मनुष्य जन्म का सार

धर्मे रागः श्रुतो चिंता दाने व्यसनमुत्तमम । इन्द्रियार्धेषु वैराग्यं संप्राप्तं जन्मनः फलम ।। सन्दर्भ – कात्यायन ने धर्म को समझने के लिए कठोर तप किया, जिस से आकाशवाणी हुई और उसने कहा की हे कात्यायन तुम पवित्र सरस्वती नदी के तट पर जा कर सारस्वत मुनि से मिलो । वे धर्म के तत्व् को जान…

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विवाह के वर का वर्णन

अत्यासन्ने चातिदूरे अत्यादशे धनवार्जिते । वृत्तिहीने च मूर्खे च कन्यादानं न शस्यते ।। मूढाय च विरलाय भारमसम्भाविताय च । आतुरे प्रमत्ताय कन्यादानं न कारयेत ।। सन्दर्भ – ये उस समय की बात है जब सती जी ने पुनर्जन्म लिया पार्वती जी के रूप में और शिव जी की घोर तपस्या कर के उन्हें प्रसन्न किया…

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युद्ध फल

सन्दर्भ – जब इंद्र का युद्ध वृत्तासुर से प्रारंभ हुआ और देवताओं ने दधिची की हड्डियों से बनाये हुए अस्त्र शस्त्रों से दैत्यों का नाश करना प्राम्भ कर दिया तब सभी राक्षस भयभीत हो कर भागने लगे । तब वृत्तासुर ने समझाया “वीरो ! युद्ध स्वर्ग का द्वार है, उसका त्याग कदापि नहीं करना चाहिए…

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प्रदोष व्रत एवं शिव पूजा

सन्दर्भ – ये उस समय की बात  है जब विश्वकर्मा ने इंद्र से बदला लेने के लिए कठोर तप कर के ब्रह्मा जी से वृत्तासुर नामक पुत्र का  आशीर्वाद लिया । वह असुर प्रतिदिन सौ धनुष (चार सौ हाथ) बढ़ता था । उसने सम्पूर्ण भूमंडल ढक लिया और इंद्र को युद्ध  के लिए ललकारने लगा । तिस…

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रावण वध की योजना

उद्देश्य – इस संधर्भ का उद्देश्य मात्र रामायण से पहले के रावण वध की प्रस्तावना और भगवान् राम के सभी सहयोगियों का परिचय कराना है जहाँ कुछ भ्रान्तिया हैं । स्कंध पुराण के अंश से मुझे निम्न लिखित उद्धरण मिला जो आपके सामने प्रस्तुत है । सन्दर्भ – सभी देवता रावण के अत्याचारों से त्रस्त…

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तीर्थ क्या हैं ?

जायन्ते च भ्रियन्ते च जलेप्वेव जलौकसः। न च गच्छअन्ति ते स्वर्गमविशुदहमनोमलाः ।।चित्तमंतर्गतम दुष्टं तीर्थस्नानंच शुध्यति । शतशोअपि जलैधौतम सुराभाण्डमिवाशुची ।। सार : अगत्स्य ने लोपामुद्रा से कहा – निष्पापे ! मैं मनासतीर्थो का वर्णन करता हूँ, सुनो । इन तीर्थों मैं स्नान करके  मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है । सत्य, क्षमा, इन्द्रिसंयम, सब…

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काशी – निषेध क्षेत्र ?

पापमेव ही कर्तव्यं मतिरस्ती याठेद्रशी सुखेनान्यात्रा कर्तव्यं मही ह्वास्ति महीयसी । अपि कामातुरो जन्तुरेकाम रक्षति मातरम, अपि पाप्क्रता काशी रक्ष्या मोक्षर्थिनैकिका ।। परापवादाशीलेन परदाराभिलाशिणा, तेन काशी न संसेव्यं क्व काशी निरयः क्व सः । अभिल्ष्यन्ति ये नित्यं धनं चात्र प्रतिग्रहे, परस्त्रम कपटैवार्पि काशी सैव्या न तैर्नरै । पर्पीडाकारम कर्म काश्याम नित्यं विवर्जयेत, तदेव चेत किमत्र…

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