ये आठों श्री गोपाल की महिषी हैं , जो सुवर्ण जैसी आभावाली  तथा विचित्र आभूषण एवं विचित्र मालाओं से अलंकृत रहती हैं | अष्टदल के अग्रभाग में वसुदेव , देवकी , गोपतिश्रीनन्द , यशोदा , बलभद्र , सुभद्रा , गोप एवं गोपियों का पूजन करना चाहिए | तदनन्तर इन्द्रादि दिक्पालों का तथा उनके वज्रादि आयुधों का पूजन करना चाहिए | विमर्श – वृत्ताकार कर्णिका , अष्टदल एवं भूपुर सहित गोपाल यन्त्रका निर्माण करना चाहिए | पूजा की विधि – सर्वप्रथम पूर्वोक्त ढ़ंगसे वर्णित श्रीगोपाल के स्वरूप का ध्यान कर मानसोपचार से पूजा करे | फिर शंख का अर्घ्यपात्र स्थापित कर उक्त यन्त्र पर पूर्वोक्त रीतिसे पीठ देवताओं एवं पीठ शक्तियों का पूजन करे फिर आसन , ध्यान , आवाहनादि से लेकर पञ्च पुष्पाञ्जलि समर्पण पर्यन्त धूप , दीपादि उपचारों से गोपालनन्दन का पूजन कर , पुष्पाञ्जलि समर्पित कर आवरण पूजा की आज्ञा माँगे | सर्वप्रथम केसरों के आग्नेयादि कोणों में पञ्चाङ्गपूजा इस प्रकार करे – आचक्राय स्वाहा आग्नेये , विचक्राय स्वाहा नैऋत्ये , सुचक्राय स्वाहा वायव्ये , त्रैलोक्यरक्षण चक्राय स्वाहा ऐशान्ये , असुरान्तकचक्राय स्वाहा चतुर्दिक्षु | इसके बाद अष्टदल में पूर्वादि दलों के क्रम से अष्टमहिषियों की यथा –  ॐ रुक्मिण्यै नमः, पूर्वदले , ॐ सत्यभामायै नमः आग्नेयदले , ॐ नाग्नजित्यै नमः , दक्षिणदले , ॐ कालिन्द्यै नमः नैऋत्यदले , ॐ मित्रविन्दायै नमः , पश्चिमदले , ॐ सुलक्षणायै नमः , वायव्यदले , ॐ जाम्बवत्यै नमः , उत्तरदले , ॐ सुशीलायै नमः , ईशानदले | तत्पश्चात् पूर्व आदि दलों के अग्रभाग में वसुदेव आदि की पूजा करे | यथा – ॐ वसुदेवाय नमः , ॐ देवक्यै नमः , ॐ नन्दाय नमः , ॐ यशोदायै नमः , ॐ बलभद्राय नमः , ॐ सुभद्रायै नमः ,  ॐ गोपेभ्यो नमः , ॐ गोपीभ्यो नमः | फिर इन्द्रादि दिक्पालों की तथा उनके वज्रादि आयुधों की पूजा करनी चाहिए | इस प्रकार के अनुष्ठान से मंत्र सिद्ध हो जाने पर साधक अपने सारे मनोरथों को पूर्ण करें | काम्य प्रयोग – ज्वर से मुक्त होने के लिये गुडूची (गिलोय) के टुकड़ों से होम करे | शत्रु को शान्त करने के लिए नीम के तेल में डुबोई बहेड़े की लकड़ी से रात्रि में १० हजार की संख्या में होम करना चाहिए | विद्या प्राप्ति हेतु पलाश के फूलों से एक लाख आहुतियां देनी चाहिए | जो व्यक्ति भक्ति में तत्पर हो रासलीला के मध्य में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान कर उक्त मन्त्र का १० हजार जप करता है वह ६ महीनों के भीतर अपनी मन चाही कन्या से विवाह करता है | जो कन्या कदम्ब वृक्ष पर बैठे श्रीकृष्ण का ध्यान कर प्रतिदिन एक हजार की संख्या में जप करती है वह ४९ दिन के भीतर मनोनुकूल पति प्राप्त करती है | मधु सहित विल्व वृक्ष का पत्र , फल या समिधाओं से अथवा शर्करा युक्त कमल पुष्पों का होम करने से व्यक्ति धनवान हो जाता है , इस विषय में विशेष क्या कहें भगवान् गोपालकृष्ण का यह मन्त्र मनुष्यों की सारी कामनायें पूर्ण करता है |  { ‘ॐ क्लीं श्री कृष्णः  शरणं मम।’ } ,”  क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलांगाय नमः ”  आदि जो मंत्र है वे ऐश्वर्य  की कामना करने वालों के लिये हैं और इन्द्रादि देवता उनका अभ्यास करते  हैं |

G गोपालतापिन्युपनिषत्

{ आतुर होकर पुकारना } क्योंकि जब आकर्षण , विकर्षण , संकर्षण होता है तब संक्रन्दन भी होता है जैसे  गोपियां रो रो कर पुकारती हैं |  *इति गोप्यः प्रगायन्त्य : प्रलपन्त्यश्च चित्रधा। रुरुदुः सुस्वरं राजन् कृष्ण दर्शन लालसा: ॥*  भगवान की प्यारी गोपियां विरह के आवेश में इस प्रकार भाँति -भाँति से गाने और प्रलाप करने लगीं | अपने कृष्ण -प्यारे के दर्शन की लालसा से वे अपने को रोक न सकीं ,करुणाजनक सुमधुर स्वर से फूट -फूटकर रोने लगीं |   अथवा  वृत्रासुर कहता है कि – अजात पक्षा इव मातरं खगाः,

स्तन्यं यथा वत्स तराः क्षुधार्ताः। प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा, मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्।। ६.११.२६ ||

 जैसे अण्डेमें से निकला हुआ पक्षी का बालक जिसके पंख अभी पुष्ट नहीं हुए हैं वह व्याकुल होकर माँ को पुकारता है अथवा बछड़ा अपनी गैय्या मैय्या को डकरा डकरा कर बुलाता है अथवा विरहिणी प्रियतमा अपने प्रियतम के लिये विषाद करती है ऐसे ही जब भक्त भगवान को पुकारता है तो भगवान दौड़े चले आते हैं | श्रीमद्भागवत के अन्तर्गत उद्धव गीता में भी कहा है कि जब भगवत्प्रेम का प्रादुर्भाव होता है तब , 

वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।

विलज्ज उद्गायति नृत्यते च  मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति।।११.१४.२४।।

प्रेम का प्रादुर्भाव हो जाने से जिस प्रेमी भक्त की वाणी गदगद और चित्त द्रवीभूत हो जाता है, चित्तवृत्ति  प्रेमार्द्र हो जाती है तब  वह प्रेमावेश में संकोच छोड़कर बार बार रोता है , कभी हंसता है, कभी लज्जा छोडकर ऊँचे स्वर से गाने लगता है ,तथा नाचने लगता है | ऐसा मेरा परम भक्त त्रिभुवन को पवित्र कर देता है | ||२४|| अब प्रकृत प्रसंग में पूर्वोक्त सनकादि मुनियों ने पुनः प्रश्न किया  | (भगवान के स्वरूपका मनन करने से मुनि कहलाते हैं) “आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य:”—-याज्ञवल्क्य जी मैत्रेयी से कहते हैं–  यह  आत्मा ही देखने (जानने) योग्य है, सुनने योग्य है, मनन करने योग्य है तथा निदिध्यासन (ध्यान) करने योग्य है॥ —-बृहदारण्यकोपनिषद २-४-५. तथा श्रीमद्भागवत में भी बताया कि ब्रह्मा जी ने तप किया — ” दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रिय: । अतप्यत स्माखिललोकतापनं तपस्तपीयांस्तपतां समाहित: ॥ २.९. ८॥”

ब्रह्माजी तपस्वियों में सबसे बड़े तपस्वी हैं | उनका ज्ञान अमोघ है | उन्होंने उस समय एक सहस्र दिव्य वर्ष पर्यन्त एकाग्र चित्तसे अपने प्राण , मन, कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियों को वशमें करके ऐसी तपस्या की , जिससे वे समस्त लोकों को प्रकाशित करने में समर्थ हो सके ||८|| { सन्दर्भ सङ्गति — यद्यपि यहाँ उन मुनियों ने क्या प्रश्न किया यह स्पष्ट नहीं है तथापि ब्रह्माजी के उत्तर से उनका प्रश्न स्पष्ट हो जाता है | } ( प्रश्न यह है कि आपको अष्टादशाक्षर मन्त्र की प्राप्ति कैसे हुई ? ) इसका उत्तर आगे बताते हैं | || २६ || 

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  || मूल उपनिषद ||

   यदेतस्य स्वरूपार्थं  वाचा वेदयन्ति ते पप्रच्छुः तदु होवाच  ब्रह्मसवनं चरतो मे ध्यातःस्तुतः परमेश्वरः परार्धान्ते सोऽबुध्यत । गोपवेशो मे पुरुषः पुरस्तादाविर्बभूव । ||२७||

 || संस्कृत व्याख्या || 

अत्र हेतुमाह यदेतस्येति | ‘यत्’ यस्मात् कारणात् , ते मन्त्राः ‘एतस्य’ श्रीकृष्णस्य , ‘स्वरूप’ भूतम् ‘अर्थं’ सर्वपुरुषार्थसाधकं , ‘वाचा वेदयन्ति’| ‘ते’ मुनयः पञ्चपदमन्त्रस्वरूपं जिज्ञासवः पप्रच्छुः | तदु हेति | ‘तत्’ पञ्चपदस्वरूपं ‘उ’ अपि ‘ह’ किल, ब्रह्मा ‘उवाच’ |

 किं | ‘ब्रह्मसवनं’ ब्रह्मणः सवनं प्रथमपरार्धं , वर्तमानस्य ‘मे’ ‘ध्यातः’ ,  ‘ स्तुतः, परमेश्वरः , 

‘परार्धान्ते’ राध्यन्ते , ‘सः,’ ‘ गोपवेषः ’ ‘ अबुध्यत ’ योग निद्रातः उत्थितः , तथा ‘ मे ’ 

‘पुरस्तात्, ’ ‘आविर्बभूव’ ‘पुरुषः’ ||२७||

                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

सनकादि ऋषियों के पूछने पर ब्रह्माजी  कहते हैं कि मैंने अपनी आयु के पचास वर्ष पर्यन्त परमेश्वर का ध्यान/स्तुति किया | कहा भी है कि  “दीप प्रियः कार्तवीर्यो  मार्तण्डो नति वल्लभः । स्तुतिप्रियो महाविष्णुर्गणेशस्तर्पणप्रियः । दुर्गाऽर्चनप्रिया नूनमभिषेक प्रियः शिवः” |  “स्तुति प्रियो विष्णुः” और परार्ध के अन्त में  स्तुति करने के बाद,मुझे प्रबोध हुआ |  (ब्रह्मा जी को परार्धद्वय जीवी कहा जाता है , उनके जीवन के  प्रथम ५० वर्ष को पहला परार्ध कहा जाता है  और ५१ वे वर्ष से १०० वर्ष तक की कालावधि को द्वितीय परार्ध कहते हैं), इस प्रकार ब्रह्मा जी की आधी आयु समाप्त होने के पश्चात्  अर्थात् प्रलय काल के बाद एक परार्ध तक जब मैंने तपस्या की तब एक प्रकाश पुंज के रूप में कोई पुरुष मेरे सामने  आविर्भूत हुआ , कोई अनिर्वचनीय रूप शोभा से सम्पन्न गोपवेशधारी उपदेष्टा पुरुष मेरे सामने प्रकट हुआ । वेद के उपनिषद भाग में प्रतिपादित ये मंत्र साक्षात श्री कृष्ण स्वरूप ही हैं | क्योंकि ये मन्त्र समस्त पुरुषार्थों की सिद्धि देनेवाले हैं | सनकादि मुनि इस पंचपद मंत्र के स्वरूप को जानने की इच्छा से पूछने लगे | तब ब्रह्मा जी ने कहा कि जब मैंने  एक परार्ध तक ध्यान , स्तुति की तब मेरी आराधना से संतुष्ट होकर गोप वेशधारी  भगवान अपनी योग निद्रा से जागे और मेरे सम्मुख प्रकट हुए |     विमर्श –  “गोपवेशो मे पुरुषः तदा आविर्बभूव लीलाधृतगोपालस्वरूपः सर्वान्तरात्मा प्रकटोऽभूत्”  अब पुरुष शब्द की व्युत्पत्ति बताते हैं | ” पुरं शरीरं तस्मिन् शेते इति पुरुषः ” पुर अर्थात् शरीर , उसमें जो शयन करे वह पुरुष कहलाता है | “तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्” इति ॥ पूर्णत्वात्पुरुषः इति ॥“पारमात्मिकोपनिषत् – अनुवाक ७”   यद्वा अस्तेर्व्यत्यस्ताक्षरयोगात् आसीत् पुरा पूर्वमेवेति विग्रहं कृत्वा व्युत्पादितः पुरुषः |  ‘‘पूर्वमेवाहमिहाऽऽसमिति । तत् पुरुषस्य पुरुषत्वम् ।’’ इति श्रुतेः | अथवा अस् धातु के अक्षरों को उलटा करके ‘पुरा ’ शब्द के साथ जोड़कर पुरा यानी पहलेसे ही ‘आसीत् ’ था —ऐसा पदच्छेद मानकर यह ‘पुरुष’ शब्द सिद्ध हुआ है | — ‘मैं यहाँ पूर्वमें ही था | यही उस पुरुष का पुरुषत्व है |’  

  ‘‘नवद्वारं पुरं पुण्यमेतैर्भावैः समन्वितम्। व्याप्य शेते महानात्मा तस्मात् पुरुष उच्यते।।’’ || १२.२१०.३७ || महाभारत, शान्तिपर्व में कहा है — ‘वह महात्मा इन पूर्वोक्त भावों से युक्त नौ द्वार वाले पवित्र पुर को व्याप्त करके शयन करता है , इसलिये वह पुरुष कहलाता है |  अथवा पुरुषु भूरिषु उत्कर्षशालिषु सत्वेषु सीदतीति , पुरूणि फलानि सनोति ददातीति वा , पुरूणि भुवनानि संहारसमये स्यति अन्तं करोतीति वा , पूर्णत्वात् पुराणत्वात् पूरणाद्वा सदनाद्वा पुरुषः ‘पूरणात्सदनाच्चैव ततोऽसौ पुरुषोत्तमः’ इति पञ्चमवेदे ( महाभारत  उद्योगपर्व  ७०.११ ) अथवा पुरु अर्थात् बहुत-से उत्कर्ष वाले सत्वों (जीवों) में स्थित है , इसलिये या अधिक फल देता है इसलिये अथवा संहार के समय प्रचुर भुवनों को नष्ट करता है इसलिये अथवा पूर्ण होने , पूरित करने या स्थित होने के कारण वह पुरुष है | पंचम वेद (महाभारत) में भी कहा है — ‘पूर्ण करने और स्थित होने के कारण यह पुरुषोत्तम है |’  इस प्रकार परमात्मा श्रीकृष्ण ने कृपा करके अपने आपको दिखाया क्योंकि ‘‘यतो वाचो निवर्तन्तेअप्राप्य मनसा सह’’ इस श्रुति के अनुसार अतीन्द्रिय होने के कारण भगवान कृपा करके ही दर्शन देते हैं | देखिये भागवत के द्वितीय स्कंध में श्री शुकदेव जी वर्णन करते हैं —  ‘‘ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं  श्रियः पतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ।

सुनंदनंदप्रबलार्हणादिभिः स्वपार्षदाग्रैः परिसेवितं विभुम् ॥ २.९.१४ ॥ ’’ ब्रह्मा जी ने देखा कि उस दिव्य लोक में समस्त भक्तों के रक्षक , लक्ष्मीपति , यज्ञपति एवं विश्व पति भगवान विराजमान हैं | सुनन्द,नन्द, प्रबल और अर्हण आदि मुख्य-मुख्य पार्षदगण उन प्रभु की सेवा कर रहे हैं || १४ ||  इस वाक्य से भगवान ने साक्षात्कार कराया | यह प्रसंग भागवत के दूसरे स्कंध के नौवें अध्याय  में इस प्रकार आया है –

भगवच्छिक्षितमहं करवाणि ह्यतन्द्रितः ।

नेहमानः प्रजा सर्गं बध्येयं यदनुग्रहात् ॥२.९.२८॥” 

 तब ब्रह्मा जी- ने प्रार्थना करते हुए कहा कि – सृष्टि करते समय मुझमें कर्तापन का भाव उत्पन्न न हो जाये अतः आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं सजग रहकर सावधानी से आपकी आज्ञा का पालन कर सकूँ और सृष्टि की रचना करते समय भी कर्तापन आदि के अभिमान से आबद्ध न हो जाऊँ ॥ २८ ॥  

तथापि नाथ मानस्य नाथ नाथय नाथितम् ।

परावरे यथा रूपे जानीयां ते त्वरूपिणः ॥ २।  ९।  २५ ॥”  हे नाथ ! आप कृपा करके मुझ याचक की यह मांग पूरी कीजिए कि मैं रूप रहित आपके  सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपों को जान सकूँ ।।२५।। इस वाक्य से ब्रह्मा जी ने पर और अवर  (सूक्ष्म और स्थूल) दोनों प्रकार के ज्ञान की अभ्यर्थना की |

 यथात्ममायायोगेन नानाशक्त्युपबृंहितम् ।

विलुम्पन् विसृजन् गृह्णन् बिभ्रदात्मानमात्मना ॥ २६ ॥

  क्रीडस्यमोघसङ्कल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते ।

तथा तद्विषयां धेहि मनीषां मयि माधव ॥ २७ ॥ ” 

आप माया के स्वामी हैं , तथा अनेक प्रकार की शक्तियों के मालिक हैं | आपका संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता । जैसे मकड़ी अपने मुंह से जाला निकालकर उसमें क्रीड़ा करती है और फिर उसे अपने में ही लीन कर लेती है, वैसे ही आप अपनी माया का आश्रय लेकर इस विविध शक्तिसम्पन्न जगत की उत्पत्ति , पालन और संहार करने के लिए अपने आप को ही अनेक रूपों में बना लेते हैं और क्रीड़ा करते हैं । इस प्रकार आप कैसे करते हैं- इस मर्म को मैं जान सकूँ, ऐसा ज्ञान आप मुझे दीजिये ।।२६ -२७।। इस प्रकार मैं आपके खेल को समझ सकूँ ऐसा ज्ञान आप मुझे दें | 

यावत्सखा सख्युरिवेश ते कृतः प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम् ।

अविक्लबस्ते परिकर्मणि स्थितो  मा मे समुन्नद्धमदोऽजमानिनः ॥ २.९.२९ ॥” 

   प्रभो ! आपने एक मित्र के समान हाथ पकड़कर मुझे अपना मित्र स्वीकार किया है । अतः जब मैं आपकी इस सेवा – सृष्टिरचना में लगूँ और सावधानी से पूर्वसृष्टि के गुण – कर्मानुसार जीवों का विभाजन करने लगूँ, तब कहीं अपने को जन्म- कर्म से स्वतंत्र मानकर प्रबल अभिमान न कर बैठूं ।।२९।। इस वाक्य से मुझमें कभी गर्व या अभिमान प्रवेश न होने पावे यह वरदान भी माँगा | इस प्रकार चतुरानन ने चार वरदान माँगे १ – परावरज्ञान २- क्रीड़ाज्ञान ३- शिक्षाज्ञान ४- गर्व का अभाव | तब भगवान ने भी चार श्लोकों में परमतत्वका उपदेश किया जो कि चतुश्लोकी भागवत के नाम से प्रसिद्ध है |  श्रीभगवानुवाच । ज्ञानं परम गुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ ३० ॥ ” श्री भगवान ने कहा — अनुभव , प्रेमाभक्ति और साधनों से युक्त अत्यंत गोपनीय अपने स्वरूप का ज्ञान मैं तुम्हें कहता हूँ , तुम उसे ग्रहण करो || ३० || इस श्लोक से ज्ञान तथा – “यावानहं यथाभावो यद् रूपगुणकर्मकः ।

 तथैव तत्त्वविज्ञानं अस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ ३१ ॥” मेरा जितना विस्तार है , मेरा जो लक्षण है , मेरे जितने और जैसे रूप ,गुण और लीलाएं हैं — मेरी कृपा से तुम उनका तत्व ठीक -ठीक वैसा ही अनुभव करो | इस श्लोक से विज्ञान और फिर –

अहमेवासमेकोऽग्रे नान्यत् यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥ ” सृष्टि के पूर्व केवल मैं – ही – मैं था | मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न दोनों का कारण अज्ञान | जहाँ यह सृष्टि नहीं है , वहाँ मैं – ही –  मैं हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है , वह भी मैं ही हूँ और जो कुछ बच रहेगा , वह भी मैं ही हूँ || ३२ ||  इस श्लोक से उत्पत्ति आदि में अपनी स्वतंत्रता तथा अभिन्ननिमित्तोपादानकत्व एवं  आदि , मध्य और अंत में अपनी वर्तमानता को प्रकट कर – “ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथा भासो यथा तमः ॥ ३३ ॥”  वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है , अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश – मण्डल के नक्षत्रों में राहु की भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती , इसे मेरी माया समझना चाहिये || ३३ || इस श्लोक से माया के दो रूपों का निरूपण किया , एक रूप तो आच्छादक है जिसके कारण अन्यथा प्रतीति होती है , यह मायाका तमो रूप है और दूसरा है शुद्ध ज्ञान स्वरूप | क्योंकि द्रष्टा ही इन्द्रिय और मन के उपाधि के संसर्ग से दृश्य बन गया है  | ” यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टानि अप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥” जैसे प्राणियों के पञ्चभूत रचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाशादि पञ्चमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूपसे विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते , वैसे ही उन प्राणियों के शरीरकी दृष्टिसे मैं उनमें आत्माके रूपसे प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टिसे अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ || ३४ || और  “एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥” यह ब्रह्म नहीं ,यह ब्रह्म नहीं –इस प्रकार निषेध की पद्धति से , और यह ब्रह्म है , यह ब्रह्म है — इस अन्वय की पद्धति से यह  सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान् ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं , वही वास्तविक तत्व हैं , जो लोग आत्मा तथा परमात्मा का तत्व जानना चाहते हैं , उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है || ३५ ||  इस श्लोक से उस परम ज्ञान को प्राप्त करने युक्ति बताकर , यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही रूप है और तुम तथा यह माया भी मुझसे भिन्न नहीं है ऐसा विनिश्चय करके मेरी आज्ञा का पालन करो | इस प्रकार इन चार श्लोकों के द्वारा शिक्षा प्रदान करके कहा कि यदि इन चार श्लोकों का निरंतर अनुस्मरण बना रहे तो तुम्हे कभी भी मोह नहीं होगा | 

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना । भवान् कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित् ॥ ३६ ॥ ” ब्रह्माजी ! तुम अविचल समाधि के द्वारा मेरे इस सिद्धांत में पूर्ण निष्ठा कर लो | इससे तुम्हें कल्प-कल्प में विविध प्रकार की सृष्टि रचना करते रहने पर भी कभी मोह नहीं होगा || ३६ ||  इस वाक्य से भगवान ने ब्रह्मा जी को मोह के अभाव का वरदान दिया |  इस प्रकार जब सब कुछ भूलकर ब्रह्माजी की चित्तवृत्ति भगवान के साथ एकाकार हो गई तब मन्त्र का प्राकट्य हुआ | अर्थात भगवान ने सबसे पहले कामबीज (क्लीं) के विभागों का प्रकाशन किया | || २७ ||  

  || मूल उपनिषद ||

   ततः प्रणतो मयानुकूलेन हृदा मह्यमष्टादशार्णं स्वरूपं सृष्टये दत्त्वा अन्तर्हितः पुनः सिसृक्षतो मे प्रादुरभूत् । तेष्वक्षरेषु  भविष्यज्जगद्रूपं  प्रकाशयन् । तदिह  ककारात् आपो लकारात् पृथिवी  ईतोऽग्निर्बिन्दोरिन्दुस्तत्संपातात्   तदर्क  इति । क्लींकारादसृजं |   कृष्णायादाकाशं खाद्वायुरित्युरुत्तरात्  सुरभिं विद्याः प्रादुरकार्षं । तदुत्तरात्स्त्रीपुंसादिचेदं  सकलमिदं सकलमिदमिति ॥ २८ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

ततः प्रणत इति | ‘ ततः ’ तदनन्तरं,  ‘मया,’ ‘अनुकूलेन’ तत्रानुरक्तेन, ‘हृदा’ मनसा,  

 ‘प्रणतः’ नमस्कृतः, अथ  ‘मह्यम् ,’  ‘अष्टादशार्ण मन्त्रं स्वस्य स्वरूप’ भूतं सृष्ट्यर्थं 

‘दत्वा’ परमेश्वरः ‘अन्तर्हितः’ | पुनः सिसृक्षत इति | अथ ‘सिसृक्षतः’ सृष्टिं कर्तुमिच्छतः

 ‘मे,’ पुरस्तात् गोपवेषधरः ‘प्रादुरभूत्’ | किं कुर्वन्  ‘तेषु’ अष्टादशसु अक्षरेषु ,

 ‘भविष्यत् जगत्’  ‘प्रकाशयन्’ मनोगोचरं कुर्वन् | तदिहेति | ‘तत्’ तस्मिन् जगद्रूपे प्रदर्शिते सति , ‘इह’ अष्टादशाक्षरमन्त्रे , ‘कात्’ ककारात्, ‘आपः’ जलं , ‘लकारात्’  ‘पृथिवी’ भूमिः,  ईकारात्  ‘अग्निः,’  ‘विन्दोः इन्दुः’  अनुस्वारात् चन्द्रः , ‘तत्सम्पातात्’ तेषां कामादीनां संश्लिष्टरूपात् क्लींकारात्, ‘ तदर्क  इति क्लींकारादसृजम् ’ |  ‘कृष्णाय’,  इति पदात् , ‘ आकाशम् ’ , इति पदार्थं  ‘ असृजम् ’ | खाद्वायुरिति | ‘खात्’ चिदाकाशात्, शव्दराशिं वेदितुं गोविन्दायेतिपदात् , ‘वायुः इति,’ ‘असृजम्’ | ‘उत्तरात्’ पदद्वयात्मकात् गोपीजनवल्लभायेतिपदात् , ‘सुरभिः’   कामधेनुः , ‘विद्याः’ चतुर्दश , इति  ‘प्रादुरकार्षं’ | 

 ‘तदुत्तरात्’ स्वाहापदात् , ‘स्त्रीपुंसादि च ’ स्त्रीपुरुषक्लीवं च ,  ‘सकलं’ स्थावरजङ्गमं , 

 ‘प्रादुरकार्षम्’ |   अभ्यासस्तृतीयोपनिषत्समाप्त्यर्थः | ‘इति’  पदं पञ्चपदस्य सृष्टिसमाप्त्यर्थः |

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः।वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्‌भ्यः पृथिवी।पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्‌। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। इत्यादि श्रुत्यन्तरात् | || २८ || 

                                  || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

        तदनन्तर मैंने उन्हें भक्ति भावभरित हृदय से  प्रणाम किया | तब भगवान ने मुझे अठारह अक्षरों वाला मंत्र जो कि उनका अपना ही  स्वरूप है , संसार के प्राणियों की सृष्टि करने के लिये मुझे गोपालमन्त्र देकर अन्तर्हित हो गये |  फिर मैंने उस अठारह अक्षरों वाले  मंत्र का अनुष्ठान किया , अनुसंधान किया तदनन्तर जब मेरे मन में  सृष्टि करने की इच्छा उत्पन्न हुई तब पुनः गोपाल देव मेरे सामने प्रकट हुए और उन  अठारह अक्षरों में जो

तत्व ज्ञानात्मक संभावनाएं छिपी  थीं उनका रहस्योद्घाटन किया जिससे भविष्य में उत्पन्न होने वाले जगत का स्पष्ट रूप मेरे मन में  प्रकाशित हुआ |  जब उस अठारह अक्षरों वाले मंत्र में मैंने सबसे पहले क्लीं के ककार को देखा तो उसमें जगत के समस्त जल का बीज संनिहित था , अर्थात ( क ) से जल की उत्पत्ति हुई | और उसी क्लीं के 

 ( ल ) से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई | और  ( ई ) से अग्नि उत्पन्न हुआ , और अनुस्वार रूपी विन्दु से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ | तथा इन सबके संश्लिष्ट रूप से  अर्थात  ( क्लीं ) से मैंने सूर्य की रचना की | फिर   ‘कृष्णाय’ इस पद से आकाश बनाया  —-

 ‘‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः।’’ और फिर उस चिदाकाश से अर्थात 

{ गोविन्द } पद से वायु का निर्माण किया | अब आगे के जो दो पद हैं { गोपीजन और वल्लभ } उनमें से गोपीजन पद से सुरभि अर्थात कामधेनु अथवा गायें  और वल्लभ पद से विद्या अर्थात् चतुर्दश विद्याओं को प्रकट किया | जो कि ये सभी तत्व अव्यक्त रूप से इस मंत्र में पहले से ही सन्निहित थे उन्हें व्यक्त किया , कोई नवीन कल्पना नहीं की क्योंकि प्रादुरकार्षं ” ऐसा कहा , जहाँ तिरोभाव होता है वहाँ आविर्भाव होता है तथा जहाँ उत्पत्ति होती है वहाँ विनाश होता है | ‘‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।’’ ‘‘आत्मतः आविर्भवतिरोभावौ ’’ {विष्णुपुराणे तूक्तं — तदेतदक्षरं नित्यं जगन्मुनिवराखिलम् ।

आविर्भावतिरोभावजन्मनाशविकल्पवत् ॥ १,२२.६० ॥ विष्णु पुराण में  कहा -हे मुनीश्वर ! यह आविर्भाव तथा तिरोभाव , जन्म एवं नाश रूप विकल्पों से युक्त सम्पूर्ण जगत् भी अक्षर एवं नित्य ही है | (स्वतंत्रः कर्ता ‘ — अष्टाध्यायी’, १. ४. ५४ ), इस न्याय के अनुसार मुख्य कर्तृत्व भगवान का ही है | बाकी सब उनके अधीन रहकर उनका ही अनुग्रह प्राप्त करके कुछ करने में समर्थ हो पाते हैं | ब्रह्माजी के मोह को दूर करना करना और फिर सृष्टि रचना का सामर्थ्य प्रदान करना,  यह सब भगवान का ही दिया हुआ है | भागवत के तृतीय स्कंध में इसका उल्लेख बड़ी स्पष्टता के साथ किया हुआ है | सबसे पहले ब्रह्माजी ने अज्ञान की पाँच वृत्तियोंकी सृष्टि की — तम (अविद्या) २ – मोह (अस्मिता) ३ – महामोह (राग) 

४ – तामिस्र (द्वेष) ५ – अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) किन्तु इस अत्यंत पापमयी सृष्टि को देखकर उन्हें प्रसन्नता नहीं हुई | तब उन्होंने अपने मन को भगवान के ध्यान से पवित्र कर उससे दूसरी सृष्टि रची | इस बार ब्रह्माजी ने सनक , सनन्दन , सनातन और सनत्कुमार — ये चार निवृत्ति परायण ऊर्ध्वरेता मुनि उत्पन्न किये | अपने इन पुत्रों से ब्रह्माजी ने कहा , पुत्रो ! तुमलोग सृष्टि उत्पन्न करो |’ किंतु वे जन्मसे ही मोक्ष मार्ग – (निवृत्ति मार्ग)  का अनुसरण करने वाले और भगवान के ध्यान में तत्पर थे , इसलिए उन्होंने ऐसा करना नहीं चाहा | जब ब्रह्माजी ने देखा कि मेरी आज्ञा न मानकर ये मेरे पुत्र मेरा तिरस्कार कर रहे हैं , तब उन्हें असह्य क्रोध हुआ | उन्होंने उसे रोकने का प्रयत्न किया किंतु बुद्धि द्वारा बहुत रोकने पर भी  वह क्रोध तत्काल प्रजापति की भौहों के बीच में से एक नीललोहित (नीले और लाल रंग के)  बालक के रूप में  प्रकट हो गया | वे देवताओं के पूर्वज भगवान भव (रूद्र) रो -रोकर कहने लगे — ‘जगत्पिता ! विधाता ! मेरे नाम और रहने के स्थान बताइये’  तब कमलयोनि भगवान् ब्रह्माने उस बालककी  प्रार्थना पूर्ण करने के लिए मधुर वाणी में कहा ‘रोओ मत, मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूरी करता हूँ | देवश्रेष्ठ ! तुम जन्म लेते ही बालक के समान फूट – फूटकर रोने लगे , इसलिए प्रजा तुम्हें ‘रुद्र’  नाम से पुकारेगी |  तुम्हारे रहने के लिये मैंने पहले से ही हृदय , इन्द्रिय , प्राण , आकाश , वायु , अग्नि , जल , पृथ्वी , सूर्य , चन्द्रमा और तप — ये ग्यारह स्थान रच दिये हैं | तुम्हारे नाम मन्यु , मनु , महिनस् ,महान् , शिव , ऋतध्वज , उग्ररेता , भव , काल , वामदेव और धृतव्रत होंगे | तथा धी , वृत्ति , उशना , उमा , नियुत् , सर्पि , इला , अम्बिका , इरावती , सुधा और दीक्षा — ये ग्यारह रुद्राणियां तुम्हारी पत्नियां होंगी | तुम उपर्युक्त नाम , स्थान और स्त्रियों को स्वीकार करो | और इनके द्वारा बहुत -सी प्रजा उत्पन्न करो क्योंकि तुम प्रजापति हो लोक पिता ब्रह्माजी से ऐसी आज्ञा पाकर भगवान नीललोहित बल , आकार और स्वभाव में अपने ही जैसी प्रजा उत्पन्न करने लगे | भगवान रुद्र के द्वारा उत्पन्न हुए उन रुद्रों को असंख्य यूथ बनाकर सारे संसार को भक्षण करते देख ब्रह्माजी को बड़ी शङ्का हुई , तब उन्होंने रूद्र से कहा ‘सुरश्रेष्ठ ! तुम्हारी प्रजा तो अपनी भयंकर दृष्टि से मुझे और सारी दिशाओं को भस्म किये डालती है , अतः ऐसी सृष्टि और न रचो |

तप आतिष्ठ भद्रं ते सर्वभूतसुखावहम् ।

 तपसैव यथापूर्वं स्रष्टा विश्वमिदं भवान् ॥ ३.  १२.  १८ ॥ 

तपसैव परं ज्योतिः भगवन्तमधोक्षजम् ।

 सर्वभूतगुहावासं अञ्जसा विन्दते पुमान् ॥ ३.१२.१९ ॥  तुम्हारा कल्याण हो , अब तुम समस्त प्राणियों को सुख देने के लिए तप करो | फिर उस तप के प्रभाव से ही तुम पूर्ववत् इस संसार की रचना करना |  पुरुष तप के द्वारा ही इन्द्रियातीत , सर्वान्तर्यामी , ज्योतिः स्वरूप श्रीहरि को सुगमता से प्राप्त कर सकता है |  ये पूरी कहानी कहने का तात्पर्य यह है कि वासुदेव की आराधना करने पर ही तुम सृष्टि करने में समर्थ हो सकोगे स्वतंत्र रूप से नहीं | इसके बाद ब्रह्माजी के उपदेश के अनुसार नीललोहित तप करने के लिए वन में चले गये , और फिर उसी के अनुसार चौथे स्कंध में “रुद्र गीत में” वासुदेव की सर्वोपरिता और अपने आराध्य के रूप में निरूपण किया है | तथा वासुदेव ही मुक्तिदाता हैं , वे ही सर्वकर्ता हैं , उनका दासानुदास होना स्वर्ग और अपवर्ग से भी बढ़कर है यह सब निरूपण किया |  इदमाह पुरास्माकं भगवान्विश्वसृक्पतिः ।

 भृग्वादीनां आत्मजानां सिसृक्षुः संसिसृक्षताम् ॥ ४.२४.७२ ॥ 

ते वयं नोदिताः सर्वे प्रजासर्गे प्रजेश्वराः । 

अनेन ध्वस्ततमसः सिसृक्ष्मो विविधाः प्रजाः ॥४.२४. ७३ ॥ और फिर अंत में कहा कि यह स्तोत्र पूर्वकाल में जगत विस्तार के इच्छुक प्रजापतियों के पति भगवान ब्रह्मा जी ने प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा वाले हम भृगु आदि अपने पुत्रों को सुनाया था || ७२ ||  जब हम प्रजापतियों को प्रजा का विस्तार करने की आज्ञा हुई , तब इसी स्तोत्र के द्वारा हमने अपना अज्ञान निवृत्त करके अनेक प्रकार की प्रजा उत्पन्न की | इत्यादि वाक्यों से ब्रह्माजी के उपदेशों का स्मरण कराते हुए और उनकी आज्ञा से अपने तपश्चरण का वृत्तान्त बताते हुए , जो लोग वासुदेव परायण हैं  उनका  शीघ्र  ही कल्याण होता है तथा अपने द्वारा गाये गए (रुद्र गीत) का फल बताकर शिवजी ने अपने प्रवचन को विराम दिया | अथवा जैसा कि स्वयं भगवान नारायण ने  नारायणोपनिषद में बताया है कि — ‘‘अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति । नारायणात्प्राणो जायते । मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी। नारायणाद्ब्रह्मा जायते । नारायणाद्रुद्रो जायते । नारायणादिन्द्रो जायते । नारायणात्प्रजापतिः प्रजायते । नारायणादद्वादशादित्या रुद्रा वसवः सर्वाणि छन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते। नारायणात्प्रवर्तन्ते । नारायणे प्रलीयन्ते। एतदृवेदशिरोऽधीते ॥’’ इस प्रकार नारायण का सर्वतन्त्र स्वतंत्र कर्तृत्व सिद्ध होता है | तथा गीता में भी  ‘‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। ’’   हे पार्थ ! सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज (कारण) मुझे ही जानो; ।।  

‘‘अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।।७.६।।’’  मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्ति तथा प्रलय स्थान हूँ।।   ‘‘ मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। ’’  हे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किंचिन्मात्र वस्तु नहीं है। इत्यादि गीता के वाक्यों से गोपाल कृष्ण का ही प्रधान कर्तृत्व प्रमाणित होता है , जो कि सकल शास्त्रों के तात्पर्य का सार है | इसी क्रम में पञ्चभूतों की उत्पत्ति तथा सुरभि { कामधेनु } की उत्पत्ति के अनन्तर चौदह विद्याओं की उत्पत्ति हुई |  ये चौदह विद्याएं  निम्नवत् हैं —   

अंगानि चतुरो वेदा मीमांसा न्यायविस्तरः:।  पुराणं धर्मशास्त्रं  च  विद्या ह्येता चतुर्दश।। 

चार वेद (ऋग, यजु:,साम,अथर्व), छः वेदांग (व्याकरण, ज्योतिष, निरुक्त, कल्प, शिक्षा, छन्द) मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र। इन चौदह विद्याओं में अकेला व्याकरण ही  आठ प्रकार का होता है–ब्राह्म, ऐन्द्र ,याम्य  ,रौद्र, वायव्य, वारुण, सावित्र, वैष्णव। ज्योतिष भी फलित,गणित,संहिता भेद से तीन प्रकार का होता है।

मीमांसा पूर्व और उत्तर भेद से दो प्रकार की होती है। धर्मशास्त्र के रूप में स्मृतियाँ प्रसिद्ध  हैं। 

और पुराण अट्ठारह हैं। इसके बाद जो स्वाहा पद है  उससे स्त्री , पुरुष और नपुंसक तथा सकल स्थावर जङ्गम माने सभी चर और अचर प्राणियों की रचना की |  उसके बाद सकल (कला-सहित) समस्त प्रपञ्च  प्रकट हुआ । सामान्य व्यवहार में चौंसठ कलाएँ प्रसिद्ध हैं परन्तु अध्यात्म में इनके बहुत से भेद हैं यहाँ विस्तार भय से नहीं लिखा है , जिन्हें जिज्ञासा हो वे महाभारत , सौन्दर्यलहरी तथा प्रश्नोपनिषद आदि का अनुशीलन कर सकते हैं | || २८ || 

  || मूल उपनिषद ||

एतस्यैव यजनेन चन्द्रध्वजो गतमोहमात्मानं वेद । इत्योंङ्कारान्तरालिकं मनुमावर्तयेत् ।

 सङ्गरहितोभ्यानयत् । ||२९||

 तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ।

तस्मादेनं नित्यमभ्यसेन्नित्यमभ्यसेदिति । ॥३० ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

   नकेवलं  सृष्टिसामर्थ्यद एवायं मन्त्रोऽपितु महेश्वरस्यात्मज्ञानप्रदोऽपीत्याह , एतस्यैवेति |    ‘ एतस्यैव ’ पञ्चपदस्यैव , ‘यजनेन’ ‘चन्द्रध्वजः’ नाम चन्द्रमौलीश्वरः , ‘गतमोहं,’ यथास्यात्तथा ,  ‘आत्मानं,’ ‘वेद’ बुबुधे | ‘इति’ कारणात् , इदानीन्तनः  ‘ओंङ्कारान्तरालिकं’ प्रणवसम्पुटितं , ‘मनुम्’ अष्टादशाक्षरं , ‘सङ्गरहितः,’ ‘आवर्तयेत्’ | आवर्तनेन अप्रत्यक्षं परमात्मानम् ‘अभ्यानयत्’ आनयत् , इत्यर्थः ||२९|| 

परमात्मस्वरूपं विवृणोति , तद्विष्णोरिति | ‘तत्’ प्रसिद्धं ,  ‘विष्णोः’ , ‘पदं’ पदनीयस्वरूपं , ‘दिवि’ इति विद्योतनात्मके स्वरूपे ,  ‘सूरयः’ ज्ञानिनः , ‘सदा पश्यन्ति’ | कीदृशं पदं

 ‘चक्षुः’ ‘इव’ चष्टेति चक्षुः प्रकाशमेवेत्यर्थः | पुनः कीदृशं पदं , ‘आततं’ व्यापकम् | उपसंहरति , तस्मादिति | ‘तस्मात्’ विष्णुप्राप्तिहेतुत्वात् ,‘एनं’ अष्टादशाक्षरं मन्त्रं ,

 ‘नित्यमभ्यसेत्’ | अभ्यासः चतुर्थोपनिषत्समाप्त्यर्थः || ३० ||

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

अब इस विषय में दृष्टान्त देते हैं | ये जो अष्टादशाक्षरी विद्या है यह न केवल ब्रह्माजी को सृष्टि करने की सामर्थ्य देनेवाली है अपितु  महेश्वर को आत्मज्ञान प्रदान करनेवाली भी यही विद्या है | इसी का  भजन-ध्यान- करने से चंद्रध्वज, माने चन्द्रमौलीश्वर शिव , क्योंकि चन्द्रमा ही मन का अधिष्ठाता देव है , अतः मन ही जिसकी ध्वजा है,मतलब विचार को ही जो सर्वोपरि स्थान देते हैं  मन जिसमें अग्रणी है, जिसने मन पर अपनी विजयध्वजा  फहराई है | अथवा चन्द्रध्वज नाम का कोई राजा जिसने भक्ति युक्त होकर इस मन्त्रके माहात्म्य को जानकर इसका जप किया और विगतमोह होकर आत्मज्ञान की सिद्धिको प्राप्त किया | क्योंकि भगवान का भजन मायानिवर्तक होता है |  सामान्य जीवों के व्यवहार में मन ही शासन करता है;  और विशिष्ट सात्विक जीवों के व्यवहार में मन के ऊपर बुद्धि शासन करती  है | { बुद्धिं तु सारथिं विद्धि } जब बुद्धि शासन करेगी तो  मोह माने अविवेक नहीं रहेगा इसलिये इसी मन्त्रके प्रभाव से महादेव का मोह भंग हुआ और अपने आत्मस्वरूप का ज्ञान हुआ | इस प्रकार बड़े बड़े देवता इस मन्त्रके प्रभाव से आसक्तिरहित होकर आत्मज्ञान प्राप्त करने में सफल हुए हैं | तो कोई भी जीव इस मन्त्र के प्रभाव से  मोह से रहित  हो कर अपने यथार्थ स्वरूप को जान सकता  है |

 ये अष्टादशाक्षरी विद्या आत्मज्ञान करा देती है। ओंकार से संयुक्त इस मंत्र का जप करे और आसक्ति से रहित हो कर के इसका अभ्यास करे तो अप्रत्यक्ष परमात्मा को भी प्रत्यक्ष करा देने का सामर्थ्य इस मंत्र में है | लेकिन शर्त यह है कि मंत्र का जप सङ्ग रहित { विषयासक्ति से रहित } होना चाहिए क्योंकि (सङ्ग रहित होकर भगवद्भजन करने से शीघ्र ही फल होता है ) और यह निःसङ्गत्व सत्संग के बिना प्राप्त नहीं हो  सकता | भगवत्पाद आचार्य शंकर ने भजगोविन्दम् में कहा है — ‘‘सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥’’

    तथा श्री लक्ष्मी नारायण संहिता में कहा है —  ‘‘संगः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत् त्यक्तं न शक्यते’ । सः सद्भिः सह कर्तव्यः सतां संगो हि भेषजम् ।। १.३९५.१२० ।।’’ 

 संग व आसक्ति सर्वथा त्याज्य है। यदि ऐसा न कर सकें तो साधु पुरुषों का सहवास करना चाहिये क्योंकि उनका संग जड़ीबूटी की तरह हितकारक है । लेकिन आजकल साधुओं के चिन्हों को धारण करने वाले बहुत से  ठग अपने वाग्जाल में भोली भाली जनता को फंसाते हैं | सच्चे संत तो निरपेक्ष होते हैं वे नगरों में  भक्तों के पीछे-पीछे नहीं  घूमते | ऐसे नकली संतो का संग करने से सन्मार्ग से पतन होना अवश्यम्भावी है | श्रीमद् वल्लभाचार्य जी कहते हैं कि मन का निरोध सेवा में परमावश्यक है |  ‘‘हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मग्ना भवसागरे। ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम्‌॥११॥’’ भगवान के द्वारा जो छोड़ दिये गये हैं , वे संसार सागर में डूब गए हैं और जो निरुद्ध किये गए हैं { भगवान ने जिन्हें पकड़ रखा है } वे दिन-रात आनन्द में लीन हैं | इस प्रकार उन परमात्मा में जिनका मन निरुद्ध होगया है वे ही उस परमपद को देख पाते हैं | 

 ‘‘अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।८ .२१ ।।’’ जो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, वही परम गति (लक्ष्य) है। जिसे प्राप्त होकर (साधक गण) पुनः (संसार को) नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।।  

‘‘भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।

 ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्  ।।१८ .५५ ।।’’  (उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात मेरा ही स्वरूप बन जाता है।।

 “यन्न दु:खेन संभिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् ।

अभिलाषोपनीतं च तत्सुखं  स्व: पदास्पदम् ।।” (तन्त्रवार्तिक) सच्चा स्वर्ग  वह है  जहाँ का सुख  दुःख से मिश्रित न हो और बाद में भी दुःख न हो । और जो संकल्प मात्र से प्राप्त हो वस्तुत: वह  सुख  स्वर्ग पद वाच्य है | ऐसा सुख तो जो लोग भगवान की नित्य लीला में विहार करते हैं उन्हें ही हो सकता है ,  इन्द्रादि लोकों में सुखभोग काल में दूसरे के सुख से ईर्ष्या तथा प्राय: दैत्य दानवों का आक्रमण होता रहता है । और देवगण मारे मारे फिरते हैं । इसलिए उनका स्वर्ग वास्तविक स्वर्ग नहीं है । 

अब उस परमात्मा का स्वरूप बताते हैं , कि वह परमात्मा प्रकाश स्वरूप है माने ज्ञान स्वरूप है |  वही विष्णु नामक व्यापक जो ब्रह्म है, महर्षि लोग नित्य निरंतर उन्हें देखते हैं और उन्हें दिव्य चक्षुओं की उपलब्धि हो जाती है । इसलिए  विष्णु तत्व की प्राप्ति के लिये इसको (अष्टादशाक्षरी  विद्या को)  बार बार दोहराना चाहिए, अभ्यास करना चाहिए ।   सारांश – निःसंग होकर ,एकमात्र भगवान में परायण होकर , मनो निरोध पूर्वक { मन को चारों तरफ से इकठ्ठा करके ब्रह्म में स्थापित करके ओंकार विशिष्ट अष्टादशाक्षर मन्त्र को निरन्तर दोहराये  | क्योंकि ब्रह्मसूत्र में कहा है कि आवृत्तिरसकृदुपदेशात्। ( ब्र.सू.४-१-१ ) ब्रह्म ज्ञान के साधनों का लगातार अभ्यास करना चाहिए | जैसे उद्दालक ने श्वेतकेतु को बार बार “तत्वमसि” कहा | तब उन वेद प्रसिद्ध देवाधिदेव  के सर्वोत्कृष्ट पद का साक्षात्कार विद्वान भक्तों को होता है , दूसरों को नहीं  | ” सदा पश्यन्ति सूरयः” 

{ आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः } इत्यादि श्रुतिके विषयमें वारंवार आवृत्ति का उपदेश किया है, इस कारण श्रवण मनन आदि वारंवार करने चाहिए | अर्थात, तब तक धान को कूटना चाहिए जब तक सम्पूर्ण भूसी न निकल जाय। तात्पर्य है कि जब तक जगत के  स्वरूप का अच्छी तरह से  बाध न हो जाये |  इसी प्रकार वेदान्त श्रवण तब तक करना चाहिए जब तक परम तत्व का अपरोक्ष साक्षात्कार न हो जाये । ||२९||३०|| 

  || मूल उपनिषद ||

तदाहुरेके  यस्य प्रथमपदाद्भूमिर्द्वितीयपदाज्जलं

तृतीयपदात्तेजश्चतुर्थपदाद्वायुश्चरमपदाद्व्योमेति ।

वैष्णवं पञ्चव्याहृतिमयं  मन्त्रं कृष्णावभासकं 

कैवल्यस्य सृत्यै सततमावर्तयेत्सततमावर्तयेदिति ॥ ३१ ॥ 

तदत्र गाथाः 

यस्य चाद्यपदाद्भूमिर्द्वितीयात्सलिलोद्भवः ।

तृतीयात्तेज उद्भूतं चतुर्थाद्गन्धवाहनः ॥ ३२॥

पञ्चमादम्बरोत्पत्तिस्तमेवैकं समभ्यसेत् ।

चन्द्रध्वजोऽगमद्विष्णोः परमं पदमव्ययम् ॥ ३३॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

 अथ मन्त्रान्तरेण पञ्चपदेभ्यो जगत्सृष्टिं निरूपयति , तदाहुरेकेइति | ‘तत्’  तत्र अष्टादशाक्षरे , ‘एके’  मुनयः , आहुः | प्रथमपदात् भूमिः | ‘ द्वितीयपदात् जलं ’ | ‘ तृतीयपदात् तेजः ’  | ‘ चतुर्थपदात् वायुः ’ | 

   ‘ चरमात् व्योम ’ | ‘इति’ ‘वैष्णवं’ पञ्च व्याहृतयः , पञ्चपदानि  , तन्  ‘ मयं ’ मन्त्रं , 

कृष्ण रूपप्रकाशकं  कैवल्यस्य मोक्षस्य , ‘ सृत्यै ’  मार्गाय , सततं आवर्तयेत् अभ्यसेत् ||३१||३२||३३|| 

                                 || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

  अब मन्त्रान्तर से पाँच पदों के द्वारा जगत की सृष्टि का निरूपण करते हैं | उस अष्टादशाक्षर मन्त्र में ये जो पांच पद हैं, इसके प्रथम पद से भूमि की उत्पत्ति हुई, दूसरे पद से जल की उत्पत्ति हुई, तीसरे पद से तेज की उत्पत्ति हुई, चौथे पद से वायु की उत्पत्ति हुई और आखिरी पद से आकाश की उत्पत्ति हुई। ये पाँच पद ही पाँच व्याहृतियाँ हैं  (भू ,भुवः, स्वः, महः, जनः) ये पांच व्याहृतियों के साथ कृष्ण का द्योतन/दर्शन कराने वाला ये जो मंत्र है, यह कृष्ण के रूप का प्रकाशन करता है और  मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है , क्योंकि मोक्ष नित्य पुरुषार्थ कहा जाता है, धर्म, अर्थ, काम क्षीण हो जाते हैं । अर्थ और काम तो क्षीण होते हैं ये देखने में भी आता है, धर्म के बारे में पता नहीं लगता है, उसके लिए श्रुति प्रमाण हैं । “तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते ” ऐसा श्रुति का मंत्र है, तो ये सब अनित्य है । तो मोक्ष नाम का जो नित्य पुरुषार्थ है, उसकी सिद्धि के लिए यह जो अष्टादशाक्षरी विद्या है इसका नित्य निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए । दो बार कहने का अर्थ आदर और निश्चय के लिये होता है। जिसके पहले चरण से भूमि उत्पन्न हुई, दूसरे चरण से जल का उद्भव हुआ, तीसरे पद से तेज का उद्भव हुआ, चतुर्थ पद से वायु प्रकट हुआ । पांचवें पद से आकाश की उत्पत्ति हुई । उस एक तत्व का ही, अष्टादशाक्षरी विद्या का ही  अभ्यास करें । तो ये चन्द्रध्वज संज्ञक जो जीवों का अधिष्ठान चैतन्य जो हिरण्यगर्भ  है , उसको  विष्णु के  अव्यय ,अक्षर पद का ज्ञान हुआ  । ‘‘भक्तावत्यादरेणैव प्रकटो जायते हरिः’’  भगवान की भक्ति ही हरि दर्शन में हेतु है |  ”  कैवल्यस्य सृत्यै  ” केवलः कृष्णः तस्य { कैवल्यस्य }  भावोनुक्रोशस्तस्य सृत्यै प्राप्त्यै प्राप्तये सततं निरन्तरं आवर्तयेत् आवृत्तिं कुर्यात् | भगवान अपने निजानन्द का ही दान कर देते हैं यह उनकी कृपा है , और इस कृपा का ही दूसरा नाम कैवल्य है | ‘‘साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥’’ इस श्रुति में भगवान को केवल कहा है , और उनकी कृपा ही कैवल्य है |  ‘‘सोऽश्नुते सर्वान्‌ कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥’’ वह समस्त कामनाओं को परितृप्त करता है तथा वह उस विज्ञानमय तथा बोधपूर्ण ‘अंतरात्मा’ के साथ ‘ब्रह्म’ में निवास करता है। इस प्रकार स्वात्मानंद दान रूपा कृपा ही कैवल्य है | यह कृपा रूपा भक्ति कितनी दुर्लभ है इसका वर्णन श्री शुकदेव जी ने भागवत के पांचवें स्कंध में इस प्रकार किया है   ‘‘राजन्पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां

दैवं प्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः अस्त्वेवमङ्ग भगवान्भजतां मुकुन्दो

मुक्तिं ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोगम्  (भा. ५.६.१८)’’  श्री शुकदेव जी ने कहा — राजन् ! भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पांडव लोगों के और यदुवंशियों के रक्षक ,गुरु ,इष्टदेव , सुहृद् और कुलपति थे , यहाँ तक कि वे कभी-कभी आज्ञाकारी सेवक भी बन जाते थे | इसी प्रकार भगवान दूसरे भक्तों के भी अनेकों कार्य कर सकते हैं और उन्हें मुक्ति भी दे देते हैं , परन्तु मुक्तिसे भी बढ़कर जो भक्तियोग है , उसे सहज में नहीं देते |   वासुदेवे मनो युञ्जन् सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् , इसलिये गीताजी  में  भगवान  ने कहा कि – ‘‘मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।१२.८।।’’  तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।। योगशिखोपनिषत् में  शिवजी ब्रह्मा जी से कहते हैं कि यदि नारायण में मन लगा दिया तो सारी सिद्धियां मिल जाती हैं |  

नारायणे मनो युञ्जन्सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥” योगशिखोपनिषत् 

  चिन्तनं वासुदेवस्य परस्य परमात्मनः ।  स्वरूपव्याप्तरूपस्य ध्यानं  कैवल्यसिद्धिदम् । ॥ १४६॥ त्रिशिख ब्राह्मणोपनिषद् | चिन्तयन् चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृतेः॥गोपालतापिन्युपषत् |  भागवत के प्रथम स्कंध के आठवें अध्याय में कुंती ने कहा — ‘‘नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्त गुणवृत्तये। आत्मारामाय शान्ताय कैवल्य पतये नमः ’’ || १.८.२७|| आप निर्धनों के परम धन हैं | माया का प्रपंच आपका स्पर्श भी नहीं कर सकता | आप अपने आप में ही विहार करने वाले , परम शान्त स्वरूप  हैं | आप ही कैवल्य मोक्ष के अधिपति हैं | इससे भगवान का कैवल्य पतित्व सिद्ध होता है | तथा वहीं भागवत के तृतीय स्कंध के तीसरे अध्याय में कामनाओं के अनुसार विभिन्न देवताओं की उपासना तथा भगवद्भक्ति के प्राधान्य का निरूपण करते हुए शुकदेव जी कहते हैं कि —  

‘‘एतावानेव यजतां इह निःश्रेयसोदयः ।

भगवत्यचलो भावो यद्‍भागवतसङ्गतः ॥ २.३.११ ॥’’ 

 ‘‘ज्ञानं यदा प्रतिनिवृत्तगुणोर्मि चक्रम् ।

 आत्मप्रसाद उत यत्र गुणेष्वसङ्गः ।

    कैवल्यसम्मतपथस्त्वथ भक्तियोगः ।

 को निर्वृतो हरिकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ २.३.१२ ॥’’ जितने भी उपासक हैं , उनका सबसे बड़ा हित इसीमें है कि वे भगवान के प्रेमी भक्तों का सङ्ग करके भगवान में अविचल प्रेम प्राप्त करलें || ११ || ऐसे पुरुषोंके सत्संगमें जो भगवान की लीला -कथाऐं होती हैं ,उनसे उस दुर्लभ ज्ञानकी प्राप्ति होती है , जिससे संसार-सागरकी त्रिगुणमयी तरङ्गमालाओंके थपेड़े शान्त हो जाते हैं , हृदय शुद्ध होकर आनन्द का अनुभव होने लगता है , इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति नहीं रहती , कैवल्यमोक्षका सर्वसम्मत मार्ग भक्तियोग प्राप्त हो जाता है | भगवान् की ऐसी रसमयी कथाओंका चस्का लग जानेपर भला कौन ऐसा है , जो उनमें प्रेम न करे | || १२ || इन श्लोकों द्वारा श्रीकृष्ण में भक्तियोगका प्रयोग करनेपर कैवल्यसम्मतपथत्व सिद्ध होता है | तथा भागवत के तीसरे स्कंध के सत्ताईसवें अध्याय में भगवान कपिल भी कहते हैं —

 ”  मद्‍भक्तः प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा ।

निःश्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम् ॥ ३.२७.२८॥

प्राप्नोतीहाञ्जसा धीरः स्वदृशा च्छिन्नसंशयः ।

यद्‍गत्वा न निवर्तेत योगी लिङ्गाद् विनिर्गमे ॥ ३.२७.२९॥ ” 

भगवान कपिल देव जी माता देवहूति से कहते हैं कि मेरा वह धैर्यवान भक्त मेरी ही महती कृपा से तत्व ज्ञान प्राप्त करके आत्मानुभव के द्वारा सारे संशयों से मुक्त हो जाता है और फिर लिंगदेह का नाश होने पर एकमात्र मेरे ही आश्रित अपने स्वरूपभूत  कैवल्य संज्ञक मंगलमय पदको सहज में ही प्राप्त कर लेता है ,  जहां पहुंचने पर योगी फिर लौटकर नहीं आता || २८ -२९ || और महाराज पृथु की यज्ञशाला में श्री विष्णु जी कहते हैं कि  ‘‘परित्यक्त गुणः सम्यग् दर्शनो विशदाशयः ।

शान्तिं मे समवस्थानं ब्रह्म कैवल्यमश्नुते ॥ ४.२०.१०॥’’ चित्त शुद्ध होने पर उसका विषयों से सम्बन्ध नहीं रहता तथा उसे तत्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है | फिर तो वह मेरी समता रूप स्थिति को प्राप्त हो जाता है | यही परम शांति , ब्रह्म अथवा कैवल्य है || १० || तथा भागवत के आठवें स्कंध के तीसरे अध्याय में गजेंद्र भगवान की स्तुति करते हुए कहते हैं कि —  ‘‘सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता

नमः कैवल्य नाथाय निर्वाण सुखसंविदे  || ८ .३ .११ || ’’ विवेकी पुरुष कर्म-संन्यास अथवा कर्म-समर्पण के द्वारा अपना अन्तःकरण शुद्ध करके जिन्हें प्राप्त करते हैं तथा जो स्वयं तो नित्यमुक्त , परमानन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं ही दूसरों को कैवल्य-मुक्ति देने का सामर्थ्य भी केवल उन्ही में है —उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ || ११ || इस वाक्य से भगवान श्रीकृष्ण का कैवल्यनाथ होना व्यक्त होता है | कैवल्य संपत्ति की सम्प्राप्ति केवल कृष्ण कृपा के द्वारा ही संभव है अन्यथा जिस समय सभी देवताओं ने मिलकर महाराज मुचुकुन्द को वर देना चाहा  और कहा कि कैवल्य पद छोड़कर  आप कुछ भी माँग सकते हैं | ‘‘वरं वृणीष्व भद्रं ते ऋते कैवल्यमद्य नः

एक एवेश्वरस्तस्य भगवान्विष्णुरव्ययः || 10 .51.२० ||’’  राजन् ! आपका कल्याण हो | आपकी जो इच्छा हो हमसे माँग लीजिये | हम कैवल्य-मोक्ष के अतिरिक्त आपको सब कुछ दे सकते हैं | क्योंकि कैवल्य-मोक्ष देने की सामर्थ्य तो केवल अविनाशी भगवान विष्णु में ही है | और वैखानस गृह्यसूत्र में कहा भी है कि “आरोग्यं भास्करादिच्छेत् धनमिच्छेत् हुताशनात्। ज्ञानं च शंकरादिच्छेत् मुक्तिमिच्छेत् जनार्दनात्।।” आरोग्य की कामना सूर्य से करें,धन की इच्छा अग्निहोत्र से पूर्ण करें। ज्ञान के लिए शंकर जी की उपासना करें और मुक्ति के लिए जनार्दन का आश्रय ग्रहण करें। 

हरिवंशपुराण के (भविष्य पर्व) अध्याय ८९ में स्वयं भगवान शितिकण्ठ ने ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणों को कर्तव्यका  उपदेश करते समय कृष्ण को ही सेव्य बताया तथा मोक्षादि सर्व इष्ट कामनाओं का दाता बताया है |

 ‘‘एष वो मोक्षदाता च एष मार्ग उदाहृतः ।

एष पुण्यप्रदः साक्षादेतत् च कर्मणः फलम् ।। ५ ।।  ये ही तुम्हें मोक्ष देने वाले हैं और ये ही गन्तव्य मार्ग बताये गये हैं | ये ही तुम्हारे पुण्यों के भण्डार हैं और ये ही सनातन धर्म हैं | || ५ ||  

एतदेव प्रशंसन्ति विद्वांसो ब्रह्मवादिनः ।

एष त्रयीगतिर्विप्राः प्रार्थ्यो ब्रह्मविदां सदा ।। ६ ।।  ‘ब्रह्मवादी विद्वान सदा इनकी ही प्रशंसा करते हैं | ये ही तीनों वेदों की गति ( आश्रय ) हैं | ब्राह्मणो ! ब्रह्मवेत्ता पुरुष सदा इन्ही की प्राप्ति के लिये प्रार्थना करते हैं || ६ ||     

एतदेव प्रशंसन्ति सांख्ययोगसमाश्रिताः ।

एष ब्रह्मविदां मार्गः कथितो वेदवादिभिः ।। ७ ।।  सांख्य और योग का आश्रय लेने वाले विद्वान इन्ही के गुण गाते हैं | वेदवादीविद्वानोंने इन्हीको ब्रह्मवेत्ताओं का मार्ग बताया है || ७ || 

एवमेव विजानीत नात्र कार्या विचारणा ।

हरिरेकः सदा ध्येयो भवद्भिः सत्त्वमास्थितैः ।। ८ ।। विप्रवरो ! तुम सदा ऐसा ही जानो | इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं है | सत्वगुण का आश्रय लेनेवाले तुम-जैसे भक्तों को सदा एकमात्र श्रीहरि का ही चिंतन करना चाहिये || ८ || 

नान्यो जगति देवोऽस्ति विष्णोर्नारायणात्परः।

ओमित्येवं सदा विप्राः पठत ध्यात केशवम् ।। ९ ।। ।  संसारमें सर्वव्यापी नारायणसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है | ब्राह्मणो ! तुम सदा ॐ का जप और भगवान केशव का ध्यान किया करो || ९ ||

ततो निःश्रेयसप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः ।

एवं ध्यातो हरिः साक्षात्प्रसन्नो वो भविष्यति।। १० ।।   ऐसा करने से तुम्हें परम कल्याण की प्राप्ति होगी | इसमें संशय नहीं है | इस प्रकार ध्यान करने पर साक्षात् श्रीहरि तुम लोगों पर प्रसन्न होंगे || १० || 

भवनाशमयं देवः करिष्यति दृढं हरिः ।

सदा ध्यात हरिं विप्रा यदीच्छा प्राप्तुमच्युतम् ।। ११ ।।   ये भगवान विष्णु तुम्हारे संसार बंधन का दृढतापूर्वक नाश डालेंगे | ब्राह्मणो ! यदि भगवान् अच्युत को प्राप्त करने की इच्छा हो तो सदा ही उन श्रीहरि का ध्यान करो || ११ || ’’ विशेष विवेचन से क्या प्रयोजन , सूक्ष्म दृष्टि से निरीक्षण करने पर शास्त्र ही अधिकारीजन के शङ्कापङ्क का क्षालन कर देता है | || ३१ || ३२ || ३३ || 

  || मूल उपनिषद ||

ततो विशुद्धं विमलं विशोक

मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् ।

यत्तत्पदं पञ्चपदं तदेव

स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ३४ ॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

   ततो विशुद्धमिति | ‘ततः’ तस्मात् कारणात् , विशुद्धत्वादिगुणोपेतं ‘तत्’ प्रसिद्धं , ‘यत्’ 

  ‘पदं’ पदनीयस्वरूपं ,  ‘तत्’ पदं , पदमेव पञ्चधा गुणितं पदं ‘पञ्चपदं,’ इति विग्रहः | 

  ‘विशुद्धं’ चिज्ज्योतिः,चिन्मात्रम् , ज्ञप्तिः , ‘विमलं’ अविद्यादिमलरहितं , ‘विशोकं’

 मनस्तापरहितं , ‘अशेषाः’ लोभादयः, तेषां निरस्तः ‘सङ्गः’ यस्मिन् विशुद्धादिगुणकं पदमेव | ‘वासुदेवः’ वसत्यस्मिन्निति वासुः , स चासौ देवश्चेति ‘वासुदेवः’ | ‘यतः’     वासुदेवात् , अन्यत् किञ्चित् नास्ति  ||३४|| स्वतः सिद्धं | नित्यानन्दैकरसं प्रत्यगभिन्नं ,

 सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं | यदीयते तत्र पुमानपावृतः ।

सत्त्वे च तस्मिन् भगवान् वासुदेवो |   ह्यधोक्षजो मे नमसा विधीयते ॥ २३ ॥ भागवतम् | 

                                 || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

  इसके बाद जो विशुद्ध है, { विक्षेप , अज्ञान आदि से रहित } जिसमें कोई मिलावट नहीं है । विशुद्धं , निर्मलं , परं ,  सच्चिदानन्दरूपं ,  ‘ विमलं ’ स्वच्छं , अविद्या आदि मलों से रहित ,  ‘ विशोकं ’ मानसिक चिंताओं से रहित ,  ‘अशेषाः’ सम्पूर्ण  लोभ , क्रोध , दम्भ , ईर्ष्या आदि के संग से रहित हो जाने पर जो बाकी रहता है  वह केवल वासुदेव ही है ’ क्योंकि यह शुद्धसत्वात्मक वसुदेव में प्रादुर्भूत होता है |  ‘‘सत्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं’’ अतः यह पञ्चपदात्मक मन्त्र ही वासुदेव है | 

 ‘‘न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते’’ न इनके समान कोई है और न इनसे अधिक कोई है |  प्रकृति और पुरुष , दो नहीं एक ही तत्व है । प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् , वे. सू . १ ,४ ,२३  परमात्मा का ही एक नाम प्रकृति है। जब जड़ता की प्रधानता से उसका नाम लेते हैं तो प्रकृति बोलते हैं और चेतना की प्रधानता से उसका नाम लेते हैं तो ब्रह्म बोलते हैं। असल में वस्तु एक ही है, जो अंग रूप से कारण का चिंतन करते हैं, उसके लिए वह प्रकृति है और जो स्वरूप रूप से कारण का चिंतन करते हैं उनके लिए वह ब्रह्म है। दृष्टिकोण का ही अंतर है। जैसे एक सोना से तरह-तरह के जेवर बनते हैं, एक मिट्टी से तरह-तरह के बर्तन बनते हैं, एक लोहे से तरह-तरह के सामान बनते हैं। इसी तरह से एक परमात्मा से यह सारी सृष्टि बनी हुई है।

मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।

 इसी से यहां बताया कि ‘सूयते सचराचरम्’ – यह प्रकृति सचराचर जगत की – जिसमें चलने-फिरने वाले भी हैं और न चलने-फिरने वाले भी हैं। सबकी सृष्टि करती है | 

  प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।।१३.२०।। तो वो तत्व विशुद्ध है, अद्वैत है। उसमें कोई मल नहीं है कोई विकार नहीं है, शोक, मोह नहीं है। और सभी प्रकार के विकार; लोभादि, आसक्ति से दूर है । तो वह जो विष्णु का पद है वो ये पांच पद ही हैं । ये वही वासुदेव है और इनसे भिन्न कुछ भी नहीं है  वह गोलोक धाम परम पवित्र, विमल, शोक-विहीन, लोभ आदि से रहित, समस्त प्रकार की आसक्ति से रहित है। वह ऊपर कहे पाँच पदों वाले मंत्र से भिन्न नहीं है। वह मन्त्र स्वयं साक्षात् वासुदेवमय ही है, उन वासुदेव से भिन्न दूसरा और कुछ भी नहीं है॥  ||३४||

  || मूल उपनिषद ||

तमेकं गोविन्दं सच्चिदानन्दविग्रहं पञ्चपदं वृन्दावनसुरभूरुहतलासीनं सततं समरुद्गणोऽहं 

परमया स्तुत्या  तोषयामि ॥ ३५ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

  ततः पञ्चपदात्मकं वासुदेवमेवाहं स्तौमीत्याह , तमेकमिति | ‘तं’ विशुद्धपदात्मकं , ‘एकं’ सजातीय विजातीय स्वगत भेद रहितं , ‘सच्चिदानन्दविग्रहं’ पदात्मकस्वरूपं ,  ‘गोविन्दं’ परपदात्मकं , वृन्दावने ‘सुरभूरुहाः’ कल्पवृक्षाः, तेषां तले ‘आसीनं’  ‘सततं’ निरन्तरं ‘समरुद्गणः’ अहं  ब्रह्मा परमया स्तुत्या तोषयामि | ॥ ३५ ॥

 वासुदेव स्तुतिमाह , ओं नम इति द्वादश मन्त्रैः | 

                            || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

  उन्हीं एक गोविन्द को जो सजातीय विजातीय और स्वगत भेद से  रहित हैं , और वे ही    सच्चिदानन्द विग्रह पंचपद स्वरूप हैं  । ‘‘सच्चिदानन्द रूपाय कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे।

नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धि साक्षिणे॥ ’’ अनायास ही सब कुछ कर सकने में समर्थ सच्चिदानन्दमय भगवान् श्रीकृष्ण को, जो वेदान्त के द्वारा जानने योग्य हैं, वे (हम) सभी की बुद्धि के साक्षी एवं सम्पूर्ण विश्व के गुरु हैं। ऐसे श्रीकृष्ण को सादर नमन-वंदन है ॥ वृन्दावन में कल्पवृक्ष/पारिजात के नीचे बैठे हुए श्री कृष्ण की मैं ब्रह्मा ४९ उनचास मरुद्गणों  के सहित  परम स्तुति के द्वारा उनका स्तवन करता हूँ |  पाणिनीय शिक्षा में भी कहा है कि बिना मरुत की सहायता से उच्चारण हो ही नहीं सकता   ‘‘आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् मनो युङ्क्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ।। ६ ।।’’ आत्मा जब बुद्धि से {अर्थों का , प्रयोजनों का} बोलने का निश्चय करती है तब मन नाम की इन्द्रिय को बोलने की प्रेरणा करती है फिर वह मन शरीर अन्तर्वर्ती जठराग्नि को [ आहन्ति ] प्रेरणा करता है फिर वह अग्नि { मारुत को } वायु को प्रेरणा करता है | अथवा मैं ( ब्रह्मा ) अपने समष्टि प्राणों के साथ  उन भगवान की स्तुति करता हूँ | ग्यारहवें  स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण उद्धव जी से कहते हैं कि  —-  

‘‘यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्

आकाशाद्घोषवान्प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा || ११। २१। ३८ || 

छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः

ॐकाराद्व्यञ्जितस्पर्श स्वरोष्मान्तस्थभूषिताम् || ११। २१। ३९ ||  ’’ 

   भगवान हिरण्यगर्भ  (ब्रह्मा जी) स्वयं वेदमूर्ति एवं अमृतमय हैं | उनकी उपाधि है प्राण और स्वयं अनाहत शब्द के द्वारा ही उनकी अभिव्यक्ति हुई है | क्योंकि श्वास प्रश्वास के द्वारा 

 ‘ सोSहं — हंसः पदेनैव जीवो जपति सर्वदा.’ { अहं सः,सोऽहं } छोड़ते समय हँ तथा ग्रहण करते समय हंसः,सोऽहं- यही शब्द उच्चरित होता है | यह मन्त्र तो जीव हमेशां जपता ही रहता है | और फिर यही मन्त्र अभ्यासवशात् सूक्ष्म अनुसन्धान करनेपर प्रणव बन जाता है | जैसे मकड़ी अपने हृदय से मुखद्वारा जाला उगलती और फिर निगल लेती है ,वैसे ही वे स्पर्श आदि वर्णों का संकल्प करनेवाले मनरूप निमित्तकारण के द्वारा हृदयाकाशसे अनन्त अपार अनेकों मार्गोंवाली वैखरीरूप वेदवाणीको स्वयं ही प्रकट करते हैं और फिर उसे अपने में लीन कर लेते हैं | वह वाणी हृद्गत सूक्ष्म ओंकार के द्वारा अभिव्यक्त स्पर्श  ( ‘क’ से लेकर ‘म’ तक २५ ) , स्वर  ( ‘अ’  से  ‘औ’   तक -९ ) , ऊष्मा ( श,ष,स,ह )  और अन्तःस्थ ( य , र , ल , व ) —– इन वर्णों से विभूषित है | सरलार्थ:- वे भगवान गोविन्द पंचपद मन्त्र स्वरूप हैं। उनका श्रीविग्रह सत्-चित्-आनन्द स्वरूप है। वे वृन्दावन में स्थित कल्पवृक्ष के नीचे (रत्नजडित सिंहासन पर) सदैव विराजमान रहते हैं। मैं (ब्रह्मा) मरुद्गणों के साथ रहते हुए उन भगवान् ( श्रीकृष्ण) को श्रेष्ठ स्तुतियों के द्वारा प्रसन्न करता हूँ॥  और वे ब्रह्मा आदि देवता इन निम्न लिखित बारह मन्त्रों  से स्तवन करते हैं : – || ३५ || 

  || मूल उपनिषद ||

ॐ नमो विश्वस्वरूपाय विश्वस्थित्यन्तहेतवे ।

विश्वेश्वराय विश्वाय गोविन्दाय नमोनमः ॥ ३६ ॥

                                || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

ॐ विश्वस्वरूपाय नमः, विश्वरूप को  नमस्कार , यहां ॐ से ही मन्त्रका आरम्भ करते हैं | अर्थात् कृष्ण प्रणव स्वरूप ही हैं  | हरिवंशपुराण के भविष्य पर्व के ८८ अठासीवें अध्याय में कृष्ण की स्तुति करते हुए शिवजी कहते हैं  कि  ‘‘ईशस्त्वं सर्वभूतानामीश्वरोऽसि ततो हरे ।

प्रणवः सर्व वेदानां गायत्री छन्दसां प्रभो ।। ५४ ।।’’  हे हरे ! आप सम्पूर्ण भूतों के ईश हैं , इसलिए

  ‘ईश्वर’ कहे गये हैं | प्रभो ! आप समस्त वेदों में प्रणव और सम्पूर्ण छंदों में ‘गायत्री’  हैं || ५४ || अब प्रणव की व्युत्पत्ति बताते हैं – प्रकर्षेण नवः इति प्रणवः | इस व्युत्पत्ति के अनुसार, सर्वदा अनेक भक्तों के उन उन मनोरथों की पूर्ति के लिये नवीन – नवीन रूप धारण करते हैं इसलिए आप प्रणव हैं | भागवत के तीसरे स्कंध के नौवें अध्याय में भगवान की स्तुति करते हुए ब्रह्माजी कहते हैं कि — 

  ‘‘त्वं भक्तियोगपरिभावितहृत्सरोज । आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम् ।

यद् यद् धिया त उरुगाय विभावयन्ति ।  तत्तद् वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ ११ ॥’’ नाथ ! आपको प्राप्त करने का मार्ग केवल आपके गुण-श्रवण से ही जाना जाता है | आप निश्चय ही मनुष्यों के  भक्ति योग के द्वारा परिशुद्ध हुए हृदय कमल में  निवास करते हैं | पुण्यश्लोक प्रभो ! आपके भक्त जन जिस-जिस भावना से आपका चिन्तन करते हैं , उन साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिए आप वही-वही रूप धारण कर लेते हैं | एवं   ‘‘ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।’’  ॐ , तत् और सत् — इन तीनों नामों से जिस परमात्मा का निर्देश दिया गया है, इस प्रकार गीता वाक्य में निर्दिष्ट परब्रह्म रूप ॐ को प्रणाम करके अब विराट रूप को नमस्कार करते हैं |  ‘‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। ’’ इस श्रुति के अनुसार  विश्व भी भगवान का ही रूप है |   जो विश्व की स्थिति (पालन) , उत्पत्ति (आविर्भाव) और अंत (तिरोभाव) माने प्रलय में जो कारण हैं | उनको मैं नमस्कार करता हूँ,  ‘‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व।’’ जिसके द्वारा,इस सृष्टि का निर्माण होता है,जिसके द्वारा इस सृष्टि का पोषण होता है और जिसमें सब लोग जाकर,अपने आप विलीन हो जाते हैं,उस एक को ही जानना चाहिए। इस श्रुति से भगवान का सर्वनियामकत्व कहा |   वे ही विश्व के ईश्वर भी हैं और विश्वरूप भी वे ही हैं । वेदान्त में, परमात्मा को जगत का अभिन्न निमित्तोपादान कहा जाता है मतलब निमित्त भी वही और उपादान भी वही यानी मिट्टी भी वही और घड़ा भी वही, कुम्हार भी वही, जगत भी वही, जगत का बनाने वाला भी वही,{ मैटर भी वही और मेकर भी वही }  विश्व का मालिक भी वही और विश्व भी वही;  स्कंध बारह अध्याय चार में  श्री शुकदेवजी कहते हैं  ‘‘यथा हिरण्यं बहुधा समीयते नृभिः क्रियाभिर्व्यवहारवर्त्मसु । एवं वचोभिर्भगवानधोक्षजो  व्याख्यायते लौकिकवैदिकैर्जनैः ॥ ३१ ॥’’जैसे व्यवहार में मनुष्य एक ही सोने को अनेकों रूपों में गढ़कर  – गलाकर तैयार कर लेते हैं और वह कंगन , कुण्डल।, कड़ा आदि अनेकों रूपों में मिलता है , इसी प्रकार व्यवहार में निपुण विद्वान लौकिक और वैदिक वाणी के द्वारा इन्द्रियातीत आत्मस्वरूप भगवानका भी अनेकों रूपों में वर्णन करते हैं | ‘‘उपादानं प्रपञ्चस्य ब्रह्मणोन्यन्न विद्यते । तस्मात्सर्वप्रपञ्चोऽयं ब्रह्मैवास्ति न चेतरत् ॥ ४५॥’’ जगत् का  उपादान ब्रह्म के अतिरिक्त और कोई नहीं ,अतः समस्त प्रपञ्च ब्रह्म ही है | योगशिखोपनिषत्  ‘‘उपादानं प्रपञ्चस्य मृद्भण्डस्येव कथ्यते । अज्ञानं चैव वेदान्तैस्तस्मिन्नष्टे क्व विश्वता ॥ ९४॥’’ जैसे घड़े का उपादान मिट्टी है , मिट्टी निकाल लेने पर घड़े का अस्तित्व नहीं रह सकता वैसे ही अज्ञान जगत का उपादान है , अज्ञान हटा लेनेपर प्रपञ्च का अस्तित्व नहीं रह सकता | अपरोक्षानुभूति , ‘‘ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’’- पुरुषसूक्त  ‘‘स वै सर्वमिदं जगत् ’’- महानारायनोपनिषत् –  ‘‘नमस्ते विश्वरूपाय रसाय च नमेा नमः |  विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्त्रे नमो नमः ||  हरिवंशपुराण-भविष्यपर्व-अध्याय ९० { शिवकृत विष्णुस्तुति } ’’  ” निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः । आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वगतभेदविवर्जितात्मा । १.११ । (महाभारत तात्पर्य निर्णयः )।  आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि:” अर्थात् “परमात्मा के हाथ, पैर मुख व उदर आदि केवल आनन्द से निर्मित है – स्थूल त्रिगुणात्मक लौकिक तत्वों से नही”    तथा दूसरे स्कंध चौथे अध्याय में शुकदेवजी कहते हैं  ‘‘ श्रियः पतिर्यज्ञपतिः प्रजापतिः  धियां पतिर्लोकपतिर्धरापतिः । पतिर्गतिश्चान्धकवृष्णिसात्वतां  प्रसीदतां मे भगवान् सतां पतिः ॥ २.४. २० ॥ ’’ जो समस्त सम्पत्तियों की स्वामिनी लक्ष्मी देवी के पति हैं, समस्त यज्ञों के भोक्ता एवं फल दाता हैं , प्रजा के रक्षक हैं , सबके अंतर्यामी और समस्त लोकोंके पालनकर्ता हैं तथा पृथ्वी देवी के स्वामी हैं, जिन्होंने यदुवंश में प्रकट होकर अंधक , वृष्णि एवं यदुवंशके लोगों की रक्षा की है , तथा जो उन लोगों के एकमात्र आश्रय रहे हैं — वे भक्तवत्सल संतजनोंके सर्वस्व श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों || २० || इस भागवतीय शुक वाक्य से भगवान सबके पति हैं और बाकी सब उनके अंश होने के कारण उनके दास होने से उन्हें नमस्कार ही किया जा सकता है इससे अधिक कुछ भी नहीं |  ‘‘किमासनं ते गरुडासनाय किं भूषणं कौस्तुभभूषणाय । लक्ष्मीकलत्राय किमस्ति देयं वागीश किं ते वचनीयमस्ति ।’’ गरुड़ पुराण के ब्रह्मकाण्ड में कृष्ण की स्तुति करते हुए भृगु जी कहते हैं कि जिनके पास गरुड़ जैसा उत्तम आसन है उन्हें हम कौनसा आसन समर्पित करें ? जिनके पास कौस्तुभमणि है उन्हें कौन सा आभूषण उपहार में दें ? स्वयं लक्ष्मी देवी जिनकी पत्नी हैं उन्हें क्या भेंट दें ? और जो स्वयं वागीश हैं उनकी हम किन शब्दों में स्तुति करें ? अतः प्रभो !  हमारा नमस्कार ही स्वीकार करें |    ऐसे गोविंद को मैं बार बार नमस्कार करता हूँ। ॥ ३६ ॥

  || मूल उपनिषद ||

नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे ।

कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमोनमः ॥ ३७ ॥

                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

विशिष्ट ज्ञान को विज्ञान कहते हैं | वेद में कहा है  ‘‘विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणितनुऽतेपि च। विज्ञानं देवा: सर्वे।

ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञानं ब्रह्मचेद्वेद। तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा। सर्वान्कामान्समश्नुत इति। ’’ विज्ञान (विज्ञानवान् पुरुष) यज्ञ का विस्तार करता है और वही कर्मों का भी विस्तार करता है। सम्पूर्ण देव ज्येष्ठ विज्ञान-ब्रह्म की उपासना करते हैं। यदि साधक ‘विज्ञान ब्रह्म है’ ऐसा जान जाये और फिर उससे प्रमाद न करे तो अपने शरीर के सारे पापों को त्याग कर वह समस्त कामनाओं (भोगों) को पूर्णता से प्राप्त कर लेता है। भागवत में ज्ञान और विज्ञान का फर्क समझाते हुए श्रीकृष्ण उद्धवजी से कहते हैं कि — 

 ‘‘नवैकादश पञ्च त्रीन्भावान्भूतेषु येन वै | 

ईक्षेताथैकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् || ११।  १९।  १४ ||

  एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत् |  

स्थित्युत्पत्त्यप्ययान् पश्येद्भावानां त्रिगुणात्मनाम् || ११.१९.१५|| 

आदावन्ते च मध्ये च सृज्यात्सृज्यं यदन्वियात् |

पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् || ११.१९.१६|| ’’ उद्धव जी ! जिस ज्ञान से प्रकृति , पुरुष , महत् तत्व , अहङ्कार और पंचतन्मात्रा —ये नौ , पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन — ये ग्यारह , पाँच महाभूत और तीन गुण सब मिलाकर इन अट्ठाईस तत्वों को ब्रह्मा से लेकर तृण तक सम्पूर्ण कार्यों में देखा जाता है और इनमें भी एक परमात्मतत्व को अनुगत रूप से देखा जाता है  — वह परोक्ष ज्ञान है , ऐसा मेरा निश्चय है || १४ ||  और जब जिस एक तत्व से अनुगत एकात्मक तत्वों को पहले देखता था , उनको पहले के समान न देखे , किन्तु एक परम कारण ब्रह्म को ही देखे  , तब यही निश्चित विज्ञान (अपरोक्ष ज्ञान)  कहा जाता है | (इस ज्ञान और विज्ञान को प्राप्त करने की युक्ति यह है कि)  यह शरीर आदि जितने भी त्रिगुणात्मक सावयव पदार्थ हैं , उनकी स्थिति , उत्पत्ति और प्रलय का विचार करे || १५ || जो तत्व वस्तु सृष्टि के प्रारम्भ में और अंत में कारण रूप से स्थित रहती है , वही मध्य में भी रहती है और वही प्रतीयमान कार्य से प्रतीयमान कार्यान्तर में अनुगत भी होती है | फिर उन कार्योंका प्रलय अथवा बाध होनेपर उसके साक्षी एवं अधिष्ठानरूपसे शेष रह जाती है | वही सत्य परमार्थ वस्तु है , ऐसा समझे || १६ ||   ‘‘ विज्ञानं ब्रह्म ’’ वो परमात्मा विज्ञान स्वरूप हैं, अनुभव स्वरूप हैं क्योंकि उनसे भिन्न कुछ भी नहीं, वो सर्व स्वरूप हैं इसलिए उनसे भिन्न कुछ है ही नहीं। ‘परमानन्दरूपिणे’ जो परम {सर्वोच्च} भी हो और आनन्द भी उसे परमानन्द कहते हैं | ‘‘आनन्दमयोऽभ्यासात् || ब्रह्मसूत्र (१,१.१२ )’’ वेदान्त सूत्र भी परमेश्वर को आनन्दमयोऽभ्यासात् कहकर पुकारता है। भगवान स्वभाव से आनन्दमय हैं। ‘रसो वै सः’ (तै. उ. २ । ७ । १) ‘रसꣳ ह्येवायं लब्ध्वानन्दीभवति । को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात् । यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति’ (तै. उ. २ । ७ । १) ‘सैषानन्दस्य मीमाꣳसा भवति’ (तै. उ. २ । ८ । १) ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ (तै. उ. २ । ८ । ५) ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन’ (तै. उ. २ । ९ । १) इति ; ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’ (तै. उ. ३ । ६ । १) इति च । श्रुत्यन्तरे च ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ (बृ. उ. ३ । ९ । २८) इस प्रकार ब्रह्म में ही आनन्द शब्द का बार-बार प्रयोग श्रुति में हुआ है |  ‘अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात्‘ और वह ब्रह्म व्यापक है इसलिये उसका कोई सीमित रूप नहीं हो सकता ऐसा व्यास सूत्र से सिद्ध होता है |

 ‘‘अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्’’  (बृ.उ.३. ८. ८ )

 ‘‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं ’’ ( क. उ. १.  ३. १५ ) 

आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता  ‘ ( छा० ८ । १ । ४ ) , 

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः‘ (मु. . )

 ‘तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः‘ (बृ. . । १९)    जो सबको आकर्षित करने वाले हैं, इसलिए कृष्ण परब्रह्म हैं |‘‘कृषिर्भूवाचकः शब्दः णश्च निर्वृत्ति वाचकः । तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ।।’’  सकल मनोरथों को पूरा करने वाले हैं  इसलिये गोपीनाथ हैं |   इन इन्द्रियों को ही गोपी मान लीजिये, जिनसे जगत की प्रतीति होती है, इनके वो नाथ हैं और उनका पालन और रक्षा करने वाले हैं | गायों के स्वामी हैं इसलिये गोविन्द कहे जाते हैं |  ऐसे गोविन्द को मेरा बारंबार  नमस्कार है । आपको हमारा हजारों बार नमस्कार हो ! नमस्कार हो ! ! || ३७ || 

  || मूल उपनिषद ||

नमः कमलनेत्राय नमः कमल मालिने ।

नमः कमलनाभाय कमला पतये नमः ॥ ३८॥

                             || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

कमल-दल जैसे जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने कमल की माला पहनी हुई है, जिनकी नाभि में भी कमल है, वो जो बौद्ध लोग जप  करते हैं न “ॐ मणिपद्मे हुम् “, नाभि में यानी मणिपुर चक्र में जो पद्म है उसके अंदर जो शक्ति है, सारी शक्तियों का स्रोत नाभि में ही रहता है । क्योंकि वह समान वायु का स्थान है | तो जो जगत की नाभि स्वरूप हैं ,{ नभ एव नाभिः ,अन्तरिक्ष ही भगवान की नाभि है }  केन्द्र स्वरूप हैं ऐसे कमला पति  (लक्ष्मीपति) को नमस्कार है । [ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकान् अकल्पयन् ॥ यजु० ३१।१३ ॥ ] अर्थ- उन्हीं विराट् पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष लोक, मस्तक से स्वर्ग, पैरों से पृथ्वी, कानों से दिशाएं प्रकट हुईं । इस प्रकार समस्त लोक उस पुरुष में ही कल्पित (रचित) हुए । जो अपने दोनों चक्षुओं में कमल की सुन्दर आभा को धारण किये हुए हैं, गले में कमल पुष्पों की माला धारण किये हुए हैं, जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है, ऐसे उन भगवान कमलापति ( श्रीकृष्ण) को नमस्कार है॥ || ३८ || 

  || मूल उपनिषद ||

बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे ।

रमामानसहंसाय गोविन्दाय नमोनमः ॥ ३९ ॥

                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

मोरमुकुट , मयूरपिच्छ  जिन्होंने अपनी पगड़ी में लगाया हुआ है और उस मोरमुकुट से जो अत्यंत सुन्दर दिख रहे हैं। ‘‘बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं ।

 बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ।

 रन्ध्रान् वेणोरधरसुधयापूरयन् गोपवृन्दैः ।

 वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीत कीर्तिः ॥ १०.२१.५ ॥ ’’ “श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ वृन्दावन में प्रवेश कर रहे हैं, उन्होने मस्तक पर मोर पंख धारण किया हुआ है कानों पर पीले-पीले कनेर के पुष्प, शरीर पर सुन्दर मनोहारी सुनहला पीताम्बर शोभायमान हो रहा है तथा गले में पाँच प्रकारके सुन्दर सुगन्धित पुष्पों की वैजयन्तीमाला धारण किये हैं, रंगमंच पर अभिनय करने वाले नटों से भी अधिक सुन्दर और मोहक वेष धारण किये हैं श्यामसुन्दर I बांसुरी को अपने अधरों पर रख कर उसमें अधरामृत फ़ूंक रहे हैं ग्वालबाल उनके पीछे पीछे लोकपावन करने वाली उनकी कीर्ति  का गायन करते हुए चल रहे हैं, और वृन्दावन आज श्यामसुन्दर के चरणों के कारण वैकुण्ठ से भी अधिक सुन्दर और पावन और रमणीय हो गया है”   रामाय, माने बलराम स्वरूप अथवा राम भद्र स्वरूप, या सबको रमण कराने वाले या योगी लोग जिसमें रमण करते हैं, ऐसी बहुत सी व्युत्पत्तियां ‘राम’ शब्द के लिए हैं । वो राम अकुण्ठमेधसे – जिनकी मेधा (मेधा शक्ति /स्मरण शक्ति/धारणा शक्ति) अकुंठित है , जो अपने भक्तजनों को कभी भूलते नहीं हैं | ये वही राम हैं जिनके माहात्म्य का वर्णन देवर्षि नारद ने राजा  चित्रकेतु को भागवत के छठे स्कंध के पन्द्रहवें अध्याय में किया था 

‘‘यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे

     शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।

 सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं

     प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ २८ ॥’’ प्राचीन काल में भगवान शंकर आदि ने श्री सङ्कर्षणदेवके ही चरण कमलों का आश्रय लिया था | इससे उन्होंने द्वैतभ्रम का परित्याग करदिया और उनकी उस महिमा को प्राप्त हुए , जिससे बढ़कर तो कोई है ही नहीं , समान भी नहीं है | तुम भी बहुत शीघ्र ही भगवान के उसी परमपदको प्राप्त कर लोगे || २८ || 

तथा पञ्चम स्कन्ध के सत्रहवें अध्याय में शिवजी इन्हीं संकर्षण भगवान की उपासना करते हैं | ‘‘भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण सन्निधाप्यैतदभिगृणन्भव उपधावति १६ श्रीभगवानुवाच ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यानायानन्तायाव्यक्ताय  नम इति ’’ वहां पार्वती एवं उनकी अरबों-खरबों दासियों से सेवित भगवान शंकर परम पुरुष परमात्मा की वासुदेव , प्रद्युम्न , अनिरुद्ध और सङ्कर्षण संज्ञक चतुर्व्यूह – मूर्तियों में से अपनी कारण रूपा संकर्षण नाम की तमः प्रधान चौथी मूर्ति का ध्यान स्थित  मनोमय विग्रह के रूप में चिंतन करते हैं और इस मंत्र का उच्चारण करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं * भगवान का विग्रह शुद्ध चिन्मय ही है परन्तु संहार आदि तामसी कार्यों का हेतु होने से इसे तामसी मूर्ति कहते हैं | *  भगवान् शङ्कर कहते हैं —- ॐ जिनसे सभी गुणों की अभिव्यक्ति होती है , उन अनन्त और अव्यक्त मूर्ति ओंकारस्वरूप परम पुरुष श्री भगवान को नमस्कार है |

 ‘‘भजे भजन्यारणपादपङ्कजं भगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम् भक्तेष्वलं भावितभूतभावनं भवापहं त्वा भवभावमीश्वरम् १८’’ भजनीय प्रभो ! आपके चरण कमल भक्तों को आश्रय देने वाले हैं तथा आप स्वयं सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के परम आश्रय हैं | भक्तों के सामने आप अपना भूतभावन स्वरूप पूर्णतया प्रकट कर देते हैं तथा उन्हें संसार बंधन से भी मुक्त कर देते हैं , किन्तु अभक्तोंको उस बन्धनमें ड़ालते रहते हैं | आप ही सर्वेश्वर हैं , मैं आपका भजन करता हूँ | 

 { अरणं भक्तानां भयाद्रक्षकं पादपङ्कजं यस्य तं | अत्र नितराम् आ सम्यगेव अरणं शरणं पादपङ्कजं यस्य तं भजे } इस प्रकार शिव के आराध्य शेषजी ही यहाँ राम शब्द से व्यवहृत हुए हैं | अब राम शब्द का दूसरा अर्थ बताते हैं |  

    ‘‘रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि ।

इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ ६॥ रामतापिन्युपनिषत् | ’’ जिस अनन्त, नित्यानन्दस्वरूप , चिदात्मा में योगी लोग रमण करते हैं , उन्हीं परब्रह्म को राम शब्द के द्वारा कहा जाता  है |  ” अकुण्ठमेधसे ” भक्तों की बुद्धि को अकुंठित बनाते हैं  | ‘‘तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१० .१० ।।’’ उन नित्य-निरंतर मेरे में लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को मैं वह बुद्धियोग देता हूँ,  जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।।  – भगवान का एक नाम वैकुण्ठ भी है – विगत: कुण्ठा यस्मात्- जिसके अन्दर से कुण्ठा निकल गई हो; जहां कोई अवरोध नहीं है, कोई कुण्ठा नहीं है । तो जिनकी स्मृति में कोई अवरोध नहीं है, कोई कुण्ठा नहीं है ऐसे अकुंठ मेधा शक्ति  वाले को मैं नमस्कार करता हूँ । लक्ष्मी के अंतःकरण रूपी सरोवर में हंस स्वरूप में विराजमान , जैसे हंस निसर्गतः नीरक्षीर के विवेक करने में निपुण होता है वैसे ही भगवान सकाम और निष्काम भाव से भजन करने वालों के परीक्षण करने में निपुण हैं | ऐसे गोविन्द को बारम्बार नमस्कार है। जिनके मस्तक पर मोर पंख सुशोभित हो रहा है, जिन

 (श्रीकृष्ण) में सभी का मन रमण करता रहता है, जिनकी बुद्धि और स्मरण शक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती और जो रमा, तथा गोप सुंदरी गण एवं श्री राधा जी के मानस के राजहंस हैं, ऐसे उन भगवान गोविन्द को बारंबार प्रणाम है ॥  || ३९ || 

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  || मूल उपनिषद ||

कंसवंश विनाशाय केशि चाणूर घातिने ।

वृषभध्वजवन्द्याय पार्थसारथये नमः ॥ ४० ॥

                           || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

कंस के वंश का विनाश करने वाले, केशी और चाणूर नाम के दैत्यों अथवा असुरों को मारने वाले, जो भगवान वृषभध्वज (शिवजी) के भी वन्दनीय हैं, भागवत के वाक्यानुसार ‘‘वैष्णवानां यथा शम्भु: ’’ शिवजी परम वैष्णव हैं | अर्जुन (पार्थ माने पृथा के  पुत्र , कुंती के पुत्र) के सखा होने के कारण कृपा पूर्वक बने सारथी को बारंबार नमन-वंदन है । स्कन्द पुराण के काशी खंड के अध्याय २१ में भी कहा है कि — ‘‘इयमेव परा हानिरुपसर्गो यमेवहि ।। अभाग्यं परमं चैतद् वासुदेवं न यत्स्मरेत् ।। ५२ ।।’’  वासुदेव श्री कृष्ण का स्मरण न करना ही सबसे बड़ी हानि है , और यही सबसे बड़ा विघ्न है तथा यही दुर्भाग्य है | तथा श्रीमद्भागवत में भी कहा है कि –‘‘येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्  त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः |

आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ||१०.२.३२||’’ कमलनयन ! जो लोग आपके चरण कमलों की शरण नहीं लेते तथा आपके प्रति भक्ति भाव से रहित होने के कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है , वे अपने को झूठ-मूठ मुक्त मानते हैं | वास्तव में तो वे बद्ध ही हैं | वे यदि बड़ी तपस्या और साधना का कष्ट उठाकर किसी प्रकार ऊंचे-से-ऊंचे पदपर भी पहुंच जायँ , तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं |    || ४० || 

  || मूल उपनिषद ||

वेणुनादविनोदाय गोपालायाहिमर्दिने ।

कालिन्दीकूललोलाय लोलकुण्डलधारिणे ॥ ४१ ॥

                            || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

बंसी बजाने में उनको बहुत आनंद आता है, कृष्णोपनिषद में कहा है कि — ‘‘वंशस्तु भगवान् रुद्रः।’’  भगवान रुद्र वंश (वंशी) बने हुए हैं।  वंशी साक्षात् रुद्र ही हैं।  कालिय नाम के सर्प के फनों पर नर्तन करके उसका मद भङ्ग कर  मानमर्दन करने वाले, यमुना के किनारे विहार चपल होकर आनंदित रहने वाले और रास करने वाले, जिनके कानों में स्थित कुण्डल गतिशीलता के कारण हिलते हुए झिलमिला रहे हैं, हिलते हुए कुण्डलों को धारण करने वाले, उनको नमस्कार है । || ४१ || 

  || मूल उपनिषद ||

वल्लवीवदनाम्भोजमालिने नृत्यशालिने ।

नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमोनमः ॥ ४२॥

                                   || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

चारों तरफ गोपियां नृत्य कर रही हैं और बीच में श्री कृष्ण हैं तो ऐसा  लगता है मानो गोपियों के मुख कमलों की  माला पहने हुए हैं अथवा नए नए कमलों की माला पहनने वाले और नृत्य करने वाले, नृत्यशील; जो शरणागत हैं उनका पालन करने वाले ‘‘भक्तवत्सलः स्वयमेव सर्वेभ्यो मोक्षविघ्नेभ्यो भक्तिनिष्ठान् सर्वान् परिपालयति’’ त्रिपाद विभूति महानारायणोपनिषत् |   ऐसे भक्तवत्सल जो सभी प्रकार के मोक्ष विघ्नों से भक्तिनिष्ठों का परिपालन करने वाले हैं | वाल्मीकि रामायण के  युद्ध काण्ड में विभीषण को उद्देश्य करके सुग्रीव के प्रति श्री राम कहते हैं  ‘‘सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते !! अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम !! (वा रा ६/१८/३३ ) अर्थ:- ‘जो एक बार भी मेरे शरण होकर कहता है, मैं तुम्हारा हूँ, (तुम मुझे अपना लो ) तो मैं उसे सब भूतों से अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है !’ इसपर भी मनुष्य उनके शरण होकर अपना कल्याण  नहीं करता, यह बड़े आश्चर्य-की बात है ! गरुड़ पुराण के आचारकाण्ड में  भगवद्भक्ति विवरण नाम के अध्याय में भी यही बात कुछ दूसरे शब्दों में दोहराई गयी है ‘‘दयां कुरु प्रपन्नाय तवास्मीति च यो वदेत् । अभयं सर्वभूतेभ्यो दद्यादेतद्व्रतं हरेः ॥ १,२२७.११ ॥’’ जो भक्त कहता है कि मैं तुम्हारा हूं , उसको सभी प्राणियों से अभय कर देते हैं | यह श्रीहरि का नियम है | अतः हे हरि ! शरणागत के ऊपर कृपा कीजिए |  ’’ श्री (लक्ष्मी से युक्त) वेदप्रतिपाद्य कृष्ण को बारंबार नमस्कार है ।  || ४२ || 

  || मूल उपनिषद ||

नमः पापप्रणाशाय गोवर्धनधराय च ।

पूतनाजीवितान्ताय तृणावर्तासुहारिणे ॥ ४३॥

                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

पाप का, कपट का, दम्भ का, छल का नाश करने वाले  { निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। } अथवा निगूहनं पापं ,( पा ,रक्षणे , अपगता पा, रक्षा यस्मात् इति पापः ) भगवान श्रीकृष्ण पाप एवं पापी -असुरों के विध्वंसक हैं , ‘‘न तथा ह्यघवान् राजन् पूयेत तप आदिभिः । यथा कृष्णार्पितप्राणः तत्पूरुषनिषेवया ॥ ६.१.१६ ॥’’ श्री शुकदेव जी ने कहा  परीक्षित ! पापी पुरुष की जैसी शुद्धि भगवान को आत्मसमर्पण करने से और उनके भक्तों का  सेवन करने से होती है , वैसी तपस्या आदि द्वारा नहीं होती || १६ || पुरन्दर का मद भङ्ग करने के लिए गोवर्धन नाम वाले पर्वत को उन्होंने धारण किया था तथा  (ब्रजवासियों की रक्षा हेतु अपने हाथ की एक उंगली पर) गोवर्धन पर्वत को जो धारण करने वाले हैं,  दूध पीने के बहाने पूतना के जीवन का अंत  करने वाले , हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के अध्याय ६  में कथा है कि पूतना (उलूकिका) एक  पक्षिणी के रूप में आई और बाद में उसने स्त्री रूप धारण किया  ‘‘कस्यचित्त्वथ कालस्य शकुनी वेषधारिणी । धात्री कंसस्य भोजस्य पूतनेति परिश्रुता ।। २२।। पूतना नाम शकुनी घोरा प्राणिभयंकरी । आजगामार्द्धरात्रे वै पक्षौ क्रोधाद् विधुन्वती ।। २३ ।।’’  वैशम्पायन जी कहते हैं — जनमेजय ! कुछ काल के बाद ब्रज में आधी रात के समय क्रोधपूर्वक अपने दोनों पंख हिलाती हुई पक्षिणी का वेश धारण किये एक राक्षसी आई  | वह भोजराज कंस की धाय थी , उसका नाम पूतना था | पूतना नाम वाली वह घोर पक्षिणी समस्त प्राणियों के लिये भयंकर थी || २२ – २३ ||  ‘‘निलिल्ये शकटस्याक्षे प्रस्रवोत्पीडवर्षिणी । ददौ स्तनं च कृष्णाय तस्मिन् सुप्ते जने निशि।। २५ ।। तस्याः स्तनं पपौ कृष्णः प्राणैः सह विनद्य च । छिन्न स्तनी तु सहसा पपात शकुनी भुवि ।। २६ ।।’’ वह मानवी स्त्री का वेश धारण करके छकड़े के धुरे के नीचे छिप गयी | उस समय उसके स्तनों में इतना दूध बढ़ आया था कि उनमें पीड़ा होने लगी थी , इसीलिये वह दूध की वर्षा सी करने लगी | उस निशीथ-काल में जब सब लोग सो गये थे , उसने कृष्णके मुख में अपना स्तन दे दिया || २५ || लाला कन्हैया उस स्तन को उसके प्राणों के साथ ही पी गया , और वह पक्षिणी घोर चीत्कार करके सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी || २६ ||  तथा भागवत के दशम स्कंध के छठे अध्याय में वर्णन  इस प्रकार है —

‘‘तस्मिन् स्तनं दुर्जरवीर्यमुल्बणं ।  घोराङ्‌कमादाय शिशोर्ददावथ । गाढं कराभ्यां भगवान् प्रपीड्य तत्  प्राणैः समं रोषसमन्वितोऽपिबत् ॥ १०. ६ .१० ॥’’ इधर भयानक राक्षसी पूतना ने बालक श्रीकृष्ण को अपनी गोद में लेकर उनके मुंह में अपना स्तन दे दिया , जिसमें बड़ा भयंकर और किसी प्रकार भी पच न सकनेवाला विष लगा हुआ था | भगवान ने क्रोध को अपना साथी बनाया और दोनों हाथों से उसके स्तनों को जोरसे दबाकर उसके प्राणोंके साथ उसका दूध पीने लगे (वे उसका दूध पीने लगे और उनका साथी क्रोध प्राण पीने लगा) || १० ||  भगवान् रोषके साथ पूतना के प्राणों सहित स्तनपान करने लगे , इसका यह अर्थ प्रतीत होता है कि (रोषाधिष्ठातृ-देवता रुद्र) ने प्राणोंका पान किया और श्रीकृष्ण ने स्तन का |   तथा  तृणावर्त नाम के दैत्य के प्राणों का हरण करने वाले गोपाल को नमस्कार है ।  || ४३ || 

  || मूल उपनिषद ||

निष्कलाय विमोहाय शुद्धायाशुद्धवैरिणे ।

अद्वितीयाय महते श्रीकृष्णाय नमोनमः ॥ ४४॥

                             || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

निष्कल माने जो लौकिक कलाओं रहित है सो , अन्यथा ‘‘एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति‘ (बृ. उ. ४. ३. ३२ ) •’’  तथा प्रश्नोपनिषद वाली ‘‘षोडशकलोऽयं पुरुषः’’इन श्रुतियों से विरोध हो जायेगा , अर्थात् स्वरूप से शुद्ध द्रष्टा मात्र होनेसे जो निर्विशेष है, वही निष्कल है | मोह से रहित, जिनके अन्तः करण से मोह निकल गया है (अविवेक, भ्रम, संशय यह सब मोह के पर्याय हैं ), ये सब जिसमें नहीं है अथवा मल , विक्षेप अज्ञानादि से रहित ऐसे शुद्धस्वरूप , जो निर्मल शुद्ध स्वरूप हैं तथा जो लोग अशुद्ध हैं , दुष्ट हैं ,पापी हैं उनके जो वैरी हैं,  और जो अद्वितीय हैं  | ‘‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म { छान्दोग्य ६।२।१ ’’ उनके सिवाए दूसरा कोई नहीं है, सबसे बड़े, पूज्य, सर्वश्रेष्ठ उन कृष्ण को बार बार नमस्कार है । सरलार्थ :- जो लौकिक कलाओं से परे हैं, जिनमें मोह का सर्वथा अभाव है, जो स्वरूप से ही परम पवित्र एवं श्रेष्ठ हैं, अशुद्ध स्वभाव एवं आचरण से युक्त रहने वाले असुरों के जो  शत्रु हैं और जिनसे पृथक् और कोई नहीं है, ऐसे महान भगवान् श्रीकृष्ण’ को बारंबार प्रणाम है॥ इस प्रकार स्तुति करके उनसे कृपा प्रार्थना  करते हैं |  || ४४ || 

  || मूल उपनिषद ||

प्रसीद परमानन्द प्रसीद परमेश्वर ।

आधिव्याधि भुजङ्गेन दष्टं मामुद्धर प्रभो ॥ ४५॥

                                   || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

हे देवाधिदेव ! हे परमानंद  स्वरूप परमेश्वर ! आप   प्रसन्न हों , कृपा करें । आधि माने मानसिक तनाव, व्याधि माने शारीरिक बीमारी, ये आधि-व्याधि रुपी सर्प के द्वारा मुझे डसा गया है; मैं उस सर्प के द्वारा ग्रसित हूँ मुझे उसके मुँह से निकालिये, मेरा उद्धार कीजिये, हे मालिक !  सर्वशक्तिमान, सर्वसमर्थ, हे प्रभो ! मेरी रक्षा करो, मेरा उद्धार करो  । कृपा करके मेरा उन व्यथाओं से उद्धार करें | आपकी कृपा प्राप्ति में जो विक्षेप आदि  बाधक तत्व हैं उनका नाश कीजिए | || ४५ || 

  || मूल उपनिषद ||

श्री कृष्ण रुक्मिणीकान्त गोपीजनमनोहर ।

संसारसागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ॥ ४६॥

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

हे श्री कृष्ण ! हे रुक्मिणी के लिए प्रिय ! हे रुक्मिणीरमण ! जैसे आपने रुक्मिणी के मनोरथों को पूर्ण किया था वैसे ही आप मेरे मनोरथों को पूरा करेंगे इस आशय से रुक्मिणी कान्त यह सम्बोधन है | राधा आदि गोपीजन के मन को हरण करने वाले श्याम सुन्दर ! जैसे आपने उन गोपियों का हृदय हरण किया था वैसे ही मेरा भी कर लीजिये ! अहंता , ममता रूपी  संसार सागर में मुझ डूबते हुए का, हे जगद्गुरो  ! मेरा उद्धार कीजिये । गुरु शब्द का अर्थ है सभी प्रकार के अज्ञानान्धकार मिटाने वाला  ‘‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’’   इस श्रुति के अनुसार आप जगद्गुरु होने के कारण आप मेरा भी अन्धकार अवश्य ही नाश करेंगे इस आशय से जगद्गुरु यह सम्बोधन है | भागवत के दशम स्कंध के नब्भे मे   अध्याय में कहा है कि — ‘‘याः सम्पर्यचरन् प्रेम्णा पादसंवाहनादिभिः ।

 जगद्‌गुरुं भर्तृबुद्ध्या तासां किं वर्ण्यते तपः ॥ १०.९०.२७ ॥’’  जिन बड़भागिनी स्त्रियों ने जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मानकर परम प्रेम से उनके चरण कमलों को सहलाया , उन्हें नहलाया-धुलाया , खिलाया-पिलाया , तरह-तरह से उनकी सेवा की , उनकी तपस्या का वर्णन तो भला , किया ही कैसे जा सकता है ||२७||  तथा भागवत के ही पांचवें स्कंध के चौबीसवें अध्याय में श्री शुकदेव जी कहते हैं कि   –‘‘यस्य भगवान् स्वयमखिलजगद्गुरुर्नारायणो द्वारि गदापाणिरवतिष्ठते निजजनानुकम्पितहृदयो येनाङ्गुष्ठेन पदा दशकन्धरो योजनायुतायुतं दिग्विजय उच्चाटितः ॥ ०५.२४.०२७ ॥’’  अपने भक्तों के प्रति भगवान का हृदय दया से भरा रहता है | इसीसे अखिल जगत के परम पूज्य गुरु भगवान नारायण हाथ में गदा लिये सुतल लोक में राजा बलि के द्वार पर सदा उपस्थित रहते हैं | एक बार जब दिग्विजय करता हुआ घमंडी रावण वहाँ पहुंचा , तब उसे भगवान ने अपने पैर के अंगूठे की ठोकर से ही लाखों योजन दूर फेंक दिया था | तथा अष्टम स्कन्ध के गजेन्द्र मोक्ष प्रसंग में नारायण को ही जगद्गुरु बताया है | यथा — ‘‘सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो

दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्

उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रान्

नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ||८.३.३२||’’  सरोवर के भीतर ग्राह ने गजेन्द्र को पकड़ रखा था और वह अत्यन्त व्याकुल होरहा था | जब उसने देखा कि आकाशमें गरुड़पर सवार होकर हाथमें चक्र लिये भगवान् श्रीहरि आ रहे हैं, तब उसने अपनी सूँडमें कमलका एक सुन्दर पुष्प लेकर ऊपरको उठाया और बड़े कष्टसे बोला —- नारायण ! जगद्गुरो ! भगवन् ! आपको नमस्कार है || ३२||  शंकराचार्य की परम्परा में भी नारायण को ही आदि गुरु के रूपमें स्वीकारा है | यथा –नारायणं पद्मभवं वशिष्ठं, शक्तिं च तत्पुत्र पराशरं च। व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं, गोविन्द योगीन्द्र मथास्यशिष्यम्॥  श्री शंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यम् । तं त्रोटकं वार्तिककारमन्यान्, अस्मद् गुरून् सन्तत मानतोस्मि।। इसी प्रकार स्कन्द आदि अनेक पुराणों में नारायण का जगद्गुरुत्व प्रतिपादित है ‘‘वसुदेव सुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।’’  कुछ लोग कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने आर्य चरित्र को छोड़कर कन्या के रूप में ही राधा को स्वीकार कर लिया था सो बात ठीक नहीं है क्योंकि भागवत में ही यद्यपि श्री शुकदेवस्वामिपाद ने इस शंका का निराकरण कर दिया है –यथा  ‘‘गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम् ।

 योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥ १०.३३.३६॥’’ गोपियों के, उनके पतियों के और सम्पूर्ण शरीर धारियों के अंतःकरणों में  जो आत्मा रूप से विराजमान हैं , जो अन्तर्यामी , सबके पति ,सबके साक्षी और सब की परमगति हैं , वही तो अपना दिव्य – चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करके यह लीला कर रहे हैं || ३६ ||  तथापि ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड के अध्याय १५ में  ‘‘पुनर्ननाम तां भक्त्या विधाता जगतां पतिः ।। तदा ब्रह्मा तयोर्मध्ये प्रज्वाल्य च हुताशनम् ।। १२० ।।  तब लोकनाथ ब्रह्मा ने पुनः भक्ति – भाव से श्री राधा को प्रणाम किया | उस समय उन्होंने श्री राधा और श्रीकृष्ण के बीच अग्नि की स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया || १२० || 

हरिं संस्मृत्य हवनं चकार विधिना विधिः।।

 उत्थाय शयनात्कृष्ण उवास वह्निसन्निधौ ।। १२१ ।। 

    फिर श्रीहरि के स्मरण पूर्वक विधाता ने विधिपूर्वक उस अग्नि में आहुति डाली | इसके बाद श्रीकृष्ण पुष्प शय्या से उठकर अग्नि के समीप बैठे || १२१ || 

ब्रह्मणोक्तेन विधिना चकार हवनं स्वयम् ।।

 प्रणमय्य पुनः कृष्णं राधां तां जनकः स्वयम् ।। १२२ ।। 

    फिर ब्रह्माजी की बताई हुई विधि से उन्होंने स्वयं हवन किया | तत्पश्चात् श्रीकृष्ण और राधा को प्रणाम करके ब्रह्माजी ने स्वयं पिता के कर्तव्य का पालन करते हुए || १२२ || कौतुकं कारयामास सप्तधा च प्रदक्षिणम् ।।

 पुनः प्रदक्षिणां राधां कारयित्वा हुताशनम् ।। १२३ ।।

    उन दोनों को कौतुक (वैवाहिक मंगल कार्य) कराए और सात बार अग्निदेव की परिक्रमा करवाई || १२३ ||

 प्रणमय्य ततः कृष्णं वासयामास तं विधिः ।। 

तस्या हस्तं च श्रीकृष्णं ग्राहयामास तं विधिः ।। १२४।।

    इसके बाद राधा से अग्नि की परिक्रमा करवा कर श्रीकृष्ण को प्रणाम करके राधा को उनके पास बैठाया | फिर श्रीकृष्ण से राधा का हाथ ग्रहण कराया || १२४ ||   

वेदोक्त सप्तमन्त्रांश्च पाठयामास माधवम् ।।

संस्थाप्य राधिकाहस्तं हरेर्वक्षसि वेदवित् ।। १२५ ।।

    और माधव से सात वैदिक मन्त्र पढ़वाये | तत्पश्चात् वेदज्ञ विधाता ने श्रीहरि के वक्षस्थल पर राधिका का हाथ रखवाकर || १२५ || 

श्रीकृष्णहस्तं राधायाः पृष्ठदेशे प्रजापतिः ।।

स्थापयामास मन्त्रांस्त्रीन्पाठयामास राधिकाम् ।।१२६।।

    राधा के पृष्ठ देश में श्रीकृष्ण का हाथ रखवाया और राधा से तीन वैदिक मन्त्रों का पाठ करवाया || १२६ ||   

पारिजातप्रसूनानां मालां जानुविलम्बिताम् ।।

श्रीकृष्णस्य गले ब्रह्मा राधाद्वारा ददौ मुदा ।। १२७ ।।

    तदनन्तर ब्रह्मा ने प्रसन्नतापूर्वक पारिजात के पुष्पों की आजानुलम्बिनी माला श्री राधा के हाथ से श्रीकृष्ण के गले में डलवाई || १२७ || 

प्रणमय्य पुनः कृष्णं राधां च कमलोद्भवः ।।

राधागले हरिद्वारा ददौ मालां मनोहराम्।।

पुनश्च वासयामास श्रीकृष्णं कमलोद्भवः ।। १२८ ।।

     तत्पश्चात् कमल जन्मा विधाता ने पुनः श्री राधा और श्रीकृष्ण को प्रणाम करके श्रीहरि के हाथ से श्री राधा के कंठ में मनोहर माला डलवाई | फिर श्रीकृष्ण को बैठाया || १२८ || 

तद्वामपार्श्वे राधां च सस्मितां कृष्णचेतसम् ।।

पुटाञ्जलिं कारयित्वा माधवं राधिकां विधिः ।। ।।१२९।।

      और उनके वाम पार्श्व में मंद मंद मुस्कराती हुई श्रीकृष्णहृदया राधाको भी बैठाया | इसके बाद उन दोनों से हाथ जुड़वाकर || १२९ || 

       पाठयामास वेदोक्तान्पञ्च मन्त्रांश्च नारद ।।

प्रणमय्य पुनः कृष्णं समर्प्य राधिकां विधिः ।। १३० ।।

कन्यकां च यथा तातो भक्त्या तस्थौ हरेः पुरः ।।

एतस्मिन्नन्तरे देवाः सानन्दपुलकोद्गमाः ।। १३१।।

दुन्दुभिं वादयामासुश्चानकं मुरजादिकम्।।

पारिजातप्रसूनानां पुष्पवृष्टिर्बभूव ह ।। १३२ ।।

     पाँच वैदिक मन्त्र पढ़वाये | तत्पश्चात् विधाता ने पुनः श्रीकृष्ण को प्रणाम करके जैसे पिता अपनी पुत्री का दान करता है उसी प्रकार राधिका को उनके हाथ में सौंप दिया और भक्तिभाव से वे श्रीकृष्ण के सामने खड़े हो गये | इसी बीच में आनन्दित और पुलकित हुए देवता दुन्दुभि (धौंसा) , आनक (नगाड़ा) , मुरज (पखावज) आदि बाजे बजाने लगे | और विवाहमण्डप के पास पारिजात के फूलोंकी वर्षा होने लगी |  || १३० || १३१ ||१३२ || 

जगुर्गन्धर्वप्रवरा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।।

तुष्टाव श्रीहरिं ब्रह्मा तमुवाच ह सस्मितः ।।१३३।।

युवयोश्चरणाम्भोजे भक्तिं मे देहि दक्षिणाम्।।

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा तमुवाच हरिः स्वयम् ।।१३४।।

मदीय चरणाम्भोजे सुदृढा भक्तिरस्तु ते ।।स्वस्थानं गच्छ भद्रं ते भविता नात्र संशयः ।। १३५ ।।’’

श्रेष्ठ गंधर्वों ने गीत गाए और झुंड – की – झुंड अप्सरायें नृत्य करने लगीं | ब्रह्माजी ने श्रीहरि की स्तुति की और मुस्कराते हुए उनसे कहा —-  ‘आप दोनों के चरण कमलों में मेरी भक्ति बढ़े , यही मुझे दक्षिणा दीजिये | ’ ब्रह्माजी की बात सुनकर स्वयं श्रीहरि ने उनसे कहा — ब्रह्मन् ! मेरे चरणकमलों में तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति हो | अब तुम अपने स्थान को जाओ | तुम्हारा कल्याण होगा , इसमें संशय नहीं है | ||१३३ || १३४ || १३५ ||  

इस प्रकार ब्रह्मा जी ने उनका विवाह करवाया अतः स्पष्ट रीति से शंका का निराकरण हो जाता है | तथा श्रीकृष्ण का जगद्गुरुत्व सिद्ध होता है | || ४६ || 

  || मूल उपनिषद ||

केशव क्लेशहरण नारायण जनार्दन ।

गोविन्द परमानन्द मां समुद्धर माधव ॥ ४७॥

                                  || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

हे केशव ! हे ब्रह्मा और शिव के ईश्वर, हरिवंश पुराण के अठासीवें अध्याय में शिवजी कहते हैं कि — ‘‘क इति ब्रह्मणो नाम ईशोऽहं सर्वदेहिनाम् । आवां तवाङ्गसम्भूतौ तस्मात्केशवनामवान् ।। ४८ ।।’’  अर्थात ‘क’-ब्रह्या, ईश-सभी प्राणियों का ‘ईश’ मैं शंकर-ये दोनों आपके अंग से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए आपका नाम केशव है।  ( क माने ब्रह्मा और ईश माने शंकर इन दोनों को वं माने अमृत रूपी सुख देने वाले =केशव ) अतः ये केशव ही अमृतस्वरूप हैं यह बात श्रुति में प्रसिद्ध है  ‘‘चतुर्मुखादीनां सर्वेषामपि विना विष्णु भक्त्या कल्पकोटिभिर्मोक्षो न विद्यते ।’’   “त्रिपाद विभूति महानारायणोपनिषत्”   हे क्लेश ( पाँच क्लेश – अज्ञान, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ) हरण करने वाले ! (सकल संतापों का शमन करने में समर्थ)   हे नारायण ! (नार माने ज्ञान और ज्ञान के अयन माने आश्रय, ज्ञान स्वरूप ) और जनार्दन, जना कहते हैं माया को और माया का अर्दन माने उसको चूर चूर करके नष्ट करने वाले अथवा जो दुर्जन लोग हैं उसको मारने वाले, ( माँ माने लक्ष्मी और धव माने पति = माधव ) अथवा जैसा कि हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अठासीवें अध्याय में शिवकृत विष्णु स्तुति के प्रसंग में  शिवजी के वाक्य अनुसार ‘‘मा विद्या च हरे प्रोक्ता तस्या ईशो यतो भवान् । तस्मान् माधव नामासि धवः स्वामीतिशब्दितः ।। ४९ ।।’’ हे हरे ! ‘मा’ कहते हैं विद्या को | और आप उसके ‘धव’ (ईश्वर या स्वामी) हैं , इसलिए ‘माधव’ नाम से प्रसिद्ध हैं | धव – शब्द स्वामी का वाचक है || ४९ ||   हे माधव आप मेरा ठीक ठीक प्रकार से उद्धार कीजिये जिससे मुझमें पुनः दोषों का उदय न हो । ॥ ४७॥

  || मूल उपनिषद ||

  अथैवं स्तुतिभिराराधयामि । यथा यूयं तथा पञ्चपदं जपन्तः 

श्रीकृष्णं ध्यायन्तः संसृतिं तरिष्यथेति होवाच हैरण्यः । ॥ ४८ ॥

अमुं पञ्चपदं मनुमावर्तयेद्यः स यात्यनायासतः केवलं तत्पदं तत् ।

 अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षदिति । ॥ ४९ ॥

तस्मात्कृष्ण एव परमं देवस्तं ध्यायेत् । तं रसयेत् । तं यजेत् । तं भजेत् । ॐ तत्सदित्युपनिषत् ॥ ५० ॥ पूर्वतापनी श्रीकृष्णोपनिषत् समाप्ता ॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

अथाहं स्तुतिभिराराधयामि भगवन्तं मन्त्रप्रवृत्तिसिद्ध्यर्थमित्याह , अथैवमिति | ‘अथ’ अस्मिन् तुष्टेऽपि  

  ‘एवं’ पूर्वोक्ताभिः , ‘स्तुतिभिः’ अहं परमेश्वरं यथा आराधयामि पञ्चपदं जपन्तः 

   ‘यूयं’ तथा  तेन प्रकारेण श्रीकृष्णं ध्यायन्तः ‘संसृतिं’ संसारसमुद्रं, तरिष्यथ, इति हिरण्यजः ब्रह्मा , मुनीन् प्रति उवाच इत्यर्थः | ॥ ४८ ॥

  अथ दयावती श्रुतिरस्मान् प्रत्याह | ‘अमुं’ वासुदेवात्मकं ‘पञ्चपदं मन्त्रम्’ यः आवर्तयेत्   सः अनायासतः केवलं शुद्धं ‘तत्’ वासुदेवाख्यं , प्रसिद्धं पदं याति | उक्तं पदं मन्त्रेण विशदयति | एजनं कम्पनं स्वावस्थानप्रच्युतिः , तद्वर्जितं सर्वदैव एकरूपमित्यर्थः | तथा सर्वभूतेषु एकं | मनसो जवीय इति | ‘मनसः’ , अपि वेगवत्तरम् | ‘ एतत् ’पदं, ‘देवाः’ द्योतनकरणाः चक्षुरादीन्द्रियाणि , ‘न’ आप्नुवन्, न प्राप्नुवन्तः चक्षुरादिप्रवृत्तेर्मनोव्यापार पूर्वकत्वात् ‘मनसः’ अपि जवीयः न तच्चक्षुरादिगम्यम् इत्यर्थः | मनसोऽपिजवीयत्वे हेतुमाह , पूर्व्वमर्शदिति | क्षणमात्रात् ब्रह्मलोकादिकं संकल्पयतः मनसः अवभासकं साक्षि मनसोऽपि ‘पूर्वं,’ ब्रह्मलोकादिकं अर्शत् प्राप्तं , व्योमवत् व्यापित्वात् इत्यर्थः |  ‘इति’ शब्दो मन्त्रसमाप्त्यर्थः | ॥ ४९ ॥

  अतः सर्वोत्कृष्टत्वात् ध्यान रसन भजनान्यस्यैव कर्तव्यानि इत्युपसंहरति | ‘तस्मात्’ अविमुक्त चिदेकरसत्वात्  ‘कृष्ण एव परो देवः,’  ‘तं’ ध्यायेत् , चिन्तयेत् , तं रसयेत् , तं जपेत् , 

  ‘ तं भजेत् ’ प्रेमपूर्वकमाराधयेत् | कीदृशम् , ‘ओं तत् सत्’   शव्दत्रयप्रतिपाद्यम् इत्यर्थः | 

     ‘इति’ शव्दः पूर्वतापनीयसमाप्त्यर्थः  | तदुक्तं गीतायां भगवता  ओंतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।17.23।। ॥ ५०॥ 

  इति श्रीमद्विश्वेश्वरविरचितायां गोपालतापनीटीकायां गोपीनाथस्य ध्यानरसनभजन निरूपणं नाम श्रीगोपालपूर्वतापनीयोपानिषट्टीका समाप्ता ||   

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

अब इसके बाद ब्रह्माजी इस प्रकार अपनी प्रार्थना, स्तुति को समाप्त करके  उन ऋषियों को उपदेश करते हैं और कहते हैं कि मैं इन प्रार्थनाओं के द्वारा,  मंत्र को सिद्ध करने के लिये भगवान की आराधना करता हूँ । और जैसे मैं आराधना करता हूँ वैसे तुम सब लोग भी  ये पांच पद वाला, पांच शब्दों वाला जो गोपाल मंत्र है इसका जाप करते हुए, श्री कृष्ण का , कमलाकांत का ध्यान करते हुए इस संसार (अहंता ममता रूपी संसार) से तर जाओगे, इसे पार कर  जाओगे |  ब्रह्माजी ने कहा कि संसार सागर पार करने के बाद भी भजन ही कर्तव्य है । अब करुणामयी श्रुति माता स्वयं हमें उपदेश करतीं हैं कि यह जो इस पांच पद वाले वासुदेव के मंत्र को दुहराता है वो बिना प्रयास के ही ( बिना श्रम के ही निष्काम भजन के मार्ग से )—- 

‘‘भक्तियोगो निरुपद्रवः।भक्तियोगान्मुक्तिः । 

बुद्धिमतामनायासेनाचिरादेव तत्त्वज्ञानं भवति ।’’ -“त्रिपाद विभूति महानारायणोपनिषत्”   वो जो केवल  ( प्रकृति और गुणों के संबंध से रहित जो केवल है सो ) वेद प्रतिपादित जो भगवत्पद है उस  शुद्ध अद्वैत मोक्ष  पद को प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार भक्तों का भगवद्धाम में गमन का निरूपण करके , भगवान विरुद्धधर्माश्रय हैं इस बात निरूपण करते हैं | (अनेजदेकं)  मन्त्रका ही विशद विवेचन करते हैं  |  ये कंपन रहित, अपने स्थान से कभी भी प्रच्युत न होने वाला , यह खुद कभी नहीं हिलता और बाकी सबको हिलाता रहता है | वह परब्रह्म नारायण किसी के भय से कांपने वाला नहीं है ।  ‘‘ भीषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः ’’ इन्हीं नारायण के भय से वायु चलता है, सूर्य इन्हीं डर से उदय होता है,इस प्रकार यह सबको चलाता है और खुद नहीं चलता और फिर कहते हैं कि (मनसो जवीयो ,मन से अधिक वेग वाला है क्योंकि सब जगह पहले से पंहुचा हुआ है)  सर्वदा एक रूप में ही स्थित रहने वाला  नित्य , सनातन फिर भी अनेक रूपों में दीखता है | ये है   विरुद्धधर्माश्रय परमात्मा |   ये एक हैं अर्थात् अद्वितीय हैं और मन से भी ज्यादा तीव्र गति वाले हैं अर्थात्  अत्यंत वेगवान हैं  |  ‘‘ यो मनसि तिष्ठन्मनसो’न्तरः, यं मनो न वेद, यस्य मनः शरीरम्, यो मनो’न्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ३.७.२० ॥’’॥बृहदारण्यकोपनिषत्॥ इस श्रुति के अनुसार मन के भी नियामक तथा मनसे भी अधिक वेगवान हैं भगवान | क्योंकि आकाश को कहीं जाना नहीं पड़ता, जो सब जगह पहले से ही विद्यमान है, मन में सबसे ज्यादा कम्पन है, सबसे ज्यादा हिलने वाले, मन से भी ज्यादा वेगवान, गति वान, भगवान हैं ।  देवता इनको दौड़ में नहीं पकड़ पाए, देवता माने हमारी ज्ञानेन्द्रियां { आँख ,कान , नासिका, रसना और त्वचा } इन इन्द्रियों के सभी अभिमानीदेवता मन से शक्ति लेकर ही कार्यान्वित होते हैं तो जब मन ही भगवान को नहीं पकड़ सकता तो देवता तो कहाँ से पकड़ पायेंगे | इसलिए ये देवताओं से पहले ही पहुँच जाते हैं |  क्योंकि ये भगवान क्षण मात्र में ही ब्रह्मलोकादि समस्त भुवनों की सृष्टि संकल्प मात्र से ही कर देते हैं | इसलिए कृष्ण ही परम देव, सर्वोत्कृष्ट देव हैं, उनका ही ध्यान करें,माने चिन्तन करें ,उनका ही जपकरें , उनका ही भजन करें माने प्रेम पूर्वक आराधना करें |  उनका अनुसन्धान करें; अनुशीलन करें, उनका ही रस लें , उनकी पूजा करें, उनका सेवन करें; अनुभव करें ।इन्द्रियां और मन का व्यतिरेक कर देने पर जो शेष रहता है। वो जो है, वही नित्य है , सत्य है , सनातन है । यही उपनिषत् है |  यही रहस्य विद्या है | यही ब्रह्मविद्या है | ‘‘यस्यावतारकर्माणि गायन्ति ह्यस्मदादयः । न यं विदंति तत्त्वेन तस्मै भगवते नमः ॥ २. ६. ३७ ॥’’भागवत में बताया कि हम लोग केवल जिनके अवतार की लीलाओं का गान ही करते रहते हैं , उस परम तत्त्व का सम्यक् वर्णन करके गान करें – यह शक्य नहीं है। हम उसके तत्व को नहीं जानते — उन भगवान के श्रीचरणों में मैं नमस्कार करता हूँ || ३७ ||   ‘‘विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययाऽऽवृताः ॥’’ हम सभी भगवान की माया को नहीं जान सकते | क्योंकि हम उसी माया के घेरे में हैं | अर्थात् उनकी कृपा के बिना उन्हें जानना संभव नहीं है क्योंकि माया तो उन्हीं के वश में है | इसलिये एकं शास्त्रं देवकी पुत्र गीतं, एको देवो देवकीपुत्र एव , मंत्रोप्येकं तस्य नामानि यानि, कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।।  यही बात भगवान ने गीता के सत्रहवें अध्याय  में भी कही है कि ॐ , तत् और सत् — इन तीनों नामों से जिस परमात्मा का निर्देश दिया गया है, उसी परमात्मा ने सृष्टि के आदि में वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना की है। || ४८||४९||५०||

अब यहाँ प्रसंगवश मंत्रयोग के सोलह अंगों का वर्णन भी संक्षेप से कर देते हैं  |  

  भवन्ति मन्त्रयोगस्य षोडशाङ्गानि निश्चितम्!!

 यथा सुधांशोर्जायन्ते कला:षोडश शोभनाः || 

 भक्ति:शुद्धिश्चासनं च पञ्चाङ्गस्यापि सेवनम्!!

 आचारधारणे दिव्यदेशसेवनमित्यपि!!

  प्राणक्रिया तथामुद्रा तर्पणं हवनं बलि:!!

  यागो जपस्तथा ध्यानं समाधिश्चेति षोडश!!

 चंद्रमा की सोलह कलाओं की तरह मंत्रयोग भी  इन सोलह अङ्गो से परिपूर्ण  होता है |  

   १-भक्ति, भक्ति के मुख्यतः तीन प्रकार होते हैं १.वैधी २.रागात्मिका और तीसरी  परा माने विधान पूर्वक,  प्रेम पूर्वक और भावनात्मक  |  तथा नवधा भक्ति में इन तीनों प्रकारों का सम्मिश्रण है  |    

   २-शुद्धि, माने आंतर वाह्य पवित्रता | दिक् शुद्धि ,काल शुद्धि ,भू शुद्धि और भूतशुद्धि भी आवश्यक है |       

   ३-आसन, कुशासन , मृगचर्म , कम्बल तथा सिद्धासन , पद्मासन आदि | 

   ४-पञ्चाङ्ग सेवन, अपने इष्टदेव का पञ्चाङ्ग जैसे १ कवच ,२  हृदय ,३  स्तोत्र , ४ गीता और ५ सहस्रनाम |   

   ५-आचार, समयाचार या कौलाचार दूसरे शव्दों में दक्षिणाचार या वामाचार | तथा मिश्राचार |

   ६-धारणा, माने |मन को शरीर के भीतर किसी स्थान में  या ,मूर्ति आदि में स्थिर रखना | 

   ७-दिव्यदेशसेवन, माने कोई तीर्थ , यज्ञशाला या देवालय |

   ८-प्राणक्रिया, माने प्राणायाम |

   ९-मुद्रा, मुद्रायें अनेक हैं सामान्यरूपसे आवाहनादि छह मुद्राओं का ज्ञान आवश्यक है |

 १ . आवाहनी मुद्रा – दोनों हाथों की अञ्जलि बनाने को आवाहनी मुद्रा कहते हैं ।

 २ . स्थापनी मुद्रा –  ” आवाहनी मुद्रा को अधोमुख करने से स्थापनी मुद्रा बन जाती है ।

 ३ . सन्निधान मुद्रा  – ” अंगूठों को ऊपर उठाकर दोनों मुट्ठियों को परस्पर मिलाने से सन्निधान मुद्रा बनती है । ४ . सन्निरोध मुद्रा – ” अङ्‍गूठों को भीतर कर दोनों मुट्ठियों को परस्पर मिलाने से सन्निरोध मुद्रा बनती है । 

५ . सम्मुखीकरण मुद्रा –  ” हृदय प्रदेश में अञ्जलि बनाने को सम्मुखीकरण  मुद्रा कहते हैं ।

 ६ .अवगुण्ठन मुद्रा  – ” दाहिने हाथ की मुट्ठी बनाकर मध्यमा एवं तर्जनी को अधोमुख कर चारों ओर घुमाने से अवगुण्ठन मुद्रा बनती है ।   

   १०-तर्पण, देवर्षिपितृ तर्पण तो सामान्य है , यहाँ मुख्य देव का आवरणोंके साथ तर्पण |

   ११-हवन, माने जप का दशांश हवन |

   १२-बलि, माने उपहार , द्रव्य समर्पण या आत्मसमर्पण |

   १३-याग,  माने अन्तर्याग और वहिर्याग | चक्र भेदन ही अंतर्याग है और उपचार पूजा ही वहिर्याग है | 

   १४-जप, माने इष्टमन्त्रका जप | मानसिक , उपांशु तथा वाचिक प्रयोजन भेद से अनेक नियम हैं | 

   १५-ध्यान, माने इष्टका ध्यान | कार्यब्रह्मका ध्यान और कारणब्रह्मका ध्यान |

   १६- समाधि , माने त्रिपुटी का लय { ज्ञाता , ज्ञान ,ज्ञेय } अथवा महाभाव का नाम ही समाधि है |

ॐ भद्रं कर्णेभिः श‍ृणुयाम देवाः ॥ भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिः ॥ व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 

हे देवताओ ऐसी कृपा करो की हम कानों से (कानों के देवता हैं (दिक्) दिशा रुपी जो देवता हैं वो हमारे ऊपर ऐसी कृपा करें कि कानों से हम भद्र (यानी कल्याण) का श्रवण करें । भद्र और सुभद्र, ये सब भगवान के नाम हैं । श्रीमद्भागवत में कहा है – तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ,श्रवण मंगलम् श्री मदाततम् , । विष्णुसहस्रनाम में भी –   विश्रुतात्मा ;  शुचिश्रवाः ;पुण्यश्रवणकीर्तनः ;   पवित्रं मङ्गलं परम्‌    ऐसे नाम हैं, तो हम कानों से उन परमात्मा का ही परम तत्व का ज्ञान ही श्रवण करें और आँखों से हम केवल भद्र यानि कल्याण ही देखें, यज्ञ करें, स्थिर अंगों के द्वारा आपकी स्तुति करें । और जब तक हमारी आयु रहे हम उस परमात्मा देव की सेवा के लिए ही प्रयत्नशील हों ।

महा यशस्वी इन्द्र हमारे लिए कल्याण साधन उपस्थित करें, हमारे लिए अनुकूल हो जाएं क्योंकि इन्द्र हाथों के देव हैं और हाथों से ही कर्म का अनुष्ठान होता है इसलिये कर्म की ही प्रशंसा होती है अतः इन्द्र से प्रार्थना है कि हमारा कर्म यशस्वी हो , सनातन हो | { स्वस्ति शब्दो सनातन वचनः } सारे विश्व को जानने वाले और पोषण करने वाले  सूर्य देव हैं वे हमारे लिए स्वस्ति या कल्याण का सम्पादन करें । जिनकी गति कहीं अवरुद्ध नहीं होती है, ऐसे अरिष्टनेमि भगवान गरुड़, तार्क्ष्य माने गरुड़, जो कि शब्दब्रह्म रूप हैं | क्योंकि शब्द के वाहन पर चढ़कर ही भगवान आते हैं अतः वे गरुड़  हमारे लिए स्वस्ति का, कल्याण का विधान करें । विस्तृत जो वाणी है, उसके जो पति हैं, ( बृहती पतिः = बृहस्पतिः ) वाक्पति बृहस्पति वो गुरुतत्व हमारे लिए स्वस्ति या कल्याण का विधान करें । इसके बाद “ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः” ऐसा तीन बार कहते हैं, तो तीनों तापों की (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) त्रिविध तापों की शांति हो । गोपाल पूर्वतापनि उपनिषद, के गोपाल तत्व का प्रतिपादन करने वाले रहस्य वर्णन का पूर्व भाग यहाँ  पूरा हुआ । इति गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत्समाप्ता ॥

    श्रीगोपालतापनी उत्तरभागः 

(गोपालोत्तरतापिन्युपनिषत्) गोपालतापन्यां उत्तरभागः | 

ॐ एकदा हि व्रजस्त्रियः सकामाः शर्वरीमुषित्वा सर्वेश्वरं गोपालं कृष्णमूचिरे । उवाच ताः कृष्ण ॥ १ ॥

अनु कस्मै ब्राह्मणाय भक्ष्यं दातव्यं भवति दुर्वाससेति ।॥ २ ॥

 कथं यास्यामोऽतीर्त्वा  जलं यमुनायाः । यतः श्रेयो भवति |॥ ३ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

   पूर्वतापन्यां गोपीनाथस्य ध्यानरसनभजनैः सुनिष्पन्नचित्तस्य वासुदेव एव मोक्षदो नान्य इति दर्शयितुं तस्य कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुमैश्वर्यप्रख्यापिकामाख्यायिकां बोधसौकर्यार्थमारचयति , एकदाहीति |   ‘एकदा’ एकस्मिन्काले,   ‘व्रजस्त्रियः’ गोपिकाः, ‘सकामाः,’  ‘शर्वरीं’ रात्रीं , सन्निधौ उषित्वा |  ‘सर्वेश्वरम्’, इति नृसिंहादिव्यावृत्यर्थमुक्तं |  ‘गोपालम्’ इति बलदेवव्यावृत्यर्थं | कृष्णमिति |   ‘कृष्णं’  कृष्णं प्रति वक्ष्यमाणमर्थं ऊचिरे ,  ‘कृष्णः’ च  ‘ताः’ प्रति वक्ष्यमाणमर्थं   ‘उवाच’ , इत्यर्थः |॥ १ ॥

  सामान्यतः आख्यायिकां सूचयित्वा विशेषतस्तां दर्शयिष्यन् आदौ स्त्रीणां वचनमाह , अनु कस्मै इति | ‘अनु कस्मै ब्राह्मणाय’ कं ब्राह्मणमनुलक्षीकृत्य , ‘भक्ष्यं दातव्यं भवति’ , येन मनस्थिताः पूर्णा भवन्तीति शेषः | कृष्णवचनमाह | ‘दुर्वाससे’ , दातव्यमिति शेषः | छान्दसत्वात्सन्धिः |॥ २ ॥

  पुनः स्त्रीणां वाक्यं , कथमिति | ‘यमुनायाः’ जलं अक्षोभ्यं  ‘अतीर्त्वा’ कथं तं मुनिं यास्यामः | ‘यतः’ मुनेः सकाशात् ‘श्रेयो भवति’ | ॥ ३ ॥

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

     अब  उत्तर भाग में  प्रवेश करते हैं |  ॐ शिवाय गुरवे नमः 

   अब गोपाल उत्तर तापनि उपनषिद यानी गोपालतापनि उपनिषद के उत्तर भाग का विश्लेषण करते हैं ।

   पूर्व तापनी का सार यह है कि भगवान गोपीनाथ के ध्यान , जप और भजन के द्वारा शुद्ध अंतःकरण हो जाने पर केवल भगवान वासुदेव ही मोक्षदाता हैं दूसरा कोई नहीं इस तथ्य को दिखाने के लिये तथा उनके परमैश्वर्य सम्पन्न सर्व सामर्थ्य को प्रदर्शित करने के लिए { जिससे उनको समझने में सरलता हो } एक आख्यायिका कहते हैं |

  एक बार ब्रज की स्त्रियां सकाम भाव से, रात्रि बिताने के बाद सर्वेश्वर गोपाल कृष्ण से बोली। हे कृष्ण हमें किस  ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए ? जिससे हमारी सभी मनोकामनायें पूर्ण हो जाएं | इस पर श्री कृष्ण ने उत्तर दिया  कि वो ब्राह्मण हैं दुर्वासा; दुर्वासा शब्द के तीन अर्थ होते हैं  १  दुर्वासा माने  अच्छे कपड़े नहीं पहनने वाला और सुवासा माने अच्छे कपड़े पहनने वाला । २  जिसके कपड़ों से अच्छी गंध न आती हो ३ जो केवल दूव नामक  घास का ही भोजन करे { यः दूर्वां अशति } ऐसे दुर्वासा नाम के ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए | तब गोपियों ने पूछा  कैसे हम जाएं उनके पास वे तो  यमुना नदी के उस पार विराजते हैं हम कैसे यमुना नदी पार करके उनके पास जाएंगे ? जिससे हमारा कल्याण हो सके ?  और यदि हम उनके पास नहीं पहुंच सके तो हमारे व्रत की पूर्ति कैसे होगी ? हे कृष्ण ! कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे हमारा कल्याण हो || १ || २ || ३ || 

  || मूल उपनिषद ||

कृष्णेति ब्रह्मचारी इत्युक्त्वा मार्गं वो दास्यति । यं मां स्मृत्वाऽगाधा गाधा भवति । यं मां स्मृत्वाऽपूतः पूतो भवति । यं मां स्मृत्वाऽव्रती व्रती भवति । यं मां स्मृत्वा सकामो निष्कामो भवति । यं मां स्मृत्वाऽश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति ।॥ ४ ॥

 यं मां स्मृत्वाऽगाधतः तलस्पर्शरहितापि सर्वा सरिद्गाधा भवति । श्रुत्वा तद्वाक्यं हि वै रौद्रं स्मृत्वा तद् वाक्येन तीर्त्वा तत्सौर्यां हि वै गत्वाश्रमं पुण्यतमं हि वै नत्वा मुनिं श्रेष्ठतमं हि वै रौद्रं चेति ।॥ ५ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

   अथ श्रीकृष्णवाक्यम् , कृष्णेत्यादि | ‘कृष्ण इति,’ नाम यः सः ‘ब्रह्मचारीति,’ वाक्यं यमुनामध्ये उक्त्वा व्रजन्तु ‘वः’ युष्माकं , यमुना मार्गं दास्यति | कृष्णेति , छान्दसत्वात् सन्धिः | कृष्णेत्युक्तिमात्रेण कथं यमुना मार्गं नो दास्यति कथं चानेकाङ्गनासम्भोगशीलो ब्रह्मचारी स्यादिति शङ्काव्युदस्तये स्वस्मृतिमहिमानमाह , यं मां स्मृत्वा अगाधा तलस्पर्शरहिताऽपि सर्वा सरित् गाधा भवति यं मां स्मृत्वा अपूतः पूतो भवति यं मां स्मृत्वाऽव्रती व्रती भवति यं मां स्मृत्वा सकामो निष्कामो भवति यं मां स्मृत्वाऽश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति इति स्पष्टार्थमिदं |॥ ४ ॥

 श्रुत्वा तद्वाचं हीति | ताः गोप्यः ‘हि’ निश्चितं ‘वै’ स्मयंते तस्य ‘वाचं,’ ‘श्रुत्वा’ , सामर्थ्यबोधकवाक्येन प्रोत्साहिताः, गन्तव्यतया ‘रौद्रं’ रुद्रांशं दुर्वाससं , ‘स्मृत्वा’ 

‘तद्वाक्येन’ कृष्णो ब्रह्मचारीत्येवंरूपेण वाक्येन , ‘तत्’ सौर्यां ‘हि,’ ‘तां’ अगाधामपि गाधाभूतां सौर्यां सूर्यतनयां यमुनां, ‘तीर्त्वा’ गत्वा आश्रमं पुण्यतमं ‘हि’ ‘नत्वा,’ ‘मुनिं’ दुर्वाससं , कीदृशं , ‘श्रेष्ठतमं,’ ‘वै’ प्रसिद्धं , ‘रौद्रं’ उक्तार्थं, ‘इति’ शव्दो भोजनपूर्वपरिचरणसमाप्त्यर्थः | ॥ ५ ॥ 

                                     || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

तब श्रीकृष्ण  ने कहा कि आप यमुना से कहना कि कृष्ण ब्रह्मचारी हैं, ऐसा कहने से यमुना आपको मार्ग दे देगी,   { अनेक स्त्रियों के साथ सम्भोग परायण रहने वाले कृष्ण को ‘कृष्ण’ ब्रह्मचारी’ हैं , ऐसा कहने मात्र से } यमुना हमें मार्ग कैसे दे सकती है , ऐसी शंका का निवारण करने के लिए कृष्ण अपनी महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि  मेरा स्मरण करने से अगाध यानि के अथाह, ‘ तलस्पर्शरहित ’  जो यमुना है वो थाह वाली हो जाएगी क्योंकि मेरा स्मरण करने से अपवित्र, पवित्र हो जाता है, अव्रती भी व्रती (जो दृढ़ निश्चय वाले नहीं है वो भी दृढ़ निश्चय वाले ) हो जाते हैं, सकाम, निष्काम हो जाते हैं; अवेदविद, वेदविद हो जाते हैं; मेरा स्मरण करने से अगाध, अथाह तलस्पर्श से रहित जो नदियां हैं  वो तल स्पर्श वाली हो जाती है, आप उसके तल पर पैर रख कर जा सकती हैं । ॥ ४ ॥  इन वाक्यों को सुनकर के गोपियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ साथ ही कृष्ण के सामर्थ्य में श्रद्धा होने के कारण प्रोत्साहित भी हुईं और जहाँ उन्हें जाना था उन  रुद्रांश दुर्वासाजी का स्मरण करके वो जो प्रतापशाली, पराक्रमी भगवान कृष्ण हैं, उनका स्मरण करके और उनके वाक्य से कि “कृष्ण ब्रह्मचारी हैं, आप हमें मार्ग दो”, यह वाक्य बोल कर यमुना ( सौर्यां – सूर्य की पुत्री, यमुना ) के पार हो गयीं । यमुना पार करके श्रेष्ठतम { प्रसिद्ध } मुनी  दुर्वासा जी के पवित्र आश्रम में पहुँच गयी  और वहाँ रुद्रावतार मुनी दुर्वासाको नमस्कार करके, ये जो पराक्रमशाली  रुद्र हैं (रुरून् , प्राणान् द्रावयति इति रुद्रः – जो प्राणो को द्रवणशील बनाते हैं , जीवनी शक्ति से भर देते हैं  अथवा जो दुःखों को पिघला देते हैं, नष्ट कर देते हैं इसलिए उनका नाम रुद्र है , रुजं दुःखं द्रावयति इति रुद्रः  अथवा ” रोदयति सर्वमंतकाले इति रुद्रः ” रोरूयमाणो द्रवतीति वा, रोदयतेर्वा, “ रुतौ नादांते द्रवति ” नाद से परे प्रकट होने वाला।)  ये सब रुद्र शव्दकी व्युत्पत्तियां हैं | ऐसे महामहिम दुर्वासाजी के पास पहुँच कर भोजन से पूर्व जो कुछ परिचर्या आवश्यक होती है वो सब उन गोपियों ने सम्पन्न की | ॥ ४ ॥ ५ ॥

    || मूल उपनिषद ||

           दत्त्वास्मै ब्राह्मणाय  क्षीरमयं घृतमयमिष्टतमं हि वै ॥ ६ ॥ 

           मिष्टतमं हि वै तु स्नात्वा भुक्त्वा  तुष्टः हित्वाऽऽशिषं प्रयोज्यान्वाज्ञां  त्वदात् । कथं यास्यामोऽतीर्त्वा सौर्य्याम् ।॥ ७ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

   ‘दत्वा,’ अस्मै, ‘ब्राह्मणाय’ दुर्वाससे, ‘क्षीरमयं’ पायसादिकं , ‘इष्टतमं हि वै’ हिततमं मिष्टतमं स्वादुतमं , ‘हि वै’ प्रसिद्धं , ईदृशान्नं दत्वा आराधयामासुरिति शेषः | ॥ ६ ॥  स तु आसां स्नेहेन ‘भुक्त्वा,’ उच्छिष्टमन्नञ्च ‘हित्वा’ त्यक्त्वा उच्छिष्टभागिभ्यो दत्वा , 

‘आशिषं ’, ‘प्रयोज्य’ दत्वा ‘अनु’ पश्चात् , ‘आज्ञां’ गमनानुज्ञां , ‘अदात्’ |  ताः ऊचुः, 

 ‘कथं यास्यामोऽतीर्त्वा सौर्य्याम्’ ॥ ७ ॥ 

                                           || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

  इसके बाद उस परम पुण्यतम आश्रम में पहुंच कर श्रेष्ठतम मुनी दुर्वासा जी प्रणाम कर उनकी सेवा करते हुए बड़े प्रेम से उन्हें भोजन करवाया | इस प्रकार  उन रुद्रान्शावतार  महामुनि  दुर्वासा जी को उन्होंने दूध से बनाए हुए खीर ,लड्डू, पेड़े आदि, घी से बनाए हुए इमर्ती , जलेबी,बालूशाही  आदि, तथा उनकी पसंद के  प्रिय मुलायम मुलायम मालपुए आदि हित कर और स्वादिष्ट पदार्थ,ब्राह्मण श्रेष्ठ दुर्वासा जी को निवेदन कर उनकी आराधना की ॥ ६ ॥ ये सब देख करके, दुर्वासा जी उससे संतुष्ट हुए, उन्होंने स्नान किया, भोग लगाया और फिर भोजन करने के बाद उच्छिष्ट भोगियों के लिए उच्छिष्ट भाग का त्याग कर , गोपियों की आराधना से प्रसन्न होकर आशीष दिया, और फिर घर लौट जाने की आज्ञा दी तब गोपियों ने कहा कि अब  हम यमुना को कैसे पार कर के जायेंगे? ॥ ७ ॥

  || मूल उपनिषद ||

  स होवाच मुनिं  दूर्वासनं मां स्मृत्वा वो दास्यतीति मार्गम् । ॥ ८ ॥

तासां मध्ये हि श्रेष्ठा गान्धर्वी  त्युवाच तं  हि वै ताभिरेवं विचार्य । ॥ ९ ॥

 कथं कृष्णो ब्रह्मचारी । कथं दूर्वाशनो मुनिः । ॥ १० ॥

 तां हि मुख्यां विधाय पूर्वमनुकृत्वा तूष्णीमासुः ।॥ ११ ॥ 

  || संस्कृत व्याख्या || 

  ‘सहोवाच मुनिः,’ ‘मां’ , ‘दूर्वाशिनं’ दूर्वाभोजिनं , दूर्वैव अशनमस्यास्ति तं , निराहारं,  वा ‘स्मृत्वा,’ ‘वः’ युष्माकं, यमुना ‘मार्गं’ दास्यतीति |॥ ८ ॥

 ‘तासां’ मध्ये हि श्रेष्ठा ‘गान्धर्वी,’ काचित्   ‘तं’ हि वै , दुर्वाससम् |   ‘एवम् उवाच’ किं कृत्वा, ‘ताभिः’ अन्याभिः स्त्रीभिः, समं विचार्य |॥ ९ ॥

 किमुवाचेत्याह |  ‘कथं कृष्णो ब्रह्मचारी’  ‘कथं,’ च मुनिः दूर्वाशनः, एवमुवाचेति सम्बन्धः | ॥ १० ॥

अन्यास्तु किंचक्रुरित्याशङ्क्याह, तां हीति |   ‘तां’ गान्धर्वीं, मुख्यां विधाय मुख्यव्यापारयन्तीं कृत्वा ,   ‘अनु’ पश्चात् ,   ‘पूर्वं’ कृत्वा अग्रेसरीं विधाय , अन्याः स्त्रियः   ‘तूष्णीमासुः’ अनुरक्तवत्यः तस्थुः | भूतभौतिकाद्यन्तर्यामिणं आत्मनोऽक्रियत्वात्सर्वमिदं कृष्णो ब्रह्मचारीत्यादिकं युज्यत एवेत्यभिप्रेत्य भगवान् मुनिराह , शब्दवानिति | ॥ ११ ॥

                         || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

तब दुर्वासा (जो केवल दूर्वा का ही अशन करते थे, { अश धातु भोजन के अर्थ में है इसलिए उनका एक नाम दूर्वाशन भी था) ने कहा कि यदि दुर्वासा केवल दूर्वाहारी है , अथवा निराहारी है ऐसा कहकर और मेरा स्मरण करके यमुना से कहना कि हमें मार्ग दो , तो यमुना तुम्हें मार्ग देगी । इस प्रकार मेरा स्मरण करने से यमुना जी आपको मार्ग दे देंगी ।॥ ८ ॥ फिर तो उन गोपियों ने आपस में बातचीत की और वो बोलीं, कि ये क्या है? कृष्ण ने कहा था कि मैं ब्रह्मचारी हूँ , और हम जानते हैं कि वे तो गोपियोंके पीछे पीछे भटकते हैं और ये महात्मा जी  ये लड्डू, पूड़ी, खीर, हलवा खाने के बाद कहते हैं कि मैं केवल दूर्वा खाता हूँ और कुछ नहीं खाता,  इस तरह परस्पर परामर्श या सलाह करके  उन गोपियोंके  मध्य में जो गान्धर्वी (ये राधा का दूसरा नाम है) नाम की गोपी थी,उसको अपना मुखिया बनाया बाकी सब चुप रहीं ,  ‘‘गान्धर्वी किन्नरी देवी मोहकर्त्री सुबुद्धिदा ।

लज्जाशीला त्रपाशीला शीलसन्तोषसंयुता ॥ १५८॥ रुद्रयामल में श्री राधा सहस्रनाम स्तोत्र’’ गान्धर्वी  यानि राधा जी ने पूछा, कि कृष्ण कैसे ब्रह्मचारी हैं और आप कैसे मात्र दूर्वाशन हैं ? तब महामुनि दुर्वासा ने समझाना शुरू किया कि कृष्ण किस प्रकार से ब्रह्मचारी हैं और मैं कैसे निराहारी हूँ | देखो भूत माने [ पृथ्वी , जल ,अग्नि , वायु और आकाश ]  और भौतिक माने इन पंचमहाभूतों से बने सभी पदार्थ  इन सबके अंतर्यामी होने से , और आत्म स्वरूप से, अक्रिय होने से तथा सर्वात्मा होने से कृष्ण का अपने आप को ब्रह्मचारी कहना ठीक ही है इस अभिप्राय से करुणामय महर्षि दुर्वासा ने वेदान्त की एक छोटी सी प्रक्रिया द्वारा आत्म तत्व  का खुलासा प्रारम्भ किया |  ॥८॥ ९॥ १० ॥ ११ ॥ 

  || मूल उपनिषद ||

     शब्दवानाकाशः |   शब्दाकाशाभ्यां भिन्नः । तस्मिन्नाकाशस्तिष्ठति । आकाशे तिष्ठति स ह्याकाशस्तं न वेद । स ह्यात्मा । अहं कथं भोक्ता भवामि । स्पर्शवान् वायुः स्पर्शवायुभ्यां भिन्नस्तस्मिन् वायौ तिष्ठति वायुर्न्न वेद तं हि स  ह्यात्माऽहं कथं भोक्ता भवामि  रूपवदिदं  हि तेजो रूपाग्निभ्यां भिन्नस्तस्मिन्नग्नौ तिष्ठति। अग्निर्न वेद तं हि स ह्यात्माऽहं । कथं भोक्ता भवामि । रसवत्यापो रसाद्भिन्नस्तास्वप्सु तिष्ठति तं ह्यापो न विदुः स ह्यात्माऽहं कथं भोक्ता भवामि । गन्धवतीयं भूमिर्गन्धभूमिभ्यां भिन्नस्तस्यां भूमौ तिष्ठति भूमिर्न वेद तं हि स ह्यात्माऽहं  कथं भोक्ता भवामि। ॥ १२ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

  शब्दगुणयुक्तः आकाशः , वर्तते , तदुभय भिन्नः विलक्षणः प्रत्यगात्मा ‘ तस्मिन् ’ शब्दवति 

‘आकाशे ,’ तिष्ठति | स हीति | शब्दवान् अपि ‘आकाशः’ ‘तम्’ अन्तर्यामिणं ‘न वेद’ , मय्यसौ तिष्ठतीति | सह्यात्मेति | ‘सः’ ‘हि’, साक्षीभूतः ‘आत्मा,’ ‘अहं,’ कथं भोक्ता 

भवामि | एवं वायुतेजोजलभूमिपर्यन्ता व्याख्येयाः | ॥ १२ ॥

                                  || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

     तब दुर्वासा जी ने ये उपनिषद माने विद्या बताई कि आकाश शब्द वाला है लेकिन शब्द आकाश से भिन्न है और उसी आकाश में वो शब्द रहता है परन्तु आकाश उसको नहीं जानता क्योंकि वह तो आकाश का भी अन्तर्यामी है ,आकाश का प्रत्यगात्मा है | हम अपने सामने वाली चीज को जान सकते हैं अपने से पीछे वाली चीज  को नहीं जान सकते , पिता अपने पुत्र का जन्म जान सकता है लेकिन अपने पिता के जन्म को नहीं जान सकता |  शब्द ही आकाश की आत्मा है । और आकाश तथा शब्द दोनों का अन्तर्यामी आत्मचैतन्य है | इसलिये उसको प्रत्यगात्मा कहते हैं | जो सबके पीछे रहकर सबको प्रकाशित करे वही प्रत्यगात्मा है | {  प्रतीपं अञ्चति , प्रकाशते इति प्रत्यगात्मा } जैसे आँख सबको देखती है लेकिन आँख अपने आपको नहीं देख सकती , आँख द्रष्टा है दृश्य नहीं , द्रष्टा कभी दृश्य नहीं होता | बैसे ही साक्षी द्रष्टा है वह दृश्य कभी भी नहीं हो सकता |  तो इस प्रकार आकाश शब्द से भिन्न भी है और अभिन्न भी है | जैसे घड़ा पृथ्वी से भिन्न भी है और अभिन्न भी है | जैसे स्वरूप से आकाश शून्य साक्षी मात्र है और स्वभाव से शब्द रूप है उसी प्रकार  मैं  स्वरूप से अभोक्ता और स्वभाव से भोक्ता हूँ और मैं जो कुछ भी खाता हूँ उसे दूर्वा दृष्टि से ही खाता हूँ तो मैं अन्य रसों का भोक्ता किस तरह हो जाऊंगा ? जैसे कि रूप वान यह तेज है, परन्तु रूप  तेज  से भिन्न है, उस तेज में ही अग्नि रहता है  अग्नि में ही रूप रहता है (यानी कि तेज में ही रूप रहता है) लेकिन अग्नि उसे नहीं जानता इसी प्रकार यह आत्मा है ऐसा समझ के अब यह बताओ कि मैं भोक्ता कैसे हुआ? और भी दूसरे उदाहरण देते हैं जल रसवान है, लेकिन जल रस से भिन्न है, जल में ही सभी रस रहते हैं, जल में ही भूमि और गंध भी रहते हैं लेकिन जल उन सबसे भिन्न है । भूमि जल में ही रहती है लेकिन रस भूमि में नहीं रहते, भूमि उनको जानती भी नहीं और वो रस ही भूमि की आत्मा है । रस जल का गुण है लेकिन सरिता के जल में और समुद्र के जल में भिन्नता है परन्तु द्रव रूप से दोनों एक ही हैं | ये सब विचार करके आप बताएं कि मैं भोक्ता कैसे हुआ ? जो सबका साक्षी है वह भोक्ता नहीं हो सकता | इन्द्रियां और मन की उपाधि के सहयोग से भोक्ता होता है तथा अपने निरुपाधिक शुद्ध स्वरूप में केवल साक्षी मात्र होता है | जैसे भौतिक पदार्थों से बनी हुई कार चलती है स्वयं भूत नहीं चलते | ॥ १२ ॥ 

  || मूल उपनिषद ||

 इदं हि मनस्तेष्वेवं हि मनुते । ॥ १३ ॥

 तानिदं हि गृह्णाति । ॥ १४ ॥

यत्र सर्वमात्मैवाभूत्तत्र कुत्र वा मनुते । कथं वा गच्छतीति । स ह्यात्मा । अहं कथं भोक्ता भवामि ।॥ १५ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

कथं तर्हि ते भोक्ताऽहं शब्दं शृणोमीत्यादि प्रत्यय इत्याशङ्क्य मनस एव तथा प्रतीतिरित्याह , इदं हि मन इति | ‘तेषु’ आकाशादिषु , वर्तमानम् ‘इदं,’ ‘हि’ प्रसिद्धं, ‘मनः’, ‘एवं हि’ अहं भोक्ता इत्येवंहि, 

  ‘मनुते’, चित् सन्निधानात् |॥ १३ ॥

 अत्र हेतुमाह , तानिति | ‘हि’ यस्मात् तान् शब्दादीन् , ‘इदं’ मनः एव, तत्तदिन्द्रियाधिष्ठातृभूतं, गृह्णाति | ॥ १४ ॥

 एवं तर्हि तवापि लोकवदन्तःकरणावच्छिन्नत्वादहं भोक्तेत्यध्यासः स्यादित्याशङ्क्य स्वस्मिन्नध्यासनिवृत्तिं दर्शयति, यत्र सर्वमिति | ‘यत्र’ आत्मज्ञानदशायां, विदुषः ‘सर्वं’ कार्यकारणजातम्, अधिष्ठानतत्वज्ञानात् ‘आत्मैव’ ‘अभूत्’, रजतमिवशुक्तिः, ‘तत्र’ च आत्मज्ञानदशायां , ‘कुत्र’ धर्मिणि, केन करणेन कः मन्ता ‘मनुते,’ एवं ज्ञानेन्द्रियान्तरपर्याया अप्याध्याहर्तव्याः | ‘क्व’, ‘वा’, दिशि, केन करणेन को वा ‘गच्छति’, एवं वागादिपर्याया अध्याहर्तव्याः | करणादीनामात्मभूतत्वात् ज्ञानिनः सर्वाध्यासनिवृतेर्नभोक्तृत्वाद्यध्यास इति भावः | सहीति | ‘सः’ कार्यकारणसाक्षी 

निवृत्ताभिमानः, ‘आत्मा,’ कथं भोक्ता भवामि | ॥ १५ ॥

                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 जब हम मन के साथ जुड़ जाते हैं तभी भोक्ता बनते हैं | हमारा भोक्तापन मन की अपेक्षा से है , शुद्ध आत्मचैतन्य की दृष्टि से नहीं , शंकराचार्य जी की प्रसिद्ध उक्ति है कि        {मनोबुध्य अहंकार चित्तानि नाहं नच श्रोत्र जिव्हे नच घ्राण नेत्रे |}  चैतन्य की संन्निधि मात्र से मन और इन्द्रियों का सन्निकर्ष होने पर भोक्तापनेकी भ्रान्ति का उदय होता है | मन ही इन्द्रियों द्वारा विषयों का ग्रहण करता है , आत्मा नहीं | इन सब बातों को बता कर दुर्वासा जी ने स्पष्ट कर दिया कि जैसे संसारीलोग विवेक के अभाव में मन को ही आत्मा मान लेते हैं वैसी भ्रान्ति ज्ञानियों को कभी नहीं होती | क्योंकि आत्मा ही सबका अधिष्ठान है , आत्मा के बिना मन , इंद्रिय आदि सब जड़ हैं , आत्मा के बिना उनमें  क्रिया , कारकत्वादि  सिद्ध ही नहीं होते इसलिए आत्मज्ञान की दशा में ज्ञानीपुरुष  सबका आत्मस्वरूप हो जाता है | अद्वैत हो जाता है | ज्ञानी तो सर्व कार्य कारणादि का साक्षी हो जाता है  इसलिए उसमें कर्त्तापने और भोक्तापने का अभिमान सर्वदा के लिए निवृत्त हो जाता है | प्रश्नोत्तर रत्नमालिका में भगवत्पाद श्री शंकराचार्य जी कहते  हैं  जितं जगत् केन ? मनो हि येन अर्थात् जिसने मन को जीत लिया उसने जगत को जीत लिया | गच्छतीति जगत्,  मन और जगत दोनों ही नित्य परिवर्तनशील हैं | जिसने अपने मन को लगाम  लगाने की कला जान ली जगत उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता | 

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥  ब्रह्म बिंदु उपनिषद |   

शिवसंकल्पसूक्त में मन्त्र है –  यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः । यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। हे परमात्मा ! जिस मन में वैदिक ऋचाएं समाई हुई हैं, जिसमें सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र ऐसे प्रतिष्ठित हैं, जैसे रथ के पहिये में `अरे` स्थित होते हैं (लगे होते हैं) तथा जिस मन में प्रजाजनों का सकल ज्ञान समाहित है, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो । मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ कठोपनिषत् द्वितीयोऽध्यायः प्रथमवल्ली – तथा – मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किं चन । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति

  इह नानेव पश्यति। बृहदारण्यक . ४,४.१९ ॥

नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवतात्मा ग्रहकर्मकालाः।

मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद्यत्।।43।। ॥श्रीमद्भागवद्पुराण॥

सुख दुःख के हेतु कोई मनुष्य ,देवता अथवा ग्रह आदि नहीं हैं  , केवल मन ही कारण है । वही संसार चक्र की धुरी है । उसी के आधार पर अच्छी बुरी सृष्टि होती है । आत्मा तो असंग है , उसका कोई स्पर्श नहीं कर सकता । मन सचेष्ट होता है – उसे अपना स्वरूप मान लेने पर आत्मा बद्ध सा हो जाता है । सब कर्म- धर्म , यम- नियम , ध्यान- दान अध्ययन आदि मनोनिग्रह के लिए हैं । इस मन के शांत हो जाने पर शांति है । सब इन्द्रियाँ मन के वश में हैं । मन को जीत लिया तो सबको जीत लिया । उसको न जीत कर जगत के शत्रुओं को जीतना मूर्खता है । शत्रुओं का स्रष्टा मन है । मन ने ही शरीर को अपना माना , शरीर के रूप में मन ही है , वही भटक रहा है – भौतिक पदार्थ भौतिक शरीर को ही दुख पहुँचा सकते है – तो  पहुँचाये , अपने ही दाँत से जीभ कट जाये तो क्रोध किस पर करें ? यदि देवता ही दुःख देते हों तो  दे लें , वे केवल अपने विकार को ही प्रभावित कर सकते हैं । आत्मा के अतिरिक्त और कोई वस्तु है ही नहीं , फिर कौन किसको कैसे दुख दे? जब सब कुछ आत्मा ही है । आत्मानं चेद्विजानीयात् अयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ – बृहदारण्यकोपनिषत् – ॥ ४,४.१२ ॥ मन के द्वारा ही मनन होता है, वो मन ही इन इन्द्रियों की सहायता से विषयों को ग्रहण करता है ।पर जहां  पर यह सब कुछ आत्मा ही हो जाता है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं होता, तो कैसे मनन करेगा उसके लिए तो दो वस्तु चाहिए, एक मन और दूसरा मननीय पदार्थ । मन ही विषयों को ग्रहण करता है लेकिन जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो जाता है तो मन किस प्रकार पदार्थ का मनन करे? दो हों तो मनन करे न ? कैसे ज्ञान होगा उसका क्योंकि ये सब तो आत्मा है,चैतन्य मात्र है , अतः मैं भोक्ता कैसे हुआ ? यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति॥-बृहदारण्यकोपनिषत् ||२-४-१४|| अर्थ:- जब स्वयं से भिन्न अज्ञान की अवस्था में द्वैत प्रतीत होता है तभी अन्य से अन्य को सूंघता है,अन्य अन्य को देखता है,सुनता है,अन्य से ही बोलता है, अन्य का ही मनन करता है। यह द्वैत ही अन्य से अन्य में व्यवहार करता है,अन्य से अन्य ही भय खाता है। किन्तु जब~यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं विजानाति” जहाँ सब कुछ  उस आत्मा के ही जैसा आत्मभूत ,आत्मरूप हो गया फिर कौन किसके द्वारा किसे और कैसे जाने। या उसे किसके माध्यम से जाने। “विज्ञातामरे केन विजानीयादिति” जिसके द्वारा अन्य से अन्य को जाना जाता है उस विज्ञाता में अन्यत्व भाव न होने से अन्य से अन्य को कैसे जाने।॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥

  || मूल उपनिषद ||

 अयं हि कृष्णो यो वो हि प्रेष्ठः शरीरद्वयकारणं भवति । ॥ १६ ॥

 द्वौ सुपर्णौ भवतो ब्रह्मणोंऽशभूतस्तथेतरो भोक्ता भवति । अन्यो हि साक्षी भवतीति । ॥ १७ ॥

वृक्षधर्मे तौ तिष्ठतः । अतो भोक्ताऽभोक्तारौ । ॥ १८ ॥

 पूर्वो हि भोक्ता भवति । तथेतरोऽभोक्ता कृष्णो भवतीति । ॥ १९ ॥

                                     || संस्कृत व्याख्या || 

  अस्तु तव ज्ञानित्वादभोक्तृत्वं कृष्णोऽपि किं तथैवेत्याशङ्क्य तस्य तु सर्व्वाधिष्ठानभूतत्वात् न भोक्तृत्वमित्याह , अयं हीति | ‘यो वः’, ‘प्रेष्ठः’, अयं कृष्णः ‘हि’ यस्मात् शरीरद्वयस्य कारणं ततो न भवतीति शेषः |॥ १६ ॥ 

एवमधिष्ठानत्वादभोक्तृत्वमित्युक्तम् , अथान्तर्यामित्वादपि तदाह , द्वौ सुपर्णाविति | ‘ब्रह्मणः’ चिन्मात्रात् , द्वौ सुपर्णौ इव सहचरौ जीवेश्वरौ , ‘भवतः’ वर्तेते | ‘तथा’ भूतयोस्तयोर्मध्ये ‘इतरः,’ ‘अंशभूतः’ जीवः, भोक्ता भवति, ‘हि’ निश्चितं, ‘अन्यः’ ईश्वरः, साक्षी केवलमीक्षितैव , भवति इत्यर्थः | ‘इति’ शब्दो मन्त्रसमाप्त्यर्थः |॥ १७ ॥ 

तयोः सुपर्णत्वं कुत इत्याशङ्क्य वृक्षे वर्तमानत्वादित्याह , वृक्षधर्मे ताविति | वृक्षस्य धर्मो व्रश्चनाख्यो यस्य तस्मिन् ‘वृक्षधर्मे’ विनाशिनि संसाराख्ये अश्वत्थे, तिष्ठतः | अत इति | 

 ‘अतः’ ईश्वरानीश्वरत्वात्, तौ भोक्ताऽभोक्तारौ |॥ १८ ॥ 

एतद्विविनक्ति | ‘पूर्वो हि भोक्ता भवति,’  तथा इतरः ‘कृष्णः’ ईश्वरः, इति , कारणात्, अभोक्ता भवति | ॥ १९॥

                               || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

     अच्छा जी मान लिया कि आप दुर्वासा जी तो ज्ञानी होने के कारण अभोक्ता हैं तो फिर  ये जो कृष्ण हैं, क्या ये भी अभोक्ता हैं ऐसा प्रश्न होने पर दुर्वासा जी ने कहा कि ये जो  तुम्हारे प्रेष्ठ (प्रियतम, प्रेम का विषय) कृष्ण हैं,ये  सूक्ष्म शरीर  और स्थूल शरीर, इन दोनों के कारण हैं। ये तो पुरुषोत्तम हैं , ये तो अधिष्ठान रूप होने से अभोक्ता ही हैं |  शुद्ध ब्रह्म चिन्मात्र है और सबका अधिष्ठान होने से अभोक्ता है  | ‘‘उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।१३ .२३।।’’ परम पुरुष (पुरुषोत्तम)  ही इस देह में उपद्रष्टा, अनुमन्ता ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है। यह परम पुरुष जो कि क्षर और अक्षर से अतीत है वह  प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखने से ‘उपद्रष्टा’, उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देने से ‘अनुमन्ता’, अपने को उसका भरण पोषण करने वाला मानने से ‘भर्ता’, तथा उसके सङ्ग से सुख दुःख भोगने से ‘भोक्ता’, और अपने को उसका स्वामी मानने से ‘महेश्वर’ बन जाता है। परन्तु स्वरूप से यह पुरुष ‘परमात्मा’ कहा जाता है। यह देह में रहता हुआ भी देह से पर (सम्बन्ध-रहित) ही है। तथा जीव और ईश्वर दोनों सहचारी  हैं , सखा हैं { सहैव ख्यायते इति सखा }  और इनको अन्तर्यामी भी कहा जाता है | { अन्तरे स्थित्वा यमयति इति अन्तर्यामी }   मुण्डकोपनिषद् में एक रूपक दिया है — ‘‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते |  तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति || ’’   दो सुंदर पंखों वाले पक्षी, जो साथ-साथ रहने वाले तथा परस्पर सखा हैं,घनिष्ठ सखा हैं , समान वृक्ष पर ही आकर रहते हैं; उनमें से एक अंश भूत होने के कारण भोक्ता है संसार रूपी वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, दूसरा अंशी, ईश्वर होने से साक्षी है , खाता नहीं है, अपितु संसार को तथा अपने सखा को देखता है।  केवल देखता है।  उपनिषद में यह बड़ा ही प्रसिद्ध मंत्र है –  जीव और ईश्वर दो पक्षी हैं, इनको पक्षी इसलिए कहा क्योंकि एक ही शरीर रूपी वृक्ष में रहते हैं । पक्षियों का निवास स्थान वृक्ष ही होता है | और वृक्ष इसलिए कहा कि काल रूपी लकड़हारा इसे प्रति पल काटता रहता है | जिसको काटा जाये सो वृक्ष { वृक्षो वृश्चनात्।,वृश्चनात् वृक्ष उच्यते , वृश्च्यते विदार्यते   इति वृक्षो देहः ।  यह संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष विनाशशील है | अश्वत्थ का अर्थ इस प्रकार है श्व का अर्थ आगामी कल है और  त्थ का अर्थ है स्थित रहने वाला और अ का अर्थ है नहीं |  अतः  अश्वत्थ का अर्थ है वह जो कल अर्थात् अगले क्षण पूर्ववत् स्थित नहीं रहने वाला है। तात्पर्य यह हुआ कि अश्वत्थ शब्द से इस संपूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील दृश्य मान जगत् की ओर इंगित किया गया है। इनमें  से एक जीव है जो अंश रूप होने से भोक्ता है और दूसरा साक्षी होने से अभोक्ता है, एक केवल साक्षी मात्र है और वृक्ष के आधार में, अधिष्ठान में दोनों रहते हैं ।शरीर ही वह वृक्ष है जिसमें एक जीव अनीश्वर होने से भोक्ता है  और दूसरा परमात्मा , ईश्वर होने से अभोक्ता है, कृष्ण है | जो जीव है वही इन्द्रिय , प्राण , मन और बुद्धि से मिलकर  भोक्ता हो जाता है और जो दूसरा है वो अभोक्ता, शुद्ध साक्षी ,कृष्ण होता है । ॥१६॥ १७॥ १८॥ १९॥

  || मूल उपनिषद ||

यत्र विद्याविद्ये न विदामो । विद्याविद्याभ्यां भिन्नः ,  विद्यामयो हि यः स कथं विषयी भवतीति ।॥ २० ॥ 

यो ह वै कामेन कामान्कामयते स कामी भवति ।

 यो ह वै त्वकामेन कामान्कामयते सोऽकामी भवति । ॥ २१ ॥ 

जन्मजराभ्यां भिन्नः स्थाणुरयमच्छेद्योऽयं योऽसौ सौर्ये तिष्ठति योऽसौ गोषु तिष्ठति । योऽसौ गाः पालयति । योऽसौ गोपेषु तिष्ठति |   सर्वेषु  वेदेषु तिष्ठति । योऽसौ सर्वैर्वेदैर्गीयते । योऽसौ सर्वेषु भूतेष्वाविश्य

भूतानि विदधाति स वो हि स्वामी  योऽसौ भवति । ॥ २२ ॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

     ईश्वरस्याभोक्तृत्वे अविद्यारहितत्वं हेतुमाह | ‘यत्र’ ईश्वरे विद्याऽविद्याभ्यां , भिन्नः घटादिवद् विषयः, न भवतीत्यर्थः | विद्याविषयत्वाभावे हेतुमाह, विद्यामयो हीति | ‘विद्या’ नाम ब्रह्माकारा अन्तःकरणवृत्तिः, तन्मयः’ तत्प्रकाशकः, ‘हि यः स कथं विषयी भवति’ | न हि घटादिप्रकाशक आलोको घटादिविषयः |॥ २० ॥

 एवमविद्यारहितत्वादभोक्तृत्वमुक्तम्, अथाकामत्वादभोक्तृत्वमाह , यो हेति | ‘यः’ ह वै किल कामेन इच्छया ‘कामान्’ विषयान् , कामयते ‘सः’ कामी कामुकः भवति | ‘यः’ ‘ह वै’ कृष्णः ‘तु’ अकामेन अनिच्छया कामान्, स्वीकरोति ‘सः’ तु अकामी लोके प्रसिद्धः भवति |॥ २१ ॥

 एवमकामित्वादभोक्तृत्वमुक्तम्, अथ षडूर्मिभावविकारशून्यत्वात् कृष्णशब्दार्थत्वादपि तदाह , जन्मेति | ‘जन्मजराभ्यां’ भिन्नः रहितः , इत्यनेन षडूर्मिरहितत्वं { १ क्षुधा २ पिपासा ३ शोक ४ मोह ५ जरा ६ मृत्यु } इति षडूर्मयः | जन्माख्यप्रथमविकाररहितत्वञ्च |  

“ १ जायते,  २ अस्ति ,  ३ विपरिणमते , ४ वर्धते , ५ अपक्षीयते , ६ विनश्यति ” | ‘स्थाणुः’ सर्वदा स्थिरः, इत्यनेन किञ्चित् कालास्तित्व विपरिणामाभ्यां शून्यत्वं विनाशशून्यत्वञ्चोक्तं भवति | अच्छेद्योऽयमिति अपक्षयशून्यत्वमुक्तं वेदितव्यम् | कृषसत्तायामितिधातुबलादयं कृष्णशब्दार्थ इति स्थाणुशब्देन सूचितम् | अथ गोविन्दशब्दार्थरूपत्वादप्यभोक्तृत्वमाह , {योऽसौ सौर्ये तिष्ठति इति |} ‘योऽसौ’, गोशब्दार्थभूते सूर्यमण्डले विद्यते तिष्ठति, स गोविन्दः, स एवाधुना कामधेन्वनुग्रहार्थं धेनुषु विद्यते तिष्ठतीति गोविन्दशब्दार्थमाह, योऽसौ गोषु तिष्ठतीति | लक्षणया गोशब्देन गोपाः ते च गा इन्द्रियाणि पालयन्तीति व्युत्पत्या, गोपेषु विद्यते तिष्ठतीति गोविन्दशब्दार्थमाह, योऽसौ गोपेषु इति | स एव गोषु वेदेषु विद्यतइति गोविन्दशब्दार्थमाह, योऽसौ सर्वेषु वेदेष्विति | गोभिर्वेदैर्गीयत इति | गोविन्दशब्दार्थमाह, योऽसौ सर्वैरिति | गोषु विनाशं गच्छत्सु स्थावरजङ्गमेष्वाविष्टः सन् भूतानि विदधाति इति गोविन्दः इति गोविन्दशब्दार्थमाह, योऽसौ सर्वेष्विति | यः ईदृशः कृष्णः गोविन्दः सर्वस्वामी, ततः असौ कथं भोक्ता इत्याशयेनाह, स वो हीति | ‘सः’ कृष्णः गोविन्दः, यत्  ‘वः’ स्वामी, तस्मात् अभोक्तेत्यर्थः | ॥ २२ ॥

                                 || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 तो जहाँ पर हम विद्या और अविद्या में भेद रेखा नहीं खींच पाते, विद्या और अविद्या के स्वरूप को नहीं जानते, विद्या और अविद्या से भिन्न शुद्ध विद्या में ये जो साक्षी हैं इसको जब तक हम नहीं जानते तब तक इस शुद्ध चेतना में  हम भोक्ता होने का आरोप करते हैं । यह किसी भी प्रकार से विषयी नहीं होता, भोक्ता नहीं होता । क्योंकि यह ईश्वर तत्व अविद्या से रहित है | तब प्रश्न होता है  कि ये विद्या क्या है ? इसका उत्तर है कि  ब्रह्माकार हुई अन्तःकरण की वृत्ति ही विद्या है | जो ब्रह्ममय है , जो सबका प्रकाशन करता है वह विषयी नहीं  हो सकता | प्रकाशक प्रकाश्य नहीं हो सकता | द्रष्टा दृश्य नहीं हो सकता | जिस प्रकाश से हम घट को देखते हैं वह प्रकाश ही घट नहीं हो जाता इसलिए अविद्या रहित होने से कृष्ण अभोक्ता ही हैं | ॥ २० ॥

अब प्रकारान्तर से समझाते हैं कि कृष्ण अकाम होने से अभोक्ता हैं | क्योंकि जो अभिलाषा पूर्वक विषयों की कामना करता है , वह कामुक कहा जाता है और ये हमारे कृष्ण तो अनिच्छा पूर्वक ही कामनाओं को स्वीकार करते हैं जैसे रङ्गमञ्च पर अभिनेता | इसलिए संसार में ये अकामी के रूप में ही प्रसिद्ध हैं | इसलिए अकामी होने से अभोक्ता हैं | गीता में भी कहा है कि  – आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।२.७०।। जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के जल उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं  वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं  वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है  न कि भोग की कामना करने वाला पुरुष।। जो काम से काम की  कामना करता है, वही कामी होता है । जो अकाम हो कर के कामनाओं की  कामना करता है वह अकामी होता है । जैसे भगवान ने गीता में कहा है कि  – तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।४.१३।। इस जगत का कर्ता होते हुए भी मुझे अव्यय , अकर्ता ही जानो कारण कि कर्मों के फल में  मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।  ‘‘न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।४.१४।।’’ कर्म मुझे लिप्त नहीं करते;  न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार जो मुझे  जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता है।।  ‘‘न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।५ .१४।।’’  परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के साथ संयोग की रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है। स्वभाव माने प्रकृति ही (सब कुछ) करती है। इस भूतमय प्रपञ्च का मैं कर्ता  हूँ पर तुम मुझे अकर्ता जानो । तो इस प्रकार से जो अकाम हो कर के कामना करता है, जैसे ईशावास्य उपनिषद में कहा है – तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः – त्याग पूर्वक भोग करो; मा गृधः कस्यस्विद्धनम् – किसी के धन की आशा मत करो, ग्रहण मत करो, लोभ मत करो  | केवल भगवान का प्रसाद ही ग्रहण करो | ॥ २१ ॥ 

अब एक दूसरी बात यह भी है कि ये परमात्मा कृष्ण तो जन्म जराभ्यां भिन्नः – हैं यहां जन्म शब्द से छह विकार और जरा शब्द से छह ऊर्मियों से रहित आत्म तत्व का निरूपण किया गया है | ये छह ऊर्मियाँ इस प्रकार हैं (क्षुधा-पिपासा, शोक-मोह और जरा -मृत्यु को “षडूर्मि” कहा जाता है) और छह विकार ये हैं –  {अस्ति – exists जायते – is born वर्धते – grows विपरिणमते – matures अपक्षीयते – decays और  विनश्यति –  dies इति }   जो अज है, नित्य है; न जायते म्रियते वा कदाचित्  – गीता और कठोपनिषद में प्रतिपादित जो आत्म तत्व अथवा ब्रह्म तत्व है वह षडूर्मि और षड्विकारों से रहित होने के कारण तथा  ‘कृष्’  धातु सत्ता अर्थ का वाचक है और  ‘ण’ शब्द आनन्द अर्थ का बोध कराता है , इन दोनों भावों से युक्त होने के कारण  यदुकुल में अवतीर्ण हुए नित्य आनन्दस्वरूप श्री विष्णु ही ‘कृष्ण’ कहलाते हैं | इसलिए वे स्थाणु हैं, स्थिर हैं |  अचञ्चल साक्षी है, ‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृत्ति वाचकः। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते।।

’कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः। विष्णुस्तद्भावयोगाच्च कृष्णो भवति सात्वतः ||  महाभारत उद्योग पर्व अध्याय ६९ तथा “ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रह: ।

अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्।।” (ब्रह्मसंहिता ५ /१)

सच्चिदानंद विग्रह श्री गोविंद कृष्ण ही परमेश्वर हैं। वे अनादि हैं तथा सबके आदि भी वे ही हैं  और समस्त कारणों के भी कारण हैं।   अपक्षय शून्य होने से अच्छेद्य हैं ,काल के कारण उनमें कोई विपरिणाम न होने से अविनाशी हैं  |  अब गोविन्द शब्द से भी अभोक्तृत्व सिद्ध करते हैं ,‘गो’ शब्द का एक अर्थ सूर्य भी होता है अर्थात  जो सूर्य में निवास करता है जो सूर्य की किरणों में रहता है वह गोविन्द है | वही गोविन्द इस समय कामधेनु पर अनुग्रह करने के लिए  गायों में निवास करता है और लक्षणा वृत्ती  से गोपों में रहकर उनका पालन करता है तथा उनकी इन्द्रियों की  वृत्तियों में भी वही निवास करता है | और वही गोविन्द वेदों में रहता है ‘गो’ माने वेद अर्थात वेद  जिसका गान करते हैं   यह भी गोविन्द शब्द का अर्थ है |

  ‘गो’ माने पृथ्वी आदि समस्त स्थावर जङ्गम प्राणी गणों में अन्तर्यामी रूप से प्रविष्ट होकर सबको धारण करता है वह गोविन्द है | जो सारे जीवों का पालन करता है जो इन सब देवताओं का अधिष्ठान है, तथा उनके अन्दर भी रहता है, ‘‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।१५ .१४ ।।’’ मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्नि रूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।। जो सब देवताओं के द्वारा स्तुति प्राप्त करता है, सारे देवता जिसका गान करते हैं, जो सब प्राणियों के अंदर प्रवेश करके जीवों का निर्माण करता है, ऐसा यह कृष्ण ‘गोविन्द’ है, जो हमारा तुम्हारा सबका स्वामी है एवं  अंतर्यामी है वह कैसे भोक्ता हो सकता है ? अर्थात अभोक्ता है | ॥ २२ ॥

  || मूल उपनिषद ||

सा होवाच गान्धर्वीं । कथं वाऽस्मासु जातोऽसौ  गोपालः कथं वा ज्ञातोऽसौ त्वया मुने कृष्णः ।

को वास्य मन्त्रः किं वाऽस्य स्थानम् । कथं वा देवक्यां जातः । को वाऽस्य ज्यायान् रामो भवति | 

 कीदृशी पूजास्य गोपालस्य भवति । साक्षात्प्रकृतिपरो योऽयमात्मा गोपालः कथं त्ववतीर्णो भूम्यां हि वै

स होवाच तां ह वै ।॥ २३ ॥ 

  एको ह वै पूर्वं नारायणो देवः | ॥ २४ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

 एवं विदितवृत्तान्ता गान्धर्वी पृच्छतीत्याह सा हविति | ‘सा’ गान्धर्व्वी , मुनिं उवाच | किम् इत्याशङ्क्याह , कथमिति | एवंविधः कृष्णो गोविन्दः ‘अस्मासु’,  ‘गोपालः,’ कथं वा जातः 

  ‘कथं वा’ , हे मुने असौ कृष्णः त्वया ज्ञातः , कोवा, अस्य मन्त्रः , किंवाऽस्यस्थानं , कथं वा देवक्यां जातः , अस्य ‘ज्यायान्’ ज्येष्ठः रामः को वा किंरूपादिः , भवति , इत्यर्थः |  ‘कीदृशी’ पूजा अस्य गोपालस्य भवति , ‘साक्षात् प्रकृतिपरः’ मायेशः ‘यः’ परमात्मा, गोपालः, कथं त्ववतीर्णः , भूम्यां , हि, वै’ प्रसिद्धं सहोवाच तां ह वै एको हीति ‘सः’ मुनिः , ‘ह’ किल ‘वै’ प्रसिद्धौ ‘तां’ गान्धर्व्वीं , उवाच |॥ २३ ॥ 

प्रश्नोत्तरगर्भां कृष्णब्रह्मणः कथामवतारयितुं कृष्णस्वरूपमाह | एकः , ‘ह’ किल ‘पूर्व्वं’ सृष्टेरादौ , नारायणोदेवः, आसीत् इति शेषः | ॥ २४ ॥

                           || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 इस प्रकार जब कृष्ण तत्व के बारे में सुना तो गांधर्वी ने मुनि से पूछा अहो ऐसे हमारे कृष्ण हैं ! ये आपने कैसे जाना ? और यदि ये परमात्मा हैं तो इनका मंत्र क्या है , इनका स्थान कहाँ है ? ये देवकी से कैसे उत्पन्न हुए ? और इनके तो बड़े भाई भी हैं जिनका नाम राम है इन दोनों का सच्चा स्वरूप क्या है ? इनकी पूजा कैसे की जाती है ? ये तो प्रकृति से परे साक्षात परमेश्वर हैं , मायाधीश हैं और जिन गोपाल को आप परमात्मा कह रहे हैं उनका धरती पर अवतार कैसे हुआ ? तब मुनि ने परब्रह्मस्वरूप श्री कृष्ण की अवतार कथा को समझाने के लिये कृष्ण का स्वरूप इस प्रकार बताना प्रारम्भ किया कि पूर्व काल में सृष्टि होने से पहले एक नारायण देव ही थे | || २३ || २४ || 

  || मूल उपनिषद ||

यस्मिन्  लोका ओताश्च प्रोताश्च तस्य हृत्पद्माजातोऽब्जयोनि स्तपित्वा  तस्मै हि  वरं ददौ । ॥ २५ ॥

 स कामप्रश्नमेव वव्रे । तं हास्मै ददौ ।॥ २६ ॥

स होवाचाब्जयोनिर्योवताराणां मध्ये श्रेष्ठोऽवतारः को भवति । येन लोकास्तुष्टा देवास्तुष्टा भवन्ति ।

 यं स्मृत्वा मुक्ता अस्मात्  संसारात्  भवन्ति । कथं वास्यावतारस्य ब्रह्मता भवति ।॥ २७ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

नारायणत्वं तस्य कुत इत्यत आह , यस्मिन्निति | ‘यस्मिन्’ देवे लोकाः ओताः, दीर्घतन्तुषु पटवत् , 

 ‘प्रोताः’ तिर्यक्तन्तुषु पटवत्, ‘तस्य हृत्पद्माज्जातोऽब्जयोनिः’ , तपित्वा, स्थिताय तस्मै ब्रह्मणे , नारायणः वरं ददौ |॥ २५ ॥ 

    स इति | ‘सः’ ब्रह्मा ‘कामप्रश्नं’ इच्छयाप्रश्नम्. एव वरं वव्रे तं हास्मै ददौ | ॥ २६ ॥

      स हेति | लब्धवरः अब्जयोनिः , नारायणम् उवाच, योऽवताराणामिति | हे विश्वाश्रय तव अवताराणां मध्ये, यः, श्रेष्ठोवतारः , सः को भवति | येनेति | येन अवतारेण हेतुना , लोकास्तुष्टाः, देवास्तुष्टा भवन्ति, यं स्मृत्वा मुक्ता अस्मात् संसारात् भवन्ति | कथं वा, अस्य श्रेष्ठस्य , अवतारस्य , ब्रह्म स्वरूपता ‘भवति’ वर्तते |  ॥ २७ ॥ 

      तो सबसे पहले मुनी ने नारायण  का नारायणत्व क्या है यह बताया  जिनमें  लोक ओत-प्रोत हैं ,  जैसे ताना-बाना होता है न वस्त्रों में; एक दुसरे से मिला हुआ, ऐसे ही ये जगत और जगदीश्वर एक हैं।{ सीधे धागों को ओत कहते हैं और आड़े धागों को प्रोत कहते हैं }  इन्ही नारायण के हृदय कमल से उत्पन्न होने के कारण ब्रह्मा को  अब्ज-योनि, पद्म-गर्भ,  कहते हैं, उन ब्रह्मा ने  तप करके अर्थात् विचार करके इनका साक्षात्कार किया तब इन्ही नारायण जी ने ब्रह्मा जी को कहा कि वर माँगो तब ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं जो भी प्रश्न पूछूँ आप उसका उत्तर

 दीजिये यह वर मैं आपसे माँगता हूँ । तब नारायण ने कहा तथास्तु | जब  ब्रह्मा जी को वर प्राप्त होगया तब उन्होंने नारायण से  प्रश्न पूंछा –  कि हे विश्वाश्रय ! आपके सब अवतारों में श्रेष्ठतम अवतार कौन सा  है, जिनकी पूजा , स्मरण तथा ध्यान करने से  सभी लोकों के सारे लोग संतुष्ट हो जाते हैं, सभी देवता संतुष्ट हो जाते हैं , जिनका स्मरण करके आवागमन से मुक्त हो जाते हैं , इस संसार सागर से पार हो जाते हैं? और किस प्रकार आपके इस श्रेष्ठ अवतार की ब्रह्मस्वरूपता सिद्ध  होती है ? ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥

  || मूल उपनिषद ||

     स होवाच तं हि  नारायणो देवः । सकाम्या मेरोः शृङ्गे

यथा सप्तपुर्यो भवन्ति तथा निष्काम्याः सकाम्या

भूगोलचक्रे सप्त पुर्यो भवन्ति । तासां मध्ये साक्षाद्ब्रह्म गोपालपुरी हीति । ॥ २८॥

सकाम्या निष्काम्या देवानां सर्वेषां भूतानां भवति ।

 यथा हि वै सरसि पद्मं तिष्ठति तथा भूम्यां तिष्ठतीति ।

 चक्रेण रक्षिता हि मथुरा । तस्माद् गोपालपुरी भवति | ॥ २९॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

          ‘स होवाच तंहि नारायणो देवः’ |  किम् | ‘सकाम्याः’  काम फलेन सहिताः,  

   ‘मेरोः शृङ्गे’   ‘यथा सप्त पुर्य्यो भवन्ति,’ तथा निष्काम्याः मोक्षदाः , ‘सकाम्याः’ कामफलदाः , अधिकारितारतम्येन ‘भूगोलचक्रे’ सप्त पुर्य्यः अयोध्यामथुरादयः भवन्ति | तासां पुरीणां मध्ये ‘गोपालपुरी’ गोपालवेशस्य विष्णोराश्रयभृता पुरी, यद्वा गवां चक्रेण पालिता ‘गोपालपुरी’ मथुरा ‘हि’ निश्चितं ‘साक्षात् ब्रह्म’ भवति, ब्रह्म प्रकाशकत्वात् |॥ २८॥

  ‘सकाम्या’, ‘निष्काम्या’, देवानां, सर्वेषां, भूतानां, च यथाभजनं भवति , यथा सरसि पद्मं तिष्ठति तथा भूम्यां गोपालपुरी तिष्ठति , इति गोपालपुरीत्यस्य व्युत्पत्तिं वदन् सर्वसिद्धसंज्ञां दर्शयति |  चक्रेण रक्षिता हि मथुरा , ‘तस्माद्गोपालपुरी भवति’ |  ॥ २९॥

                             || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

नारायण ने ब्रह्मा जी को बताया:  कि  नारायण देव के संकल्प से मेरु पर्वत पर देवताओं की सात पुरियों का निर्माण होता है । तो जो देवलोक में देवताओं की पुरियां हैं वो सकाम कही जाती हैं  जैसे १ इंद्र की अमरावती २ अग्नि की अशोकवती  ३ वरुण की  भोगवती ४ ईशान की सिद्धवती ५ वायु की गान्धर्ववती ६ कुबेरकी अलकावती ७ निर्ऋतिकी  यशोवती  और ब्रह्मलोक से सम्बन्धित जो पुरियां हैं वो निष्काम कही जाती हैं – तो निष्काम और सकाम, जैसे पितृलोक, इन्द्रलोक सकाम हैं और महः ,  जनः, तपः, सत्यम्  निष्काम हैं ।  इसी प्रकार से भूलोक में गोपाल की सात पुरियां होती हैं १ अयोध्या २ मथुरा ३ हरिद्वार ४ काशी ५ काञ्ची ६ उज्जैन ७ द्वारका  तो इस भूगोल चक्र के मध्य स्थान में  जो गोपाल पुरी है वो मथुरा साक्षात् ब्रह्मस्वरूपा है ।॥ २८॥

 इन पुरियोंमें सभी प्रकार के सकाम जीवात्मा प्राणी और देवता निवास करते हैं | यदि व्यक्ति भजन करे तो इन पुरियों के प्रभावसे सकामता से  निष्कामता की ओर अग्रसर होता है । अतः इन स्थानों में भक्ति करनी चाहिए,  यहाँ यदि सत्संग लाभ होजाय तो भजन में मन लगता है । और भजन के तारतम्य से सकामता से निष्कामता की ओर बढ़ा जा सकता है | जैसे तालाब में एक कमल रहता है वैसे ही स्थल कमल भी होता है तो इस ब्रह्मतत्व में भूमि एक सरोवर के समान  रहती है और इस भूमि का केंद्र है मथुरा, जो एक कमल के समान है और यह सुदर्शन चक्र से रक्षित है  अतः इसको गोपाल पुरी कहते हैं । मथ्यते तु जगत्सर्वं ब्रह्मज्ञानेन येन वा। तत्सारभूतं यद्यस्यां मथुरा सा निगद्यते॥ अर्थात्‌ जिस ब्रह्म ज्ञान एवं भक्तियोग से सारा जगत्‌ मथा जाता है और उसके परिणाम स्वरूप यानी ज्ञानी और भक्तों का संसार लय हो जाता है, वह सारभूत ज्ञान और भक्ति जिसमें सदा विद्यमान रहते हैं, वह मथुरा कहलाती है। मतलब मंथन  से निकला  हुआ  सार  मथुरा है    ॥ २९॥

  || मूल उपनिषद ||

       बृहद्   वृहद्वनं मधोर्मधुवनं तालस्तालवनं काम्यं काम्यवनं बहुलो बहुलवनं कुमुदं कुमुदवनं 

खदिरः खदिरवनं भद्रो भद्रवनं भाण्डीर इति भाण्डीर वनं श्रीवनं लोहवनं

 वृन्दाया वृन्दावनमेतैरावृता पुरी भवति ।॥ ३०॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

     सा च मथुरा द्वादशवनैरावृता भवतीत्याह , वृहदिति | ‘वृहत्’  महद्भूतं , इति कारणात् वृहद्वनम् ’ एकं (१)  | ‘मधोः’ दैत्यस्य , सम्बन्धि इतिकारणात् ‘मधुवनं,’ द्वितीयं (२) |    ‘तालः’, वर्तत इतिकारणात् ‘तालवनं,’ तृतीयं  (३) | ‘काम्यं’ कामदेवः, वर्तत इति काम्यवनं, चतुर्थं (४) | ‘बहुलः,’ वर्तत इति बहुलवनं , पञ्चमं (५) | कुमुदं , वर्तत

 इतिकारणात् ‘कुमुदवनं,’ षष्ठं (६) | ‘खदिरः,’  वर्तत  इतिकारणात् ‘खदिरवनं,’ 

  सप्तमं (७) | ‘भद्रः,’ वृक्षविशेषः, वर्तत इतिकारणात् अथवा बलभद्रो खेलति यत्र इति  ‘भद्रवनं,’  अष्टमं  (८) | ‘भाण्डीरः,’   इति नाम वटः, वर्तते इतिकारणात् ‘भाण्डीरवनं,’ नवमं (९) | श्रीः रमा , तस्याः, तस्मिन् साधकानां शीघ्रमाविर्भावात् तद्वनं ‘श्रीवनं,’ दशमं    (१०) लोहः नाम कश्चिदसुरः, सः तपसा यत्र सिद्धिं प्राप्तः, तत् ‘लोहवनं,’ एकादशं (११) | 

वृन्दायाः , वनं , वृन्दावनं , द्वादशं (१२) | ॥ ३०॥

                           || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

इस गोपालपुरी मथुराके चारों ओर बारह वन हैं, एक बृहत् वन है जो बहुत बड़ा है ।  दूसरा मधुदैत्य से सम्बन्धित होने के कारण  मधुबन कहलाता है , अथवा  जिसमें बहुत ही मीठेमीठे फल होते हैं ऐसा मधुबन है । जिसमें बहुत से ताल के वृक्ष हैं, उसको ताल वन कहते हैं । जहाँ कामदेव निवास करते हैं ,अथवा जो कामनाओं  की पूर्ती करने वाला है, वो काम्यवन है । जहाँ पर अनेक वृक्ष जातियों का  बाहुल्य है उसका नाम  बहुल वन है । जिसमें बहुत कुमुद खिलते हैं उसका नाम है कुमुदवन । जिसमें बहुत से कत्था के पेड़ हैं उसको खदिरवन कहते हैं ।भद्र नाम का एक वृक्ष विशेष जहाँ बहुतायत में होता है , अथवा  जो मोक्ष देने वाला, कल्याण देने वाला है , या फिर बल भद्र की जो क्रीड़ास्थली है वो भद्र वन है । भाण्डीर नाम का वटवृक्ष जिस  वन में है , अथवा  जहाँ सब प्रकार के तत्त्वज्ञान तथा ऐश्वर्य-माधुर्यपूर्ण लीला-माधुरियों का संपूर्ण रूप से प्रकाश हो, उसे भाण्डीरवन कहते हैं।, श्री वन,को { विल्ववन भी कहते हैं, अथवा शोभा युक्त वन } अथवा  जहाँ साधकोंको शीघ्र सिद्धिलाभ हो वह श्री वन है |   लौहवन, जहां लोहासुर ने तप करके सिद्धि प्राप्त की थी , अथवा {श्रीकृष्ण ने यहीं पर गोचारण करते समय लोहजंघासुर का वध किया था } |   वृन्दावन { जहां तुलसी की झाड़ियां अधिक मात्रा में हों वह वृन्दावन  इन सब वनों से ढकी हुई, घिरी हुई ये गोपालपुरी मथुरा है ।॥ ३०॥

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  || मूल उपनिषद ||

       तत्र तेष्वेव गहनेश्वेव देवा मनुष्या गन्धर्वा नागाः किंनरा गायन्तीति नृत्यन्तीति ।॥ ३१॥

    तत्र द्वादशादित्या एकादश रुद्रा अष्टौ वसवः सप्त मुनयो ब्रह्मा नारदश्च पञ्च विनायका

वीरेश्वरो रुद्रेश्वरोऽम्बिकेश्वरो गणेश्वरो नीलकण्ठेश्वरो विश्वेश्वरो

गोपालेश्वरो भद्रेश्वर इत्यष्टावन्यानि लिङ्गानि चतुर्विंशतिर्भवन्ति ।॥ ३२॥

    द्वे वने स्तः कृष्णवनं भद्रवनम् । तयोरन्तर्द्वादश वनानि

पुण्यानि पुण्यतमानि । तेश्वेव देवास्तिष्ठन्ति । सिद्धाः सिद्धिं प्राप्ताः ।॥ ३३॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

      तत्र तेश्वेवेति |  ‘तत्र’  मथुरासमीपे, ‘तेश्वेव’ द्वादशमपि एवंविधेषु प्रागुक्तप्रकारेषु,

  ‘गहनेषु’ ‘देवाः,’   ‘मनुष्याः,’  ‘गन्धर्वाः,’  ‘नागाः,’  ‘किंन्नराः,’  ‘इति’  प्रसिद्धं ,

   ‘नृत्यन्तीति’   ॥ ३१॥   

        ‘तत्र’  तेषु द्वादशषु अपि वनेषु द्वादशादित्या इति |  वरुणः (१) सूर्यः (२) वेदाङ्गः (३) 

  भानुः (४) इन्द्रः (५) रविः (६) गभस्तिमान् (७) यमः (८) हिरण्यरेताः (९) दिवाकरः (१०)       मित्रः (११) विष्णुः (१२) |

   एकादश रुद्रा इति |

 वीरभद्रश्च शम्भुश्च गिरिशश्च तृतीयकः ।[अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च तथापरः ।।

 भुवनाधीश्वरश्चैव कपाली च विशांपतिः । स्थाणुर्भग इति प्रोक्ता   रुद्रा एकादशाद्भुताः ।।

    अष्टौवसव इति  |

   ध्रुवो धरश्च सोमश्च आपश्चैवाऽनिलोऽनलः ।

   प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः । ।

   सप्त मुनय इति | 

  कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः।

  जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते मुनयः स्मृताः॥ 

  ‘ब्रह्मा,’ ‘नारदश्च’ | पञ्च विनायकाः , ‘‘मोदः  (१)  प्रमोदः (२) आमोदः  (३) सुमुखः (४)    दुर्मुखः  (५) तथा’’ इति प्रोक्ताः | वीरेश्वरः (१) रुद्रेश्वरः (२) अम्बिकेश्वरः (३) गणेश्वरः (४) नीलकण्ठेश्वरः (५) विश्वेश्वरः (६) गोपालेश्वरः (७) भद्रेश्वरः (८) इति अष्टौ लिङ्गानि | तथा 

  ‘अन्यानि,’  ‘चतुर्विंशति लिंगानि भवन्ति’ ॥ ३२॥

   द्वे वने इति | ‘द्वेवने,’ ‘स्तः’ वर्तेते, एकं ‘कृष्णवनं’ | द्वितीयं ‘भद्रवनं’ | ‘तयोः’ द्वयोर्वनयोः ,   ‘अन्तः’ मध्ये , ‘द्वादश वनानि’ , भवन्ति | कानिचित् ‘पुण्यानि,’ कानिचित् ‘पुण्यतमानि,’   ‘तेषु,’ समस्तेषु, अपि ‘सिद्धाः’ जातिविशेषाः , ‘देवाः’ , ‘तिष्ठन्ति’ | कीदृशाः सिद्धा देवाः , ‘सिद्धिं प्राप्ताः’ ॥ ३३॥     

                                           || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

        वहीं मथुरा के समीप ही इन बारह वनों में  देवता, मनुष्य, गन्धर्व, किन्नर और नाग  गान करते हैं और नृत्य करते हैं ।  ॥ ३१॥ 

वहाँ उस दिव्य मथुरा धाम के बारह वनों में   १२ आदित्य,  वरुणः (१) सूर्य (२) वेदाङ्गः (३) भानुः (४) इन्द्रः (५) रविः (६) गभस्तिमान् (७) यमः (८) हिरण्यरेता (९) दिवाकरः (१०)  मित्रः (११) विष्णुः (१२) | पुराणान्तर में पाठ भेद से उनके नामों का क्रम भिन्न मिलता है | 

यथा –  { १ अंशुमान, २ अर्यमा , ३  इन्द्र,  ४ त्वष्टा, ५  धाता , ६  पर्जन्य,  ७ पूषा,  ८ भग,  ९  मित्र, 

 १० वरुण, ११ विवस्वान और १२  विष्णु। } |

 ११ रुद्र, वीरभद्र  (१)  शम्भू  (२)  गिरिशः  (३)  अजैकपाद (४)  अहिर्बुध्न्य (५)  पिनाकी (६) 

 भुवनाधीश्वर (७)  कपाली (८)  विशांपतिः (९)  स्थाणुः  (१०)  भगः (११)  ये ग्यारह रुद्र हैं । पुराणान्तर में इनके अन्य नाम इस प्रकार दिए हुए हैं  {१ – कपाली २ – पिंगल ३ – भीम ४ – विरुपाक्ष

 ५ – विलोहित ६ – शास्ता ७ – अजपाद ८ – अहिर्बुध्न्य ९ – शंभू १० – चण्ड ११ – भव } 

  ८ वसु,  { १ . आप, २ . ध्रुव, ३ . सोम, ४ . धर, ५ . अनिल, ६ . अनल, ७ . प्रत्यूष और ८ . प्रभाष। }  ध्रुवो धरश्च सोमश्च आपश्चैवाऽनिलोऽनलः । प्रत्युष श्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः । ।

 ७ मुनि, { क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरस, वशिष्ठ तथा मरीचि हैं। 

   कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः। जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते मुनयः स्मृताः॥ 

    पांच विनायक,   पञ्च विनायकाः , ‘‘मोदः  (१)  प्रमोदः (२) आमोदः  (३) सुमुखः (४)    दुर्मुखः  (५) { पंचविनायक-१ मोद, २ प्रमोद, ३ दुर्मुख,४सुमुख और ५गणनायक.}  | 

८ लिङ्ग – वीरेश्वरः (१) रुद्रेश्वरः (२) अम्बिकेश्वरः (३) गणेश्वरः (४) नीलकण्ठेश्वरः (५) विश्वेश्वरः (६) गोपालेश्वरः (७) भद्रेश्वरः (८) इति अष्टौ लिङ्गानि | वीरेश्वर, रुद्रेश्वर, अम्बिकेश्वर, गणेश्वर,नीलकण्ठेश्वर, विश्वेश्वर, गोपालेश्वर, भद्रेश्वर – ये आठ बड़े महत्त्वपूर्ण लिङ्ग हैं ।   

 { लीनंगमयति, बोधयति इति लिङ्गम् |  -जिससे लीन अर्थ का ज्ञान हो उसे लिंग कहते हैं |} अर्थात जो लीन सत्ता को प्रकट करता है वह लिंग है  इसका तात्पर्य यह हुआ कि जो बाह्य इन्द्रियों के लिए अगोचर हैं , उन पदार्थों को अभिव्यक्त करने वाले को लिंग कहा जाता है। 

 दूसरी व्युत्पत्ति है- { लयनाल्लिङ्गमित्याहुः |}  जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि का विलय हो जाये वह लिङ्ग है |     

तीसरी  व्युत्पत्ति है –  { लीनं प्रच्छन्न स्वरूपं प्रकटयति यत् तत् लिङ्गम् |} अर्थात् जो चिन्ह परब्रह्म परमात्मा के गुप्त स्वरूप का अवबोधन करा दे , वह लिङ्ग है |  सूक्ष्मत्वात्कारणत्वाच्च लयनाद् गमनादपि । लक्षणात्परमेशस्य लिङ्गमित्यभिधीयते ॥ (योगशिखोपनिषद्, २/९, १०) न्याय शास्त्र में लिंग को “हेतु” भी कहा जाता है । और इसके अतिरिक्त चौबीस अन्य शिवलिंग भी यहाँ हैं जो  गायत्री के २४ अक्षरों के प्रतीक हैं | प्रकृति में भी २४ तत्व कहे गए हैं  – ५ महाभूत, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ प्राण, ४ अन्तःकरण; तो यही चौबीस तत्व जो ब्रह्मा , विष्णु , महेश के स्वरूप हैं अर्थात  एकादश रूद्र, द्वादश आदित्य और  ब्रह्मा जी; ये मिलाकर के, २४ होकर के २४ तत्व हो जाते हैं |॥ ३२॥

  और यहाँ इस मथुरा क्षेत्र में मुख्य रूप से दो वन हैं, कृष्ण वन और भद्रवन, कृष्ण वन – मोक्ष देने वाला और भद्रवन – जो संसार के भोगों को  देने वाला है । उनके अन्दर १२ वन हैं, उनमें से कुछ पवित्र हैं और कुछ  परम पुण्यतम हैं, उन सभी वनों में  में देवता लोग निवास करते हैं, तथा सिद्ध लोग जो सिद्धि को प्राप्त कर चुके  हैं, वे सब लोग यहाँ निवास करते हैं | ॥ ३३ ॥

  || मूल उपनिषद ||

तत्र हि रामस्य राममूर्तिः प्रद्युम्नस्य प्रद्युम्नमूर्तिरनिरुद्धस्य अनिरुद्धमूर्तिः कृष्णस्य कृष्णमूर्तिः ।॥ ३४॥

 वनेश्वेवं मथुरास्वेवं द्वादश मूर्तयो भवन्ति । ॥ ३५॥

 एकां हि रुद्रा यजन्ति । द्वितीयां हि ब्रह्मा यजति । तृतीयां ब्रह्मजा यजन्ति । चतुर्थीं मरुतो यजन्ति । पञ्चमीं विनायका यजन्ति । षष्ठीं च वसवो यजन्ति । सप्तमीमृषयो यजन्ति । अष्टमीं गन्धर्वा यजन्ति |   नवमीमप्सरसो यजन्ति । दशमी वै ह्यन्तर्धाने तिष्ठति । एकादशमेति स्वपदं गता { स्वपदानुगा } द्वादशमेति भूम्यां तिष्ठति । ॥ ३६॥

तां हि ये यजन्ति ते मृत्युं तरन्ति । मुक्तिं लभन्ते । गर्भजन्मजरामरणतापत्रयात्मकं दुःखं तरन्ति ।॥ ३७॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

अत्र हेतुं वदन्नेव श्रेष्ठावतारमाह, तत्र हीति | ‘हि’ यस्मात् ‘तत्र’ तेषु ,  ‘रामस्य’ बलदेवस्य,

  ‘रामाख्या’ ‘मूर्तिः’ ‘प्रद्युम्नस्य’, ‘प्रद्युम्नाख्या’ ‘मूर्तिः’ ‘अनिरुद्धस्य,’ अनिरुद्धाख्या मूर्तिः, 

  ‘कृष्णस्य,’ कृष्णाख्या मूर्तिः अस्तीत्यर्थः | ॥ ३४॥ 

  एवम्प्रकाराः तेष्वेव ‘वनेषु’ तथा एवम्प्रकाराः ‘मथुरासु’ मथुराप्रदेशेषु , ‘द्वादशमूर्तयः’ | रौद्री   (१) ब्राह्मी (२) दैवी (३) मानवी (४) विघ्ननाशिनी (५) काम्या (६) आर्षी (७) गान्धर्वी (८) गौः (९) अन्तर्धानस्था (१०) स्वपदङ्गता (११) भूमिस्था (१२) ॥ ३५॥

     द्वादशमूर्तीनां प्रत्येकमुपासकानाह | ‘एकां हि रुद्रा यजन्ति ’ |  ‘द्वितीयां ब्रह्मा यजति’ | ‘तृतीयां’ , ‘ब्रह्मजाः’ सनत्कुमारादयः, ‘यजन्ति’ |  ‘चतुर्थीं ,’ ‘मरुतः’ मरुद्गणाः, ‘यजन्ति’ |    ‘पञ्चमीं’ विनायका यजन्ति’ |  ‘षष्ठीं वसवो यजन्ति’ | ‘सप्तमीमृषयो यजन्ति’ |  ‘अष्टमीं गन्धर्वा यजन्ति’ | ‘नवमीमप्सरसो यजन्ति’ | ‘दशमी वै,’ ‘अन्तर्धाने तिष्ठति’ गुप्ता तिष्ठति, इत्यर्थः | ‘एकादशमेति,’ या प्रसिद्धा, सा ‘स्वपदं’ विष्णुपदं आकाशाख्यं, ‘गता’ प्राप्ता | ‘द्वादशमेति,’ या प्रसिद्धा, सा ‘भूम्यां तिष्ठति’ | ॥ ३६॥

   { (१) प्रकृष्टं द्युम्नं द्रविणं यस्यास्तादृशी प्रद्युम्नस्य मूर्तिः }

   { (२) न निरुद्धा अनिरुद्धा प्रत्यक्षासौ मूर्तिश्च }

   { (३) कृष्णा श्यामा चासौ मूर्तिश्च कृष्णमूर्तिः } 

   { (४) एकां प्रथमां रामस्यमूर्तिं वृहद्वनस्थां रुद्रा रुद्रलोके | } 

   { (५) द्वितीयां प्रद्युम्नस्य मूर्तिं मधुवनस्थां ब्रह्मा ब्रह्मलोके | }

   { (६) तृतीयां अनिरुद्धमूर्तिं तालवनस्थां ब्रह्मजाः सनत्कुमारादयः सत्यलोके |}

   { चतुर्थीं कृष्णमूर्तिं काम्यवनस्थां मरुतो देवाः देवलोके | }

   { पञ्चमीं पुनः राममूर्तिं बहुलवनस्थां विनायकाः | }

   { षष्ठीं पुनः प्रद्युम्नमूर्तिं कुमुदवनस्थां वसवो यजन्ति | } 

   { (७) सप्तमीं पुनरनिरुद्धमूर्तिं खदिरवनस्थां ऋषयो यजन्ति | } 

   { (८) अष्टमीं पुनः कृष्णमूर्तिं भद्रवनस्थां गन्धर्वाः यजन्ति | }

   { (९) नवमीं पुनरपि भाण्डीरवनस्थां राममूर्तिं अप्सरसो यजन्ति | }

  { (१०) दशमीं श्रीवनस्थां प्रद्युम्नमूर्तिरन्तर्धाने तिष्ठतीति सा कदाऽपि न प्रकटीभवतीति       तस्या उपासका अपि न सन्ति | } 

  { (११) एकादशीं लोहवनस्था अनिरुद्धमूर्तिः स्वपदं द्वारकां श्वेतद्वीपं वा गता | } 

  {  (१२) द्वादशीं  वृन्दावनस्था कृष्णमूर्तिर्भूम्यां प्रकटीभूय श्रीगोविन्द गोपाल गोवर्धनधर गोपीनाथाद्यभिधाना भूम्यां तिष्ठति

   तत्पूजकानां फलातिशयमाह, तां हीति | ‘तां’ भूमिष्ठां मूर्तिं, ‘ये यजन्ति’ , ‘ते,’ ‘मृत्युं’ अविद्याकामकर्माख्यं, ‘तरन्ति’ तद्विमुक्ता भवन्ति, इत्यर्थः | ‘मुक्तिं लभन्ते’ | ‘गर्भजन्मजरामरणतापत्रयात्मकं’ आध्यात्मिकाधिदैविकाभौतिकतापत्रयोत्थं,  ‘दुःखं तरन्ति’ , दुःखहेतूनामविद्यादीनां निवृत्तत्वादित्यर्थः | ॥ ३७॥

                                       || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

       वहीं पर { मथुरा में ही } राम की राममूर्ति यानि के बलराम की मूर्ति – सङ्कर्षण तत्व, प्रद्युम्न माने काम-मूर्ति, अनिरुद्ध माने अहंकार की मूर्ति और कृष्ण-वासुदेव माने परब्रह्म की मूर्ति है । ॥ ३४॥

 इस प्रकार पहले वृन्दावन के वनों का वर्णन किया और जैसे उन वनों में द्वादश मूर्तियों  वर्णन किया, वैसे मथुरा में भी यही स्थिति है । वहां पर भी द्वादश वनों में द्वादश मूर्तियां होती है । उन मूर्तियों के नाम इस प्रकार हैं – रौद्री   (१) ब्राह्मी (२) दैवी (३) मानवी (४) विघ्ननाशिनी (५) काम्या (६) आर्षी (७) गान्धर्वी (८) गौः (९) अन्तर्धानस्था (१०) स्वपदङ्गता (११) भूमिस्था (१२) ॥ ३५॥ 

 अब उन बारह मूर्तियों के उपासकों के नाम बताते हैं ,  इनमें  से एक मूर्ति का रूद्र भजन करते हैं और दूसरी मूर्ति का ब्रह्मा जी भजन करते हैं, तीसरी मूर्ति का सनत्कुमार आदि, नारदादि जो ब्रह्मा के पुत्र हैं वो तीसरी मूर्ति का भजन करते हैं और चौथी की  मरुद्गण उपासना करते हैं । तो मूर्तियां हैं चार, उनका क्रम यह है – वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध । जो पांचवी मूर्ति है उसकी  विनायक लोग पूजा करते हैं, छठी की वसु लोग पूजा करते हैं, सातवीं की ऋषिगण पूजा करते हैं , आठवीं मूर्ति की गन्धर्व लोग उपासना करते हैं , नौवीं की अप्सराएं पूजा करती हैं, दसवीं मूर्ति अंतर्धान रूप से, अव्यक्त , अप्रकट रूप से रहती है | ग्यारहवीं मूर्ति स्वपदानुगा, 

{ स्वपद माने विष्णु पद अर्थात आकाश में अथवा द्वारका या श्वेतद्वीप में अपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित रहती है |  जो भगवान के परम भक्त हैं, वो उसकी पूजा करते हैं और बारहवीं भगवान की मूर्ति भूमि पर विराजती है । जो कि भूमि पर  प्रकट होकर  श्री गोविन्द ,गोपाल, गोवर्धनधर, गोपीनाथ आदि नामों से जानी जाती है |  तो इस प्रकार से भगवान की १२ मूर्तियां बतायीं । मुख्य तो चार हैं लेकिन द्वादशादित्य के रूप से भगवान् की १२ मूर्तियां हो जाती हैं । ॥ ३६॥

 अब इनकी जो उपासना करते हैं उनको क्या विशेष फल मिलता है सो बताते हैं | जो भूलोक में रहनेवाली कृष्ण की  मूर्ति की उपासना करते हैं वो मृत्यु से, यानि के अज्ञान से तर जाते हैं | { मृत्यु माने अविद्या , काम और कर्म } जिनके अविद्या , काम और कर्म छूट गए हैं वे ही मृत्यु से मुक्ति को प्राप्त करते हैं । उन्हें गर्भ-जन्म, जरा, मरण, तापत्रय { आध्यात्मिक माने शरीर की और मन की बीमारियाँ ,   आधिदैवक माने ग्रह नक्षत्रों से उत्पन्न पीड़ा और आधिभौतिक माने  महामारी , भूकंप , ज्वालामुखी का फटना , अतिवृष्टि , अनावृष्टि आदि के दुःख, ये सब नहीं देखने पड़ते, इन सबसे तर जाते हैं ।}   दुःख का मूलकारण अविद्या माने नासमझी ही है | विद्या का प्रकाश होते ही समस्त दुःखों की आत्यन्तिकी निवृत्ति हो जाती है |‘‘ योऽन्यथासन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते। किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा। इति।’’ ‘जो अन्य प्रकारका (अविनाशी) होते हुए भी आत्मा को अन्य प्रकारका (विनाशी) मानता है, उस आत्मघाती चोर ने कौन-सा पाप नहीं किया ?’ ॥ ३७॥

  || मूल उपनिषद ||

तदप्येते श्लोका भवन्ति ।

  प्राप्य मथुरां पुरीं रम्यां सदा ब्रह्मादिसेविताम् ।

शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गरक्षितां मुसलादिभिः ॥ ३८ ॥

यत्रासौ संस्थितः कृष्णस्त्रिभिः शक्त्या समाहितः ।

रामानिरुद्धप्रद्युम्नै रुक्मिण्या सहितो विभुः ॥ ३९॥

चतुःशब्दो भवेदेको ह्योंकारः समुदाहृतः । ॥ ४० ॥

  || संस्कृत व्याख्या || 

      उक्तेर्थे  मन्त्रसम्मतिमाह, तदपीति | ‘तत्’ तत्र मथुरायाः कृष्णाश्रयत्वे ब्रह्मादिसेवितत्वे च ‘एते श्लोकाः’ मन्त्रा अपि , ‘भवन्ति,’ इत्यर्थः | प्राप्य मथुरां पुरीं रम्यामिति | तां 

 ‘मथुरां पुरीं प्राप्य’ , देवाः मनुष्याः गन्धर्वादयस्तिष्ठन्तीतिशेषः | कीदृशीं, ‘शङ्ख चक्र गदाशार्ङ्गरक्षितां,’ तथा ‘मुसलादिभिः’ बलदेवाद्यायुधैः, उपरक्षितां, इत्यर्थः | ॥ ३८ ॥

        यत्रासाविति | ‘त्रिभिः’  बलदेवादिभिः ‘शक्त्या’ रुक्मिण्या , सहितः ‘कृष्णः’ , ‘यत्र संस्थितः’ , तां पुरीं ‘प्राप्य,’ देवादयस्तिष्ठन्तीति सम्बन्धः | इदमेव विवृणोति, रामानिरुद्ध – प्रद्युम्नैरिति | ॥ ३९॥

        तदेवं कृष्णावतारोऽवताराणां श्रेष्ठो मथुरा चास्य स्थानमित्युक्तं भवति | कथं वै अस्य ब्रह्मता भवतीत्यादेरुत्तरं वक्तुं प्रणवार्थत्वमाह, चतुरिति | चत्वारः, शब्दाः, रामानिरुद्धादयो वाचकाः, यस्य ‘चतुः शब्दः’ चतुर्व्यूहः | ‘एकः’ ईश्वरः, ‘भवेत्’ भवति | अत्र हेतुमाह, ह्योङ्कारस्येति | ‘हि’ यस्मात् कारणात् , ‘ओङ्कारस्य’ अकारोकारमकारार्धमात्ररूपैः

  ‘अंशैः’ ‘कृतः’ रामप्रद्युम्नानिरुद्धकृष्णाभिधेयो व्यूहसमुदाय इत्यर्थः | ॥ ४० ॥

                                   || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

    अब यह मथुरा कृष्ण के आश्रित है और ब्रह्मादि देवताओं द्वारा  सेवित है यह बताने के लिए आगे के मन्त्रों में वर्णन करते हैं | मधुर रमणीय मथुरा को प्राप्त करके यानी जानकर के कि ये जो मथुरा है सो कृष्ण का आश्रय है , अथवा कृष्णाश्रित है   ब्रह्मा आदि देवता , मनुष्य और गन्धर्वादि सभी लोग यहाँ रहते हैं | ये मथुरा कैसी है तो इसके उत्तर में बताते हैं  कि  शङ्ख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष के द्वारा सुरक्षित है, और बलदेव के मुसलादि आयुधों से सुरक्षित है | ॥ ३८ ॥

 जहाँ पर ये भगवान कृष्ण अपनी  तीन विभूतियों बलदेव आदि के साथ  और अपनी आत्मशक्ति रुक्मिणी जी के साथ विराजमान रहते हैं  | जैसे के आत्मदेव अपनी अनेक वृत्तियों से घिरे रहते है उसी तरह ये कृष्ण स्वरूप परमात्मा  अनेक स्त्री-पुरुष रूपी शक्तियों से घिरे हुए, समाहित, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं ।  रमा माने लक्ष्मी, रुक्मिणी और अनिरुद्ध-प्रद्युम्न, बलदेव इन सबके साथ, ये सर्व व्यापक जो आकाश के समान हैं, वो वहाँ विराजमान हैं । जैसे  मीठेजल में चीनी व्याप्त होती और जल व्यापक होता बैसे ही श्री कृष्ण रूपी ब्रह्ममें जगत व्याप्त है और श्री कृष्ण व्यापक हैं | { जो व्याप्य होता है वो छोटा होता है और जो व्यापक होता है वो बड़ा होता है | इसीको कार्यब्रह्म और कारणब्रह्म अथवा अपरब्रह्म और परब्रह्म भी कहते हैं | } ॥ ३९॥

      इसलिये यह कृष्णावतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ है और मथुरा पुरी ही इनका स्थान { धाम } है | अब इनकी ब्रह्मता कैसे सिद्ध होती है इसके उत्तर में प्रणव के अर्थ को समझाते हैं |   जैसे चार अक्षरों से मिलकर ॐकार बनता  है; अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रा अथवा जागृत स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय उसी प्रकार से ये जो परम देव श्रीकृष्ण हैं, ये  भी चतुर्व्यूहात्मक हैं | व्यूह माने समुदाय { जैसे मन ,बुद्धि , चित्त और अहंकार के समुदाय का नाम एक अंतःकरण होता है वैसे ही समष्टि चेतना का नाम एक ईश्वर होता है | } मन के देव प्रद्युम्न हैं , बुद्धि के देव संकर्षण हैं , चित्त के देव वासुदेव हैं और अहंकार के देव अनिरुद्ध हैं |  ॥ ४० ॥

  || मूल उपनिषद ||

तस्माद्देवः परो रजसेति सोऽहमित्यवधार्यात्मानं गोपालोऽहमिति भावयेत् ॥ ४१ ॥ 

स मोक्षमश्नुते । स ब्रह्मत्वमधिगच्छति । स ब्रह्मविद्भवति । ॥ ४२ ॥

स गोपान्   जीवान् वै   आत्मत्वेनासृष्टिपर्यन्तमालाति । स गोपालो भवति । ओं तत् यत् सोहं  परं ब्रह्म कृष्णात्मको नित्यानन्दैकरूपः सोहमोन्तद् गोपाल एव परं  सत्यमबाधितं सोऽहमित्यात्मानमादाय मनसैक्यं कुर्यात् । आत्मानं गोपालोऽहमिति भावयेदिति  स एवाव्यक्तोऽनन्तो नित्यो गोपालः ।॥ ४३ ॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

    यं च स्मृत्वा मुक्ता अस्मात् संसारादित्यस्योत्तरमाह , तस्मादिति | ‘तस्मात्’ प्रणवाभिधेयात् ,    ‘रजसः’ कामकर्मात्मकात् ,  ‘परः’  इत्येवंविधो यः, ‘देवः,’ 

  ‘सोऽहमिति,’  ‘अवधार्य्य’ मनसा निश्चित्य ‘आत्मानं’  ‘ गोपालोहऽमिति भावयेत् | रजसेति सन्धिश्च्छान्दसः | आत्मस्वरूपगोपालात्माहमित्युपासीतेति वाक्यार्थः | ॥ ४१ ॥ 

  विशिष्टोपास्तेः फलानि दर्शयति | ‘सः’ उपासकः , ‘मोक्षम्’ अविद्याकामकर्म्मवियोगम्,   ‘अश्नुते’ ‘सः,’‘ब्रह्मत्वं’ सर्वबृहत्त्वम्, ‘अधिगच्छति’ अत्र हेतुमाह, स ब्रह्मविद् भवतीति, ॥४२॥

      व्युत्पत्तिपूर्वकं गोपालकत्वं दर्शयति | ‘गोपान्’ जीवान् , ‘आत्मत्वेन,’ ‘आसृष्टिपर्यन्तम्,’ 

  ‘आलाति’ आदत्ते स्वीकरोति | पदार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह , स गोपालो भवतीति | गोपालत्वेन विशिष्टभावनामुक्त्वा कृष्णत्वेन तामाह , ओं तत् यत् सोऽहमिति | ओन्तच्छब्दाभ्यां वाच्यं ‘यत्’ , ‘परं ब्रह्म,’ ‘सोऽहं,’ इत्यवधार्यात्मानं इत्यनुवर्तनीयं , ततः 

  ‘कृष्णात्मको नित्यानन्दैकरूपः,’ ‘अहम्,’ इति भावयेदितिशेषः | कृष्णात्मक इत्यस्यैव व्याख्यानं नित्यानन्दैकरूप इति | कृष सत्तायामिति धात्वर्थान्तशब्दस्य चानन्दार्थत्वात् ब्रह्मात्मैक्यभावनापूर्व्वकं गोपालैक्यभावनामाह ओन्तद्गोपाल एव परं सत्यमिति | ओन्तच्छब्दवाच्यं ‘परं सत्यमवाधितं,’ ‘ब्रह्म,’  ‘गोपाल एव,’ ‘सः’ गोपालः, ‘अहम्,’ ‘इति,’

  ‘आत्मानं,’ ‘मनसा,’ ‘आदाय’  ज्ञात्वा, ‘ऐक्यं कुर्यात्’ | तदेव विवृणोति, आत्मानं गोपालोऽहमिति भावयेदिति | गोपालात्मैक्यभावने हेतुमाह | ‘स एवाव्यक्तोनन्तः’ , तं भावयेदित्यर्थः | मायायामतिव्याप्तिं वारयति , अनन्त इति | देशतोऽनन्तत्वं मायायामपीत्यत आह नित्य इति | पुरुषार्थहेतुतामाह , गोपाल इति | ॥ ४३ ॥ 

                                   || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

         अब ब्रह्मा जी के उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसमें उन्होंने पूछा था कि किसके स्मरण से इस संसार से मुक्ति होती है |  तो इसका  उत्तर है कि उसी प्रणव नाम वाले से जो कि रजोगुण से मुक्त है  रज का अर्थ है कामना और कर्म इस कामकर्मात्मक रजस से जो परे है ऐसा जो शुद्ध ज्ञानात्मक देव है वही मैं हूँ  (माने मायारूपी दृश्य से मुक्त, माया से ऊपर उठ कर  , माया को देखने वाला जो है ) वही मैं हूँ, ऐसी धारणा करके, मन में निश्चय करके दृढ़ समझ प्राप्त करे, कि मैं ही गोपाल हूँ , ऐसी भावना करे तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है । मतलब आत्मरूप  से ही गोपाल की उपासना करे | इसीको अहंग्रहोपासना कहते हैं | मूल में कहा है कि परो रजसेति, और गायत्री का चौथा पाद है – ‘‘ॐ परोरजसे सावदोम् ’’ इसका पदच्छेद होता है { परो रजसे – असौ – अदः ॐ} अर्थात्  रजस से माने क्रियाशक्ति से  , पदार्थ से परे , प्रकाश्य से परे क्योंकि काम, क्रोध आदि दृश्य पदार्थों के लिये ही होते हैं |   ‘‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।’’ रजोगुण से उत्पन्न हुई यह ‘कामना’ है,  यही क्रोध है; |  अतः इस रजोगुण से ऊपर उठकर अपने द्रष्टा स्वरूप में स्थित होना चाहिए। बृहदारण्यकोपनिषद् के भाष्य में भी कहा है कि —  तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे । नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ ७ ॥

तस्या उपस्थानम् — तस्या गायत्र्याः उपस्थानम् उपेत्य स्थानं नमस्करणम् अनेन मन्त्रेण । कोऽसौ मन्त्र इत्याह — हे गायत्रि असि भवसि त्रैलोक्यपादेन एकपदी, त्रयीविद्यारूपेण द्वितीयेन द्विपदी, प्राणादिना तृतीयेन त्रिपद्यसि, चतुर्थेन तुरीयेण चतुष्पद्यसि ; एवं चतुर्भिः पादैः उपासकैः पद्यसे ज्ञायसे ; अतः परं परेण निरुपाधिकेन स्वेन आत्मना अपदसि — अविद्यमानं पदं यस्यास्तव, येन पद्यसे — सा त्वं अपत् असि, यस्मात् न हि पद्यसे, नेति नेत्यात्मत्वात् । अतो व्यवहारविषयाय नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसे । असौ शत्रुः पाप्मा त्वत्प्राप्तिविघ्नकरः, अदः तत् आत्मनः कार्यं यत् त्वत्प्राप्तिविघ्नकर्तृत्वम् , मा प्रापत् मैव प्राप्नोतु ; इति – शब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः ; यं द्विष्यात् यं प्रति द्वेषं कुर्यात् स्वयं विद्वान् , तं प्रति अनेनोपस्थानम् ; असौ शत्रुः अमुकनामेति नाम गृह्णीयात् ; अस्मै यज्ञदत्ताय अभिप्रेतः कामः मा समृद्धि समृद्धिं मा प्राप्नोत्विति वा उपतिष्ठते ; न हैवास्मै देवदत्ताय स कामः समृध्यते ; कस्मै ? यस्मै एवमुपतिष्ठते । अहं अदः देवदत्ताभिप्रेतं प्रापमिति वा उपतिष्ठते । असावदो मा प्रापदित्यादित्रयाणां मन्त्रपदानां यथाकामं विकल्पः ॥  ॥ ४१ ॥ 

       अब इस विशेष उपासना के फल को बताते हैं  कि वह उपासक  मोक्ष को प्राप्त होता है | { मोक्ष माने अविद्या , काम और कर्म से छुट्टी } फिर वह ब्रह्मत्व को समझ जाता है । { ब्रह्म माने सब कुछ , सबसे बड़ा जो  ,देश ,काल और वस्तु की दृष्टि से  अनन्त है , तथा अव्यक्त है और जो  परिच्छिन्न नहीं है } इसका कारण यह है कि  वह ब्रह्मज्ञानी हो जाता है और ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्म में भेद नहीं होता । ॥४२॥     

       वह गोपों को, जीवों को अपना ही स्वरूप समझ कर के सृष्टि पर्यन्त उनका पालन करता है । उनको यथारूप में स्वीकार करता है |  वह ॐकार स्वरूप गोपाल ही हो जाता है । वही सत्य है, वही मैं हूँ । जो परब्रह्म श्रीकृष्ण हैं, उनसे एक रूप हो जाता है, वही मैं हूँ । वह सत्य स्वरूप गोपाल ही मैं हूँ । जो परम सत्य है, अबाधित है, कभी मिथ्या नहीं होता है, वही मैं हूँ । इस प्रकार से अपने स्वरूप को समझ कर के ऐक्य की भावना करे । अपने आप को ‘ब्रह्माहम् ‘, ‘गोपालोहम् ‘, इस प्रकार की भावना करे । वही अव्यक्त, अनंत, नित्य, अविनाशी , आनन्दस्वरूप गोपाल है |गोपाल ही परम पुरुषार्थ है |  ॥ ४३ ॥    

   || मूल उपनिषद ||

मथुरायां स्थितिर्ब्रह्मन्सर्वदा मे भविष्यति ।

शङ्खचक्रगदापद्मवनमालावृतस्तुवै  ॥ ४४ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

    कोवास्यावतारस्याश्रयो नित्यमित्याशङ्क्य नारायणो ब्रह्माणं प्रत्याह , मथुरायां स्थितिरिति | योऽहं  शङ्खचक्रादिभिरावृतः  ‘तुवै’ प्रसिद्धं , तस्य ‘ मे सर्वदा मथुरायां स्थितिर्भविष्यति, ’ इत्यर्थः | ॥ ४४ ॥

                                        || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

ब्रह्मा जी को नारायण ने बताया: हे ब्रह्मन् !  सदा मेरी स्थिति मथुरा में ही होगी, मैं वहां पर शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और वन माला धारण करके नित्य निवास करता हूँ ।॥ ४४ ॥

  || मूल उपनिषद ||

विश्वरूपं परं ज्योतिः स्वरूपं रूपवर्जितम् ।

 हृदा मां संस्मरन् ब्रह्मन् मत्पदं याति निश्चितं  ॥ ४५ ॥

    || संस्कृत व्याख्या ||  

  विश्वरूपमिति | ‘विश्वरूपं ,’ ‘परं’  उत्कृष्टं नित्यं,  ‘ज्योतिः स्वरूपं’ स्वप्रकाशं चैतन्यात्मकं , वस्तुतः ‘रूपवर्जितं’ , ‘मां’ , ‘हृदा संस्मरन्’ , पुरुषः ‘निश्चितं मत्पदं याति’ ॥ ४५ ॥

                                           || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

विश्वरूप परम ज्योति, { परं  माने सर्वोत्कृष्ट नित्यानन्दैकरसस्वरूप } ज्योति स्वरूप , चैतन्यात्मक स्वप्रकाश , आत्म स्वरूप और वास्तव  में  (रूप वर्जित),  ऐसे मुझ को जो सदा हृदय में स्मरण करता है वह निश्चित  ही मेरे धामको प्राप्त करता है |  ॥ ४५ ॥

  || मूल उपनिषद ||

 मथुरा मण्डले यस्तु जम्बूद्वीपे स्थितोऽपि वा  ।

  योऽर्चयेत्प्रतिमां मां च स मे प्रियतरो भुवि ॥ ४६ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

    कीदृशी पूजास्येत्यस्योत्तरमाह , मथुरेति | ‘मथुरामण्डले यस्तु जम्बूद्वीपे स्थितोऽपि वा,’ 

  ‘प्रतिमां’ शिलादिमयीं, ‘मां च’ , ध्यानभावितं ‘भुवि’, सम्यक् ‘अर्चयेत्’ , ‘सः,’ ‘मे’ मम,   ‘प्रियतरः’ वल्लभः, भवति | ॥ ४६ ॥

                                       || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 किस प्रकार पूजा करनी चाहिए इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि  जम्बूद्वीप में जो मथुरा मंडल है उसमें शिला आदि से निर्मित मेरी प्रतिमा जिसको ध्यान आदि विधियों द्वारा खूब भावित किया गया हो , उसकी विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिये | इस प्रकार जो मेरी  मूर्ति की  साक्षात् मेरे ही रूप में गन्धादि द्रव्यों द्वारा अर्चना करता है, वह मेरा प्यारा है , वह मुझे प्रियतम है ।॥ ४६ ॥

  || मूल उपनिषद ||

तस्यामधिष्ठितः कृष्णरूपी पूज्यस्त्वया सदा ।

चतुर्धा चास्याधिकारभेदत्वेन यजन्ति माम् ।॥ ४७ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

      तस्यामिति | हे ब्रह्मन् ‘तस्यां’ मथुरायां, ‘अधिष्ठितः’ अधिष्ठाय स्थितः, ‘कृष्णरूपी’, अहं  ‘त्वया सदा पूज्यः’ | चतुर्व्यूहपूजनोपदेशमभिप्रेत्य तत्र संप्रदायं दर्शयति , चतुर्धा चेति | पूज्यत्वेन अधिक्रियन्त इति ‘अधिकाराः’ अस्य रूपाणि, तेषां ‘भेदत्वेन’ भिन्नत्वेन ‘मां चतुर्धा यजन्ति’ | ॥ ४७ ॥

                                           || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

       नारायण कहते हैं कि हे ब्रह्मन् ! उस मथुरा में अधिष्ठित कृष्ण रूपी जो परब्रह्म है, वही तुम्हारे द्वारा  सदा पूजनीय  हो। चतुर्व्यूह की पूजा के उपदेश के अभिप्राय से तत्सम्बन्धी संप्रदाय का स्वरूप दिखाते हुए कहते हैं कि अधिकार भेद से चार रूपों में मेरी पूजा की जाती है | ॥ ४७ ॥

 इस उपदेश का गुह्यतम सारांश यह है कि मनुष्य को चाहिए कि भगवान के विभिन्न अंशों – वासुदेव,संकर्षण , प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध समेत पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण की महिमा का निरंतर  कीर्तन तथा स्मरण करे | ये विस्तार अन्य सभी रूपों या शक्ति तत्वों के मूल विग्रह रूप हैं |

 १  लाल रंग के प्रद्युम्न हैं ,  (प्रद्युम्न मन के अधिष्ठाता हैं | ) 

 २  हरे रंग के सङ्कर्षण हैं ,ये (संकर्षण ही जीव तत्व के अधिष्ठाता हैं | )   

  ३ काले रंग के श्रीकृष्ण हैं {वासुदेव-परमात्मा} चित्त के अधिष्ठाता हैं ,

४  और श्वेत रंग के अनिरुद्ध हैं , {अनिरुद्ध-अहंकार के अधिष्ठाता हैं ,}  अनिरुद्ध अनन्त जगत के (शक्ति के द्वारा) रक्षा कर्ता एवं तत्वज्ञान को देने वाले हैं |  ये चारों भगवान श्री कृष्ण के चतुर्व्यूह के रूप में जाने जाते हैं | केन्द्रीय विग्रह तो भगवान श्री गोपाल कृष्ण ही  हैं | वासुदेव परमार्थ तत्व है ,उससे सङ्कर्षण जीव उत्पन्न होता है , उस सङ्कर्षण से प्रद्युम्न मन , और उससे अनिरुद्ध अहंकार , पांचरात्र ग्रंथों में भगवान के पांच रूप बताए हैं    इन ५  रूपों में प्रथम है पर, दूसरा  है  व्यूह,  तीसरा  है विभव,  चौथा है अन्तर्यामी और पांचवें को अर्चा , विग्रह  (मूर्ति) का नाम दिया है।  अर्थात् पुरुषोत्तम कृष्ण गोपाल जो हैं  वे ही क्रमश: इन ५  रूपों में प्रकट होते हैं। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – इन चार दिव्य गोपनीय और उत्तम नामों द्वारा ब्रह्म, जीव, मन और अहंकार – इन चार स्वरूपों में प्रकट हुए उन्हीं भक्तप्रतिपालक भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है, जो सबके अन्तःकरण में विद्यमान हैं। ॥ ४७ ॥

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  इनके चार प्रकार से अवतार भेद हुए हैं । ये युग अनुवर्ती हैं । सतयुग में ये भगवान सफेद ब्राह्मण रूप में हो जाते हैं, त्रेता युग में लाल, क्षत्रिय रूप हो जाते हैं और द्वापरयुग में पीत, वैश्य रूप हो जाते हैं और कलि युग में ये ही कृष्ण हो जाते हैं । बुद्धिमान लोग युगानुरूप इसी प्रकार उनकी पूजा करते हैं |(श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध में  वर्णन है ) चारों युगों में भगवान श्री हरि के  ध्यान का

  १.  कृते शुक्लश्चतुर्बाहुः जटिलो वल्कलाम्बरः ।

 कृष्णाजिनोपवीताक्षान् बिभ्रद् दण्डकमण्डलू ॥ ११. ५.२१ ॥ 

सतयुग  में भगवान का श्वेत वर्ण होता है, वे चार भुजाएँ, सिर पर  जटा, वल्कल वस्त्र, काले मृग का चर्म, यज्ञोपवीत, रुद्राक्ष की माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते है | सतयुग के मनुष्य भगवान के इसी स्वरूप का ध्यान करते थे | अखण्ड तपयोग और ध्यान ही भगवत प्राप्ति का मार्ग था | 

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    २.  त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः ।

 हिरण्यकेशः त्रय्यात्मा स्रुक् स्रुवाद्युपलक्षणः ॥ २४ ॥ 

 त्रेतायुग में भगवान के श्रीविग्रह का रंग   रक्त (लाल) वर्ण का होता है, ये चार भुजाएं धारण करते हैं। और कटिभाग में वे तीन मेखला धारण करते हैं | उनके केश सुनहले  होते हैं और वे वेद प्रतिपादित यज्ञ के रूप में रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ पात्रों को धारण करते हैं | त्रेता के मनुष्य भगवान के इसी स्वरूप का ध्यान करते थे | वेदोक्त यज्ञ ही भगवत्प्राप्ति का मार्ग था | 

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३.  द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः ।

 श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः ॥ २७ ॥    

 द्वापरयुग मे भगवान श्याम (सांवले) वर्ण के होते है। वे पीताम्बर और शंख, चक्र, आदि आयुध धारण करते हैं। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह, भृगु लता , कौस्तुभमणि आदि लक्षणों से वे पहचाने जाते हैं । द्वापर के मनुष्य भगवान के इसी स्वरूप का ध्यान करते थे | सकाम पूजन कर्मकांड ही भगवत प्राप्ति का मार्ग था | 

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४.   कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र पार्षदम् ।

 यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैः यजन्ति हि सुमेधसः ॥ ३२ ॥    

 कलियुग में भगवान का श्रीविग्रह होता है कृष्णवर्ण– काले रंग का | जैसे नीलम मणि में से उज्वल  कान्तिधारा निकलती रहती है , वैसे ही उनके अंग की छटा भी उज्वल होती है | वे हृदय आदि अंगों,  कौस्तुभ आदि उपांगों, सुदर्शन आदि अस्त्रों,  एवं सुनन्द प्रभृति पार्षदों से संयुक्त रहते हैं |  भगवान श्रीकृष्ण की श्रेष्ठ बुद्धि संपन्न पुरुष ऐसे यज्ञों के द्वारा उनकी आराधना करते हैं जिनमें नाम ,गुण लीला आदि के कीर्तन की प्रधानता रहती है | || ३२ || 

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  || मूल उपनिषद ||

युगानुवर्तिनो लोका यजन्तीह सुमेधसः  । 

गोपालं सानुजं कृष्णं रुक्मिण्या सह तत्परम्  ॥ ४८ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

    इदमेव विवृणोति | ‘युगानुवर्तिनः सुमेधसः लोकाः’ , ‘इह’ जम्बूद्वीपे , गोपालादिकं मां ‘यजन्ति’ | चतुर्व्यूहं विवृणोति, गोपालमिति | अनु पश्चात् जायेते तौ , अनुजौ प्रद्युम्नानिरुद्धौ , ताभ्यां सहितं ,  ‘सानुजं,’ ‘गोपालं’ | कीदृशं,‘रामरुक्मिण्या सह,’ वर्तमानं | तथा च गोपालसङ्कर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धात्मकचतुर्व्यूहः शक्त्या सहित उक्तो भवति | पुनः कीदृशं , ‘तत्परं’ रामादिषु अनुरक्तं | यद्वा ‘तत्परं’ एकाग्रं यथास्यात्तथा, यजन्तीति सम्बन्धः ॥ ४८ ॥

                                      || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

जिनका जन्म बाद में हुआ वे अनुज  { प्रद्युम्न और अनिरुद्ध } अर्थात् सानुज गोपाल और उन गोपाल के साथ राम और रुक्मिणी इसका तात्पर्य यह है कि शक्ति के साथ गोपाल , संकर्षण , प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का जो  चतुर्व्यूह कहा गया है  वही  सृष्टि का संचालन करता है  और बुद्धिमान लोग तत्पर होकर अर्थात् एकाग्र होकर उन्ही की उपासना करते हैं | यदि आप अपने मन ,बुद्धि , चित्त और अहंकार को ठीक ठीक समझते हैं तो उनका उपयोग भी ठीक दिशा में कर सकेंगे और आपको अध्यात्म ज्ञान की सिद्धि शीघ्र ही सुलभ हो सकेगी क्योंकि श्री भगवान जी  ने गीता जी में कहा  है  कि— 

 ‘‘मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।७ .७ ।।’’ हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूत की मणियाँ सूत के धागे में पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरे में ही ओत-प्रोत है।

 ऐसा होने के कारण मुझ परमेश्वर से परतर ( अतिरिक्त ) जगत का  कारण अन्य कुछ भी नहीं है अर्थात् मैं ही जगत का एकमात्र कारण हूँ। हे धनंजय ! क्योंकि ऐसा है इसलिये यह संपूर्ण जगत् और सभी  प्राणी मुझ परमेश्वर में दीर्घ तन्तुओं में वस्त्र की भाँति तथा सूत्र में मणियों की भाँति पिरोया हुआ अनुस्यूत, अनुगत, बिंधा हुआ, गूँथा हुआ है।॥ ४८ ॥ ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि |                                                                                                 प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च ||१. ५.३७ | प्रभो ! आप भगवान श्री वासुदेव को नमस्कार है | हम आपका ध्यान करते हैं | प्रद्युम्न , अनिरुद्ध और संकर्षण को भी नमस्कार है |  || ४८||

  || मूल उपनिषद ||

गोपालोऽहमजो नित्यः प्रद्युम्नोऽहं सनातनः  । 

रामोऽहमनिरुद्धोऽहमात्मानं चार्चयेद्बुधः । ॥ ४९ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

       अयं चतुर्व्यूह एको विष्णुरेव नतु विष्णोः पृथगित्याह , गोपालोहमिति | गोपालादयश्चत्वारोपि ‘अहं’ विष्णुरेव, ततः ‘आत्मानं’ विष्णुं मां चतुर्विधं , ‘बुधः’ विद्वान् , अर्चयेत् इत्यर्थः |  ॥ ४९॥

                                        || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

   यह जो चतुर्व्यूह है , यह चतुरात्मक होते हुए भी  एक ही विष्णु है , विष्णु से अलग नहीं है | इसलिये  कहा कि मैं गोपाल ही अजन्मा और नित्य  हूँ।  मैं ही सनातन प्रद्युम्न हूँ तथा मैं ही  राम हूँ  { यहाँ राम माने बलराम } अनिरुद्ध भी मैं ही हूँ इनको सबको अपना आत्म स्वरूप जानकर के { यह आत्मा  ही चतुर्विध विष्णु है ऐसा जानकर } जो विद्वान् पुरुष अर्चना करते हैं । मेरे द्वारा बताए हुए जो पंचरात्र के  धर्म हैं उनके अनुसार अर्चना करते हैं, उसकी निष्काम भाव से और विभाग से यानी वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, और अनिरुद्ध माने चित्त,  बुद्धि, मन,  और अहंकार । इस प्रकार से उनके विभाग से समझकर के, इन सब में जो अनुस्यूत, परब्रह्म विष्णु , वासुदेव स्वरूप हैं , उनकी पूजा करे ।॥ ४९॥

  || मूल उपनिषद ||

मयोक्तेन स धर्मेण निष्कामेन विभागशः ।   

तैरयं पूजनीयो हि भद्रकृष्ण निवासिभिः ॥ ५० ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

        मयोक्तेनेति | ‘मया’ मन्वादिरूपिणा , विभागशो वर्णाश्रमादिभेदप्रोक्तेन ‘स्वधर्मेण’ वर्णाश्रम धर्मेण, ‘भद्रकृष्ण’ वनयोः ‘निवासिभिः,’  ‘तैः’ प्रसिद्धैः वर्णाश्रम धर्मैः, ‘अयं’ चतुर्विधः कृष्णः , ‘पूजनीयः,’ इत्यर्थः | ॥ ५० ॥

                                      || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

युग के आदि में मेरे द्वारा बताए हुए  और बाद में मनु आदि के द्वारा उपदिष्ट जो वर्णाश्रम के धर्म हैं उन धर्मों के अनुसार निज धर्म और निज आश्रम के अनुसार स्वधर्म पालन में सतत सावधान होकर भद्र वन में और कृष्ण वन में जो निवास करते हैं उनके लिए पूर्वोक्त विभाग पूर्वक , निष्काम भाव से चतुर्विध कृष्ण ही पूजनीय हैं  ॥ ५० ॥

  || मूल उपनिषद ||

तद्धर्मगतिहीना ये तस्यां मयि परायणाः  ।  

कलिना ग्रसिता ये वै तेषां तस्यामवस्थितिः ॥ ५१ ॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

      स्वधर्महीनानामपि मत्परायणानामेव मत्पुर्यामवस्थितिर्नत्वभक्तानामित्याह, तद्धर्मगतिहीना इति |  ‘कलिना,’ ‘ग्रसिताः’ ग्रस्ताः सन्तः,  ‘तद्धर्मगतिहीनाः’  आश्रमाचाररहिता अपि, ‘ये’, तस्यां, पुर्यां, मत्परा भवन्ति , ‘वै तेषां’, एव  ‘तस्यां’ पुर्यां, 

  ‘अवस्थितिः’, नान्येषामित्यर्थः | ॥ ५१ ॥  

                                       || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 यदि  कोई व्यक्ति निजवर्णाश्रमोक्त धर्म का ठीक ढ़ंगसे  पालन नहीं भी कर पाता हो तथा उनके लिए, जो विहित कर्मकांड आदि धर्म हैं उनको नहीं भी जानता हो ,  लेकिन मेरे परायण हो तो वह मेरी इस दिव्य मथुरा पुरी में रह सकता है | अभक्तों के लिये यहाँ स्थान नहीं है |  और जो लोग  कलियुगके दोषोंसे ग्रसित हैं तथा  आश्रमाचार से रहित होने पर भी, मत्परायण होने के कारण, {  मेरे परायण होने के कारण , मेरे भक्त होने के कारण } उन्हें ही मेरे परमधाम  मथुरा में निवास करने का अधिकार है । अर्थात उन्हें ही यहां की आध्यात्मिक दैवीसम्पत्ति का लाभ प्राप्त हो सकता है , दूसरों को नहीं | गीता जी में भगवान ने अपने भक्तों को आश्वासन दिया है कि —

‘‘अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। 

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।९. ३० ।।’’  यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।’’  ‘‘अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।  सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।४.३६।।’’  यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो,  तो भी ज्ञान रूपी नौका द्वारा,  निश्चित ही सम्पूर्ण पापों का तुम संतरण कर जाओगे।।  

‘‘मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।९.३२ ।।’’   हे पार्थ ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परम गति को प्राप्त हो जाते हैं। || ३२ || और भगवान ने वादा किया है कि — 

‘‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।।९ .३१ ।।’’  हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।३१ ।।   ॥ ५१ ॥ 

  || मूल उपनिषद ||

यथा त्वं सह पुत्रैस्तु यथा रुद्रो गणैः सह   ।  

यथा श्रियाभियुक्तोऽहं तथा भक्तो मम प्रियः ॥ ५२॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

     अत्र हेतुमाह, यथेति | ‘यथा’ , ‘पुत्रैः’  सनकादिभिः, ‘सह त्वं’ ‘यथा’ च ‘गणैः सह,’

  ‘रुद्रः’ , ‘यथा,’ च ‘श्रिया,’ ‘अभियुक्तः’ सहितः, ‘अहं’ , मम प्रियः, ‘तथा’ , 

‘भक्तो मम प्रियः’ , अतस्तत्र पुरि भक्तानामेवावस्थितिरिति शेषः | ॥ ५२॥

                                   || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

         हे ब्रह्मा जी ! इसमें क्या कारण  है सो बताते हैं कि जैसे सनकादि महर्षि लोग हमेशा ब्रह्मलोक में आपके पास ही रहते हैं और वे सब आपको  प्रिय भी हैं तथा जैसे प्रमथ गण के साथ भगवान रुद्र रहते हैं और जैसे लक्ष्मी जी सर्वदा मेरे साथ रहतीं हैं उसी प्रकार भक्त भी { जिन्होंने मेरा ही आश्रय लिया है ऐसे भक्त } मुझे प्रिय हैं ,   जैसे मुझे लक्ष्मी जी  प्रिय है उसी प्रकार मेरे भक्त मुझे प्रिय हैं ।  इसलिये भक्त ही मेरी पुरी के निवासी हो सकते हैं |  और जो लोग कलि के प्रभाव से ग्रस्त हैं  { कलह , राग , द्वेष आदि से विमूढ़ हैं } यदि वे भी मेरी भक्ति में तत्पर होकर मथुरा में निवास करें  तो जैसे तुम मुझे प्रिय हो और तुम्हारे पुत्र, सनत्कुमार, नारदादि तुम्हें  प्रिय हैं,  जैसे रूद्र को अपने गण प्रिय हैं, उसी तरह मथुरा निवासी भी मुझे प्रिय हैं । अतः  मथुरा में केवल भक्तों को ही रहने का अधिकार है | ॥ ५२॥

  || मूल उपनिषद ||

स होवाचाब्जयोनिश्चतुर्भिर्देवैः कथमेको देवः स्यादेकमक्षरं यद्विश्रुतमनेकाक्षरं कथं भूतं ।

स होवाच तं हि वै पूर्वं हि  एकमेवाद्वितीयं ब्रह्मासीत् ।तस्मादव्यक्तमव्यक्तमेवाक्षरम् ।

 तस्मादक्षरात् महत्तत्वं महतो वै हङ्कारस्तस्मादेवाहङ्कारात्  पञ्चतन्मात्राणि  तेभ्यो भूतानि ।

 तैरावृतमक्षरं भवति  अक्षरोहमोंकारोहमजरोऽमरोऽभयोऽमृतो ब्रह्माभयं हि वै स मुक्तोऽहमस्मि । अक्षरोऽहमस्मि सत्तामात्रं विश्वरूपं प्रकाशं व्यापकं तथा एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म मायया तु चतुष्टयम् |॥ ५३॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

       ‘सः’ एवं प्रबोधितः,  ‘ह’ प्रसिद्धः, ‘अब्जयोनिः,’  ‘उवाच’ | किं  ‘चतुर्भिर्देवैः’ गोपाल रामादिभिः ,  ‘कथमेको देवः स्यात्’ , अनेकेषामेकत्वं व्याहतमित्यर्थः | ‘एकमक्षरं,’ 

‘यत्’ प्रणवाख्यं,  ‘विश्रुतं’ , तर्हि ‘कथं’ , गोपालरामाद्यनेकाक्षरं ’ ‘भूतं’ जातं | स हेति |

  एवं पृष्टः ‘ह’ प्रसिद्धः , विष्णुः ‘तं हि वै’, ‘उवाच’ | एकस्यानेकात्मकत्वमुपपादयितुं तस्य जगन्मूलकारणत्वं वक्तुमाह , पूर्वं हि एकमेवाद्वितीयमित्यादि | ‘पूर्वं’ सृष्टेः प्राक् ‘एकं’ सजातीयभेद-रहितम्,  ‘एव’ शब्दात् स्वगतभेदरहितम् , ‘अद्वितीयं’ विजातीयभेदरहितम्,   ‘ब्रह्म,’  ‘आसीत्’ | ‘तस्मात्’ ब्रह्मणः, ‘अव्यक्तं’ सर्व्वकार्यकारणशक्तिः, अव्यक्तम् 

आसीत् | अव्यक्तमेवेति | यत् ‘अव्यक्तं’ तत् अक्षरं , ब्रह्म  ‘एव,’ तच्छक्तिरूपत्वात् |    ‘तस्मादक्षरान्महत्तत्वम्’  | ‘महतो वै हङ्कारः’ | अहङ्कारवर्णलोपश्छान्दसः | ‘तस्मादेवाहङ्कारात्, ’  ‘पञ्चतन्मात्राणि’ भूतसूक्ष्मापरपर्यायाः, ‘तेभ्यः’ , ‘भूतानि’ पञ्चमहाभूतानि , इत्यर्थः | तैरावृतमिति | ‘तैः’ महादादिभिः कार्यभूतैः, ‘आवृतम्’ व्याप्तं,

  ‘अक्षरं ,’ चेति घटशरावादिभिरिव मृत् | अक्षरोहमिति | अव्याकृताक्षरात्मको विष्णुः  ‘ओङ्कारः,’ च ‘अहम्’ | ओङ्काराक्षरब्रह्मणऐक्योपपादनाय ओङ्कारे ब्रह्मधर्म्मानाह, अजर इति |  ‘अजरोऽमरः’ जरामरण शून्यः, ‘अभयः’ अविद्याकामकर्म्मशून्यः, ‘अमृतः’ आनन्दात्मकः, ओङ्कार इति शेषः | तथाविधब्रह्मप्रतीकत्वात् अथ अक्षरधर्म्मानाह, ब्रह्मेति | ‘अक्षरः’ अव्याकृताख्यः, ‘अभयं हि वै ब्रह्म,’ ब्रह्मशक्तिसमुदायरूपत्वात् | अथ ब्रह्मधर्म्मानाह, मुक्तोहमिति | ‘अहं’ , ‘मुक्तः’ अविद्यास्पर्शरहितः, ‘अस्मि’ , ‘अक्षरोऽहम्’ अविनाशी अहम्, ‘अस्मि,’ इत्यर्थः | ओङ्कारः, ब्रह्म, तत्प्रतीकत्वात् तथाक्षरमव्याकृतं ब्रह्म, तच्छक्तिरूपत्वादिति विवक्षितार्थः | नन्वेवं ब्रह्मचेत् कथं चतुष्टयं सम्पन्नमित्याशङ्क्य मन्त्रमाह , ‘सत्तामात्रं विश्वरूपं प्रकाशं व्यापकं तथा एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म मायया तु चतुष्टयम्,’ इति स्पष्टं ॥ ५३॥

                                        || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

      जब इस प्रकार भगवान नारायण ने ब्रह्माजी को  समझाना चाहा  तो यह  सब सुन कर के अब्जयोनी

  { कमल जन्मा }  ब्रह्मा जी बोले   कि यह बताइए कि (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध), ये चारों देवता एक कैसे हो गए ? { आपने अनेकों में एकता की स्थापना कैसे करदी ? } एक ही अक्षर ओंकार या प्रणव (ॐ) ब्रह्म के वाचक रूप से श्रुति में प्रसिद्ध है , तो फिर ये गोपाल, राम आदि  अनेकों अक्षरों वाला ब्रह्म कहाँ से आ गया ? ऐसा प्रश्न होने पर विष्णु जी ने उन्हें बताया | कि जैसे एक ही सोने से अनेक भूषण बन जाते हैं तथा एक ही बीज से अनेक शाखाओं वाला वृक्ष ,पत्र ,पुष्प फल , रस आदि से समन्वित हो जाता है वैसे ही  आदि काल में एकमेव अद्वितीय ब्रह्म ही था | एकम् एव अद्वितीयं ब्रह्म। एकम् – the One | एव – alone | अद्वितीयम् – without a second | (एक) शब्द का प्रयोग सजातीय भेद को हटाने के लिए किया , (एव) शब्द का प्रयोग स्वगत भेद को हटाने के लिए किया और (अद्वितीय)  पद का प्रयोग  विजातीय भेद  को हटाने के लिए किया है | जैसे मनुष्य और पशु परस्पर विजातीय हैं और गाय ,घोड़ा ,भैंस ,ऊंट आदि पशुओं का आपस में सजातीय भेद है तथा एक ही पशु में उसके आँख ,कान ,हाथ ,पाँव आदि स्वगत भेद प्रसिद्ध ही  हैं | इस तरह के भेद मूल धातु में , बीज के रस में अथवा ब्रह्म में नहीं होते | फिर उस ब्रह्मसे अव्यक्तकी उत्पत्ति हुई इस अव्यक्तको ही अक्षरब्रह्म भी कहते हैं उसीमें  सर्वकार्य कारण शक्ति  समाहित रहती है | तदनन्तर उस अक्षर से महत्तत्व की उत्पत्ति होती है , महत्तत्व से अहंकार की , अहंकार से पाँच तन्मात्राओं की , तन्मात्राओं को ही सूक्ष्म भूत भी कहते हैं  फिर उन्हीं पाँच  तन्मात्राओं से पृथ्वी आदि पाँच महाभूतों की रचना होती है | यह सब होते होते इसमें जो  एक मूलतत्व,  ब्रह्मतत्व है,वह ढकाहुआ  सा प्रतीत होने लगता है जैसे सूर्य से उत्पन्न होनेवाले बादल सूर्य को ही ढक सा लेते हैं | तथा जैसे मिट्टी से ही घड़े , सकोरे आदि बर्तन बनते हैं उनमें मिट्टी ढक सी जाती है | जैसे घड़े के नष्ट होने पर भी मिट्टी नष्ट नहीं होती   बैसेही क्षरभूतों के नष्ट होने पर भी अक्षरब्रह्म नष्ट नहीं होता | इसलिए गोपालतापनी उपनिषद ओङ्काररूपी ब्रह्मके धर्मों को बताती है कि वो अजरअमर है माने बुढ़ापा और मौत उसे छू नहीं सकते ,  दूसरा धर्म है  (अभय) अभय का अर्थ है अविद्या , काम और कर्मसे शून्य होना | और तीसरा ब्रह्म का स्वभाव है अमृत होना { अमृत माने अनन्त , आनन्द } { यही अ, उ, म, = ओं } {सत् , चित् , आनन्द = ब्रह्म , }  क्योंकि  ‘ॐ’ ही ब्रह्म का प्रतीक है | अब अक्षर माने अव्याकृत प्रकृति का  स्वरूप बताते हैं | इस { अक्षर } को ब्रह्म इसलिये कहते हैं क्योंकि यह अक्षर ब्रह्म की शक्ति है , और शक्ति और शक्तिमान में भेद नहीं होता जैसे अग्नि और उसकी उष्णता में कोई भेद नहीं है | श्वेताश्वतरोपनिषद के छठे अध्याय में एक मन्त्र है —

 [ परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।।६ .८।। ]  इसका भावार्थ यह है कि उसकी शक्ति ही उसका स्वभाव है | 

  {  न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ||    उस ‘देव’ का करणीय कर्म कुछ है ही नहीं, न ही उसके कर्म का कोई करण (साधनभूत अंग) है, न ही कोई ‘उससे’ बढ़कर है न ही हमें ‘उसके’ समान कोई दिखायी पड़ता है-क्योंकि ‘उसकी’ शक्ति अन्य सबसे बहुत अधिक बढ़कर है , सबसे परे है, मनुष्य केवल विविध नामों तथा विविध रूपों में उसका वर्णन सुनते हैं। वस्तुतः ‘उसका’ बल, ‘उसकी’ क्रियाएँ तथा ‘उसका’ ज्ञान स्वभावतः आत्म-समर्थ तथा स्वयं ही स्वयं का कारण हैं। } क्योंकि अविद्या का स्पर्श मुझ में नहीं है , इसलिये  मैं मुक्त हूँ | मैं अक्षर हूँ , माने अविनाशी हूँ | तात्पर्य यह है कि ओङ्कार ब्रह्म है , उसका प्रतीक होने से और अक्षर ब्रह्म है उसकी शक्ति रूप होने से | अब जबकि ब्रह्म ऐसा है तो फिर चार प्रकार का कैसे होगया ऐसी शङ्का होने पर श्रुति प्रमाण से उदाहरण देते हैं कि जगत के आवश्यक कार्यों का संपादन करने के लिये ब्रह्म को अनेक रूप धारण करने पड़ते हैं |  *‘ इन्द्रो  मायाभिः पुरुरुप ईयते ’* यहां सर्वज्ञ परमात्मा का ही नाम इन्द्र है | यही परब्रह्म  अपनी अनेकों उपाधियों से  अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है | परमात्मा तो एक ही है परन्तु माया कल्पित  उपाधियों से  अनेक जैसा दिखता है |  अद्वितीय परमात्मा एक होता हुआ भी देवता रूप से , मनुष्य रूप से , पञ्चभूत रूप से और भौतिक प्रपञ्च , कृमिकीटादि विविध रूपों में दिखता है ॥  अब मूल मंत्र बताते हैं  ‘सत्ता मात्रं विश्वरूपं प्रकाशं व्यापकं तथा एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म मायया तु चतुष्टयम्,’ इस मंत्र का अर्थ स्पष्ट ही है | 

ब्रह्म यानी व्यापक सत्ता , विश्वरूप एक तत्व और जहाँ व्यापक ब्रह्म तत्व का ज्ञान होता है वहां  पर अभय का प्रकाश होता है । जहाँ दो होते हैं वहाँ भय होता है और जहाँ एक होता है वहाँ अभय होता है, ऐसा जान करके मैं मुक्त हूँ । मैं अक्षर हूँ, मैं सत्ता मात्र हूँ, मैं चिन्मात्र हूँ, मैं प्रकाश मात्र  हूँ, मैं अद्वितीय हूँ | केवल उपाधि भेद होने के कारण  तथा मेरे कार्यों से और विभिन्न गुणों से संयुक्त होने के कारण चार प्रकार का दिखता हूँ परन्तु वास्तव में  मैं एक ही  सर्वव्यापक हूँ । ॥ ५३॥

  || मूल उपनिषद ||

रोहिणीतनयो रामो अकाराक्षरसंभवः  ।  

तैजसात्मकः प्रद्युम्न उकाराक्षर संभवः ।  ॥ ५४॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

     मायया चतुष्टयत्वं विवृणोति , रोहिणीतनय इति | अकाराक्षरावच्छिन्नया मायया सम्भवः आविर्भावो यस्य सः ‘अकाराक्षरसम्भवः,’ ‘रोहिणीतनयः’,  ‘रामः’  विश्वात्मको 

जाग्रदवस्थाधिष्ठातृसमष्टिरूप इत्यर्थः | तैजसात्मक इति | उकाराक्षरावच्छिन्नया मायया प्रादुर्भूतः , ‘प्रद्युम्नः’ , ‘तैजसात्मकः’  स्वप्नावस्थाधिष्ठातृसमष्टिरूप इत्यर्थः | ॥ ५४॥

                                          || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

    अब माया से इस अद्वितीय ब्रह्म के चार विभाग कैसे हुए इसका विवरण करते हैं | { विवरण माने पर्दा हटाना } अकारांश से सीमित माया से जिनका आविर्भाव हुआ वे हैं विश्वात्मक, रोहिणीतनय यानि बलराम जी | इनको व्यष्टि में  विश्व कहते  हैं  और समष्टि में  विराट कहते हैं | ये जाग्रत अवस्था के अधिष्ठाता देव हैं इनकी उत्पत्ति अकार-अक्षर से हुई । ॐ में जो अकार है वो बलराम हैं, वही विश्व हैं  यानी पंच भूत से बना हुआ जो प्रकट जगत और  जागृत अवस्था में जो विश्व का दर्शन होता है वे यह रोहिणी तनय यानि संकर्षण भगवान हैं । उकारांश से सीमित माया से जिनका आविर्भाव हुआ वे हैं तैजसात्मक प्रद्युम्न जी | इनको व्यष्टि में तैजस कहते हैं और समष्टि में हिरण्यगर्भ  कहते हैं | ये स्वप्न अवस्था के अधिष्ठाता देव हैं इनकी उत्पत्ति उकार-अक्षर से हुई । ॐ में जो उकार है वो प्रद्युम्न हैं, यानी सूक्ष्म पंचभूत से बना हुआ जो काल्पनिक सूक्ष्म जगत स्वप्न में प्रतीत होता है वह कामात्मक होने से स्वप्न में ये प्रद्युम्न जी जीवों के पाप और पुण्य के अनुसार मानसिक सृष्टि करते हैं | ॥ ५४॥

  || मूल उपनिषद ||

प्राज्ञात्मकोऽनिरुद्धो वै मकाराक्षरसंभवः    

अर्धमात्रात्मको कृष्णो यस्मिन् विश्वं प्रतिष्ठितम् ।॥ ५५॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

        प्राज्ञात्मक इति |  मकाराक्षरावच्छिन्नया मायया प्रादुर्भूतः ‘अनिरुद्धः,’  ‘प्राज्ञात्मकः’    सुषुप्त्यवस्थाधिष्ठातृसमष्टिरूप इत्यर्थः |  श्रीकृष्णस्तु अवस्थात्रयातीतं तुरीयं धामेत्याह , अर्धमात्रात्मक इति |  ‘अर्धमात्रा’ विशेषतोनुच्चार्या, ”अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषत:” इति स्मृतेः |  तदात्माकः ’ तत्प्रकाशकः , ‘कृष्णः,’ ‘यस्मिन्’ सदानन्दात्मके कृष्णे, ‘विश्वं,’ ‘प्रतिष्ठितं’ अध्यस्तम् | ॥ ५५॥   

                                      || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या ||      मकारांश से सीमित माया से जिनका प्रादुर्भाव हुआ वे हैं  प्राज्ञात्मक अनिरुद्ध हैं  , ये सुषुप्ति अवस्था के अधिष्ठाता देव हैं । इनको व्यष्टि में प्राज्ञ कहते हैं और समष्टि में ईश्वर कहते हैं | और श्री कृष्ण तो तीनों अवस्थाओं से परे हैं इसलिए इनको व्यष्टि में तुरीय कहा जाता है और समष्टि में ब्रह्म | अर्धमात्रा ही कृष्ण हैं | जिन

सदानंदात्मक श्री कृष्ण में संपूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है | ( माने अध्यस्त है , आरोपित है |)  यानि अकार, उकार और मकार ये सब अर्धमात्रा में प्रतिष्ठित हैं,  ॥ ५५॥

  || मूल उपनिषद ||

   कृष्णात्मिका जगत्कर्त्री मूलप्रकृति रुक्मिणी   

   व्रजस्त्रीजनसंभूतश्रुतिभ्यो ब्रह्मसङ्गतः ॥ ५६॥  

 || संस्कृत व्याख्या || 

       विन्दुप्रतिपाद्या रुक्मिणी मूलप्रकृतिरूपेत्याह, कृष्णात्मिकेति | कृष्णशक्तिरूपत्वात् शक्तिशक्तिमतोश्चाभेदात् कृष्णस्वरूपा , ‘जगत्कर्त्री,’ ‘मूलप्रकृतिः,’ ज्ञातव्या, इति शेषः | कीदृशी रुक्मिणीत्याह, व्रजस्त्रीजनसम्भूतेति |  ‘व्रजस्त्रीजने’, ‘सम्भूताः’ प्रसिद्धाः, याः ‘श्रुतयः, ताभ्यः, प्रसिद्धः यो  ‘ब्रह्मसङ्गः,’  तस्मात् हेतोः | ॥ ५६॥ 

                                || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

   अब ओंकार की अर्धमात्रा के ऊपर जो बिंदु होता है उसके  द्वारा संकेतित मूल प्रकृति रूपा रुक्मिणी का वर्णन करते हैं |  ये रुक्मिणी जी कृष्ण की शक्ति हैं और शक्ति और शक्तिमान में  अभेद होने के कारण ये कृष्णस्वरूपा ही हैं | कृष्ण से अभिन्न जगत की उपादान कारण भूता जो मूल प्रकृति है वही रुक्मिणी हैं । जगत्कर्त्री को ही मूल प्रकृति जानना चाहिए | अब ये रुक्मिणी जी  कैसी हैं सो बताते हैं ‘व्रज स्त्रीजन सम्भूता’ ब्रज की स्त्रियों के रूप में ये प्रकट हुई हैं | ( व्रज की स्त्रियां ही श्रुति की ऋचाएं हैं ) और श्रुति का मुख्य विषय धर्म और ब्रह्म ही है | धर्म से अंतःकरण की शुद्धि होती है और शुद्ध अंतःकरण में ब्रह्म का प्रकाश होता है | धारणाद्वा धर्मः। जो सबको धारण करे सो धर्म , श्रुति में और स्मृतियों में धर्म भी आत्मा का ( ब्रह्म का ) एक नाम है | इसलिए गोपियों का नित्य ब्रह्म सङ्ग

 { नित्य ब्रह्म संबन्ध } प्रसिद्ध ही है |

 धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा ,लोके धर्मिष्ठं  प्रजा उपसर्पन्ति ,धर्मेण पापमपनुदति ,धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितं तस्माद्धर्मं परमं वदन्ति ॥ ७॥ महानारायणोपनिषत् | धर्म का अर्थ होता है कर्तव्यपरायणता | धर्म ही सम्पूर्ण जगत को प्रतिष्ठित रखनेवाला एवं स्थिरता देने वाला है | धर्मिष्ठ पुरुष के प्रति ही प्रजा जन सलाह लेने के लिए जाते हैं | धर्म के द्वारा ही धार्मिक पुरुष पापों को दूर हटा देता है | धर्म में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है | { धर्म  में  ही स्थिरता है, सत्ता है } इसीकारण धर्म को सबसे बड़ा (श्रेष्ठ) कहा जाता है | और सभी मनुष्यों के लिये  सामान्य धर्म क्या है – तो भागवत जी में भगवान उद्धव जी से कहते हैं कि —- ‘‘अहिंसा सत्यमस्तेयं अकामक्रोधलोभता । भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः ॥ ११.१७.२१ ॥’’ उद्धव जी ! चारों वर्णों और चारों आश्रमों के लिये साधारण धर्म यह है कि मन, वाणी और शरीर से किसी की हिंसा न करें ; सत्यपर दृढ़ रहें ; चोरी न करें ; काम , क्रोध तथा लोभसे बचें और जिन कामोंके करने से समस्त प्राणियोंकी प्रसन्नता और उनका भला हो , वही करें || २१ || 

और परम धर्म क्या है – ‘‘स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे । अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा संप्रसीदति ॥ १.२. ६ ॥’’ मनुष्य के लिए परम धर्म वही है , जिससे भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति हो  — भक्ति भी ऐसी , जिसमें किसी प्रकार की कामना न हो और जो नित्य निरंतर बनी रहे , ऐसी भक्ति से हृदय आनंद स्वरूप परमात्मा की उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है || ६ || श्रीमद्भागवत में धर्म की प्रशंसा में एक अद्भुत श्लोक लिखा है —

 धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां

वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तासपत्रयोन्मूलनम्।

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः 

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्।।१. १. २।।

अर्थ:- महामुनि व्यास देव  के द्वारा निर्मित श्रीमद्भागवत महापुराण में मोक्ष पर्यन्त फल की कामना से रहित परम धर्म का निरूपण हुआ है। इसमें शुद्धान्त:करण सत्पुरुषों के जाननेयोग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्माका निरूपण हुआ है, जो तीनों तापों का जड़से नाश करनेवाली और परम कल्याण देनेवाली है। अब और किसी साधन या शास्त्र से क्या प्रयोजन। जिस समय भी सुकृती  पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते हैं, ईश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदय में आकर बंदी बन जाता है ।।२।। और महामुनि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास तो स्वयं ही साक्षात नारायण के अवतार हैं | क्योंकि नारायण से ही ज्ञान की परम्परा प्रारम्भ होती है अतः भागवत के मंगलाचरण में ही कहा है कि —-

“कृष्णं नारायणं वन्दे कृष्णं वन्दे व्रजप्रियम्। 

कृष्णं द्वैपायनं वन्दे कृष्णं वन्दे पृथासुतम्।।” तथा महाभारत के अनुशासन पर्व के २५५ वें अध्याय में बताया कि  ‘‘धर्मः कामश्च कालश्च वसुर्वासुकिरेव च।

अनन्तः कपिलश्चैव सप्तैते धरणीधराः।। ४१ ।।’’ धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल ये सात पृथ्वी को धारण करनेवाले हैं || ४१ || तथा विष्णु सहस्रनाम में कहा कि —- ‘‘लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।, वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः॥५६॥अनिर्विण्णःस्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपोमहामखः।,

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।, 

आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः॥६९॥’’ { विष्णुसहस्रनाम } जो व्रजकी स्त्रियां हैं वही श्रुति के भिन्न भिन्न मन्त्र हैं | उन्ही वेदके मन्त्रोंके आधार पर ज्ञान की संगति बिठाई जाती है | उसी संगति के संग्रह का नाम ब्रह्मसूत्र है |॥ ५६॥  

  || मूल उपनिषद ||

प्रणवत्वेन प्रकृतिं वदन्ति ब्रह्मवादिनः       

तस्मा दोङ्कार सम्भूतो गोपालो विश्वसंस्थितः ॥ ५७॥ 

 || संस्कृत व्याख्या || 

     ‘प्रणवत्वं’ प्रकृष्टस्तुतित्वं, असत्सत्वादिगुणारोपहेतुत्वं, तेन हेतुना ‘ब्रह्मवादिनः,’ यद्वा विश्वतैजसादिरूपेण चतुर्धा संस्थितम् इत्यर्थः | तस्याः ‘प्रकृतित्वं ‘वदन्ति’ | ‘तस्मात्’ ब्रह्मस्वरूपत्वात्,  ‘ओङ्कारेण  ‘सम्भूतः’ प्रकृतिप्रतिपाद्यत्वात् प्रादुर्भूतः, ‘गोपालः ,’ विश्वसंस्थित इत्यर्थः | ॥ ५७॥ 

                                         || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

  प्रणव माने प्रकृष्ट स्तुति | इस प्रणव में प्रकृति के तीन गुणों का आरोप होने से  तीन तत्वों का निर्माण होता है इसलिये प्रणव त्रिगुणात्मक है |   अकार, उकार, मकार; व्यष्टि में  (विश्व , जाग्रत) अकार से उद्भूत जाग्रत अवस्था के अभिमानी चेतन को विश्व कहते हैं |  ( तैजस ,स्वप्न) उकार से उद्भूत स्वप्न अवस्था के अभिमानी चेतन को तैजस कहते हैं |  और ( प्राज्ञ ,सुषुप्ति )  मकार से उद्भूत सुषुप्ति अवस्था के अभिमानी चेतन को प्राज्ञ कहते हैं | समष्टि में इन्ही को विराट , हिरण्यगर्भ  और ईश्वर कहते हैं |  वैसे ही प्रकृति में सत्वगुण ,रजोगुण, और तमोगुण हैं अतः जो प्रकृति है वही प्रणव है ऐसा ब्रह्मवादी लोग कहते हैं ।अथवा विश्व , तैजस , प्राज्ञ और तुरीय रूप से चार प्रकार का मानते हैं | उसी ओंकार से उत्पन्न हुई प्रकृति से जगत की रचना होती है इसलिए समग्र विश्व में गोपाल ही विराजमान हैं | प्रकृति शब्द में   तीन अक्षर हैं  १ प्र २ कृ ३ ति  (प्र =प्रकृष्ट-उत्कृष्ट-ज्ञानरूप-सत्वगुण) 

२  (कृ =क्रियाशील-रजोगुण)  ३ (ति = स्थितिशक्तिसे युक्त -तमोगुण) ॥ ५७॥

  || मूल उपनिषद ||

क्लीमोङ्कारस्यैकतत्वं पद्यते  ब्रह्मवादिभिः  

मथुरायां विशेषेण मां ध्यायन्  मोक्षमश्नुते ॥ ५८॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

      क्लीमोङ्कारस्यैक्यमिति | ‘क्लीमोङ्कारयोः ‘ऐक्यत्वं’, ब्रह्मवादिनः वदन्ति | अतः तत्  ‘पद्यते’, बीजाद्यः समन्त्र इत्यर्थः | उक्तगोपालभजनं मथुरायामतिशयेन झटिति 

मोक्षफलदमित्याह , मथुरायामिति |  ‘मथुरायां मां ध्यायन्,’ विश्वाकारेण संस्थितः, किं पुनर्वक्तव्यं, चतुर्धा संस्थितः, ‘विशेषेण’ शीघ्रम्,  ‘मोक्षं,’ प्राप्नोतीत्यर्थः | ॥ ५८॥

                                || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

उस ॐकार से ये विश्व प्रकट होता है, उसी का नाम गोपाल है, वे गोपाल ही  सारे विश्व का अधिष्ठान हैं । क्लींकार और ओंकार  का एकत्व ब्रह्मवादी लोग कहते हैं । {  प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।।१३ .२० ।।प्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।। } क्लींकार अर्थात प्रकृति और ॐकार अर्थात ब्रह्म, यह दोनों   एक हैं, प्रकृति और पुरुष दोनों एक हैं इस बात को सिद्ध करने के लिये  ब्रह्मसूत्र में एक सूत्र आता है  —

‘‘प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्।।१ .४ .२३ ।।’’  प्रकृति भी परब्रह्म ही है क्योंकि प्रतिज्ञा और दृष्टांत से यही बात सिद्ध होती है । प्रतिज्ञा ये है कि एक तत्व के जानने से सबका ज्ञान हो जायेगा, तो एक तत्व के जानने से सबका ज्ञान कैसे हो जायेगा? तो दृष्टांत देते हैं जैसे एक सुवर्ण को जानने से समस्त सुवर्ण के आभूषणों का ज्ञान हो जाता है, जैसे एक  मिट्टी  को जानने से संपूर्ण पार्थिव पदार्थों का ज्ञान हो जाता है वैसे ही एक सत्य तत्व को जान लेने से समस्त विश्व का ज्ञान हो जाता है तो यदि प्रकृति और पुरुष दो हों तो उनमें से एक के जानने से सब का ज्ञान हो जाता है ये प्रतिज्ञा पूरी नहीं हो पायेगी अतः प्रकृति भी ब्रह्म का ही एक नाम है । इसलिए ही मंत्र के आदि में क्लींकार लगाया है | तो उक्त प्रकार से मथुरा में गोपाल का भजन शीघ्र ही मोक्ष फल को देनेवाला होता है | मैं ही विश्वाकार होकर मथुरा में स्थित हूँ इस प्रकार मेरा ध्यान करना चाहिये | जो तत्व विश्वाकार हो सकता है तो क्या वह चार प्रकार का नहीं हो सकता  ? जैसे १०० रुपये में १ रुपया भी होता ही है |  श्रीमद्भगवद्गीता का तेरहवां अध्याय इस विषय को समझने  में बहुत ही सहायक है | खास करके ये दो श्लोक हैं | 

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।

 इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः।।१३ .६ ।।

पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।

 एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।१३ .७ ।।

 इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्तःकरण की चेतन वृत्ति) तथा धृति –  इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।। यहाँ  मथुरा माने मधुरा,  { मधु विद्या } ,ब्रह्मविद्या |  तो विशेष रूप से इस ब्रह्मविद्या को समझ करके जो ध्यान करता है वो मोक्ष को प्राप्त करता है |  अतः  मथुरा ये मधुरा ब्रह्मविद्या- मधु विद्या  का प्रतीक है | तथा  बृहदारण्यकोपनिषद के दूसरे अध्याय का पाँचवाँ  ब्राह्मण जिसमें मधु विद्या काण्ड है अवश्य ही अनुशीलन करने योग्य है | उसका सारभूत केवल एक ही मंत्र यहाँ उदाहरण के रूप में उद्धृत करते हैं – 

 इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेति | अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्रणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम् । अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः । इत्यनुशासनम् ॥ बृह. २,५.१९ ॥ अर्थ :- और अब  इस  मधु का  अथर्वण गोत्रोत्पन्न दध्यंग ऋषि ने अश्विनीकुमारों को उपदेश किया | यह देखते हुए ऋषि ने कहा कि वह परमात्मा रूप रूप के प्रतिरूप हो गया | उसका वह रूप प्रतिख्यापन (प्रकट) करने के लिये है | ईश्वर माया से अनेक रूप प्रतीत होता है | [ शरीर रूप रथ में जोड़े हुए ] इसके [ इन्द्रियरूप ] घोड़े शत और दश हैं | यह  (परमेश्वर) ही हरि (इन्द्रियरूप अश्व) है ; यही दश , सहस्र , अनेक और अनन्त है | वह यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्य से रहित), और अबाह्य है | माने दृश्य नहीं है | यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है | यही समस्त वेदान्तों का अनुशासन (उपदेश) है | || १९ ||  ॥ ५८॥

  || मूल उपनिषद ||

अष्टपत्रं विकसितं हृत्पद्मं तत्र संस्थितम्  । 

दिव्यध्वजातपत्रैस्तु चिह्नितं चरणद्वयम् ॥ ५९॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

       मां ध्यायन् इत्यनेन सूचितं ध्यानं विशदयति, अष्टपत्रं विकसितं हृत्पद्मं तत्र संस्थितं दिव्यध्वजातपत्रैस्तु चिन्हितं चरणद्वयमिति |  ‘अष्टपत्रविकसित’ हृदय कमल  ‘संस्थितं,’ मां नित्यं ध्यायेदित्यग्रे , तेन सम्बन्धः | तत्रादौ  ‘दिव्यध्वजातपत्रैः,’  ‘चिन्हितं,’ ‘चरणद्वयं,’ ध्यायेत् | ॥ ५९॥

                                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

  अब इस श्लोकके पूर्ववर्ती अठावनवे श्लोकमें  { मां ध्यायन् } इस पद के द्वारा जो ध्यान सूचित किया था उसी  ध्यान का  विशद विवेचन यहाँ करते हैं | अपने  हृदय में खिलेहुए अष्टदल  कमल में मुझे स्थापित कर मेरे चरण युगल का  ध्यान करना चाहिये | उन चरणों के तलवों में  दिव्य ध्वजा और छत्र आदि का स्मरण करना चाहिये |   जो भगवान के श्री चरण हैं, उनमें दिव्य ध्वजा और (आतपत्र) छत्र इन दिव्य चिन्हों से चिन्हित, चरणद्वय का ध्यान करे | अंदर हृदय कमल में आठ पंखुड़ियां हैं, ये पंखुड़ियां ही अष्टधाप्रकृति है । भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।७ .४ ।।

 { गीता }  पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश — ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार — यह आठ प्रकार के भेदों वाली मेरी ‘अपरा’ प्रकृति है। श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के  – अट्ठाईसवें अध्याय में गोपाल के ध्यान का बहुत सुन्दर वर्णन है |

 सञ्चिन्तयेद् भगवतश्चरणारविन्दं वज्राङ्कुशध्वज सरोरुह लाञ्छनाढ्यम् ।

उत्तुङ्गरक्तविलसन् नखचक्रवाल ज्योत्स्नाभिराहतमहद् हृदयान्धकारम् ॥ ३.२८.२१॥

यच्छौचनिःसृतसरित् प्रवरोदकेन । तीर्थेन मूर्ध्न्यधिकृतेन शिवः शिवोऽभूत् ।

ध्यातुर्मनःशमलशैलनिसृष्टवज्रं ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम् ॥ ३.२८.२२ ॥

  अन्तर्यामी रूप में स्थित हुए उनके स्वरूप का विशुद्ध भाव युक्त चित्त से चिन्तन करे  | इस प्रकार योगी जब यह अच्छी तरह देख ले कि भगवद् विग्रह में चित्त की स्थिति हो गयी,तब वह उनके समस्त अंगों में लगे हुए चित्त को विशेष रूप से एक-एक अंग में लगावे | पहले भगवान के चरण कमलों का ध्यान करना चाहिये। वे वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल के मङ्गलमय चिन्हों से युक्त हैं तथा अपने उभरे हुए लाल-लाल शोभामय नख चन्द्र-मण्डलकी चन्द्रिकासे ध्यान करनेवालों के हृदयके अज्ञानरूप घोर अन्धकारको दूर कर देते हैं ॥ २१ ॥ इन्हीं चरणों की धोवन से नदियों में श्रेष्ठ श्रीगङ्गाजी प्रकट हुई थीं, जिनके पवित्र जल को मस्तक पर धारण करने के कारण स्वयं मङ्गल रूप श्री महादेव जी और भी अधिक मङ्गलमय हो गये। ये अपना ध्यान करने वालों के पाप रूप पर्वतों पर छोड़े हुए इन्द्र के वज्र के समान हैं। भगवान के इन चरणकमलों का चिरकाल तक चिंतन करे ॥ २२ ॥ ॥ ५९॥

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                                                                            श्रीकृष्ण के चरण चिन्ह                               

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  || मूल उपनिषद ||

श्रीवत्सलाञ्छनं हृत्स्थं कौस्तुभं प्रभया युतम्   ।     

चतुर्भुजं शङ्खचक्रशार्ङ्गपद्मगदान्वितम्  ॥ ६०॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

     ‘हृत्स्थं,’ ‘श्रीवत्सलाञ्छनं,’ ‘प्रभयायुतं,’ च ‘कौस्तुभं,’ ध्यायेत् | ‘चतुर्भुजं’ चतुर्भिर्गुणितं भुजं,  ‘शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गपद्मान्वितं,’ ध्यायेत् | शार्ङ्गपद्मयोरेककरे स्थितिरिति बोध्यम् | तेन करचतुष्टये पञ्चधारणमुपपन्नम् | ॥ ६०॥ 

                                  || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

और श्रीवत्स का चिन्ह उन्होंने हृदय में धारण किया हुआ है   [ एक सात ७ अंक की आकृति की स्वर्णमयी बालों की रेखा { भंवरी } भगवान के  वक्षस्थल पर विराजमान है उसको श्रीवत्स का चिन्ह कहते हैं ] जो कि दक्षिणावर्त भौंरी के आकार का कहा गया है |  वक्षस्थल के वाम भाग में ’भृगु लता‘ का चिन्ह  तथा दायें भाग में  ‘श्रीवत्स का’ चिन्ह होता है । भृगु लता भगवान की सहिष्णुता और क्षमाशीलता का प्रतीक है तथा श्रीवत्स का दर्शन शरणागति प्रदायक और भक्तवत्सलता का प्रतीक हैं।  और मध्य भाग में  दिव्य प्रभा से युक्त कौस्तुभ मणि धारण किये हुए हैं  । चारभुजा धारण करने वाले, शङ्ख, चक्र, गदा ,शार्ङ्ग (धनुष का नाम) और कमल धारण किये हुए, शार्ङ्ग धनुष और कमल एक ही हाथ में धारण किया हुआ है जिससे चार हाथों में  पाँच चीजें धारण करना युक्त सिद्ध होता है ||| ६० || 

  || मूल उपनिषद ||

सुकेयूरान्वितं बाहुं कण्ठं  मालसुशोभितम्  ।     

द्युमत्किरीटं वलयं  स्फुरन्मकरकुण्डलम्  ॥ ६१॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

 ‘बाहुं,’ च ‘सुकेयूरैः’ अङ्गदैः, ‘अन्वितं,’ ध्यायेत् | बाहुमित्येकबचनं जात्यभिप्रायेण | तथा ‘कण्ठं,’  ‘मालासुशोभितं,’ ध्यायेत् | तथा ‘द्युमन्’ दीप्तिमान् , ‘किरीटः’ मुकुटः, तं, स्मरेत् | तथा ‘स्फुरन्ती  ‘मकराकारे  ‘कुण्डले,’  तयोर्द्वयमित्यर्थः |    ॥ ६१॥  

                                          || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

 बांहें  सुन्दर केयूर { अंगद , बाजूबंद = बाहु का आभूषण }  से युक्त और कंठ  मालाओं  से सुशोभित है  । चमकीले मुकुट को धारण किये हुए हैं |  अद्वैत स्वरूप, चमकीले मकराकृति कुण्डलों को जिन्होंने धारण किया हुआ है  |सांख्य और योग ये दोनों ही भगवान के कुण्डल हैं | क्योंकि सांख्य और योग का फल एक ही है | अतः अद्वैत स्वरूप कहा  |  ‘‘यत् सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।५ .५ ।।’’ जो स्थान ज्ञानियों द्वारा प्राप्त किया जाता है,  उसी स्थान पर कर्मयोगी भी पहुंचते हैं। इसलिए जो पुरुष सांख्य और योग को (फल रूप से) एक ही देखता है,  वही (वास्तव में) देखता है।।   ॥ ६१॥  

  || मूल उपनिषद ||

हिरण्मयं सौम्य तनुं स्वभक्तायाभयप्रदम् ।  

ध्यायेन्मनसि मां नित्यं वेणुशृङ्गधरं तु वा ॥ ६२॥

 || संस्कृत व्याख्या || 

       ‘हिरण्मयं’ देदीप्यमानं विष्णुं, तथा ‘सौम्यतनुं’ प्रसन्नमधुराकृतिं, ‘स्वभक्ताय’ स्वभक्तेभ्यः, ‘अभयप्रदं’ मोक्षदम् , इत्यर्थः | अथवा द्विभुजं ध्यायेदित्याह, वेणुशृङ्गधरं तु वेति | ॥ ६२॥

                                              || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

सोने जैसा देदीप्यमान चमकीला विष्णु स्वरूप और शांत ,सौम्य , मधुराकृति , अनुग्रह विग्रह अपने भक्तों को अभय देने वाले { मोक्ष देने वाले } । अथवा द्विभुज गोपाल का ध्यान करें जिन्होंने अपने हाथों में बांसुरी और शृङ्ग 

 { सींग का बना हुआ एक वाद्य विशेष } धारण किया हुआ है | इस प्रकार से मन में नित्य ध्यान करें | अथवा  श्रीमद्भागवत के अनुसार – ध्यान की अद्भुत छटा देखिये —-

 बिभ्रद् वेणुं जठरपटयोः श्रृङ्‌गवेत्रे च कक्षे ।

     वामेपाणौ मसृणकवलं तत्फलान्यङ्‌गुलीषु ।

 तिष्ठन् मध्ये स्वपरिसुहृदो हासयन् नर्मभिः स्वैः

   स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञ भुग् बालकेलिः ॥ १०.१३. ११ ॥ यह श्लोक उस समय का है जब ब्रह्मा जी भगवान की लीला को देखकर मोहित हो गये थे | (उस समय श्रीकृष्ण की छटा सबसे निराली थी) उन्होंने मुरली को तो कमर की फेंट में आगे की ओर खोंस लिया था | सिंगी और बेंत बगल में दबा लिये थे | बांये हाथ में बड़ा ही मधुर घृतमिश्रित दही-भात का ग्रास था और अंगुलियों में अदरक , नीबू आदि के अचार-मुरब्बे दबा रखे थे | ग्वालबाल उनको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए थे और वे स्वयं सबके बीचमें बैठकर अपनी विनोदभरी बातोंसे अपने साथी ग्वालबालोंको हँसाते जा रहे थे | जो समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता हैं , वे ही भगवान ग्वालबालोंके साथ बैठकर इस प्रकार बाल-लीला करते हुए भोजन कर रहे थे और स्वर्गके देवता आश्चर्यचकित होकर यह अद्भुत लीला देख रहे थे || ११ ||  श्रीमद्भागवतपुराणम्/स्कन्धः १०/पूर्वार्धः/अध्यायः १३  ॥ ६२॥ 

  || मूल उपनिषद ||

  मथ्यते तु जगत्सर्वं ब्रह्मज्ञानेन येन वा  ।   

  तत्सारभूतं यद्यस्यां मथुरा सा निगद्यते  ॥ ६३॥   

|| संस्कृत व्याख्या || 

     अथ मथुराशब्दार्थमाह |  ‘मथ्यते,’ ‘सर्वं,’  ‘जगत्,’ अनेनेति मथं , ब्रह्मज्ञानं, गोपालस्वरूपञ्च,  ‘ब्रह्मज्ञानेन,’ मदनगोपालस्वरूपेणवा इति संबन्धः | ‘यत्’ अधिष्ठानं, हि सम्यक् ज्ञानं जगद्भ्रमं निवर्तयति , ‘तत्सारभूतं,’ ‘यस्यां,’ ‘सा,’ ‘मथुरा’ पुरीत्यर्थः | ॥ ६३॥   

 || शब्दार्थबोधिनी हिन्दी व्याख्या || 

       अब मथुरा शब्द का अर्थ करते हैं |   जिस ब्रह्मज्ञान के द्वारा सारे जगत का मंथन किया जाता है | पहले व्यतिरेक विधि से बाद में अन्वय विधि से मंथन करने के उपरान्त जो सार निकलता है वह गोपाल स्वरूप है | वही सबका अधिष्ठान है , उस अधिष्ठान का ठीक ठीक ज्ञान हो जाने पर  जगद्भ्रम की निवृत्ति हो जाती है |   जिनके  ज्ञान से सर्वजगत का ज्ञान हो जाता है यानी एक ब्रह्मको यदि जान लें तो सबको जान सकते हैं क्योंकि सबके अंदर अन्तर्यामी रूप से  एक सच्चिदानंद ही  रहा हुआ है । ये कहा जाता है वेदांतमें –  ‘‘अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् । आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥ २०॥’’ दृग्दृश्य विवेक,  अस्ति भाति और प्रिय  { है, भान होता है और प्रिय है; यह ब्रह्म का रूप है } और यह अस्ति , भाति, और  प्रिय सर्वव्यापक है तथा नाम और रूप बदलते रहते हैं, यही नाम और रूप जगत का  रूप हैं और यह मिथ्या है । { मिथ्याशब्द का अर्थ यह नहीं है कि प्रतीत ही नहीं होता , अपितु प्रतीत तो होता है परन्तु आकाश में नीलिमा के समान } { दर्पण में प्रतिबिम्ब के समान }  जैसे स्वप्न के पदार्थ स्वप्न काल में तो सत्य ही प्रतीत होते  हैं बैसे ही भ्रम काल में संसार सत्य मालूम पड़ता है |  तो मंथन के बाद जो सार निकलता है वही मथुरा है |ब्रह्म ज्ञान के  द्वारा जब  सम्पूर्ण जगत का मन्थन किया गया तब मेरा जो सारभूत है यानि ब्रह्मविद्या का जो सारभूत है, उसी का नाम मथुरा अथवा मधुरा विद्या है । ‘‘ मथ्यते तु जगत्सर्वं ब्रह्मज्ञानेन येन वा। तत्सारभूतं यद्यत्स्यान्मथुरा सा निगद्यते॥’’  अर्थात्‌ जिस ब्रह्मज्ञान एवं भक्तियोग से सारा जगत  मथा जाता है तब जैसे छाछ और मक्खन अलग अलग हो जाते हैं और सार तथा असार का निर्णय हो जाता है – यानी ज्ञानी और भक्तों का संसार लय हो जाता है, ज्ञानी को सब कुछ ब्रह्ममय दिखता है और भक्त को सर्वत्र भगवद्दर्शन होता है तब वह सारभूत ज्ञान और भक्ति जिसमें सदा विद्यमान रहते हैं, वह मथुरा कहलाती है। पद्म पुराण में भगवान का वचन है-  ‘‘अहो न जानन्ति नरा दुराशयाः पुरीं मदीयां परमां सनातनीम् | सुरेंद्र नागेंद्र मुनींद्र संस्तुतां मनोरमां तां मथुरां पुरातनीम्  || ४३ ||’’ पद्म पुराण पाताल खंड  अर्थात्‌ दुष्ट हृदय के लोग मेरी इस परम सुंदर सनातन मथुरा नगरी को नहीं जानते, जिसकी सुरेन्द्र, नागेन्द्र तथा मुनीन्द्रों ने स्तुति की है और जो मेरा ही स्वरूप है। और यह मथुरा ही मधुरता भी है , मधुराधिपते रखिलं मधुरम् | ऋग्वेद के प्रथम मंडल में ही  मधु सूक्त है जिसमें मधुरता की प्रार्थना की गई है |  ॥ ६३॥ 

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        मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । 

माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥६॥

मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः ।

मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥७॥

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः ।

माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥८॥

  “ऋतायते ऋतं यज्ञमात्मन इच्छते यजमानाय “वाताः वायवः “मधु माधुर्योपेतं कर्मफलं “क्षरन्ति वर्षन्ति प्रयच्छन्तीत्यर्थः । तथा “सिन्धवः स्यन्दनशीला नद्यः समुद्रा वा “मधु माधुर्योपेतं स्वकीयं रसं क्षरन्ति । एवं “नः अस्मभ्यम् “ओषधीः फलपाकान्ता ओषधयस्ताश्च “माध्वीः माधुर्योपेताः “सन्तु भवन्तु ॥ मधु । ऋतायते । ऋतमात्मन इच्छति । ओषधीः । ओषः पाकः आसु धीयते इति ओषधयः । “नक्तं रात्रिः “नः अस्माकं “मधु मधुमती माधुर्योपेतफलप्रदा भवतु। “उत अपि च “उषसः उषःकालोपलक्षितान्यहानि च मधुमन्ति भवन्तु । “पार्थिवं रजः पृथिव्याः संबन्धी लोकोऽस्माकं “मधुमत् माधुर्य विशिष्ट फलयुक्तो भवतु । “पिता वृष्टि प्रदानेन सर्वेषां पालयिता “द्यौः द्युलोकोऽपि “मधु मधुयुक्तः भवतु ॥ पार्थिवम् । “नः अस्माकं “वनस्पतिः वनानां पालयिता यूपाभिमानी देवः “मधुमान् माधुर्योपेतफलवान् “अस्तु । तादृशं फलमस्मभ्यं प्रयच्छत्वित्यर्थः। “सूर्यः सर्वस्य प्रेरकः सविता च “मधुमान् अस्तु । “गावः अग्निहोत्राद्यर्था धेनवश्च “नः अस्माकं “माध्वीः माधुर्योपेतेन पयसा युक्ताः “भवन्तु ॥ वनस्पतिः । वनानां पतिर्वनस्पतिः । अर्थ :-  सभी प्रकार के यज्ञों का मूल उद्देश्य कल्याण से ही जुड़ा होता है  | यहां  इस ऋचा में ये कामना की गयी है कि … यज्ञ से जुड़े हुए  सभी होता ओर यजमानों को वायु के  देव सदा सुगंध मय मधु  (माधुर्य युक्त कर्म फल)  प्रदान करें  | तरंग मय जल प्रवाह जिनमें  होता है  उन सारी नदियों से भी मधु की ही प्राप्ति हो | (नदियाँ माधुर्य से युक्त रस का ही क्षरण करें)   इस पावन धरा पर उत्पन्न सारी औषधियां  हमें  निरामय और पुष्ट बनायें | औषधियों से भी मधु की ही कामना की गयी है | रात्रि हमारे लिए मधु प्रदाता बनी रहे और उसी प्रकार उषःकाल, अर्थात सूर्योदय के पहले का दिवसारंभ का समय, तथा दिन का समय भी मधुप्रद हो; पृथ्वी जो सभी लोगों को