April 24, 2024

प्रथम अध्याय

अष्टांग ह्रदय

अष्टांग ह्रदयम् – सूत्रस्थानम्
॥प्रथमोध्याय॥

मंगलाचरण
रागादिरोगान्  सततानुषक्तानशेषकायप्रसृतान्।
औत्सुक्यमोहारतिदा़ञ्जघान, योऽपूर्ववैधाय नमोऽस्तु तस्मै।।१।।

अर्थ – जो राग आदि रोग सदा मानव मात्र के पीछे लगे रहते, जो सम्पूर्ण शरीर मे फैले रहते है और जो उत्सुकता, मोह तथा अरति( बेचैनी) उत्पन्न करते रहते है, उन सबको जिसने नष्ट किया उन अपूर्व वैध को हमारा नमस्कार है।

आयुः कामायमानेन धर्मार्थसुखसाधनम्।  आयुर्वेदोपदेशेषु विधेय परमादरः।।२।।

अर्थ – धर्म, अर्थ, सुख नामक तीनो पुरुषार्थो का साधन( प्राप्ति का उपाय) आयु है, अतः आयु (सुखायु) की कामना करने वाले पुरुष को आयुर्वेदो मे निर्दष्ट उपदेशों मे परम आदर करना चाहिए।

ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत्। सोऽश्विनौ तौ सहस्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकान्मुनीन्॥३॥

तेऽग्निवेशादिकांस्तेतु पृथक् तन्त्राणि तेनिरे।

अर्थ – ब्रह्माजी ने सबसे पहले आयुर्वेदशास्त्र का स्मरण करके दक्षप्रजापति को ग्रहण कराया अर्थात् पढाया था। दक्षप्रजापति ने अश्विनीकुमारों को पढाया था, अश्विनीकुमारों ने देवराज इन्द्र को पढाया था, उन्होने अत्रिपुत्र (आत्रेय,पुनर्वसु) आदि महर्षियो को पढाया था; आत्रेय आदि ने अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, हारीत, क्षारपाणि आदि को पढ़ाया था, और फिर अग्निवेश आदि महर्षियो ने अलग-अलग  तत्वों (आयुर्वेदशास्त्रो) की विस्तार के साथ रचना की।

तेभ्योऽतिभिविप्रकीर्णेभ्य प्राय सारतरोच्यः।।
क्रियतेऽष्टाङ्गह्रदयं नातिसङ्क्षेपविस्तरम्।।४।।

अर्थ – महर्षि वाग्भट जी का कथन है कि इधर उधर बिखरे हुये उन प्राचीन तन्त्रो मे से उत्तम से उत्तम (सार) भाग को लेकर यह उच्चय (संग्रह) किया गया है। जिसे अष्टाङ्गह्रदयम् कहा (नाम दिया) गया है। यह (इसमे प्राचीन ग्रंथो मे वर्णित विषय) न अत्यन्त संक्षेप मे है न अत्यन्त विस्तार से कहे गये है।

कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान्।।
अष्टावङ्गानि तस्याहुश्र्चिकित्सा येषु सन्श्रिता।।५।।

अर्थ – कायचिकित्सा, बालतन्त्र (कौमारभृत्य), ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या), उर्ध्वांगचिकित्सा (शालाक्यतन्त्र), शल्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), दंष्ट्राविषचिकित्सा (अगदतन्त्र), जरा चिकित्सा (रसायनतन्त्र) तथा वृषचिकित्सा (वाजीकरण तन्त्र) ये आठ अङ्ग कहे गये है।इन्ही अंगो मे संपूर्ण चिकित्सा आश्रित है।

वायुः पित्तम् कफश्चेति त्रयो दोषः समासतः।।
विकृताऽविकृता देहम् ध्नन्ति ते वर्तषन्ति च।।६।।

अर्थ – आयुर्वेदशास्त्र मे संक्षेपतः तीन ही दोष माने जाते है, वात, पित्त, और कफ । ये तीनो वात आदि दोष विकृत(असम अर्थात कम या ज्यादा होने पर) शरीर का  नाश कर देते है और अविकृत(समभाव मे अर्थात नियत मात्रा मे होने पर ) जीवनदान करते है अथवा स्वास्थ्य सम्पादन करने मे सहायक होते है।

पंचमहाभूतो मे आकाशतत्व अवकाश(खाली स्थान) रुप मे शरीर मे रहता है और पृथ्वीतत्व आधारस्वरुप है। अतः ये दोनो शरीर मे निष्क्रिय है अर्थात इनमे शरीर मे कोई क्रिया नही होती है। शेष तत्वो मे जलतत्व कफ है, अग्नि तत्व पित्त है और वायुतत्व ही वात है।

ते व्यापिनोऽपि हन्नाभ्योरध्योर्ध्वसंश्रयाः।।
वयोऽहोरात्रिभुक्तानाम् तेऽन्तमध्यादिगाक्रमात्।।७।।

अर्थ – ये तीनो वात आदि दोष शरीर मे व्याप्त रहते है। फिर भी नाभि से निचले भाग मे वायु का, नाभि तथा ह्रदय के मध्य भाग मे पित्त का और ह्रदय के उपरीभाग मे कफ का आश्रयस्थान है। यद्यपि ये दोष सदा गतिशील रहते है। तथापि वयस् के अन्तकाल (वृद्धावस्था) मे, वयस् के मध्यकाल (यौवन) मे, वयस् के आदिकाल (बाल्यकाल) मे, दिन- रात तथा भुक्त (भोजन कर चुकने) के अन्त,मध्य व आदिकाल मे विशेष रुप से गतिशील रहते है।

(यह इस तरह समझे, वृद्धावस्था मे,दिन के अन्तिम पहर मे रात्रि के अन्तिम पहर मे तथा भोजन पचने की क्रिया के अन्तिम भाग मे वायु का प्रभाव रहता है।  उसी तरह अवस्था का मध्यभाग ( युवावस्था), दिन का मध्यभाग,रात्रि का मध्यभाग तथा भोजन पचने की क्रिया के मध्यभाग मे पित्त का प्रभाव, तथा बाल्यकाल,दिन का आदिभाग,रात्रि का आदिभाग तथा भोजन पचने की क्रिया के आदिभाग मे कफ का प्रभाव रहता है।)

तैर्भवेद्विषमस्तीक्ष्णो मन्दश्चाग्नि समैः समः।।
कोष्ठः क्रूरो मृदुर्मध्यो मध्यः स्यात्तेः समैरपि।।८।।

अर्थ – उक्त वात आदि दोषो के प्रभाव से अग्नि(जठराग्नि), वात से विषम, पित्त से तीक्ष्ण और कफ से मन्द हो जाती है। जठराग्नि की भांति कोष्ठ भी वातदोष से क्रूर, पित्तदोष से मृदु और कफदोष से मध्यम रहता है और इन दोषो के सम रहने पर भी मध्यम रहता है।

आमाशय, पक्वाशय, अग्न्याशय, मूत्राशय, रक्ताशय, ह्रदय, उण्डुक तथा फुप्फुस इन अवयवो की परिधि को आयुर्वेदशास्त्र मे कोष्ठ नाम से परिभाषित किया गया है।

शुक्रार्तवस्थैर्जन्मादो विषेणेव विषक्रिमेषः।।

तैश्च तिस्र: प्रकृतयो हीनमध्योत्तमाः पृथक्। समधातुः समस्तासु श्रेष्ठा निन्द्या द्विदोषजाः।।९।।

अर्थ – गर्भाधान काल मे माता पिता के आर्तव तथा शुक्र मे अधिकता से उपस्थित या वर्तमान उक्त तीनो दोषो के अनुसार क्रमशः गर्भ की तीन प्रकृतियाॅ बनती है।

१. वातदोष की अधिकता से हीन प्रकृति
२. पित्तदोष की अधिकता से मध्य प्रकति
३. कफदोष की अधिकता से उत्तम प्रकृति

यही प्रकतियाॅ श्रेष्ठ मानी गयी है।जो प्रकतियाॅ दो दोषो के मिश्रण से बनती है, वे निन्दनीय मानी जाती है और समधातुज प्रकति सबसे श्रेष्ठ होती है।

 उण्डुक – appetite
फुप्फुस – lung (फेफङे)
आमाशय – stomach (पेट)
पक्वाशय – duodenum
अग्न्याशय – pancreas

तत्र रूक्षो लघुः शीतः खरः सूक्ष्मश्चलोऽनिलः।
पित्तम् सस्नेहतीक्ष्णोष्णम् लघु विस्रम् सरम् द्रवम्।। ११।।

अर्थ –

वातदोष के गुण यह रूक्ष, लघु, शीत, खर, सूक्ष्म तथा चल(सदा गतिशील) होता है।

पित्तदोष के गुण यह कुछ स्निग्ध, तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, विस्र(आम गन्ध वाला), सर तथा द्रव होता है‌।

स्निग्धः शीतो गुरूर्मन्दः श्लक्षणो मृत्स्नः स्थिरः कफः।
सन्सर्गः सन्निपातश्च तद्द्वित्रिकोपतः।।१२।।

अर्थ –

कफदोष के गुण- स्निग्ध, शीत, गुरू, मन्द, श्लक्ष्ण, मृत्स्न तथा स्थिर होता है।

आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार किन्ही दो दोषो के एकसाथ क्षय या वृद्धि होने का नाम सन्सर्ग है।तीनो दोषो के एकसाथ क्षय या वृद्धि होने का नाम सन्निपात है।

यहाँ मृत्स्न का अर्थ मिट्टी से है।

रसासृङ्मासमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः।
सप्तदुष्याःमला मूत्रशकृत्स्वेदादयोऽपि च।।१३।।

अर्थ – आयुर्वेदशास्त्र मे रस, रक्त, मांस, मेदा, मज्जा, अस्थि तथा शुक्र ये सात ‘धातु’ कहे जाते है और जब ये वात आदि दोषो द्वारा दूषित किये जाते है तो इन्हे दूष्य कहते है।मूत्र, पूरीष तथा स्वेद आदि मल कहे जाते है।

पुरीष-  विष्ठा

व्याख्या से मुख्य अंश

तीनो दोष, सातो धातु व मल ही शरीर के मूल है।

धातु जो द्रव्य शरीर का धारण एवंं पोषण करते है धातु कहलाते है।इसीलिये सम अवस्था मे स्थित वात आदि दोषो को भी धातु कहा गया है।

दोष जो दूसरो को दूषित करे।

दूष्य जो स्वयं दूषित हो ।

मल भी दूष्य है।

धातु के मल

रस का मल – कफ

रक्त का मल – पित्त

मांस का मल – नाक, कान आदि छिद्रो से निष्कासित मल

मेदस् का मल – स्वेद

अस्थि का मल – नख,रोम,केश

मज्जा का मल – त्वचा का स्नेह (तैलीयता)

शुक्र का मल – ओजस्

वृद्धिः समानैः सर्वेषाम् विपरीतैर्विपर्ययः।
रसाः स्वाद्वम्ललवणतिक्तोषणकषायकाः।।१४।।
षड् द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वम् बलावहाः।

अर्थ – शरीर से सम्बन्धित उक्त वात आदि दोषो, रस आदि धातुओं तथा मलो के समान गुण धर्म वाले पदार्थों का सेवन करन से उन उन की वृद्धि होती है और उन उन के विपरीत गुण धर्म वाले पदार्थों का सेवन करने से उनका क्षय होता है।

           आयुर्वेद मे रसो की संख्या छह है- स्वादु(मीठा), अम्ल(खट्टा), लवण(नमकीन), तिक्त(नीम तथा चिरायता आदि), ऊषण(कटु- कालीमिर्च आदि) तथा कषाय(कसैला)। ये सभी रस भिन्न-भिन्न द्रव्यो मे पाये जाते है।ये रस अन्त की ओर से आगे की ओर को बलवर्धक होते है अर्थात मधुर रस सबसे अधिक बलवर्धक होता है और इसके बाद सभी उत्तरोत्तर बलनाशक होते है।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक १५,१६

तत्राद्या मारूतम् ध्नन्ति त्रयस्तिक्तादयः कफम्।।१५।
कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते।।

अर्थ – इनमें प्रथम तीन (मधुर, अम्ल, लवण) रस वातदोष को नष्ट करते हैं, तिक्त, कटु, कषाय कफदोष को नष्ट करते हैं तथा कषाय, तिक्त , मधुर पित्तदोष को नष्प करते है। इससे विपरीत रस वात, पित्त कफ दोषो को बढ़ाते है।

शमनम् कोपनम् स्वस्थहितम् द्रव्यमिति त्रिधा।।१६।।
उष्णशीतगुणोत्कर्षात्तत्र वीर्यम् द्विधा स्मृतम्।।

अर्थ – विधिभेद से द्रव्य तीन प्रकार का होता है- शमन (वात आदि दोषो का शमन करने वाला), कोपन (वात आदि दोषो को कुपित करने वाला), स्वस्थहित ( स्वस्थ पुरूष के स्वास्थ को बनाये रखने वाला)

द्रव्यो मे शीतगुण तथा उष्णगुण की अधिकता से दो प्रकार काक्ष वीर्य माना जाता है।

संसार में सभी पदार्थ या तो शीत है या उष्ण। अतः दो प्रकार का वीर्य होना स्वाभाविक ही है, किन्तु वायु द्रव्य ऐसा है जो अनुष्णाशीतस्पर्श वाला है ।

अनुष्णाशीतस्पर्श अर्थात जो न उष्ण है न शीत। मौसम के अनुसार

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक १७, १८,१९

त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वाद्वम्लकटुकात्मक:।।१७।।

अर्थ:- भले ही द्रव्य किसी रस से युक्त क्यो न हो उसका विपाक तीन प्रकार का होता है- मधुर, अम्ल तथा कटु।

प्राय सभी प्रकार के रस वाले द्रव्यो का भोजन के पाचनकाल के पश्चात वह रस जठराग्नि द्वारा पाक हो जाने पर उपर्युक्त तीन प्रकार का पाया जाता है।

१. मधुर तथा लवण रस वाले द्रव्यो का मधुर।

२. अम्ल रस वाले द्रव्यो का अम्ल

३. तिक्त, कटू, काषाय रस वाले द्रव्यो का कटु विपाक होता है।

गुरूमन्दहिमस्निग्धश्लक्षणसान्द्रमृदुस्थिरः। गुणाः ससुक्ष्मविशदा विन्शति: सविपर्ययाः।।१८।।

अर्थ:- द्रव्यो मे परस्पर विपरीत यह २० गुण पाये जाते है।-

गुरू – भारी, लघु – हल्का, मन्द – चिरकारी (जो न शीघ्र लाभ करता है न हानि), तीक्ष्ण – तीखा(जो शीघ्र लाभ या हानि करे), शीत –

शीतल, उष्ण – गरम, स्निग्ध – चिकना, रुक्ष – रूखा, श्लक्ष्ण – साफ, खर – खुरदुरा, सान्द्र – गाढा, द्रव – पतला, मृदु – कोमल, कठिन – कठोर, स्थिर – अचल, सर – चल(फैलने वाला) , सूक्ष्म – बारीक(छोटे से छोटे स्रोतो मे प्रवेश करने वाला), स्थूल – मोटा, विशद – टूटने वाला, पिच्छिल – लसलसा (लसीला)।

कालार्थकर्मणाम् योगो हीनमिथ्यातिमात्रक। सम्यग्योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैकारणम्।।१९।।

अर्थ – काल, अर्थ तथा कर्म के हीनयोग, मिथ्यायोग एवम् अतियोग रोग या रोगो की उत्पत्ति मे एकमात्र कारण होता है तथा काल, अर्थ और कर्म का सम्यक् योग आरोग्य का एकमात्र कारण होता है।

काल- यह आयुर्वेदिक दृष्टि से तीन प्रकार का होता है- शीतकाल, उष्णकाल तथा वर्षाकाल। इन कालो मे क्रमशः शीत, उष्ण तथा वर्षा का अधिक होना अतियोग, कम होना हीनयोग तथा सीमा के विपरीत होना मिथ्यायोग है।

अर्थ- श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियो द्वारा जिन-जिन विषयो का ग्रहण किया जाता है उन्हे ही अर्थ कहा गया है।इन अर्थो का अपनी-अपनी इन्द्रियो द्वारा अधिक संयोग अतियोग, कम संयोग हीनयोग तथा अनिष्टकारक संयोग होने को मिथ्यायोग कहते है।

कर्म – वाणी, मन तथा शरीर 

की पृवत्ति या चेष्टा का नाम कर्म है।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक २०, २१

रोगस्तु दोषवैषम्यम् दोषासाम्यमरोगता।
निजागन्तुविभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृताः।।२०।।

अर्थ – वात, पित्त, कफ इन दोषो  क विषमता का नाम रोग है। सामान्य रूप से रोग दो प्रकार के होते है। निज ( वात आदि भीतरी दोषो की विषमता से होने वाले), आगन्तुज ( अभिघात आदि बाहरी कारणों से होने वाले)।

तेषाम् कायमनोभेदादधिष्ठानमपि ‌द्विधा।
रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाहृतौ।।२१।।

अर्थ- रोगो के अधिष्ठान (आश्रयस्थान) भी दो होते है।- काय(शरीर) तथा मन। मन के दो दोष है- रजस् तथा तमस्।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक २२,२३

दर्शनस्पर्शनप्रश्नैः परिक्षेत च रोगिणम्।
रोगम् निदानप्राग्रूपलक्षणोपशयाप्तिभिः।।२२।।

अर्थ – दर्शन, स्पर्शन (छू कर) तथा रोग सम्बन्धित विविध प्रश्न पूछकर रोगी की परीक्षा करनी चाहिए।

निदान, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय तथा सम्प्राप्ति नामक रोगज्ञान के उपायो से रोग की परीक्षा करनी चाहिए।

भुमिदेहप्रभेदेन देशमाहुरिह द्विधा।
जाङ्गलम् वातभूयिष्ठमनूपम् तु कफोल्बणम्।।२३।।
साधारणम् सममलम् त्रिधा भूदेशमादिशेत्।।

अर्थ – आयुर्वेदिक दृष्टि से देश दो प्रकार का होता है। भुमिदेश तथा देहदेश। शरीर के विभिन्न अवयवो को यहां देहदेश कहा गया है।।

भुमिदेश तीन प्रकार का कहा गया है

जांगल देश – रूखा सूखा मरुस्थल जैसे बीकानेर, जैसलमेर, बाहरी अरब प्रदेश, अफ्रीका आदि। ये प्रायः जल तथा वृक्षरहित देश है। यहां पित्तज, रक्तज् तथा वातज् रोग अधिक होते हैं।

आनुप देश – बिपुल जल तथा पर्वतो से युक्त देश। जैसे – आसाम, ब्रह्मा, बंगाल की खाड़ी,नदी नालो से युक्त प्रदेश। यहां कफज् तथा वातज् रोग अधिक होते है।

साधारण देश – इसमें वात आदि सभी रोग सम रहते है।जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि के निवासी।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक २४,२५

क्षणादिर्व्याध्यवस्था कालो भेषजयोगकृत।।२४।।

अर्थ- आयुर्वेद मे दो प्रकार का काल माना जाता है

१. क्षण अर्थात प्रातःकाल तथा सायंकाल

२. रोग की अवस्था ( आमावस्था तथा जीर्णावस्था)। इन दोनो कालो के अनुसार भेषजयोग( चिकित्सा का प्रयोग) किया जाता है।

यहां क्षण शब्द दिन और रात के विभाजन में प्रयुक्त होता है। कालभेद का प्रयोग शास्त्र मे इस प्रकार देखा जाता है।जैसे – प्रातःकाल वमनकारक औषधियों को देना चाहिए, मध्यान्ह मे विरेचन करना चाहिए फिर कुछ समय रुककर बस्ति का प्रयोग करना चाहिए।

शोधनम् शमनम् चेति समासादौषधम् द्विधा।

शरीरजानाम् दोषाणाम् क्रमेण परमौषधम्।।२५।।

बस्तिर्विरेको वमनम् तथा तैलम् धृतम् मधु।

अर्थ – सक्षिप्त रूप से ओषध(चिकित्सा) दो प्रकार की होती है। १.शोधन अर्थात यमन विरेचन आदि विधियो से दोषो को निकालना।२. शमन अर्थात उभरे  हुए वात आदि रोगो को शान्त करने का उपचार।

शरीर सम्बन्धी दोषो की उत्तम चिकित्सा क्रमशः इस प्रकार है।

वातदोष की चिकित्सा बस्ति प्रयोग, पित्तदोष की चिकित्सा विरेचन प्रयोग तथा कफदोष की चिकित्सा वमन प्रयोग है। वातदोष मे तेल, पित्तदोष मे घी, और कफदोष मे मधु का प्रयोग शमन चिकित्सा है।

वमन – vomat,

विरेचन – मलमार्ग से दोषो का त्याग विरेचन कहलाता है।

अष्टाङ्गह्रदयम्२६, २७

धीधैर्यात्मादिविज्ञानम् मनोदोषौषधम् परम्।।२६।।

अर्थ- मानसिक (रजस् तथा तमस्) दोषो की उत्तम चिकित्सा है – बुद्धि तथा धैर्य से व्यवहार करना और आत्मादि विज्ञान( कौन मेरा है, क्या मेरा बल है, यह कौन देश तथा कौन मेरे हितैषी है) का विचार कर कार्य करना।

भिषग्द्रव्यानुफस्थाता रोगीपादाचतुष्टयम्। चिकित्सितस्य निर्दिष्टम्, प्रत्येकम् तच्चतुर्गुणम्।।२७।।

अर्थ – चिकित्सा धर्म के चार पाद (चरण) माने जाते है । जैसे – १. भिषक (वैध), २. द्रव्य ( मैनफल आदि शोधन द्रव्य, गुरुच आदि शमन द्रव्य तथा बस्ति आदि शोधन उपकरण ), ३. उपस्थाता (परिचायक या नर्स) तथा रोग।

इन चारो मे प्रत्येक मे चार चार गुण होने चाहिए।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक २८, २९

दक्षस्तीर्थात्तशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा शुचिर्भिषक।

बहुकल्पम् बहुगुणम् सम्पन्नम् योग्यमौषधम्।।२८।।

अर्थ – वैध के चार लक्षण – १.दक्ष(कुशल), २.तीर्थ( आचार्य ) से शास्त्र(आयुर्वेद शास्त्र)के अर्थ को ग्रहण कर चुका हो। ३.दृष्टकर्मा( चिकित्सा की विधियों को अनेक बार देख चुका हो। ४. जो शुचि( शरीर तथा आचरण से पवित्र)हो।

औषध द्रव्य के चार लक्षण – १.बहुकल्प(जो स्वरस,क्वाथ, फाण्ट,अवलेह, चूर्ण आदि अनेक रूपों में दिया जा सकता) हो,२. बहुगुण (जो औषध के सभी गुणो से सपन्न) हो, ३.सपन्न(जो अपने गुणों की सम्पत्ति से युक्त) हो, ४. योग्य(जो रोग, रोगी, देश, काल आदि के अनुकूल ) हो।

अनुरक्तः शुचिर्दक्षो बुद्धिमान परिचारकः।

आढयो रोगी भिषग्वश्यो ज्ञापकः सत्ववानपि।।२९।।

अर्थ – परिचारक के चार लक्षण –

१. अनुरक्त(रोगी से स्नेह रखने वाला), २. शुचि( साफ सफाई रखने वाला), ३.दक्ष(कुशल) तथा ४.बुद्धिमान होना चाहिए।

रोगी के चार लक्षण – १. आढय( धन जन आदि से सम्पन्न), २. भिग्वश्य( वैध की आज्ञानुसार औषधि सेवन करने वाला, ३.ज्ञापक(अपने सुख दुख कहने मे सक्षम) तथा ४.सत्त्ववान्(मानसिक शक्ति सम्पन्न तथा चिकित्सालय मे होने वाले कष्टो से न घबराने वाला) हो।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक /२६

साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधा,तौ तु पुनर्द्विधा।

सुसाध्यः कृच्छ्रसाध्यश्च, याप्यो यश्चानुपक्रमः।।

नोट – यह श्लोक सूत्रस्थानम्- अध्याय २ से २६वाॅ श्लोक है, किन्तु अन्य श्लोक समझने हेतु इसका वर्णन यहां आवश्यक है।आगे के श्लोक इससे सम्बन्धित है।

अर्थ – साध्य तथा असाध्य इस प्रकार रोग के दो भेद होते है। इन दोनो के पुनः दो भेद होते है।

साध्य के भेद –

सुखसाध्य तथा कृच्छ्र ((कष्ट) साध्य।

असाध्य के भेद –

 याप्य (कुछ दिन चिकित्सा द्वारा चलाने योग्य) तथा

अननुपक्रम अर्थात चिकित्सा के अयोग्य ( जवाब देकर चिकित्सा करने योग्य)।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक ३०, ३१

सर्वोषधक्षमे देहे यूनः पुन्सो जितात्मनः।अमर्मगोऽल्पहेग्ररूपरूपोऽनुपद्रवः।।३०।।

अतुल्यदूष्यदेशर्तुप्रकृतिः पादसम्पदि। ग्रहेष्वनुगुणेष्वेकदोषमार्गो नवः सुखः।।३१।।

अर्थ-

सुखसाध्य रोग के लक्षण-  जिस रोगी का शरीर सभी प्रकार की चिकित्साविधियो को सहन करने में सक्षम हो, जो युवक( बालक या वृद्ध न ) हो, जो जितेन्द्रिय हो, जिसका रोग किसी मर्मस्थल मे उत्पन्न न हुआ हो, जिस रोग के उत्पादन हेतु (कारण), पूर्वरूप, रूप, आदि थोड़े एवं सामान्य( उग्र न) हो, जिसमें अभी तक कोई उपद्रव पैदा न हुए हों तथा जिस्म दूष्य, देश, ऋतु एवं प्रकृति समान न हो, चिकित्सालय मे उक्त चारो पाद अपने अपने गुणों से सम्पन्न हो, सूर्य- चन्द्र आदि ग्रह अनुकूल हो, रोग एक दोष से उत्पन्न हो, एकमार्गगामी हो और रोग नया हो।

चिकित्सा क्षेत्र में पुरूष (पुन्सो) शब्द का अर्थ प्राणीमात्र से है।

(सुखसाध्य को समझें, जो रोग आराम से ठीक हो जाये ।

ऐसा रोगी जो बूढ़ा या बालक ने हो अपितु युवा हो, उसकी चिकित्सा सुगमपूर्वक हो जाती है,  जिसके दवा खाने में नखरे न हों, जो जितेंद्रिय हो अर्थात यदि वैद्य किसी कार्य विशेष का निषेध करे तो उसे मान सके । जिस रोग के लक्षण ज्यादा उग्र न हों अर्थात रोग ज्यादा बढ़ा हुआ न हो, प्राथमिक स्टेज में ही पता चल जाये, ग्रह अनुकूल हों अर्थात ज्योतिषीय अध्ययन से भी किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका भी न हो। इस प्रकार के रोगी के रोग सुखसाध्य कहे जाते हैं।)

अतुल्यदूष्यदेशर्तुप्रकृतिः  –

अतुल्यदूष्य – शीतगुण प्रधान कफ से उष्णगुण प्रधान रक्त का दूषित होना    

अतुल्यदशज् – अनूपदेश मे पित्तदोष से उत्पन्न रोग।

अतुल्यऋतु – शरद ऋतु में कफज् रोग।

अतुल्यप्रकृति – पित्तदोष वाले पुरूष को कफज् रोग की उत्पत्ति।

अनुपदेश – तटवर्ती क्षेत्र – झील, नदी, समुद्र इत्यादि के समीपवर्ती क्षेत्र

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक ३२, ३३

शस्त्रादिसाधनः कृच्छ्रः सङ्करे ततो गदः।

शेषत्वादायुषो याप्यः पथ्याभ्यासाद्विपर्यये।।३२।।

अर्थ –

कष्टसाध्य रोग के लक्षण- कृच्छ्र शब्द का अर्थ है कष्ट। कष्टसाध्य रोग वे होते है जिनमे शस्त्र क्षार अग्नि( दाह) कर्म तथा विष आदि के प्रयोग किए जाते है।जिन रोगो मे ऊपर कहे गए सुखसाध्य के लक्षण संकर( मिले जुले) हो अर्थात पूर्णरूप से विद्यमान न हो।

याप्य रोग के लक्षण – उस रोग को याप्य कहते है जिसमें सुखसाध्य के लक्षणो से विपरीत लक्षण हो, किन्तु आयु के शेष रहने के कारण तथा पथ्य( हितकर) आहार विहार तथा औषध के अभ्यास(लगातार सेवन) के कारण रोगी चल फिर सक रहा हो।

अनुपक्रम एव स्यात्स्थितोऽत्यन्तविपर्यये। औत्सुक्यमोहारतिकृद् दृष्टरिष्टोक्षनाशनाः॥३३॥

अर्थ –

प्रत्याख्येय रोग के लक्षण – उस रोग को अनुपक्रम भी कहते है जो सुखसाध्य लक्षणो से अत्यन्त विपरीत हो और जो औत्सुक्य, मोह तथा अरति(बेचैनी) लक्षणो वाला हो, जिसमे अरिष्ट लक्षण दिखाई दे रहे हो एवं जिसमें ज्ञानेन्द्रियो का नाश हो गया हो।

औत्सुक्य भाव को रोगी मे इस प्रकार देखेंगे – अधिक प्रसन्न होना, उठ उठ कर दौड़ना, आदि या मोह, बेहोशी, प्रलाप(अंट संट बकना) आदि। अरति(बेचैनी), हाथ पांव पटकना, सिर घुमाना आदि।

अरिष्ट – मृत्युकारक

अष्टाङ्गह्रदयम्३४,३५

त्यजेदार्ताम् भिषग्भूपैर्द्विष्टम् तेषाम् द्विषम् द्विषम्। हीनोपकरणम् व्यग्रमविधेयम् गतायुषम्।।३४।।

चण्डम् शोकातुरम् भीरूम् कृतघ्नम् वैधमानिनम्।

तन्त्रस्यास्य परम् चातो वक्ष्यतेऽधयायसङ्ग्रहः।।३५।।

अर्थ –  त्याज्य रोगी – चिकित्सक को चाहिए कि निम्न प्रकार के रोगी की चिकित्सा न करें – १. जिससे राजा या महाजन द्वेष करता हो या जो स्वयं अपना द्वेषी हो, २. जो राजाओं (श्रीमानो ) से द्वेष करता हो, ३. वैध से द्वेष करता हो, ४. जिसके पास चिकित्सा के उपयोगी साधन न हो, ५. जो व्यग्र हो अर्थात चिकित्सा कराने मे सक्रिय न हो, इधर उधर भटकता रहता हो, ६. जो रोगी चिकित्सक की आज्ञानुसार चलना स्वीकार न करता हो, ७. जो गतायु हो ( इसका ज्ञान ज्योतिषी आदि से किया जा सकता है) , ८. जो अत्यन्त क्रोधी हो, ९. शोकातुर हो अर्थात स्त्री, पुत्र, धन आदि के नाश से दुखी हो, १०. जो भीरू(डरपोक) हो अर्थात पंचकर्म  आदि क्रियाओ से डरता हो, ११. कृतघ्न अर्थात दूसरो द्वारा किये गये उपकारो को न मानता हो, १२. जो वैधमानी हो अर्थात जिसमे वैध का ज्ञान न हो फिर भी अपने आप को वैध मानता हो।

अब यहां से सम्पूर्ण अष्टाङ्गह्रदय के आध्यायो के संग्रह का वर्णन किया जा रहा है।

(ये बहुत समझने का श्लोक है । पहले जो जिज्ञासा है, उसकी बात करते है।  श्लोक में लिखा है, हीनोपकरणम – जिसके पास उपकरण न हो, जिसकी हिंदी करी गयी है, जो साधनहीन हो । दोनों लगभग एक ही बात हैं ।

अब जैसे कोई गरीब दिल का मरीज, डाक्टर के पास पहुंचे और बोले कि साब फलां फलां समस्या है । डॉक्टर को समझ आ  जाये कि इसको तो स्टंट पड़ेंगे या बायपास होगी, उतना पैसा गरीब के पास न हो और उसके लिए सम्भव भी न हो तो उसकी चिकित्सा न करे । इसकी 2 संभव वजहें हैं ।

पहली तो ये कि यदि गरीब को बता देगा तो वो और उसके घर वाले असहाय और डिप्रेसस फील करेंगे कि मरते देख रहे हैं और चाह कर भी कुछ कर नहीं पा रहे । मरीज भी और ज्यादा मरीज हो जाएगा और घर मे सिवाय क्लेश के कुछ नहीं प्राप्त होगा अतः ऐसे मरीज को सीधा सीधा न बतावे । जैसे ज्योतिषी किसी के मृत्यु के बारे में सीधा सीधा नहीं बताता । बात घुमा देता है ।

दूसरा कारण ये कि यदि ऐसे मरीज का इलाज करेगा तो द्रवित होकर, उसका खर्चा खुद उठाएगा । जब ऐसा ज्यादा बार करेगा तो खुद के फाके के दिन आ जाएंगे और वैद्य का स्थिर चित्त होना आवश्यक है । लालची वैद्य, परेशान व्यक्ति वैद्यगिरी ने करे अतः ऐसे मरीज का इलाज करके वैद्य अपना ही नुकसान करेगा ।

मुझे ये ही 2 सम्भव कारण नजर आते हैं । आप देखोगे कि आजकल ज्यादातर लोग इन्हीं 10 कैटेगोरी में आते हैं । मरीज डॉक्टर का विश्वास नहीं करते, खुद ही सबसे बड़े डॉक्टर बन जाते हैं, ये सब आजकल के मरीजों के लक्षण ही हैं । अतिउत्तम बात लिखी गयी है ।)

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक ३६,३७

आयुष्कामदिनर्त्वीहारोगानुत्पादनद्रवाः। अन्नज्ञानान्नसन्रक्षामात्राद्रव्यरसाश्रयाः।।३६।।

दोषादिज्ञानतद्मेदतच्चिकित्साद्वयुपक्रमाः। शुद्धयादिस्नेहनस्वेदरेकास्थापननावनम्।।३७।।

धूमगण्डूषदृक्सेकतृप्तियन्त्रकशस्त्रकम्। शिराविधिः शल्यविधिः शस्त्रक्षाराग्निकर्मिकौ।।३८।।

सूत्रस्थानमिमेऽध्यायास्त्रिन्शत्शारीरमुच्यते। गर्भावक्रान्तितद्वयापदङ्गमर्मविभागिकम्।।३९।।

अर्थ – सूत्रस्थान के अध्यायो की गणना की जा रही है १. आयुष्कामीय, २. दिनचर्या, ३.ऋतुचर्या, ४. रोगानुत्पादनीय, ५. द्रवद्रव्यविज्ञानीय, ६. अन्नस्वरूपविज्ञानीय, ७. अन्नरक्षाध्याय, ८. मात्राशितीय, ९. द्रव्यादिविज्ञानीय, १०. रसभेदीय, ११. दोषादिविज्ञानीय, १२. दोषभेदीय, १३. दोषोपक्रमणीय, १४. द्विविधोपक्रमणीय, १५. शोधनादिगणसंग्रह, १६. स्नेहविधि, १७. स्वेदविधि, १८. वमन विरेचनविधि, १९. बस्तिविधि, २०. नस्यविधि, २१. धुम्रपानविधि, २२. गण्डूषाविधि, २३. अश्चोतनाञ्जनविधि, २४. तर्पणपुटपाकविधि, २५. यन्त्रविधि, २६. शस्त्रविधि, २७. सिराव्यधविधि, २८. शल्याहरणविधि, २९. शस्त्रकर्मविधि, ३०. क्षाराग्निकर्मविधि ये अध्याय सूत्रस्थान मे है।

शरीरस्थान के अध्यायो की गणना की जा रही है। १. गर्भावक्रान्ति, २. गर्भव्यापद, ३. अङ्गविभाग, ४. मर्मविभागीय, ५. विकृतिविज्ञानीय तथा ६. दूषादिविज्ञानीय। ये अध्याय शरीरस्थान मे है।

अष्टाङ्गह्रदयम्श्लोक ४०,४१,४२,४३,४४

विकृतिर्दूतजम् षष्ठम्ऽनिदानम् सार्वरोगिकम्। ज्वरासृक्श्वासयक्ष्मादिमदाद्यर्शोऽतिसारिणाम्।।४०।।

मूत्राघातप्रमेहाणाम्  विद्रध्याद्युदरस्य च।

पाण्डुकुष्ठानिलार्तानाम् वातास्रस्य षोडश।।४१।।

अर्थ –

निदानस्थान के अध्याय १. सर्वरोगनिदान, २.ज्वरनिदान, ३.ऐ रक्तपित्तकासनिदान, ४. श्वासहिक्कानिदान, ५. राजयक्ष्मानिदान,६. मदात्पयनिदान, ७. अर्शोनिदान, ८. अतिसारग्रहणीरोगनिदान, ९. मूत्रघातनिदान, १०. प्रमेहनिदान, ११. विद्रधिवृद्धि – गुल्म-निदान, १२. उदररोगनिदान, १३. पाण्डुरोगशोफविसर्पनिदान, १४. कुष्ठश्वित्रक्रिमिनिदान, १५. व्यातव्याधिनिदान तथा १६. वातशोणितनिदान।

चिकित्सतम् ज्वरे रक्ते कासे श्वासे यक्ष्मणि। वमौ मदात्ययेऽर्शः विशि द्वौ, द्वौ मूत्रिते।।४२।।

विद्रधौ गुल्मजठरपाण्डुशोफविसर्पिशषु। कुष्ठाश्वित्राननिलव्याधिवातास्रेषु चिकित्सतम्।।४३।।

द्वाविन्शतिरिऽमेध्यायाः कल्पसिद्धिरत: परम्। कल्पो वमेर्विरेकस्य तत्सिद्धिर्बस्तिकल्पना।।४४।।

अर्थ –

चिकित्सितस्थान के अध्याय १. ज्वर, २. रक्तपित्त, ३. कास, ४. श्वासहिक्का, ५. राजयक्ष्मादि, ६. छर्दिहृद्रोगतृष्णा, ७. मदात्ययादि, ८. अर्शसाम्ऽचिकित्सित, ९. अतिसार, १०. ग्रहणीरोग, ११. मूत्राघात, १२. प्रमेह, १३.विद्रधिवृद्धि, १४. गुल्म, १५. उदर, १६. पाण्डुरोग, १७.श्वयथु, १८. विसर्प, १९. कुष्ठ, २०. श्वित्रक्रिमि, २१. वातव्याधि तथा २२. वातशोणित।

कल्प-सिद्धिस्थान के अध्याय- १. वमनकल्प, २. विरेचनकल्प, ३. वमनविरेचनसिद्धि, ४.बस्तिकल्प, ५.अस्तिव्यापत्सिद्धि, तथा ६. भेषजकल्प।

अष्टाङ्गह्रदयम्४५, ४६, ४७, ४८

साद्धिर्बस्त्यापदाम् षष्ठो द्रव्यकल्पः अत उत्तरम्। बालोपचारे तद्व्याधो तद्ग्रहे, द्वौ भूतगे।।४५।।

उन्मादेऽथ स्मृतिभ्रन्शे, द्वौ द्वौ वर्त्मसु सन्धिषु। दृक्तमोलिङ्गनाशेषु त्रयो, द्वौ द्वौ सर्वगे॥४६॥

कर्णनासामुखशिरोव्रणे, भङ्गे भगन्दरे। ग्रन्थ्यादौ क्षुद्ररोगेशु गुह्यरोगे पृथग्द्वयम्॥४७॥

विषे भुजङ्गे कीटेषु मूषकेषु रसायने। चत्वारिन्शोऽनपत्यानामध्यायो बीजपोषणः॥४८॥

इत्यध्यायशतम् विन्शम् षड्भिः स्थानैरूदीरितम्॥

अर्थ –

उत्तरस्थान के अध्याय १. बालोपचरणीय, २. बालामयस्रतिषेध, ३. बालग्रहप्रतिषेध, ४. भूतविज्ञानीय,  ५. भूतप्रतिषेध, ६. उन्मादप्रतिषेध, ७. परस्मार(स्मृतिभन्श)प्रतिषेध, ८. वर्त्मरोगविज्ञानीय, ९. वर्त्मरोगप्रतिषेध, १०.सन्धिसितासितरोगविज्ञानीय, ११. सन्धिसितासितरोगप्रतिषेध, १२. दृष्टिरोगविज्ञानीय, १३. तिमिरप्रतिषेध, १४.लिङ्गनाशप्रतिषेध, १५. सर्वाक्षिरोगविज्ञानीय, १६. सर्वाक्षिरोगप्रतिषेध, १७. कर्णरोगविज्ञानीय, १८. कर्णरोगप्रतिषेध, १९. नासारोगविज्ञानीय, २०. नासारोगप्रतिषेध, २१. मुखरोगविज्ञानीय, २२. मुखरोगप्रतिषेध, २३. शिरोरोगविज्ञानीय, २४. शिरोरोगप्रतिषेध, २५. व्रणविज्ञानीय, २६. सद्योव्रणप्रतिषेध, २७. भङ्गप्रतिषेध, २८. भगन्दरप्रतिषेध, २९. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लीपद-अपची-नाडीविज्ञानीय, ३०. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लीपद-अपची-नाडीप्रतिषेध, ३१. क्षुद्ररोगविज्ञानीय, ३२. क्षुद्ररोगप्रतिषेध, ३३. गुह्यरोगविज्ञानीय, ३४. गुह्यरोगप्रतिषेध,३५. विषप्रतिषेध, ३६. सर्पविषप्रतिषेध, ३७. कीटलूतादिप्रतिषेध, ३८. मुषिकलार्कविषप्रतिषेध, ३९. रसायनध्याय तथा ४०. वाजीकरणध्याय।

इस प्रकार सम्पूर्ण अष्टाङ्गह्रदय के अध्यायो की गणना उक्त छह स्थानो में कर दी गयी है।

(निदान – किसी भी समस्या के बाहरी लक्षणों से आरम्भ करके उसके (उत्पत्ति के) मूल कारण का ज्ञान करना निदान (Diagnosis / डायग्नोसिस्) कहलाता है। निदान का बहुत महत्व है। जब तक रोग की सटीक पहचान न हो जाए, तब तक सही दिशा में उपचार असंभव है। इसलिए पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में निदान अध्याय बहुत वृहद होता था और उपचार अध्याय सीमित। कारण यह है कि यदि निदान सटीक हो गया तो उपचार भी सटीक होगा। सही निदान का अर्थ यह है कि कष्टदायक लक्षणों का आधारभूत कारण और उसके द्वारा उत्पन्न विकृति का सही रूप समझा जाए। निदान के कुछ भाग होते हैं  –

समस्या

रोगी चिकित्सक के पास क्यों आया है, यह जानने के लिए अपना प्रश्न होता है – क्या तकलीफ है? रोगी यदि होश में है तो कष्टदायक लक्षणों की चर्चा करता है, यदि बेहोश है तो साथ आए लोग बताते हैं। ये लक्षण कब से हैं और कैसे आरंभ हुए, यह पूछा जाता है। इस प्रकार चिकित्सक समस्या का रूप समझता है कि इस रोगी को क्या हुआ है, यथा तीन दिन से सर में भीषण दर्द है और इसके पूर्व कोई तकलीफ नहीं थी। कभी कभी शिकायतों की संख्या अनेक होती है और इनसे संगठित समस्या का निरूपण करना पड़ता है।

प्रश्नोत्तर – (१) पारिवारिक – इसके अंतर्गत वंशानुक्रम का प्रभाव, परिवार के लोगों की शरीरसंपत्ति कैसी है। कोई परिवार दुबले पतले लोगों का तो कोई मोंटों का, कहीं लंबे तगड़े तो कहीं नाटे, कौन से रोग होते हैं (तपेदिक, मधुमेह, कैंसर, मानसिक रोग आदि), परिवार का रूप-कौन कौन सदस्य हैं माता पिता हैं या नहीं? नहीं हैं तो कब और किस रोग के कारण निधन हुआ? रोगी विवाहत है तो पत्नी, बच्चों का स्वास्थ्य, भाई बहन का स्वास्थ्य, परिवार में रोगी का स्थान परिवार की आर्थिक स्थिति और आदतें आदि। घर और वातावरण कैसा है?

(२) व्यक्तिगत – रोगी का पेशा और आदतें (कुछ रोग व्यवसाय संबंधी होते हैं, जैसे छापाखाने में काम करनेवालों में लेड पॉइज़निंग; कुछ काम श्रमसाध्य होते हैं तो कहीं दिन भर बैठे रहना पड़ता है; आदतों में नशा (जैसे शराब, भाँग, अफीम आदि का सेवन) बहुधा रोग का कारण होता है; जनम से अब तक का हाल (बचपन में कौन सी बीमारियाँ हुर्इं, पैदायशी दोष तो नहीं है? शारीरिक विकास का क्रम क्या रहा?); पहले हुई बीमारियाँ और उनके इलाज की चर्चा; औरतों में माहवारी, गर्भावस्था, गर्भपात आदि की जानकारी; रोगी का दैनिक कार्यकलाप और रुचि (क्या खाते हैं? कब सोते हैं? खेलकूद में भाग लेते हैं या नहीं?)।

(३) वर्तमान कष्ट – अंत में वर्तमान शिकायतों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की जाती है। कौन कौन से लक्षण हैं? एक स्थान पर हैं या व्यापक? दर्द है तो कहाँ है, कैसा है : मीठा है या तीव्र, एक स्थान पर है या प्रसारित होता है, लगातार हो रहा है या दौरे होते हैं? कष्ट का आरंभ कैसे और कब हुआ? जिस अंगविशेष से पीड़ा है, उसके बारे में विस्तार से जानकारी, जैसे पेट में दर्द है तो कब से है, कभी कभी होता है तो क्या भोजन से संबंधित है, क्या रात में जगा देता है, भोजन के कितनी देर बाद होता है, कोई विशेष चीज खाने पर होता है, किस चीज से आराम मिलता है, दर्द फैलता तो नहीं, कितनी देर रहता है, कै तो नहीं होती? आदि।

शरीरपरीक्षा

परीक्षा का आरंभ सामान्य निरीक्षण से होता है : रोगी होश में है और उसके ज्ञान का स्तर, शयनमुद्रा, चलने का ढंग, स्वास्थ्य का सामान्य स्तर और पोषण की स्थिति, चेहरे का भाव और वर्ण (पीलापन, कँवला, नीलता, या शोथ), हाथ का आकार गिल्टियों की सूजन, श्वास की गति और प्रकार, ताप, नाड़ीपरीक्षा।

निरीक्षण – गृद्धदृष्टि चिकित्सक दूर की कौड़ी लाता है, द्वार पर पड़े छिलके देखकर रोगी ने क्या खाया है बता देता है। कहते हैं, नेपोलियन प्रथम का चिकित्स कौर्विसार्टनैल चित्र देखकर निदान कर देता था। सर आर्थर कॉनन डाँयल के लोकप्रिय चरित शरलक होल्म्स, की निरीक्षण शक्ति कमाल की थी। सच तो यह है कि ध्यान से देखें तो अनेक रोग केवल देखकर पहचाने जा सकते हैं।

स्पर्शपरीक्षा – निरीक्षण से ज्ञात तथ्यों को स्पर्श द्वारा पुष्ट करते हैं। इसमें दर्द, स्पर्शवेदना, शोथ, अस्थिभंग आदि का ज्ञान होता है।

थाप परीक्षा – परीक्षा का यह तरीका 1761 ई. में लियोपोल्ड ओवेनब्रगर में ढूँढ निकाला था। जब वह छोटा था तभी घड़े को ठोककर बता देता था कि इसमें कितना पानी है। इसमें उदर या वक्ष का जलीय शोथ, ठोसपन, तथा फेफड़े के रोगों के बारे में तथ्य प्राप्त होते हैं।

परिश्रवण परीक्षा – हृदय और श्वास की ध्वनियों को सुनने के लिए डाक्टरों का स्टेथॉस्कोप सुप्रसिद्ध यंत्र है। इसका आविष्कार रीने थियोफील हाइसिंथेलेनेक ने कया। सन् 1819 में लेनेक ने इसकी चर्चा अपने एक शोधलेख में की। पहले यह एक चोंगानुमा यंत्र था, पर अब विद्युत् उपकरणों ने इतने उन्नत यंत्र बनाए हैं कि आप दूर बैठे धड़कन की ध्वनि सुन सकते हैं, या टेलिफोन अथवा रेडियो पर प्रसारित कर सकते हैं।

इन विधियों से अवयवों की परीक्षा आरंभ होती है। क्रम से पाचन प्रणाली (मुख, जीभ, गला, आमाशय, यकृत, आँत, तिल्ली और मलाशय), हृदय तथा रक्तसंचार प्रणाली, श्वासप्रणाली, मूत्रप्रणाली के गुर्दे और मूत्राशय, त्वचा, तंत्रिकातंत्र (बुद्धि, ज्ञान, मांसपेशियों की कुशलता, ज्ञानेंद्रियों की कुशलता, प्रतिक्षेप क्रिया), हड्डियों और जोड़ों की परीक्षा की जाती है।

(मजेदार बात ये है कि आधुनिक चिकित्सा    विज्ञान में डॉक्टर, अब इसी निरिक्षण को ही सबसे   ज्यादा महत्व देते हैं, रोगी से   पूछेंगे १ मिनट और टेस्ट लिख देंगे, दुनिया भर के जबकि पहले रोगी से ही लक्षण आधारित जानकार रोग जाना जाता था | डायग्नोस्टिक मशीनों के आने के बाद, इनको चलाये रखने और इनसे पैसा कमाने का एक नया धंधा शुरू हो गया है | डॉक्टर, अब सिर्फ ठीक नहीं करता अपितु पैसा बनाने के तरीके पहले   ढूंढता है कितने लोग हैं, जो सरदर्द में CT Scan बोल देते हैं, बिना आगे के लक्षण सुने और जाने | कि क्या इसमें गैस का लक्षण है, क्या  माइग्रेन का   लक्षण हैं     आदि )

चिकित्सा विज्ञान में इन दिअनोस्टिक मशीनों से किये जाने  वाले निरिक्षण को अब विशेष परिक्षण कहते हैं, जो साधारण परिस्थितियों में नहीं कराया जाता, असामान्य परिस्थिति में इनका भी प्रयोग करना चाहिये |

विचार विमर्श

तथ्यों और समस्या को सामने रखकर, चिकित्सक शास्त्रीय ज्ञान और अनुभव के प्रकाश में उनका विश्लेषण करता है, संभावित विकल्पों पर गौर करता है तथा एक जैसे रोगों में भेद करता है। बहुधा वह अन्य चिकित्सक से, अथवा विशेषज्ञ से, परामर्श भी करता है।

निर्णय

तर्क, विचार, अनुभव और विभेदक निदान के ज्ञान द्वारा चिकित्सक अंतिम निर्णय पर पहुँचता है। यही है रोग का निदान और सफल चिकित्सक की प्रथम सीढ़ी।

इसके आगे के भाग और    भेद – अष्टांग ह्रदय हमको बतायेगा |)

इतिश्रीवैधपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गह्रदयसंहितायाम् प्रथम सूत्रस्थाने आयुष्कामीयो नाम प्रथमोध्यायः॥१॥

You cannot copy content of this page