April 23, 2024

शास्त्रज्ञान सत्र

शास्त्र ज्ञान सत्र 23

सुभाषित/श्लोक

पंडित किसे कहते हैं ? कौन होता है पंडित ? क्या किसी पुजारी को पंडित कहा जा सकता है ? क्या किसी हवन कराने वाले को पंडित कहा जा सकता है ? क्या किसी ब्राहमण को भी पंडित कहा जा सकता है ? अगर नहीं तो फिर पंडित कौन होता है ? ग्र और गृ को कैसे बोलते हैं ? मात्राओं से बोलने पर क्या अंतर पड़ता है ? ये सब जानने के लिए, ये वीडियो अवश्य देखें | यदि आपको ये वीडियो अच्छा लगे तो इसे व्हात्सप्प और फेसबुक पर अवश्य शेयर करें |

ईश्वर का तार्किक प्रतिपादन, नन्दभद्र की कथा से – शास्त्र ज्ञान

ऐसा तो है नहीं कि बस आज के ही लोग, कहते हों कि विज्ञान ही सब कुछ है | कोई ईश्वर वगैरह नहीं होता है | पुराने जमाने में भी ऐसे लोग थे बल्कि सदैव रहे हैं | पर पुराने जमाने के लोग, उसका उत्तर कैसे देते थे ? तब भी तो कोई उत्तर दिया ही जाता रहा होगा | क्या था वो उत्तर, जानते हैं, आज नन्दभद्र की कथा से |


इस वीडियो की एडिटिंग करने के लिये और इसे अब तक शास्त्र ज्ञान के अन्य वीडियो से अलग बनाने के लिये, हम Suvarna Paliwal जी का विशेष आभार प्रकट करते हैं, जो उन्होंने अपना कीमती समय निकाल कर, इस वीडियो की एडिटिंग की | आशा है, भविष्य में भी हमें ज्ञान के प्रसार के इस पुनीत कार्य में उनका योगदान मिलता रहेगा |


यदि आपको ये कहानी अच्छी लगे तो इसे अवश्य शेयर करें, बच्चों को सुनाएँ, व्हात्सप्प पर शेयर करें ताकि अन्य लोगों तक भी ये कथा पहुँच सके | (ऐसी कथाएं भी सुननी चाहिए, जो पहले कभी नहीं सुनी हैं, पुराणों में बहुत कुछ है लेकिन लोग बहुधा केवल भागवत पुराण और गरुण पुराण ही सुनते, सुनाते हैं जबकि अन्य पुराण भी अवश्य सुनने चाहिए)

न्याय शास्त्र – विभिन्न लोकन्याय

न्यायशास्त्र (तर्कशास्त्र) की जब बात होती है तो हमें लोक्न्याय भी पढने चाहिए | लोक्न्याय कुछ कुछ मुहावरे जैसे हैं कि समाज में, ऐसे कौन कौन से नियम हैं, जिनको तर्क करते समय ध्यान रखना चाहिए | ये लोकप्रचलित ही है, एक प्रकार के नियम बन गए कि ऐसा ऐसा होने पर, ये वाला लोकन्याय लगेगा | इसी सन्दर्भ में, हमें ये लोकन्याय जानने चाहिए | ये छोटा सा वीडियो है | आशा है आपको पसंद आएगा |

शास्त्र ज्ञान सत्र 22

कथा

युधिष्ठिर के वनवास के समय में, उसको भगवान् राम और नल-दमयंती की कथा सुनाई गयी | इसी कथा को सुनाकर, युधिष्ठिर को बताया गया कि ये उसका बुरा समय नहीं है | इस कथा को सभी को सुनना चाहिए ताकि हमें भी पता चले कि आखिर बुरा समय होता क्या है ! इस कथा की आजकल के जीवन में कितनी आवश्यकता है, ये भी पता चलता है अतः इसे अवश्य सुनना और सुनाना चाहिए | यदि आपको अच्छा लगता है तो आप भी इसे शेयर कर सकते हैं |

चर्चा

धर्म को समझना आवश्यक है | पिछले कुछ भागों में, हमने धर्म के बारे में चर्चा की और आज उसके बारे में आखिरी चर्चा की जाएगी (कोशिश करें कि नीचे के वीडियो पहले देखें ताकि धर्म के बारे में, पहले क्या चर्चा हुई, वो स्पष्ट हो सके) | धर्म, विद्या, सत्य को समझना आवश्यक है क्योंकि बिना इनको समझे, धर्म को नहीं समझा जा सकता है | धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्म लक्षणं अतः इन लक्षणों को समझना परम आवश्यक है | धर्म को फेसबुक और व्हात्सप्प से और कदाचित, २-२ पंक्तियों की परिभाषाओं से कदापि न समझें क्योंकि ये भ्रमति करेंगी और आपको गलत राह पर ले जायेंगी | शास्त्रों से ही, धर्म को जानने की कोशिश करें | हमारे शास्त्रों में धर्म के ऊपर हजारों पन्ने लिखे गए, उसे कोई फेसबुक या व्हात्सप्प पर क्या लिखेगा और क्या पढ़ेगा…. आइये, चर्चा करते हैं धर्म की |

तर्कशास्त्र

तर्कशास्त्र में विभिन्न न्याय दिए गए हैं, जो एक तरह से आगे के लिए, सन्दर्भ बन गए | इनको समझना आवश्यक है क्योंकि इनको समझने से, विभिन्न जगहों पर इनका प्रयोग कर सकते हैं, जैसे सत्य क्या है ? ईश्वर और आत्मा के सन्दर्भ में अंधगज न्याय क्या होता है ? इसी तरह से, काकतालीय न्याय, अंधचटक न्याय आदि भी अवश्य पढने चाहिए | तर्कशास्त्र अन्य शास्त्रों को समझने में बहुत सहायक है अतः इनको समझना बहुत आवश्यक है |

शास्त्र ज्ञान सत्र 21

चर्चा

आज का विषय बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि इन सभी विषयों पर बड़ी भ्रांतियां हैं | उन भ्रांतियों पर हम पहले भी बात कर चुके हैं किन्तु आज उनके आगे, विस्तार से बात करेंगे | पिछले वीडियो में, हिदू शब्द पर तो बात ही थी किन्तु धर्म की बात नहीं हो पायी थी, आज हमने बात की, धर्म क्या होता है ? बहुत से लोग, सनातन धर्म की जगह स्वयं को हिन्दू बोलते हैं, बिना ये जाने कि हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है ? स्वयं को बड़ा धार्मिक बतलाते हैं, बिना ये जाने कि धर्म वास्तव में होता क्या है ? धर्म का चाहे उनमें लेशमात्र भी लक्षण न हो, किन्तु वो स्वयं को धर्म का सबसे बड़ा रक्षक बताते हैं और फिर कहते हैं धर्मो रक्षति रक्षितः | लोगों ने बिना गहराई में जाए, शास्त्रों की उक्तियों का मजाक बना रखा है | न धर्म को जानते हैं, न धर्म की रक्षा कैसे की जाए, ये जानते हैं किन्तु जोश में कहते हैं कि हम धर्म की रक्षा करेंगे |

आज इस सत्र में इन्हीं सब विषयों की चर्चा करेंगे, रिकॉर्डिंग पूरी नहीं हो पायी थी, पर जितनी है, उतनी आपके सामने है | ये सत्र वास्तव में 2019, जनवरी में हुआ था | यदि आपको ये पसंद आये तो इसे शेयर अवश्य करें, व्हात्सप्प पर और फेसबुक पर |

तर्कशास्त्र/न्यायशास्त्र

आखिर शास्त्र पढने ही क्यों चाहिए ? उनकी क्या आवश्यकता है ? इसको समझना चाहिए | हमको पता होना चाहिए कि हम ज्ञान तीन ही प्रकार से प्राप्त कर सकते हैं – एक स्वअनुभव से, एक दूसरों के अनुभव से और तीसरा पूर्वजों के अनुभव से | चौथा कोई तरीका नहीं है, ज्ञान को प्राप्त करने का | पूर्वजों के अनुभव को जानने के बाद ही, हम आगे की खोज कर पायेंगे अन्यथा जो लोग ये सोचते हैं कि ज्ञान तो भीतर ही पैदा हो जाता है, उन्हें ये पता ही नहीं कि वो दुबारा उसी कुँए को खोद रहे हैं, जो पहले से ही उनके बगल में कोई खोद कर गया है | E = MC२ अगर आइन्स्टीन न लिख कर जाता किताबों में, तो आगे की खोज कैसे होती | हमारे पूर्वज ऐसे ही बहुत सारी खोज, पहले से करके गए हैं, हमारे लिए | पर हम पढ़ ही नहीं रहे | हमें जिद है कि पूर्वजों का ज्ञान या तो व्यर्थ है, ताकियानूसी है (बिना पढ़े ही ये बात हमें ज्ञात है) अथवा हम खुद ही खोज करेंगे पर पूर्वजों की बातें नहीं जानेंगे कि जो वो सांख्य, योग आदि में कह गए, वही कार्य हमें जाने कितने वर्षों को लगाने के बाद समझ आएगा, आएगा भी या नहीं |

शास्त्रों में भी तर्कशास्त्र जैसा शास्त्र उन्होंने क्यों लिखा ? क्यों उन्होंने अन्य धर्मों की तरह सीधे नहीं कहा कि ये ईश्वर है, मान लो | क्यों उसे सिद्ध करने पर तुल गए | आत्मा, ईश्वर, पूर्वजन्म इस सब को तर्क से सिद्ध उन्होंने किया , किसलिए ? इसलिए कि हम इसे कल्पना या गप्प न समझें |

इसी क्रम में, न्यायशास्त्र में, लोकन्याय पढ़ते हुए, हमने अरुंधतीदर्शन न्याय और शाखाचंद्र न्याय पढ़ा | मूर्तिपूजा हमारे यहाँ होती थी या नहीं, इसको शाखाचंद्र न्याय से समझा |

तर्कशास्त्र/न्यायशास्त्र

हम बहुधा तर्क-वितर्क करते हैं किन्तु तर्क के अवयव क्या होते हैं, बिना ये जाने ! हमें पता होना चाहिए कि तर्क का उद्देश्य क्या होता है और उसके क्या क्या मुख्य अवयव हैं | यदि ये ही नहीं जानेंगे तो कैसे पता चलेगा कि हम तर्क कर रहे हैं या कुतर्क ! न्यायशास्त्र में जो विभिन्न लोक न्याय हैं, उनमें अरुंधती दर्शन न्याय क्या होता है ? ये भी इस वीडयो में बताया गया है | यदि अच्छा लगे तो लाइक और शेयर अवश्य करें और चैनल को सबस्क्राइब करें |

कथा

हम सभी ने कहानियाँ सुनी हैं | लेकिन कौन सी कहानी, कहाँ से, कैसे जुड़ जाती है, इसका प्रायः हम ध्यान नहीं देते, जिसका सही उदाहरण है, जन्मेजय के नागयज्ञ की ये कथा | जो जुडती है, राजा नल से | ये वही नल-दमयंती वाले राजा नल हैं | इससे ये ज्ञात होता है कि राजा नल उसी समयकाल के थे, जिस समय जन्मेजय थे | ये ध्यान देने वाली बात है क्योंकि राजा नल की कहानी में कलियुग का जिक्र है अर्थात वो परीक्षित के बाद हुए थे | इस प्रकार, कथाओं की कड़ियाँ जोड़ना आना चाहिए | फिर आप एक अलग ही निष्कर्ष पर पहुचेंगे, जो पहली बार आपके ध्यान में न आया होगा | इसी प्रकार, आज कथा सुनते हैं, जन्मेजय के नागयज्ञ की, एक अलग तरह से | यदि अच्छी लगे, तो शेयर अवश्य करें |

श्लोक/सुभाषित

हम 12 ज्योतिर्लिंग के नाम तो जानते हैं लेकिन उनका इतिहास बहुधा नहीं जानते हैं | ज्योतिर्लिंग जैसी महत्वपूर्ण धार्मिक धरोहर का इतिहास तो सभी भारतीयों को पता ही होना चाहिए | इस के पिछले सत्र में हमने २ ज्योतिर्लिंग के बारे में चर्चा की थी और इस बार चार ज्योतिर्लिंग की चर्चा की, जिसमें इनके इतिहास और ये कैसे बने, इसकी चर्चा की गयी है | आप भी अवश्य सुनें और यदि अच्छा लगे तो इसे लाइक और शेयर करें |

श्लोक/सुभाषित

जी हाँ, ऐसा भी होता है कि व्यायाम से अपेक्षित लाभ नही भी होता है | व्यायाम केवल शरीर के लिए आवश्यक नहीं है अपितु मन के लिए भी बहुत आवश्यक है | मन जिन इन्द्रियों को संचालित करता है, वो इन्द्रियां, इसी शरीर में हैं और स्वस्थ शरीर में ही, स्वस्थ मन निवास करता है | सबका आपस में लिंक है | व्यायाम को समझाता हुआ, इस बार का सुभाषित |

शास्त्र ज्ञान सत्र 20

श्लोक/सुभाषित

तोते की तरह स्पष्ट बोलना चाहिए, हाथी की तरह, नहाना चाहिए – इस सुभाषित में ये उपदेश दिया गया है कि हमें प्रकृति से भी सीखते रहना चाहिए |

श्लोक/सुभाषित

शास्त्र ज्ञान के इस सत्र में हमने विभिन्न ज्योतिर्लिन्ग् के उद्भव के बारे में चर्चा की गयी | इसमें इस बात को स्पष्ट किया गया कि लिंग का अर्थ बहुत लोग, Penis करते हैं जबकि ये गलत है | लिंग अलग होता है, जिसका अर्थ होता है चिन्ह | पेनिस का अर्थ होता है, शिश्न | दोनों अलग अलग चीजें हैं किन्तु लोगो में भ्रम इतना अधिक बैठा दिया गया है कि लोग अब न पढ़ते हैं, न जानते हैं और इसी प्रकार के अर्थ का अनर्थ कर देते हैं | उन लोगों से पूछना चाहिए कि फिर नपुंसक लिंग का क्या अर्थ है ?

आगे इस सत्र में, विभिन्न प्रकार के पापों के बारे में बात की गयी है और संध्या (जो कि कुल 5 होती हैं, दिन में) किन्तु मुख्य 3 होती होती हैं | उनके बारे में बताया गया है |

कथा

परीक्षित की कहानी | परीक्षित कैसे मृत्यु को प्राप्त हुए ? तक्षक ने उनको क्यों काटा ? कलियुग ने कैसे, परीक्षित को ठगा |

तर्कशास्त्र

बाबा लोग कहते हैं कि ईश्वर आस्था का विषय है, आत्मा होती है, मान लो ! पर कैसे मान लें कि ईश्वर है ? कैसे मालूम कि आत्मा होती है ? क्या मालूम, ईश्वर न होता हो, आप हमें लल्लू बनाते हो !!! ऐसा नहीं है ।

हमारे सनातन धर्म मे कोई भी बात बिना प्रमाण के नहीं की जाती थी। ईश्वर है, क्योंकि वो तर्क (लॉजिक) से प्रमाणित है । आत्मा है क्योंकि उसका भी प्रमाण है। जब भारत में बौद्ध भिक्षुओं में ये प्रचार कर दिया कि कोई ईश्वर नही होता तो भारतीय मनीषियों ने, उसके खण्डन के लिये, तर्कशास्त्र को 500 साल लगाकर, पीढियां लगाकर, पुनर्भाषित किया और सिद्ध किया कि ईश्वर मात्र आस्था का विषय नहीं है । (इसके लिये पढ़ें उदयाणाचार्य कृत न्याय कुसुमांजलि और आत्मा की सिद्धि के लिए पढ़ें आत्मतन्वविवेक)

इसी क्रम में इस बार हमने समझा कि प्रमाण क्या होता है ? कैसे समझें कि कौन सी चीज प्रमाण है ! इस संदर्भ में चर्चा हुई कि हम हिन्दू कैसे बने । हम इंडियंस कैसे बने । आप भी देखिये और समझिये इस महत्वपूर्ण वीडियो से ।

शास्त्र ज्ञान सत्र 19

सत्संग क्यों आवश्यक है ?

सत्संग से क्या लाभ होता है, शास्त्र ज्ञान चर्चा से क्या लाभ है, ये जानना आवश्यक है |

परीक्षित की जन्मकथा, शास्त्र ज्ञान, सत्र 19

जब युधिष्ठिर ने दुर्योधन को बोला कि अगर हम पांडवों में से किसी एक को भी हरा दोगे तो हम अपनी पराजय स्वीकार कर लेंगे और तुम जीते हुए माने जाओगे और सारा राज्य तुम्हारा | ये सुनते ही दुर्योधन तालाब से बाहर आ गया | यह देखकर कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को बुरी तरह फटकारा और कहा – कि तुम्हारी जुआ खेलने की आदत गयी नहीं अभी तक | तुम तो पैदा ही, जंगल में रहने के लिए हो ! अगर दुर्योधन ने भीम के अलावा अर्जुन, तुम्हें या किसी और को युद्ध के लिए चुन लिया तो तुम्हारा जीतना असम्भव है |

कृष्ण जी ने, दुर्योधन के तालाब से बाहर आते ही, भीम द्वारा दुर्योधन को ललकारने का इशारा किया और भीम के ललकारने पर, दुर्योधन ने उसे ही चुना | जब युद्ध शुरू हुआ, तो भीम के लाख प्रयास करने पर भी, भीम दुर्योधन पर हावी नहीं हो पाया और दुर्योधन ने भीम की अच्छी पिटाई कर दी | ये देख कर पांडव घबरा गए और अर्जुन ने कृष्ण से पूछा कि इस युद्ध में कौन जीतेगा ?

कृष्ण ने कहा, भीम के पास ताकत भले अधिक है किन्तु दुर्योधन के पास अभ्यास की अधिकता है | उसने 14 वर्ष तक, भीम का पुतला बना कर, उस पर विभिन्न दांव पेंचों का अभ्यास किया है | अगर ताकर और अभ्यास में युद्ध होगा तो अभ्यास जीतेगा, अतः इस युद्ध में भीम का जीतना असम्भव है | अर्जुन के निवेदन पर, कृष्ण जी द्वारा भीम की जांघ पर गदा मारने का इशारा और भीम द्वारा, दुर्योधन की जांघ तोडना | यह देखकर, बलदाऊ जी का हल लेकर, भीम को मारने दौड़ना और कृष्ण जी द्वारा बीच बचाव किया गया | बलदाऊ जी, भीम को श्राप देकर चले गए | अब आगे की परीक्षित जन्म की कहानी, इस वीडियो में |

बच्चों को झूठ बोलने से कैसे रोकें, स्वयं झूठ बोलने से कैसे बचें – शास्त्र ज्ञान


माता-पिता के लिए सबसे बड़ी दुविधा है कि बच्चों को झूठ बोलने से कैसे रोकें ! वो भी तब जब स्वयं झूठ बोलते हों | आम जीवन में, ऑफिस में, घर में, पचासों बार, झूठ बोलना पड़ता है | पर ये समझना चाहिए कि कोई झूठ क्यों बोलता है | झूठ केवल 3 ही परिस्थितियों में बोला जाता है – पहला, जब आपका कोई लोभ हो, तब व्यक्ति झूठ बोलता है, दूसरा, जब आपको कोई भय हो, जान का या मार का या कोई और, तब व्यक्ति झूठ बोलता है और तीसरा, जब किसी का भला करना हो | आपको ये मनन करना चाहिए, कि हम झूठ क्यों बोलते हैं | ऐसी क्या बिजली गिर जायेगी, अगर हम झूठ नहीं बोलेंगे तो | सत्य बोलने का अभ्यास कैसे करें, ये समझना चाहिए तब ही आप अपने बच्चों को समझा पायेंगे | इसी बात को अलग तरीके से रखता हुआ, शास्त्र ज्ञान का ये वीडियो |

हिन्दू धर्म क्या है ? धर्म और रिलिजन में क्या अंतर है ?

आजकल हिन्दू धर्म को लेकर बड़े भ्रम की स्थिति है | जिस विषय पर गहन अध्ययन और चिन्तन की आवश्यकता है, उस पर बिना तह तक जाए, नारे लगाए जाते हैं | हमें समझना चाहिए कि हिन्दू क्या होता है ? रिलिजन का अर्थ भी प्रायः धर्म कर दिया जाता है, ये भी समझना चाहिए कि रिलिजन का क्या अर्थ है और धर्म रिलिजन से कैसे अलग है ? जब तक हम इतने बेसिक्स नहीं समझेंगे, हम अपने धर्म को ही नहीं जानेंगे तो भला, उसके चार स्तंभों को कैसे समझेंगे | इस वीडियो को देखना, सभी के लिए आवश्यक है | आप ये वीडियो देखिये और बताइए कि आपको कैसा लगा |


तर्कशास्त्र, प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रकार, योगबल और अनुमान प्रमाण के प्रकार – शास्त्र ज्ञान

तर्कशास्त्र, धर्म और तात्विक ज्ञान के लिए अति आवश्यक है | तर्क से, धर्म और तत्व को समझा जा सकता है | इसी विषय को आगे बढाते हुए, आज बाते करेंगे प्रमाण (Proof) की | हमें पता होना चाहिए कि जब कोई बात कही जाती है तो उसको कैसे चेक करें, कैसे पता करें कि वो प्रमाणित है या नहीं ! किसे प्रमाण कहा जाएगा | आइये आज समझते हैं, प्रत्यक्ष प्रमाण और अनुमान प्रमाण के प्रकारों को |

शास्त्र ज्ञान सत्र 24

नन्दभद्र की कथा के पहले भाग में हमने जाना कि ईश्वर का तार्किक प्रतिपादन कैसे किया गया | अब इस आगे की कथा में, जीवन के बहुत से महत्वपूर्ण पहलुओं का विश्लेषण है जैसे कि बुद्धिमान या पंडित की क्या पहचान होती है, किसी भक्त में और भिखारी में क्या कोई अंतर होता है ? योगी होने की पहली शर्त क्या है ? जीवन में जो कष्ट आते हैं वो कितने प्रकार के होते हैं और उन कष्टों से कैसे बचा जा सकता है ? लालच से कैसे बचा जाए और सबसे महत्वपूर्ण क्या पापी लोग, दुष्ट लोग, सदैव प्रसन्न रहते हैं ? in सभी प्रश्नों का उत्तर हमें मिलता है, नन्दभद्र की कथा से | तो आइये, सुनते हैं, नन्दभद्र की कथा का भाग 2 |

भाग 1 का वीडियो लिंक – https://youtu.be/vjXaB-UZgmA

You cannot copy content of this page