April 23, 2024
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ज्ञान का भण्डार – शास्त्रज्ञान का ग्रुप – 2019

शास्त्रज्ञान का एक व्हाट्सप्प ग्रुप भी है, जिस पर शास्त्रों का अध्ययन किया जाता है | इस ग्रुप पर 2019 से अनेकों शास्त्रों का अध्ययन किया गया है | ऐसे अनेकों शास्त्रों के निहित होने से, ये व्हाट्सप्प ग्रुप, बड़े महत्व का हो गया है | जिसे, हमें आप सभी के लिए, वेबसाइट पर अपलोड कर रहे है | हमें विश्वास है कि ये ग्रुप और जानकारी, जिज्ञासुओं के लिए बहुत काम में आएगी
| इस महती कार्य को करने में सहयोग देने वाले सभी मित्रों का धन्यवाद |

नोट : यथासंभव, सभी मोबाइल नंबर डिलीट कर दिए गए हैं, मैन्युअल तरीके से,फिर भी यदि कोई रह गया हो तो कृपया अवगत कराएं, ताकि उसे भी हटाया जा सके |

24/07/19, 9:55 pm – +91 11637: अनन्य भक्ति के साधन ……..
••••••••••••••••••••••••••••••••
1 … प्रार्थना ——-
प्रातः काल आँख खुलने पर
….. कर दर्शन करो और भगवान की प्रार्थना करो …
… कराग्रे वसते लक्ष्मी ,करमूले सरस्वती ।
करमध्ये तु गोविन्दः ,प्रभाते कर दर्शनम् ।।
… परन्तु आजकल प्रभात मे कप दर्शन होने लगा …
….प्रातः काल उठकर कर दर्शन करो अर्थात् मन मेँ
विचार करो कि आज मै इन हाथो से सत्कर्म ही करुँगा ताकि परमात्मा मेरे घर पधारने की कृपा करेँ …
…… हाथ क्रिया शक्ति का प्रतीक है,,,,
.,,,…. भगवान से प्रार्थना करो कि जिसप्रकार
आपने अर्जुन का रथ हाँका था उसी प्रकार
आप मेरे जीवन रथ के सारथी बनेँ ….

फिर नवग्रहोँ का ध्यान करेँ ……
“ब्रह्मामुरारिस्त्रिपुरान्तकारीभानु:शशिभूमिसुतोबुधश्च,। गुरुश्च शुक्र: शनि राहू केतव: कुर्वन्तु सर्वे मम ।।”

तब नासिका के पास हाथ ले जाकर देखे यदि दायाँ स्वर चल रहा हो दायाँ पैर , बायाँ स्वर चल रहा हो तो बायाँ पैर धरती पर रखे , पैर रखने से पूर्व प्रार्थना करेँ …….
“समुद्र वसने देवि, पर्वतस्तनमण्डले,
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे.”

माता पिता एवं गुरुजनोँ को प्रणाम करेँ । नित्य क्रिया से (शौचादि )पहले बोले ……

“उत्तिष्ठन्तु सुरा: सर्वेयक्षगन्धर्व किन्नरा,।
पिशाचा गुह्यकाश्चैव मलमूत्र करोम्यहं ।।.”

निवृत्त होकर दातुन करते समय प्रार्थना करेँ ……

“हे जिह्वे रस सारज्ञे, सर्वदा मधुरप्रिये ।
नारायणाख्य पीयूषम् पिव जिह्वे निरन्तरं.”।।
“आयुर्बलं यशो वर्च: प्रजा पशुवसूनि च, ।
ब्रह्म प्रज्ञाम् च मेघाम् च त्वम् नो देहि वनस्पते. ।।”

2 .सेवा पूजा —–
स्नान से पूर्व जल मे गंगादि का आवाहन करने हेतु पढ़े …

“गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ,।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिँ कुरु ।।”

फिर निम्न मंत्रो को बोलते हुए स्नान करेँ ……..
“अतिनीलघनश्यामं नालिनायतलोचनम्, ।
स्मरामि पुण्डरीकाक्षं तेन स्नातो भवाम्यहम्. ।।

स्नानादि से निवृत्त होकर एकान्त मे भगवान
की सेवा पूजा करने के लिए मानसिक शुद्धि के लिए निम्न मन्त्रोँ द्वारा अपने ऊपर छल छिड़के .,….. ..
“ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतर: शुचिः ।”.

निम्न मंत्रो को पढ़ते हुए शिखा बन्धन करेँ …….
“चिद्रूपिणि ! महामाये ! दिव्यतेज:समन्विते, ।
तिष्ठ देवि ! शिखामध्ये तेजो वृद्धिम् कुरुष्व में. ।।

चन्दन लगायेँ……
“चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
आपदां हरते नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा ।।”

3 .स्तुति —–
भगवान की स्तुति करेँ .,.,,,
” शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं ,
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णँ शुभाङ्गं ।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिर्भिध्यानगम्यं ,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।”

हे नाथ आपने जब अजामिल जैसे पापी का उद्धार कर
दिया तो फिर आप मेरी ओर क्यो नहीँ देखते ?

4 ..कीर्तन —–
स्तुति के बाद एकान्त मेँ बैठकर प्रभु के नाम
का कीर्तन करो ….
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे …. हे नाथ नारायण वासुदेव …

.,……अपना कामकाज करते समय भी प्रभु का स्मरण
करते रहो ,,,

  1. कथा श्रवण —–
    प्रभु के प्यारे संतो का समागम करो , उनके श्रीमुख से
    कथा श्रवण करो , हो सके तो रोज कथा सुनो .यदि नही सुन सकते समयाभाव मेँ , तो रामायण , भागवत की कथा का वाचन करो ।
    प्रेम पूर्वक उसका पाठ करो ।

6 . स्मरण —–
समस्त कर्मो का समर्पण – रात को सोने से पहले किये हुए
कर्मो का विचार करो कि, क्या प्रभु को पसन्द आएँ ऐसे कर्म मेरे हाथ से आज हुए है । यदि अन्दर से नकारात्मक
उत्तर मिले , तो मान लेना कि वह दिन जीते हुए नही बल्कि मरते हुए निकल गया ।

अतः क्षमा प्रार्थना करेँ.,,
“अपराध सहस्राणि क्रियन्ते अर्हनिशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ।।

.,,…. यदि कोई पाप हो जाय तो प्रायश्चित करो , और किए हुए सभी कर्म को परमात्मा को अर्पित करो … “

……….. अनेन कर्मणा श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीयतां न मम् ।।
25/07/19, 10:31 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

पुरुष त्यागि सक नारिहि
जो बिरक्त मति धीर।
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ।।

परन्तु जो वैराग्य वान् और धीर बुद्धि पुरुष हैं वही स्त्री को त्याग सकते है, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयों के वश में हैं( उनके गुलाम है) और श्री रघुवीर के चरणों से विमुख हैं।।115क।।

सोउ मुनि ग्यान निधान
मृग नयनी बिधु मुख निरखि।
बिबस होइ हरिजान
नारि बिष्नु माया प्रगट।।

वे ज्ञान के भण्डार मुनि भी मृग नयनी ( युवती स्त्री ) के चन्द्र मुख को देखकर विवश (उसके अधीन ) हो जाते हैं।
हे गरुड़ जी! साक्षात् भगवान् विष्णु की माया ही स्त्री रूप से प्रकट है।।115 (ख)।।
25/07/19, 7:31 pm – +91 11637: कवीन्दुं नौमि वाल्मीकिं यस्य रामायणीं कथाम् ।
चन्द्रिकामिव चिन्वन्ति चकोरा इव कोविदाः ।।

मै कवि-चन्द्र वाल्मीकि को प्रणाम करता हूँ ,जिनकी रामायण कथा को विद्वान गण उसी प्रकार चुनते है ,जिस प्रकार चकोर चन्द्रमा की चांदनी को ।

वाल्मीकिकविसिंहस्य कवितावनचारिणः।
श्रृण्वन् रामकथा नादं को न याति परं पदम्।।

कविता रुपी वन में विचरण करनेवाले वाल्मीकि कविरुपी सिंह की रामकथा के शब्दों(घोष)को सुनकर (भला)कौन मोक्ष को प्राप्त नहीं होता ।।

कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकि कोकिलम्।।

मै कविता रुपी शाखा(डाली)पर आसीन होकर “राम-राम”का मधुर अक्षरों में मधुर कूजन करते हुए वाल्मीकि रुपी (नर)कोयल की वन्दना करता हूँ ।।
25/07/19, 11:24 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अ जीध्याय-६ श्लोक ७४,७५


हन्ति दोषत्रयं कुष्ठं वृष्या सोष्णा रसायनी। काकमाची सरा स्वर्या चाङ्गेर्यम्लाऽग्निदीपनी॥७४॥

ग्रहण्यर्शोऽनिलश्लेष्महितोष्णा ग्राहिणी लघुः।

काकमाची का वर्णन- काकमाची(मकोय की पत्तियों) का शाक तीनों दोषों का शमन करने वाला, कुष्ठरोग का विनाशक, कुछ उष्णवीर्य, रसायन गुणों से युक्त, सर(मल को सरकाने वाला) तथा स्वरयंत्र के लिए हितकर होता है।

चांगेरी (तिपतिया) का शाक- यह स्वाद मे अम्ल, अग्निवर्धक, ग्रहणीरोग, अर्शोरोग, वाताविकार तथा कफविकार नाशक होता है। यह उष्णवीर्य, मल को बांधने वाला और लघु(शीघ्र पचने वाला) होता है।

वक्तव्य- सुणिष्णक और चांगेरी के आकार में क्रमशः चार पात और तीन पात का अंतर है, ये दोनों पत्रशाक है।

पटोलसप्तलारिष्टशार्ङ्गेष्टावल्गुजाऽमृताः॥७५॥

वेत्राग्रबृहतीवासाकुतिलीतिलपर्णिकाः। मण्डूकपर्णीकर्कोटकारवेल्लकपर्पटाः॥७६॥

नाडीकलायगोजिह्वावार्ताकं वनतिक्तकम्। करीरं कुलकं नन्दी कुचैला शकुलादनी॥७७॥

कटिल्लम् केम्बुकम् शीतं सकोशातककर्कशम्। तिक्तम् पाके कटु ग्राही वातलं कफपित्तजित्॥७८॥

पटोल आदि शाक- पटोल(परवल), सप्तला(सातला), अरिष्ट(नीम), शार्ङ्गेष्टा(काकतिक्ता- चक्रपाणि), अवल्गुजा(बाकुची के पत्ते, फलियां तथा बीज), अमृता(गिलोय या गुरुच के पत्ते), वेत्राग्र(बेंत के नये अंकुर), बृहती(वनभण्टा), वासा(अडूसा), कुन्तली(छोटा तिल-विशेष का पौधा), तिलपर्णिका, मण्डूकपर्णी(ब्राह्मीभेद के पत्ते), कर्कोट(ककोड़ा का फल), कारवेल्लक(करेला), पर्पट(पितपापड़ा), नाड़ी(नाड़ीशाक), कलाय(मटर), गोजिह्वा(गाजवां), वार्ताक(बैंगन), वनतिक्तक(पथ्यसुन्दर अर्थात हरीतिकी– चक्र,टी.च.सू. २७/९५), करीर (कैर के फल या बांस के अंकुर), कुलक (छोटा जंगली करैला), नन्दी(पारसपीपल के पत्ते), कुचैला (कालीपाठा), शकुलादनी(कुटकी), कठिल्ल(दीर्घपत्रा पुनर्नवा), केम्बुक(करेमू), कोशातक(कृतबेधन तरोई) और कर्कश(स्वल्पकर्कोटकः- चक्र, कबीला का पत्र)— ये द्रव्य शीतवीर्य, स्वाद मे तिक्त, पाक में कटु है, मल को बांधने वाले है, वातकारक, कफ तथा पित्तदोषशामक है।

वक्तव्य- ऊपर जिन २८ शाकों के नाम गिनाए गए हैं, उनमें अनेक परिचय की दृष्टि से विवादास्पद है, अतएव कोई टीकाकार किसी द्रव्य का कोई पर्याय दे रहा है तो कोई कुछ। यह विवाद औषध-द्रव्य विशेषज्ञों के सामूहिक निर्णय की अपेक्षा रखता है।विशेषज्ञ भी वे हों जो पूर्वाग्रह या दुराग्रह से ग्रस्त न हों क्योंकि विगृह्मसम्भाषा से निर्णीत विषय सिद्धांत रूप मे परिणत नहीं हो पाते। ऐसा ही एक द्रव्य है वशतिक्तम् । आचार्य चक्रपाणि इसे पथ्यसुन्दरम्, श्री अरुणदत्त वत्सकः , श्री हेमाद्री- किराततिक्तकम्, शब्दमाला हरीतकी वैद्यकनि॰- लोध्रवृक्ष तथा रत्नमाला- वनतिक्तायां, पाठायाम्। इसी प्रकार अन्य अनेक द्रव्य है।
25/07/19, 11:51 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
25/07/19, 11:51 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
25/07/19, 11:52 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
25/07/19, 11:52 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
25/07/19, 11:57 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
25/07/19, 11:58 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: Water spinach
26/07/19, 12:00 am – Shastragyan Abhishek Sharma:
26/07/19, 9:49 am – +91 11637: स्वारथ सुकृतु न श्रम वृथा , देखि बिहंग बिचारि ।
बाजि पराएँ पानि परि ,तू पच्छीनु न मारि ।।

कविवर बिहारी जी ने राजा जयसिंह को बाज की भांति दुर्व्यहार न करने की प्रेरणा देते हुए कहा है कि हे (राजाजयसिंह रुपी) बाज ! इन छोटे पक्षियों को (अपने साथी) अर्थात छोटे राजाओं को मारने से तेरा क्या स्वार्थ सिद्ध होगा अर्थात क्या फायदा होगा । न तो ये सत्कर्म है और न ही तेरे द्वारा किया गया श्रम (काम) सार्थक है ।

अतः हे बाज !तू भलीभाँति पहले बिचार कर, उसके बाद कोई काम कर इस तरह दूसरों के बहकावे मे आकर अपने सह साथियों (पक्षियों)का संहार न कर ।

तू औरंगजेब के कहने पर अपने पक्ष के हिन्दू राजाओं पर आक्रमण करके उनका संहार मत कर क्योंकि तेरे परिश्रम का फल तुझे न मिलकर औरंगजेब को प्राप्त होता है ।।।
26/07/19, 11:14 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

इहां न पच्छपात कछु राखउं।
बेद पुरान संत मत भाषउं।।

मोह न नारि नारि के रूपा।
पन्नगारि यह नीति अनूपा।।

यहां मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता।
वेद पुराण और संतों का मत ( सिद्धांत ) ही कहता हूं।
हे गरुड़ जी! यह अनुपम ( विलक्षण ) रीति है कि एक स्त्री के रूप पर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती।।115-1।।

माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ।
नारि वर्ग जानइ सब कोऊ।।

पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी।
माया खलु नर्तकी बिचारी।।

आप सुनिए, माया और भक्ति दोनो ही स्त्री वर्ग की हैं, यह सब कोई जानते हैं।
फिर श्री रघुवीर को भक्ति प्यारी है।
माया बेचारी तो निश्चय ही नाचने वाली ( नटिनी) मात्र है।।115-2।।
26/07/19, 10:08 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi added +91
26/07/19, 10:49 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ७९,८०

हृद्यं पटोलं कृमिनुत्स्वादुपाकं रुचिप्रदम्। पित्तलं दीपनम् भेदि वातघ्नम् बृहतीद्वयम्॥७९॥

परवल का शाक- परवल हृदय के लिए हितकारक, कृमिनाशक, पाक में मधुर तथा भोजन के प्रति रुचि को उत्पन्न करता है।

बृहतीद्वय का वर्णन- वनभण्टा तथा कण्टकारी के फलो का शाक पित्तवर्धक, जठराग्नि को प्रदिप्त करने वाला, मलभेदक तथा वातनाशक होता है।

वृषं तु वमिकासघ्नं रक्तपित्तहरं परम्। कारवेल्लं सकटुकं दीपनम् कफजित्परम्॥८०॥

अडूसा का वर्णन- अडूसा के पत्तों का शाक वमन, कास(खांसी) तथा रक्तपित्तरोग का नाश करने में उत्तम होता है।

करेला का शाक- यह कुछ कटु (तिक्त रस युक्त) अग्निदीपक तथा कफनाशक द्रव्यों में उत्तम है।
27/07/19, 12:19 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: प्रश्नोत्तरमाला – 28

किं दुर्लभं सद्गुरुरस्ति लोके
सत्संगतिर्ब्रह्मविचारणा च ।
त्यागो हि सर्वस्व शिवात्मबोधः
को दुर्जयः सर्वजनैर्मनोजः । २८ ।

प्र: संसार में दुर्लभ क्या है ?
उ: सद्गुरु, सत्संग, ब्रह्मविचार, सर्वस्व का त्याग और कल्याणरूप परमात्मा का ज्ञान ।

प्र: सबके लिए क्या जीतना कठिन है ?
उ: कामदेव ।
27/07/19, 5:49 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: ।। श्रीकृष्ण ।।
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवाय!!!

             🌹जय श्री कृष्ण🌹

27/07/19, 8:27 am – Abhinandan Sharma: वाह, बहुत सुंदर ।
27/07/19, 8:29 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: ये गलती से सेन्ड हो गया है sorry 🙏🙏
27/07/19, 8:30 am – Abhinandan Sharma: ये आ गयी पहली लाइन तुलसीदास जी की, ढोल गंवार टाइप । कोई अगर एक ही लाइन पढ़ेगा अबला अबल सहज जड़ जाती तो यही अर्थ करेगा कि औरत को मूर्ख कहा गया है । इसीलिये बार बार कहते हैं कि स्वयं पढिये भरम अपने आप डोर होंगे ।
27/07/19, 8:35 am – Abhinandan Sharma: इस संदर्भ में नित्यानंद जी की आज की पोस्ट का रेफेरेंस देना उचित होगा । जैसा लिखा है, सभी का कोई न कोई शत्रु है, जन्म का मृत्यु, जवानी का बुढापा आदि तो ऐसा क्या है, जिसका कोई शत्रु नहीं है, उसे क्या कहते हैं, पढिये नित्यानंद मिश्रा जी को –

‘Asapatna’ (असपत्न): such a wonderful and rare name!

The fifth ‘Brahmana’ of first chapter of the ‘Brihadaranyaka Upanishad’ describes the ‘prana’ as ‘asapatna’ (असपत्न),[1] meaning “without an enemy”. Gurudeva’s commentary on the verse says ‘asapatno niṣpratidvandvaḥ’ (असपत्नो निष्प्रतिद्वन्द्वः), i.e. the word ‘asapatna’ means “having no adversary or rival”, i.e. “unparalleled, unequalled”.

The word ‘asapatna’ is found in Vedic samhitas also, it is used several times in the tenth ‘mandala’ of the Rigveda-samhita and also in the Atharvaveda-samhita.

‘Asapatna’ is derived as follows. As per the Amara-kosha, the Samskrita word ‘sapatna’ (सपत्न) means “an enemy”.[2] In turn, ‘sapatna’ comes from the word ‘sapatnī’ which means “a woman having the same husband as another, i.e. fellow-wife”. As per the ‘Kashika’, one who is like a ‘sapatnī’ is ‘sapatna’.[3]

With ‘sapatna’ meaning “an enemy”, the word ‘asapatna’ means “one without an enemy”. The word has a similar meaning as ‘ajātaśatru’ (अजातशत्रु) or ‘anamitra’ (अनमित्र, I posted about this name some days ago.)

‘Asapatna’ is the 500th name of Shiva in the first ‘Shiva-sahasranama’ in the ‘Linga-Purana’.[4] Commenting on the name, the ‘Shivatoshini’ commentary says Shiva is ‘asapatna’ as (a) “he who has no sapatnī’, i.e. no wife other than Parvati and (b) “he who has no enemy”.[5]

The female version of ‘asapatna’ (असपत्न) is ‘asapatnā’ (असपत्ना, with the long final vowel), a word used in the Ramayana.[6] Without diacritics, both can be spelled ‘Asapatna’ or the female version can be spelt ‘Asapatnaa’.

When I checked on LinkedIn if anybody has the name ‘Asapatna’, I was pleasantly surprised to find one result: Asapatna Bandyopadhyaya in Kolkata, West Bengal. This person is most likely a male, two documents on ‘indiankanoon’ website mention a ‘Shri Asapatna Bandhyopadhyaya’ in Kolkata. The location is not surprising, as some of the rarest Samskrita names are found in Bengal. My deep respect for parents of Shri Asapatna Bandhyopadhyaya for choosing such a beautiful and rare name.

Notes—
[1] ‘स एषोऽसपत्नः’ = सः + एषः + असपत्नः (Brihadaranyaka Upanishad 1.5.12)
[2] ‘रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषद्द्वेषणदुर्हृदः’ (Amarakosha 2.8.10)
[3] ‘सप्त्नीशब्दादपरे ऽकारम् इव अर्थे निपातयन्ति, सप्त्नीव सपत्नः’ (Kashika on व्यन् सपत्ने, Ashtadhyayi 4.1.145). On this, the ‘Nyasa’ further says: यथैव हि सपत्नी दुःखहेतुः, तथा शत्त्रुरपीति, यः सपत्नीव सपत्नः स उच्यते.
[4] ‘असपत्नः प्रसादश्च प्रत्ययो गीतसाधकः’ (Linga Purana 1.65.111)
[5] ‘नास्ति सपत्नी जगदंबिकान्यस्त्री यस्य वा न सपत्नः शत्रुर्यस्य सोऽसपत्नः’ (Shivatoshini, ibid.)
[6] ‘असपत्ना वरारोहे मेरुमर्कप्रभा यथा’ (Valmiki Ramayana 3.18.5). Although in the sense of “she who has no fellow-wife”, it also means “she who has no enemy”.
27/07/19, 8:37 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: यहाँ नारी औरत को नहीं । तालाब के किनारों पर उग ने बाली नारी को कहा गया है । क्या ये सही है 🙏🙏
27/07/19, 8:38 am – Abhinandan Sharma: आप चौपाई का अर्थ स्वयं देखें ।
27/07/19, 8:39 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: जी 🙏
27/07/19, 8:41 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan added Binita Kotnala Ghaziabad Shastra Gyan, Ghaziabad Shastra Gyan Pushpa,
27/07/19, 8:43 am – Abhinandan Sharma: लीजिये, संदर्भ भी मिल गया आज कि पुण्य ट्रांसफर हो सकते हैं ।
27/07/19, 8:43 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: आप सभी का स्वागत है 🙏🙏कृपया ग्रुप के नियम एक बार अच्छे से पड़ ले 💐स्वागतम 🙏🙏
27/07/19, 8:53 am – Abhinandan Sharma: वाह, सुन्दरदास जी ने क्या सही निचोड़ा है । बहुत सुंदर ।
27/07/19, 9:11 am – LE Onkar A-608 added +91
27/07/19, 9:41 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: जिसने वैराग्य शतक आखिर के ये कुछ श्लोक भी पढ़ लिए तो जीवन का निचोड़ समझने के लिए काफी लगते हैं 🙂 बाकी सुन्दरदास जी, तुलसीदासजी, रहीम, ज़ौक और कबीर तो रस का भण्डार हैं ।
27/07/19, 9:53 am – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

गमने तु चतुर्विशन्नेत्रवेदास्तु धावने।
मैथुने पञ्चषष्ठिश्च शयने च शताङ्गुलम्।२२२।

प्राणस्य तु गतिर्देविस्वभावाद्द्वादशाङ्गुलम्।
भोजने वमने चैव गतिरष्टादशाङ्गुलम्।२२३।

एकाङ्गुले कृते न्यूने प्राणे निष्कामता।
आनन्दस्तु द्वितीये स्यात्कविशक्तिस्तृतीयके।२२४।

वाचासिद्धिश्चतुर्थे च दूरदृष्टिस्तु पञ्चमे।
षष्ठे त्वाकाशगमनं चण्डवेगश्च सप्तमे।२२५।

अर्थ- चलते-फिरते समय प्राण वायु (साँस) की लम्बाई चौबीस अंगुल, दौड़ते समय बयालीस अंगुल, मैथुन करते समय पैंसठ और सोते समय (नींद में) सौ अंगुल होती है।२२२।

हे देवि, साँस की स्वाभाविक लम्बाई बारह अंगुल होती है, पर भोजन और वमन करते समय इसकी लम्बाई अठारह अंगुल हो जाती है।२२३।

भगवान शिव अब इन श्लोकों में यह बताते हैं कि यदि प्राण की लम्बाई कम की जाय तो अलौकिक सिद्धियाँ मिलती हैं। इस श्लोक में बताया गया है कि-
यदि प्राण-वायु की लम्बाई एक अंगुल कम कर दी जाय, तो व्यक्ति निष्काम हो जाता है, दो अंगुल कम होने से आनन्द की प्राप्ति होती है और तीन अंगुल होने से कवित्व या लेखन शक्ति मिलती है।२२४।

साँस की लम्बाई चार अंगुल कम होने से वाक्-सिद्धि, पाँच अंगुल कम होने से दूर-दृष्टि, छः अंगुल कम होने से आकाश में उड़ने की शक्ति और सात अंगुल कम होने से प्रचंड वेग से चलने की गति प्राप्त होती हैं।२२५।
27/07/19, 9:59 am – Abhinandan Sharma:
27/07/19, 10:01 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वाह, बहुत सुन्दर, बुक तो करवाएं पर लिंक कहाँ है ?
27/07/19, 10:02 am – Abhinandan Sharma: आइला 😲
27/07/19, 10:02 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: यहाँ एक अंगुल कितना होगा?
27/07/19, 10:03 am – Abhinandan Sharma: https://www.amazon.in/gp/product/9388727495/ref=cm_sw_r_tw_myi?m=A2NPB25BZOO3WC
27/07/19, 12:21 pm – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

भगतिहि सानुकूल रघुराया।
ताते तेहि डरपति अति माया।।

राम भगति निरुपम निरुपाधी।
बसइ जासु उर सदा अबाधी।।

श्री रघुनाथजी भक्ति के विशेष अनुकूल रहते हैं।
इसी से माया उससे अत्यन्त डरती रहती है।
जिसके हृदय में उपमा रहित और उपाधि रहित (विशुद्ध ) राम भक्ति सदा बिना किसी बाधा के (रोक-टोक ) के बसती है;।।115-3।।

तेहि बिलोकि माया सकुचाई।
करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।।

अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी।
जाचहिं भगति सकल सुख खानी ।।

उसे देखकर माया सकुचा जाती है।
उस पर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर (चला) सकती।
ऐसा विचार कर ही जो विज्ञानी मुनि हैं,
वे भी सब सुखों की खानि भक्ति की ही याचना करते हैं।।115-4।।
27/07/19, 1:58 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 🙏🙏
27/07/19, 4:32 pm – Binita Kotnala Ghaziabad Shastra Gyan: *हिंदू त्योहार पहचानो

  1. 🔘 e 2. 🐍👊🙋
  2. 💰💸👉🍹 4. ☕ 🚶
  3. 👬 ✌🚶 6. ®🅰 😁
  4. 🐄 12 🍹 8. 6⃣
  5. 💩 💰💨 🚶 10. Birth 8⃣ 🙋
    11.🔟 ♻ 12. 👩wall €
  6. 9⃣ ⛺ 14. 🐘 4⃣ ☕
  7. ➰🅰♏ 9⃣🙋16. 👩v⛺
  8. ✋👍4⃣ 18. 🐊☀🎄
  9. 🐒🙏🎄 20. 🔫🐄

वक्त कल तक😉
27/07/19, 4:44 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: 8. छठ्ठ

  1. मकर संक्रांति
    20.गणगौर
    27/07/19, 4:48 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 1. Holi
    27/07/19, 4:48 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 2. Nagpanchami
    27/07/19, 4:48 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 3. Dhanteras
    27/07/19, 4:49 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 4. Teeja
    27/07/19, 4:49 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 5. Bhaiduj
    27/07/19, 4:53 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 8. Chhat (suryashasthi)
    27/07/19, 4:53 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 10. Janmashtami
    27/07/19, 4:53 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 12. Deepawali
    27/07/19, 4:53 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 13. Navratra
    27/07/19, 4:54 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 15. Shree Ram navami
    27/07/19, 4:54 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 16. Shivratri
    27/07/19, 4:56 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 6 Rakhi
    27/07/19, 5:00 pm – Shastra Gyan Vikrant Garg Nagpur: 14 Ganesh chaturthi
    27/07/19, 5:12 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: Vinita mam yahan es tarah ka koi bhi post nahi kiya jata hai 🙏please pahle aap group ke niyam achchhi tarah se pd le 🙏please
    27/07/19, 5:21 pm – Vaidya Ashish Kumar: 💐💐✅
    27/07/19, 5:22 pm – Vaidya Ashish Kumar: धन्यवाद सर,दोनों बुक एक साथ ऑर्डर करना है
    27/07/19, 5:39 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कृपया कुछ भी पोस्ट करने से पहले ग्रुप के नियम पढ़ लें अन्यथा अगली ऐसी पोस्ट पर निष्कासन होगा 🙏🏼
    27/07/19, 5:40 pm – LE Santosh Saxena D 706: 10 Janmashtami
    27/07/19, 5:41 pm – LE Santosh Saxena D 706: 1 holi
    27/07/19, 5:45 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: पहेलियां ही सुलझानी है तो कृपया दूसरा ग्रुप ढूँढिये, पोस्ट हुआ हो हुआ, उस पर उत्तर भी दिए जा रहे हैं, कृपया आगे के लिए ध्यान रखें 🙏🏼
    27/07/19, 5:46 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 106

कृच्छ्रेणामेध्यमध्ये नियमिततनुभिः स्थीयते गर्भमध्ये
कान्ताविश्लेषदुःखव्यतिकरविषमे यौवने विप्रयोगः ।
वामाक्षीणामवज्ञाविहसितवसतिर्वृद्धभावोऽप्यसाधुः
संसारे रे मनुष्या वदत यदि सुखं स्वल्पमप्यस्ति किंचित् ।। १०६ ।।

अर्थ:
प्रथमावस्था में प्राणी गर्भावस्था में पड़ा रहता है । वहां वह मल-मूत्र राध लोहू प्रभृति गन्दी चीज़ों के बीच में पड़ा हुआ, बड़े बड़े कष्ट भोगता और हिल भी नहीं सकता । दूसरी अवस्था – जवानी में, वह अपनी प्यारी स्त्री की जुदाई के दुःख सहन करता है । तीसरी अवस्था – बुढ़ापे में, वह स्त्रियों से अनादृत होकर दुःख में पड़ा रहता है । हे मनुष्यों ! इस संसार में ज़रा सा भी सुख हो तो बताओ ।

गर्भावस्था

माता के खून और पिता के वीर्य से, गर्भाशय में, प्राणी की देह बनती है । चार मास बाद, उस देह में जीव आ जाता है । उस समय वह घोर अन्धकारपूर्ण कैदखाने में हाँथ-पाँव बंधा हुआ, उल्टा लटका रहता है । मुंह पर झिल्ली होने के कारण, न बोल सकता है और न रो सकता है,
जिस स्थान में वह नौ मास तक रहता है, वह स्थान – गर्भाशय, मल, मूत्र राध, खून, पीव और कफ प्रभृति महागंदे पदार्थों से भरा रहता है । वह जगह गन्दगी होने के सिवा इतनी तंग भी है कि वहां वह अच्छी तरह फैल-पसर कर रह भी नहीं सकता । उसी मैली और तंग जगह में जो साक्षात् नर्क है, वह बड़े ही कष्ट से नौ महीने काटता है । नर्क-कुण्ड के कष्टों से दुखी होकर, वह परमात्मा को याद करता है और उससे वादा करता है कि इस बार मैं जन्म लूँगा तो और कुछ न करके, केवल आपकी उपासना ही करूँगा । खैर, भगवान् दया करके उसे बाहर निकलते हैं; पर बाहर आते ही वह, माया-मोह में फंसकर, ईश्वर को भूल जाता है ।

बालावस्था

बालावस्था भी परमदुख की मूल है । इस अवस्था में प्राणी पराधीन और अतीव दीन रहता है । अशक्तता, मूर्खता, चपलता, दीनता और दुःख-सन्ताप – ये विकार इस अवस्था में आ जाते हैं । बालक एक पदार्थ की ओर दौड़ता, दुसरे को पकड़ता और तीसरे की इच्छा करता है । वह बड़ी बड़ी इच्छाएं करता है, पर उसकी इच्छाएं पूरी नहीं होती । वह सदा तृष्णा के फेर में पड़ा रहता और क्षण-क्षण में भयभीत होता है । उसे कभी शान्ति प्राप्त नहीं होती । जिस तरह कदलीवन का हाथी, सांकलों में बंधा हुआ, दीन हो जाता है; उसी तरह यह चैतन्य पुरुष, बालावस्था रुपी सांकलों में, महादीन हो जाता है । जिस तरह क्षण क्षण में द्वार की ओर दौड़ने वाले कुत्ते का अपमान होता है; उसी तरह बालक का अनादर होता है । उसे सदा माता-पिता और बांधवों का भय रहता है । यहाँ तक की अपने से बड़े बालकों और पशु-पक्षियों से भी उसे भीत रहना पड़ता है । स्त्री के नयन और नदी के प्रवाह से भी बालक और मन की चञ्चलता अधिक है । सच तो यह है कि बालक और मन कि चञ्चलता समान है; और सब की चञ्चलता, इन दोनों की चञ्चलता से नीचे है । जिस तरह वेश्या का मन एक पुरुष में नहीं ठहरता; उसी तरह बालक का मन भी एक पदार्थ में नहीं ठहरता ।

इस काम या पदार्थ से मेरा अनिष्ट होगा या कल्याण, इतना भी ज्ञान बालक को नहीं होता । जिस तरह ज्येष्ठ आषाढ़ में पृथ्वी तपती रहती है; उसी तरह सुख-दुःख और इच्छा प्रभृति दोषों से बालक जलता रहता है ।

बालक में अशक्तता और पराधीनता इतनी होती है कि, वह आप न उठ सकता है, न बैठ सकता है, न चल सकता है और न खा सकता है । कोई उठा लेता है तो गोद में आ जाता है; नहीं तो अपने मल-मूत्र में ही पड़ा रोया करता है । कोई दूध पीला देता है तो पी लेता है; नहीं तो रोता रहता है । यह शिशु अवस्था है । इस अवस्था को पार कर वह बालकावस्था में आता है; तब पढ़ने-लिखने का भार उसके सिर पर आता है । उस समय बालक गुरु से इस तरह डरता है; जिस तरह कोई यमदूत से डरता है । ज़रा भी दंगा करने या न पढ़ने से माता-पिता और गुरु प्रभृति की ताड़नाएँ सहनी पड़ती हैं । अगर उसे कुछ रोग हो जाता है, तो वह साफ़ साफ़ कह नहीं सकता और उसे सह भी नहीं सकता; भीतर ही भीतर सहता और दुःख पाता है । यह अवस्था महामूर्खतापूर्ण है । बालक कभी कहता है कि मुझे बर्फ का टुकड़ा भून दो; कभी कहता है कि आकाश का चाँद उतार दो । भोला इतना होता है कि, थाली में जल भर कर चाँद दिखाने और दूध की जगह आटा घोल कर दे देने से भी राज़ी हो जाता है । इस अवस्था में दुःख ही दुःख हैं, सुख और स्वाधीनता का नाम ही नहीं । परमात्मा यह अवस्था किसी को न दे ।

युवावस्था

बालकावस्था के बाद युवावस्था आती है । यद्यपि ये अवस्था नीचे से ऊपर चढ़ती है; पर यह और भी बुरी है । १५।१६ साल की अवस्था में शादी कर दी जाती है । इसे ‘शादी खाने आबादी’ कहते हैं, पर यह है बर्बादी । बेचारे के पैरों में ऐसी बेड़ियाँ डाल दी जाती हैं, कि उसे जन्म भर आज़ादी नहीं मिलती । लोहे और काठ की बेड़ियों से चाहे मनुष्य को छुटकारा मिल जाये; पर स्त्री रुपी बेड़ियों से जीवन-भर छुटकारा नहीं मिलता । अब तक पढ़ने लिखने की चिन्ता और गुरु प्रभृति के भय से ही दुखी रहना पड़ता था; पर अब और फ़िक्र – चिंताएं सिर पर सवार होती हैं । वही माता-पिता, जिन्होंने शादी शादी कहकर पैरों में स्त्रीरुपी बेड़ियाँ पहना दी थीं, उठती जवानी के पट्ठे को को भून-भूनकर खाते हैं । कहते हैं – “हमने तुझे पढ़ा लिखा दिया, तेरा शादी-ब्याह कर दिया; हमारा कर्तव्य पूरा हुआ; अब तू कमा । अगर नहीं कमाता है तो अपनी स्त्री को लेकर अलग हो जा ।” इस समय बेचारे की जान पर बन आती है । नौकरी या रोज़गार मिलना कोई खेल नहीं; इसलिए बेचारा भीतर ही भीतर जल-जलकर ख़ाक होने लगता है । अगर धनी घर में जन्म होता है, तो ये कष्ट भोगने नहीं पड़ते । उस अवस्था में और ही नाश के सामान आ इकट्ठे होते हैं । धन, यौवन और प्रभुता इनमें से प्रत्येक अनर्थ की जड़ है । जहाँ ये सब इकट्ठे हो जाएँ, वहां का तो कहना ही क्या ? जिस तरह धन पाने की आशा से, निर्धन लोग धनी को घेरे रहते हैं; उसी तरह इस अवस्था में, सब दोष आकर युवक को घेर लेते हैं । युवावस्था रुपी रात्रि को देखकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार, “आत्मज्ञान रुपी धन” को लूटते हैं; इसलिए चित्त शांत नहीं रहता और विषयों की ओर दौड़ता है । विषयों का संयोग होने से तृष्णा बढ़ती है । इस तृष्णा राक्षसी के मारे प्राणी जन्म-जन्मांतर में दुःख भोगता है ।

इस अवस्था में विषय भोगों की ओर मन ज़ियादा रहता है । स्त्री अत्यधिक प्यारी लगती है । नित नई स्त्रियों पर मन चला करता है । अगर कोई मित्र आता है, तो नवयुवक उससे कहता है – “अरे यार ! वह नाज़नी कैसी खूबसूरत है ! उसने तो मेरा दिल ही ले लिया । उसके दीदार बिना मुझे क्षण भर चैन नहीं । वह कैसे मिले ?” बस; ऐसी ही बातें अच्छी लगती हैं । अगर इच्छित स्त्री नहीं मिलती, तो मन में क्रोध होता है; क्रोध से मोह होता है और मोह से बुद्धि नष्ट हो जाती है । बुद्धि के नष्ट होने से, मनुष्य बिना पतवार की नाव की तरह से नष्ट हो जाता है । समुद्र में अगाध जल भरा है । उसमें अनन्त तरंगे उठती हैं । इतना विशाल महासागर, ईश्वर आज्ञा के विरुद्ध, मर्यादा को नहीं मेटता; पर युवावस्था शास्त्र और ईश्वर दोनों की आज्ञाओं को मेट देती है । जिस तरह अँधेरे में पदार्थों का ज्ञान नहीं रहता; उसी तरह युवावस्था में शुभ-अशुभ या भले-बुरे का ज्ञान नहीं रहता । जवानी दीवानी में लोक-लाज और हया-शर्म सब हवा हो जाती हैं ।

लिख चुके हैं, युवा अवस्था में स्त्री सबसे अधिक प्यारी लगती है । अगर किसी तरह स्त्री से वियोग हो जाता है, तो पुरुष उसकी वियोगग्नि में इस तरह जलता है, जिस तरह दावाग्नि से वन के वृक्ष जलते हैं । युवावस्था में बड़े से बड़े बुद्धिमानों की बुद्धि उसी तरह मलिन हो जाती है; जिस तरह वर्षाकाल में निर्मल नदी मलिन हो जाती है । इस अवस्था में “वैराग्य और संतोष” प्रभृति गुणों का अभाव हो जाता है ।

मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र जी ने मुनि वसिष्ठ से कहा – “हे मुनिवर ! जिस महासागर में अनन्त और अगाध जलराशि है तथा लाखों करोड़ों बड़े बड़े मगरमच्छ और घड़ियाल हैं, उसका पार करना महाकठिन है; पर मैं उसका पार करना उतना मुश्किल नहीं समझता, जितना की मैं इस युवावस्था का पार करना कठिन समझता हूँ । युवावस्था विषयों की ओर ले जाने वाली, महा अनर्थकारी और लोक-परलोक नशानेवाली है । जिस तरह आकाश में वन का होना आश्चचर्य की बात है; उसी तरह युवावस्था में सब सुखों के मूल वैराग्य, विचार, सन्तोष और शान्ति का होना आश्चर्य है ।”

महाराजा रामचन्द्र एक और जगह कहते हैं – “युवावस्था ! मुझ पर दया करके तू न आना ! मुझे तेरी जरुरत नहीं, क्योंकि मेरी समझ में तेरा आना दुखों का कारण है । जिस तरह पुत्र के मरने का सङ्कट पिता के सुख के लिए नहीं होता; उसी तरह तेरा आना भी सुख के लिए नहीं होता ।”

वृद्धावस्था

यह अवस्था, पहली दो अवस्थाओं से भी बुरी है । बाल्यावस्था महाजड़ और अशक्त है; युवावस्था अनर्थ और पापों का मूल है तथा वृद्धावस्था में शरीर जर्जर और बुद्धि क्षीण हो जाती है, खूब निकल आता है, दांत गिर पड़ते हैं, बाल सफ़ेद हो जाते हैं, बल काम हो जाता है, आँखों से काम सूझता है या सूझता ही नहीं, कानो से सुनाई नहीं देता, पैरों से चला नहीं जाता, लकड़ी तक-तक कर चलना होता है, कफ और खांसी अपना दौरा-दौरा जमा लेते हैं, हर समय सांस फूलने लगता है । बहुत क्या – सारे रोग, शत्रुओं की तरह मौका पाकर, इस अवस्था में चढ़ाई कर देते हैं । स्त्री-पुत्रादि सभी नाते-रिश्तेदार बूढ़े को उसी तरह त्याग देते हैं; जिस तरह पके फल को वृक्ष और निकम्मे बूढ़े बैल को बैलवाले त्याग देता है ।

ज़रा अवस्था या बुढ़ापा मृत्यु का पेशखीमा है । जिस तरह सांझ होने से रात निकट आती है; उसी तरह बुढ़ापे के आने से मौत निकट आ जाती है । संध्या के आने पर जो दिन की इच्छा करते हैं और बुढ़ापे के आने पर जो जीने की अभिलाषा रखते हैं, वे दोनों ही मूर्ख हैं । जिस तरह बिल्ली, चूहे को खा जाने की घात में रहती है और चाहती है कि चूहा आवे तो खाऊं; उसी तरह मौत देखती रहती है कि बुढ़ापा आवे तो मैं इसे ग्रहण करूँ । ऐसा जान पड़ता है मानो वृद्धावस्था काल की सखी है । वह आकर रोगरूपी आग से शरीर के मांस को जलाती या पकाती और उसका स्वामी – काल आकर प्राणी को भक्षण कर जाता है । अशक्तता, अङ्गपीड़ा और खांसी – ये तीनो काल की पटरानियां हैं । जिस तरह वन में बाघिन आकर पहले शब्द करती या गरजती और मृग का नाश करती है; उसी तरह शरीर रुपी वन में खांसी रुपी बाघिन आकर बल-रुपी मृग का नाश करती है । जिस तरह चन्द्रमा के उदय होने से कमलिनी खिल उठती है; उसी तरह बुढ़ापे के आने से मृत्यु प्रसन्न होती है । जरा बड़ी जबरदस्त है । इसने बड़े बड़े शत्रुहन्ताओं के मान-मर्दन कर दिए हैं । यह शरीर को आग की तरह जलाती है । जिस तरह वृक्ष में आग लगती है, तब धुंआ निकलता है; उसी तरह शरीर वृक्ष में जरा-रुपी अग्नि के लगने से तृष्णा-रुपी धुंआ निकलता है । जरा-रुपी जञ्जीर में बंधने से मनुष्य दीन हो जाता है, अंग शिथिल हो जाते हैं, बल क्षीण हो जाता है, इन्द्रियां निर्बल हो जाती हैं और शरीर जर्जर हो जाता है, पर तृष्णा उलटी बलवती हो जाती है । इस अवस्था में घोर दुःख हैं, सुख का तो लेश भी नहीं ।

जिस समय पुरुष बूढा हो जाता है, उसमें कमाने की शक्ति नहीं रहती; तब सभी उसे पागल समझकर उसकी हंसी करते और उसके पुत्र-पौत्रादि बुरी नज़र से देखते हैं । यहाँ तक की ख़ास उसकी अर्द्धांगी उससे घृणा करने लगती है । पुत्र उसे कोई चीज़ नहीं समझते और लोग भी उसे वृथा की बला समझते हैं । पुत्र और पुत्र-वधुएं उसे एक टूटी सी खाट पर, पौली में डाल देते हैं और उसके थूकने को एक ठीकरा रख देते हैं । आप समय पर अच्छे से अच्छा खाना खाते हैं; पर समय-बे-समय, जब याद आ जाती है, बचा खुचा बासी कूसी खाना, एक पुरानी और फूटी सी थाली या ठीकरे में रख कर दे आते हैं । जब उसका थूक-खखार या मल-मूत्र उठाते हैं – “अब मर क्यों नहीं जाते? जवान-जवान मरे जाते हैं, पर तुमको मौत नहीं आती !” प्रभृति । यह दुर्गति बुढ़ापे में होती है ।

अगर घर गृहस्थी में सौभाग्य से कोई दुःख नहीं होता, घरवाले स्त्री-पुत्र आदि अच्छे मिल जाते हैं, घर में परमात्मा की दया से सुखैश्वर्य के सभी सामान मौजूद होते हैं; तो दूसरों का भला न चेतने वाले, दूसरों को अच्छी अवस्था में देखकर कुढ़ने वाले ही वाले तंग करते हैं । वह अपनी ओर से उसका सर्वनाश करने में कोई बात न उठा रखते हैं । यद्यपि ऐसी बातों से उन्हें कोई लाभ नहीं होता; तो भी वो बिल्ली की सी करतूतों से बाज़ नहीं आते; हरदम नाक में दम किये रहते हैं । मतलब यह कि, संसार में दुखों की ही अधिकता है । यहाँ सुख है ही नहीं । अगर है तो उसके परिणाम में कोई लाभ नहीं; वरन हानि है ।

उस्ताद ज़ौक़ कहते हैं –
राहतो रंज ज़माने में हैं दोनों, लेकिन।
याँ अगर एक को राहत है, तो है चार को रंज ।।

निस्संदेह संसार में सुख और दुःख दोनों ही हैं – पर बहुलता दुःख की ही है, क्योंकि चार दुखियों में मुश्किल से एक सुखी मिलता है ।

उस्ताद ज़ौक़ ही एक जगह और कहते हैं –
हलावते शरमो पासदारी, जहाँ में है ज़ौक़ रंजोख्वारी ।
मज़े से गुज़री, अगर गुज़ारी किसी ने बे नामोनंग होकर ।।

संसार से दूर रहना अच्छा; यहाँ के संबंधों की जड़ में दुःख और क्लेश भरा हुआ है । जिसने अपनी ज़िन्दगी चुपचाप गुज़ार दी; सच तो ये है, उसने अच्छी गुज़ार दी ।

सारांश यह कि सभी महात्माओं ने संसार के दुखों का अनुभव करके औरों को चेतावनी दी है, कि इस मिथ्या जगत की माया में न भूलो; इससे दिल मत लगाओ, किन्तु इसके बनानेवाले के साथ दिल लगाओ । इसके साथ दिल लगाने से तुम्हारा बुरा और उसके साथ दिल लगाने से भला है ।

गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है –
सलिल युक्त शोणित समुझ, पल अरु अस्थि समेत ।
बाल कुमार युवा जरा, है सु समुझ करु चेत ।।
ऐसेही गति अवसान की, तुलसी जानत हेत ।
ताते यह गति जानि जिय, अविरल हरि चित चेत ।।

स्त्री की रज और पुरुष के वीर्य से तुम्हारे शरीर के खून, मांस और हड्डियां बनी । फिर तुम गर्भाशय से बाहर आये । फिर बालक अवस्था में रहे; उसके बाद युवावस्था आयी; फिर बुढ़ापा आया । फिर तुम मरे और कर्मफल भोगने को फिर जन्म लिया । इस तरह लोक-वासना के कारण तुम्हें बारम्बार जन्मना और मरना पड़ता है । इसमें कैसे कैसे कष्ट उठाने पड़ते हैं, इन बातों को याद करते रहो और कष्टों से बचने के लिए सावधान होकर परमात्मा से प्रीति करो; तभी तुम्हारा भला होगा । तुम्हारे सारे नातेदार मतलबी हैं; केवल एक वह सच्चा सहायक और रक्षक है । यही सब विषय नीचे के भजनो में कैसी खूबी से दिखाए हैं –

भजन (राग धनाश्री)

हरि बिन और न कोई अपना, हरि बिन और न कोई रे।
मात पिता सुत बन्धु कुटुम सब, स्वारथ के ही होई रे ।।
या काय को भोग बहुत दे, मरदन कर कर सोई रे ।
सो भी छूटत नैक न खसकी, संग न चाली धोई रे ।।
घर की नारि बहुत ही प्यारी, तन में नाहीं दोई रे ।
जीवट कहती संग चलूंगी, डरपन लागी सोई रे ।।
जो कहिये यह द्रव्य आपनो, जिन उज्जल मति खोई रे ।
आवत कष्ट राखत रखवारी, चालत प्राण ले जोई रे ।।
इस जग में कोई हितू न दीखे, मैं समझों तोई रे ।
चरणदास-सुखदेव कहैं, ये सुन लीजो सब कोई रे ।।

भजन (राग सोरठ)

सुध राखो वा दिन की कछु तुम, सुध राखो वा दिन की रे ।
जादिन तेरी यह देह छूटैगी, ठौर बसौगे बन की रे ।।
जिनके संग बहुत सुख कीने, तेरो मुख ढँक होएंगे न्यारे रे ।
जम के त्रास होएं बहु भाँती, कौन छुटावनहारे रे ।।
देहल लों तेरी नारि चलेगी, बड़ी पौल लो माई रे ।
मरघट लों सब बीर भतीजे, हंस अकेला जाए रे ।।
द्रव्य पड़ें और महल खड़े रहे, पूत रहैं घर माहीं रे ।
जिनके काज पचैं दिन राती, सो संग चालत नाहीं रे ।।
देव पितर तेरे काम न आवें, जिनकी सेवा लावे रे ।
चरणदास-सुखदेव कहत हैं, हरि बिन मुक्ति न पावे रे ।।

परमात्मा की भक्ति करो तो ऐसी करो कि परमात्मा के सिवा अन्य किसी भी देवी-देवता या संसारी पदार्थ को कुछ समझो ही नहीं; यानि उस जगदीश के सिवा सबको झूठे, निकम्मे और नाशमान समझो । केवल उसके प्रेम में गर्क हो जाओ और उससे प्रेम के बदले में कुछ मांगो नहीं; तब देखो, क्या आनन्द आता है !

कबीर साहब कहते हैं –
सुमिरन से मन लाइए, जैसे दीप पतंग।
प्रान तजै छीन एक में, जरत न मोरे अंग।।

इसी बात को उस्ताद ज़ौक़ ने किस तरह कहा है –
कहा पतंग ने यह, दारे शमा पर चढ़ कर ।
अजब मज़ा है, जो मर ले किसी के सर चढ़ कर ।।

ऐसी प्रीति को ही प्रीति कहते हैं । दीपक और पतंग, मछली और जल, नाद और कुरङ्ग, चातक और मेघ – इनकी प्रीति आदर्श प्रीति है । ऐसी प्रीति से ही सच्ची सिद्धि मिलती है – ऐसी प्रीति वालों को ही परमात्मा के दर्शन होते हैं ।

दोहा

सह्यो गर्भदुख जन्मदुःख, जौवन त्रिया वियोग।
वृद्ध भये सबहिन तज्यो, जगत किधौं यह रोग।।
27/07/19, 6:52 pm – LE Onkar A-608 added Mahendra Mishra Delhi Shastra Gyan, Sachin Tyagi Shastra Gyan,
27/07/19, 6:55 pm – LE Onkar A-608 added LE Shail Singh W Onkar Singh Ji
27/07/19, 6:57 pm – +91 97194 58113 left
27/07/19, 8:03 pm – Abhinandan Sharma: सभी नए सदस्यों की सुविधा के लिये, ग्रुप के नियम यहां डाल रहा हूँ । ये ग्रुप पहलीबार चुटकुलों के लिये नहीं है ।
27/07/19, 8:03 pm – Abhinandan Sharma: इस ग्रुप में फ़ॉर्वर्डेड पोस्ट डालना मना है | नेट से कोई भी कंटेंट, ख़ास तौर से बिना सन्दर्भ के अथवा तोडा मरोड़ा हुआ, डालना भी मना है | जो आपने स्वयं पढ़ा हो, किसी शास्त्र से, कोई दोहां, कोई चोपाई, कोई पुराण, कुछ भी, वो आप इस ग्रुप में डाल सकते हैं | ग्रुप ज्वाइन करने वाले, खुद भी कोई भी एक पुस्तक, ग्रुप एडमिन के परामर्श से प्रारंभ कर सकते हैं और उसे पढ़कर ग्रुप में अन्य मेम्बेर्स को पढने के लिए डाल सकते हैं | अभी ग्रुप में ४-5 पुस्तक इस प्रकार के प्रयास से चल रही है, जिससे सभी लोग वो ग्रन्थ पढ़ सकें | स्वागतम !
27/07/19, 8:45 pm – Shastra Gyan Kartik: वाह्ह्हह्ह्ह्ह 🙂
27/07/19, 9:16 pm –
27/07/19, 11:22 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: अगले श्लोक में दो बड़ी अच्छी और ध्यान देनेवाली कहानिया हैं, पढ़े जरूर ।🙏🏼
28/07/19, 9:46 am –
28/07/19, 11:14 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ।
जो जानइ रघुपति कृपा
सपनेहु मोह न होइ।।

श्री रघुनाथजी का यह रहस्य ( गुप्त मर्म) जल्दी कोई भी नही जान पाता।
श्री रघुनाथजी की कृपा से जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्न में भी मोह नही होता ।।116 (क)।।

औरउ ग्यान भगति कर
भेद सुनहु सुप्रबीन।

जो सुनि होइ राम पद
प्रीति सदा अबिछीन।।

हे सुचतुर गरुड़ जी! ज्ञान और भक्ति का और भी भेद सुनिए, जिसके सुनने से श्री राम जी के चरणों में सदा अविच्छिन्न ( एक तार ) प्रेम हो जाता है
।।116 (ख)।।
28/07/19, 1:37 pm – : This message was deleted
29/07/19, 8:48 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: प्रश्नोत्तरमाला – 29

पशोः पशुः को न करोति धर्मं
प्राधीतशास्त्रोऽपि न चात्मबोधः।
किन्तद्विषं भाति सुधोपमं स्त्री
के शत्रवो मित्रवदात्मजाद्याः। २९ ।

प्र: पशुओं से भी बढ़कर पशु कौन है ?
उ: शास्त्र का खूब अध्ययन करके जो धर्म का पालन नहीं करता और जिसे आत्मज्ञान नहीं हुआ ।

प्र: वह कौन सा विष है जो अमृत सा जान पड़ता है ?
उ: नारी ।

प्र: शत्रु कौन है जो मित्र सा लगता है ?
उ: पुत्र आदि ।
29/07/19, 10:59 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

सुनहु तात यह अकथ कहानी ।
समुझत बनइ न जाइ बखानी।।

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुख रासी।।

हे तात! यह अकथनीय कहानी ( वार्ता ) सुनिए ।
यह समझते ही बनती है , कही नहीं जा सकती ।
डीव ईश्वर का अंश है।
(अतएव ) वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है।।116-1।।

सो माया बस भयउ गोसाईं ।
बंध्यो कीर मरकट की नाईं।।

जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई ।
जदपि मृषा छूटति कठिनई।।

हे गोसाईं! वह माया के वशीभूत होकर तोते और वानर की भांति अपने आप ही बंध गया।
इस प्रकार जड़ और चेतन में गांठ पड़ गई ।
यद्यपि वह ग्रंथि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटने में कठिनता है ।।116-2।।
29/07/19, 11:01 am – Pitambar Shukla: डीव❎
जीव✅
29/07/19, 11:23 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 🙏🏼🙏🏼
29/07/19, 11:39 am – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻
29/07/19, 11:46 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 🙏🙏
29/07/19, 2:43 pm – +91joined using this group’s invite link
29/07/19, 8:38 pm – +91 joined using this group’s invite link
29/07/19, 8:50 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 107

आयुर्वर्षशतं नृणां परिमितं रात्रौ तदर्धं गतं
तस्यार्धस्य परस्य चार्धमपरं बालत्ववृद्धत्वयोः ।
शेषं व्याधिवियोगदुःखसहितं सेवादिभिर्नीयते
जीवे वारितरङ्गचञ्चलतरे सौख्यं कुतः प्राणिनाम् ।। १०७ ।।

अर्थ:
मनुष्य की उम्र औसत सौ बरस की मानी गयी है । उसमें से आधी तो रात में सोने में गुज़र जाती है; बाकी में एक भाग बचपन में और एक भाग बुढ़ापे में चला जाता है । शेष में जो एक भाग बचता है – वह रोग, वियोग, पराई चाकरी, शोक और हानि प्रभृति नाना प्रकार के क्लेशों में बीत जाता है । जल तरंगवत चञ्चल जीवन में प्राणियों के लिए सुख कहाँ है ?

खुलासा: शास्त्रों में मनुष्य की आयु सौ बरस की मानी गयी है । उसमें से पचास बरस; यानि आधी आयु तो रात के समय सोने में बीत जाती है । अब रहे पचास बरस; उनके तीन भाग कीजिये । पहले १७ साल बचपन की अज्ञानावस्था और पराधीनता में बीत जाते हैं । दुसरे १७ साल वृद्धावस्था में चले जाते हैं और शेष १६ साल नाना प्रकार के रोग, शोक, वियोग, हानि-लाभ की चिन्ता और दूसरों से लड़ने-झगड़ने प्रभृतुय में बीत जाते हैं ।

दुःखपूर्ण जीवन में कहीं सुख नहीं

यद्यपि इस जीवन में ज़रा भी सुख नहीं है, क्षण-भर भी शान्ति नहीं है; तो भी मनुष्य का ऐसा मोह है कि वह मरना नहीं चाहता; मौत का नाम सुनते ही काँप उठता है । अगर इस जीवन में सुख होता, तो न जाने क्या होता ? घोर कष्ट और दुखों में भी यदि मनुष्य मरता है तो कहता है -” हम कुछ न जिए, अगर और कुछ दिन जीते तो ……………..”

किसी कवी ने कहा है –
हो उम्र खिज्र भी, तो कहेंगे बवक्ते मर्ग।
हम क्या रहे यहाँ, अभी आये अभी चले।।

चाहे हज़ारों बरस की उम्र हो जाए, मरते समय यही कहेंगे, इस संसार में कुछ भी न रहे, अभी आये अभी जाते हैं । जीने की अभिलाषा बनी ही रहती है ।

घृणित जीवन से भी क्यों घृणा नहीं होती?

मनुष्य जीवन में दुःख ही दुःख हैं; फिर भी मनुष्य इस घृणित जीवन से सन्तुष्ट क्यों रहता है ? इससे उसे घृणा क्यों नहीं होती ? जिस तरह मैले से भंगी को घृणा नहीं होती; उसी तरह जिनके स्वाभाव में मनुष्य जीवन के दुःख समा गए हैं, उन्हें इस मलिन और घृणित जीवन – दु:खपूर्ण जीवन से घृणा नहीं होती । मैले का कीड़ा मैले में ही सुखी रहता है; मैले से निकलने में उसे दुःख होता है । यही हाल उनका भी है, जिनके अन्तः कारन मलिन हैं । वे मलिन गृहस्थाश्रम में ही सही हैं ।

मनुष्य का कर्तव्य क्या है ?

मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है । यह ८४ लाख योनियां भोगने के बाद मिलता है । अगर मनुष्य इस मानव जीवन में भी चूक जाता है – आवागमन – जन्म-मरण के फन्दे से छूटने का उपाय नहीं करता, तो पछताता और रोता है; पर यह सुअवसर उसे फिर जल्दी नहीं मिलता । इस पर एक दृष्टान्त है –

अवसर चुके पछताना होता है

किसी राजा के ३६० रानियां थीं । राजा विदेश गया था । जिस दिन वह लौटकर आया उस दिन ३६०वे नम्बर की रानी के यहाँ उसके जाने की बारी थी । रानी ने दासियों से कह दिया कि मैं सोती हूँ; जब राजाजी आवें, मुझे जगा देना । रात को राजा आया; किन्तु दासियों ने भय के मारे रानी को न जगाया । सवेरे राजा चला गया । रानी ने उठकर पुछा – “क्या राजाजी आये थे ?” दसियों ने कहा -“हाँ, आये थे । हम लोग उनके भय के मारे आपको जगा न सकीं ।” रानी बहुत रोई, पछताई । उसे ३६० दिन तक फिर राह देखनी पड़ी । बस, यही हाल उनका है, जो इस मनुष्य जन्म को वृथा गवां देते हैं । इसमें भगवत्भक्ति या उपासना नहीं करते । मर जाने पर, ८४ लाख योनियों को भोगकर, फिर कहीं ऐसा अवसर हाथ आता है । अतः मनुष्य को सब जञ्जाल छोड़कर, एकमात्र भगवत्भक्ति में लग्न चाहिए; एक क्षण भी व्यर्थ न गवाना चाहिए । दम निकले तो जगदीश्वर की याद करता हुआ ही निकले । इसी में कल्याण है । सांस का भरोसा क्या ? आया आया, न आया न आया ।

“गुरु-कौमुदी” में कहा है –
अरे भेज हरेर्नाम, क्षेमधाम क्षणे क्षणे ।
बहिस्सरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्त्तते ।।

अरे जीव ! प्रत्येक क्षण हरि का नाम भज । हरि का नाम कल्याण धाम है । जो सांस बाहर निकल जाता है, उसका क्या भरोसा ? आवे, न आवे ।

महाभारत में आयु की क्षणभंगुरता पर एक इतिहास लिखा है
एक ब्राह्मण राह भूलकर किसी भयानक वन में जा निकला । वहां हाथी और सर्प प्रभृति भयानक हिंसक पशु घूम रहे थे । एक पिशाचिनी हाथ में फांसी लिए सामने आ रही थी । उन्हें देखकर वह डर के मारे रक्षा का स्थान खोजने लगा । उसने एक अन्धा कुआँ देखा, जिसमें घास छा रही थी तथा अनेक प्रकार की बेलें लगी थी । वह एक बेल को पकड़ कर औंधा सिर किये, कुँए में लटक गया । थोड़ी देर बाद उसने नीचे की ओर देखा तो एक बड़ा भारी सर्प मुंह फाड़े नज़र आया; ऊपर की ओर देखा तो एक मस्त हाथी खड़ा दीखा । उस हाथी के छः मुख थे । उसका शरीर आधा सफ़ेद और आधा काला था । जिस बेल को वह ब्राह्मण पकडे हुए था, उसको वह हाथी खा रहा था और सफ़ेद और काले दो चूहे चूहे उस बेल की जड़ को काट रहे थे ।

इसका मतलब यों है – वह ब्राह्मण जीव है । सघन वन यह संसार है । काम क्रोध आदि भयानक जीव, इस जीव को नष्ट करने को घूम रहे हैं । स्त्री रुपी पिशाचिनी, भोग-रुपी पाश लेकर, इस जीव के फंसने के लिए फिरती है । कुँए में जो बेल लटक रही है, वही आयु है । उसी को पकड़ कर यह जीव लटक रहा है । कुँए में जो कालसर्प है, वह इस जीव का काल है, वह अपनी घात देख रहा है; उधर रात-दिन रुपी चूहे इस आयु रुपी बेल की जड़ काट रहे हैं । वह हाथी वर्ष है । उसके छः मुख, छः ऋतुएं हैं । कृष्ण और शुक्ल दो पक्ष उस हाथी के दो वर्ण या रंग हैं । मनुष्य इस तरह मौत के मुंह में है । हर क्षण मौत उसे निगलती जा रही है; पर आश्चर्य है कि इस आफत में भी – मृत्यु-मुख में पड़ा हुआ भी – वह अपने को सुखी समझता है और इस नितान्त भयपूर्ण जीवन से सन्तुष्ट है ।

बीत गयी सो बात गयी, आगे की सुधि लो

बहुत से लोग कहा करते हैं कि हमने सारी उम्र परपीड़न या पापकर्मों में खोयी; भगवान् को कभी भूल से भी याद न किया; अब हम क्या कर सकते हैं ? यह कहना हमारी भूल है । जो समय बीत गया, वह तो लौट कर आवेगा नहीं; पर जो समय हाथ में है, उसे तो सुकर्म और ईश्वर कि याद में लगाना चाहिए । यदि बाकी उम्र भी व्यर्थ के झंझटों में गवाईं जाएगी, तो अन्तकाल में भारी पछतावा होगा ।

किसी कवी ने ठीक कहा है
पुत्र कलत्र सुमित्र चरित्र,
धरा धन धाम है बन्धन जीको।
बारहिं बार विषय फल खात,
अघात न जात सुधारस फीको।
आन औसान तजो अभिमान,
कही सुन, नाम भजो सिय-पीको।
पाय परमपद हाथ सों जात,
गई सो गई अब राख रही को।

एक नट की उपदेशप्रद कहानी

एक राजा बड़ा ही कञ्जूस था । उसने प्रचुर धन-सञ्चय किया था; पर उससे न तो वह अपने पुत्र को सुख भोगने देता था और न खर्च के डर से अपनी कन्या की शादी ही करता था । एक दिन एक नट-नटी उसके दरबार में आये और राजा से तमाशा देखने की प्रार्थना की । राजा ने कहा -“अच्छा अमुक दिन देखा जाएगा ।” नटनी बार बार याद दिलाती रही और राजा बार बार टालता रहा । अन्त में नटनी ने वज़ीर से कहा – “अगर राजा साहब तमाशा न देखें, तो हम चले जाएँ; हमें खर्च खाते बहुत दिन हो गए ।” यह सुन वज़ीर ने राजा से कहा – “महाराज ! आप तमाशा देख लीजिये । हम लोग चन्दा करके कुछ नट को दे देंगे । अगर आप तमाशा न देखेंगे तो बड़ी बदनामी होगी ।” राजा इस बात पर राज़ी हो गया । तमाशा हुआ । तमाशा होते होते जब दो घडी रात रह गयी और राजा ने कुछ भी इनाम न दिया, तब नटनी ने नट से कहा
रात घडी भर रह गयी, थाके पिंजर आये ।
कह नटनी सुन मालदेव, मधुरा ताल बजाय ।।

नटनी की बात सुकर नट ने कहा
बहुत गयी थोड़ी रही, थोड़ी भी अब जाय।
कहे नाट सुन नायिका, ताल में भंग न पाय।।

एक तपस्वी भी वहां तमाशा देख रहा था । उसने ये सवाल जवाब सुनते ही नट को अपना कम्बल दे दिया, राजा के लड़के ने अपनी हीरों की जडाऊँ कड़ों की जोड़ी दे दी और राजकन्या ने अपने गले के हीरों का हार दे दिया ।

राजा यह सब देखकर चकित हो गया । उसने सबसे पहले तपस्वी से पूछा – “तुम्हारे पास यही एक कम्बल था । तुमने क्या समझकर उसे दे दिया ?” तपस्वी ने कहा – “आपके ऐश्वर्य को देखकर मेरे मन में भोगों की वासना उठ खड़ी हुई थी; पर नट के दोहे से मेरा विचार बदल गया । मैंने उससे यह उपदेश ग्रहण किया, कि बहुत सी आयु तो तप में बीत गयी; अब जो थोड़ी सी रह गयी है, उसे भोगों की वासना में क्यों ख़राब करूँ ? मुझे नट से उपदेश मिला, इससे मैंने अपना एकमात्र कम्बल – अपना सर्वस्व उसे दे दिया ।

इसके बाद राजा ने पुत्र से पूछा – “तुमने क्या समझकर अपने कड़ों की बेशकीमती जोड़ी उसे दे दी ?” राजपुत्र ने कहा – “मैं बड़ा दुखी रहता हूँ, क्योंकि आप मुझे कुछ भी खर्च करने नहीं देते । दुखी होकर मैंने यह विचार कर रखा था कि किसी दिन राजा को विष देकर मरवा दूंगा; पर इस नट के दोहे से मुझे यह उपदेश हुआ है कि राजा कि बहुत सी आयु तो बीत गयी, अब वह बूढा हो गया है; दो-चार बरस की बात और है; इस अर्से में वह आप ही मर जाएगा, अतः पितृहत्या क्यों की जाय ? इसी उपदेश के बदले में मैंने नट को कड़ों की जोड़ी दे दी ।”

फिर राजा ने राजकन्या से पूछा – “तुमने अपना कीमती हार नट को क्यों दिया ?” कन्या ने कहा – मेरी जवानी आ गयी है; आप खर्च के भय से मेरी शादी नहीं करते । कामदेव बड़ा बलवान है । काम की प्रबलता के मारे, मेरा विचार वज़ीर के लड़के के साथ निकल भागने का था; पर नट के दोहे से मुझे यह उपदेश मिला कि राजा कि बहुत सी आयु तो चली गयी; अब जो शेष रह गयी है वह भी बीतने ही वाली है । थोड़े दिनों के लिए पिता के नाम में क्यों बट्टा लगाऊं ? यह अनमोल उपदेश मुझे नट के दोहे से मिला, इसी से मैंने अपना बहुमूल्य हार उसे दे दिया । हे पिता ! नट के दोहे ने आपकी जान और इज़्ज़त बचाई है; अतः आपको भी उसे कुछ इनाम देना चाहिए ।” राजा ने यह सब बातें सोच-समझकर नट को इनाम दे विदा किया और वज़ीर के लड़के के साथ कन्या की शादी कर दी । राजपुत्र को गद्दी देकर आप वैरागी हो गया और अपनी शेष रही आयु आत्मविचार में लगा दी । इसी तरह सभी संसारियों को अपनी शेष आयु सुकर्म और ब्रह्मविचार में लगा, जन्म-मरण से पीछा छुड़ा, नित्य सुख-शान्ति लाभ करनी चाहिए ।

बाल-बच्चो का क्या किया जाय

प्रथम तो स्त्री-पुत्र प्रभृति आपके कोई नहीं; एक सराय के मुसाफिर के समान हैं । यहाँ आकर नाता जुड़ गया है । अपने अपने समय पर सब अपनी अपनी राह लगेंगे । इसके सिवा, ये आपसे सच्ची मुहब्बत भी नहीं करते । आपसे इनका काम निकलता है, पाप-पुण्य की गठरी आप बांधते हैं और सुख ये भोगते हैं; इसीसे आपको कोई “बाबूजी”, कोई “चाचाजी” और कोई “नानाजी” कहता है । अगर आप इनकी जरूरतों और फरमाइशों को पूरी न करें, तो ये आपका नाम भी न लें । ऐसे स्वार्थी लोगों को मिथ्या प्रीति के फेर में पड़कर, आप अपने अमूल्य और दुष्प्राप्य जीवन को क्यों नष्ट करते हैं ? जब आप इस देह को छोड़कर परलोक में चले जाएंगे, तब क्या ये आपके साथ जाएंगे ? हरगिज़ नहीं । कोई पौली तक और कोई श्मशान तक आपकी लाश के साथ जाएंगे । वहां पहुँच, आपको जला-बला ख़ाक कर सब भूल जायेंगे ।

आप भी मुसाफिर हैं और आपके स्त्री-पुत्र भी मुसाफिर हैं । आपकी अगली सफर बड़ी लम्बी है । यह तो बीच का एक मुकाम है । कर्म-भोग भोगने को आप यहाँ ठहर गए और कर्मवश ही आप से इन सबका मेल हो गया । ये अपने सफर का प्रबन्ध करें चाहे न करें, पर आप तो अवश्य करें । इनके झूठे मोह में आप न भूलें । अगर आप बाल-बच्चों की रोटी और कपड़ों की फ़िक्र में लगे रहेंगे तो यह फ़िक्र तो अन्त तक लगी ही रहेगी और आपको ले जाने वाली गाड़ी या मौत आ जाएगी । उस समय बड़ी कठिनाई होगी । जो लोग उम्र भर गृहस्थी के झंझटों में लगे रहे, अन्त में उनका बुरा ही हुआ । ये घर-झगडे ही तो ईश्वर-दर्शन या स्वर्ग अथवा मोक्ष की प्राप्ति में बाधक हैं ।

महात्मा शेख सादी ने कहा है
ऐ गिरफ़्तारे पाये बन्दे अयाल।
दिगर आज़ादगी मबन्द ख़याल।।
ग़मे फ़रज़न्दों नानो जामओ कूत।
बाज़द आरद ज़े सेर दर मलकूत।।

ऐ औलाद की मुहब्बत में गिरफ्तार रहने वाले, तू किसी तरह भी बन्धन मुक्त नहीं हो सकता । सन्तान, रोटी, कपडा तथा जीविका की फ़िक्र तुझे स्वर्ग की चिन्ता से रोकती है ।
इसलिए “सब तज और हर भज”।

क्या घर में रहकर ईश्वर-उपासना नहीं की जा सकती ?

घर गृहस्थी में रहकर ईश्वर-उपासना की जा सकती है; पर घर में रहकर भक्ति करना है टेढ़ी खीर । जैसी सङ्गति होती है, वैसा ही मनुष्य हो जाता है । ज्ञानियों की सङ्गति में ज्ञान की और स्त्रियों की सुहबत में काम की उत्पत्ति होती है । घर में रहकर वैराग की उत्पत्ति होना कठिन है ।

किसी कवी ने कहा है
जाइयो ही तहाँ ही जहां संग न कुसंग होय,
कायर के संग शूर भागे पर भागे है ।
फूलन की वासना सुहाग भरे वासन पै,
कामिनी के संग काम जागे पर जागे है ।
घर बेस घर पै बसो, घर वैराग कहाँ,
काम क्रोध लोभ मोह, पागे पर पागे है ।
काजर की कोठरी में लाखु ही सयानो जाय,
काजर की ऐक रेख लागे पर लागे है ।

संसार की संगतियों में मनुष्य संसारी हो जाता है; विषय भोगों की ओर उसका मन चलायमान होता है और स्त्री-पुत्र आदि में उसका राग बना ही रहता है; पर जो वेदान्त ग्रंथों को विचारते और महापुरुषों की सङ्गति करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध होते रहने की वजह से, उन्हें गृहस्थाश्रम में ही, वैराग्य उत्पन्न होने लगता है । गृहस्थी में एक न एक दुःख बना ही रहता है । उस दुःख के कारण मनुष्य के मन में वैराग्य भी पैदा होता रहता है । विषयों में दुःख समझना ही वैराग्य का और सुख समझना ही राग का हेतु है । महामूढ़ों को भी कुछ न कुछ वैराग्य बना ही रहता है । जिस समय कोई कष्ट आता है, स्त्री-पुत्र आदि मर जाते हैं, धन नाश हो जाता है, तब मूढ़ भी अपने तई और संसार को धिक्कारता है; लेकिन ज्योंही वह कष्ट दूर हो जाता है, उसका वैराग्य भी काफूर हो जाता है । पर वास्तव में वैराग्य का कारण है – गृहस्थाश्रम ही; क्योंकि बिना गृहस्थाश्रम तो किसी की उत्पत्ति होती ही नहीं । रामचन्द्र और वशिष्ठ प्रभृति को गृहस्थाश्रम में ही वैराग्य हुआ था । और भी बड़े-बड़े सन्यासियों को गृहस्थाश्रम में ही वैराग्य हुआ था । वैराग्य उत्पन्न होते ही, उन्होंने घर गृहस्थी त्याग, वन की राह ली थी ।

यह बात भी नहीं है कि गृहस्थाश्रम में ज्ञान होता ही न हो । जनकादि महात्मा गृहस्थाश्रम में ही ज्ञानी हुए थे । ज्ञान का कारण “वैराग्य” है । जो गृहस्थ होकर सदैव वैराग्य और विचार में मग्न रहता है, उसके ज्ञानी होने में सन्देह नहीं; पर जो सन्यासी होकर भी भोगों में राग रखता है, उसके अज्ञानी होने में संशय नहीं । “वैराग्य” ही आत्मज्ञान का साधन है । मनुष्य – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास – किसी आश्रम में क्यों न हो, बिना वैराग्य के ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना मोक्ष नहीं । जो पुरुष गृहस्थाश्रम में रहकर भी उसमें आसक्त नहीं होता, जल में कमल की तरह रहता है, उसकी मुक्ति में ज़रा भी सन्देह नहीं । एक दृष्टान्त इस मौके का हमें याद आया है, उससे पाठकों को अवश्य लाभ होगा –

राजा जनक और शुकदेव जी

एक बार व्यास जी ने शुकदेव जी से कहा कि तुम राजा जनक के पास जाकर उपदेश लो । शुकदेव जी जनक के द्वार पर गए । भीतर खबर कराई तो राजा ने कहला भेजा, कि द्वार पर ठहरो । शुकदेव जी तीन दिन तक द्वार पर खड़े रहे पर उन्हें क्रोध न आया । राजा ने क्रोध की परीक्षा करने के लिए ही उन्हें तीन दिन तक द्वार पर खड़ा रखा और चौथे दिन अपने पास बुलाया । वहाँ जाकर शुकदेव जी क्या देखते हैं कि राजा जनक सोने के जडाऊ सिंहासन पर बैठे हैं, सुन्दरी नवयौवना स्त्रियां उनके चरण दाब रही हैं और कुछ मोरछल और पंखे कर रही हैं । जगह-जगह विषय भोग या ऐशो आराम के सामान धरे हैं । सामने ही सुन्दर नर्तकियां नाच रही हैं । यह हाल देखकर शुकदेव जी के मन में राजा की ओर से घृणा हुई । उन्होंने मन में कहा – “नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली बात है । यह तो भोगों में आसक्त हैं; पिताजी ने इन्हें परम ज्ञानी क्यों कहा ?” राजा जनक शुकदेव जी के मन की बात ताड़ गए । दैवात उसी समय मिथिलापुरी में भीषण आग लग गयी । बाहर से दूत दौड़े आये और कहने लगे – “महाराज ! पुरी में आग लग गयी और और राजद्वार तक आ पहुंची है ।” शुकदेव जी मन में सोचने लगे कि मेरा दण्ड-कमण्डल बाहर रखा है, कहीं वह जल न जाय । उस समय राजा ने कहा –
अनन्तवत्तु मे वित्तं यन्मे नास्ति हि किञ्चन।
मिथिलायां प्रदग्धायां न मे दह्यति किञ्चन।।

मेरा आत्मरूप-धन अनन्त है । उसका अन्त कदापि नहीं हो सकता । इस मिथिला के जलने से मेरा तो कुछ भी नहीं जल सकता ।

राजा जनक के इस वाक्य से पदार्थों में उनकी आसक्ति नहीं – अनासक्ति ही साबित होती है । अगर कोई मनुष्य गृहस्थी में रहकर, स्त्री-पुत्र-धन प्रभृति में अनासक्त रहे, उनमें ममता न रक्खे, चाहे व्यवहार सब तरह करे, वह सच्चा ज्ञानी है, उसकी मोक्ष अवश्य होगी ।

ममता ही दुखों का कारण है । जिसकी किसी भी पदार्थ में ममता नहीं, उसे दुःख क्यों होने लगा ? उसकी ओर से, वह पदार्थ मिले तो अच्छा और न मिले तो अच्छा । बचा रहे तो भला और नष्ट हो जाय तो भला । जिसकी जिस चीज़ में ममता होती है, उसे उस चीज़ के नाश होने या उसके न मिलने से अवश्य दुःख होता है ।

कहा है
यस्मिन वस्तूनि ममता नायस्तत्र तत्रेव।
यत्नेवाहमुदासे मुदा स्वभाव संतुष्टः।।

जिस जिस चीज़ में मनुष्य की ममता है, वही-वही दुखी है और जिस जिससे उदासीनता है, वही सन्तुष्टता है । मतलब यह कि “ममता” ही दुखों का मूल है । घर-गृहस्थी में रहो और गृहस्थी के सारे कार्य-व्यवहार करो; पर किसी भी पदार्थ में ममता मत रक्खो । तुम्हारी ओर से कोई मर जाय तो शोक नहीं; धन-दौलत नष्ट हो जाय तो रंज नहीं, आ जाय तो ख़ुशी नहीं; इस तरह उदासीन भाव रक्खो । अगर इस तरह गृहस्थी में रहो, तो तुमसे बढ़कर ज्ञानी कौन है ? तुम्हें अवश्य मोक्षपद मिलेगा ।

निर्मोही पुरुष

एक मनुष्य के एक ही लड़का था । लड़का जवान हो गया था । उसकी शादी भी हो गयी थी । एक दिन पिता ने किसी उद्देश्य से शाम को एक सभा बुलाने का निमंत्रण दिया । दैवयोग से दोपहर में उसका पुत्र अचानक मर गया । उसने, उसकी लाश को बैठक में लिटाकर ऊपर से कपड़ा उढ़ा दिया और आप शान्त भाव से द्वार पर बैठकर हुक्का पीने लगा । इतने में सभा का समय हो गया; मित्र लोग आने लगे । उनमें से एक मित्र उसी बैठक में किसी ज़रूरी काम से गया । वहां एक लाश पड़ी देख उसने बाहर आकर पूछा – “यह क्या !”
उसने कहा – “भाई ! लड़का मर गया है पहले सभा का काम कर लें; तब सब मिलकर इसे शमशान घाट पर ले चलेंगे ।” मित्र लोग उस निर्मोही पिता की बात सुनकर चकित हो गए । उन्होंने कहा – “तुम तो अजब आदमी हो ! तुम्हें अपने इकलौते जवान पुत्र का भी रंज नहीं !” उसने कहा – “भाई ! मेरा इसका क्या नाता ? हम सब सराय के मुसाफिर हैं । पूर्वजन्म के कर्मवश एक दुसरे से मिल गए हैं । अपना-अपना समय होने से, अपनी-अपनी राह चले जा रहे हैं; इसमें रंज या शोक की बात ही क्या है ?” ऐसे ही मनुष्य, गृहस्थी में रहकर भी, जन्म-मरण के फन्दे से छूटकर, मोक्षलाभ करते और जीवन्मुक्त कहलाते हैं ।

काम करो, पर मन को ईश्वर में रक्खो

अगर भगवान् कृष्ण के कथनानुसार संसार के काम-धंधे किये जाएँ, तो भी हर्ज नहीं; पर मन को संसारी पदार्थों या विषय-भोगों से हटाकर एकमात्र भगवान् में लगाना चाहिए । दुनियावी काम करते रहने और मन को भगवान् में लगाए रहने से सिद्धि मिल सकती है ।

महाकवि रहीम कहते हैं –

दोहा

जो “रहीम” मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहि ।
जल में जो छाया परी, काया भीजत नाहिं ।।

सारा दारोमदार मन पर है । व्यभिचारिणी स्त्री घर के धन्धे किया करती है, पर मन को हर क्षण अपने यार में रखती है । गाय जहाँ-तहाँ घास चरती फिरती है, पर मन को अपने बच्चे में रखती है । स्त्रियां जब धान कूटती हैं, तब एक हाथ से मूसल चलाती हैं और दुसरे से ओखल के धान को ठीक करती जाती हैं । इसी बीच में यदि उनका बच्चा आ जाता है, तो उसे दूध भी पिलाती रहती हैं; किन्तु उनका ध्यान बराबर मूसल में ही रहता है । अगर ज़रा भी ध्यान टूटे तो हाथ के पलस्तर उड़ जाएँ । इसी तरह मनुष्य, यदि संसार के काम-धन्धे करता हुआ भी, ईश्वर में मन लगाकर उसकी भक्ति करता रहे, तो कोई हर्ज नहीं; उसे भगवत-दर्शन अवश्य होंगे । यद्यपि इस संसार में रहकर सिद्धि लाभ करना – है बड़े शूरवीरों का काम; तो भी इस तरह अनेक लोग, गृहस्थी में रहते हुए भी मोक्षपद पा गए हैं ।

ईश्वर प्राप्ति की सहज राह कौन सी है

गृहस्थी में रहने की अपेक्षा, गृहस्थी त्यागकर, वन के एकान्त भाग में रहकर, भगवत में मन लगाना अवश्य आसान है ।” गृहस्थी में रहने से मन विषय-भोगों की ओर दौड़ता ही है । स्त्री को देखने से काम जागता ही है; पर न देखने से मन नहीं चलता । पराशर ऋषि ने मत्स्यगन्धा देखी, तो उनका मन चलायमान हुआ । विश्वामित्र ने मेनका देखी तो उनका मन बिगड़ा । शिव ने मोहिनी देखी तो उनका मन चञ्चल हुआ । इसीलिए पहले के अनेक महापुरुष अपने-अपने घर त्यागकर वन में चले गए और वहाँ उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गयी । पर वन में जाकर भी जो मन को विषयों में लगाए रहते हैं, ममता को नहीं त्यागते; कामना को नहीं छोड़ते, वे गृहस्थी में भी बुरे हैं । वे धोबी के कुत्ते की तरह, न घर के न घाट के ।

त्याग में ही सुख है

जो धन-दौलत, राजपाट, स्त्री-पुत्र प्रभृति को त्यागकर वन में रहते हैं; किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं रखते, यहाँ तक की खाने के लिए पाव भर आटे की भी जरुरत नहीं रखते; जहाँ जगह पाते हैं, वही पड़े रहते हैं; जो मिल जाता है, उसी से पेट भर लेते हैं – वे सचमुच ही सुखी हैं ।

शंकराचार्य महाराज ने “मोहमुद्गर” में कहा है –
सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः शय्याभूतलमजिनंवासः ।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः कस्य सुखम न करोति वैराग्यः ।।

जो देवमन्दिर या पेड़ के नीचे पड़े रहते हैं, भूमि ही जिनकी चारपाई है, मृगछाला ही जिनका वस्त्र है, सारे विषय-भोग के सामान जिन्होंने त्याग दिए हैं; यानी वासना रहित हो गए हैं – ऐसे किन मनुष्यों को सुख नहीं है ? अर्थात ऐसे त्यागी सदा सुखी हैं ।

देह नहीं मन के वैराग्य से लाभ है

अनेक लोग गेरुए कपडे पहन लेते हैं, तिलक-छापे या राख लगा लेते हैं; पर उनका मन सदा भोगों में लगा रहता है । वे शरीर को वैरागियों सा बना लेते हैं; पर उनका मन भोगियों सा रहता है; इसलिए उनका जन्म वृथा जाता है । आजकल साधु-सन्यासी बनना एक प्रकार का रोज़गार हो गया है । जिनसे किसी तरह की मेहनत मज़दूरी नहीं होती, वे साधु वेश बनाकर लोगों को ठगते और घर मनीआर्डर भेजते हैं । बहुत से ढोंगी नगरों में आकर बड़े आदमियों के यहाँ डेरा लगा देते हैं, चेले-चेलियों से भेंट लेते हैं, नवयौवना सुन्दरियों को पास बिठाकर उपदेश देते हैं, अपने कदमों में रुपयों और अशर्फियों के ढेर लगवाते हैं, भला ऐसों का मन परमात्मा में लग सकता है ? जब विश्वामित्र और पराशर जैसे, हवा और पानी पर गुज़ारा करने वाले, मुनियों का मन स्त्रियों के देखते ही चञ्चल हो गया; तब रबड़ी-मलाई, मावा-मोहनभोग उड़ाने वालों का मन कैसे स्त्रियों पर न चलेगा ? ऐसा कौन है जिसका मन स्त्रियों ने खण्डित नहीं किया ?

कहा है
कोऽर्थान् प्राप्य न गर्वितो ?
विषयिणः कस्यापदो नागताः ?
स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः ?
को नामा राज्ञां प्रियः ?
कः कालस्य न गोचरान्तरगतः ?
कोऽर्थी गतो गौरवं ?
को वा दुर्जनवागुरा निपतितः
क्षेमेण यातः पुमान् ?

किसको धन पाकर गर्व नहीं हुआ ? किस विषयी पर आफत नहीं आयी ? पृथ्वी पर किसका मन नारी ने आकृष्ट नहीं किया ? कौन राजाओं का प्यारा हुआ ? कौन काल की नज़र से बचा ? किस मँगते का गौरव हुआ ? कौन सज्जन दुष्टों के जाल में फंसकर कुशल से रहा ?

सन्यासियों को स्त्री-दर्शन भी मना है

धर्मशास्त्र में लिखा है –
सम्भाषायेत् स्त्रियं नैव, पूर्वदृष्टां च न स्मरेत ।
कथाम् च वर्जयेत्तासां, नो पश्येल्लिखितामपि ।।
यस्तु प्रव्रजितो भूत्वा पुनः सेवेत्तु मैथुनम् ।
षष्ठिवर्षसहस्त्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ।।

यति को स्त्री से बात न करनी चाहिए, पहले की देखी हुई स्त्री की याद न करनी चाहिए तथा स्त्रियों की चर्चा भी न करनी चाहिए और स्त्री का चित्र भी न देखना चाहिए ।

जो सन्यासी होकर स्त्री के साथ मैथुन करता है, वह साठ हज़ार वर्ष तक विष्ठा का कीड़ा होता है । और विषयों से मन को रोकना उतना कठिन नहीं, जितना कि स्त्री से रोकना कठिन है; इसी से स्त्री का चित्र तक देखने की मनाही की है । जो ढोंगी, साधु-सन्यासी दुनियादारों के घर आते और स्त्रियों में बैठे रहते हैं, उनको उपदेश ग्रहण करना चाहिए ।

ढोंगी साधुओं के लिए अमूल्य उपदेश

बनावटी या ढोंगी साधुओं के सम्बन्ध में महात्मा तुलसीदास जी ने कहा है –
तन को योगी सब करें, मन को विरला कोय।
सहजे सब सिधि पाइये, जो मन योगी होय।।
जाके उर बर वासना, भई भास कछु आन।
तुलसी ताहि विडम्बना, केहि बिधि कथहि प्रमान।।
काह भयो बन बन फिरे, जो बनि आयो नाहिं।
बनते बनते बनि गयो, तुलसी घर ही माहिं।।
रामचरण परचे नहीं, बिन साधन पद-नेह।
मूँड़ मुड़ायो बादिहीं, भाँड़ भये तजि गेह।।
कीर सरस बाणी पढ़त, चाखत चाहें खाँड़।
मन राखत वैराग मँह, घर में राखत राँड़।।
जहाँ काम तहँ राह नहीं, जहाँ राम नहिं काम।
तुलसी दोनों नहिं मिलें, रवि रजनी इक ठाम।।
तब लगि योगी जगतगुरु, जब लगि रहे निरास।
जब आशा मन में जगी, जग गुरु योगी दास।।
(*व्याख्या ज्यादा होने के कारण यहाँ नहीं दी गयी है)

कोरा सन्यासी भेष धारना, नरक के सामान करना है

आजकल अनेक वेद विरुद्ध काम करने वाले, मनगढंत मत चलानेवाले, झूठ बोलनेवाले, बगुला और बिलाव की सी वृत्ति रखनेवाले फिरते हैं । गृहस्थों को चाहिए कि उनका बातों से भी सत्कार न करें । ठगों का सत्कार होने से ही ठग-साधू बढ़ रहे हैं । उनमें से कोई मूर्ती बनाकर पूजता और पुजवाता है । कोई अपने को कबीरपन्थी, कोई नानकपन्थी, कोई रामानुजी और कोई दादूपन्थी कहता है । इन पन्थों से कोई लाभ नहीं । जब तक “आत्मज्ञान” नहीं होता, तब तक सिद्धि या मोक्ष नहीं मिलती; अतः मन को सब तरफ से हटाकर, आत्मचिंतन में लगाना चाहिए । ढोंग करने से मनुष्य-जन्म वृथा जाता है । काम तो सब यतियों के से किये जाते हैं, कष्ट भी उन्ही की तरह उठाये जाते हैं; पर परिणाम में मिलता कुछ भी नहीं । बिना आत्मज्ञान या ब्रह्मविचार के कल्याण नहीं होता । गृहस्थों को भी चाहिए कि ऐसे ठगों का आदर-सम्मान न करें । ऐसे बनावटी साधु-सन्यासी आप नरक में जाते हैं और अपने शिष्यों को भी नरक में घसीट ले जाते हैं ।

किसी ने ठीक यही बात कविता में बड़ी खूबी से कही है
आत्मभेद बिन फिरें भटकते, सब धोखे की टाटी में।
कोई धातु में ईश्वर मानत, कोई पत्थर कोई माटी में।।
वृक्ष कोई जल में कोई, कोई जंगल कोई घाटी में।
कोई तुलसी रुद्राक्ष कोई, कोई मुद्रा कोई लाठी में।
भगत कबीर कोई कहे नानक, कोई शंकर परिपाटी में।
कोई नीमार्क रामानुज है, कोई बल्लभ परिपाटी में।।
कोई दादू कोई गरीब दासी, कोई गेरू रंग की हाटी में।
कहै “आज़ाद” भेष जो धारे, चले नरक की भाटी में।।

सन्यासी एक जगह न रहे

सन्यासी का मन किसी प्रीती में न फंस जाय अथवा किसी से उसकी मुहब्बत न हो जाय; इसलिए धर्मशास्त्र में सन्यासियों को एक दिन से ज्यादा एक गाँव में रहना तक मन लिखा है ।

कहा है
आबे दरिया बहे तो बेहतर,
इन्सां रवाँ रहे तो बेहतर।
पानी न बहे तो उसमें दुर्गन्ध आये,
खञ्जर न चले तो मोर्चा खाये।।

गिरिधर कवी कहते हैं

कुण्डलिया

(१)
बहता पानी निर्मला, पड़ा गन्ध सो होय ।
त्यों साधू रमता भला, दाग लागे न कोय ।।
दाग लागे न कोय, जगत से रहे अलहदा ।
राग-द्वेष युग प्रेत, न चित को करें बिच्छेदा ।।
कहा “गिरिधर” कविराय, शीट उष्णादिक सहता ।
होय न कहुँ आसक्त, यथा गंगाजल बहता ।।

(२)
रहने सदा इकन्त को, पुनि भजनो भगवन्त ।
कथन श्रवण अद्वैत को, यही मतो है सन्त ।।
यही मतो है सन्त, तत्व को चितवन करनो ।
प्रत्येक ब्रह्म अभिन्न, सदा उर अन्तर धरनो ।।
कहा “गिरिधर” कविराय, बचन दुर्जन को सहनो ।
तज के जन-समुदाय, देश निर्जन में रहनो ।।

सन्यासियों के कर्तव्य कर्म

यति पञ्चक से

वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो,
भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः।
विशोकमन्तः करणे रमन्तः,
कौपीनंवन्तः खलु भाग्यवन्तः।।

(२)
मूलं तरो: केवलमाश्रयन्तः,
पाणिद्वयं भोक्तुममन्त्रयन्तः।
कत्थामिव श्रीमपि कुत्सयेतः,
कौपीनंवन्तः खलु भाग्यवन्तः।।

(३)
देहादिभावं परिवर्त्तयन्तः,
आत्मानमात्मन्यवलोकयन्तः।
नान्तं न मध्यं न वहिः स्मरन्तः,
कौपीनंवन्तः खलु भाग्यवन्तः।।

(४)
स्वानन्दभावे परितुष्टिमन्तः,
सुशान्त सर्वेन्द्रियतुष्टिमन्तः।
अहर्निशं ब्रह्मसुखे रमन्तः,
कौपीनंवन्तः खलु भाग्यवन्तः।।

(५)
पञ्चाक्षरं पावन मुच्चरन्तः,
पतिं पशूनां हृदि भावयन्तः।
भिक्षाशिनो दिक्षु परिभ्रमन्तः,
कौपीनंवन्तः खलु भाग्यवन्तः।।

भावार्थ:
(१)
वेदान्त वाक्य या उपनिषदों में अथवा ब्रह्मविद्या में मन लगाए रहनेवाला, केवल भिक्षा के अन्न से सन्तुष्ट रहनेवाला, मन को शोक-ताप शून्य करके सन्तुष्ट रहेवाला और कोपीन पहनने वाला योगी भाग्यवान है ।

(२)
केवल वृक्ष के मूल में आश्रय लेने वाला, दोनों हाथों को भोजन के लिए न लगाने वाला, आत्मश्लाघा की तरह लक्ष्मी की निन्दा करनेवाला अर्थात अपनी तारीफ और धन से दूर रहनेवाला एवं कोपीन धारण करनेवाला योगी सुखी है ।

(३)
सुखासक्ति, वासना को त्यागनेवाला, अपने स्वरुप में औरों को देखनेवाला, अन्त, मध्य और पुत्र कलत्र आदि को न याद करनेवाला एवं कोपीन बाँधनेवाला यति भाग्यवान है ।

(४)
अपने आत्मा में ही आनन्दमग्न रहनेवाला, आँख कान नाक जीभ प्रभृति इन्द्रियों के विषय-सुखों के त्यागने से सन्तुष्ट और आत्मसाक्षात्कार से खुश रहनेवाला और दिन-रात ब्रह्म के दर्शनों से पैदा हुए आनन्द में रहनेवाला तथा कोपीन पहनने वाला योगी सुखी है ।

(५)
“शिवाय नमः” इस पांच अक्षर के, आत्मा को शुद्ध करनेवाले, मन्त्र का उच्चारण करनेवाला, ह्रदय में पशुपति शङ्कर की भावना करता हुआ, भिक्षान्न पर गुज़ारा करके, दिशाओं में घूमनेवाला और कोपीन धारण करनेवाला योगी भाग्यवान है ।

यतिपञ्चक का फल

वास्तविक महापुरुष होने की इच्छा रखनेवालों को उपरोक्त “यति पञ्चक” कण्ठाग्र कर लेना और इस पर अमल करना चाहिए; तब उन्हें निश्चय ही शान्ति और सिद्धि मिलेगी ।

छप्पय

शतहि वर्ष की आयु में, रात में बीतत आधे।
ताके आधे आध, वृद्ध बालकपन साधे।।
रहे यहै दिन, आधि व्याधि गृहकाज समोये।
नाना विधि बकवाद करत, सबहिन को खोये।।
जल की तरंग बुदबुद सदृश, देह खेह ह्वै जात है।
सुख कहो कहाँ इन नरन कौ, जासों फूल गात है।।
29/07/19, 8:50 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: *अरे भज हरेर्नाम, क्षेमधाम क्षणे क्षणे।
बहिस्सरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्त्तते।।
29/07/19, 9:19 pm – Karunakar Tiwari Kanpur Shastra Gyan: 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
29/07/19, 9:39 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ८१,८२

वार्ताकं कटु तिक्तोष्णं मधुरं कफवातजित्। सक्षारमग्निजननं हृद्य रुच्यमपित्तलम्॥८१॥

बैंगन का शाक- यह दो प्रकार का होता है–
१. कटु तथा तिक्त, २. मधुर ।

दोनों प्रकार के बैंगन उष्णवीर्य, कफ तथा वातनाशक होते है। इनमें कुछ क्षार अंश भी होता है। ये जठराग्नि को बढ़ाने वाले, हृदय के लिए हितकर, रुचिकर तथा कुछ पित्तकारक भी होते हैं।

वक्तव्य- ‘अपित्तलम्’ यहां पित्त शब्द के साथ जो नञ्समास किया गया है, वह इषत अर्थ में है, ऐसा समझना चाहिए। श्री हेमाद्रि कहते है- ‘अपित्तलत्वं बालपक्वञ्यतिरेकेण’। यहां श्री हेमाद्रि ने सुश्रुतसम्मत व्याख्यान् किया है। देखें- जीर्णं सक्षारपित्तलम्। (सु.सू. ४६/२६९)

करीरमाध्मानकरं कषायं स्वादु तिक्तकम्। कोशातकावल्गुजकौ भेदिनावग्निदीपनौ॥८२॥

करीर का साग– यह अध्मान(अफरा) कारक होता है, रस मे कषाय, मधु तथा तिक्त होता है।

तरोई तथा बाकुची का शाक- ये दोनों बंधे हुए मल का भेदन करने वाले तथा अग्निदीपक होते है।
29/07/19, 10:26 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: धन्य हैं आप इतना लिखते हैं , सिर्फ इसलिये की हम सब पड़ सके ।🙏🙏
29/07/19, 10:26 pm – Dayadhankr Soryvanshi Hts, Akhilesh Frnd: 🙂
29/07/19, 10:27 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: अगर यहाँ लोग पढ़ रहे हैं, तो मेहनत सफल है 🙂
29/07/19, 10:29 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: आप सभी धन्यवाद के पात्र है , भाग्यशाली हैं हम जो इस ग्रुप का हिस्सा है
30/07/19, 7:10 am – Abhinandan Sharma:
30/07/19, 10:30 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: लेख लंबा है, लेकिन रोचक इतना है कि आद्योपांत पढ़ गया.

बहुत-बहुत धन्यवाद. लोगों को इतना वक्त कहां कि पुस्तकें निकाल कर पढ़ लें; ग्रुप ने आसान बना दिया. बेहतरीन ज्ञानवर्धन हम सबों का हो रहा है, ग्रुप को सफल कहा जा सकता है. सभी सदस्य भी अनुशासित हैं.
30/07/19, 11:11 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

तब ते जीव भयउ संसारी ।
छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।

श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई।
छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।

तभी से जीव संसारी( जन्मने-मरने वाला ) हो गया ।
अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है।
वेदों और पुराणों ने बहुत से उपाय बतलाये हैं।
पर वह ग्रंथि छूटती नहीं वरन् अधिकाधिक उलझती ही जाती है ।।116-3।।

जीव ह्रदयँ तम मोह बिसेषी।
ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।।

अस संजोग ईस जब करई।
तबहुं कदाचित सो निरुअरई।।

जीव के हृदय में अज्ञान रूपी अन्धकार विशेष रूप से छा रहा है,
इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती,
छूटे तो कैसे?
जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग ( जैसा आगे वर्णित किया जा रहा है ) उपस्थित कर देते हैं तब भी कदाचित् ही वह ( ग्रंथि) छूट पाती है ।।116-4।।
30/07/19, 11:22 am – : 🌹🌿सुंदर कथा.🌿🌹

कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नि ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है।
आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं।
शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा।

भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जीकी क्रपा।
अगर कोई अच्छा मूल्य मिला,
तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा।

पत्नि बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले,
तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना।
घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे।
पर बच्चे अभी छोटे हैं,
उनके लिए तो कुछ ले ही आना।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए।

बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है।
तेरा परिवार बसता रहे।
ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा।
दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे।

भक्त नामदेव जी- दो चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?

फकीर ने जितना कपड़ा मांगा,
इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था।
और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया।

दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे।
फिर पत्नि की कही बात,
कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है।
दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना।

अब दाम तो क्या,
थान भी दान जा चुका था।
भक्त नामदेव जी एकांत मे पीपल की छाँव मे बैठ गए।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
जब सारी सृष्टि की सार पूर्ती वो खुद करता है,
तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा।
और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन गए।

अब भगवान कहां रुकने वाले थे।
भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी।

अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया।

नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है?

नामदेव का घर यही है ना?
भगवान जी ने पूछा।

अंदर से आवाज हां जी यही आपको कुछ चाहिये
भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर मे कुछ भी नही है फिर ह्र्दय मे देने की सहायता की जिज्ञयासा हैl

भगवान बोले दरवाजा खोलिये

लेकिन आप कौन?

भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी?
जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक,
वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl

ये राशन का सामान रखवा लो।
पत्नि ने दरवाजा पूरा खोल दिया।
फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ,
कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई।
इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है?
मुझे नहीं लगता।
पत्नी ने पूछा।

भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है।
जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया।
और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है।
जगह और बताओ।
सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में।

शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था।

समान रखवाते-रखवाते पत्नि थक चुकी थीं।
बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे।
वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़।
कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते।
उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे।

भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे,
पर सामान आना लगातार जारी था।

आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना।
हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकी वो अभी तक घर नहीं आए हैं।

भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं।
अब परिजन नामदेव जी को देखने गये

सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे,
जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं।

इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते
उनकी पत्नी बोल पड़ीं- कुछ पैसे बचा लेने थे।
अगर थान अच्छे भाव बिक गया था,
तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?

भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए।
फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया,
कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है।

पत्नि ने कहा अच्छी सरकार को आपने थान बेचा और वो तो समान घर मे भैजने से रुकता ही नहीं था।
पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया।
उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे।

भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले- ! वो सरकार है ही ऐसी।
जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं।
उसकी बख्शीश कभी भी खत्म नहीं होती।
वह सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है।

जय जय
🌻🌻कृष्णं वन्दे🌻🌻
🌹🌾🌾🌾🌹
30/07/19, 11:53 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: Rekha please sb samjho yahan es tarah ke message nahi kiye jate hai .
Net se ya kahin se bhi kuch nahi hai yahan sirf hmare vedo ko pdkr hi likhte hai sabhi
30/07/19, 11:54 am – Aniket Gupta Gorakhpur Shastra Gyan: राम राम जी
30/07/19, 11:55 am – Aniket Gupta Gorakhpur Shastra Gyan: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
30/07/19, 11:57 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: ये इस ग्रुप के नियम हैं कृपया सभी पड़ लीजिये
30/07/19, 12:08 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
मनुस्मृति
द्वितीय अध्याय

चोदितो गुरुणा नित्यं अप्रचोदित एव वा ।
कुर्यादध्ययने यत्नं आचार्यस्य हितेषु च । । २.१९१ । ।

शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च ।
नियम्य प्राञ्जलिस्तिष्ठेद्वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् । । २.१९२ । ।

नित्यं उद्धृतपाणिः स्यात्साध्वाचारः सुसंवृतः ।
आस्यतां इति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः । । २.१९३ । ।

हीनान्नवस्त्रवेषः स्यात्सर्वदा गुरुसन्निधौ ।
उत्तिष्ठेत्प्रथमं चास्य चरमं चैव संविशेत् । । २.१९४ । ।

प्रतिश्रावणसंभाषे शयानो न समाचरेत् ।
नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः । । २.१९५ । ।

अर्थ

गुरु रोज कहे ना कहे,पर अध्ययन व आचार्य के हित के लिए सदा यत्न करना चाहिए।शरीर वाणी ,बुद्धि,ज्ञानेन्द्रिय व मन का संयम करके गुरुमुख की ओर सदा देखते हुए रहा करें। ओढ़ने के वस्त्र से दाहिना हाथ सदा बाहर रखें और गुरुआज्ञा से सामने बैठे। गुरु के पास में सदा सादा वस्त्र धारण करें व सादा भोजन ग्रहण करे। गुरु के पहले जागे व बाद में सोए। ब्रह्मचारी सोते जागते, बैठते उठते,खाते पीते, खड़े बैठे, मुँह फेरकर खड़ा हुआ गुरु से बातचीत ना करे।।
30/07/19, 12:09 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: हरी ॐ
30/07/19, 12:22 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
30/07/19, 1:03 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: अंतिम श्लोक का अर्थ कृपया थोड़ा विस्तार में बताने की कृपा करें
30/07/19, 3:17 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

अष्टमे सिद्धयश्चैव नवमे निधयो नव।
दशमे दशमूर्तिश्च छाया चैकादशे भवेत्।२२६।

द्वादशे हंसचारश्च गङ्गामृतरसं पिबेत्।
आनखाग्रं प्राणपूर्णे कस्य भक्ष्यं च भोजनम्।२२७।

एवं प्राणविधिः प्रोक्तः सर्वकार्यफलप्रदः।
ज्ञायते गुरुवाक्येन न विद्याशास्त्रकोटिभिः।२२८।

प्रातःश्चन्द्रो रविः सायं यदि दैवान्न लभ्यते।
मध्याह्नमध्यरात्रश्च परतस्तु प्रवर्त्तते।२२९।

दूरयुद्धे जयीचन्द्रः समासन्ने दिवाकरः।
वहन्नाड्यागतः पादः सर्वसिद्धिप्रदायकः।२३०।

अर्थ- यदि श्वास की लम्बाई आठ अंगुल कम हो जाय, तो साधक को आठ सिद्धियों की प्राप्ति होती है, नौ अंगुल कम होने पर नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं, दस अंगुल कम होने पर अपने शरीर को दस विभिन्न आकारों में बदलने की क्षमता आ जाती है और ग्यारह अंगुल कम होने पर शरीर छाया की तरह हो जाता है, अर्थात् उस व्यक्ति की छाया नहीं पड़ती है।२२६।

श्वास की लम्बाई बारह अंगुल कम होने पर साधक अमरत्व प्राप्त कर लेता है, अर्थात् साधना के दौरान ऐसी स्थिति आती है कि श्वास की गति रुक जाने के बाद भी वह जीवित रह सकता है, और जब साधक नख-शिख अपने प्राणों को नियंत्रित कर लेता है, तो वह भूख, प्यास और सांसारिक वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।२२७।

ऊपर बताई गई प्राण-विधियाँ सभी कार्यों में सफलता प्रदान करती हैं। लेकिन प्राण को नियंत्रित करने की विधियाँ गुरु के सान्निध्य और कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है, विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन मात्र से नहीं।२२८।

यदि सबेरे चन्द्र स्वर और सायंकाल सूर्य स्वर संयोग से न प्रवाहित हों, तो वे दोपहर में या अर्धरात्रि में प्रवाहित होते हैं।२२९।

दूर देश में युद्ध करनेवाले को चन्द्र स्वर के प्रवाहकाल में युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहिए और पास में स्थित देश में युद्ध करने की योजना हो तो सूर्य स्वर के प्रवाहकाल में प्रस्थान करना चाहिए। इससे विजय मिलती है। अथवा प्रस्थान के समय जो स्वर चल रहा हो, वही कदम पहले उठाकर युद्ध के लिए प्रस्थान करने से भी वह विजयी होता है।२३०।

31/07/19, 1:03 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कविता

मूसे पर सांप राखै, सांप पर मोर राखै, बैल पर सिंह राखै, वाकै कहा भीती है |
पूतनिकों भूत राखै, भूत कों बिभूति राखै, छमुख कों गजमुख यहै बड़ी नीति है |
कामपर बाम राखै, बिषकों पीयूष राखै, आग पर पानी राखै सोई जग जीती है |
‘देविदास’ देखौ ज्ञानी संकर की साबधानी, सब बिधि लायक पै राखै राजनीति है |
31/07/19, 2:41 am – Pitambar Shukla: 🙏🙏🙏🙏
31/07/19, 11:29 am – LE Nisha Ji D706: बहुत खूब
31/07/19, 11:30 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏🙏🙏
31/07/19, 11:32 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई।
जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।।

जप तप ब्रत जम नियम अपारा।
जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।

श्री हरि की कृपा से यदि सात्विकी श्रद्धा रूपी सुन्दर गौ हृदय रूपी घर में आ कर बस जाय;
असंख्य जप,तप, व्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार ( आचरण) , जो श्रुतियों ने कहे हैं,।।

तेइ तृन हरित चरै जब गाई।
भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।।

नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा।
निर्मल मन अहीर निज दासा।।

उन्हीं( धर्माचार रूपी) हरे तृणों ( घास ) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भाव रूपी छोटे बछड़े को पा कर वह पेन्हावे।
निवृत्ति ( सांसारिक विषयों से और प्रपंच से हटना )
नोई ( गौ के दुहते समय पिछले पैर बांधने की रस्सी ) है,
विश्वास ( दूध दुहने का ) बरतन है,
निर्मल ( निष्पाप ) मन जो स्वयं अपना दास है( अपने वश में है ), दुहने वाला अहीर है।।116-6।।
31/07/19, 1:52 pm – Abhinandan Sharma:
31/07/19, 4:36 pm – Dayadhankr Soryvanshi Hts, Akhilesh Frnd: 👏🏻
31/07/19, 5:16 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 108

ब्रह्मज्ञानविवेकिनोऽमलधियः कुर्वन्त्यहो दुष्करं
यन्मुञ्चन्त्युपभोगकांचनधनान्येकान्ततो निःस्पृहाः ।
न प्राप्तानि पुरा न सम्प्रति न च प्राप्तौ दृढप्रत्ययो
वाञ्छामात्रपरिग्रहाण्यपि परं त्यक्तुं न शक्त वयम् ।। १०८ ।।

अर्थ:
उन बुद्धिमान, निर्मल ज्ञान वाले, ब्रह्मज्ञानियों का कठिन व्रत देखकर हमें बड़ा विस्मय होता है, जो विषय-भोग, धन-दौलत, सोना-चाँदी और स्त्री-पुत्र प्रभृति को एकदम से त्याग देते हैं और फिर उनकी इच्छा नहीं रखते ।

सत् और असत् का विचार करनेवाले देह और आत्मा को अलग अलग समझनेवाले इस संसार को स्वप्न मानने वाले, इस जगत की झूठी चमक-दमक पर मोहित न होनेवाले पुरुह “ज्ञानी” कहलाते हैं । जिनके सामने माया का पर्दा हट जाता है, जिन्हे देह के नाशमान और आत्मा के नित्य और अविनाशी होने का ज्ञान हो जाता है, उन्हें परमात्मा दीखने लगता है । उन्हें परमात्मा के ध्यान में जो आनन्द आता है, उसकी बराबरी त्रिभुवन के सारे सुखैश्वर्य भी नहीं कर सकते । ऐसे ज्ञानी इस जगत से नाता क्यों जोड़ने लगे ? जब तक उन्हें ज्ञान नहीं होता; माया का पर्दा उनकी आँखों के सामने से नहीं हटता, शरीर और आत्मा का भेद मालूम नहीं होता, तभी तक वे इस संसारी जाल में फंसे रहते हैं; जहाँ उन्हें ज्ञान हुआ और उन्होंने संसार की असलियत समझी, तहाँ फ़ौरन ही इसे छोड़ा । एकबार छोड़कर, फिर इसकी इच्छा वे इसलिए नहीं करते, कि वे समझबूझकर इसे छोड़ते हैं; जबरदस्ती या किसी के बहकाने से अथवा दुकानदारी के लिए तो वे इसे छोड़ते ही नहीं, जो उनकी लालसा इनमें बनी रहे ।

जो लोग रूपया पैदा करने या पुजने के लिए घर-गृहस्थी को छोड़ते हैं, उनका मन संसार के विषय-भोगों में लगा रहता है । वे न इधर के रहते हैं न उधर के ही । वे “धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का” अथवा “खुदही मिला न विसाले सनम” या “दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम ” वाली कहावत चरितार्थ करते हैं । ऐसे कच्चे त्यागियों के सम्बन्ध में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं –
इत कुल की करनी तजे, उत न भजे भगवान्।
तुलसी अधवर के भये, ज्यों बघूर को पान।।

अर्थात इधर तो वे अपना घरबार और स्त्री-पुत्र तथा अपने कुल के कामों को छोड़ बैठते हैं और उधर भगवान् को भी नहीं भजते । वे हवा के बवण्डर या भभूले में चक्कर खानेवाले पत्ते की तरह अधर में ही चक्कर खाते रहते हैं

अगर वे अपने घर में ही रहते, तो अपने कुल-वर्ण के अनुसार कर्म करते और और महात्माओं की सङ्गति और सेवा-टहल से संसार की असारता, अपने नातेदारों की स्वार्थपरता एवं ईश्वर की महिमा का ज्ञान लाभ करके, ईश्वर की भक्ति करते हुए, प्रह्लाद, जनक और अम्बरीष प्रभृति की तरह, घर में रहकर ही सिद्धि लाभ करते । नादान लोग बिना पूर्ण वैराग्य और ज्ञान के, घर गृहस्थी को छोड़कर वन में चले तो जाते हैं; पर उनकी वासना – ममता अपने घरवालों अथवा पराई स्त्रियों या धन-दौलत में बनी रहती है; इसलिए वे संसारियों की निन्दा के भय से लुक-छिपकर विषयों को भोगते हैं और परमात्मा में मन नहीं लगाते । इस तरह उनके लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं – वे न तो संसारी सुख ही भोग सकते हैं और न स्वर्ग या मोक्ष ही लाभ कर सकते हैं । सारांश यह, मनुष्य को संसार से पूरी विरक्ति होने पर ही संन्यास लेना चाहिए और एक बार त्यागी बनकर फिर अत्यागी न बनाना चाहिए । त्यागी होकर विषयों में लालसा रखनेवाले महानीच हैं । उनकी दोनों जहाँ में महान दुर्गति होती है ।

प्रत्येक मनुष्य को समझना चाहिए कि यह संसार वास्तव में ही मायाजाल है । कोई किसी का नहीं है । सब अपना अपना मतलब गांठते हैं । मतलब नहीं, तो कोई किसी का नहीं ।

तुलसीदास जी कहते हैं –
तुलसी स्वारथ के सगे, बिन स्वारथ कोई नाहिं।
सरस वृक्ष पंछी बसें, नीरस भये उड़ जाहिं।।

सभी स्वार्थ के सगे हैं; बिना स्वार्थ कोई किसी का नहीं । जब तक वृक्ष में फल रहते हैं, तभी तक पंछी उस पर रहते हैं; जहाँ वृक्ष फलहीन हुआ कि वे उसे छोड़कर और जगह उड़ जाते हैं । यही हाल संसार का है । सब खड़े दम का मेला है । सभी जीते जी के साथी हैं; मरते ही साड़ी मुहब्बत उड़ जाती है । जो स्त्री अर्द्धाङ्गी कहलाती है, जो पुरुष को अपना प्राण प्यारा कहती है, उसे गले से लगाती है और उसके लिए जान देने तक को तैयार रहती है, दम निकलते ही उससे डरने या भय खाने लगती है । अगर वह रोटी भी है, तो अपने सुखों के लिए रोती है; उसके लिए नहीं रोती । और कुटुम्बी – माता पिता भाई बहिन इत्यादि भी दम निकलते ही कहने लगते हैं – “जल्दी उठाओ, अब घर में रखना ठीक नहीं।”

इस मौके की एक कहानी हमें याद आयी है, उसे हम पाठकों के उपकारार्थ नीचे लिखते हैं –

सब जीते जी के साथी हैं

एक सेठ का लड़का किसी महात्मा के पास जाया करता था । सेठ को भय हुआ कि कहिं पुत्र वैराग्य न ले ले; इसलिए उसने पुत्र वधु से कला दिया कि वह पुत्र को हर तरह से अपने वश में कर ले; जिससे महात्मा की सङ्गति छूट जाय । लड़के की स्त्री उस दिन से उसकी सेवा-टहल और भी ज्यादा करने लगी; हाथों में उसका मन रखने लगी । लड़का जब घर से बाहर जाता, तभी वह कहती – “आपका वियोग मुझसे सहा नहीं जाता । क्षणभर में ही मेरे प्राण अकुलाने लगते हैं; अतः आप मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाया करें । लड़के ने महात्मा के पास जाना काम जरूर कर दिया; पर कभी कभी वह चला ही जाता था । एक दिन वह बहुत दिन बीच में देकर पहुंचा । महात्मा ने कहा – “भाई ! आजकल तुम आते क्यों नहीं ?” उसने कहा – “मेरी स्त्री मुझे बहुत ही प्यार करती है । उसे मेरे बिना क्षणभर भी कल नहीं पड़ती; इसी से आना नहीं होता; महात्मा ने कहा – “भाई ! ये सब झूठी बातें हैं । संसार में कोई किसी को नहीं चाहता । अगर तुमको विश्वास न हो तो परीक्षा कर लो ।”
सेठ के पुत्र ने परीक्षा करना ही उचित समझा । महात्मा ने उसे प्राणायाम या सांस चढाने की क्रिया सिखा दी । जब वह प्राणायाम क्रिया में पक्का हो गया, तब महात्मा ने कहा – “आज तू घर जाकर कहना, मेरे पेट में बड़ा दर्द है । इसके बाद सांस चढ़कर पड़ जाना; पर पहले यह कह देना कि यदि मेरी मृत्यु हो जाय, तो अमुक महात्मा को बुलाये बिना मुझे मत जलाना ।” लड़का घर पहुंचा और पेट के दर्द के मारे चिल्लाने लगा । कुछ देर बाद ज़मीन पर गिर पड़ा और माता पिता से कहने लगा – “यदि मैं मर जाऊं; तो बिना अमुक महात्मा को बुलाये और दिखाए मुझे मत जलाना ।” इसके बाद उसने सांस चढ़ा लिया । घरवालों ने उसे देखा तो बोले -” अब इसमें दम नहीं, काठी-कफ़न लाओ और शमशान की तयारी करो ।” इतने में उसकी माँ बोली -“पुत्र ने अमुक महात्मा को बुलाने को कहा था, इसलिए पहले उन्हें बुलवाओ ।” सेठ ने महात्मा के पास आदमी भेजा । वह तत्काल चले आये । उन्हें देखते ही सेठ बोला – “मैं मर जाऊं तो हानि नहीं; पर मेरा पुत्र जी उठे यही मेरी इच्छा है ।” यही बात सेठानी और लड़के की स्त्री ने भी कही । महात्मा ने कहा – “मैं एक पुड़िया देता हूँ । तुममे से जो कोई इसे खा लेगा, वह मर जाएगा और लड़का जी उठेगा ।” इस बात के सुनते ही, सब लगे बगलें झाकने और बहाना करने । तब महात्मा ने कहा – “खैर तुम सब नहीं खाते तो मैं ही खा लेता हूँ ।” यह कहकर महात्मा ने पुड़िया खा ली और क्रिया द्वारा सांस उतार उसे होश में कर दिया । लड़के ने सारा हाल सुना । सुनते ही उसे संसारी मुहब्बत का सच्चा हाल मालूम हो गया और उसने घर छोड़ वैराग्य ले लिया । देखिये ! कुटुम्बियों की प्रीती का चित्र महात्मा सुन्दरदास जी कैसी उम्दगी के साथ खींचते हैं –
(१)
माता पिता युवती सुत बान्धव।
लागत है सब कूँ अति प्यारो।।
लोक कुटुम्ब खरो हित राखत।
होइ नहीं हमते कहुँ न्यारो।।
देह-सनेह तहाँ लग जानहु।
बोलत है मुख शब्द उचारो।।
“सुन्दर” चेतन शक्ति गयी जब।
बेगि कहें घर बार निकारो।।

(२)
रूप भलो तबही लग दीसत।
जौं लग बोलत-चालत आगे।।
पीवत खात सुनै और देखत।
सोइ रहे उठि के पुनि जागै।।
मात पिता भइया मिली बैठत।
प्यार करे युवती गल लागे।।
“सुन्दर” चेतन शक्ति गयी जब।
देखत ताहि सबै डरि भागे।।

माँ, बाप, स्त्री, पुत्र और नातेदार सबको पुरुष बहुत ही प्यारा लगता है । सब लोग उससे खूब मुहब्बत करते और चाहते हैं कि यह हमसे अलग न हो । लेकिन यह देह की मुहब्बत उसी समय तक है, जब तक की प्राणी अच्छी तरह बोलता चालता है । “सुन्दरदास जी” कहते हैं – जहाँ शरीर में से चेतन शक्ति – आत्मा निकल गयी कि वही सब कहने लगते हैं – “इसे जल्दी घर से बाहर निकालो।” जब तक प्राणी बोलता, चालता, खाता, पीता, सुनता और देखता है एवं सोकर फिर जाग उठता है; तभी तक माँ-बाप और भाई पास बैठते हैं और युवती गले से लगकर प्यार करती है । “सुन्दरदास जी” कहते हैं – ज्योंही चेतन शक्ति शरीर से निकल कर बाहर गयी कि लोग उसे देखते ही डर कर भागने लगते हैं ।

जिस संसार की ऐसी गति है जो नीरा माया-जाल या गोरखधन्धा है, जिसमें कुछ भी सार-तत्व नहीं है, जिसमें स्वार्थपरता या खुदगर्ज़ी कूट-कूट कर भरी है, उस पर मूर्ख ही लट्टू होते हैं । जो समझदार हैं वे उसके जाल में नहीं फंसते, अगर फंस भी जाते हैं, तो सबको छोड़-छोड़कर अलग हो जाते हैं । जितने विद्वान और महात्मा हुए हैं सभी ने कहा – “इस संसार के साथ दिल मत लगाओ; इसके बनाने वाले के साथ दिल लगाओ । इसी में आपकी भलाई और आपका कल्याण है । उसकी शरण में जाने वाले के पास दुःख और क्लेश नहीं फटकते । वह अपने शरणार्थी की सदैव रक्षा करता है । कौरव-सभा में उसी ने द्रौपदी की लाज रखी थी । जो उसे याद करता है, उसकी खबर वह अवश्य लेता है ।

कहा है-
जो तुमको सुमिरत जगदीशा, ताहि आपनो जानत ईशा ।
अभिमानी से हो तुम दूरा, सतवादी के जीवनमूरा
सुखी मीन जहँ नीर अगाधा, जिमि हरशरण न एकौ बाधा।।

दोहा

बड़े विवेकी तजत हैं, सम्पत्ति सुत पितु मात।
कंथा और कोपीन हूँ, हमसे तजो न जात।।
31/07/19, 5:41 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

यात्रारम्भे विवाहे च प्रवेशे नगरादिके।
शुभकार्याणि सिद्धयन्ति चन्द्रचारेषु सर्वदा।२३१।

अयनतिथिदिनेशैःस्वीयतत्त्वे च युक्ते यदि वहति कदाचिद्दैवयोगेन पुंसाम्।
स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्रस्वरेण प्रभवति नहि विघ्नं केशवस्यापि लोके।२३२।

‘जीवं रक्ष जीवं रक्ष’ जीवाङ्गे परिधाय च।
जीवो जपति यो युद्धे जीवं जयति मेदिनीम्।२३३।

भूमौ जले च कर्त्तव्यं गमनं शान्तकर्मसु।
वह्नौ वायौ प्रदीप्तेषु खे पुनर्न भयेष्वपि।२३४।

अर्थ- यात्रा, विवाह अथवा किसी नगर में प्रवेश के समय चन्द्र स्वर चल रहा हो, तो सदा सारे कार्य सफल होते हैं, ऐसा स्वर-वैज्ञानिकों का मत है।२३१।

सूर्य अथवा चन्द्रमा के अयन के समय यदि अनुकूल तत्त्व प्रवाहित हो रहा हो, कुम्भक करने मात्र से अर्थात् साँस को रोक लेने मात्र से बिना युद्ध किए विजय मिलती है, चाहे शत्रु कितना भी बलशाली क्यों न हो।२३२।

जो व्यक्ति अपनी छाती को कपड़े से ढककर ‘जीवं रक्ष’ मंत्र का जप करता है, वह विश्व-विजय करता है।२३३।

जब स्वर में पृथ्वी या जल तत्त्व का उदय हो तो वह समय चलने-फिरने और शांत प्रकृति के कार्यों के उत्तम होता है। वायु और अग्नि तत्त्व का प्रवाह काल गतिशील और कठिन कार्यों के उपयुक्त होता है। लेकिन आकाश तत्त्व के प्रवाहकाल में कोई भी कार्य न करना ही उचित है।२३४।

01/08/19, 6:49 am – Abhinandan Sharma: प्राणायाम ऐसे करना चाहिए कि नाक के आगे हाथ से सत्तू रखने पर, वो न हिले । यहां से समझा जा सकता है कि सांस की लंबाई, कितनी कम होनी चाहिए।
01/08/19, 11:43 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

परम धर्म मय पय दुहि भाई।
अवटै अनल अकाम बनाई।।

तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै।
धृति सम जावनु देइ जमावै।।

हे भाई! इस प्रकार ( धर्माचार में प्रवृत्त सात्विकी श्रद्धा रूपी गौ से भाव, निवृत्ति और वश में किये हुए निर्मल मन की सहायता से ) परम धर्म मय दूध दुह कर उसे निष्काम भाव रूपी अग्नि पर भली भाँति औटावे।
फिर क्षमा और संतोष रूपी हवा से उसे ठंडा करे और धैर्य तथा शम (मन का निग्रह ) रूपी जामन देकर उसे जमावे।।116-7।।

मुदिताँ मथै बिचार मथानी।
दम अधार रजु सत्य सुबानी।।

तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता।
बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।

तब मुदिता ( प्रसन्नता ) रूपी कमोरी में तत्व विचार रूपी मथानी से दम ( इंद्रिय – दमन) के आधार पर ( दम रूपी खंभे आदि के सहारे ) सत्य और सुन्दर वाणी रूपी रस्सी लगा कर उसे मथे और मथ कर तब उसमें से निर्मल, सुन्दर और अत्यंत पवित्र वैराग्य रूपी मक्खन निकाल ले।।116-8।।
01/08/19, 12:08 pm – FB Anand Kumar Patna Shastra Gyan: Aap log jo series me Vairaagya Shatak etc likhte hai, wo kisi site par publish hota hai??
01/08/19, 12:11 pm – Abhinandan Sharma: Yes
01/08/19, 12:11 pm – Abhinandan Sharma: ji, keep the record on his blog.
01/08/19, 4:50 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1118125388385110&id=100005629773129
01/08/19, 7:16 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 109

व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती
रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम् ।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो
लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्।। १०९ ।।

अर्थ:
वृद्धावस्था भयङ्कर बाघिनी की तरह सामने खड़ी है । रोग शत्रुओं की तरह आक्रमण कर रहे हैं, आयु फूटे हुए घड़े के पानी की तरह निकली चली जा रही है । आश्चर्य की बात है, फिर भी लोग वही काम करते हैं, जिससे अनिष्ट हो ।

बुढ़ापा मौत का पेशखीमा है

बुढ़ापा मौत का पेशखीमा या बकौल “सिसरो” ज़िन्दगी के नाटक का आखिरी सीन है । इसी से चतुर पुरुष बुढ़ापे को देखते ही समझ लेते हैं कि मौत अब आने ही वाली है – हमारे जीवन नाटक का अन्तिम पर्दा गिरने ही वाला है – हमारी ज़िन्दगी का अभिनय अब समाप्त होने ही वाला है । इसी से उन्होंने अगर जवानी और बचपन के दिन वृथा जञ्जालों में भी खोये हैं; तो बुढ़ापे में चेत जाते हैं और सब तजकर हर भजने लगते हैं; पर ऐसे समझदारों की संख्या बहुत थोड़ी है । ज़ियादा तादाद उन अज्ञानियों की है, जो बुढ़ापे को सामने देखकर भी, दम और खांसी के आक्रमण होने पर भी, घरवालों से तिरस्कृत होनेपर भी, संसार की ममता नहीं छोड़ते । अनेक बूढ़े ठीक चला-चली के समय शादी-विवाह करते हैं ; अनेक बेटे-पोतों की पालना में लगे रहते हैं और अनेक धन बढ़ने की चिन्ता में ही मशगूल रहते हैं । इन सब कामों से मनुष्यों का अनिष्ट साधन होता है । न तो उन्हें इस जन्म में ही क्षण-भर को शान्ति मिलती है और न मरने पर अगले जन्म में ही । ममता और कामना के कारण उनका संसार-बन्धन दृढ़ हो जाता है और वे बारबार मरते और जन्म लेते हैं तथा इस घोर दुःख को सुख समझते हैं । भगवान् जाने उन्हें इन घोर दुखों को देखकर भी कैसे सन्तोष होता है ?

भगवान शंकराचार्य कहते हैं –
यावज्जनं तावन्मरणं, तावज्जननि जठरे शयनं।
इति संसारे स्फुटतर दोषः, कथमिह मानव ! तव सन्तोषः?।।

जब तक जन्म ग्रहण करना है, तब तक मरना और माता के पेट में सोना है । संसार में यह दोष स्पष्ट है । हे मनुष्य ! फिर भी तुझे इस जगत में कैसे सन्तोष है ?

रोज़ आँखों से देखते हैं कि इस संसार में ज़रा भी सुख नहीं है । माता के पेट में प्राणी नौ महीने तक घोर नरक-कुण्ड में पड़ा पड़ा सड़ता है । वहां परमात्मा से बारम्बार विनय करता है कि मुझे इस नरक से बाहर कीजिये । मैं बाहर जाते ही केवल आपका भजन करूँगा; पर बाहर आते ही वह सब भूल जाता है । उसे अपने वादे का ध्यान भी नहीं रहता । बाल्यावस्था वह खेल-कूद या पढ़ने-लिखने में गवां देता है; तरुणावस्था में वह तरुणी के फन्दे में फंसा रहता है और बुढ़ापे में नाती-पोतों और दोहितों का सुख देखना चाहता है । इसी तरह उसकी सारी उम्र बीत जाती है और जिस काम के लिए वह यहाँ आया था, वह काम अधूरा या बिना हुआ रह जाता है और समय पूरा होने पर, काल छोटी पकड़ कर ले जाता है । इसके बाद, वह फिर जन्म लेता और मरता है । इस तरह उसे ८४ लक्ष योनियों में जन्म लेना पड़ता है; तब कहीं फिर ऐसा अवसर उसे मिलता है; यानी जन्म-मरण की फांसी काटने वाली मनुष्य-देह मिलती है । अतः ज्ञानी को चाहिए कि अपने मन को अपने अधीन करे और एकाग्र चित्त से परमत्मा की उपासना में लवलीन हो जाय । इस दुर्लभ मनुष्य-देह को वृथा न गवाएं ।

महात्मा चरणदास ने यही सब मोह-मदिरा का नशा उतरनेवाली और गफलत को दूर करनेवाली बातें नीचे के भजन में बड़ी ही खूबी से अदा की हैं –

भजन (राग जंगला)

पीले रे प्याला हो जा मतवाला, प्याला प्रेम हरिरस का रे ।।टेक।।
पाप-पुण्य दोउ भुगतन आये, कौन तेरा और तू किसका रे?।
जो दम जीवे प्रभु के गुण गाले, धन यौवन सुपना निश का रे।।
बाल अवस्था खेल गवाँई, तरुण भय नारी-बश का रे।
वृद्ध भय कफ बाय ने घेरा, खाट परा नहिं जाय मसका रे।।
नाभ-कमल बिच है कस्तूरी, कैसे भरम मिटे पशु का रे।
मन सतगुरु यों भरमत डोले, जैसे मिरग फिरै बन का रे।।
लाख चौरासी से उबरा चाहे, छोड़ कामिनी का चसका रे।
प्रेम लगन “चरणदास” कहत है, नखसिख स्वास भरा विष का रे।।

बुढ़ापे में तो मोक्ष रुपी सोना बना लो

मनुष्य की आयु फूटे घड़े के जल की तरह नित्य निकली जा रही है । प्राणी हर क्षण काल के गाल में है । जब तक वह काल के गाल के नीचे नहीं उतरता, तभी तक खैर है । पर मज़ा यह कि मनुष्य आप काल के गाल में है; तोभी विषयों का पीछा नहीं छोड़ता । इसकी दशा उस मेंढक के समान है, जो सांप के मुंह में फंसा हुआ मछरों को मारने की चेष्टा करता था । मनुष्य नित्य देखता है कि करोड़पति, अरबपति और राजा महाराजा अपनी धन-दौलत को यहीं छोड़-छोड़ कर चले जा रहे हैं; फिर भी उसे होश नहीं होता ! भला इस बेहोशी और गफलत का भी कोई ठिकाना है ! बचपन और जवानी में ही परमात्मा से प्रीति करनी चाहिए । अगर उन अवस्थाओं में भूल हो गयी हो; तो बुढ़ापे में तो अवश्य ही सम्भल जाना चाहिए । यह काया पारसमणि है । यह इसलिए मिली है कि इससे मोक्षरूपी सोना बना लिया जाय । जो लोग देर करते हैं, अवधि बीतने पर, यह पारसमणि उनसे छीन ली जाती है और वे मोक्षरूपी सोना नहीं बना पाते; यानी मोक्षलाभ के उपाय करने के पहले ही काल उन्हें ले जाता है ।

पारस पत्थर की बटिया

एक महापुरुष के पास पारस पत्थर की बटिया थी । उन्होंने एक दरिद्र गृहस्थ पर दया कर उसे वह बटिया दे दी और कह दिया कि हम तीर्थ करने जा रहे हैं; १८ महीने बाद लौटेंगे; तब तक तुम इस बटिया से इच्छानुसार सोना बनाकर अपना दारिद्र दूर कर लेना । महात्मा चले गए । गृहस्थ ने बाजार में जाकर लोहे का भाव पूछा । भाव महंगा था, इसलिए सोचा कि जब लोहा सस्ता होगा, लाकर झट सोना बना लूँगा । इस तरह १८ महीनों में जब दो चार दिन रह गए, तब वह लोहा गाड़ियों पर लादकर लाया । विचार किया – “अब क्या देर है, झट सोना बना लेंगे।” उसे तो ख्याल रहा नहीं और १८ मास का आखिरी दिन आ गया । महात्मा भी आ गए । उन्होंने आते ही अपनी पारसमणि मांगी । गृहस्थ ने कहा – “मैं आज शाम को ही आप की बटिया दे दूंगा।” महात्मा ने कहा – “अब समय हो गया; एक क्षण भी बटिया तुम्हारे पास नहीं रह सकती ।” महात्मा ने बटिया ले ली । गृहस्थ रोटा और हाथ मलता रह गया । यह दृष्टान्त है । दृष्टान्त यह है कि समय पूरा हो जाने पर काल इस बात की प्रतीक्षा नहीं करता कि किसी का समय हुआ है कि नहीं; वह तो प्राणी को लेकर चलता बनता है; अतः समय रहते मोक्ष का उपाय करना चाहिए । आग लगने पर कुआँ खोदने से कोई लाभ नहीं । बुढ़ापा या मौत का पेशखीमा आया देखकर भी होश न करना भारी नादानी है ।

मनुष्यों ! विषयों को छोड़ो और परलोक बनाने की फ़िक्र करो; क्योंकि काल तुम्हारे सिरों पर उसी तरह मण्डरा रहा है; जिस तरह बाज़ चिड़िया की घात में मण्डराता है ।

महात्मा सुन्दरदास जी ने खूब कहा है –
तू अति गाफिल होय रह्यो शठ,
कुञ्जर ज्यूं कछु शंक न आनै।
माय नहीं तनमें अपनो बल,
मत्त भयो विषय-सुख ठानै।
खोंसत-खात सबै दिन बीतत,
नीत अनीत कछु नहीं जानै।
“सुन्दर” के हरि काल महारिपु,
दन्त उखारी कुम्भस्थल भानै।।

*इस कविता में मनुष्य को हाथी और मौत को सिंह माना है । सिंह जिस तरह हाथी के दाँत उखाड़ कर उसके कुम्भस्थल को चीर डालता है; उसी तरह काल-सिंह मनुष्य को मार डालता है । (हाथी की पेशानी के ऊपरी भाग में, सामने ही, जो दो गोले होते हैं । उन्हें “कुम्भस्थल” कहते हैं ।

अरे शठ ! तू बहुत ही गाफिल और असावधान हो रहा है । हाथी की तरह मन में भय नहीं करता । तेरे शरीर में तेरा बल नहीं समाता । मतवाला होकर विषय-भोगों का आनन्द लूट रहा है । छीनते और खाते तेरे दिन बीते जा रहे हैं । तू न्याय-अन्याय, कुछ नहीं समझता । “सुन्दरदास” कहते हैं, घोर शत्रु कालरुपी सिंह तेरे दांतों को उखाड़ कर तेरा कुम्भस्थल फाड़ देगा ।

(२)
सन्त सदा उपदेश बतावत,
केश सबै सर श्वेत भये हैं ।
तू ममता अजहुँ नहीं छाँड़त,
मौतहु आयी सन्देश दये हैं ।
आजु कि कल चलै उठी मूरख,
तेरे हि देखत केते गए हैं ।
“सुन्दर” क्यूँ नहीं राम सँभारत ?
या जगहू में कौन रहे हैं?।।

सन्त लोग सदा उपदेश देते हैं । तेरे सर के बाल सफ़ेद हो गए हैं; मौत ने अपना सन्देश भेज दिया है । अरे मूर्ख ! आज या कल तू उठ जाएगा । पर अफ़सोस ! इतनी खबर पाने पर भी तू होश नहीं करता और अब तक भी ममता नहीं छोड़ता ! अरे शठ ! तेरी आँखों के सामने, देखते देखते कितने ही चले गए; क्या तू यहीं रहेगा ? इस जगत में कौन रहा है ? अब भी तू भगवन को क्यों नहीं याद करता ?

(३)
करत करत धन्ध, कछु न जाने अन्ध।
आवत निकट दिन, अगले चपाकदे।।
जैसे बाज़ तीतर कुं, दावत है अचानक।
जैसे बक मछरी कुं, लीलट लपाकदे।।
जैसे मक्षिका की घात, मकरी करत आय।
जैसे सांप मूसक कुं, ग्रस्त गपाकदे।।
चेत रे अचेत नर, “सुन्दर” सँभार राम।
ऐसे तांहि काल आय, लेइगो टपाकदे।।

अरे अन्धे ! धन्धों में लगकर तुझे होश नहीं, तेरे अन्तिम दिन शीघ्र शीघ्र नज़दीक आ रहे हैं । जिस तरह बाज़ अचानक आकर तीतर को दबा लेता है, जिस तरह बगुला मछली को चट से निगल जाता है, जिस तरह मकड़ी, मक्खी की घात में लगी रहती है, जिस तरह सांप चूहे को गप से गपक लेता है; उसी तरह काल तुझ पर झपट्टा मारना ही चाहता है । अरे गाफिल मनुष्य ! होशकर और भगवान् को याद कर ।

(४)
मेरो देह, मेरो गेह, मेरो परिवार सब।
मेरो धन-माल, मैं तो बहु विधि भारो हूँ।।
मेरे सब सेवक, हुकम कोउ मेटे नाहिं।
मेरी युवती को मैं तो अधिक पियारो हूँ।।
मेरो वंश ऊंचो, मेरे बाप-दादा ऐसे भये।
करत बड़ाई, मैं तो जगत उजारो हूँ।।
“सुन्दर” कहत, मेरो मेरो करि जानै शठ।
ऐसे नहिं जाने, मैं तो काल ही को चारो हूँ।।

यह मेरी देह है, यह मेरा घर है, यह सब मेरा कुटुम्ब है, या मेरा धन-माल है, मैं हर तरह से बड़ा आदमी हूँ । मेरे सब नौकर हैं, जो मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते । मैं अपनी युवती का बहुत ही प्यारा हूँ; मेरा कुल और वंश ऊंचा है; मेरे बाप-दादा ऐसे नामी हुए; मैं जगत का उजियारा हूँ; इस तरह मनुष्य अपनी बड़ाई करता और शेखी बघारता है । “सुन्दरदास” कहते हैं, शठ मेरा ही मेरा करता है पर यह नहीं जानता कि मैं स्वयं मौत का चारा हूँ ।

(५)
माया जोरि जोरि, नर राखत जतन करि।
कहत है एक दिन, मेरे काम आइ है।।
तोहि तौ मरत, कछु बेर नहीं लागे शठ।
देखत ही देखत, बबूला सो बिलाई है।।
धन तो धरयो ही रहे, चालत न कौड़ी गहै।
रीते हाथन से जैसो आयो, तैसो ही जाइ है।।
करिले सुकृत, यह बेरिया न आवै फेरि।
“सुन्दर” कहत नर पुनि पछताई है।।

मनुष्य धन जोड़-जोड़ कर रखता है और कहता है कि यह एक दिन मेरे काम आएगा । अरे मूर्ख ! तुझे तो मरते देर न लगेगी; देखते देखते पानी के बबूले की तरह, बिलाय जाएगा । तेरा धन, यहाँ का यहीं रक्खा रह जायेगा; चलते समय कौड़ी भी तू साथ न ले जाएगा; जिस तरह रीते हाथों आया था, उसी तरह खाली हाथों चला जाएगा । अरे मूर्ख ! परोपकार या धर्म-पुण्य कर ले, यह मौका फिर न मिलेगा । “सुन्दरदास जी” कहते हैं, अगर हमारी चेतावनी पर ध्यान न देगा, तो अन्त समय पछ्तावेगा ।

किसी कवी ने मोह-निद्रा में सोनेवाले गाफिल को जगाने और उसे अपने कर्तव्य पर आरूढ़ करने के लिए कैसा अच्छा भजन कहा है –

भजन

मूरख छाँड़ वृथा अभिमान ।। टेक ।।
औसर बीत चल्यो है तेरो, तू दो दिन को मेहमान ।।
भूप अनेक भये पृथ्वी पर, रूप तेज बलवान ।
कौन बच्यो या काल बली से, मिट गए नामनिशान ।।
धवल धाम धार रथ गज सेना, नारी चन्द्र समान ।
अन्त समाही सबहिं को तज के, जाय बसै समसान ।।
तज सतसङ्ग भ्रमत विषयन में, जा विधि मर्घट-स्वान ।
क्षण भर बैठ सुमिरन न कीनो, जासों होत कल्याण ।।
रे मन मूढ़ ! अन्त मत भटके, मेरो कह्यो अब मान ।
“नारायण” ब्रजराज कुंवर से, बेगि करो पहचान ।।

दोहा

कुपित सिंहनी ज्यों जरा, कुपित शत्रु ज्यों रोग।
फूटे घट जल ज्यों वयस, तउ अहितयुत लोग ।।
01/08/19, 7:24 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: प्रश्नोत्तरमाला – 30

विद्युच्चलं किं धनयौवनायु-
र्दानं परं किञ्च सुपात्रदत्तम् ।
कण्ठङ्गतैरप्यसुभिर्न कार्यं
किं किं विधेयं मलिनं शिवार्चा । ३० ।

प्र: बिजली की तरह क्षणिक क्या है ?
उ: धन, यौवन और आयु ।

प्र: सबसे उत्तम दान कौन सा है ?
उ: जो सुपात्र को दिया जाय ।

प्र: कण्ठगत प्राण होने पर भी क्या नहीं करना चाहिए और क्या करना चाहिए ?
उ: पाप नहीं करना चाहिए और कल्याणरूप परमात्मा की पूजा करनी चाहिए ।
01/08/19, 7:26 pm – Pitambar Shukla: 🙏🙏🙏🙏
02/08/19, 11:39 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

जोग अगिनि करि प्रगट तब
कर्म सुभासुभ लाइ।

बुद्धि सिरावै ग्यान घृत
ममता मल जरि जाइ।।

तब योग रूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्म रूपी ईंधन लगा दे( सब कर्मों को योग रूपी अग्नि में भस्म कर दे)।

जब ( वैराग्य रूपी मक्खन का) ममता रूपी मल जल जाय,
तब ( बचे हुए ) ज्ञान रूपी घी को ( निष्चयात्मिका) बुद्धि से ठंडा करे।।117-क।।

तब बिग्यान रूपिनी बुद्धि
बिसद घृत पाइ।

चित्त दिआ भरि धरै दृढ़
समता दिअटि बनाइ।।

तब विज्ञान रूपिणी बुद्धि उस ( ज्ञान रूपी)
निर्मल घी को पा कर उससे चित्त रूपी दिया को भर कर,
समता की दीवट बना कर,
उसे दृढ़ता पूर्वक ( जमा कर ) रखे।।117-क।।
02/08/19, 2:12 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
मनुस्मृति
द्वितीय अध्याय

आसीनस्य स्थितः कुर्यादभिगच्छंस्तु तिष्ठतः ।
प्रत्युद्गम्य त्वाव्रजतः पश्चाद्धावंस्तु धावतः । । २.१९६ । ।

पराङ्मुखस्याभिमुखो दूरस्थस्यैत्य चान्तिकम् ।
प्रणम्य तु शयानस्य निदेशे चैव तिष्ठतः । । २.१९७ । ।

नीचं शय्यासनं चास्य नित्यं स्याद्गुरुसन्निधौ ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् । । २.१९८ । ।

नोदाहरेदस्य नाम परोक्षं अपि केवलम् ।
न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषितचेष्टितम् । । २.१९९ । ।

गुरोर्यत्र परिवादो निन्दा वापि प्रवर्तते ।
कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः । । २.२०० । ।

परीवादात्खरो भवति श्वा वै भवति निन्दकः ।
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी । । २.२०१ । ।

अर्थ

 गुरु आसान में बैठे हो तो शिष्य आसन से उठ कर, गुरु खडे हों तो पास जा कर, गुरु आतें हो तो सम्मुख जा कर,जाते हों तो पीछे दौड़ कर बात करनी चाहिए,गुरु पीछे हों तो सम्मुख होकर,दूर हों तो पास जा कर,लेटे हों तो प्रणाम करके आज्ञा सुनना चाहिए। गुरु के पास में आसन या बिछौना गुरु से नीचा रखना चाहिए। और उनके सामने मनमाने तौर से ना बैठे। गुरु केपीछे भी उनका अकेला नाम ले के ना बोले व उनकी चाल बोल चेष्टा की नकल ना करें। जंहा गुरुनिन्दा होती हो वँहा शिष्य अपने दोनों कान बंद कर लेवे या वँहा से अलग हट जाए, गुरु निंदा सही या झूठ करने से मर कर कुत्ता या गधा होता है।गुरु धन भोगने वाला कृमि व कुचाल करने वाला कीट होता है।।

हरी ॐ
🙏
02/08/19, 5:57 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 110

सृजति तावदशेषगुणाकरं पुरुष रत्नमलंकरणं भुवः।
तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेदहह कष्टमपंडितंताविधेः।। ११० ।

अर्थ:
ब्रह्मा की यह अज्ञानता खटकती है कि वह मनुष्य को गुणों की खान, पृथ्वी का भूषण और प्राणियों में रत्नरूप बनता है; किन्तु उसे क्षणभंगुर कर देता है ।
मनुष्य, समस्त जीवधारियों में श्रेष्ठ, अशरफुल, मख़लूक़ात, गुणों का सागर और सृष्टि की शोभा है । यह सब होने पर भी, उसकी उम्र कुछ नहीं; वह पानी के बुलबुले की तरह क्षणभर में नाश हो जाता है ! ब्रह्मा गुणों की खान – पृथ्वी के शोभारूप पुरुष को बनता है, यह तो अच्छी बात है; किन्तु उसे क्षणभर में ही नाश कर देता है, यह दुःख की बात है ! यह विधाता की मूर्खता है ! यदि वह पुरुष को सदा रहनेवाला – अमर और अजर बनता, तो अच्छा होता । इसमें उसकी बुद्दिमत्ता दीखती । क्योंकि अपने बाग़ में आप ही वृक्ष लगा कर, आप ही जल से सींच कर और बढाकर, अपने ही हाथों से अपने लगाए हुए वृक्ष को कोई नहीं काटता । जो ऐसा करता है; वह मूर्ख ही समझा जाता है ।

विधाता की और भी गलतियां

इस सृष्टि की रचना में, विधाता ने अपनी अनुपम कारीगरी और चातुरी के जो काम किये हैं; उन्हें देखकर मनुष्य की अक्ल दंग रह जाती है । तरह-तरह के फल-फूल और वृक्ष लता पत्रादि; नाना प्रकार के जल, थल और आकाश में विचरने वाले प्राणी; अनगिनत तारे और सूरज-चन्द्रमा तथा नीलगगन प्रभृति को देखकर रचयिता की रचनाचातुरी की हज़ार दिल से तारीफ करनी पड़ती है । निस्सन्देह, विधाता की क्षमता और बुद्धिमत्ता, चतुरी और कारीगरी का पार पाना असंभव है; तथापि यह कहना पड़ता है कि, उस चतुर कारीगर ने भूलें भी बहुत कि हैं । जिस तरह उसने मनुष्य को, सृष्टि का सरदार बनाकर, क्षणभंगुर करने की भूल की है; उसी तरह उसने सोने में सुगन्ध और ईख में फूल न लगाने तथा चन्द्रमा को कलंकी बनाने की भूलें की हैं ।

किसी ने कहा है –
शशिनि खलु कलङ्कः, कण्टक पद्मनाले,
युवतिकुचनिपात, पक्वता केशजाले।
जलधिजलमपेयं, पण्डिते निर्धनत्वं,
वयसि धनविवेको, निर्विवेको विधाता।।

चन्द्रमा में कलङ्क, कमल की डण्डी में काँटे, युवतियों की छातियों का गिर जाना, बालों का सफ़ेद हो जाना, समुद्र के जल का पीने योग्य न होना, विद्वानों का धनहीन रहना और बुढ़ापे में धनागम की चिन्ता रहना – ये सब विधाता की मूर्खता का परिचय देते हैं ।

कहाँ तक कहें, विधाता ने ऐसी-ऐसी अनेक भूलें की हैं । हमने उसकी भूलों के चन्द नमूने यहाँ दिखा दिए हैं । ये सब भूलें मन में काँटे की तरह खटकती हैं; पर इन सब में भी, मनुष्य जैसे प्राणी का, क्षणभर में ही, बबूले की तरह बिलाय जाना सब से अधिक खटकता है ।
02/08/19, 9:52 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ८३,८४

तण्डुलीयो हिमो रूक्षः स्वादुपाकरसो लघुः। मदापेत्तविषास्रघ्नः मुञ्जातं वातपित्तजित्त्वष॥८३॥

स्निग्धं शीतं गुरु स्वादु बृंहणं शुक्रकृत्परम्। गुर्वी सरा तु पालङ्कया मदघ्नी चाप्युपोदका॥८४॥

तणडुलीय(चौलाई) का शाक- यह शीतवीर्य, रुक्ष, रस तथा पाक में मधुर एवं लघु होता है। यह मद्यविकार(मदात्यय), पित्तविकार, विषविकार तथा रक्तविकार(विशेषकर रक्तप्रदर) का विनाश करता है।

मुञ्जातक(कन्द विशेष) का शाक- यह वात तथा पित्तविकारो का नाशक होता है। स्निग्ध, शीत, गुरु, स्वाद में मधुर, शरीर को पुष्ट करने वाला तथा शुक्रवर्धक होता है।

पालक का शाक- यह गुरु होने के कारण देर में पचता है तथा मलभेदक होता है। देशभेद से इसका स्वादभेद भी देखा जाता है।

उपोदिका(पोई) का शाक- यह भी गुरु एवं सर गुणों से युक्त होती है तथा मद का नाश भी करती है।
03/08/19, 3:47 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: कमल की डंडी में कांटे????🤔
03/08/19, 4:00 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सार ये है कि जहाँ सुख है वहां दुःख भी होगा ही, बाकी कमल में कांटे नहीं तो गुलाब मान लीजिए ☺️
03/08/19, 4:04 am – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
03/08/19, 4:10 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: जी वह समझ गया था,,,

भूल सुधार के निमित्त लिखा 🙏
03/08/19, 6:46 am – Abhinandan Sharma: सो माया बस भयउ गोसाई,
बंध्यो कीर मरकट की नाई – इसका क्या अर्थ है ? तोते और बन्दर का उदाहरण क्यों दिया गया है ? बताइये ।
03/08/19, 6:58 am – Pitambar Shukla: आज समय मिलने पर इस विषय को जितना और जैसा मैंने समझा है, अवश्य लिखूँगा ।
03/08/19, 7:11 am – Abhinandan Sharma: बढ़िया | और किसी की समझ में आया, ऐसा क्यों लिखा गया ? केवल पढना नहीं है ? गुनना भी है ! समझना भी है ! पढ़ तो सब लेते हैं, पर अगर बाल की खाल न निकाली तो क्या लाभ ? जो लोग पढ़ लिख नहीं पाते, उन्हें अपढ़ कहते हैं और जो लोग कहते हैं, हमने तो रामायण, महाभारत, गीता सब पढ़ लिया पर वास्तव में उन्हें समझ नहीं पाते, उन पर चिन्तन नहीं करते, उन्कहें कुपढ़ कहते हैं | कुपढ़ नहीं बनना है, यही इस ग्रुप का उद्देश्य है | चितन कीजिये और सोचिये, कीर और मरकट क्यों लिखा ?
03/08/19, 8:25 am – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥

माया में मनुष्य इस भाँति लिपटा हुआ है कि उसे लगता है कि माया ने ही उसे बाँध रखा है। जबकि वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र है।
उसने स्वयं ही माया को पकड़ रखा है। जैसे शिकारी तोते को पकड़ने के लिए रस्सी में बाँस की पोली (पोंगी जैसे गांव में हाथ से पंखे झलने के लिए उसकी डंडी में लगाया जाता था) लगा देता है और नीचे तोते के खाने की प्रिय चीज लाल मिर्च डाल देता है, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह हमारे लिए हमारे माँ-बाप, पत्नी, बच्चे, धन-वैभव, मान-प्रतिष्ठा इत्यादि।
अब तोता आकर उस बाँस लगी रस्सी पर बैठता है और जैसे ही मिर्ची खाने के लिए नीचे झुकता है, पोली घूम जाती है और तोता उलटा लटक जाता है।
तोता यह समझता है कि पोली ने उसे पकड़ लिया है जबकि तोता खुद ही पोली को मजबूती से पकड़े होता है। ईश्वर ने उसे पंख दिए हैं वह पोली छोड़ कर उड़ सकता है पर मिथ्या भ्रम के कारण वह वहीं लटका रहता है और शिकारी आकर उसे पकड़ कर पिजड़े में बन्द कर देता है। तोता मिथ्या भ्रम के बन्धन में बंध कर वास्तविक बंधन में बँध जाता है।
इसी प्रकार मर्कट को भी शिकारी उसके प्रिय खाद्य चने आदि को किसी सकरे मुँह वाले बर्तन में डाल देता है और जब बंदर उसमें हाथ डालकर मुट्ठी बंद कर लेता है तो उसका हाथ बर्तन में फंस जाता है और वह यही सोचता है कि मुझे बर्तन ने पकड़ लिया। जबकि वह अगर मुट्ठी छोड़ दे तो स्वतंत्र हो जाए परन्तु माया में पड़ता वह भी पराधीनता की गति को पाता है।
इसी प्रकार मनुष्य स्वयं स्वतंत्र है परन्तु मायावश मिथ्या ग्रंथि में स्वयं को स्वयं ही बाँधे है।

_गोस्वामी जी द्वारा रचित रामचरित मानस का उत्तरकांड ज्ञान का वह भंडार है जहाँ से आप सरल भाषा में मुक्ति का मार्ग मिलता है।
परन्तु जैसा कि अभिनन्दन जी ने लिखा कि सिर्फ पढ़ना ही नहीं गुनना भी है तो आप इसे पढिये और मनन कीजिये।

‘इसका अर्थ मेरे पिताजी ने एक बार हमें विस्तार से बताया था।’
03/08/19, 8:28 am – Abhinandan Sharma: 👏👏
03/08/19, 8:28 am – Abhinandan Sharma: ऐसे ही शब्दों को समझिये केवल पढिये मत, गहराई में जाइये।
03/08/19, 1:18 pm – Pitambar Shukla: 🙏🙏
03/08/19, 1:31 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏🙏
03/08/19, 1:54 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

जीवेन शस्त्रं बध्नीयाज्जीवेनैव विकाशयेत्।
जीवेन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा।२३५।

आकृष्य प्राणपवनं समारोहेत वाहनम्।
समुत्तरे पदं दद्यात् सर्वकार्याणि साधयेत्।२३६।

अपूर्णे शत्रुसामग्रीं पूर्णे वा स्वबलं तथा।
कुरुते पूर्णतत्त्वस्थो जयत्येको वसुन्धराम्।२३७।

या नाडी वहते चाङ्गे तस्यामेवाधिदेवता।
सन्मुखेSपिदिशा तेषां सर्वकार्यफलप्रदा।२३८।

अर्थ- युद्ध में शत्रु का सामना करते समय जो स्वर प्रवाहित हो रहा हो, उसी हाथ में शस्त्र पकड़कर उसी हाथ से शत्रु पर प्रहार करता है, तो शत्रु पराजित हो जाता है।२३५।

यदि किसी सवारी पर चढ़ना हो साँस अन्दर लेते हुए चढ़ना चाहिए और उतरते समय जो स्वर चल रहा हो वही पैर बढ़ाते हुए उतरना चाहिए। ऐसा करने पर यात्रा निरापद और सफल होती है।२३६।

यदि शत्रु का स्वर पूर्णरूप से प्रवाहित न हो और वह हथियार उठा ले, किन्तु अपना स्वर पूर्णरूपेण प्रवाहमान हो और हम हथियार उठा लें, तो शत्रु पर ही नहीं पूरी दुनिया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।२३७।

जब व्यक्ति की उचित नाड़ी में उचित स्वर प्रवाहित हो, अभीष्ट देवता की प्रधानता हो और दिशा अनुकूल हो, तो उसकी कभी कामनाएँ निर्बाध रूप से पूरी होती हैं।२३८।

यहाँ यह पुनः ध्यान देने की बात है कि श्लोक संख्या ७५ के अनुसार चन्द्र स्वर (बाँए) की दिशा उत्तर और पूर्व एवं सूर्य स्वर (दाहिने) की पश्चिम और दक्षिण।
03/08/19, 2:22 pm – Dayadhankr Soryvanshi Hts, Akhilesh Frnd: 🙂
03/08/19, 8:40 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 111

गात्रं संकुचितं गतिर्विगलिता भ्रष्टा च दन्तावलिः-
दृष्टिर्नश्यति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते ।
वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुश्रूषते
हा कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोप्यमित्रायते ।। १११ ।।

अर्थ:
मनुष्य की वृद्धावस्था बड़ी खेदजनक है । इस अवस्था में शरीर सुकड़ जाता है, चाल मन्दी पद जाती है, दन्त-पंक्ति टूटकर गिर जाती है, दृष्टी नाश हो जाती है, बहरापन बढ़ जाता है, मुंह से लार टपकती है, बन्धुवर्ग बातों से भी सम्मान नहीं करते, स्त्री भी सेवा नहीं करती और पुत्र भी शत्रु हो जाते हैं ।

बुढ़ापे का चित्र

मनुष्य का बुढ़ापा सचमुच ही दुखों की खान है । जिस तरह शत्रु घात लगाए रहते हैं और मौका पाते ही हमला करते हैं; वैसे ही रोग जवानी में तो दबे-छिपे पड़े रहते हैं, पर बुढ़ापे की अवायी देखते ही प्रणिपार चढ़ बैठते हैं । बुढ़ापे में शरीर निकम्मा हो जाता है, खाल झूलने लगती है, इन्द्रियां बेकाम हो जाती हैं, आँखों से दिखाई नहीं देता, कानो से सुनाई नहीं देता, पैरों से चला नहीं जाता और दम चढ़ा करता है । हर समय खों-खों लगी रहती है; दांत अलग ही कष्ट देते और हिल हिल कर प्राण लेते हैं । कोई कड़ी चीज़ खाई नहीं जाती । ज़रा भी कड़ी चीज़ दांतों-टेल आने से दम निकलने लगता है । जिस समय दन्त-पीड़ा के मारे माथा और कनपटी भन्नाने लगते हैं, तब मनुष्य मृत्यु को याद करने लगता है ।

दांतो पर उस्ताद ज़ौक़ ने खूब कहा है :-
जिन दांतों से हँसते थे हमेशा, खिल-खिल।
अब दर्द से हैं वही रुलाते, हिल-हिल।।
पीरी में कहाँ, अब वह जवानी के मज़े।
ए ज़ौक़, बुढ़ापे से हैं दांता किल-किल।।

जिन दांतो से जवानी में खिल खिलाकर हंसा करते थे, अब बुढ़ापे में वही हिल हिल कर हमें रुलाते हैं । ए ज़ौक़ ! बुढ़ापे में अब वह जवानी के मज़े कहाँ हैं ? अब तो इस बुढ़ापे से दांता किल-किल है !

महाकवि नज़ीर अकबराबादी “बुढ़ापे” का क्या ही अच्छा चित्र खींचते हैं –

बुढ़ापा

क्या कहर है यारों, जिसे आ जाय बुढ़ापा।
और ऐश जवानी के तई, खाय बुढ़ापा।।
इशरत को मिला ख़ाक में, गम लाय बुढ़ापा।
हर काम को हर बात को, तरसाय बुढ़ापा।।
सब चीज़ को होता है, बुरा है बुढ़ापा।
आशिक को तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा।।

आगे तो परीजाद ये, रखते थे हमें घेर।
आते थे चले आप, जो लगती थी ज़रा देर।।
सो आके बुढ़ापे ने किया, है ये अन्धेर।
जो दौड़ के मिलते थे, वो अब लेते हैं मुंह फेर।।
सब चीज़ को होता है, बुरा है बुढ़ापा।
आशिक को तो अल्लाह, न दिखलाये बुढ़ापा।।

क्या यारो, उलट है गया हमसे ज़माना।
जो शोख कि थे, अपनी निगाहों के निशाना।।
छेड़े है कोई डाल के, दादा का बहाना।
हंस कर कोई कहता है, कहाँ जाते हो नाना।।
सब चीज़ को होता है, बुरा है बुढ़ापा।
आशिक को तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा।।

पूछैं जिसे कहता है, वो क्या पूंछे है बुड्ढे।
आवें तो ये गुल-शोर; कहाँ आवे है बुड्ढे।।
बैठे तो ये है धूम, कहाँ बैठे है बुड्ढे।
देखें जिसे वह कहता है, क्या देखे है बुड्ढे।।
सब चीज़ को होता है, बुरा है बुढ़ापा।
आशिक को तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा।।

वह जोश नहीं, जिसके कोई खौफ से दहले।
वह ज़ोम नहीं, जिससे कोई बात को सहले।।
जब फस हुए हाथ, थके पाँव भी पहिले।
फिर जिसके जो कुछ शौक में आवे, सोइ कहले।।
सब चीज़ को होता है, बुरा है बुढ़ापा।
आशिक को तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा।।

करते थे जवानी में, तो सब आपसे आ चाह।
और हुस्न दिखाते थे, वह सब आन के दिलख़्वाह।।
यह कहर बुढ़ापे ने किया, आह नज़ीर आह !
अब कोई नहीं पूछता, अल्लाह ही अल्लाह।।
सब चीज़ को होता है, बुरा है बुढ़ापा।
आशिक को तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा।।

बुढ़ापे में निर्धनता मरण है

यदि मनुष्य जवानी में प्रचुर धन कमाकर रख देता है, तब तो बुढ़ापा सुख से पार हो जाता है; घरवाले हलवा और मोहन-भोग खिलाते, गरमागरम दूध पिलाते अथवा कोई और सुख से खाये जाने योग्य पदार्थ बना देते हैं; यदि पास पैसा नहीं होता, तो सभी घरवाले हर तरह से अनादर करते और सूखे टुकड़े सामने रखते हैं; इच्छा हो बूढ़ा खाय, इच्छा हो न खाय । अगर बूढ़े के पास धन होता है, तो स्त्री, पुत्र, पौत्र और पुत्री तथा पुत्र-वाद्यें हर समय बूढ़े की हाज़िरी में खड़े रहते हैं; मुंह से बात निकलती नहीं और काम हो जाता है । अगर बूढ़े के पास धन नहीं होता, तो सब उसे त्याग देते हैं; क्योंकि यह संसार मतलब का है; बिना स्वार्थ, बिना मतलब और बिना पैसे कोई बात नहीं करता । मतलब से ही लोग एक दुसरे के नातेदार और सम्बन्धी बने हुए हैं; वास्तव में कोई किसी का नहीं है ।

कहा है –
वृक्षं क्षीणफलं त्यज्यन्ति विहगाः, शुष्कसरः सारसाः।
पुष्पं पर्य्युषितं त्यज्यन्ति मधुपा, दग्धं वनान्तं मृगाः।।
निर्द्रव्यं पुरुषं त्यज्यन्ति गणिकाः, भृष्टश्रियं मन्त्रिणः।
सर्व्वः कार्यवशाद् जनोऽभिरमते, कस्यास्तिको वल्लभः ?।।

फलहीन वृक्ष को पक्षी त्याग देते हैं, सूखे तालाब को सारस छोड़ देते हैं, मधुहीन फूलों को भौंरे त्याग देते हैं, जले हुए वन को हिरन छोड़ देते हैं, धनहीन पुरुष को वेश्या त्याग देती है और श्रीहीन राजा को मन्त्री त्याग देते हैं । सब मतलब से एक दुसरे को चाहते हैं; नहीं तो कौन किसका प्यारा है ?

“मोहमुद्गर” में लिखा है –
यावद् वित्तोपार्जनशक्तः, तावन्निजपरिवारो रक्तः।
तदनु च जरया जर्जर देहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे।।

जब तक धन कमाने की सामर्थ्य रहती है, तब तक कुटुम्ब के लोग राज़ी रहते हैं; इसके बाद, बुढ़ापे से शरीर जर्जर होते ही कोई बात तक नहीं पूछता।
संसार की यही धरा है । जिस पुत्र के लिए बचपन में कहीं से धन लाते और उसे अच्छा पिलाते-खिलाते और पहनाते थे, हर तरह लाड-प्यार करते थे; पास पैसा न होने पर भी, पढ़ाने-लिखाने में अपनी शक्ति से अधिक खर्च करते थे; आप तंगी भोगते थे, पर पुत्र को तंगदस्त न होने देते थे; आप फाटे कपडे पहने फिरते थे; पर उसे अच्छे से अच्छा पहनाते थे; अब वही पुत्र मुंह से नहीं बोलता, मौका पड़ने से वह या उसके पुत्र गालियां देते और कभी कभी बूढ़े को मार तक बैठते हैं; पुत्र-वधुएं दिन-भर टनटनाया करती और कहती हैं – “ससुरजी मारें तो संकट कटे; दिन-भर पड़े पड़े खाते और थूक-थूक कर घर ख़राब करते हैं; हमसे तो रोज़ रोज़ मैला साफ़ नहीं होता।” बेटों की बहुएं तो बहुएं, ख़ास अपनी अर्धाङ्गी देखते ही आँखें चढ़ा लेती और खाऊँ-खाऊँ करती रहती है; बूढ़े पति को आलिङ्गन करना, उसकी सेवा करना तो दूर की बात है, उसे पास बैठना भी बुरा समझती है । बीमारी में सेवा-सुश्रुषा करती-करती कहने लगती है – “अब तो तुम मर जाओ तो अच्छा हो । मुझसे यह सब अब नहीं होता ।” कहाँ तक गिनाव, बुढ़ापे में ऐसे-ऐसे अनगिन्तो दुःख आ घेरते हैं; पर आश्चर्य तो यह है कि, इतने पर भी, अज्ञानियों का मोह नहीं छूटता । हमें एक मोहान्ध बूढ़े की की कहानी याद आयी है, उससे पाठकों को बहुत कुछ ज्ञान होता – उनकी आँखें खुल जाएंगी –

एक बूढ़े सेठ की दुर्दशा

किसी नगर में एक बूढ़ा सेठ रहता था । उसने जवानी में बहुत सा धन सञ्चय किया था । बुढ़ापे में पुत्रों ने सारा धन उससे अपने हाथोने में ले लिया । बूढ़े को पौली में एक टूटी सी चारपाई पर, एक फटी-पुरानी गुदडी बिछाकर पटक दिया । एक लाठी उसके हाथ में दे दी और कह दिया कि घर में चोर-चकोर या कुत्ता-बिल्ली न आने पावे। सब घर के भोजन कर लेने पर बचा खुचा खाना एक फूटी सी थाली में रखकर बाह्यें बूढ़े को दे जातीं । कुछ दिन इस तरह गुज़रे । पुत्र-वधुओं को यह भी अच्छा न लगा । उन्होंने कहा – “ससुरजी के कारण निकलने-बैठने में बार-बार घूंघट करना होता है, इससे बड़ा कष्ट होता है । अच्छा हो अगर ऊपर के चौबारे में रख दिए जाएँ और एक घण्टी इन्हें दे दी जाय । जब इन्हें किसी चीज़ की जरुरत होगी, यह घण्टी बजा देंगे ।” कलियुग में जोरू का हुक्म खुदा के हुक्म के बराबर समझा जाता है । बेटों ने अपनी घरवालियों की बात मंजूर कर ली और कह-सुन कर बूढ़े को ऊपर पहुंचा दिया और एक घण्टी उसे दे दी । बूढ़े को जब खाना या पानी वगैरह की जरुरत होती, घण्टी बजा देता । कुछ दिनों बाद एक दिन, बूढ़े का नाती ऊपर चला गया । बूढ़ा उसे खिलता रहा । शेष में, वह खेलता-खेलता घण्टी ले आया । अब तो मुश्किल हो गयी; बूढ़ा खाये-पिए बिना मर गया । २४ घण्टे बीतने पर किसी को उसकी याद आयी । देख, तो बुधिराम कूच कर गए थे । पुत्रों ने उसे श्मशान पर ले जाकर जला दिया । बुढ़ापे में ऐसी ही दुर्गति होती है ।

बुढ़ापे में ममता और भी बढ़ जाती है

एक बूढ़ा अपने मकान की पौली में पड़ा रहता था । कोई उसकी बात न पूछता था । बेचारा ज्यों त्यों करके दिन काटता था । एक दिन उसका पोता उसे मारने और गाली देने लगा । बूढ़ा भी उसे गाली देने लगा । इतने में नारदजी उधर से आ निकले । उन्होंने बूढ़े से सारा हाल पूछा । उसकी दुर्दशा का हाल सुनकर, नारद जी ने उससे कहा – “तुम्हारा जीवन वृथा है । तुम या तो वन में जाकर तप करो या हमारे साथ स्वर्ग को चलो ।” सुनते ही बूढ़ा लाल हो गया और बोलै – “महाराज ! अपनी राह लीजिये । मेरे नाती-बेटे मुझे मारें चाहें गाली दें, आप काज़ी या मुल्ला ? मैं इन्हीं में खुश हूँ ।” नारदजी संसार की मोह-ममता देखकर दंग रह गए । बात यह है कि, अज्ञानी लोगों कि तृष्णा और ममता बुढ़ापे में और भी बढ़ जाती है । वे हज़ारों तरह के कष्ट सहते और अपमानित होते हैं; पर गृहस्थाश्रम को नहीं त्यागते । इसी मिथ्या और स्वार्थपर संसार कि हाय-हाय में एक दिन मर जाते और ममता के कारण बार-बार जन्म लेते और मरते हैं । इस तरह उनके जन्म-मरण का चक्र घूमा ही करता है ।

मोह त्यागने में ही भलाई है

मोह-ममता ही संसार-बन्धन का कारण है । ज्ञानी समझते हैं कि यहाँ कोई किसी का नहीं है । सभी सराय के मुसाफिर हैं । राह चलते-चलते एक जगह एकत्र हो गए हैं । अपना-सपना समय होने पर, अपनी-अपनी राह लगते हैं । न कोई किसी कि स्त्री है और न कोई किसी का पति है; न कोई किसी का पुत्र है और न पिता; न कोई किसी का भतीजा है और न चाचा प्रभृति । स्वार्थ की जञ्जीर में सब बन्धे हुए हैं । फिर इन स्वार्थियों का साथ भी सदा-सर्वदा को नहीं । आज साथ हैं, तो कल अलग हो जाएंगे । जन्म के साथ मृत्यु निश्चित है और संयोग के साथ वियोग अटल है । जब पुरुष का स्त्री से वियोग होता है, तब उसको बड़ा कष्ट और शोक होता है । इसी तरह पुत्र के मरने पर भी महा शोक होता है । पर जो ज्ञानी हैं , तत्त्ववेत्ता हैं, वे इस जगत के नातों की असलियत को जानते हैं; अतः या तो वे गृहस्थी को तज देते हैं या कुटुम्बियों में रहते हुए भी उनमें मोह-ममता नहीं रकते । जो परिवार में रहते हुए भी, परिवार में मोह-ममता नहीं रखते, वे जीवन्मुक्त हैं । धन्य हैं ऐसे नररत्न !

एक निर्मोही राजा की कहानी सुनने और ध्यान देने योग्य है –

निर्मोही राजा

किसी नगर में एक ज्ञानी राजा था । उसे सब निर्मोही कहते थे । एक दिन उसका राजकुमार बन में शिकार खेलने गया । उसे प्यास ज़ोर से लगी । पानी की खोज में, वह एक मुनि के आश्रम में जा पहुंचा । मुनि ने उसे जल पिलाया और पूछा – “आप किसके पुत्र हैं ?” लड़के ने कहा – “मैं निर्मोही राजा का पुत्र हूँ ।” महात्मा ने कहा – “राजकुमार ! एक ही मनुष्य निर्मोही भी हो और साथ ही राजा भी हो, यह नितान्त असंभव है । जो राजा होगा, वह निर्मोही न होगा और जो निर्मोही होगा, वह राजा न होगा ।” राजकुमार ने कहा – “यदि आपको विश्वास नहीं आता; तो आप जाकर परीक्षा कर लीजिये ।” मुनि ने कहा – “अच्छा, हम नगर में जाते हैं । जब तक हम न लौटें, तब तक आप यहीं ठहरें ।” यह कहकर मुनि महाराज नगर को चले गए और राजभवन के द्वार पर जा पहुंचे । द्वार पर उन्हें एक दासी कड़ी मिली ।
मुनि ने दासी से कहा:
तू सुन चेरी श्याम की, बात सुनावौं तोहि ।
कुंवर विनास्यौ सिंह ने, आसान परयौ मोहि ।।

दासी ने जवाब दिया:
ना मैं चेरी श्याम की, नहि कोई मेरो श्याम ।
प्रारब्धवश मेल यह, सुनो ऋषि अभिराम ।।

इसके बाद ऋषि आगे चले, तो उन्हें राजकुमार की स्त्री मिली । उससे उन्होंने कहा –
।। दोहा ।।
तू सुन चातुर सुन्दरी, अबला यौवनवान ।
देवीवाहन दलमल्यौ, तुम्हरो श्रीभगवान ।।

स्त्री ने जवाब दिया:
।। दोहा ।।
तपिया पूरब जनम की, क्या जानत हैं लोक ।
मिले कर्मवश आन हम, अब विधि कीन वियोग ।।

इसके बाद ऋषि ने राजकुमार की माता से मिलना चाहा । वे रानी के पास जा पहुंचे और उससे मिलकर उन्होंने कहा –
।। दोहा ।।
रानी तुमको विपत्ति अति, सूत खायो मृगराज ।
हमने भोजन न कियो, तिसी मृतक के काज ।।

रानी ने जवाब दिया:
।। दोहा ।।
एक वृक्ष डालें घनी, पंछी बैठे आय ।
यह पाटी पीरी भई, उड़ उड़ चहुँ दिशि जाएँ ।।

इसके बाद ऋषि राज-दरबार में गए और राजा से मिले । कुशल-प्रश्न होने के बाद ऋषि ने कहा –
।। दोहा ।।
राजा मुखत में राम कहु, पल-पल जात घडी ।
सुत खायो मृगराज ने, मेरे पास खड़ी ।।

राजा ने जवाब दिया:
।। दोहा ।।
तपिया तप क्यों छांडियो, इहाँ पालक नहि सोग ।
वासा जगत सराय का, सभी मुसाफिर लोग ।।

राजा का जवाब सुनते ही ऋषि को विश्वास हो गया कि, राजा ही नहीं, राजा और राजा का सारा कुटुम्ब निर्मोही है ।

मनुष्य को प्रथम तो गृहस्थाश्रम में रहना ही नहीं चाहिए और यदि रहे भी, तो निर्मोही राजा कि तरह मोह त्याग कर रहे । ममता त्याग कर गृहस्थी में रहने से, मनुष्य भवबंधन में नहीं बांधता और संसार के दुःख-क्लेश उसे संतप्त नहीं कर सकते । ऐसे ज्ञानी को जीवन्मुक्त कहते हैं ।

पर हम देखते हैं कि बुढ़ापे में मनुष्य कि आशा-तृष्णा और भी बढ़ जाती है । बूढ़ा रात-दिन अपने बेटे-पोतों और दोहितों की चिन्ता में ही मग्न रहता है । आप मरने के किनारे बैठा रहता है; तोभी पुत्र-पौत्रों के लिए धन की चिन्ता किया करता है । उसे काम से काम इस चला चली की अवस्था में तो परमात्मा का भजन करना चाहिए; पर बूढ़े से यह नहीं होता ।

शंकराचार्य कृत *”मोहमुद्गर” *में लिखा है –
बालस्तावत् क्रीड़ासक्तः, तरुणस्तावत् तरूणीरक्तः।
वृद्धस्तावत् चिंतामग्नः, परमे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः।।

बचपन में मनुष्य खेल-कूद में लगा रहता है, जवानी में युवती स्त्री में आसक्त रहता है और बुढ़ापे में चिन्ता फ़िक्रों में डूबा रहता है; लेकिन परम ब्रह्म की चिन्तना में कोई नहीं लगा रहता ।

शोक चिन्ता करना वृथा है

शोक चिन्ता करना वृथा और नाशमान है । यहाँ कोई किसी का नहीं फिर वृथा शोच-फ़िक्र में अपनी दुर्लभ मनुष्य-देह को नाश करना और जिस काम के लिए जगत में आये हैं, उस काम की ओर ध्यान न देना, सचमुच ही भारी नादानी है । पुत्र मर गया तो क्या ? स्त्री मर गयी तो क्या ? धन चला गया तो क्या ? जिस तरह स्त्री-पुत्र, मित्र-यार प्रभृति चले गए; मर गए; उसी तरह हम भी एक दिन मर जाएंगे; फिर शोच किसका ? यदि वे चले जाते और हम सदा बने रहते; तो भी शोच सकते थे; पर जब सभी को जाना है तो कौन किसका शोच करे ?

कहा है –
अष्टकुलाचलसप्तसमुद्राः ब्रह्म-पुरन्दर-दिनकर-रुद्राः।
न त्वं नाहं नायं लोकः, तदपि किमर्थं क्रियते शोकः ।।

हिमाचल और विंध्याचल प्रभृति आठ पर्वत, सातों समुद्र, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य और रूद्र सभी अनित्य और नाशमान हैं । न तू, न मैं और न यह लोक स्थायी है; तो फिर शोक किस लिए किया जाता है ?

मृत्यु से डरने और घबराने की जरुरत नहीं

जब तक मनुष्य को शरीर और शरीरी अथवा देह और आत्मा के अलग-अलग होने का ज्ञान नहीं होता, तब तक वह इस बात को नहीं समझता कि आत्मा, अमर,अविनाशी, नित्य और शाश्वत है; वह कभी नहीं मरता, उसे जल डूबा नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, हवा सोख नहीं सकती, तलवार-बन्दूक प्रभृति मार नहीं सकती, तभी तक वह डरता और घबराता है । यह शरीर नाश होता है, आत्मा नहीं; मरना, एक कपडा उतारकर दूसरा पहनना है; शरीर आत्मा के ठहरने की धर्मशाला मात्र है; अगर यह धर्मशाला टूट जायेगी तो आत्मा दूसरी में जा रहेगा – ऐसा ज्ञान होते ही, मनुष्य के मन में भय और भावना नहीं रहती । दुःख सुख का सम्बन्ध शरीर से है, आत्मा से नहीं; आत्मा को दुःख सुख नहीं व्यापते, क्योंकि वह निराकार है – ऐसा ज्ञान होते ही, दुःख आप से आप भाग जाते हैं – हाँ मौत की याद हरदम रखनी चाहिए, क्योंकि मौत को याद रखने से पाप नहीं होते और परमात्मा की शरण में शांति लाभ करना ही अच्छा मालूम होता है; पर मौत से डरना कभी न चाहिए । जो शरीर और आत्मा में भेद नहीं समझते, वे ही मौत के नाम से काँप उठते हैं; किन्तु जो शरीर और आत्मा को जुदा-जुदा समझते हैं, जीवन में कभी पाप नहीं करते, सदा पराया भला करते और परमात्मा को हर क्षण याद करते हैं, वे हँसते-हँसते चोला छोड़ देते हैं । भीष्म-पितामह कई दिनों तक शरशय्या पर लेटे रहे उन्हें ज़रा भी कष्ट न मालूम हुआ । अन्तिम दिन उन्होंने जगदीश को याद करते करते, नश्वर चोला हँसते-हँसते त्याग दिया ।

भीष्म-पितामह आत्मतत्त्व को पूर्वतया जानने वाले थे । वे जानते थे कि मैं पहले भी था अब वर्त्तमान में भी हूँ और आगे भविष्य में भी इसी तरह रहूँगा । शत्रु मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकते । हाँ, वे मेरी इस देह का नाश कर सकते हैं; पर देह का नाश होने से मेरी क्या हानि ? इस देह के नाश होने पर, दूसरी देह, इससे ताज़ा और नई, मुझे मिलेगी । मेरा आत्मा नित्य और अविनाशी है, उसे नाश करनेवाला जगत में कोई भी नहीं ।

गीता में कहा है –
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारुतः ।। 23 ।।

अविनाशी तू तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ।। १७ ।।

मुझको काटे कहाँ है वह तलवार ।
दाग दे मुझको कहाँ है वह नार ।।
गरम मुझको करे, कहाँ है वह पानी ।
वह में कब ताब, सूखने की ।।
मौत को मौत न आएगी ।
क़सद मेरा जो करके जायेगी ।।

मौत का शोक दूर करने का नुस्खा

महात्मा बुद्ध के ज़माने में किसी स्त्री का इकलौता पुत्र मर गया । पुत्र-शोक, सब शोकों से भारी होता है; इसलिए वह स्त्री शोकाभिभूत होकर, महात्मा बुद्ध के पास गयी और उनसे लड़के के जिला देने की प्रार्थना की । महात्मा ने कहा – “जिस घर में कोई न मारा हो, उस घर से थोड़े राय के दाने ले आओ । अगर तुम वो दाने ले आई तो हम तुम्हारे पुत्र को ज़िन्दा कर देंगे ।” वह स्त्री घर-घर पूछती फिरी; पर उसे एक भी घर ऐसा न मिला,जिसमें मौत न हुई थी । अतः वह बैरंग वापस आयी और महात्मा से सारा हाल निवेदन कर दिया । सुनते ही महात्मा ने कहा – “मौत प्राणिमात्र के पीछे लगी हुई है; जो जन्मा है वह अवश्य मरेगा । यह संसार नाशमान है । आगे पीछे सब को इस जगत से चल देना है। कोई सदा सर्वदा के लिए यहाँ नहीं आया । इसलिए इसमें शोक की कोई बात नहीं । मूर्ख ही मरे हुए का शोच किया करते हैं, ज्ञानी नहीं । ज्ञानी जानते हैं, कि आत्मा अजर, अमर, नित्य और अविनाशी है; इसी से वे शोच नहीं करते; किन्तु मूर्ख देह को आत्मा समझते हैं; इसी से शोक करते हैं ।” महात्मा का यह उपदेश सुनते ही, स्त्री का शोक दूर हो गया और उसे परम शांति लाभ हुई ।

भगवान् की शरण में ही सुख है

इस जगत में मनुष्य को किसी भी अवस्था में सुख नहीं है । फिर बुढ़ापा तो हर तरह दुखों की खान ही है । अतः मनुष्य को जवानी में ही, आगे आनेवाले बुढ़ापे का ख्याल करके, विषयों से मन हटा लेना और परिवार वालों के नाम को भी न रखा चाहिए । सामझदार को कम से कम जवानी के उतार में तो घर जञ्जाल त्याग, वन में जा, परमात्मा की भक्ति और उपासना करनी चाहिए । मन बारम्बार दबाने और समझने से से शान्त हो जाता है और धीरे-धीरे रही सही ममता भी छूट जाती है । अभ्यास के कारण, अन्तकाल में भगवत ही मन में रहने से, मनुष्य की मुक्ति भी हो जाती है; यानि आवागमन से पीछा छूट जाता है । परब्रह्म की शरण में चले जाने से जो आनन्द आता है, उसे लिखकर बता नहीं सकते ।
बुढ़ापे का चित्र देखकर, मौत को सिर पर मँडराती समझकर, कुटुम्बियों का नाता झूठा समझकर, विषय-वासनाओं को त्यागकर, पुत्र-कलत्र और धन-दौलत की ममता छोड़कर वैराग्य में मन लगाओ । अच्छा हो यदि शरीर में शक्ति सामर्थ्य होते हुए घर से निकल कर वन में जा बसों और सबसे नाता तोड़ एकमात्र परमात्मा से नाता जोड़ लो । उसका नाता ही सच्चा नाता है; और सब नाते झूठे हैं । उसकी शरण में चले जाने से शोक-ताप सता नहीं सकते । भगवान् को भूलने से ही मनुष्य दुःख भोगता और संसारी शत्रुओं से तंग रहता है; किन्तु जो भगवान् के चरण-कमलों में चला जाता है, उसका कोई अनिष्ट नहीं कर सकता और शोक-ताप तो उससे हज़ार कोस दूर भागते हैं । याद रक्खो, परमात्मा की शरण में चले जाने वाले से काल और यमराज तक भय खाते हैं ऋद्धि सिद्धि तो उसके सामने हाथ बांधे खड़ी रहती हैं ।

भगवान् ने कहा है –
जो समीप आवै शरणाई ।
राखौं ताहि प्राण की नाई ।।

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं –
कोटि विघ्न संकट विकट, कोटि शत्रु जो साथ।
तुलसी बल नहीं कर सकें, जो सुदृष्टि रघुनाथ।।
राखन हारा साइयाँ, मारि न सकहे कोय ।
बाल न बांका कर सकै, जो जग बैरी होय ।।

बुढ़ापे में जगदीश को याद करो

बुढ़ापा आ जाने पर भी, जो परलोक बनाने की सुध नहीं करते, स्त्री-पुरुषों की ममता में पड़कर, घर-गृहस्थी के जञ्जाल में फंसकर, उम्र पूरी कर देते हैं, उनकी भयङ्कर हानि और निन्दा होती है ।
कहा है –
मूर्खो द्विजातिः स्थविरो गृहस्थः ।
कामी दरिद्रो, धनवान तपस्वी ।।
वेश्या कुरूपा, नृपतिः कदर्य्यः ।
लोके षडेतानि विडम्बितानि ।।

मूर्ख ब्राह्मण, बूढा गृहस्थ, दरिद्री कामी, धनवान तपस्वी, कुरूपा वेश्या और स्वेच्छाचारी राजा – ये ६ अपना फजीता और लोकनिन्दा करनेवाले हैं ।

जो बुढ़ापे तक भी गर्भावस्था का किया इकरार पूरा नहीं करते, उनको विद्वान् और तत्त्ववेत्ता लोग पुरुष नहीं “नपुंसक” कहते हैं । उनको बारम्बार जन्म लेना और मरना होता है । अतः बुढ़ापे में तो मनुष्य को सब तज कर हर भजन और अपना परलोक सुधारना चाहिए ।

छप्पय

भयो संकुचित गात, दन्तु उखरि परे महि।
आँखिन दीखत नाहिं, बदन ते लार परत बहि।।
भई चाल बेचाल, हाल बेहाल भयो अति ।
बचन न मानत बन्धु, नारिहु तजि प्रीति गति ।।
यह कष्ट महा दिए वृद्धपन, कछु मुख सों नहिं कहि सकत।
निज पुत्र अनादर कर कहत, यह बूढ़ो यों ही बकत ।।
04/08/19, 12:41 am – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ८५,८६

पालङ्कयावत्मृतश्चञ्चुः स तु सङ्ग्रहणात्मकः। विदारी वातपित्तघ्नी मूत्रला स्वादुशीतला॥८५॥

जीवनी बृंहणी कण्ठया गुर्वी वृष्या रसायनम्। चक्षुष्या सर्वदोषघ्नी जीवन्ती मधुरा हिमा ॥८६॥

चञ्चु का शाक- इसके सामान्य गुण पालक के समान होते हैं। इसका विशेष गुण है ग्राही होना।

वक्तव्य- करीर या करील को क्रकरीपत्र भी कहा गया है। यह अन्य वृक्षों की भांति बहुत पत्तों वाला नहीं होता, तथापि इसकी नवीन शाखाओं में विरल पत्ते होते है। निघण्टुकारो ने इसे ‘मरुभूरूह’ कहा है। इसकी कली तथा फलों का अचार भी बनता है। औषधीय उपयोग में इसके कली, फल एवं छाल लिए जाते है।

मुञ्जातक- एक कन्द विशेष का नाम है, इसके गुण राजनिघण्टु में देखें। इसके अभाव में तालमज्जा का प्रयोग किया जाता है। सु. सू. ३९/९ में कफनाशक द्रव्यों में इसका भी परिगणन किया गया है।

विदारी(बिलाई) कन्द- यह वात-पित्तनाशक, मल-मूत्र को निकालने वाला, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, जीवनी शक्ति को देने वाला, स्वास्थ्यवर्धक, कण्ठ के लिए हितकर, पाचन में गुरु, वीर्यवर्द्धक तथा रसायन होता है।

वक्तव्य- इसकी सुदीर्घ लताएं होती है, उनकी जड़ो में गांठ के रूप में यह कन्द पाया जाता है। छिलका उतारने पर दूध जैसा सफेद द्रव इसमें से निकलता है। यह। खाने में आरम्भ में मधुर किन्तु अन्त में कुछ कसैलापन इसमें पाया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह जाड़े का मेवा है। वर्ष भर के बाद इनका स्वाद वैसा नहीं रह जाता।

जीवन्ति का शाक- यह दृष्टि के लिए हितकर, त्रिदोषनाशक, मधुर तथा शीतवीर्य है।
04/08/19, 7:51 am – Abhinandan Sharma: वाह । इतना कुछ लिखा है आपने । परोपकार सम धन नहीं भाई । बहुत सुंदर ।

अब एक बात बताइये – कायर के संग शूर भागे पर भागे है’ इसका क्या अर्थ है – केवल पढ़ना नहीं है ना ।

जो निर्मोही पुरुष की कथा दी गयी है, मुझे सबसे अधिक पसंद आयी, बहुत प्रायोगिक । आप लोगों को कौन सी कथा सबसे अच्छी लगी क्योंकि हर एक कथा, मोती की तरह है, बताइए, आपको कौन सा मोती अच्छा लगा ।
04/08/19, 7:52 am – Abhinandan Sharma: क्या तरोई और तोरई एक ही है ?
04/08/19, 7:53 am – Abhinandan Sharma: 🙏🙏
04/08/19, 8:14 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: यहाँ जो मेरी समझ आया वो ये था कि कायर के साथ से शूर भी कायर हो जाता है और श्लोक के सन्दर्भ में, संसारी संगतियो से वैराग्य आसान नहीं, टेढ़ी खीर है।
04/08/19, 8:16 am – Abhinandan Sharma: कैसे ? कोई उदाहरण ?
04/08/19, 8:33 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: ऋषभदेव का हिरन के बच्चे को पालना और उसी के ममत्व में पड़ जाना।
04/08/19, 9:11 am – Abhinandan Sharma: नहीं बात शूर और कायर की हो रही है । कैसे कायर शूर को भी कायर बना देता है ?
04/08/19, 9:15 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
मनुस्मृति
द्वितीय अध्याय
04/08/19, 9:15 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: दूरस्थो नार्चयेदेनं न क्रुद्धो नान्तिके स्त्रियाः ।
यानासनस्थश्चैवैनं अवरुह्याभिवादयेत् । । २.२०२ । ।

प्रतिवातेऽनुवाते च नासीत गुरुणा सह ।
असंश्रवे चैव गुरोर्न किं चिदपि कीर्तयेत् । । २.२०३ । ।
04/08/19, 9:15 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: अर्थ

शिष्य खुद दूर रहकर दूसरों के द्वारा गुरुपूजा ना करे, पूजा में क्रोध ना करे,गुरु अपनी स्त्री के पास हो तब पूजा ना करें।शिष्य अगर गाड़ी में बैठा हो तो उतर कर प्रणाम करे। गुरु की तरफ अगर शिष्य की तरफ से वायु प्रवाह हो रहा हो तो गुरु के सम्मुख ना बैठे। अगर गुरु ना सुन सक रहें हो तब कुछ नहीं कहना चाहिए

🙏हरी ॐ
04/08/19, 9:20 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 🤔
04/08/19, 9:28 am – Abhinandan Sharma: गांव में लड़ाई हो जाये, गली में जो पिट रहा हो उसके बहुत समर्थक हों, सब उसको बचाने जा रहे हों और एक आदमी दौड़ता हुआ आये – भागो भागो, जान बचाओ, वो इधर ही आ रहे हैं । तो आधे से ज्यादा लोग वापिस घरों में घुस जाते हैं । ऐसे एक अकेला भीरु, बाकियों को भी डरा देता है ।
04/08/19, 9:29 am – Abhinandan Sharma: ऐसा ही युद्ध में, मोर्चे से एक सैनिक भागता हुआ आये, भागो भागो, सब मर जायेंगे तो पीछे के सैनिकों के भी पैर उखड़ जाते हैं ।
04/08/19, 9:30 am – Abhinandan Sharma: ऐसे एक डरपोक, बाकी शूरों को भी डरा देता है, ये सिर्फ संगत का असर है । अगर शूर ऐसे लोगों का साथ रहे ,जो मौत से न डरते हैं तो कोई भी पीछे नहीं हटेगा लेकिन जो भीरु होंगे, वो भागेंगे और देखा देखी सब भागने लगते हैं ।
04/08/19, 9:33 am – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
04/08/19, 10:16 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 👌🏼
04/08/19, 11:18 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

तीनि अवस्था तीनि गुन
तेहि कपास ते काढ़ि।
तूल तुरीय सँवारि पुनि
बाती करै सुगाढ़ि।।

( जागृत , स्वप्न और सुषुप्ति) तीनों अवस्थाएँ और ( सत्व , रज और तम) तीनों गुण रूपी कपास से तुरीयावस्था रूपी रुई को निकालकर और फिर उसे सँवार कर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावे।।117-ग।।

एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यान मय।

जातहिं जासु समीप
जरहिं मदादिक सलभ सब।।

इस प्रकार तेज की राशि विज्ञान मय दीपक को जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जायँ।।117-घ।।
05/08/19, 10:57 am – Shastra Gyan Gaurav Valecha Katni, MP:
05/08/19, 11:15 am – Abhinandan Sharma: एडमिन हमाये बोत गुस्सेल हेंगे 😆
05/08/19, 11:16 am – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 😃😃
05/08/19, 11:54 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा।
दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा।
तब भव मूल भेद भ्रम नासा।।

सोऽहमस्मि ( वह ब्रह्म मैं हूं)
यह जो अखण्ड ( तैल धारा वत् कभी न टूटने वाली) वृत्ति है
वही ( उस ज्ञान दीपक की ) परम प्रचण्ड दीप शिखा ( लौ) है।

( इस प्रकार ) जब आत्मानुभव के सुख का सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है ।।117-1।।

प्रबल अबिद्या कर परिवारा।
मोह आदि तम मिटइ अपारा।।

तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा।
उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।।

और महान् बलवती अविद्या के परिवार मोह आदि का अन्धकार मिट जाता है।
तब वही( विज्ञान रूपिणी ) बुद्धि (आत्मानुभव रूप ) प्रकाश को पाकर ह्रदय रूपी घर में बैठकर उस जड़ – चेतन की गाँठ को खोलती है ।।117-2।।
05/08/19, 12:36 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
05/08/19, 2:26 pm – +91 11637: नागपंचमी के पावन पर्व पर ••••••••
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हिन्दू संस्कृति ने पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया है। हमारे यहां गाय की पूजा होती है। कई बहनें कोकिला-व्रत करती हैं। कोयल के दर्शन हो अथवा उसका स्वर कान पर पड़े तब ही भोजन लेना, ऐसा यह व्रत है।
हमारे यहाँ वृषभोत्सव के दिन बैल का पूजन किया जाता है। वट-सावित्री जैसे व्रत में बरगद की पूजा होती है, परन्तु नाग पंचमी जैसे दिन नाग का पूजन जब हम करते हैं, तब तो हमारी संस्कृति की विशिष्टता पराकाष्टा पर पहुंच जाती है।
गाय, बैल, कोयल इत्यादि का पूजन करके उनके साथ आत्मीयता साधने का हम प्रयत्न करते हैं, क्योंकि वे उपयोगी हैं।
लेकिन नाग हमारे किस उपयोग में आता है, उल्टे यदि काटे तो जान लिए बिना न रहे। हम सब उससे डरते हैं। नाग के इस डर से नागपूजा शुरू हुई होगी, ऐसा कई लोग मानते हैं, परन्तु यह मान्यता हमारी संस्कृति से सुसंगत नहीं लगती।
नाग को देव के रूप में स्वीकार करने में आर्यों के हृदय की विशालता का हमें दर्शन होता है।
‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्‌’ इस गर्जना के साथ आगे बढ़ते हुए आर्यों को भिन्न-भिन्न उपासना करते हुए अनेक समूहों के संपर्क में आना पड़ा। वेदों के प्रभावी विचार उनके पास पहुँचाने के लिए आर्यों को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा।

विभिन्न समूहों को उपासना विधि में रहे फर्क के कारण होने वाले विवाद को यदि निकाल दिया जाए तो मानव मात्र वेदों के तेजस्वी और भव्य विचारों को स्वीकार करेगा, इस पर आर्यों की अखण्ड श्रद्धा थी। इसको सफल बनाने के लिए आर्यों ने अलग-अलग पुंजों में चलती विभिन्न देवताओं की पूजा को स्वीकार किया और अलग-अलग पुंजों को उन्होंने आत्मसात करके अपने में मिला लिया। इन विभिन्न पूजाओं को स्वीकार करने के कारण ही हमें नागपूजा प्राप्त हुई होगी, ऐसा लगता है।

भारत देश कृषिप्रधान देश था और है। सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है।

साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रेय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली।

साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है।
साँप भी प्रभु का सर्जन है, वह यदि नुकसान किए बिना सरलता से जाता हो, या निरुपद्रवी बनकर जीता हो तो उसे मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं, तब अपने प्राण बचाने के लिए या अपना जीवन टिकाने के लिए यदि वह हमें डँस दे तो उसे दुष्ट कैसे कहा जा सकता है?
हमारे प्राण लेने वालों के प्राण लेने का प्रयत्न क्या हम नहीं करते?
साँप को सुगंध बहुत ही भाती है। चंपा के पौधे को लिपटकर वह रहता है या तो चंदन के वृक्ष पर वह निवास करता है। केवड़े के वन में भी वह फिरता रहता है। उसे सुगंध प्रिय लगती है, इसलिए भारतीय संस्कृति को वह प्रिय है।
प्रत्येक मानव को जीवन में सद्गुणों की सुगंध आती है, सुविचारों की सुवास आती है, वह सुवास हमें प्रिय होनी चाहिए।
हम जानते हैं कि साँप बिना कारण किसी को नहीं काटता। वर्षों परिश्रम संचित शक्ति यानी जहर वह किसी को यों ही काटकर व्यर्थ खो देना नहीं चाहता। हम भी जीवन में कुछ तप करेंगे तो उससे हमें भी शक्ति पैदा होगी। यह शक्ति किसी पर गुस्सा करने में, निर्बलों को हैरान करने में या अशक्तों को दुःख देने में व्यर्थ न कर उस शक्ति को हमारा विकास करने में, दूसरे असमर्थों को समर्थ बनाने में, निर्बलों को सबल बनाने में खर्च करें, यही अपेक्षित है।
कुछ दैवी साँपों के मस्तिष्क पर मणि होती है। मणि अमूल्य होती है। हमें भी जीवन में अमूल्य वस्तुओं को (बातों को) मस्तिष्क पर चढ़ाना चाहिए।
समाज के मुकुटमणि जैसे महापुरुषों का स्थान हमारे मस्तिष्क पर होना चाहिए।
हमें प्रेम से उनकी पालकी उठानी चाहिए और उनके विचारों के अनुसार हमारे जीवन का निर्माण करने का अहर्निश प्रयत्न करना चाहिए।
सर्व विद्याओं में मणिरूप जो अध्यात्म विद्या है, उसके लिए हमारे जीवन में अनोखा आकर्षण होना चाहिए। आत्मविकास में सहायक न हो, उस ज्ञान को ज्ञान कैसे कहा जा सकता है?
साँप बिल में रहता है और अधिकांशतः एकान्त का सेवन करता है।
इसलिए मुमुक्षु को जनसमूह को टालने का प्रयत्न करना चाहिए। इस बारे में साँप का उदाहरण दिया जाता है।

देव-दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन में साधन रूप बनकर वासुकी नाग ने दुर्जनों के लिए भी प्रभु कार्य में निमित्त बनने का मार्ग खुला कर दिया है। दुर्जन मानव भी यदि सच्चे मार्ग पर आए तो वह सांस्कृतिक कार्य में अपना बहुत बड़ा योग दे सकता है और दुर्बलता सतत खटकती रहने पर ऐसे मानव को अपने किए हुए सत्कार्य के लिए ज्यादा घमंड भी निर्माण नहीं होगा।
दुर्जन भी यदि भगवद् कार्य में जुड़ जाए तो प्रभु भी उसको स्वीकार करते हैं, इस बात का समर्थन शिव ने साँप को अपने गले में रखकर और विष्णु ने शेष-शयन करके किया है।
समग्र सृष्टि के हित के लिए बरसते बरसात के कारण निर्वासित हुआ साँप जब हमारे घर में अतिथि बनकर आता है तब उसे आश्रय देकर कृतज्ञ बुद्धि से उसका पूजन करना हमारा कर्त्तव्य हो जाता है।

इस तरह नाग पंचमी का उत्सव श्रावण महीने में ही रखकर हमारे ऋषियों ने बहुत ही औचित्य दिखाया है।

चातुर्मास के अंतर्गत आने वाले श्रावण मास जो नागेश्वर भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, के शुक्ल पक्ष की पंचमी अर्थात् नाग पंचमी का क्या महत्व है, आइये यह जानते हैं। यूं तो प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष वाली पंचमी का अधिष्ठाता नागों को बतलाया गया है। पर श्रावण शुक्ला पंचमी एक विशेष महत्व रखती है। शायद ही कोई हो जो नाग/सर्प से अपरिचित होगा। लगभग हर जगह देखने को मिल जाते हैं ये सर्प।
नाग हमेशा से ही एक रहस्य में लिपटे हुए रहे हैं इनके विषय में फैली अनेक किंवदंतियों के कारण। जैसे नाग इच्छाधारी होते हैं, मणि धारण करते हैं, मौत का बदला लेते हैं आदि-आदि। पर जो भी हो, सर्प छेड़ने या परेशान करने पर ही काटते हैं। आप अपने रास्ते जाइए साँप अपने रास्ते चला जाएगा।
हाँ कभी मार्ग भटककर अचानक इनका घर में आ जाना डर का कारण हो सकता है पर ऐसे में या किसी भी परिस्थिति में इन साँपों को मारना नहीं चाहिए। कोशिश यही करनी चाहिए कि इनको एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया जाये।
हमारे हिन्दू धर्मग्रन्थों में भी नागों का वर्णन मिलता है कहीं भगवान शिव के गले के आभूषण के रूप में तो कहीं भगवान विष्णु के शेषनाग के रूप में।
ऐसी मान्यता है कि शेषनाग ही श्रीरामचंद्र जी के भ्राता लक्ष्मण जी के रूप में अवतरित हुए थे।
कालिय नाम के नाग का मर्दन श्रीकृष्ण द्वारा किया गया था और तारा महाविद्या को भी सर्पों के आभूषणो से युक्त बतलाया गया है।
यज्ञोपवीत का संस्कार करते समय भी उसमें रुद्रादि देवों के साथ साथ “सर्पानावाहयामि” कहकर सर्पों का आवाहन किया जाता है ताकि यज्ञोपवीत भली प्रकार द्विज की रक्षा कर सके। शास्त्रों में तो पंचमी को नागों को दूध से स्नान करवाने को कहा गया है वह भी जरूरी नहीं कि नाग असली हो, ताँबे या गोबर या मिट्टी से बने नाग का ही स्नान/अभिषेक किया जाना चाहिए।
पुराणों के अनुसार किसी भी पंचमी तिथि को जो नागों को दुग्धस्नान करवाता है उसके कुल को “वासुकि, तक्षक, कालिय, मणिभद्र, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक तथा धनञ्जय” – ये सभी नाग अभयदान देते हैं ।

इस संबंध में श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को कही गयी एक कथा है कि
एक बार राक्षसों व देवताओं ने मिलकर जब सागर मंथन किया था तो उच्चैःश्रवा नामक अतिशय श्वेत घोड़ा निकला जिसे देख नागमाता कद्रू ने अपनी सपत्नी/सौत विनता से कहा कि,
“देखो! यह अश्व श्वेतवर्ण का है परन्तु इसके बाल काले दिखाई पड़ रहे हैं।” तब विनता बोली, “यह अश्व न तो सर्वश्वेत है, न काला है और न ही लाल रंग का।” यह सुनकर कद्रू बोली, “अच्छा? तो मेरे साथ शर्त करो कि यदि मैं इस अश्व के बालों को कृष्णवर्ण का दिखा दूँ तो तुम मेरी दासी हो जाओगी और यदि नहीं दिखा सकी तो मैं तुम्हारी दासी हो जाऊँगी।”
विनता ने शर्त स्वीकार कर ली और फिर वो दोनों क्रोध करती हुई अपने-अपने स्थानों को चली गयीं। कद्रू ने अपने पुत्रों को सारा वृत्तान्त कह सुनया और कहा, “पुत्रों! तुम अश्व के बालों के समान सूक्ष्म होकर उच्चैःश्रवा के शरीर से लिपट जाओ, जिससे यह कृष्ण वर्ण का दिखने लगेगा और मैं शर्त जीतकर विनता को दासी बना सकूंगी।”
यह सुन नाग बोले, “माँ! यह छल तो हम लोग नहीं करेंगे, चाहे तुम्हारी जीत हो या हार। छल से जीतना बहुत बड़ा अधर्म है।”
पुत्रों के ऐसे वचन सुनकर कद्रू ने क्रुद्ध होकर कहा, “तुमलोग मेरी आज्ञा नहीं मानते हो, इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि तुम सब, पांडवों के वंश में उत्पन्न राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में अग्नि में जल जाओगे।”
नागगण, नागमाता का यह शाप सुन बहुत घबड़ाये और वासुकि को साथ लेकर ब्रहमाजी को सारी बात कह सुनाई।
ब्रह्मा जी ने कहा, “वासुके! चिंता न करो।
यायावर वंश का बहुत बड़ा तपस्वी जरत्कारू नामक ब्राह्मण होगा जिसके साथ तुम अपनी जरत्कारू नाम की बहिन का विवाह कर देना और वह जो भी कहे, उसका वचन स्वीकार लेना। उनका पुत्र आस्तीक उस यज्ञ को रोक तुम लोगों की रक्षा करेगा।”
यह सुन वासुकि आदि नाग प्रसन्न हो उन्हें प्रणाम कर अपने लोक को चले गए। कालांतर में वह यज्ञ जब हुआ तो नाग पंचमी के दिन ही आस्तीक मुनि ने नागों की सहायता की थी। अतः उस दाह की व्यथा को दूर करने के लिए ही गाय के दुग्ध द्वारा नाग प्रतिमा को स्नान कराने की मान्यता है जिससे व्यक्ति को सर्प का भय नहीं रहता इसीलिए यह दंष्ट्रोद्धार पंचमी भी कहलाती है।
नागपंचमी को किसी भी समय घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर नागों के चित्र या एक-एक गोबर से नाग बनाकर उनका दही, दूध, दूर्वा, पुष्प, कुश, गंध, अक्षत और नैवेद्य अर्पित कर पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन करवाने से व्यक्ति के कुल में कभी सर्पों का भय नहीं होता।

“‘नमोsस्तु सर्व सर्पेभ्यो'”
सभी सर्पों को नाग पंचमी पर नमन🙏🙏🙏🙏🙏🙏
05/08/19, 5:35 pm – LE Onkar A-608: 🙏
05/08/19, 6:22 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 112

क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः
क्षणं वित्तैहीनं क्षणमपि च सम्पूर्णविभवः।
जराजीर्णैरङ्गैर्नट इव क्लीमंडिततनुर्नरः
संसारान्ते विशति यमधानीजवनिकाम्।। ११२ ।।

अर्थ:
मनुष्य नाटक के एक्टर के समान है; जो क्षणभर में बालक, क्षणभर में युवा और कामी रसिया बन जाता है तथा क्षण में दरिद्र और क्षण में धनैश्वर्य-पूर्ण हो जाता है । फिर; अन्त में बुढ़ापे से जीर्ण और सुकड़ी हुई खाल का रूप दिखाकर, यमराज के नगर की ओट में छिप जाता है ।

महाराज भर्तृहरि जी ने मनुष्य का नाटक के स्टेज-एंकर से खूब ही अच्छा मिलान किया है । सचमुच ही मनुष्य नाटक के किरदार सा ही काम करता है ।

मंच पर जिस तरह एक ही कलाकार कभी बालक, कभी जवान, कभी बूढ़ा, कभी धनि, कभी निर्धन, कभी राजा, कभी फ़कीर, कभी साधू, कभी असाधु तथा कभी रोगी और निरोगी, त्यागी और अत्यागी, भोगी और योगी, गृहस्थ और सन्यासी बनकर, तरह-तरह के तमाशे दिखता और शेष में नाटक के परदे के पीछे छिप जाता है; उसी तरह मनुष्य बालक और जवान, धनी और निर्धन प्रभृति के स्वांग भर और दिखाकर, अन्त में जीवन-नाटक का आखिरी सीन – बुढ़ापे का रूप – दिखा कर, यमपुरी-रुपी परदे की ओट में जाकर छिप जाता है; यानि इस दुनिया से कूच कर जाता है ।

छप्पय

छिन में बालक होत, होत छिनहि में यौवन।
छिन ही में धनवन्त, होत छिन ही में निर्धन।।
होत छिनक में वृद्ध, देह जर्जरता पावत।
नट ज्यों पलटत अंग, स्वांग नित नए दिखावत।।
यह जीव नाच नाना रचत, निचल्यो रहत न एकदम।
करके कनात संसार की, कौतुक निरखत रहत यम।।
05/08/19, 6:37 pm – LE Nisha Ji :
05/08/19, 7:09 pm – Abhinandan Sharma: क्या किसी ने श्लोक के पहले शब्द पर ध्यान दिया ? “चोदितो गुरूणाम नित्यं” बताये क्या समझ आया ?
05/08/19, 7:12 pm – Abhinandan Sharma: इसका अर्थ सुधाकर के अलावा कौन बतायेगा ? अगर समझ में नहीं आया था तो पूछा क्यों नहीं ?
05/08/19, 7:19 pm – Abhinandan Sharma: वाह, अद्भुत ।
05/08/19, 7:20 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: अभी ध्यान दिया, पर सही मतलब नहीं समझ आया।
05/08/19, 7:28 pm – Abhinandan Sharma: सुधाकर जी, plz feapond
05/08/19, 7:30 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: बता दिया गया है 🙏🏼
05/08/19, 10:11 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ८७,८८,८९

कुष्माण्डतुम्बकालिङ्गकर्कार्वेर्वारूतिण्डिशम्। तथा त्रपुसचीनाकचिर्भटं कफवातकृत्॥८७॥

भेदि विष्टम्भ्यभिष्यन्दि स्वादुपाकरसं गुरु।

कुष्माण्ड आदि का वर्णन- कुष्माण्ड(कोहड़ा, पेठा), तुम्ब( जिसकी साधु लोग तुम्बी या कमण्डलु बनाते हैं), कलिंग( तरबूज), कर्कारु (खरबूजा), उर्वारु(ककड़ी या खारा), तिण्डिश(टिंडे), त्रपुस(बड़ा खीरा), चीनाक(चीना ककड़ी) और चिर्भट (फूट)– ये सभी कफकारक, वातकारक, मलभेदक, विष्टम्भी, अभिष्यन्दि, विपाक तथा रस मे मधुर एवं गुरु होते है।

बल्लीफलानां प्रवरं कुष्माण्डं वातपित्तजित्॥८८॥

बस्तिशुद्धिकरं वृष्यम् त्रपुसं त्वतिमूत्रलम्। तुम्बं रुक्षतरं ग्राहि कालिङ्गैर्वारुचिर्भटम्॥८९॥

बालं पित्तहरं शीतं विद्यात्पक्वमतोऽन्यथा।

कुष्माण्ड(कोहड़ा) के गुण- लताओं में फलने वाले उक्त सभी फलो में कुष्माण्ड उत्तम माना गया है। यह वात तथा पित्त का शमन करता है, बस्ति(मूत्राशय) को शुद्ध करता है और वीर्य को बढ़ाता है।

त्रपुस (बड़ा खीरा)- कुष्माण्ड आदि से अधिक मूत्रकारक होता है।

तुम्ब या तुम्बा(गोल लौआ या लौकी)- तरबूज, ककड़ी, फूट ये सब रूक्ष तथा मल को बांधने वाले होते है। ऊपर कहे गये फल जब तक बाल (मुलायम) रहते है तब तक इनका गुण पित्तनाशक होता है और ये शीतवीर्य होते है। जब ये पक जाते है, तब पित्तकारक एवं उष्णवीर्य हो जाते है।
05/08/19, 10:11 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: जी एक ही है।
05/08/19, 10:14 pm – Poonam Goyal Delhi Artist Shastra Gyan: कृपया इसका उत्तर बताए जो आपने सब से पूछा था?
05/08/19, 10:26 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: चोदितो गुरुणाम नित्यं – नित्य गुरु के प्रेरणा से
05/08/19, 10:26 pm – Ashu Bhaiya: 👏🏻👏🏻
05/08/19, 10:26 pm – Ashu Bhaiya: की
05/08/19, 11:00 pm – Poonam Goyal Delhi Artist Shastra Gyan: 😊🙏
05/08/19, 11:03 pm – FB Mrudul Tiwari Allahabad Shastra Gyan: 🙏🙏🙏🙏👌👌👌👌
05/08/19, 11:20 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वैराग्य शतकं – 113

अहौ वा हारे वा बलवति रिपौ वा सुहृदि वा
मणौ वा लोष्ठे वा कुसुमशयनेवा दृषदि वा।
तृणे वा स्त्रैणे वा मम समदृशो यान्तु दिवसाः
क्वचितपुण्यारण्ये शिवशिवशिवेति प्रलपतः।। ११३ ।।

अर्थ:
हे परमात्मा ! मेरे शेष दिन, किसी पवित्र वन में, “शिव शिव” रटते हुए बीतें; सर्प और पुश-हार, बलवान शत्रु और मित्र, कोमल पुष्प-शय्या और पत्थर की शिला, मणि और पत्थर, तिनका और सुन्दरी कामिनियों के समूह में मेरी समदृष्टि हो जाय, मेरी यही इच्छा है ।

खुलासा – कोई विरक्त पुरुष परमात्मा से प्रार्थना करता है कि मेरी मति ऐसी कर दे कि, मुझे सर्प और हार, शत्रु और मित्र, पुष्प-शय्या और शिला, रत्न और पत्थर, तिनका और सुन्दरी स्त्री सब एक से दीखने लगें; इनमें मुझे कुछ भेद न मालूम हो; मैं समदर्शी हो जाऊं और मेरा शेष जीवन किसी पवित्र वन में “शिव शिव शिव” जपते बीते।

जब सभी शरीरों में एक ही व्यापक ब्रह्म दीखने लगे; शत्रु-मित्र में भेद न मालूम हो; हर्ष-शोक और दुःख-सुख सब में चित्त एकसा रहे; तब योगसिद्धि हुई समझनी चाहिए ।
कबीरदास कहते हैं –
सुदृष्टि सतगुरु करौ, मेरा भरम निकार।
जहाँ देखों तहाँ एक ही, साहब का दीदार।।
समदृष्टि तब जानिये, शीतल समता होय।
सब जीवन कि आत्मा, लखै एकसी सोय।।
समदृष्टि सतगुरु किया, भरम किया सब दूर।
दूजा कोई दिखे नहीं, राम रहा भरपूर।।

यही अवस्था सर्वोत्तम अवस्था है । इसी में परमानन्द है । इस अवशता में शोक और दुःख का नाम भी नहीं है; पर यह अवस्था उन्ही को प्राप्त होती है, जिन पर जगदीश कि कृपा होती है या जिनके पूर्व जन्म के सञ्चित पुण्यों का उदय होता है ।

समदर्शी होने के उपाय

समदर्शिता ही परमानन्द की सीढ़ी है

चित्त की समता ही योग है । जब समान दृष्टी हो गयी, तब योगसिद्धि में बाकी ही क्या रहा ? जब मनुष्य को इस बात का ज्ञान हो जाता है, कि समस्त जगत और जगत के प्राणियों में एक ही चेतन आत्मा है; छोटे बड़े, नीच-उंच सभी शरीरों में एक ही ब्रह्म का प्रकाश है; तब उसकी नज़र में सभी समान हो जाते हैं । जब वह राजा-महराजा, अमीर और गरीब, मनुष्य और पशु-पक्षी, हाथी और चींटी, सर्प और मगर – सब में एक ही चेतन आत्मा को व्यापक देखता है; तब उसके दिल में किसी से राग और किसी से विराग, किसी से विरोध और किसी से प्रणय-भाव रह नहीं जाता; उस समय उसे न कोई शत्रु दीखता है और न कोई मित्र । इस अवस्था में पहुँचने पर, वह न किसी को अपना समझता है, न पराया । इस समय ही उसे स्त्री और पुरुष, दोस्त और दुष्काण, सर्प और पुष्प-हार, सोना और मिट्टी प्रभृति में कोई फर्क नहीं मालूम होता । इस अवस्था में, उसके अन्तःकरण से दुखों का घटाटोप दूर होकर, परमानन्द कि प्राप्ति होती है । उस समय जो आनन्द होता है, उसको कलम से लिखकर बताना कठिन ही नहीं; असंभव है ।

समस्त जगत में एक ही आत्मा व्यापक है ?

बेशक, सारे जगत में एक ही चेतन आत्मा है । जिस तरह गुलाब-जल से भरे घड़े में, गङ्गाजल से भरे घड़े में, मूत्र से भरे घड़े में और शराब से भरे घड़े में एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब – अक्स पड़ता है, सबमें एक ही सूर्य दीखता है; उसी तरह मनुष्य, पशु-पक्षी और मागत-मैच प्रभृति जगत के सभी प्राणियों में एक ही चेतन ब्रह्म का प्रतिबिम्ब या प्रकाश है । अलग-अलग प्रकार के शरीरों या उपाधियों के कारण, सबमें एक ही आत्मा होने पर भी अलग-अलग दीखते हैं । लेकिन भिन्न-भिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न आत्मायों का होना, अज्ञानियों को ही मालूम होता है; जो सच्चे तत्ववेत्ता और पपूर्ण ज्ञानी हैं अथवा जो आत्मतत्त्व कि तह तक पहुँच गए हैं, उन्हें सभी शरीरों में एक ही आत्मा दीखता है । वे समझते हैं कि, जो आत्मा हम में है, वही समस्त जगत और जगत के प्राणियों में है । बकरी के शरीर में जो आत्मा है, वह बकरी; हाथी के शरीर में जो आत्मा है, वह हाथी और मनुष्य के शरीर में जो आत्मा है, वह मनुष्य कहलाता है । जिन जिन शरीरों में आत्मा प्रवेश कर गया है, उन्ही उन्हीं शरीरों के नाम से वह पुकारा जाता है; शरीरों या उपाधियों का भेद है; आत्मा में कोई भेद नहीं । नदी, तालाब, झील, बावड़ी, झरना, सोता और कुंआ – इन सब में एक ही जल है, पर नाम अलग-अलग है । नाम अलग अलग हैं । एक लोहे के डण्डे पर कपडा लपेट कर जो अग्नि जलाई जाती है, उसे मशाल कहते हैं और एक मिट्टी के दीवले में जो अग्नि जलती है, उसे दीपक कहते हैं । पृथ्वी एक ही है, पर उसके नाम अलग-अलग हैं । किसी को नगर, किसी को गाँव, किसी को ढानी और किसी को घर कहते हैं; पर है तो सब धरती ही । ताना और बाना एक ही सूत के दो नाम हैं; पर है दोनों में ही सूत । वन एक ही है; उस में अनेक वृक्ष हैं और उनके नाम तथा जातियां अलग-अलग हैं । बीज से वृक्ष होता है और वृक्ष से बीज होता है; अतः बीज वृक्ष है और वृक्ष बीज है । दोनों एक ही हैं, पर नाम अलग-अलग हैं । बाप से बीटा पैदा होता है; अतः बाप में और बेटे में एक ही आत्मा है, अतएव बाप बेटा है और बेटा बाप है । बहुत कहना-समझाना वृथा है । निश्चय ही सबमें एक ही चेतन आत्मा है, पर भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों के कारण नाम अलग-अलग हैं । भ्रम के कारण मनुष्य को असल बात समझ नहीं पड़ती । मृगमरीचिका में जल नहीं है; पर भ्रमवश मनुष्य को जल दीख पड़ता है और वह कपडे उतार कर तैरने को तैयार हो जाता है । रस्सी-रस्सी है, सांप नहीं; पर अँधेरे में वही रस्सी सांप सी दीखती है और मनुष्य डर कर उछालता और भागता है । इसी तरह जब तक मनुष्य के ह्रदय में अज्ञान रुपी अंधकार रहता है, उसे और का और दीखता है । देख और आत्मा अलग़-अलग हैं । देह नाशमान और आत्मा अविनाशी हैं; पर अज्ञानी को, जिसके दिल में अँधेरा है, देह और आत्मा एक मालूम होते हैं तथा शरीर और आत्मा दोनों ही नाशमान जान पड़ते हैं । इसी तरह सब जगत में एक ब्रह्म व्यापक है – शरीर-शरीर में एक ही चेतन आत्मा है; पर अज्ञानी सब प्राणियों में एक ही आत्मा नहीं मानता है । अज्ञान-अंधकार के मारे, वह इस बात को नहीं समझता कि मुझमें, उधो में, माधव में, रामा में, मेरी स्त्री में, मेरे पुत्र में, माधव के पुत्र में, घोड़े में, हाथी में, सर्प में और सिंह में एक ही आत्मा है; यानी जो आत्मा मुझमें है वही समस्त जगत में है ।

बिहारीलाल कवी ने कहा है –
मोहन मूरति श्याम की, अति अद्भुत गति जोइ।
वसत सुचित अन्तर तऊ, प्रतिबिम्बित जग होइ।।

श्याम की मोहिनी मूरत की गति अति अद्भुत है । वह सुन्दर ह्रदय में रहती है, तोभी उसका प्रतिबिम्ब – अक्स – सारे जगत में पड़ता है ।

महाकवि नज़ीर कहते हैं –
ये एकताई ये यकरंगी, तिस ऊपर यह क़यामत है।
न कम होना न बढ़ना और हज़ारों घट में बंट जाना।।

ईश्वर एक है और एक रंग है – निर्विकार और अक्षय है; उसमें रूपान्तर नहीं होता और वह घटता-बढ़ता भी नहीं; लेकिन अचम्भे की बात है कि, वह घट-घट में इस तरह प्रकट होता है, जिस तरह एक सूर्य का प्रतिबिम्ब सैकड़ों जलाशयों में दिखाई देता है ।

क्या जीवात्मा और परमात्मा में भी कुछ भेद नहीं है ?

निस्संदेह; जीवात्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है । दोनों में एक ही आत्मा है । जीव की उपाधि अन्तःकरण है और परमेश्वर की उपाधि माया है । जीव की उपाधि छोटी है और परमात्मा की बढ़ी है; इसी से ईश्वर में जो सर्वज्ञता प्रभृति धर्म हैं; जीव में नहीं । गंगा की बढ़ी धरा में नाव और जहाज़ चलते है, हज़ारों मगरमच्छ और करोड़ों मछलियां तैरती हैं तथा किनारे पर लोग स्नान करते हैं । पर वही गङ्गाजल अगर एक गोलास में भर लिया जाय, तो उसमें न तो नाव और जहाज़ होंगे, न मगरमच्छ और मछलियां होंगी और न किनारे पर लोग स्नान करते होंगे । दरअसल, गंगा की बड़ी धरा में जो जल है, व्है जल गिलास में है । वह गंगा का बड़ा प्रवाह है और गिलास में थोड़ा सा जल है । जिस तरह दोनों जलों के एक होने में सन्देह नहीं; उसी तरह जीवात्मा और परमात्मा के एक होने में सन्देह नहीं । सारांश यह कि, जीवात्मा, परमात्मा और समस्त जगत में एक ही ब्रह्म है । जो इस बात कि तह तक पहुँच जाएगा, वह किस से बैर करेगा और किससे प्रीती ? जब तक मनुष्य इस बात को अच्छी तरह नहीं समझ लेता और यही बात उसके दिल पर नक्श हुई नहीं रहती कि, जो आत्मा मेरे शरीर में है वही जगत के और प्राणियों के शरीर में है, तभी तक वह किसी को अपना और किसी को पराया, किसी को अपनी स्त्री और किसी को अपना पुत्र, किसी को शत्रु और किसी को मित्र, किसी को सर्प और किसी को फूलों का हार समझता है; किसी से खुश होता है और किसी से नाराज़, किसी से विरोध करता और किसी से प्रणय । पहले के पहुंचे हुए महात्मा जो सिंहो को अपने आश्रमों में भेद बकरी कि तरह पालते और सर्पों को गले का हार बनाये रहते थे, वह क्या बात है ? और कुछ नहीं, यही बात है, कि वे भीतरी दिल से सिंह में भी और अपने में एक ही आत्मा समझते थे; इसी से वे उनसे डरते नहीं थे और सिंह तथा सर्प प्रभृति हिंसक जीव भी उन्हें कष्ट न पहुंचते थे ।

कैवल्यौपनिषद में लिखा है –
यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा, विश्वस्यायतन महत्।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यं स त्वमेव त्वमेव तत्। ।

जो ब्रह्म सब प्राणियों का आत्मा, सम्पूर्ण विश्व का आधार, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और नित्य है, वही तुहि है और तू वही है ।

ज्ञानकाण्ड उपनिषत् ही तो वेद का निष्कर्ष और सार है । उसमें सर्वत्र आत्मा को ही ईश्वर कहा है । हमारे वेद ही नहीं, संसार के समस्त धर्मशास्त्र – कुरान और बाइबिल आदि में भी यही बात कही है । कुरान में “ला इलाहा इल्ला अन्ना” यही निचोड़ कहा है, यानी आत्मा के सिवा दूसरा और ईश्वर नहीं है । बाइबिल में भी ईसा मसीह ने कहा है – “Ye are the living temples of God अर्थात चमक ईश्वर के जीवित मंदिर हो; अर्थात “तत्वमसि” । वह तुम हो ।

समदर्शी होने से मोक्ष मिलती है

“समस्त जगत में एक ही ब्रह्म या चेतन आत्मा व्यापक है – इस बात को जाने-समझे बिना, समदर्शी हो नहीं सकता इसी से हमने यह बात विस्तार स समझायी है । अब रही यह बात कि, समदर्शी होने कि क्या जरुरत है ? समदृष्टि होने से क्या लाभ है ? इन प्रश्नों का उत्तर हम संक्षेप में ही दिए देते हैं – समदृष्टि हो जाने से मनुष्य का दुःख और क्लेशों से पीछा छूट जाता है; वर्णनातीत परमानन्द कि प्राप्ति होती है; संसार-बन्धन काट जाता है; आवागमन का झगड़ा मिट जाता है; प्राणी को बारम्बार जन्म लेना और मरना नहीं पड़ता; उस कि मोक्ष हो जाती है और वह परमपद या विष्णुत्व को प्राप्त हो जाता है । स्वामी शंकराचार्य जी महाराज कहते हैं –
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ ।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद् यदि विष्णुत्वम् ।।

हे मनुष्य ! यदि तू शीघ्र ही मोक्ष या विष्णुत्व चाहता है, तो शत्रु और मित्र, पुत्र और बंधुओं से विरोध और प्रणय मत कर; यानी सब को एक नज़र से देख, किसी में भेद न समझ ।

सार– यदि मोक्ष, मुक्ति या परमानन्द चाहते हो, तो सब जगत में अपने ही आत्मा को देखो, किसी को अपना और किसी को पराया, किसी को शत्रु और किसी को मित्र मत समझो ।

छप्पय

सर्प सुमन को हार, उग्र बैरी अरु सज्जन।
कंचन मणि अरु लोह, कुसुम शय्या अरु पाहन।
तृण अरु तरुणी नारि, सबन पर एक दृष्टी चित।
कहूँ राग नहि रोष, द्वेष कितहुँ न कहुँ हित।।

====🙏🏼इति शतकत्रयम्🙏🏼====
05/08/19, 11:23 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सम्पूर्ण वैराग्य शतक(दो भागों में)
https://panini-sanskrit.blogspot.com/2019/02/blog-post_27.html?m=1
05/08/19, 11:24 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: https://panini-sanskrit.blogspot.com/2019/07/temp.html?m=1
06/08/19, 11:15 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई।
तब यह जीव कृतारथ होई।।

छोरत ग्रंथि जानि खगराया।
बिघ्न अनेक करइ तब माया।।

यदि वह ( विज्ञान रूपिणी बुद्धि ) उस गाँठ को खोलने पावे,
तब यह जीव कृतार्थ हो।
परन्तु हे पक्षिराज गरुड़ जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेकों विघ्न करती है ।।117-3।।

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई ।
बुद्धिहि लोभ देखावहिं आई।।

कल बल छल करि जाहिं समीपा।
अंचल बात बुझावहिं दीपा ।।

हे भाई! वह बहुत सी ऋद्धि- सिद्धियों को भेजती है,
जो आ कर बुद्धि को लोभ दिखाती हैं।
और वे ऋद्धि -सिद्धियां कल ( कला), बल और छल करके समीप जाती और आंचल की वायु से उस ज्ञान रूपी दीपक को बुझा देती है ।।117-4।।
06/08/19, 6:11 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: प्रश्नोत्तरमाला – 31

अहर्निशं किं परिचिन्तनीयं
संसारमिथ्या त्वशिवात्मतत्त्वम् ।
किं कर्म यत्प्रीतिकरं मुरारेः
क्वास्था न कार्या सततं भवाब्धौ । ३१ ।

प्र: रात-दिन विशेषरूप से क्या चिन्तन करना चाहिए ?
उ: संसार का मिथ्यापन और कल्याणरूप परमात्मा का तत्त्व ।

प्र: वास्तव में कर्म क्या है ?
उ: जो भगवान् श्रीकृष्ण को प्रिय हो ।

प्र:सदैव किसमें विश्वास नहीं करना चाहिए ?
उ: संसार-समुद्र में ।

कण्ठङ्गता वा श्रवणङ्गता वा
प्रश्नोत्तराख्या मणिरत्नमाला ।
तनोतु मोदं विदुषां सुरम्यं
रमेशगौरीशकथेव सद्यः । ३२ ।

यह प्रश्नोत्तर नाम की मणिरत्नमाला कण्ठ में या कानो में जाते ही लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु और उमापति भगवान् शंकर की कथा की तरह विद्वानों के सुन्दर आनन्द को बढ़ावे ।

🙏🏼हरि ॐ🙏🏼
इति स्वामी शंकराचार्यकृत प्रश्नोत्तरी
07/08/19, 10:07 am – Abhinandan Sharma: 👏👏 देखिये, सुधाकर जी ने इस ग्रुप के पाठकों को क्या-क्या पढवा दिया ! श्रृंगार शतक, नीति शतक, वैराग्य शतक, शंकराचार्य प्रश्नोत्तरी !!! यही संगत है, साधू की | बहुत बहुत धन्यवाद सुधाकर जी, आपके इतनी मेहनत के लिए अन्यथा वास्तविक जीवन में तो मरने की भी फुर्सत नहीं मिलती लेकिन आपने फोन ही फोन में, इतना कुछ पढवा दिया कि मजा आ गया | पुनः पुनः धन्यवाद |
07/08/19, 10:13 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: 🙏💐
07/08/19, 10:18 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: धन्यवाद🙏🙏
07/08/19, 10:28 am – Pitambar Shukla: 🙏🙏🙏🙏
07/08/19, 10:31 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
मनुस्मृति
🙏द्वितीय अध्याय🙏

गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासाद प्रस्तरेषु कटेषु च ।
आसीत गुरुणा सार्धं शिलाफलकनौषु च । । २.२०४ । ।

गुरोर्गुरौ सन्निहिते गुरुवद्वृत्तिं आचरेत् ।
न चानिसृष्टो गुरुणा स्वान्गुरूनभिवादयेत् । । २.२०५ । ।

विद्यागुरुष्वेवं एव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु ।
प्रतिषेधत्सु चाधर्माद्धितं चोपदिशत्स्वपि । । २.२०६ । ।

श्रेयःसु गुरुवद्वृत्तिं नित्यं एव समाचरेत् ।
गुरुपुत्रेषु चार्येषु गुरोश्चैव स्वबन्धुषु । । २.२०७ । ।

बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यज्ञकर्मणि ।
अध्यापयन्गुरुसुतो गुरुवन्मानं अर्हति । । २.२०८ । ।

अर्थ

बैल,घोड़ा,ऊंट आदि की सवारी पर मकान की छत पर,चटाई, शिला,पाटा, व नाव पर गुरु के साथ बैठने का निषेध नहीं है। गुरु के गुरु समीप आवे तो गुरु के समान व्यवहार करें। गुरु की आज्ञा बिना अपने माता-पिता को भी प्रणाम ना करें।
विद्या गुरु पिता आदि,अधर्म से बचाने वाले,हितैषी इन से गुरु के समान व्यवहार करें। विद्या,तप से श्रेष्ठ,अपने से बड़ा सदाचारी, गुरुपुत्र व गुरु सम्बन्धी इन से भी गुरु के समान व्यवहार करना चाहिए। गुरुपुत्र अपने से छोटा या समान अवस्था का, या यज्ञकर्म में शिष्य हो तब भी वेद का अध्यापक होने से गुरु तुल्य मान्य होता है।।

हरी ॐ
🙏
07/08/19, 10:38 am – Abhinandan Sharma: पंगु कौन है और तीर्थ क्या है ? ये प्रश्न आया क्या ?
07/08/19, 10:51 am – LE Onkar A-608: कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिँल्लीनंपरेब्रह्मणियस्य चेतः।
वेदान्त-सिद्धान्त मुक्तावली

जिसका मन उस अपार सच्चिदानंद समुद्र परब्रह्म में लीन हो गया है उसका कुल पवित्र हो जाता है, माता कृतकृत्य हो जाती है और उसके कारण पृथ्वी भी पुण्यवती हो जाती है।
07/08/19, 10:59 am – FB Mrudul Tiwari Allahabad Shastra Gyan: 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
07/08/19, 11:04 am – Dayadhankr Soryvanshi Hts, Akhilesh Frnd: 💐💐👏🏻👏🏻
07/08/19, 11:39 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

होइ बुद्धि जौं परम सयानी।
तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।।

जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी।
तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।।

यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई,
तो वह उन (ऋद्धि -सिद्धियों) को अहित कर ( हानिकर ) समझ कर उनकी ओर ताकती नहीं।
इस प्रकार यदि माया के विघ्नों से बुद्धि को बाधा न हुई,
तो फिर देवता उपाधि( विघ्न ) करते हैं।।117-5।।

इंद्री द्वार झरोखा नाना।
तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।

आवत देखहिं बिषय बयारी।
ते हठि देहिं कपाट उघारी।।

इंद्रियों के द्वार हृदय रूपी घर के अनेकों झरोखे हैं।
वहाँ -वहाँ(प्रत्येक झरोखे पर) देवता थाना किए ( अड्डा जमा कर ) बैठे हैं।
ज्यों ही वे विषय रूपी हवा को आते देखते हैं त्यों ही हठ पूर्वक किवाड़ खोल देते हैं।।117-6।।
07/08/19, 1:11 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: तीर्थ क्या है? ये प्रश्न आया था
पंगु नहीं पर अँधा और बहरा कौन है? यह प्रश्न भी आया था।
07/08/19, 5:58 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 👆🏼
07/08/19, 6:00 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 👆🏼
07/08/19, 11:28 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ९०,९१

शीर्णवृन्तं तु सक्षारं पित्तलं कफवातजित्॥९०॥

रोचनं दीपनं हृद्यमष्ठीलाऽऽनाहनुल्लघु।

शीर्णवृन्त-फलशाक- शीर्णवृन्त(जो शाकफल अपने डण्ठल से अलग हो गया हो) शाक कुछ खारापन, पित्तकारक, कफदोष तथा वातदोष का विनाशक, रुचिकारक, जठराग्निदीपक तथा हृदय के लिए हितकर होता है। यह वातिष्ठीला तथा आनाह(आफरा) रोगों का विनाशक एवं लघु होता है।

वक्तव्य- यहां शीर्णवृन्त शब्दझ से भलीभांति पके हुए फल का ग्रहण करना चाहिए। जैसा कि सुश्रुत ने कहा है– ‘शुक्लं लघुष्णम् सक्षारं दीपनं बस्तिशोधनम्’ (सु.सू. ४६/२१३) श्री अरुणदत्त अपनी व्याख्या में कहते है– शीर्णवृन्तं=कर्चूरम।

शीर्णवृन्त- यहां इस नाम से एक शाक विशेष का वर्णन किया गया है। ‘वृ्न्त’ शब्द का प्रयोग— फल तथा वृक्ष या लता से जुड़े हुए भाग को डण्ठी या डण्ठल कहते है। ‘शीर्ण’ का अर्थ है गला हुआ। प्रायः सब फलो के वृन्य पकने पर गल या झड़ जाते है , किन्तु लाल कुम्हड़ा या सीताफल या कद्दू नाम का एक लताफल ऐसा भी होता है, जिसका वृन्त पकने पर भी अलग नहीं होता। इसे अंग्रेजी में red gaurd कहते है जिसका अर्थ होता है लाल कुम्हड़ा। वाग्भट ने श्लोक ८८ में जिस कुष्मांड का वर्णन किया है वह पेठे की मिठाई वाला है।

मृणालबिसशालूककुमुदोत्पलकन्दकम्॥९१॥

नन्दीमाषककेलूटश्रृङ्गाटककसेरुकम्। क्रौञ्चादनं कलोड्यं च रुक्षं ग्राही हिमम् गुरु॥९२॥

मृणाल आदि का वर्णन- मृणाल(कमलनाल) , बिस(कमल की जड़ – भसौंडा), शालूक(कमलकन्द), कुमुद(कुई) एवं उत्पल के कन्द, नन्दी(तुण्डीकेरी), माषक(वास्तूल), केलूट(किस्मक नामक उदुम्बर भेद) , श्रृंगाटक(सिंघाड़ा), कसेरु, क्रौञ्चादन (मृणाल, पिप्पली, धेञ्चुलक, चिञ्चोटक) और कलोड्य(पद्य्मबीज)— ये सभी द्रव्य रुक्ष, ग्राही (मल को बांधने वाले), शीतवीर्य एवं गुरु (देर से पचने वाले) होते है।
07/08/19, 11:31 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 🙏🏼🙏🏼
08/08/19, 11:23 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई।
तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।।

ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा।
बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।

ज्यों ही वह तेज हवा हृदय रूपी घर में जाती है,
त्यों ही वह विज्ञान रूपी दीपक बुझ जाता है ।

गाँठ भी नहीं छूटी और वह (आत्मानुभव रूप ) प्रकाश भी मिट गया।
विषय रूपी हवा से बुद्धि व्याकुल हो गई ( सारा किया कराया चौपट हो गया ) ।।117-7।।

इंद्रिन्ह सुरन्ह न ज्ञान सोहाई।
बिषय भोग पर प्रीति सदाई।।

बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी।
तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।

इन्द्रियों और उनके देवताओं को ज्ञान ( स्वाभाविक ही ) नहीं सुहाता;
क्योंकि उनकी विषय – भोगों में सदा ही प्रीति रहती है।

और बुद्धि को भी विषय रूपी हवा ने बावली बना दिया ।
तब फिर ( दुबारा ) उस ज्ञान दीपक को उसी प्रकार से कौन जलाए।।117-8।।
08/08/19, 11:00 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ९३,९४,९५

कलम्बनालिकामार्षकुटिञ्जरकुतुम्कम। चिल्लीलट्वाकलोणीकाकुरूटकगवेधुकम॥९३॥

जीवन्तझुञ्झ्वेडगजयवशाकसुवर्चलाः। आलुकानि च सर्वाणि तथा सूप्यानि लक्ष्मणम्॥९४॥

स्वादु रुक्षं सलवणं वातश्लेष्मकरं गुरु। शीतलं सृष्टविण्मूत्रं प्रायो विष्टभ्य जीर्यति॥९५॥

स्विन्नं निषपीडितरसं स्नेहाढ्यं नातिदोषलम्।

कलम्ब आदि का वर्णन- कलम्ब(कदम्ब या करेमू), नालिका(नालीशाक), मार्ष(मरसा), कुटिञ्जर(ताम्रमूलक या तन्दूलक), कुतुम्बक(द्रोणपुष्पी- गूमा), चिल्ली(क्षारपत्रक शाक, लाल बथुआ), लट्वाक(गुग्गुलशाक), लोणीका(लोणार, सलूनक, कुलफा), कुरुटक (स्थितिवारक, शितिवारी), गवेधुक (तृणधान्य), जीवन्त (जीवन्ती), झुञ्झु (चुच्चु), ऐडगज (चकवड), यवशाक (छोटे पत्तो वाली चिल्ली या जौ के कोमल पत्ते), सुवर्चल (हुलहुल), सभी प्रकार के आलू, सभी प्रकार के वे अन्न जिनकी दाले बनायी जाती है (जैसे- चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, कुलथी आदि) और लक्ष्मण(मुलेठी के पत्ते)— उपर्युक्त सभी शाक स्वाद में मधुर, रुक्ष, लवणरसयुक्त, वात तथा कफ कारक, देर में पचने वाले शीतवीर्य, मल-मूत्र निकालने वाले और प्रायः ये देर से पचते है। यदि इन्हें उबालकर इनका रस निचोड़कर घी या तेल मे भलीभांति भूंज लिया जाता है, तो ये दोषकारक नहीं होते।

लघुपत्रा तु या चाल्ली सा वास्तकसमा मता॥९६॥

चिल्लीशाक का वर्णन- चिल्ली नामक शाक दो प्रकार का होता है– १. बड़े पत्ते वाला, २. छोटे पत्ते वाला । इनमें से दूसरे के गुण धर्म बथुआ के समान होते हैं।
09/08/19, 10:21 am – Sachin Tyagi Shastra Gyan:
09/08/19, 10:36 am – LE Onkar A-608: इस ग्रुप में सन्देश अग्रेषित करना वर्जित है।
09/08/19, 11:06 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

तब फिरि जीव बिबिधि बिधि
पावइ संसृति क्लेस।
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस।।

( इस प्रकार ज्ञान दीपक के बुझ जाने पर)
तब फिर जीव अनेकों प्रकार के संसृति (जन्म -मरणादि) के क्लेश पाता है।
हे पक्षिराज! हरि की माया अत्यन्त दुस्तर है,
वह सहज ही में नही तरी जा सकती ।।118-क।।

कहत कठिन समुझत कठिन
साधत कठिन बिबेक।
होइ घुनाच्छर न्याय जौं
पुनि प्रत्यूह अनेक।।

ज्ञान कहने( समझाने) में कठिन,
समझने में कठिन और साधने में भी कठिन है ।
यदि घुणाक्षर न्याय से( संयोग वश) कदाचित् यह ज्ञान हो भी जाय,
तो फिर ( उसे बचाए रखने में) अनेकों विघ्न हैं।।118-ख।।
09/08/19, 4:16 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 🙏🏼
09/08/19, 5:09 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
मनुस्मृति
द्वितीय अध्याय

उत्सादनं च गात्राणां स्नापनोच्छिष्टभोजने ।
न कुर्याद्गुरुपुत्रस्य पादयोश्चावनेजनम् । । २.२०९ । ।

गुरुवत्प्रतिपूज्याः स्युः सवर्णा गुरुयोषितः ।
असवर्णास्तु सम्पूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः । । २.२१० । ।

अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनं एव च ।
गुरुपत्न्या न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम् । । २.२११ ।

अर्थ

गुरु के समान गुरुपुत्र के पैर दबाना,
तैल मलना,स्नान कराना, जूँठा खाना इत्यादि काम नही करना चाहिए। गुरुस्त्री यदि सजातीय हो, तो गुरु समान पूज्य है। नहीं तो उसको उठ कर प्रणाम करते यही सेवा है। तैल मलना,स्नान कराना,शरीर दाबना, फूलों से बाल गूँथना,ये कार्य गुरुस्त्री के नहीं करना चाहिए।।
10/08/19, 9:29 am – Abhinandan Sharma: ये पढ़ने में जितना आसान है, करने में उतना ही कठिन । यही योग का की प्रोसेस है । इसे समझना चाहिए ।
10/08/19, 9:32 am – Abhinandan Sharma: बस इतना ही ? इसके आगे नहीं है ?
10/08/19, 9:34 am – Abhinandan Sharma: कुष्मांड माने लौकी ?
10/08/19, 9:34 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: जितना था सब लिख दिया 🙂
10/08/19, 9:40 am – Abhinandan Sharma: अद्भुत । समदृष्टि पर बेहतरीन आख्यान ।
10/08/19, 9:45 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: कोई बता सकते हैं महर्षि पाणिनी का व्याकरण हिन्दी भाषा टीका सहित किस प्रकाशक से प्राप्त किया जा सकता है. बता दूं कि चौखम्भा में नहीं था.
10/08/19, 9:45 am – Vaidya Ashish Kumar: नही सर,जिससे पेठा बनता है,कद्दू से छोटा
10/08/19, 9:45 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: इसके आगे टीकाकार ने प्रश्नोत्तर दिए हैं जिनके उत्तर बहुत ही सटीक और सुन्दर हैं, आज्ञा हो तो वो भी पढ़ लिए जाएँ ❓
10/08/19, 9:45 am – Vaidya Ashish Kumar: किडनी रोगों में कुष्मांड बहुत उपयोगी है।
10/08/19, 9:47 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: जितना मुझे पता है, भट्टोजी दीक्षित की लघुसिद्धांतकौमुदी से अच्छा कुछ नहीं हो सकता। बाकी @919911340906 ज्यादा अच्छा बता पाएंगे ।
10/08/19, 10:37 am – Abhinandan Sharma: गोल वाला ?
10/08/19, 10:38 am – Abhinandan Sharma: जरूर
10/08/19, 11:24 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

ग्यान पंथ कृपान कै धारा ।
परत खगेस होइ नहिं बारा।।

जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई।
सो कैवल्य परम पद लहई।।

ज्ञान का मार्ग कृपाण (दुधारी तलवार ) की धार के समान है।
हे पक्षिराज! इस मार्ग से गिरते देर नहीं लगती ।
जो इस मार्ग को निर्विघ्न निबाह ले जाता है,
वही कैवल्य ( मोक्ष) रूप परम पद को प्राप्त करता है ।।118-1।।

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद।
संत पुरान निगम आगम बद।।

राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं।
अनइच्छित आवइ बरिआईं।।

संत, पुराण, वेदऔर ( तन्त्र आदि) शास्त्र ( सब) यह कहते हैंकि कैवल्य रूप परम पद अत्यंत दुर्लभ है;
किन्तु हे गोसाईं! वही( अत्यंत दुर्लभ) मुक्ति श्रीराम जी को भजने से बिना इच्छा किये भी जबरदस्ती आ जाती है ।।118-2।।
10/08/19, 11:41 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: पाणिनि की अष्टाध्यायी के लगभग २००० सूत्र हमे किसी ने भेजे थे। आपको प्रेषित कर रहे हैं।
10/08/19, 11:43 am – Shastragyan Abhishek Sharma: नहीं पेठे वाला कद्दू । आगे बताया गया है।🙏🏻
10/08/19, 12:45 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: हमारे यंहा रखिया कहते है
10/08/19, 1:03 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad:
10/08/19, 1:04 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad:
10/08/19, 1:05 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad:
10/08/19, 1:05 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: कुम्हड़ा
10/08/19, 1:28 pm – Vaidya Ashish Kumar: ✅🙏🏻🙏🏻
10/08/19, 1:47 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar:
10/08/19, 2:18 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: हां, यह कद्दू है
10/08/19, 2:25 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: जी, बहुत-बहुत धन्यवाद! पुस्तक रुप में प्राप्त होता, तो अच्छा था. चौखम्भा में नहीं थी.
🙏🏽🙏🏽
10/08/19, 2:26 pm – Shasta Gyan Gaurav Gautam Lucknow left
10/08/19, 2:31 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: जी जो आपको भेजा है संस्कृत के एक आचार्य ने हमे भेजा था। किंतु हमारी समझ से परे था। सो संग्रहित कर लिया। आपके काम में आया हमारा संग्रहण सफल हो गया।
10/08/19, 10:54 pm – FB Rajesh Kr Mishra Sapt:
10/08/19, 10:55 pm – FB Rajesh Kr Mishra Sapt:
11/08/19, 11:08 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई।
कोटि भाँति कोउ करै उपाई।।

तथा मोच्छ सुख सुनु खग राई।
रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ।।

जैसे स्थल के बिना जल नहीं रह सकता,
चाहे कोई करोड़ों प्रकार के उपाय क्यों न करे।

वैसे ही हे पक्षिराज! सुनिये,
मोक्ष सुख भी श्री हरि को छोड़कर नहीं रह सकता ।।118-3।।

अस बिचारि हरि भगत सयाने।
मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।

भगति करत बिनु जतन प्रयासा।
संसृति मूल अबिद्या नासा।।

ऐसा विचार कर बुद्धिमान हरि भक्त पर लुभाए रह कर मुक्ति का तिरस्कार कर देते हैं।

भक्ति करने से संसृति( जन्म मृत्यु रूप संसार) की जड़ अविद्या बिना ही यत्न और परिश्रम के ( अपने आप ) वैसे ही नष्ट हो जाती है,।।118-4।।
11/08/19, 2:01 pm – Abhinandan Sharma: शास्त्र ज्ञान सत्र 37 लाइव

https://youtu.be/m8ylFb3XHHE
11/08/19, 3:04 pm – Abhinandan Sharma: कोई प्रश्न ?
11/08/19, 9:17 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ९६,९७,९८

तर्कारी वरूणं साधु सतिक्तम् कफ वातजित्। वर्षाभ्वौ कालशाकं च सक्षारं कटुतिक्तकम्॥९७॥

दीपनं भेदनं हन्ति गरशोफकफानिलान्। दीपनाः कफवातघ्नाश्चिरिबिल्वाङ्कुराः सराः॥९८॥

तर्कारी शाक आदि का वर्णन- तर्कारी(अरणी) तथा वरणा के कोमल पत्तो एवं फलों का शाक स्वाद में मधुर कुछ तीतापन युक्त होता है। ये दोनों कफदोष तथा वातदोष नाशक होते है।

पुनर्नवा तथा कालशाक- दोनों प्रकार की (छोटी एवं बड़ी) पुनर्नवाओं का तथा कालशाक (काला मरसा का शाक) कुछ खारा, स्वाद मे कुछ कटु एवं कुछ तिक्त रस वाला होता है। ये दोनों शाक जठराग्नि को प्रदिप्त करते हैं, मल का भेद करके उसे निकालते है। दूषिविष, शोफ(सूजन), कफदोष तथा वातदोष का विनाश करते हैं।

करञ्ज का शाक- करंज के कोमल पत्तों या अंकुरो का शाक जठराग्नि को प्रदिप्त करने वाला, कफ एवं वातनाशक होता है और मल की रुकावट को दूर करता है।

शतवर्यङ्कुरास्तिक्ता वृष्या दोषत्रयापहाः। रूक्षो वंशकरीरस्तु विदाही वातपित्तलः॥९९॥

शतावरी के अंकुरो का शाक- यह स्वाद में हल्का तिक्तरस वाला, वीर्यवर्द्धक तथा तीनो दोषों का विनाशक होता है।

वक्तव्य-* शतावरी या शतावर वृष्य (वीर्यवर्द्धक) औषधों मे उत्तम है। नैनीताल तथा अल्मोड़ा आदि पर्वतीय क्षेत्रों में यह पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है। इसके अंकुरो को पर्वतीय भाषा में “कैंरुआ” भी कहा जाता है। यह चैत्र मास के अंतिम दिनों से आषाढ़ मास तक अधिक मात्रा में निकलते रहते हैं। आरंभ मे ये दो-चार दिनों तक सुकोमल होते है। इनका संग्रह कर छोटे छोटे टुकड़े काटकर सब्जी बना ली जाती है। इसे रोटी के साथ खाया जाता है। यह पोष्टिक तथा रुचिवर्धक होती है। यह अंकुरशाक है।

वंशकरीर का शाक- बांस के नये अंकुरो का शाक– शतावरी के अंकुरो की भांति बांस के भी अंकुर निकलते हैं, इनका भी शाक, आचार तथा मुरब्बा बनाया जाता है। नेपाल में इसके आचार का अत्यन्त प्रचार है, वहां इसे तामा” कहते है। इसके गुण- यह रुक्ष, विदाहकारक तथा वातपित्तकारक होता है।
11/08/19, 10:54 pm – LE Onkar A-608: अरणी तथा वरना दोनो ही समझ में नहीं आए।
आज ज्ञात हुआ कि तर्कारी एक शाक विशेष है, इससे पहले मैं यह समझता था कि तरकारी का मतलब सब्जी होता है।
सब्जी मतलब जो सब्ज हो।
12/08/19, 9:06 am – Shastragyan Abhishek Sharma:
12/08/19, 9:06 am – Shastragyan Abhishek Sharma:
12/08/19, 9:16 am – Shastragyan Abhishek Sharma:
12/08/19, 9:16 am – Shastragyan Abhishek Sharma:
12/08/19, 9:17 am – Shastragyan Abhishek Sharma:
12/08/19, 9:17 am – Shastragyan Abhishek Sharma:
12/08/19, 9:33 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
मनुस्मृति
द्वितीय अध्याय

गुरुपत्नी तु युवतिर्नाभिवाद्येह पादयोः ।
पूर्णविंशतिवर्षेण गुणदोषौ विजानता । । २.२१२ । ।

स्वभाव एष नारीणां नराणां इह दूषणम् ।
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः । । २.२१३ । ।

अविद्वांसं अलं लोके विद्वांसं अपि वा पुनः ।
प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् । । २.२१४ । ।

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसं अपि कर्षति । । २.२१५ । ।

कामं तु गुरुपत्नीनां युवतीनां युवा भुवि ।
विधिवद्वन्दनं कुर्यादसावहं इति ब्रुवन् । । २.२१६ । ।

अर्थ
पूरे बीस साल का जवान व भला बुरा जानने वाला शिष्य जवान गुरुस्त्री के पैर छू कर प्रणाम ना करे, सदा दूर से ही प्रणाम करे।
यह स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पुरुषों को दोष लगा देना।। इसलिए बुद्धिमान सदा स्त्रियों से सावधान रहते हैं। संसार में पुरुष पण्डित हो या मूर्ख,उसको काम क्रोध मोह के वश कुमार्ग में ले जाने को स्त्रियां बड़ी समर्थ होती हैं।
माता ,बहन, व लड़की के साथ भी एकांत में ना बैठें। क्योंकि इंद्रियां ऐसी प्रबल है कि विद्वान के मन को भी खींच लेती है। यदि इच्छा हो तो युवा शिष्य युवती गुरुपत्नी को दूर से मैं अमुक हूँ कहकर प्रणाम कर लेवे।।

🙏 हरी ॐ 🙏
12/08/19, 10:28 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

भोजन करिअ तृपिति हित लागी।
जिमि सो असन पचवै जठरागी।।

असि हरि भगति सुगम सुखदाई ।
को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।

जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्ति के लिए और उस भोजन को जठराग्नि अपने -आप ( बिना हमारी चेष्टा के ) पचा डालती है,

ऐसी सुगम और परम सुख देने वाली हरि भक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा? 118-5।।

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।

हे सर्पों के शत्रु गरुड़ जी!
मैं सेवक हूंऔर भगवान् मेरे सेव्य ( स्वामी ) हैं,
इस भाव के बिना संसार रूपी समुद्र से तरना नहीं हो सकता ।

ऐसा सिद्धांत विचार कर श्री रामचन्द्रजी के चरण कमलों का भजन कीजिए ।।119-क।।
12/08/19, 12:59 pm – Shastra Gyan Ranjana Prakash: This message was deleted
12/08/19, 5:46 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: This message was deleted
12/08/19, 5:46 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: This message was deleted
12/08/19, 8:10 pm – +91 88880 18360 joined using this group’s invite link
13/08/19, 8:29 am – Abhinandan Sharma:
13/08/19, 8:36 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 🙏🙏
13/08/19, 8:36 am – Ghaziabad Shastra Gyan Pushpa: 🙏
13/08/19, 8:37 am – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
13/08/19, 8:46 am – Shyam Sunder Fsl: 🙏
13/08/19, 10:12 am – Poonam Goyal Delhi Artist Shastra Gyan: 👌
13/08/19, 10:54 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: बहुत ही सुंदर
👌👌👌
13/08/19, 11:03 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

जो चेतन को जड़ करइ
जड़हि करइ चैतन्य ।

अस समर्थ रघुनायकहि
भजहिं जीव ते धन्य।।

जो चेतन को जड़ कर देता है और जड़ को चेतन कर देता है, ऐसे समर्थ श्री रघुनाथजी को जो जीव भजते हैं,
वे धन्य है ।।119-ख।।

कहेउँ ज्ञान सिद्धांत बुझाई ।
सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई ।।

राम भगति चिंतामनि सुंदर ।
बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।

मैंने ज्ञान का सिद्धांत समझा कर कहा।
अब भक्ति रूपी मणि की प्रभुता( महिमा ) सुनिए ।

श्री राम जी की भक्ति सुन्दर चिन्ता मणि है।
हे गरुड़ जी! यह जिसके हृदय के अन्दर बसती है,।।119-1।।

परम प्रकास रूप दिन राती।
नहिं कछु चहिअ दिया घृत बाती।।

मोह दरिद्र निकट नहिं आवा।
लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।

वह दिन -रात ( अपने -आप ही) परम प्रकाश रूप रहता है ।
उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नही चाहिए ।
( इस प्रकार मणि का एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है)
फिर मोह रूपी दरिद्रता समीप नहीं आती ( क्योंकि मणि स्वयं धन रूप है);
और ( तीसरे ) लोभ रूपी हवा उस मणिमय दीप को बुझा नहीं सकती,
( क्योंकि मणि स्वयं प्रकाश रूप है, वह किसी दूसरे की सहायता से नही प्रकाश करती) ।।119-2।।
13/08/19, 11:19 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: ये तो शतावरी ही जान पड़ता है. बांस कोपल सफेद होता है.
13/08/19, 12:29 pm – Vaidya Ashish Kumar: 💐💐
13/08/19, 12:30 pm – Vaidya Ashish Kumar: बहुत बढ़िया अभिषेक जी💐💐
13/08/19, 2:41 pm – You added Omprakash Singh LE C-105
13/08/19, 2:42 pm – Omprakash Singh LE C-105: धन्यवाद🙏🙏

13/08/19, 8:34 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: ॐ श्रीगणेशाय नमः

वाचस्पतिमिश्रकृत सांख्यतत्त्व कौमुदी

व्याख्याकार – पं श्री ज्वालाप्रसाद गौड़

अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां नमामः।
अजा ये तां जुषमाणां भजन्ते जहात्येनां भुक्तभोगां नुमस्तान्।। १ ।।

अर्थ:
हम इस चराचर विश्वरूप बहुत सी प्रजाओं की सृष्टि करनेवाली, नित्य, एक रजोगुण, सत्वगुण, तमोगुणात्मिका अर्थात त्रिगुणात्मिका प्रकृति को नमस्कार करते हैं और उन पुरुषों को भी हम नमस्कार करते हैं, जो पुरुष भी नित्य तथा अनादि हैं; एवं शब्दादि विषय सम्बन्धी उपभोगों को प्रदान करनेवाली उस प्रकृति को भजते हैं तथा अन्त में भुक्तभोग इस प्रकृति को अनात्म वास्तु समझकर छोड़ देते हैं ।

कपिलाय महामुनये मुनये शिष्याय तस्य चासुराये ।
पञ्चशिखाय तथेश्वरकृष्णायैते नमस्येमाः ।। २ ।।

अर्थ:
इसके पश्चात हम महामुनि कपिल एवं उनके शिष्य मुनि आसुरि तथा आसुरि के शिष्य पञ्चशिख और ईश्वरकृष्ण, इनको भी हम नमस्कार करते हैं ।
13/08/19, 9:37 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: 🙏😌
13/08/19, 9:40 pm – Sachin Tyagi Shastra Gyan: कोटि जन्म तोहे मरतां होगे, कुछ नहीं हाथ लगा रे।
कुकर-सुकर खर भया बौरे, कौआ हँस बुगा रे।।(1)
कोटि जन्म तू राजा किन्हा, मिटि न मन की आशा।
भिक्षुक होकर दर-दर हांड्या, मिल्या न निर्गुण रासा।।(2)

जब तक यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तो जन-साधारण की धारणा होती है कि:-

1) बड़ा होकर पढ़-लिखकर अपने निर्वाह की खोज करके विवाह कराकर परिवार पोषण करेंगे। बच्चों को उच्च शिक्षा तक पढ़ाऐंगे। फिर उनको रोजगार मिल जाए। उनका विवाह करेंगे। परमात्मा संतान को संतान दे। फिर हमारा कर्तव्य पूरा हुआ। कई बार गाँव या गवांड (पड़ौसी गाँव) के वृद्ध इकट्ठे होते तो आपस में कुशल-मंगल जानते तो एक ने कहा कि परमात्मा की कृपा से दो लड़के तथा दो लड़की हैं। कठिन परिश्रम करके पाला-पोसा तथा पढ़ाया, विवाह कर दिया। सब के सब बेटा-बेटियों वाले हैं। मेरा कार्य पूर्ण हुआ। 75 वर्ष का हो गया हूँ। अब बेशक मौत हो जाए, मेरा जीवन सफल हुआ। वंश बेल चल पड़ी, संसार में नाम रहेगा।

विवेचन:- उपरोक्त प्रसंग में जो भी प्राप्त हुआ, वह पूर्व निर्धारित संस्कार ही प्राप्त हुआ, नया कुछ नहीं मिला।

एक व्यक्ति का विवाह हुआ। संतान रूप में बेटी हुई। मानव समाज की धारणा रही है कि पुत्रा नहीं है तो उसका वंश नहीं चलता। (परंतु आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से पुत्रा-पुत्राी में कोई अंतर नहीं माना जाता) आशा लगी कि दूसरा पुत्र तो बेटा होगा। दूसरी भी लड़की हुई। फिर आशा लगी कि परमात्मा तीसरा तो पुत्रा दे। परंतु तीसरी भी लड़की हुई। इस प्रकार कुल पाँच बेटियाँ हुई। पुत्रा का जन्म हुआ ही नहीं। इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि न तो मानव का चाहा हुआ और न किया हुआ। जो कुछ हुआ, संस्कारवश ही हुआ। यह परमेश्वर का विधान है। मानव शरीर प्राप्त प्राणी को वर्तमान जन्म में पूर्ण संत से दीक्षा लेकर भक्ति करनी चाहिए तथा पुण्य-दान, धर्म तथा शुभ कर्म अवश्य करने चाहिऐं, अन्यथा पूर्व जन्म के पुण्य मानव जीवन में खा-खर्च कर खाली होकर परमात्मा के दरबार में जाएगा। फिर पशु आदि के जीवन भोगने पड़ेंगे।

जैसे किसान अपने खेत में गेहूँ, चना आदि बीजता है। फिर परिश्रम करके उन्हें परिपक्व करके घर लाकर अपने कोठे (कक्ष) में भर लेता है। यदि वह पुनः बीज बो कर फसल तैयार नहीं करता है और पूर्व वर्ष के गेहूँ व चने को खा-खर्च रहा है तो वर्तमान में तो उसे कोई आपत्ति नहीं आएगी क्योंकि पूर्व वर्ष के गेहूँ-चना शेष है, परंतु एक दिन वह पूर्व वाला संग्रह किया अन्न समाप्त हो जाएगा और वह किसान परिवार भिखारी हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार मानव शरीर में जो भी प्राप्त
हो रहा है, वह पूर्व के जन्मों का संग्रह है। यदि वर्तमान में शुभ कर्म तथा भक्ति नहीं की तो भविष्य का जीवन नरक हो जाएगा।

अध्यात्म ज्ञान होने के पश्चात् मानव बुद्धिमान किसान की तरह प्रतिवर्ष प्रत्येक मौसम में दान-धर्म, स्मरण रूपी फसल बोएगा तथा अपने घर में संग्रह करके खाएगा तथा बेचकर अपना खर्च भी चलाएगा यानि पूर्ण गुरू जी से दीक्षा लेकर उनके बताए अनुसार साधना तथा दान-धर्म प्रति समागम में करके भक्ति धन को संग्रह करेगा। इसलिए परम संत मानव को जीने की राह बताता है। उसका आधार सत्य आध्यात्मिक ज्ञान सर्व ग्रन्थों से प्रमाणित होता है।

जैसा कि पूर्वोक्त प्रसंग में एक वृद्ध ने बताया कि सर्व संतान का पाल-पोसकर विवाह कर दिया। मेरे मानव जीवन का कार्य पूरा हुआ, मेरा जीवन सफल हुआ। अब बेशक मौत आ जाए। विचारणीय विषय है कि उसने तो पूर्व का जमा ही खर्च कर दिया, भविष्य के लिए कुछ नहीं किया। जिस कारण से उस व्यक्ति का मानव जीवन व्यर्थ गया।

कबीर जी ने कहा है कि:-
क्या मांगुँ कुछ थिर ना रहाई। देखत नैन चला जग जाई।।
एक लख पूत सवा लख नाती। उस रावण कै दीवा न बाती।।

भावार्थ:- यदि एक मनुष्य एक पुत्रा से वंश बेल को सदा बनाए रखना चाहता है तो यह उसकी भूल है। जैसे श्रीलंका के राजा रावण के एक लाख पुत्रा थे तथा सवा लाख पौत्रा थे। वर्तमान में उसके कुल (वंश) में कोई घर में दीप जलाने वाला भी नहीं है। सब नष्ट हो गए। इसलिए हे मानव! परमात्मा से यह क्या माँगता है जो स्थाई ही नहीं है। यह अध्यात्म ज्ञान के अभाव के कारण पे्ररणा बनी है। परमात्मा आप जी को आपका संस्कार देता है। आपका किया कुछ नहीं हो रहा। उस वृद्ध की बात को मानें कि पुत्रा के होने से वंश वृद्धि होने से संसार में नाम बना रहता है। एक गाँव में प्रारम्भ में चार या पाँच व्यक्ति थे। उनके वंश के सैंकड़ों परिवार बने हैं। उनका वंश चल रहा है। उनका संसार में नाम भी चल रहा है। परंतु शास्त्रोक्त विधि से भक्ति न करने के कारण परमात्मा के विधानानुसार वह भला पुरूष कहीं गधा बनकर कष्ट उठा रहा होगा। वहाँ पर गधे के वंश की वृद्धि करके फिर कुत्ते का जन्म प्राप्त करके वहाँ उस कुल की वृद्धि करके अन्य प्राणियों के शरीर प्राप्त करके असंख्यों जन्म कष्ट उठाएगा। भावार्थ है कि मानव जीवन प्राप्त प्राणी को चाहिए कि सांसारिक कर्तव्य कर्म करते-करते आत्म कल्याण का कार्य भी करे। जिस कारण से परिवार से आने वाली पूर्व पाप की मार भी टलेगी, परिवार खुशहाल रहेगा। अन्यथा शुभ-अशुभ दोनों कर्मों का फल भोगने से कभी सुख तथा कभी दुःख का कहर भी झेलना पड़ता
13/08/19, 11:42 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १००, १०१, १०२, १०३, १०४

पत्तूरो दीपनस्तिक्तः प्लीहार्शः कफवातजित्। कृमिकासकफोत्क्लेदान् कासमर्दो जयेत्सरः॥१००॥

रुक्षोष्णमम्लं कौसुम्भं गुरु पित्तकरं सरम्। गुरुष्णं सार्षपं बद्धविण्मूत्रं सर्वदोषकृत्॥१०१॥

यद्वालमव्यक्तरसं किञ्चित्क्षारं सतिक्तकम्। तन्मूलकं दोषहरं लघु सोष्णं नियच्छति॥१०२॥

गुल्मकासक्षयश्वासव्रणनेत्रगलामयान्। स्वराग्निसादोदावर्तपीनसांश्च महत्पुनः॥१०३॥

रसे पाके च कटुकमुष्णवीर्यं त्रिदोषकृत। गुर्वभिष्यन्दि च स्निग्धसिद्धं तदपि वातजित्॥१०४॥

पत्तूर(मछेछी) का शाक- यह अग्निदीपक, स्वाद मे तिक्त, कफ तथा वात दोष का नाशक है। यह प्लीहाविकार तथा अर्शोरोग को शान्त करता है।

कासमर्द( कसौंदी का शाक)- यह क्रिमिरोग, कासरोग, कफज, विकार तथा उत्क्लेद(शरीर में उत्पन्न गीलेपन) को जीत लेता है। यह मलभेदक है।

कुसुम्भ का शाक- कुसुम्भ(कुसुम) के पत्तो का शाक, रुक्ष, उष्णवीर्य, अम्ल, गुरु (देर में पचने वाला), पित्तकारक तथा सर(रेचक) होता है।

सरसों के पत्तों का शाक- यह पाचन मे गुरु, उष्णवीर्य, स्वाद मे कुछ अम्ल, मल मूत्र की प्रवृत्ति मे रुकावट डालने वाला तथा त्रिदोषकारक होता है।

वक्तव्य- साहित्यदर्पणकार श्री विश्वनाथ ने भी सर्षपशाक की प्रसंशा की है, परन्तु यह भी कह दिया है कि इसे ग्राम्य लोग बड़े चाव से खाते हैं— ‘तरुणं सर्षपशाकं’ इत्यादि। इसे पंजाब में बड़े आदर के साथ खाया जाता है,अन्यत्र भी लोग खाते ही है।

बालमूली का शाक- जो मूली कच्ची (रुढ़ न हुई हो) वह अव्यक्त रस वाली या कुछ खारापन तथा तीतापन लिए होती है। वह तीनो का नाश करती है, लघु तथा कुछ उष्णवीर्य वाली होती है। मूली गुल्म, कास, क्षय, श्वास, व्रण, नेत्रविकार, कण्ठविकार(स्वरभेद आदि), ज्वररोग, अग्निमान्द्य, उदावर्त तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है।

वृद्धमूली का शाक- बड़ी मूली रस में विपाक, कटु, उष्णवीर्य, त्रिदोषकारक, देर मे पचने वाली तथा अभिष्यन्दि होती है।

स्नेहसिद्ध मूली का शाक- यदि बड़ी मूली को घी में भलिभाति पका लिया जाए तो यह वातनाशक होती है।

वक्तव्य- आकृति भेद से मूली दो प्रकार की होती है।– १.गोल २. लम्बी। लम्बी मूली भी छोटी- बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है।— १. लघुमूलक और २. नेपालमूलक। ये भी नयी और पुरानी भेद से दो प्रकार की होती है। गर्मियों में मिलने वाली मूली स्वाद में कटु होती है, जाड़ो मे होने वाली मूली मधुर होती है। इसे नमक मिर्च लगाकर खाया जाता है। कच्ची मूली का शाक भी बनाया जाता है और सलाद के रूप में कच्चा खाया भी जाता है। इसी के भेद है- गाजर, चुकुदर, शलजम आदि।

मौसम मे मूली को काटकर सुखा लिया जाता है। बाद में पानी मे भिगाकर इसका भी शाक के रुप में प्रयोग होता है। यह सब वर्णन किसी भी जाति की बालमूली का है। जब यह रूढ़ हो जाती है, इसके भीतर जाली पड़ जाती है और बाहर का भाग कड़ा हो जाता है तब यह अग्राह हो जाती है। इसके विशेष गुणधर्मो के लिए देखें— सु.सू.४६/२४०-२४३। सुखाये सभु शाक विष्टम्भी तथा वातकारक होते है, केवल सुखाये हुए मूली के शाक को छोड़कर।
13/08/19, 11:47 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: प्लीहाविकार — spleenitis( तिल्ली का बढ़ना)
13/08/19, 11:54 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
13/08/19, 11:58 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
13/08/19, 11:58 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
14/08/19, 4:20 am – Pitambar Shukla: 🙏🙏

14/08/19, 10:09 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: शिव पुराण से

देवता त्रिपुरासुरों के विध्वंस से त्रस्त होकर शिवजी के पास जाते हैं क्योंकि वे शिवजी के अलावा किसी और मनुष्य, देवता के द्वारा अवध्य हैं परन्तु शिवजी कहते हैं – “देवगण! इस समय त्रिपुराधीश पुण्य कार्यों में लगे हुए हैं और ऐसा नियम है कि जो पुण्यात्मा हो उस पर विद्वानों को किसी प्रकार प्रहार नहीं करना चाहिए । वे तारकपुत्र सब के सब पुण्य-संपन्न हैं, यद्यपि मैं रणकर्कश हूँ, तथापि जानबूझकर मित्रद्रोह कैसे कर सकता हूँ क्योंकि पहले किसी समय ब्रह्माजी ने कहा था कि मित्रद्रोह से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है ।”

ब्रह्मघ्ने च सुरापे च स्तेने भग्नव्रते तथा।
निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः।।
(शि. पु. रु. सं. युद्ध खण्ड, ३|५)

सत्पुरुषों ने ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर और व्रत भङ्ग करनेवाले के लिए प्रायश्चित का विधान किया है; परन्तु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं है।
14/08/19, 10:21 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई।
हारहिं सकल सलभ समुदाई।।

खल कामादि निकट नहिं जाहीं।
बसइ भगति जाके उर माहीं।।

( उसके प्रकाश से) अविद्या का प्रबल अंधकार मिट जाता है।
मदादि पतंगों का सारा समूह हार जाता है ।
जिसके हृदय में भक्ति बसती है, काम , क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते।।119-3।।

गरल सुधासम अरि हित होई।
तेहि मनि बिन सुख पाव न कोई ।।

ब्यापहिं मानस रोग न भारी।
जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।।

उसके लिए विष अमृत के समान और शत्रु मित्र हो जाता है।
उस मणि के बिना कोई सुख नही पाता।
बड़े – बड़े मानस रोग,
जिनके वश हो कर सब जीव दुखी हो रहे हैं,
उसको नहीं व्यापते।।119-4।।
14/08/19, 10:30 am – +91 …..: कृतघ्न मतलब
14/08/19, 10:32 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: जो किसी का किया एहसान/उपकार न मानता हो और उसका भी बुरा करे ।
14/08/19, 10:34 am – +91 ……: 🙏🙏
14/08/19, 11:28 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad:
14/08/19, 11:29 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: ये कासमर्द(कसौंदी) नहीं लग रहा है.
14/08/19, 11:29 am – FB Mukesh Sinha Pathalgaon CG Shastra Gyan: खरपतवार है
14/08/19, 11:30 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad:
14/08/19, 11:31 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: कसौंदी है
14/08/19, 11:34 am – Shastragyan Abhishek Sharma: Google se uthaai hai, wahan aur bhi pics hai.
मदद करे।
14/08/19, 11:34 am – Shastragyan Abhishek Sharma: 🙏🏻
14/08/19, 11:37 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: मैं जो भेजा हूं, यही कसौंदी है.
14/08/19, 11:56 am – Vaidya Ashish Kumar: धन्यवाद सर
14/08/19, 11:56 am – Vaidya Ashish Kumar: आप बहुत पुण्य कमा रहे है अभिषेक जी🌹🌹
15/08/19, 12:37 am – +91 ……..:
15/08/19, 3:05 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कृपया कुछ भी forwarded या group के विषय से हटकर न डालें, हमें बधाई कम और पढाई की ज्यादा जरुरत है तो अगर बधाई नहीं भी आएगी तो चलेगा । आगे से किसी के लिए कोई चेतावनी नहीं होगी, तो कृपया समझदार बनें 🙏🏼🙏🏼
15/08/19, 6:37 am – LE Nisha Ji : आप सभी को स्वतंत्रता का 73 वाँ वर्ष और राखी के पर्व की बहुत बहुत बधाई।
15/08/19, 9:05 am – +91 ………..: जय हिंद
15/08/19, 10:39 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

राम भगति मनि उर बस जाकें।
दुख लवलेस न सपनेहु ताकें।।

चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं।
जे मनि लागि सुजतन कराहीं।।

श्री राम भक्ति रूपी मणि जिसके हृदय में बसती है,
उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुःख नहीं होता ।
जगत् में वे ही मनुष्य चतुरों के शिरोमणि हैं जो उस भक्ति रूपी मणि के लिए भली भाँति यत्न करते हैं।।119-5।।

सो मनि जदपि प्रगट जग अहई।
राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।।

सुगम उपाय पाइबे केरे।
नर हतभाग्य देहिं भट भेरे।।

यद्यपि वह मणि जगत् में प्रकट ( प्रसिद्ध ) है,
पर बिना राम जी की कृपा के उसे कोई नही पा सकता ।
उसे पाने के उपाय भी सुगम ही हैं पर अभागे मनुष्य उन्हे ठुकरा देते हैं।।119-6।।
15/08/19, 10:34 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १०५,१०६

वातश्लेष्महरम् शुष्कं सर्वं आम् तु दोषलम्। कटूष्णो वातकफहा पिण्डालुः पित्तवर्धनः॥१०५॥

सूखी मूली का शाक- सुखायी गयी सभी प्रकार की मूलियां वात एवं कफ नाशक होती है।

कच्ची मूली का शाक- सभी प्रकार की कच्ची मूलियां वात आदि दोषकारक होती है।

पिण्डालु नामक कन्द का शाक- यह कुछ कटु, उष्णवीर्य तथा पित्त को बढ़ाने वाला है।

वक्तव्य- सुश्रुत ने पिण्डालु का जो वर्णन किया है, वह उक्त वाग्भटोक्त गुणधर्मों के विपरीत है। देंखें— पिण्डालुकम् कफकरं गुरूवातप्रकोपणम् (सु.सू.४६/३०४)

आयुर्वेद मे आलुक नाम से अनेक कन्दों का ग्रहण होता है। जैसे- १. काष्ठालुक(कठालू), २. शंखालुक— यह सफेदी लिए होता है, ऐसा लगता है कि बाजार में बिकने वाला यही शंखालु ही आलू है। ३. हत्स्यालुक— बड़े से बड़े आकार का आलू, इसके दर्शन प्रदर्शनीयों मे किये जा सकते हैं। ४. पिण्डालुक— हमारी मान्यता के अनुसार यह वही है जिसका विवेचन हमने इसी प्रकरण में आगे किया है। जो इसे सुथनी मानते हैं, उन्हें इसका समावेश मध्वालुक मे अथवा रक्तालुक मे करना चाहिए क्योंकि यह लाल तथा सफेद भेद से दो प्रकार का पाया जाता है। ५. मध्वालुक- यह आकृति से दो प्रकार का होता है। छोटा तथा बड़ा। इनमें छोटा छीलने पर भीतर से सफेद तथा बड़ा छीलने पर रक्ताभ होता है। हिन्दी में इन्हे छोटी सुथनी तथा बड़ी सुथनी कहते है। ६.रक्तालुक- यह भी वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। जंगली सफेद तथा घर में लगाया लाल रंग का। जंगली अधिक से अधिक १ या २ इंच गोलाई में मोटा, घरेलू ५ या६ इंच मोटा या इससे भी अधिक। इसे तरूड़ या रतालू भी कहते हैं। इन्ही कन्दो में एक शकरकंद भी है।यह शक्कर की भांति खाने में मीठा होता है । अतः इसे शकरकंद कहते है।

नैनीताल तथा अल्मोड़ा आदि जिलों में पिण्डालु नाम का एक कन्द मिलता है, जिसका शाक क्षेत्रिय लोगों को अतिप्रिय है। वहां इसकी खेती भी होती है। मैदानी स्थानों में इसे अरुई या घुइयां कहते है। ये पिण्डालु या पिनालु के उपकन्द है। पिण्डालू के जिस मूल अवयव को यहां बण्डा कहा जाता है, उसे पर्वतीय क्षेत्रों में गडेरी कहते है। हमारे विचार से सुश्रुत ने जिस पिण्डालु के गुण धर्मो का वर्णन किया है, वह यही पिण्डालु कन्द है।

कुठेरशिग्रुसुरससुमुखासुरिभूस्तृणम्। फणिज्जार्जकजम्बीरप्रभृति ग्राहि शालनम्॥१०६॥

विदाहि कटु रुक्षोष्णं हद्यं दीपनरोचनं। दृकशुक्रकृमिहृत्तीक्ष्णं दोषोत्क्लेशकरं लघु॥१०७॥

कुठेरक आदि शाक- कुठेरक (वनतुलसी- बवई), शिग्रु (सहजन की फली), सुरस (काली तुलसी), सुमुखा (तुलसीभेद), आसुरि (राई के पत्ते), भूस्तृण, फणिज्झक, अर्जक, जम्बीर आदि के पत्तो के शाक ग्राही (मल को बांधने वाले) तथा उत्तम होते है। यह विदाहकारी, स्वाद मे कटु, रूक्ष, उष्णवीर्य, हृदय के लिए हितकारी, जठराग्नि को प्रदिप्त करने वाले तथा रुचिकारक होते है। ये दृष्टिनाशक, शुक्र तथा क्रिमि नाशक होते है। ये गुणों में तीक्ष्ण, वात आदि दोषों को उभाड़ने वाले तथा पाचन में लघु होते हैं।

वक्तव्य- “फणिज्जार्जकजम्बीरप्रभृति” इस ‘प्रभृति शब्द से अष्टाङ्गसंग्रह अध्याय ७ मे कहे गये धान्य— तुम्बुर, शैलेय, यवानी, श्रृंगवेर, पर्णाश, गृंजन, अजाजी, कण्डीर, जलपिप्पली, खराश्वा, कालमालिका, दीप्यक, क्षवकृत, द्वीपि और वस्तगधां का ग्रहण कर लेना चाहिए। अष्टाङ्गहृदय मे उक्त द्रव्यो को ‘हरितकवर्ण’ मे गिना है।
15/08/19, 11:39 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: पत्तूर मछेछी

गूगल ने भी हाथ जोड़ लिए🙏 क्या है यह
15/08/19, 11:41 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: सरसों के शाक व सरसों के पत्ते के शाक के गुणधर्म एक ही है या अलग🙏
16/08/19, 12:08 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: हमारे तरफ मानता अनुसार इसे पुरुष ही प्रथम चीरा देते है फिर महिला काट सकती है
16/08/19, 12:20 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: यंहा कद्दू आदि का गुणधर्म कुछ खारापन लिए हुए बताया गया है सो कैसे???
16/08/19, 12:21 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: उत्तर अपेक्षित है🙏
16/08/19, 1:13 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: Ha ji humare yahan bhi
16/08/19, 1:34 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: उत्तर पहले ही दिया जा चुका है।
16/08/19, 1:34 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 👆🏼
16/08/19, 7:25 am – FB Anand Kumar Patna Shastra Gyan: https://www.facebook.com/137392350144710/posts/466854923865116/
16/08/19, 10:25 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: भारत के प्राय:क्षेत्रों में ऐसी ही मान्यता है. शाकाहारी लोग देवी की बलि इसी का देते हैं, शायद इसीलिए.
16/08/19, 10:34 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: हमारे यहाँ नारियल, कद्दू , कटहल, पेठा …. इन सभी को प्रथम पुरुष ही काटते हैं।
16/08/19, 10:50 am – +91………: इसका एक दुर्गुण भी हैं की इसका अगर रस बाल पर पड जाये तो बाल सफ़ेद हो जाता हैं।
16/08/19, 11:19 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

पावन पर्बत बेद पुराना ।
राम कथा रुचिराकर नाना।।

मर्मी सज्जन सुमति कुदारी।
ग्यान बिराग नयन उरगारी।।

वेद -पुराण पवित्र पर्वत हैं।
श्री राम जी की नाना प्रकार की कथाएँ उन पर्वतों में सुन्दर खाने हैं।
संत पुरुष (उनकी इन खानों के रहस्य को जानने वाले ) मर्मी है और सुन्दर बुद्धि ( खोदने वाली ) कुदाल है।
हे गरुड़ जी! ज्ञान और वैराग्य –ये दो उनके नेत्र हैं।।119-7।।

भाव सहित खोजइ जो प्रानी।
पाव भगति मनि सब सुख खानी।।

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा।
राम ते अधिक राम कर दासा।।

जो प्राणी उसे प्रेम के साथ खोजता है,
वह सब सुखों की खान इस भक्ति रूपी मणि को पा जाता है।

हे प्रभो! मेरे मन में तो ऐसा विश्वास है कि श्री राम जी के दास श्री राम जी से भी बढ़ कर हैं।।119-8।।
..
16/08/19, 8:01 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १०८,१०९,११०

हिष्माकासविषश्वासपार्श्वरुक्पूतिगन्धहा। सुरसः सुमुखो नातिविदाही गरशोफहा॥१०८॥

आर्द्रिका तिक्तमधुरा मूत्रला न च पित्तकृत। लशुनो भृशतीक्ष्णोष्णः कटुपाकरसः सरः॥१०९॥

हृद्यः केश्यो गुरुर्वृष्यः स्निग्धो रोचनदीपनः। भग्नसन्धानकृद्वल्यो रक्तपित्तप्रदूषणः॥११०॥

किलासकुष्ठगुल्मार्शोमेहक्रिमिकफानिलान। स हिष्मापीनसश्वासकासान् हन्ति रसायनम्॥१११॥

सुरसा का शाक- हिचकी, कास, विषविकार श्वास, पार्श्वशूल(पसलियों में पीड़ा का होना) तथा मुख की दुर्गन्ध का विनाश करता है।

सुमुख नामक तुलसी का शाक- यह अधिक विदाहकारक नहीं होता है। दूषीविष तथा शोथरोग का विनाश करता है।

हराधनिया का शाक- यह थोड़ा तीता तथा मधुर होता है। मूत्रल तथा पित्तकारक नहीं होता है।

लशुनकद का शाक- इसका कन्द विशेष करके तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य होता है।इसका विपाक कटु होता है। यह सर है, हृदय के लिए तथा केशो के लिए हितकर है, पचने में गुरु, वीर्यवर्द्धक, स्निग्ध, दीपन, पाचन, अस्थिभग्न को जोड़ने वाला, बलवर्धक, रक्त एवं पित्त को दूषित करने वाला है। यह किलास(श्वित्र), कुष्ठ, गुम, अर्श, प्रमेह, क्रिमिरोग, कफविकार, वातविकार, हिचकी, पीनस, श्वास और कास रोग का विनाश करता है। यह रसायन है।

वक्तव्य- यहां लहसुन के केवल कन्द के गुण दिये गये है। प्रसंगवश उनके अन्य अंगों का वर्णन भी प्रस्तुत है— इसके पत्र खारे तथा मधुर होते हैं और इसका मध्यभाग अधिक मधुर एवं पिच्छिल होता है। कभी कभी इसके मध्यभाग मे भी लशुनकन्द पाये जाते है, औषध मे इनका भी महत्वपूर्ण स्थान है।अष्टाङ्गहृदय उत्तरस्थान(३९/१११-१२१) मे इसकी विस्तृत रसायनविधि देंखें। इसके अतिरिक्त काश्यपसंहिता में भी इसके विविध कल्पों का अवलोकन करें।
16/08/19, 8:51 pm – LE Onkar A-608: मेरे बाबा ने अपने गांव के एक मुहल्ले के निवासियों की विशेषता बतायी थी कि “खाय मछेछी, रगड़ै गोड़!” (मछेछी खाते हैं और पैर रगड़ते हुए चलते हैं).
मेरे द्वारा मछेछी के बारे में जिज्ञासा प्रकट करने पर बताया था कि यह एक प्रकार की घास है जो तालाब के सूखे हुए भाग में उगती थी।
अब यह प्राप्य है या नहीं बुजुर्ग ग्रामीणों से पता करने का प्रयास करूँगा।
16/08/19, 9:09 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: 1 कली के लहसुन के भी विभिन्न व विशेष प्रयोग है शायद

पर रक्त व पित्त को दूषित करने वाला???₹
16/08/19, 9:34 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
🙏 श्री मनुस्मृति 🙏

विप्रोष्य पादग्रहणं अन्वहं चाभिवादनम् ।
गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्मं अनुस्मरन् । । २.२१७ । ।

यथा खनन्खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति ।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति । । २.२१८ । ।

मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथ वा स्याच्छिखाजटः ।
नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत्सूर्यो नाभ्युदियात्क्व चित् । । २.२१९ । ।

       *अर्थ*

विदेश से आने पर चरणस्पर्श कर व प्रतिदिन दूर से गुरुस्त्री को प्रणाम करना चाहिए ,यही शिष्यों के आचार है ।।
जैसे पुरुष कुदाल फावड़े से भूमि खोदता हुआ जल पाता है वैसे सेवा से गुरुविद्या को पाता है।।
ब्रह्मचारी मुण्डित या शिखाधारी या जटाधारी हो उसे सूर्योदय व सूर्यास्त के समय गांव के भीतर नहीं होना चाहिए अर्थात दोनों काल में गांव के बाहर सन्ध्या गायत्री की उपासना में रहना चाहिए।।

हरी ॐ
🙏
.
17/08/19, 7:01 am – Abhinandan Sharma: ऐसा नहीं है कि लोग अब ही धर्म पर प्रश्नचिंह लगाते हैं या अभी ही धर्म की निंदा किया करते हैं | ऐसा पहले भी होता था किन्तु पहले पढ़कर निंदा की जाती है जबकि आजकल बिना पढ़े ही, बहुतेरे लोग, धर्म पर आक्षेप लगाते हैं | जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर था भारत में तो बौद्ध धर्म कि विद्वानों ने सनातन धर्म पर विभिन्न आक्षेप लगाए और उनके आक्षेप आजकल के उथले आक्षेप नहीं होते थे, जैसे कि “जो ईश्वर अपने मंदिर की रक्षा नहीं कर सकता, वो कैसा ईश्वर ?” या फिर – “मैंने तो भगवान् की इतनी पूजा पाठ की, फिर भी मेरा बेटा मर गया, फिर ऐसे भगवान की क्यों पूजा करूँ ?” ये बहुत ही उथले आक्षेप हैं, इनमें कोई दम नहीं है | जिन लोगों ने कभी धर्म को जाना ही नहीं, वो इस प्रकार की बाते करते हैं | ऐसे लोगों से लाख गुना बेहतर तो बौद्ध धर्म के लोग थे, जिन्होंने ईश्वर पर आक्षेप लगाने के लिए तर्क का सहारा लिया | सनातन धर्म के ही सबसे विश्वसनीय ग्रन्थ को, जिसे धर्म की रक्षा के लिए, लिखा गया था, उसे ही सबसे पहले निशाना बनाया | उस शास्त्र का नाम था – तर्कशास्त्र (न्याय शास्त्र)

बौद्ध विद्वान नागार्जुन (३०० ई) ने गौतम ऋषि द्वारा रचित न्याय शास्त्र में ही कमियां निकालीं | ये यहाँ, गलत लिखा है, इसकी व्याख्या यहाँ गलत है | ऐसा गलत लिखा है, वैसा गलत लिखा है | इस प्रकार, पढलिख कर, लोगों ने सनातन धर्म पर आक्षेप लगाये, हमला किया | केवल उपरोक्त तरीके के मूर्खतापूर्ण आक्षेप मात्र नहीं थे, वरन तथ्यपरक बातें थी | नागार्जुन की व्याख्या को, वात्स्यायन ऋषि (400 ई) ने चेलेंज किया और न्यायशास्त्र की पुनर्व्याख्या की, और ग्रन्थ लिखा – ‘न्यायभाष्य’ | लेकिन बौद्ध कहाँ मानने वाले थे ! जैसे आजकल के कुतर्की और धर्म का ABCD भी न जानने वाले बेसिरपैर के आक्षेप लगाते हैं, उससे उलट, बौद्धों ने और मेहनत की, और उस भाष्य में भी कमियां निकालीं और बौद्ध दार्शनिक दिननांग (500 ई) ने, भाष्य में गलतियाँ निकालीं | जिनका खंडन उद्योतकराचार्य (600 ई) ने न्याय शास्त्र के ही ऊपर ‘न्यायवार्तिक’ लिख कर दिया |

सोचिये, आप जो, ईश्वर का खंडन करते हैं, उन बातों के पीछे कितना अध्ययन है ? कितनी मेहनत है ? क्या इन लोगों से ज्यादा पढ़ा है आपने ? फिर आप कहते हैं, कि मैं उस ईश्वर को नहीं मानता, मैं तो नास्तिक हूँ ! पर उसके पीछे ग्राउंड कितना मजबूत है ! देखिये बौद्धों ने कितनी मेहनत की फिर भी बार बार, तर्कशास्त्र में गलतियां निकालीं और इस बार बीड़ा उठाया, बौद्ध विद्वान धर्मकीर्ति (700 ई) ने और ग्रन्थ लिखा ‘न्यायबिंदु’ और उसमें बिंदुवार क्रम से, न्यायवार्तिक की बहुत सी बातों को गलत सिद्ध किया | सैकड़ों सालों तक ये हमला होता रहा, कोरी बातें नहीं बल्कि शास्त्रार्थ | फिर सनातन धर्म के उद्भट विद्वान वाचस्पति मिश्र ने (800 ई) ने ‘न्याय बार्तिक टीका’ करके जैसे, सनातन धर्म की रक्षा की | इन्हीं ग्रंथों को आधार बनाकर, आदिशंकराचार्य ने (७८८ ई), पूरे भारत में घूम घूम कर, बौद्धों को तर्क और शास्त्रार्थ में पराजित किया | सोचिये, वो बोद्ध, जिन्होंने आपसे सैकड़ों गुना आध्ययन किया, वर्षों तक, सनातन धर्म की जड़ें खोदीं | वो तक शंकराचार्य के और वाचस्पति मिश्र के सामने न टिक सके तो फिर आपके तर्कों की तो जमीन ही नहीं है | फिर भी आप समझते हैं कि आपके प्रश्न बड़े ही तार्किक हैं ! जो तर्कशास्त्र को जानता है, वो आपकी बातों को सुनकर हँसता है और कभी कभी ROFL भी हो जाता है |

सनातन धर्म, ईश्वर, आत्मा आदि के बारे में एक आम राय है कि वो तो भक्ति से प्राप्त होते हैं, वो ज्ञान से, तर्क से प्राप्य नहीं है । मेरा स्पष्ट मत इससे कुछ भिन्न है । तर्क क्या करता है ? तर्क (logic) आपको सत्य तक पहुचने में मदद करता है । सत्य क्या है ? जिसकी सत्ता है, वह सत है और जिसकी सत्ता ही नहीं है, वह असत है । ईश्वर की सत्ता यदि है, यदि ईश्वर सत्य है तो वह तर्क से अवश्य दिखेगा। यदि आत्मा है, तो वह तर्क से अवश्य प्रकाशित होगी ।

यदि ईश्वर तर्क से प्राप्य नहीं है, यदि आत्मा, तर्क से प्रमाणित नहीं है, तो वो निश्चित ही नहीं है । सोचिये, यदि ये तर्क से प्रमाणित न होते और सिर्फ मानने होने की ही बाध्यता होती तो फिर शंकराचार्य ने बौद्धों को कैसे मनवाया कि ईश्वर है ? क्या वो सभी बौद्ध गुरुओं से ये जाकर कहते थे कि अरे ! आपका तो विश्वास ही नहीं है ईश्वर में, आपको तो वो मिलेगा ही कैसे ? पहले ईश्वर को मानो, वह ज्ञान से नहीं आस्था से मिलेगा, आस्था करो और उनकी ये बातें सुनकर सभी बौद्ध अपनी हार मान लेते होंगे ! है ना ?

पर नहीं, ऐसा नहीं होता था । भारतीय सनातन धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है, जिसमें धर्म की रक्षा तर्कशास्त्र करता है । गौतम ऋषि ने इसी कारणवश इसकी रचना की | इसी तर्कशास्त्र से, बौद्धों के आक्रमण से धर्म की रक्षा हुई। आज भी अगर कोई ये कहता है कि धर्म, ईश्वर, आत्मा, मानने की चीज है तो मैं आपसे कहता हूँ कि नहीं ये सब जानने की चीज है, मानने की नहीं । अभी आपको बहुत अध्ययन करना है |

https://youtu.be/egRlssoPtCI
17/08/19, 7:21 am – FB Mrudul Tiwari Allahabad Shastra Gyan: 🙏🙏🙏🙏🙏
17/08/19, 7:29 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
17/08/19, 8:11 am – Pitambar Shukla: 🙏🌹🌹🙏
17/08/19, 8:15 am – Pitambar Shukla: मछेछी= मत्यसाक्षी

लोक प्रचलित मान्यता के अनुसार इसको पीस कर मिश्री के साथ सेवन करने से नेत्र- ज्योति का वर्धन होता है ।
17/08/19, 8:17 am – Pitambar Shukla: मत्यसाक्षी ❎
मत्स्याक्षी✅
17/08/19, 11:37 am – FB Vikas Delhi Shastra Gyan: 🙏🙏
17/08/19, 11:41 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

राम सिंधु घन सज्जन धीरा।
चंदन तरु हरि संत समीरा।।

सब कर फल हरि भगति सुहाई ।
सो बिनु संत न काहू पाई।।

श्री राम चंद्र जी समुद्र हैं,
तो धीर संत पुरुष मेघ हैं।
श्री हरि चन्दन के वृक्ष हैं,
तो संत पवन हैं।
सब साधनों का फल सुन्दर हरि भक्ति ही है ।
उसे संत के बिना किसी ने नही पाया ।।119-9।।

अस बिचारि जोइ कर सतसंगा।
राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।।

ऐसा विचार कर जो भी संतों का संग करता है,
हे गरुड़ जी! उस के लिए श्री राम जी की भक्ति सुलभ हो जाती है ।।119-10।।
17/08/19, 12:02 pm – LE Onkar A-608: मछेछी की खोज में, पहचानने वाले के साथ तालाब में ढूंढ़ा किन्तु अभी नहीं उगी है।
उसने बताया कि यह कार्तिक के महीने में बहुतायत से पायी जाती है।
17/08/19, 12:40 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: 🙏 इतने प्रयास के लिए धन्यवाद
17/08/19, 12:41 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
17/08/19, 1:38 pm – You added LE B 204 Amit Srivastava
17/08/19, 1:40 pm – You added LE Raju Tomar F Tower
17/08/19, 1:41 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan joined using your invite
17/08/19, 1:54 pm – LE Raju Tomar F Tower: 😊 धन्यवाद अभिनंदन जी
17/08/19, 1:55 pm – Abhinandan Sharma: 🙏 सभी नए मेंबर कृपया ग्रुप के नियम एक बार अवश्य देख लें
17/08/19, 2:36 pm – LE Raju Tomar F Tower: नियम कृपया पुनः प्रसारित करिए
17/08/19, 2:57 pm – Abhinandan Sharma: इस ग्रुप में फ़ॉर्वर्डेड पोस्ट डालना मना है | नेट से कोई भी कंटेंट, ख़ास तौर से बिना सन्दर्भ के अथवा तोडा मरोड़ा हुआ, डालना भी मना है | जो आपने स्वयं पढ़ा हो, किसी शास्त्र से, कोई दोहां, कोई चोपाई, कोई पुराण, कुछ भी, वो आप इस ग्रुप में डाल सकते हैं | ग्रुप ज्वाइन करने वाले, खुद भी कोई भी एक पुस्तक, ग्रुप एडमिन के परामर्श से प्रारंभ कर सकते हैं और उसे पढ़कर ग्रुप में अन्य मेम्बेर्स को पढने के लिए डाल सकते हैं | अभी ग्रुप में ४-5 पुस्तक इस प्रकार के प्रयास से चल रही है, जिससे सभी लोग वो ग्रन्थ पढ़ सकें | स्वागतम !
17/08/19, 2:57 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: इस ग्रुप में फ़ॉर्वर्डेड पोस्ट डालना मना है | नेट से कोई भी कंटेंट, ख़ास तौर से बिना सन्दर्भ के अथवा तोडा मरोड़ा हुआ, डालना भी मना है | जो आपने स्वयं पढ़ा हो, किसी शास्त्र से, कोई दोहां, कोई चोपाई, कोई पुराण, कुछ भी, वो आप इस ग्रुप में डाल सकते हैं | ग्रुप ज्वाइन करने वाले, खुद भी कोई भी एक पुस्तक, ग्रुप एडमिन के परामर्श से प्रारंभ कर सकते हैं और उसे पढ़कर ग्रुप में अन्य मेम्बेर्स को पढने के लिए डाल सकते हैं | अभी ग्रुप में ४-5 पुस्तक इस प्रकार के प्रयास से चल रही है, जिससे सभी लोग वो ग्रन्थ पढ़ सकें | स्वागतम !
17/08/19, 3:02 pm – LE Raju Tomar F Tower: 🤔फिर तो 😟पढ़ना पड़ेगा 😢
17/08/19, 9:45 pm – LE Onkar A-608: मत्स्याक्षी का सेवन करके महिलाएँ मीनाक्षी हो सकती हैं।
18/08/19, 10:24 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं।

कथा सुधा मथि काढ़हिं
भगति मधुरता जाहिं।।

ब्रह्म ( वेद) समुद्र है,
ज्ञान मन्दराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्र को मथ कर कथा रूपी अमृत निकालते हैं,
जिसमें भक्ति रूपी मधुरता बसी रहती है।।120-क।।

बिरति चर्म असि ज्ञान मद
लोभ मोह रिपु मारि।

जय पाइअ सो हरि भगति
देखु खगेस बिचारि।।

वैराग्य रूपी ढाल से अपने को बचाते हुए और ज्ञान रूपी तलवार से मद, लोभ और मोह रूपी वैरियों को मार कर जो विजय प्राप्त करती है,
वह हरि भक्ति ही है;

हे पक्षिराज! इसे विचार कर देखिए ।।120-ख।।
18/08/19, 11:03 am – Abhinandan Sharma: वात, पित्त और कफ ! तो क्या कफ को संस्कृत में भी कफ ही कहते हैं ? क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि अंग्रेजी का कफ शब्द भी, संस्कृत से आया है ? अंग्रेजी में cough की etymology क्या है ?
18/08/19, 11:04 am – Abhinandan Sharma: 😲
18/08/19, 11:15 am – Abhinandan Sharma: क्या हम सांख्य शास्त्र को कंटिन्यू करने वाले हैं ?
18/08/19, 11:32 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: 🤔
18/08/19, 12:03 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: अवश्यमेव आएगा परंतु जब समझ आएगा तभी, सोमवार तक का समय दीजिये समय दीजिये 🙏🏼
18/08/19, 12:18 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
18/08/19, 12:32 pm – Abhinandan Sharma: Cough तो दिखा ही नहीं रहा ?
18/08/19, 12:38 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: यहां cough की spelling cuff दी है शायद ??

Google translate भी cuff का अर्थ कफ ही बताता है। किन्तु cuff और cough मे अंतर नहीं मिला।
18/08/19, 1:36 pm – Dr PL Sharma White Cottege Ghaziabad Shastr Gyan joined using this group’s invite link
18/08/19, 1:38 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : Welcome Prof. Dr. P L Sharma from White Cottage. 🙏🏻
18/08/19, 1:42 pm – Dr PL Sharma White Cottege Ghaziabad Shastr Gyan: Thanks🙏😄😄
18/08/19, 10:02 pm – LE Onkar A-608: यह अवधी भी कितनी सुसंस्कृत है🙏
19/08/19, 10:18 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ।
जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।।

नाथ मोहिं निज सेवक जानी।
सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी ।।

पक्षिराज गरुड़ जी फिर प्रेम सहित बोले—
हे कृपालु! यदि मुझ पर आप का प्रेम है,
तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जान कर मेरे सात प्रश्नों उत्तर बखान कर ( विस्तार पूर्वक ) कहिए ।।120-1।।

प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा।
सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।।

बड़ दुख कवन कवन सुख भारी।
सोइ संछेपहिं कहहु बिचारी।।

हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है?

फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है,
यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिये।।120-2।।

19/08/19, 6:02 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: Cuff – हाथ का कलाई वाला हिस्सा, जहाँ से हम कमीज की बाज़ू मोड़ते हैं। जैसे की handcuff.

Cough – a sudden, usually noisy expulsion of air from the lungs, often involuntarily.

Origin of cough –
Dutch -> kuchen(to cough)
German -> keuchen(to pant)

दोनों ही english कफ(cuff, cough) अलग हैं और हिन्दी के कफ से मेल नहीं खाते।
19/08/19, 6:05 pm – Abhinandan Sharma: cough – इस कफ में और वात, पित्त और कफ वाले कफ में, क्या अंतर है ?
19/08/19, 6:08 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: Cough – जैसा की google बाबा और dictionary बता हैं, केवल खखारने की क्रिया है गला साफ़ करने के लिए तथा सांस का रास्ता साफ करने के लिए।
19/08/19, 6:12 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: This message was deleted
19/08/19, 6:13 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कफ – इसके बारे में ज्यादा पढ़ना अभी बाकी है पर जैसा समझ आया, यह शरीर में उपस्थित द्रव है।
19/08/19, 6:15 pm – Abhinandan Sharma: हम्म…. good ! मतलब दोनों अलग अलग हैं !
19/08/19, 6:16 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: जी
19/08/19, 9:05 pm – Dr PL Sharma White Cottege Ghaziabad Shastr Gyan: 🕉 हिन्दू (सनातन) धर्म के आधार ग्रंथ वेद हैं। जिनके अनुसार परमात्मा सत् चित् आनन्द मय है। वह सबका आधार है। सर्व व्यापक एवं अजन्मा है।
उसका मुख्य नाम ओउ्म है। इसी को प्रणव कहा जाता है।
19/08/19, 9:34 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सांख्यतत्त्व कौमुदी – 1

दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदभिघातके हेतौ ।
दृष्टे सापार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ १ ॥

अन्तःकरण वर्ती त्रिविध दुःखों से चैतन्य शक्ति को भी अपाय होता है, ऐसी भावना उत्पन्न होने पर इनका प्रतिकार किन उपायों से होगा, यह जानने की अभिलाषा होना सहज सिद्ध बात है, यदि कोई कहे कि लोक सिद्ध दृष्ट उपाय सुकर होते हैं, तो शास्त्रीय उपाय का क्या काम? परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि लौकिक उपायों से दुःख अवश्य ही निवृत्त हो जाएगा, ऐसा नहीं कह सकते, अतएव दुःखत्रयों के निवृत्ति होने के लिए शास्त्रीय उपायों को काम में अवश्य लाना चाहिए ।

इस शास्त्र के विषय में विद्वानों की जिज्ञासा नहीं होवेगी, ऐसा हम प्रतिपादन करते परन्तु कब ?
यदि संसार में दुःख – इस पदार्थ का अभाव होता ? अथवा दुःख होकर भी उसका नाश किसी को अभीष्ट नहीं होता ।
अथवा दुःख नाश करने की इच्छा होते हुए भी दुःख नाश करना अशक्य होता (क्योंकि शास्त्रों में दुःख पदार्थ नित्य बताया गया है अर्थात नित्य होने से नाश होना अशक्य ही है )
तीसरा विकल्प कहते हैं,
अथवा दुःख नाश जब भी शक्य है तो शास्त्र विषय का ज्ञान होना यह सच्चा उपाय न होता ।
चौथा, अथवा कोई दूसरा सुलभ उपाय होता, तब हम प्रतिपादन करते, परन्तु उपरोक्त प्रकार में से यहाँ पर एक भी नहीं है, यदि कहें कि कैसे ? तो नीचे लिखा जाता है, संसार में दुःख है ही नहीं अथवा होकर भी उसका नाश किसी को अभीष्ट नहीं, ऐसा तो कह ही नहीं सकते, क्योंकि इस संसार में आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक; तीन प्रकार का दुःख अनुभव से जाना जाता है ।

उपरोक्त दुःखत्रयों में पहिला जो आध्यात्मिक दुःख है उसके दो भेद हैं, शारीर और मानस, शरीरान्तर्गत वात, पित्त और कफ इन तीनो दोषों के विषमता से होने वाला दुःख शारीरिक दुःख कहलाता है तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, ईर्ष्या, विषाद इष्ट वस्तु का अदर्शन इत्यादि के योग से होने वाला दुःख मानस कहलाता है । यह सब शरीर के आन्तरिक उपाय से साध्य होने के कारण आध्यात्मिक कहलाते हैं ।

शरीर को छोड़कर उसके बाहरी उपाय द्वारा साध्य-दुःख के आधिभौतिक और आधिदैविक, ऐसे दो प्रकार हैं ।

उक्त प्रकार में – मनुष्य, पशु, मृग, पक्षी, सर्प, वृक्षादि स्थावर पदार्थ; इनके योग से होनेवाला दुःख आधिभौतिक दुःख है तथा यज्ञ, राक्षस, विनायक ग्रह, इनके योग से होने वाला जो दुःख है, वह आधिदैविक दुःख है ।

उपरोक्त त्रिविध दुःख प्रत्येक प्राणी के अनुभव में आने योग्य हैं तथा वे दुःखत्रय, रजोगुण का ही एक प्रकार का परिणाम है, इस कारण वे दुःखत्रय नहीं हैं, ऐसा किसी काल में नहीं कह सकते तथा अन्तः करण के ऊपर धर्मरूप से रहने वाले इन त्रिविध दुःखों से चैतन्य शक्ति का “यह वस्तु हमको अनिष्टप्रद है” इस भावना से सम्बन्ध होने के कारण इस अनिष्ट दुःख का नाश हो, ऐसी जिज्ञासा होना योग्य ही है, दुःख, यह रजोगुण का कार्य है, और रजोगुण नित्य है अतः नित्य होने के कार्य का नाश होना, यह बात अशक्य है । अर्थात कारण का अस्तित्व रहने से कार्य का भी आस्तित्व रहता ही है क्योंकि कारण रहते हुए कार्य का सर्वथैव नाश नहीं होता । यह सत्य है, परन्तु उसका अभिभव अर्थात – प्रतिकार होना शक्य है, उस दुःख का प्रतिकार कैसे कर सकते हैं, इसका विवेचन आगे बतलाया गया है ।

यदि यहाँ पर कोई ऐसी शंका करे कि दुःख है तथा यह नाशवान भी है और इसका प्रतिकार भी शक्य है तथा दुःखप्रतिकारार्थ शास्त्रीय उपाय भी है, तब लोक-प्रसिद्ध सुलभ उपायों को छोड़कर अनेक जन्मों में वह भी महत्कष्ट से साध्य होनेवाले शास्त्रीय उपायों के झंझट में कौन पड़ेगा ? क्योंकि आज समाज में भी कहावत है कि गृहाङ्गण में जो शहत मिल जावे, तो फिर उसके लिए पर्वत पर कौन जावेगा ? वैसे ही अभीष्टार्थ यदि सहज में ही सिद्ध हो, तो उसके लिए ऐसा कौन विद्वान् है जो यत्न करेगा ? “अब दुःख प्रतिकारार्थ सुलभ दृष्ट उपाय बतलाते हैं” शारीरिक दुःख के प्रेतकारार्थ उत्तम वैद्यों के बतलाये हुए सैकड़ों उपाय हैं और मानसिक दुःख निवारणार्थ भी उत्तम स्त्री, अन्न, पान, अभ्यंग, वस्त्र, अलंकार इत्यादि उपाय हैं तथा इनके प्राप्त होने से दुःख का प्रतिकार होना शक्य है । ऐसे ही – आधिभौतिक दुःख के प्रीकारार्थ निति शास्त्राभ्यास निपुणता, शान्त स्थान में वास्तव्य इत्यादि सहज उपाय हैं और आधिदैविक दुःख के लिए मन्त्र, मणि, औषध इत्यादि उपाय अति सुलभ हैं और प्रतिकार भी तुरन्त हो सकता है इस कारण से शास्त्रीय उपायों की जिज्ञासा होना अयुक्त है “परन्तु इन लौकिक उपायों से अभिलषित दुःख निवृत्त होना हिमजल तुल्य है, किन्तु यह स्थूल दृष्टी वालों को क्या मालूम ।

पूर्वोक्त शंकाओं का निराकरण करते हैं कि यह पूर्वोक्त स्थूल दृक मनुष्य कृतविधान ठीक नहीं है, क्योंकि दृष्ट उपाय हैं परन्तु उन उपायों से दुःख निवृत्त अवश्यमेव होगा ही, ऐसा नहीं कह सकते यदा कदाचित हो भी जावे तो भी उस दुःख कि तथात्सदृश अन्य दुःखों की उत्पत्ति नहीं होवेगी ऐसा अवाधित सिद्धान्त नहीं कह सकते, अस्तु, प्रकृति शास्त्र को दुःख निवृत्ति ही मात्र अभीष्ट नहीं है किन्तु एकान्तिकात्यन्तिक दुःख निवृत्ति अभीष्ट है । ‘एकान्त’ कहते हैं अवश्यमेव दुःख निवृत्त होने को और ‘अत्यन्त’ कहते हैं, एक बार निवृत्त दुःख के पुनः न उत्पन्न होने को तो इन दोनों बातों को दृष्ट उपायों में अभाव है अतः मूल में “एकान्तात्यन्ततो भावाद् ” कहा है।

यथाविधि रसायन, कामिनी निति शस्त्राभ्यास, मणि, मंत्रादि यद्यपि लौकिक उपाय सुकर हैं तथापि आध्यात्मिक दुःख निवृत्त्यर्थ उनकी कुछ भी उपयोगिता नहीं देखी जाती इसी कारण इनका वे ‘अनैकान्तकत्व’ कोटि में समझना चाहिए । क्वचित स्थल में उनकी उपयोगिता भी देखी जाती है परन्तु दुःख की अत्यन्त निवृत्ति नहीं होती अतैव इनको ‘अनात्यन्तिकत्व’ कहते हैं अर्थात पूर्वोक्त प्रकार के दोषों द्वारा ग्रस्त होने से (मृगजलवत) नोरूप योगी दृष्ट उपायों के झगडे में न पढ़कर विद्वानों को शास्त्रीय(आध्यात्मिक) उपाय आवश्यकीय है ।
19/08/19, 10:25 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : https://youtu.be/RlWN68hhkUY
19/08/19, 11:18 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ११२,११३,११४

पलाण्डुस्तद्रुणन्यूनः श्लेष्मलो नातिपित्तलः। कफवातार्शसां पथ्याः स्वेदेऽभ्यवहृतौ तथा॥११२॥

तीक्ष्णो गृञ्जनको ग्राही पित्तिनां हितकृन्न सः। दीपनः सूरणो रूच्यः कफघ्नो विशदो लघुः॥११३॥

विशेषादर्षसां पथ्याः भूकन्दस्त्वतिदोषलः। पत्रे पुष्पे फले नाले कन्दे च गुरुता क्रमात्॥११४॥

पलाण्डु(प्याज) का शाक- यह लहसुन से कुछ कम गुणों वाला होता है। यह कफकारक है तथा पित्तकारक कम होता है।

गृञ्जनक का शाक- यह कफविकार, वातविकार तथा अर्शोरोग में हितकर होता है। व्रणशोथ आदि पर इसका लेप करके स्वेदन किया जाता है तथा शाक बनाकर इसे खाया भी जाता है। गाजर का शाक तीक्ष्ण गुणों वाला, मल को बांधने वाला तथा यह पित्तविकारों के लिए हितकर नहीं है।

वक्तव्य- वास्तव में उक्त ११२वें पद्य को ‘पलाण्डु…….तथा’। इस प्रकार दो पंक्तियों में पूरा होना चाहिए था। ऐसा मत श्री अरुणदत्त एवं श्रीचन्द्रनन्दन का था, किन्तु हेमाद्रि का कथन है कि ये गुण धर्म पलाण्डु के नहीं अपितु गृञ्जन के है। अतः उक्त दो पंक्तियों को यहां एकसाथ रखा है। वास्तव में स्वेदन के लिए पलाण्डु तथा गृञ्जन दोनों का ही प्रयोग होता है। देखें च.सू.२७/१७४।

सूरण का शाक- यह अग्निदीपक, रुचिकारक, कफनाशक, विशद(पिच्छिलतानाशक), लघु (शीघ्र पचने वाला), विशेष करके यह अर्शोरोग के लिए हितकर होता है।

वक्तव्य- अर्शोनाशक ‘शूरणमोदक’ योग देखें— भैषज्यरत्नावली- अर्शोरोगाधिकार में १. स्वल्प – शूरणमोदक, २. बृहतशूरणमोदक तथा अन्य अनेक योग। सूरण परिचय- यह दो प्रकार का होता है- एक वह जिसे खा लेने से मुख तथा गले में कांटे जैसे चुभते से प्रतीत होते है। दूसरा वह जो पहले की तुलना में कम कष्टकारक होता है। पाककर्मकुशल व्यक्ति दोनो की सब्जी सूखी अथवा रसेदार बनाते हैं, बड़े शौक से खायी भी जाती है। वे इसके टुकड़ो को इमली (किसी प्रकार के अम्ल), चूना या फिटकरी आदि में डालकर, उबालकर घी में तलकर इसका पाक किया करते है। कुछ टीकाकारो ने सुरण को ही भूकन्द माना है। ‘कन्द’ शब्द की दृष्टि से उनका सोचना उचित ही है, किन्तु सूरण के उक्त गुणों के बाद उसे अतिदोषज कहना कहां तक युक्तिसंगत होगा?

भूकन्द का शाक- यह अत्यन्त दोषकारक तथा दोषवर्धक होता है।

वक्तव्य- भूकन्द के सम्बन्ध में विद्वानो के मतभेद- कोई इसे जिमिकन्द, दूसरे विद्वान उसे ‘भूस्फोटाऽऽख्यः प्रावृड् उद्भवः’ अर्थात यह संस्वेद शाक है। हिन्दी में इसे— भुईछत्ता, खुमी आदि कहते है। अंग्रेजी में mashroom कहते है। यह वर्षाऋतच में वर्षा होने पर सहसा पैदा हो जाता है। इसका आकार छाता का जैसा होता है। रंग सफेद या बादामी सफेद होता है। यह भक्ष्य(खाने योग्य) तथा अभक्ष्य (जहरीला) भेद से दो प्रकार का होता है।

शाको मे उत्तरोत्तर गुरुता- पत्रशाको से पुष्पशाक गुरु, इनसे अधिक फलशाक, फलशाको से अधिक गुरु नालशाक(सरसो के नाल= गन्दल), इनसे भी अधिक गुरु कन्दशाक होते हैं।

वक्तव्य- श्री हेमाद्रि उक्त श्लोक का क्रम पुष्पे पत्रे इस प्रकार चाहते हैं, क्योंकि। सुश्रुत ने एक तो नालशाक का ग्रहण नहीं किया और दूसरा जहां हेमाद्रि लघवः पाठ को उद्धृत करते हैं, यहां सुश्रुत ने गुरुवः पाठ दिया है जो सर्वथा युक्तियुक्त है। देखें। सु.सू. ४६/२४३। गुरुवः के स्थान पर लघवः शब्द का छप जाना सम्पादकीय प्रमाद प्रतीत होता है।
19/08/19, 11:23 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कृपया कोई भी forwarded, video या image न डालें, केवल वही डाले जो खुद से पढ़ा हो, वो भी typed, कोई image नहीं। इनका अधिकार केवल admin के ही पास है 🙏🏼🙏🏼
20/08/19, 12:20 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
श्री मनुस्मृति

तं चेदभ्युदियात्सूर्यः शयानं कामचारतः ।
निम्लोचेद्वाप्यविज्ञानाज्जपन्नुपवसेद्दिनम् । । २.२२० । ।

सूर्येण ह्यभिनिर्मुक्तः शयानोऽभ्युदितश्च यः ।
प्रायश्चित्तं अकुर्वाणो युक्तः स्यान्महतैनसा । । २.२२१ । ।

आचम्य प्रयतो नित्यं उभे संध्ये समाहितः ।
शुचौ देशे जपञ् जप्यं उपासीत यथाविधि । । २.२२२ । ।

यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किं चित्समाचरेत् ।
तत्सर्वं आचरेद्युक्तो यत्र चास्य रमेन्मनः । । २.२२३ । ।

अर्थ

यदि ब्रह्मचारी इच्छा से सोता रहे और सूर्योदय हो जाय या नगर में ही बिना जाने सूर्यास्त हो जाय तो प्रायश्चित में एक दिन का उपवास करे व गायत्री जाप करे।। यदि सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सोता रह जाय व प्रायश्चित्त ना करे तो महापातक लगता है।।
रोज़ दोनों सन्ध्या में एकाग्रमन होकर पवित्र स्थान में गायत्रीजाप करे।।
यदि किसी धर्म का स्त्री या शूद्र आचरण करता हो और उसमें उसका मन लगता हो तो उसी का पालन करे,या जिसमें अपना चित्त प्रसन्न हो वही करे।।

हरी ॐ
🙏
20/08/19, 12:24 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कफ पृथ्वी और जल तत्व से बना है सो रंग में सफ़ेद, चिकनाई वाला, गुरु, मीठा होता है। इसकी शरीर में मुख्य स्थिति छाती और पेट में होती है।
20/08/19, 12:27 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 🙏🏼🙏🏼
20/08/19, 12:44 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: भूकन्द के भक्ष्य-अभक्ष्य होने का कैसे पता लगेगा?
20/08/19, 12:44 am – G B Malik Delhi Shastra Gyan:……………. बहुत दिनों से मेरे मन में एक प्रश्न है, जिज्ञासा है, जो मैं आज पूछना चाहता हूँ, वो यह कि हिन्दू धर्म /सनातन धर्म के अनुसार, भगवान की क्या परिभाषा है? अगर भगवान को परिभाषित करेंगे तो कैसे करेंगे?
20/08/19, 12:47 am – G B Malik Delhi Shastra Gyan: जब से मैंने इस मेसेज को पढ़ा है, तब से मेरी जिज्ञासा और ज्यादा बढ़ी है, क्या यह भगवान की ki परिभाषा हो सकती है?
20/08/19, 12:48 am – G B Malik Delhi Shastra Gyan: कृपया मार्गदर्शन करें, अति कृपा होगी
धन्यवाद
20/08/19, 12:53 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: धीरज धरो महाराज, ये @918010855550 जी बताएँगे, शायद सो गए हों अभी 🙂
20/08/19, 4:28 am – Pitambar Shukla: 🙏🙏
20/08/19, 5:27 am – Ashu Bhaiya: भगवान – सभी ऐश्वर्यों का मालिक
ईश्वर – सभी पर शासन (ईशन) करने वाला
20/08/19, 6:15 am – Abhinandan Sharma: बहुत सुंदर ।
20/08/19, 6:20 am – Mummy Hts:
20/08/19, 6:34 am – Abhinandan Sharma: वाह, क्या तात्विक विवेचन है । बहुत सुंदर आरम्भ । तर्कशास्त्र का भी उद्देश्य, दुख से परमानेंट मुक्ति ही है ।
20/08/19, 7:35 am – LE Onkar A-608: ब्रह्म मुहूर्त में पढ़ने पर भी कोई ऐसा वाक्य नही रहा कि कई बार न पढ़ना पड़ा हो। बहुत ही अधिक समय लगा। ऐसा एकाग्रता का अभाव या अत्यल्पज्ञता के कारण हो सकता है।
एकान्त और अत्यन्त के अर्थ ने इनके बारे में मेरे पूर्वज्ञान को तिरोहित कर दिया। 🙏
20/08/19, 8:19 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: इसीलिए लिखने में भी समय लगा, 2 अलग पुस्तकों से और कम से कम तीन बार पढ़ा तब कहीं जाकर दिमाग में घुसा की क्या बताया गया है।
20/08/19, 8:32 am – LE Onkar A-608: आप के परिश्रम के लिए नमन 🙏
कृपया इसे पोस्ट करने का समय ऐसा रखें कि लोग पढ़ सकें।
दिन में इतना विशद एवं गूढ विषय व्यस्तता के कारण पढ़ना एवं समझना अत्यन्त दुष्कर है।
20/08/19, 8:38 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: इसीलए यहाँ text form में पोस्ट करना जरुरी किया गया है ताकि हम इसे दो दिन, दो हफ्ते, दो महीने और दो साल बाद भी पढ़ सकें। समय की परेशानी सभी के साथ है, तो जब आपके पास समय हो तभी पढ़ें।
20/08/19, 8:42 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 🙏🙏
20/08/19, 10:31 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

संत असंत मरम तुम्ह जानहु ।
तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।।

कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला।
कहहु कवन अघ परम कराला।।

संत और असंत का मर्म ( भेद) आप जानते हैं,
उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए ।
फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है?।।120-3।।

मानस रोग कहहु समुझाई।
तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।।

तात सुनहु सादर अति प्रीती।
मैं संछेप कहउँ यह नीती।।

फिर मानस रोगों को समझा कर कहिए।
आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है।

( काग भुशुण्डि जी ने कहा )—
हे तात! अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिये।
मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूं।।120-4।।
20/08/19, 9:08 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: भूकन्द मेरे समझ से सूरणकन्द को ही कहते हैं ; जिस सूरणकंद के पौधे में फूल लग जाते हैं, वह भूकंद है. जाति एक ही है. यह त्रिदोषकारक होता है और ऐसी मान्यता है कि इसे खाने से गलित कुष्ठ होता है.
20/08/19, 10:02 pm – +91 …………:
20/08/19, 10:05 pm – +91 …………: 😊👌👌
20/08/19, 10:18 pm – Abhinandan Sharma: हमाए एडमिन साब भोत गुस्से वाले हैं, ये बात नये मेंबर जान लें और इस वीडियो को उनके दिखने से पहले हटा लें । फिर मत कहिएगा की बताया क्यों नई ।

20/08/19, 10:29 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
20/08/19, 10:35 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 😄😄🙏
20/08/19, 10:49 pm – FB Rahul Gupta Kanpur: एक बार मुझसे ऐसी भूल (सच में भूल ही थी) हो गयी थी। मैंने तुरन्त क्षमा याचना करके तथा post हटाकर भूल सुधार कर लिया था।
20/08/19, 10:53 pm – FB Rahul Gupta Kanpur: मानस रोग प्रसंग को युगतुलसी श्रीरामकिंकर जी ने बहुत सुंदर ढंग से समझाया है।
21/08/19, 5:19 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
श्री मनुस्मृति

धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थौ धर्म एव च ।
अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः । । २.२२४ । ।

आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः ।
नार्तेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः । । २.२२५ । ।

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः । । २.२२६ । ।

यं मातापितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम् ।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि । । २.२२७ । ।

अर्थ

कोई अर्थ व धर्म को, कोई काम व अर्थ को, कोई अर्थ को और कोई धर्म को ही अच्छा मानते हैं।। पर धर्म,अर्थ, व काम इन तीनों का आचरण करने से भला होता है यह धर्म शास्त्र की आज्ञा है।।

आचार्य ब्रह्मा की मूर्ति,पिता प्रजापति की मूर्ती,माता पृथ्वी की मूर्ती, और बड़ा भाई अपनी ही मूर्ती है,,इन से दुखी होने पर भी इनका अपमान ना करें।।
और ब्राह्मण का तो कभी ना करें, मनुष्यों की उत्पत्ति व पालन पोषण में माता पिता जो दुख सहते हैं उसका बदला सैकड़ों वर्ष सेवा से भी नहीं हो सकता ।।

हरी ॐ
🥢
21/08/19, 9:35 am – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : क्या मनु ने प्रलय देखा था, कैसा प्रलय था। कृपया थोड़ा प्रकाश डाले
21/08/19, 10:13 am – Abhinandan Sharma: इस ग्रुप में, किसी भी पोस्ट से संबंधित प्रश्न ही मान्य हैं । यदि आपके पास, विषय से हटकर कोई प्रश्न है तो कृपया ग्रुप के संबंधित सदस्य, जिसे उचित समझें, उससे अलग से पूछ लें ।
21/08/19, 10:19 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

नर तन सम नहिं कवनिउ देही।
जीव चराचर जाचत जेही।।

नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी।
ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ।।

मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नही है ।
चर और अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं।

यह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याण कारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है ।।120-5।।

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर।
होहिं बिषय रत मंद मंद तर।।

काँच किरिच बदले ते लेहीं।
कर ते डारि परस मनि देहीं।।

ऐसे मनुष्य शरीर को धारण ( प्राप्त ) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नही करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं,
वे पारस मणि को हाथ से फेंक देते है और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं।।120-6।।
21/08/19, 10:24 am – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : Ji. 😊

फिर भी यदि कोई चर्चा इस विषय पर कभी हो पाए तो जरूर कीजियेगा। धन्यवाद🙏🏻
21/08/19, 10:32 am – Abhinandan Sharma: जब चर्चा में प्रलय विषय आये, तब आप ये प्रश्न रखियेगा🙏
21/08/19, 10:35 am – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : उचित हैं 🙏🏻
21/08/19, 2:54 pm – +91 80765 70922:
21/08/19, 2:55 pm – +91 ………: This message was deleted
21/08/19, 2:55 pm – Abhinandan Sharma: कृपया दोनो वीडियो तुरन्त हटा लें, कहीं हमाए एडमिन न देख लें !

21/08/19, 4:41 pm – Abhinandan Sharma: ऐसा स्ट्रिक्ट ग्रुप देखा है कहीं और 😊
21/08/19, 4:53 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कृपया सभी नए सदस्य ध्यान दें
इस ग्रुप में फ़ॉर्वर्डेड पोस्ट डालना मना है | नेट से कोई भी कंटेंट, ख़ास तौर से बिना सन्दर्भ के अथवा तोडा मरोड़ा हुआ, डालना भी मना है | जो आपने स्वयं पढ़ा हो, किसी शास्त्र से, कोई दोहां, कोई चोपाई, कोई पुराण, कुछ भी, वो आप इस ग्रुप में डाल सकते हैं | ग्रुप ज्वाइन करने वाले, खुद भी कोई भी एक पुस्तक, ग्रुप एडमिन के परामर्श से प्रारंभ कर सकते हैं और उसे पढ़कर ग्रुप में अन्य मेम्बेर्स को पढने के लिए डाल सकते हैं | अभी ग्रुप में ४-5 पुस्तक इस प्रकार के प्रयास से चल रही है, जिससे सभी लोग वो ग्रन्थ पढ़ सकें | स्वागतम !
21/08/19, 4:56 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : Dhanyawad. अभी कौन 2 सी पुस्तक चल रही है।
21/08/19, 5:04 pm – Abhinandan Sharma: अष्टांग हृदय (आयुर्वेद), रामचरित मानस, मनु स्मृति, सांख्यतत्व कौमुदी (अभी इस पर विचार चल रहा है कि इसको कंटिन्यू करना है या नहीं), शिव स्वरोदय ।
21/08/19, 5:05 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : अति सुंदर🙏🏻
21/08/19, 5:05 pm – Abhinandan Sharma: भृतहरि के तीनों शतक (श्रृंगार, नीति और वैराग्य, शंकराचार्य का प्रश्नोत्तरमाला, गोविब्द दामोदर स्तोत्र, कृष्णअष्टक समाप्त हो चुके हैं अभी तक ।
21/08/19, 5:07 pm – Pitambar Shukla: कुछ समय तक वाल्मीकि रामायण भी चल चुकी है ।
21/08/19, 5:08 pm – Abhinandan Sharma: मेरी तो उसकी इच्छा थी 😊
21/08/19, 5:11 pm – +91 ………: चाणक्य सूत्राणि कैसा रहेगा ?????
21/08/19, 5:12 pm – Abhinandan Sharma: 😲 बहुत बढ़िया रहेगा !!! सुदर्शन जी, क्या विचार है । अर्थशास्त्र से शुरू करें या किसी और से ?
21/08/19, 5:13 pm – Abhinandan Sharma: आप कर पाएंगे ?
21/08/19, 5:13 pm – +91 ……..: जी । प्रतिदिन एक सूत्र
21/08/19, 5:13 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: चाणक्य ही सही रहेंगे ।
21/08/19, 5:14 pm – Abhinandan Sharma: बहुत सुन्दर ।
21/08/19, 5:14 pm – Abhinandan Sharma: शुभारंभ कीजिये ।
21/08/19, 5:14 pm – +91 ……..: ठीक हैं हम उनका एक सूत्र अभी सायं ६.00 से भेजते हैं।
21/08/19, 5:17 pm – Abhinandan Sharma: 👏👏
21/08/19, 5:19 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : कृपया श्रीमद्भागवत भी शुरू करिये 🙏🏻
21/08/19, 5:24 pm – Abhinandan Sharma: नहीं । बहुत बड़े और विस्तारित ग्रन्थ की बजाय, छोटे, समाप्त हो सकने वाले और uncommon ग्रंथों को प्राथमिकता दी जाएगी।
21/08/19, 5:25 pm – Abhinandan Sharma: जैसे भगवद्गीता सभी ने पढ़ी होगी लगभग लेकिन चाणक्यनीति ओरिजिनल शायद ही किसी ने पढ़ी हो या चाणक्य का अर्थशास्त्र। सो उसको वरीयता रहेगी ।
21/08/19, 5:27 pm – Abhinandan Sharma: शिव स्वरोदय, अष्टांग हृदय, त्रिशतक, सब ऐसे ही ग्रन्थ हैं । रामचरितमानस तो पीताम्बर जी की इच्छा थी, सो वो कर रहे हैं । आप यदि स्वयं भागवत पुराण रोज डालना चाहें, तो अवश्य डाल सकते हैं, उसके लिये कोई मना नहीं है।
21/08/19, 5:27 pm – +91 ……….: जन्माष्टमी 23 अगस्त को है 24 अगस्त को इस पर कुछ प्रकाश डालिए
21/08/19, 5:30 pm – Abhinandan Sharma: विषय से हटकर प्रश्न अलग से पूछे कृपया । ये प्रश्न आप अलंकार जी से अलग से पूछ लीजिये ।
21/08/19, 5:33 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : जी जरूर, पर अभी नही। अभी काफी अच्छे विषय चल रहे है,।
21/08/19, 5:33 pm – FB Rahul Gupta Kanpur: 🌟 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी काल-निर्णय

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को होता है। इस व्रत में सप्तमी-सहित अष्टमी का ग्रहण निषिद्ध है।

इस विषय में दो मत प्रचलित हैं। स्मार्त लोग अर्धरात्रि का स्पर्श होने पर या रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी में भी उपवास करते हैं, किन्तु वैष्णव लोग सप्तमी का किंचिन्मात्र स्पर्श भी ग्रहण नहीं करते। उनके यहाँ सप्तमी का स्पर्श होने पर अगले दिन उपवास किया जाता है, चाहे अगले दिन अष्टमी कला-काष्ठा मात्र ही हो।

निम्बार्क सम्प्रदायी वैष्णव तो पूर्वदिन अर्धरात्रि से कुछ पल भी सप्तमी अधिक हो तो भी अष्टमी को उपवास न करके नवमी को ही उपवास करते हैं। यही मत रामानन्द सम्प्रदायियों को भी मान्य है।

रामानुज सम्प्रदाय वाले नक्षत्र को ही प्रधानता देते हैं। उनके यहाँ सिंह-संक्रांति में रोहिणी नक्षत्र जब भी आता है तभी जन्माष्टमी मनाई जाती है। शेष वैष्णवों के यहाँ उदयव्यापिनी अष्टमी को ही मान्यता दी जाती है।

जय श्रीकृष्ण 🌏
21/08/19, 5:55 pm – +91 ………..: चाणक्य नीति और चाणक्य सूत्राणि अलग अलग ग्रन्थ हैं।

अभी चाणक्य के ग्रंथो में अभी लघुचाणक्य, वृद्धचाणक्य ,चाणक्य नीतिदर्पण(जन प्रचलित) , चाणक्य राजनीतिशास्त्र ,उनका अर्थशास्त्र , श्लोक परिमाण ग्रन्थ , और चाणक्य सूत्राणि या उनका सूत्र ये ग्रंथ मिलते हैं।

उसी मे से उनका यह ग्रन्थ हैं चाणक्य सूत्राणि जो लगभग ५७१ सूत्र हैं।
21/08/19, 6:01 pm – Abhinandan Sharma: Give me some time to decide
21/08/19, 6:07 pm – +91…………: चाणक्य_सूत्राणि

चाणक्य सूत्राणि पर यह पुस्तक पंडित श्री रामावतार विद्याभास्कर जी की हैं जो इस पुस्तक के भाषान्तरकार तथा व्याख्याकार हैं हैं।

            *सूत्र १* 
      *सुखस्य मूलं धर्मे: 11१11*

अर्थ– धर्म ( नीति या मानोवोचित कर्तव्य का पालन ) सुख का मूल हैं।

विवरण– जगत् ( समाज ) का धारण या प्लान करने वाली नीतिमत्ता या कर्तव्यपालन ही मनुष्य का धर्म हैं। धर्म (नीति) ने ही समस्त जगत् को धारण कर रखा हैं। नहीं तो वह कभी का लड़ झगड़कर नष्ट हो गया होता। अधर्म आपतदृष्टि से सुख का मूल दिखने पर भी दुःख का मूल हैं। धर्म पालन से दुःखदायी पाप की संभावनायें नष्ट हो जाती हैं। मानसिक अभ्युज्ञान और ऐहिक अभ्युदय दोनों को समानरूप से साथ साथ सिद्ध करने वाली नीति “धर्म” कहलाती हैं। इस लिए जो लोग राज्याधिकार के लेना और उससे सुख अर्थात् दोनों प्रकार का अभ्युदय पाना चाहे वे सावधान हो जाये और उससे भी पहले धर्म ( नीतिमत्ता ) को अपनायें। नीति का अनुसरण किये बिना मनुष्य लो मानसिक अभ्युस्थानमूलक सुख ही सुख है। मानसिक पतन से मिलनेवाला सुख सुख न होकर सुखभ्रम या अनन्त दुःखदायक ही है।

पुस्तकान्तर में इससे प्रथम यह स्वतंत्र सूत्र उपलब्ध है।

    *सा श्रीर्वो$व्यात्।।*

अर्थ- वह परमसंपत्तिदात्री ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवता राज्यश्री आप राज्याधिकारियों को सुमति देकर रक्षा करे।

विवरण- राज्यश्री आप लोगो के पास आकर आप को श्रीमदमत्त न बनाकर , समाजसेवा के सर्वोत्तम क्षेत्र राज्यसंख्या का सुधारूप से सञ्चालन करने की सुमति प्रदान करे। आप लोग राज्य को अपने राष्ट्र की पवित्र धरोहर मानकर इसे राष्ट्रसेवा का तपोवन बनाकर रखे।

भादप्रद कृष्ण षष्ठी , परिधावी सवंत्सर (२१/०८/२०१९)🙏🙏
21/08/19, 7:15 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

आदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चाद्युद्धं समाचरेत्।
सर्पमुद्रा कृता येन तस्य सिद्धिर्न संशयः।२३९।

चन्द्रप्रवाहेSप्यथ सूर्यवाहे भटाः समायान्ति च योद्धुकामाः।
समीरणस्तत्त्वविदां प्रतीतो या शून्यता सा प्रतिकार्यनाशिनी।२४०।

यां दिशां वहते वायुर्युद्धं तद्दिशि दापयेत्।
जयत्येव न सन्देहः शक्रोऽपि यदि चाग्रतः।२४१।

यत्र नाड्यां वहेद्वायुस्तदङ्गे प्राणमेव च।
आकृष्य गच्छेत्कर्णातं जयत्येव पुरन्दरम्।२४२।

अर्थ- युद्ध करने के पहले मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए, तत्पश्चात युद्ध करना चाहिए। जो व्यक्ति सर्पमुद्रा का अभ्यास करता है, उसके कार्य की सिद्धि में कोई संशय नहीं रह जाता।२३९।

जब चन्द्र स्वर या सूर्य स्वर में वायु तत्त्व प्रवाहित हो रहा हो, तो एक योद्धा के लिए युद्ध हेतु प्रस्थान करने का उचित समय माना गया है। पर यदि अनुकूल स्वर प्रवाहित न हो रहा हो और सैनिक युद्ध के लिए प्रस्थान करता है, तो उसका विनाश हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।२४०।

जिस स्वर में वायु तत्त्व प्रवाहित हो रहा हो, उस दिशा में यदि योद्धा बढ़े तो वह इन्द्र को भी पराजित कर सकता है।२४१।

किसी भी स्वर में यदि वायु तत्त्व प्रवाहित हो, तो प्राण को कान तक खींचकर युद्ध के लिए प्रस्थान करने पर योद्धा पुरन्दर (इन्द्र) को भी पराजित कर सकता है।
21/08/19, 7:15 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: 🙏🙏🙏
21/08/19, 7:27 pm – LE Raju Tomar F Tower: प्रणाम,
आज एक व्यक्ति ने मुझको मेरी जड़ों से तोड़ने का असफल प्रयास कियाl दुख तो इस बात का है कि वह स्वयं अपनी जड़ों से टूटा हुआ था और उन जड़ों से भी टूट चुका था जिनसे उसका परिवार अच्छी तरह से जुड़ा थाl कुछ लोग ऐसे व्यक्ति की बात मानकर अपना नाम भी बदलने को तैयार हो जाते हैं जिस व्यक्ति ने स्वयं अपने माता-पिता द्वारा दिया गया नाम नहीं बदलाl
मैं संत रामपाल के एक शिष्य की बात कर रहा हूं
🙏
21/08/19, 8:11 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कृपया यहाँ इसकी बात न करें, अगला ऐसा message और आप निष्काषित कर दिए जाएंगे
21/08/19, 8:12 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सांख्यतत्त्वकौमुदी – 2

दृष्टवादानुश्रविकः स ह्यविशुद्धि क्षयातिशययुक्तः ।
तद्विपरीतः श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञानात् ।। २ ।।

अर्थ:
जब कि वह वैदिक उपाय अविशुद्धि(मलिन), क्षय(नाशवान) तथा अतिशय आदि दोषयुक्त है, तब वैदिक कर्म कलाप भी लौकिक उपाय के सदृश ही है और ऐसा होने के कारण उस दोषयुक्त वैदिक उपाय से विपरीत अर्थात अशुद्धता रहित हमारा वैदिक उपाय ही अति उत्तम है क्योंकि इसकी (हमारे शास्त्रीय उपाय की ) उत्पत्ति व्यक्त(व्यक्त्कार्य) और अव्यक्त(कारण) तथाज्ञ(चैतन्य पुरुष) इनके विवेक ज्ञान से होती है ।

व्याख्या – गुरु पाठ के अनन्तर जो श्रवण किया जाता है अर्थात जिसका केवल गुरु परंपरा से श्रवण होता है तथा कोई व्यक्ति विशेष से ग्रथित नहीं किया जाता, वही अनुभव अर्थात वेद है (तत्रेति) उसमें रहनेवाला या उससे मिला हुआ या उससे प्राप्त किया गया जो कर्म समूह है, वह ‘आनुश्रविक’ है । परन्तु वह आनुश्रविक कर्मसमूह भी लोकसिद्ध उपाय सदृश ही है,(एकान्तिकेति) क्योंकि त्रिविध दुःखों का नियम से तथा समूल नाश करने में (उपयोगिता) कारिणीभूत न होना यह दोष उभयत्र सदृश ही है ।

यद्यपि इस कारिका में आनुश्रविक अर्थात वैदिक, ऐसा यद्यपि सामान्यतः निर्देश किया है, तथापि उस शब्द का ‘कर्मकलाप’ मात्र अभिप्राय समझना अर्थात वैदिक कर्मसमूह मात्र दुःखोच्छेद के लिए निरुपयोगी है, अन्य भाग नहीं, क्योंकि विवेक ज्ञान, यह भी तो आनुश्रविक ही है, जैसे वेद ही ने विवेक ज्ञान विषय में “अये मैत्रेयी आत्मा को जानना चाहिए” ऐसा विधान किया है, आत्मा को जानना, इसका अर्थ आत्मा को प्रकृति से भिन्न समझना ऐसा है (न स ) तद्वत “जो आत्मा को जानता है, वह पुनः जन्म मरण की परम्परा में नहीं गिरता” ऐसी श्रुति आत्म ज्ञान का परम फल बतलाती है ।

कर्मसमूह दुःखोच्छेद के लिए निरुपयोगी है, इसका कारण बतलाते हैं –
(सह्य) वह वैदिक उपाय अविशुद्ध, क्षय, अतिशय इन तीनो दोषों से युक्त है, (अविशुद्धि:) सोम यागादि सत्र, पशुओं की हिंसा, बीजों का नाश इत्यादि दोषयुक्त कर्मों के सहाय से साध्य होता है, बस यही उसकी (अविशुद्धि) अपवित्रपना है, जैसे भगवान् पञ्चशिखाचार्य जी ने वैदकीक कर्म समूह को स्वल्प सङ्कर, सपरिहार तथा साप्रत्यव मर्ष, ऐसा बतलाया है, अब प्रत्येक शद्बों का अर्थ बतलाता हूँ –

स्वल्प सङ्कर – इसका अर्थ यह है कि ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों से उत्पन्न होने वाले प्रधान अपूर्व का तथा पशु हिंसादिकों से उत्पन्न हुआ अनर्थकारक स्वल्प अपूर्व से संसर्ग होना अर्थात मेल होना स्वल्प सङ्कर कहलाता है अर्थात ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों से उत्पन्न होने वाला प्रधानीभूत धर्म का पशु हिंसादि अनर्थकारक अप्रधानीभूत अधर्म का एक समानाधिकरण में रहना ही सङ्कर कहलाता है, पुण्य की अपेक्षा अलप होने से स्वल्प कहा है ।

सपरिहारः – बहुत से प्रायश्चितों द्वारा उसका परिहार (निष्कृति) हो सकता है, परन्तु प्रमाद से या स्मृति विभ्रम से भूल कर, प्रायश्चित न किया गया तो प्रधान कर्म के विपाक समय में अर्थात मुख्य कर्म का स्वर्गादिक फल जिस समय प्राप्त होता है, उसी समय अप्रधान हिंसाजन्य अधर्म भी दुःख रूप से अनुभव करने में आता है, परन्तु यद्यपि ऐसा प्रकार है, तथापि यावत्काल पर्यन्त वह अनर्थ उत्पन्न करते रहे, तावत् काल पर्यन्त वह सप्रत्यव मर्ष रहता है अर्थात सहिष्णुता के साथ रहता है सारांश फल भोगने वाला पुरुष उसको सहता है ।

चिरकालिक पुण्य संचय से प्राप्त स्वर्ग रुपी अमृत सरोवर में स्नान करने वाले कुशल कर्म ही अल्प पाप से प्राप्त दुखाग्नि की चिंगारी को सहन करते हैं अर्थात बहुत सी सुख राशि के सामने दुःख कणिका कुछ भी मालूम नहीं पड़ती, यहाँ तक पूर्वोक्त पञ्च शिखाचार्य का मत बतलाया गया तथा उससे वैदिक कर्मसमूह अविशुद्ध है यह निश्चित हुआ, परन्तु इस पर मीमांसकों की कोटि नहीं है ऐसा नहीं, जो कोटि है वह आगे बतलाई जाती है, यदि मीमांसक कहें कि –

किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो, यह सामान्य शास्त्र (अग्नि शोमीयं पशुमालभेत) अग्निष्टोम सम्बन्धी पशुओं की हिंसा करें, इस विशेष शास्त्र से बाधित होता है, परन्तु यह मीमांसकों का कथन हमको युक्त नहीं मालूम पड़ता क्योंकि उपरोक्त सामान्य और विशेष वाक्य में हमको किञ्चित भी विरोध नहीं देख पड़ता, अतः वे जैसा कहते हैं, वैसा यहाँ नहीं है, कारण जिन दोनों में विरोध हुआ करता है, उनमें से जो बली होता है, वह दुर्बल को बाधा किया करता है, ऐसा नियम तथा अनुभव भी है, परन्तु उपरोक्त वाक्यों में विरोध न होकर उनका भिन्न-२ विषय है; यदि कहो कि कैसे? तो बताता हूँ – “किसी प्राणी की हिंसा मत करो” यह निषेध हिंसा को अनर्थ हेतुत्व सूचित कराता है – अर्थात हिंसा का अर्थोत्पादक है, परन्तु यज्ञ के उपयोगी नहीं है, ऐसा सूचित नहीं कराता तथा ‘अग्निष्टोम में हिंसा करें’ यह जो दूसरा वाक्य है, वह यह सूचित करता है कि पशुओं की हिंसा यज्ञ के उपयोगी है, बस इतना ही कहना है परन्तु उससे अनर्थ नहीं होता ऐसा कुछ वह नहीं कहता ।
हिंसा अनर्थ का हेतु होना तथा यज्ञ के उपयोगी होना, इन दोनों में किसी तरह का विरोध नहीं है, इस उपरोक्त शास्त्रार्थ से – हिंसा, पुरुष को दोषी भी करेगी तथा यज्ञ के उपयोगी भी होवेगी यह सिद्ध हो चुका, अस्तु, मूल कारिका में जो “क्षयातिशय” कहा, अब वह वैदिक उपाय क्षय तथा अतिशय दोष युक्त कैसे हैं, यह बतलाते हैं ।

क्षय (नाश) तथा अतिशय ये दोष वस्तुतः स्वर्गादि फलों में विद्यमान रहते हैं, न कि यज्ञों में, परन्तु उन्हीं दोषों का यज्ञ में उपचार किया जाता है ।

अब स्वर्गादिकों में अतिशय दोष कैसे है, यह बतलाया जाता है । ज्योतिष्टोम यज्ञ केवल स्वर्ग के साधक हैं तथा वाजपेयादि यज्ञ स्वराज्य के भी साधक हैं अर्थात उससे इन्द्र बना जा सकता है; तो इन दोनों में अतिशय दोष आ गया, क्योंकि दुसरे की संपत्ति का उत्कर्ष हुआ देख, जिसकी संपत्ति हीन है, ऐसे पुरुष को दुःख होना प्रकृति सिद्ध बात है । एक की अपेक्षा दुसरे को उत्तम स्थिति में रहना, यही अतिशय कहाता है ।

अब मीमांसकों का अमरत्व के विषय में क्या कहना है, वो बताते हैं । हमनें सोमपान किया और अमर हुए, प्रकृत वाक्य में ‘अमर’ का अर्थ है चिरकाल तक स्थिर रहने वाला । उपरोक्त अर्थ करने के विषय में प्रमाण भी है । प्रलय पर्यन्त स्थिर रहनेवाले स्थान को अमृतत्व, ऐसा कहा जाता है ।
यागादिकों से अमृतत्व की प्राप्ति नहीं होती, यह जो पूर्व में प्रतिज्ञा की गयी है, उसी के दृढीकरणार्थ श्रुति की साक्षी देते हैं । यथा – कर्म से, प्रजा से तथा धन से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, वह तो केवल त्याग साध्य विवेक ज्ञान से ही लाभ होता है, तद्वत ‘हृदयान्तर्गत स्थित सुखरूप एवं स्वयंप्रकाश ब्रह्म ज्ञान से प्राप्त करके महात्मा यति उसी में लीन हो जाते हैं ।
तथा कर्म करनेवाले, द्रव्य की इच्छा करनेवाले, संतति उत्पन्न करनेवाले ऋषि मृत्यु को प्राप्त हुए (मृत्यु अर्थात स्वर्गादि क्षयी फल) दुसरे ज्ञानी ऋषिकर्म के योग से अप्राप्य अमृतत्व (मोक्ष) को ज्ञान से प्राप्त हुए इत्यादि अनेक श्रुतियाँ, कर्म से मोक्ष प्राप्त नहीं होती, ऐसा स्पष्ट प्रतिपादन करती हैं ।

इन सब बातों का विचार करके ग्रन्थकार कहते हैं, वह सोमयागादि यज्ञ अविशुद्ध, अनित्य व सातिशय फल देने वाले दुःखनाशक वैदिक उपाय से विपरीत (भिन्न) हिंसादि दोषरहित नित्य व निरतिशय फल देनेवाला उपाय अतिश्रेष्ठ है, क्योंकि वह पुरुष पुनः जन्म मरण की परम्परा में नहीं प्राप्त होता, इस अर्थ की श्रुति साक्षी है ।

परन्तु हमारे उपरोक्त कथन में एक शंका उत्पन्न हो सकती है, कि विवेक ज्ञान से प्राप्त होने वाला मोक्ष, यह भी अनित्यत्व मोक्षग्रस्त है क्योंकि “जो जो कार्य हैं, वे वे अनित्य हैं”, इस व्याप्ति से मोक्ष को भी अनित्यता प्राप्त होती है, परन्तु यह शंका मिथ्या है क्योंकि जो जो भाव कार्य में हैं वे वे अनित्य हैं अर्थात कार्यत्वेन अनित्यता सिद्ध करना ठीक नहीं है, कार्यत्वेन भाव कार्य को ही अनित्यता प्राप्त होती है, दुःखध्वंस अर्थात दुःख का नाश वह कार्य है परन्तु भावरूप नहीं है, अतएव दुःखाभावरूप मोक्ष अनित्य नहीं है ।

इस उपरोक्त विवेचन का यह सार है कि उस दुःखनाशक वैदिक उपाय से, सत्वपुरुषान्यता प्रत्यय (प्रधान व पुरुष, ये दोनों भिन्न हैं ऐसा साक्षात्कार होना हिन् सत्वपुरुषान्यता प्रत्यय कहलाता है ) यह दुःखनाशक उपाय विपरीत है तथा इसी कारण से वह अधिक कल्याणकारक है । वैदिक उपाय, वेदविहित होने के कारण तथा उन उपायों से दुःख का भी किञ्चित नाश होने के कारण प्रशस्त है, तद्वत प्रकृति और पुरुष भिन्न हैं, यह प्रत्यय भी प्रशस्त है, परन्तु इन दोनों प्रशस्त उपायों में से दूसरा अधिक श्रेयस्कर है, क्योंकि इसमें हिंसा दोष बिलकुल न होकर इसके द्वारा मिला हुआ फल, नित्य और निरतिशय होता है ।

इस विवेक ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होती है, यह बताते हैं । व्यक्त, अव्यक्त तथा ‘ज्ञ’, इन तीनों के ज्ञान द्वारा इसकी उत्पत्ति होती है । विज्ञान-विवेक द्वारा होनेवाला ज्ञान, यह पृथक-पृथक हैं, ऐसा ज्ञान(व्यक्त ज्ञान) व्यक्त अर्थात कार्य, इसी का प्रथम ज्ञान होता है, पश्चात् उसके कारण का, अर्थात अव्यक्त का ज्ञान होता है तथा ये दोनों (व्यक्ताव्यक्त) कोई और ही के लिए हैं, ऐसा मालूम होकर इनसे पृथक (किसी तरह से सम्बन्ध न रखनेवाला) आत्मा का ज्ञान होता है, सारांश ज्ञान प्राप्त होने का क्रम ऐसा ही होने के कारण यहाँ भी व्यक्त, अव्यक्त, ज्ञ ऐसा क्रम से ही कहा गया है ।
21/08/19, 9:25 pm – LE Raju Tomar F Tower: क्या यह मेरे लिए है
21/08/19, 9:34 pm – LE Raju Tomar F Tower: धन्यवाद सुदर्शन जी,
संभवतः मेरा ज्ञान आप जैसे महान ज्ञानी मनीषियों के समक्ष कुछ भी नहीं है, अतः कोई संभावना नहीं बनती कि मैं व्यर्थ में इस ग्रुप में रहूं और आप जैसे महान ज्ञानी जनों का समय नष्ट करूंl हो सकता है मैं पुनः इस प्रकार का कोई विवरण प्रस्तुत कर दूं और आप को टोकना पड़ेl ज्ञानियों की गूढ़ विषय वस्तुओं को मेरे जैसा सहज सरल और सामान्य व्यक्ति समझ भी कैसे सकता है? अभी तक आपने मुझको सहन किया इसके लिए मैं आपका बड़ा आभारी हूंl
धन्यवाद, चलता हूं
प्रणाम

21/08/19, 9:44 pm – Abhinandan Sharma: मेरी ही गलती थी, बिना पूछे एड कर लिया था 😔
21/08/19, 10:09 pm – Vaidya Ashish Kumar: कफ जो गले से निकलता है,दिखता है वो शरीर का असामान्य स्राव है जो विकृत है इस कफ को बलगम कहते है।

कफ जो त्रिदोष वाला है वो पंच महाभूत से बना है एवं मुख्यतः पृथ्वी और जल तत्व से और पूरे शरीर मे प्राकृत रहने पर हमेशा बहता रहता है।
22/08/19, 12:09 am – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ११५,११६

वरा शाकेषु जीवन्ती सार्षपं त्वरम् परम्।

         *इति शाकवर्ग॥*

उत्तम अधम निर्णय- शाकवर्ग मे परिगणित शाको मे जीवन्ती (डोड़ी) शाक उत्तम तथा सरसों की पत्तियों तथा नाल का शाक अधम माना गया है।

वक्तव्य- शाकवर्ग के प्रारम्भ में छः प्रकार के शाको का परिगणन किया गया था। तदनुसार यहां कहा गया भूकन्द संस्वेदज शाको मे गिना जाता है। संक्षेप में शाक परिचय—

१. पत्रशाक- बथुआ, पोई, मरसा , चौलाई आदि।

२.पुष्पशाक- गोभी, अगस्तिया के फूल, केले के फूल, सेमल के फूल आदि।

३. फलशाक- पेठा, लौकी, करेला, बैंगन, परवल, टिण्डा आदि।

४.नालशाक- सरसों, राई आदि के नाल।

५. कन्दशाक- मूली, सूरण(जिमिकन्द), आलू, पिण्डालू, रक्तालू, वाराहीकन्द, गेठी, तरूड़ आदि।

६. संस्वेदज शाक- छत्रक, खूंब आदि। आचार्य खरनाद ने कहा है कि भोजन कर लेने के बाद फलों का सेवन करना चाहिए, अतः अब इसके बाद यहां फलवर्ग का प्रस्ताव है।

         *अथ फलवर्गः*

द्राक्षा फलोत्तमा वृष्या चक्षुष्या सृष्टमूत्रविट्॥११५॥

स्वादुपाकरसा स्निग्धा सकषाया हिमा गुरुः। निहन्यनिलपित्तासृतिक्तास्यत्वमदात्ययान्॥११६॥

तृष्णाकासश्रमश्वाससस्वरभेदक्षतक्षयान्।

द्राक्षा परिचय- द्राक्षा (दाख या मुनक्का) सब फलो मे उत्तम है। यह वीर्यवर्द्धक, आंखों के लिए उत्तम, मल-मूत्र को सुचारू रूप से निकालती है। विपाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, कुछ काषाय रसयुक्त, शीतवीर्य तथा देर में पचने वाली है। यह वात, पित्त, तथा रक्त विकारों का नाश करती है। मुख का तीतापन, मदात्ययरोग, तृष्णा(प्यास का अधिक लगना), कास, श्रम, श्वास, स्वरभेद, क्षत(उरःक्षत) एवं क्षय इन रोगों का विनाश करती है।

वक्तव्य- अंगूर आकार भेद से दो प्रकार के होते हैं।— १. छोटे, जिनके किशमिश बनाये जाते है और २. बड़े, जो आकार में लम्बे होते है, जिनके मुनक्का बनाये जाते हैं। फिर ये बीजवाले तथा बीजरहित भेद से भी दो प्रकार के होते हैं। स्वाद भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं— खट्टे और मीठे। वर्णभेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं।— काले तथा सफेद या हरिताभ सफेद। मुनक्का या किशमिश बनाने के लिए इन्हें थोड़ा पकाना पड़ता है, नहीं तो ये जल्दी सूखते नहीं अपितु सड़ जाते है।।
22/08/19, 12:43 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: जीवन्ति शाक????
22/08/19, 9:39 am – FB Susheel Pareek Jaipur Shastra Gyan: Your order for Aghori Baba Ki Geeta (Vigyan ki p… is cancelled. If you have already paid, refund will be initiated shortly. Details: http://amzn.in/d/7O7rBZ0
22/08/19, 10:00 am – Shastra Gyan Ranjana Prakash: प्राण को कानों तक खींच कर,मतलब क्या?
22/08/19, 10:31 am – Pitambar Shukla: श्री गणेशाय नमः
श्री जानकी वल्लभो विजयते
श्री राम चरित मानस
उत्तर कांड

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।
संत मिलन सम सुख जग नाहीं।।

पर उपकार बचन मन काया।
संत सहज सुभाउ खगराया ।।

जगत् में दरिद्रता के समान दुःख नही है तथा संतों के मिलन के समान जगत् में सुख नही है ।
और हे पक्षिराज! मन , वचन और शरीर
से परोपकार करना,
यह संतों का सहज स्वभाव है।।120-7।।

संत सहहिं दुख पर हित लागी ।
पर दुख हेतु असंत अभागी।।

भूर्ज तरू सम संत कृपाला।
पर हित निति सह बिपति बिसाला।।

संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए ।

कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं( अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)।।120-8।।
22/08/19, 11:32 am – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

प्रतिपक्षप्रहारेभ्यः पूर्णाङ्गं योSभिरक्षति।
न तस्य रिपुभिः शक्तिर्बलिष्ठैरपि हन्यते।२४३।

अङ्गुष्ठतर्जनीवंशे पादाङ्गुष्ठे तथा ध्वनिः।
युद्धकाले च कर्त्तव्यो लक्षयोद्धु जयीभवेत्।२४४।

निशाकरे रवौ चारे मध्ये यस्य समीरणः।
स्थितो रक्षेद्दिगन्तानि जयकाञ्क्षी गतः सदा।२४५।

श्वासप्रवेशकाले तु दूतो जल्पति वाञ्छितम्।
तस्यार्थः सिद्धिमायाति निर्गमे नैव सुन्दरि।२४६।

अर्थ- युद्ध के समय शत्रु के प्रहारों से अपने सक्रिय स्वर की ओर के अंगों की रक्षा कर ले, तो उसे शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु भी उसे कोई क्षति नहीं पहुँचा सकता।२४३।

युद्ध के दौरान हाथ के अंगूठे तथा तर्जनी से अथवा पैर के अंगूठे से ध्वनि करने वाला योद्धा बड़े-बड़े बहादुर को भी युद्ध में पराजित कर देता है।२४४।

विजय चाहनेवाला वीर चन्द्र अथवा सूर्य स्वर में वायु तत्त्व के प्रवाहकाल के समय यदि किसी भी दिशा में जाय तो उसकी रक्षा होती है।२४५।

भगवान शिव कहते हैं, हे सुन्दरी (माँ पार्वती), एक दूत को अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए उसे साँस लेते समय अपनी मनोकामना व्यक्त करनी चाहिए। परन्तु यदि वह श्वास छोड़ते समय अपनी मनोकामना व्यक्त करता है, तो उसे सफलता नहीं मिलती।२४६।
22/08/19, 12:18 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : चन्द्र स्वर या सूर्य स्वर क्या हुआ? क्या ओर भी कोई स्वर है, कृपया प्रकाश डाले।
22/08/19, 12:20 pm – Abhinandan Sharma: सर, आपका पहले का भाग छूट गया है | अभी आगे से ही करें और पढ़ते रहे, कुछ न कुछ नया मिलता ही रहेगा | शोर्ट में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर, इड़ा और पिंगला नाडी है |
22/08/19, 12:21 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : ओ के जी 🙏🏻😊
22/08/19, 2:12 pm – Abhinandan Sharma: आप इस लिंक पर दुबारा आर्डर करें – https://amzn.to/2Zk2dJd
22/08/19, 2:36 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: यदि बायें नाक से साँस चल रही हो तो चन्द्र स्वर और दाहिनें नाक से साँस चल रही हो तो सूर्य स्वर एेसा समझें।
22/08/19, 4:41 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : Ji🙏🏻
22/08/19, 4:41 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : Thank you. 😊
22/08/19, 6:59 pm – +91 ………….: चाणक्य_सूत्राणि

        *सूत्र०२* 
  *धर्मस्य मुलमर्थः।।२।।*

अर्थ- धर्म का मूल अर्थ हैं।

विवरण- धर्म अर्थात नीतिमत्ता को सुरक्षित रखने में राज्य श्री ( अर्थात सुदृढ़ सुपरिक्षित सुचिंतित राज्यवस्था ) का महत्वपूर्ण ध्यान हैं। जगत् को धारण करने ( जगत को ऐहिक अभ्युदय तथा मानसिक उत्कर्ष देने ) वाली नीति को राष्ट्र में सुरक्षित रखने में अर्थ अर्थात राज्यश्री ही मुख्य कारण होती हैं। राज्य में दरिद्रता आ जाने पर प्रजा में अनीति की बाढ़ आ जाती हैं। क्योंकि तब राज्य के पास अनीति को रोकने का साधन नहीं होता। राज्यसंख्या जितनी ही संपन्न और तेजस्वी होती है, प्रजा उतनी ही नीतिपरायण रहती हैं। राजकोष में दरिद्रता आ जाने पर राष्ट्र व्यवस्था ग्रीष्मकालीन कुनदियो के सामान लुप्त हो जाती हैं।

     *सूत्र०३*

अर्थस्य मूलं राज्यम्।।०३।।

अर्थ- राज्य ( राज्य की स्थिरता ) ही अर्थ (धन-धन्यादि संपत्ति या राज्यैश्वर्य ) का मूल (प्रधान कारण) होता हैं।

विवरण- राज्य की स्थिरता ही ऐश्वर्य को स्थिर रखने वाली वास्तु है। ऐश्वर्यहीन राज्य परस्पर व्याहृत अव्यव्यहरिक कल्पना है। राज्य तो हो पर उसे स्थिर रखने वाला ऐश्वर्य उसके पास न हो तो राज्य श्थिर नहीं रह पाता। राजा और प्रजा दोनो ही अर्थ से ऐहिक अभ्युदय वाले कर्म करके जीवन यात्रा करते हैं। राजा को राष्ट्र , दुर्ग, सेना, मंत्री, राजकर्मचारी, शस्त्रास्त्र , आदि विविध प्रकार के यान आदि संग्रह करके प्रजा की रक्षा-शिक्षा भरण-पोषण आदि में विपुल धन की आवश्यकता होती है। क्योंकि अर्थागम् राज्य के सुप्रबंधपर ही निर्भर होता हैं,इस लिए राज्याधिकारी लोग राज्य कको सर्वप्रिय बनाकर स्थिर बनाने में प्रमाद काम न ले।

भादप्रद कृष्ण सप्तमी, परिधावी सवंत्सर 🙏🙏🌺
22/08/19, 7:00 pm – Vaidya Ashish Kumar:
22/08/19, 7:05 pm – Dayadhankr Soryvanshi Hts, Akhilesh Frnd: 👏🏻
22/08/19, 7:15 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 🙏🏼🙏🏼
22/08/19, 9:46 pm – ~ BATMAN😈 left
22/08/19, 9:54 pm – +91 ……………: राधे राधे ॥ आज का भगवद चिन्तन ॥
22-08-2019
कृष्ण तत्व
भगवान श्री कृष्ण एक तरफ वंशीधर हैं तो दूसरी तरफ चक्रधर, एक तरफ माखन चुराने वाले हैं तो दूसरी तरफ सृष्टि को खिलाने वाले। वो एक तरफ बनवारी हैं तो दूसरी तरफ गिरधारी, वो एक तरफ राधारमण हैं तो तो दूसरी तरफ रुक्मणि हरण करने वाले हैं।
कभी शांतिदूत तो कभी क्रांतिदूत, कभी यशोदा तो कभी देवकी के पूत। कभी युद्ध का मैदान छोड़कर भागने का कृत्य , तो कभी सहस्र फन नाग के मस्तक पर नृत्य। जीवन को पूर्णता से जीने का नाम कृष्ण है। जीवन को समग्रता से स्वीकार किया श्री कृष्ण ने। परिस्थितियों से भागे नहीं उन्हें स्वीकार किया।
भगवान श्री कृष्ण एक महान कर्मयोगी थे, उन्होंने अर्जुन को यही समझाया कि हे अर्जुन, माना कि कर्म थोड़ा दुखदायी होता है लेकिन बिना कर्म किये सुख की प्राप्ति भी नहीं हो सकती। अगर कर्म का उद्देश्य पवित्र व शुभ हो तो वही कर्म सत्कर्म बन जाता है।

    संजीव कृष्ण ठाकुर जी 
             वृन्दावन
https://m.facebook.com/sanjivkrishnathakur/

https://www.youtube.com/user/sanjivkrishnathakur
22/08/19, 10:01 pm – Dayadhankr Soryvanshi Hts, Akhilesh Frnd: जन्माष्टमी कब है ???
22/08/19, 10:07 pm – Abhinandan Sharma: इसे देख लेवे ।
22/08/19, 10:11 pm – Ashu Bhaiya: जो वैष्णव नहीं हैं (अर्थात स्मार्त हैं) (अर्थात वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षा नहीं ली है) वे 23-अगस्त को मनाएं । यदि वैष्णव हैं तो सम्प्रदाय के अनुसार 24-अगस्त को मनाएं ।
22/08/19, 10:28 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक ११७,११८,१२०,१२१

उद्रिक्तपित्ताञ्जयति त्रीन्दोषान्स्वादु दाडिमम्॥११७॥

पित्तावारोधि नात्युष्णमम्लं वातकफापहम्। सर्वं हृद्यं लघु स्निग्धं ग्राहि रोचनदीपनम्॥११८॥

दाड़िम-फल का वर्णन- यह स्वादभेद से दो प्रकार का होता है— १. मधुर और २. अम्ल(खट्टा)। मधुर दाडिम के गुण— इसी को अनार कहते है। यह पित्त- प्रधान तीनों दोषों को शान्त करता है। खट्टा दाडिम— यह खट्टा होने पर पित्तदोष को प्रकुपित नहीं करता। यह अधिक उष्ण भी नहीं होता है। यह वात तथा कफदोष का विनाशक होता है।

सभी प्रकार का दाड़िम हृदय के लिए हितकर, शीघ्र पचने वाले, स्निग्ध, ग्राहि(मल को बांधने वाले), रुचि तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाले होते हैं।

वक्तव्य- पर्वतीय क्षेत्रों में दाड़िम के वृक्ष पर्याप्त रूप में पाये जाते हैं। इसके वृक्ष चिरायु होते है। स्थानीय लोग खट्टे तथा मीठे दाड़िमों की चटनी बनाकर रख लेते हैं। इसे काली चटनी कहते है। यह लाल तथा सफेद वर्णभेद से दो प्रकार का होता है। इसके छिलकों को धूप में सुखाकर चूर्ण बनाकर रख लिया जाता है। यह चूर्ण पित्तातिसार, प्रवाहिका, कास, बच्चो के दांत निकलने तथा टाउन्सिल मे प्रयोग किया जाता है।यद्यपि सभी अम्ल पदार्थ पित्तवर्धक तथा उष्णवीर्य होते है, तथापि अनार एवं आंवला फल इसके अपवाद है।

मोचखर्जुरपनसनारिकेलपरूषकम्। आम्राततालकाश्मर्यराजादनमधूकजम्॥११९॥

सौवीरबदराङ्कौल्लफलगुश्लेषमातकोद्भवम्। वातामाभिषुकाक्षोडमुकूलकनिकोचकम्॥१२०॥

उरुमाणं प्रियालं च बृंहणं गुरु शीतलम्। दाहक्षतक्षयहरं रक्तपित्तप्रसादनम्॥१२१॥

स्वादुपाकरसं स्निग्धम् विष्टम्भी कफशुक्रकृत्।

केला आदि फलों का वर्णन- मोच(केले का फल), खर्जूर(खजूर या छुहारा), पनस(कटहल), नारियल, परूषक(फालसा), आम्रात(आमड़ा), तालफल, काश्मर्य( गम्भारी का फल), राजादन(खिरनी), महुआ का फल, सौवीर(बड़ा बेर का फल), बेर का फल, अंकोर, फल्गु(गूलर), श्लेषमातक(लसोड़ा), बादाम, अभिषुक(पिस्ता), अखरोट, मुकूलक(यह भी पिस्ता की जाति है), निकोचक(चिलगोजा—चीड़ का बीज), उरूमाण(खुमानी या खुरमानी) और प्रियाल(चिरौंजी)— ये सभी फल बृंहण(शरीर को बढ़ाने वाले), गुरु (देर में पचने वाले) तथा शीतवीर्य होते हैं। दाह, क्षत(उरःक्षत) तथा अन्य स्थानों में लगे घावों का शमन करते है। रक्त तथा पित्त को शुद्ध करते हैं। ये सभी विपाक मे मधुर है, स्निग्ध, विष्टम्भकारक (मलावरोधक), कफ एवं शुक्रधातु को बढ़ाते है।
22/08/19, 10:28 pm – LE Onkar A-608: इस ग्रुप में फार्वर्डेड मेसेज भेजना प्रतिबंधित है।
कृपया description पढ़ लें।
22/08/19, 10:29 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : बहुत बढ़िया। 👌🏼
मेरे पास एक आईडिया है। जब अगली पोस्ट डाले तक कृपया पहले वाली पोस्ट को सेलेक्ट कर उसके अंदर लिखें जैसे कि ये मैसेज ताकि एक एक करके ऊपर की पोस्ट पर पहुच जाए वार्ना पहले का पोस्ट सर्च करना पड़ता है जिसमे बहुत समय लग जाता है ओर निरंतरता का भी एहसास नही होता है। 🕉🙏🏻
22/08/19, 10:29 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan: तब
22/08/19, 10:33 pm – Abhinandan Sharma: कर्मयोगः पर ऐसी फ़ॉर्वर्डेड पोस्ट ने ही योग का सत्यानाश किया है । कृपा करके ऐसी कोई भी फ़ॉर्वर्डेड पोस्ट इस ग्रुप पर न डालें । कृपया ग्रुप इनफार्मेशन अवश्य पढ़ लें ।
22/08/19, 10:35 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : ये मेरा एक कॉमन आईडिया है किसी पोस्ट विशेष के लिए नही। 🙏🏻😊
22/08/19, 10:35 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: उत्तम सलाह। अगली post से apply करूंगा।
22/08/19, 10:36 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : अरे वाह। 😊👌🏼
22/08/19, 10:38 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: इसे कहते हैं खोज 🙂
22/08/19, 10:40 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏🙏
22/08/19, 10:41 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: सामान्य सा उपाय था और हम slack तक की यात्रा करके आ गये।😊😊
22/08/19, 10:46 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

लाभादीन्यपि कार्याणि पृष्ठानि कीर्तितानि च।
जीवे विशति सिद्धयन्ति हानिर्निःसरणे भवेत्।२४७।

नरे दक्ष स्वकीया च स्त्रियां वामा प्रशस्यते।
कुम्भको युद्धकाले च तिस्रो नाड्यस्त्रयीगतिः।२४८।

हकारस्य सकारस्य विना भेदं स्वरः कथम्।
सोऽहं हंसपदेनैव जीवो जपति सर्वदा।२४९।

शून्याङ्गं पूरितं कृत्वा जीवाङ्गे गोपयेज्जयम्।
जीवाङ्गे घातमाप्नोति शून्याङ्गे रक्षते सदा।२५०।

अर्थ- जो कार्य साँस लेते समय किए जाता है, उसमें सफलता मिलती है। पर साँस छोड़ते समय किए गए कार्य में हानि होती है।२४७।

दाहिना स्वर पुरुष के लिए और बाँया स्वर स्त्री के लिए शुभ माना गया है। युद्ध के समय कुम्भक (श्वास को रोकना) फलदायी होता है। इस प्रकार तीनों नाड़ियों के प्रवाह भी तीन प्रकार के होते हैं।२४८।

स्वर ज्ञान “हं” और “सः” में प्रवेश किए बिना प्राप्त नहीं होता। “सोऽहं” अथवा “हंस” पद (मंत्र) के सतत जप द्वारा स्वर ज्ञान की प्राप्ति होती है।२४९।

आपत्ति सदा सक्रिय स्वर की ओर से आती है। अतएव आपत्ति के आने की दिशा ज्ञात होने पर निष्क्रिय स्वर को सक्रिय करने का प्रयास करना चाहिए। निष्क्रिय स्वर सुरक्षा देता है।२५०।
22/08/19, 10:47 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: सही है इस तरह भेजना 🙂👍🏻
22/08/19, 10:47 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: 😊👍🏻
22/08/19, 11:19 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: शंका
अष्टाङ्ग हृदय के अलावे आयुर्वेद की सभी पुस्तकों में बादाम, पिस्ता, चिल्गोजा, अखरोट आदि को उष्ण वीर्य बताया गया है. सिर्फ चिरौंजी/प्रियाल को शीत वीर्य बताया गया है. ऐसा क्यों?
23/08/19, 5:47 am – Abhinandan Sharma: श्रीमान, अभी तो हम सब बस पढ़ रहे हैं | अभी रिसर्च नहीं कर सकते हैं | आपको यदि ज्ञात है, तो आप ही बताएं |
23/08/19, 5:50 am – Vaidya Ashish Kumar: This message was deleted
23/08/19, 5:51 am – Vaidya Ashish Kumar: सुंदर एवं उपयोगी विचार🙏🏻🙏🏻
23/08/19, 8:12 am – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

वामे वा यदि वा दक्षे यदि पृच्छति पृच्छकः।
पूर्णे घातो न जायेत शून्ये घातं विनिर्दिशेत्।२५१।

भूतत्त्वेनोदरे घातः पदस्थानेऽम्बुना भवेत्।
उरुस्थानेऽग्नितत्त्वेन करस्थाने च वायुना।२५२।

शिरसि व्योमतत्त्वे च ज्ञातव्यो घातनिर्णयः।
एवं पञ्चविधो घातः स्वरशास्त्रे प्रकाशितः।२५३।

युद्धकाले यदा चन्द्रः स्थायी जयति निश्चितम्।
यदा सूर्यप्रवाहस्तु यायी विजयते सदा।२५४।

अर्थ- जब कोई प्रश्नकर्ता युद्ध के विषय में सक्रिय स्वर की ओर से प्रश्न पूछ रहा हो और उस समय कोई भी स्वर, चाहे सूर्य या चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो युद्ध में उस पक्ष को कोई हानि नहीं होती। पर अप्रवाहित स्वर की दिशा से प्रश्न पूछा गया हो, तो हानि अवश्यम्भावी है।२५१।
अगले दो श्लोकों में होनेवाली हानियों पर प्रकाश डाला गया है।

यदि प्रश्न-काल में उत्तर देनेवाले साधक के स्वर में पृथ्वी तत्त्व प्रवाहित हो, समझना चाहिए कि पेट में चोट लगने की सम्भावना, जल तत्त्व, अग्नि तत्त्व और वायु तत्त्व के प्रवाह काल में क्रमशः पैरों, जंघों और भुजा में चोट लगने की सम्भावना बतायी जा सकती है।२५२।

आकाश तत्त्व के प्रवाह काल में सिर में चोट लगने की आशंका का निर्णय बताया जा सकता है। स्वरशास्त्र इस प्रकार चोट के लिए पाँच अंग विशेष बताए गए हैं।२५३।

यदि युद्धकाल में चन्द्र स्वर प्रवाहित हो रहा हो, तो जहाँ युद्ध हो रहा है वहाँ का राजा विजयी होता है। किन्तु यदि सूर्य स्वर प्रवाहित हो रहा हो, समझना चाहिए कि आक्रामणकारी देश की विजय होगी।२५४।
23/08/19, 9:48 am – Pitambar Shukla: सन इव खल बंधन करई।
खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।।

खल बिनु स्वारथ पर अपकारी।
अहि मूषक इव सुनु उरगारी ।।

किन्तु दुष्ट लोग सन की भांति दूसरों को बाँधते हैं और ( उन्हे बाँधने के लिए ) अपनी खाल खिंचवा कर विपत्ति सह कर मर जाते हैं।
हे सर्पों के शत्रु गरुड़ जी! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं।।120-9।।

पर संपदा बिनासि नसाहीं।
जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।।

दुष्ट उदय जग आरति हेतू।
जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।

वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं।

दुष्ट का अभ्युदय ( उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भांति जगत् के दुःख के लिए ही होता है ।।120-10।।
23/08/19, 12:48 pm – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: जिज्ञासा के लिए पूछा, जानकारी नहीं है.
23/08/19, 1:38 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: ऐसी मेरी भी इच्छा थी
23/08/19, 1:48 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : देखिये ना कितना मजा आ रहा है अब पढ़ने का।
23/08/19, 5:04 pm – Abhinandan Sharma: आपने बहुत अच्छा सुझाव दिया है पारीक जी | धन्यवाद !
23/08/19, 5:05 pm – Abhinandan Sharma: हम लोगों ने तो इसके लिए न जाने कितने सॉफ्टवेर, स्लेक, टेलीग्राम और जाने क्या क्या ढूंढा पर आपने इतना आसान तरीका बता दिया कि अब पाठकों के लिए कुछ भी ढूंढना पहले से बहुत आसान है |
23/08/19, 5:09 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : 🙏🏻
23/08/19, 7:30 pm – +91 ………….: चाणक्य_सूत्राणि

                 *सूत्र०४*  
         *राज्यमूलमिन्द्रियजय:।।०४।।*

अर्थ- अपनी इंद्रियों पर अपना आधिपत्य प्रतिष्टित रखना राज्य का (राज्य में राज्य श्री आने और उसके बाद चिरकाल तक ठहरने का ) मुख्य कारण है।

विवरण- राज्याधिकारियों की स्वेच्छाचारिता , विषयलोलुपता और स्वार्थपरायणता राज्य के लिये हलाहल का काम करती है, जब भोगलोलुप राज्याधिकारी राजशक्ति के दबाव से अपनी व्यक्तिगत भोग इच्छा पूरी करने से मतवाले बन जाते हैं। तब वह राज्य संस्था प्रजा के अनुमोदन से वंचित होकर नष्ट हो जाती है। राज्य-संस्था को प्रजा का हार्दिक अनुमोदन मिलते रहने के लिए राज्याधिकारियों में स्वेच्छचारितापर पूरा अंकुश रखे तब किसी राज्य का वैभव् सुरक्षित रह सकता है। इंद्रियों पर विजय न पानेवाले राज्यधिकरी को लोग जनता को राज्य का शत्रु बना लेते हैं। विषम लोभी राज्याधिकारियों की भूले अपनी राज्य संस्था को अपयश दिलाने वाली होती है। उसे अश्रद्वेष तथा घृणास्पद बना डालने वाली होती है।

                        *सूत्र०५*
            *इंद्रियजयस्य मूलं विनयः।।५।।*

अर्थ- विनय ही इंद्रियों पर विजय आने का सुख का साधन हैं।

विवरण- विनितो की संगत में रहकर उनसे ज्ञानसंबंधी सत्यासत्य का विचार सीखकर सत्य को पहचानकर , सत्य के माधुर्य से मधुमय होकर , अहंकार त्यागकर सत्य के बोझ के नीचे डकार नष्ट हो जाना विनयः अर्थात् सत्याधीन हो जाना है। पात्रापत्रपरिचय , व्यवहारकुशलता , सुशीलता , शिष्टाचार सहिष्णुता , उचित्तज्ञता, तथा कार्याक्रयविवेक आदि के विनय ही व्यवहारिक रूप हैं।
विनयी मनुष्य की इंद्रियां उसकी सुविचारित स्पष्ट आज्ञा के बिना संसार में कही एक पैर भी नहीं डालती। उसकी इंद्रियों के पैरो में शमकी वह भरी श्रृंखला पड़ी रहती हैं। जो उन्हें कुमार्ग में जाने ही नहीं देती। नम्रता सुशीलता आदि सब विनीत मन के धर्म हैं। मन के धर्मपरायण होते ही इंद्रियां अपने आप विजित हो जाती हैं , अर्थात विजिट मन के प्रति आत्मसमर्पण करके रहने लगती हैं। विनयी मानव अपनी स्थिरता तथा धीरता के प्रभाव से अपनी इंद्रियों पर वशीकार पाकर रहता है। अविनीत मनुष्य अविमृश्यकारी होता हैं। उसकी इंद्रियां प्रत्येक समय उसे अधिकारहीन तथा अनुचीत भोगो के लिए उत्तेजित करती रहती हैं। राज्याधिकारी लोग विनय से ही राष्ट्र के लोकमत को वश में रख सकते हैं। इतिहास बताता है की बहुत से राजा लोग अविनय से ऐश्वर्यसहित ध्वस्त हो चुके हैं। इसके विपरीत बहुत से लोग झोपड़ी में निवास कर भी राज्य पाकर रह गए हैं। इसलिए राज्याधिकारी लोग पवित्र ज्ञानवृद्ध को संगत किया करे और उनसे विनय सीखकर विनीत बने। यदि वे विनीत नहीं बंनेंगे तो वे मस्तक से माला उतार फेंकनेवाले मस्त हाथी के समान राज्यश्री को नष्ट-भ्रष्ट कर डालेंगे। विनय के बिना उनकी स्वेच्छाचारित रुकना असंभव है, और उसके रहते हुए उनका राज्य खो बैठना सुनिश्चित हैं।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि , परिधावी संवत्सर (२३/०८/२०००) 😊
23/08/19, 10:13 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १२२,१२३

फलं तु पित्तलं तालं सरं काश्मर्यजं हिमम्॥१२२॥

शकृन्मूत्रविसन्धघ्नं केश्यं मेध्यं रसायनम्। वातामाद्युष्णवीर्य तु कफंपित्तकरं सरम्॥१२३॥

परं वातहरं स्निग्धमनुष्णम् तु प्रियालजम्।प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहा॥१२४॥

कोलमज्जा गुणैस्तद्वत्तृट्छर्दिः कासजिच्च सः।

ताल आदि फलों का वर्णन- ताल(ताड़) का फल पित्तकारक तथा सर होता है। गभ्भार का फल शीतवीर्य, मल तथा मूत्र की रुकावट को दूर करता है। बालो एवं मेधा (धारणाशक्ति) के लिए हितकर, रसायन गुणों से युक्त होता है।
बादाम आदि फलों के गुण- ये उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, सर, वातनाशक द्रव्यों में श्रेष्ठ तथा स्निग्ध होते हैं, किन्तु प्रियाल (चिरौंजी) उष्णवीर्य नहीं होता।
प्रियालमज्जा के गुण- चिरौंजी की गिरि मधुर, वीर्यवर्द्धक, पित्त तथा वातविकार का नाश करती है।
बेर की मज्जा के गुण- इसके गुण भी प्राय प्रियालमज्जा के समान होते है, किन्तु यह तृष्णा तथा कास का विनाश करती है।

वक्तव्य- ‘वातामादि’ यहां आदि शब्द से अभिषुक(पिस्ता), मकूलक, निकोचक(चिलगोजा) तथा उरुमाण(खुमानी) तक के द्रव्यो को लेना चाहिए। उरुमाण फल पर्वतीय प्रदेशों (नैनीताल, अल्मोड़ा, शिमला, मंसूरी, काश्मीर आदि) में होता है। इसका बाहरी गूदा भी और भीतर की गिरि भी खायी जाती है, जो बादाम के आकार की तथा स्वाद में मधुर होती है। यह आकार भेद से छोटी तथा बड़ी दो प्रकार की होती है। बड़ी खुमानी के भीतर से निकलने वाली गिरि के ये गुण है।
24/08/19, 1:49 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
श्री मनुस्मृति

तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा ।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते । । २.२२८ । ।

तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते ।
न तैरनभ्यनुज्ञातो धर्मं अन्यं समाचरेत् । । २.२२९ । ।

त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः ।
त एव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः । । २.२३० । ।

पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी । । २.२३१ । ।

त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रीन्लोकान्विजयेद्गृही ।
दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते । । २.२३२ । ।

इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् ।
गुरुशुश्रूषया त्वेवं ब्रह्मलोकं समश्नुते । । २.२३३ । ।

सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः । । २.२३४ । ।

यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत् ।
तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात्प्रियहिते रतः । । २.२३५ । ।

अर्थ

इस लिए सदा माता पिता और आचार्य का प्रिय कार्य करें,इन तीनों के सन्तुष्ट होने से सब तप पूरे हो जाते हैं।। इन तीनों की सेवा परम् तप कहा जाता है।। इनकी आज्ञा लेकर ही दूसरे धर्मों का आचरण करना चाहिए। ये ही तीनों लोक, पृथ्वी अंतरिक्ष व स्वर्ग है, तीनों आश्रम,तीनों वेद व तीनों

अग्नि है ।।
पिता गार्हपत्य अग्नि,माता दक्षिणाग्नि और गुरु आवहनियाग्नि का स्वरूप है। ये तीनों अग्नि संसार में बड़े है।। इन तीनों की भक्तिसेवा से तीनों लोक गृहस्थ जीतता है। और स्वर्ग में देवताओं के भांति सुख पाता है।।
मातृ भक्ति से यह लोक,पितृभक्ति से मध्यलोक व गुरुभक्ति से ब्रह्म लोक को पता है। जिसनें इन तीनों का आदर किया उसने सब धर्मों का पालन किया।।जिसने इन तीनों का अनादर किया उसके सब धर्म कर्म निष्फल हैं । जब तक माता पिता व गुरु जीवित हैं तब तक इनकी सेवा में विशेष लगा रहे।।
24/08/19, 10:49 am – FB Abhijit Rajkot Shastra Gyan: This message was deleted
24/08/19, 11:01 am – Pitambar Shukla: संत उदय संतत सुख कारी।
बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।।

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा ।
पर निंदा सम अघ न गरीसा।।

और संतों का अभ्युदय सदा ही सुख कर होता है,
जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुख दायक है ।

वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिंदा के समान भारी पाप नही है ।।120-11।।

हर गुर निंदक दादुर होई।
जन्म सहस्र पाव तन सोई।।

द्विज निंदक बहु नरक भोग करि।
जग जनमइ बायस सरीर धरि।।

शंकर जी और गुरु की निन्दा करने वाला मनुष्य ( अगले जन्म में ) मेढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेढक का शरीर पाता है।

ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोग कर फिर कौए का शरीर धारण कर के जन्म लेता है।।120-12।।

24/08/19, 6:12 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: दक्षिणाग्नि?
24/08/19, 6:22 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: अग्नि 3 प्रकार की होती है (3 संख्यासूचक)

1) गार्हपत्य (gārhapatya) – पश्चिम दिशा – गृहों का आधिपत्‍य ही गृहपत्‍य माना गया है। यह गृहपत्‍य जिस अग्‍नि में प्रतिष्‍ठित है, वही ‘गार्हपत्‍य अग्‍नि’ के नाम से प्रसिद्ध है।

2) दक्षिण (dakshina) – दक्षिण-पश्चिम – जो अग्‍नि यजमान को दक्षिण मार्ग से स्‍वर्ग में ले जाता है, उस दक्षिण में रहने वाले अग्‍नि को ब्राह्मण लोग ‘दक्षिणाग्‍नि‘ कहते हैं।

3) आहवनीय (āhavanīya) – पूर्व दिशा – सब प्रकार के हव्‍य को स्‍वीकार करने वाला वह्नि ‘आहवनीय अग्‍नि’ कहलाता है।
24/08/19, 6:29 pm – +91 …………..: चाणक्य_सूत्राणि

    *सूत्र_०६*   *विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा।।०६।।*

अर्थ- ज्ञानवृद्धो के सेवा विनय का मूल है।

विवरण- विनय अर्थात नैकिकता,नम्रता, उचितज्ञता,शासनकुशलता,आदि रूपोंवाली स्थिर संपत्ति अनुभवी ज्ञानवृद्ध लोगो की सेवा में श्रद्धापूर्वक बार-बार ज्ञानार्थी रूप में उपस्थित होते रहने से ही प्राप्त होता हैं।मनुष्य विद्या,तपस्या, और अनुभव से ज्ञानवृद्ध बनता है। ज्ञानवृद्ध लोगो के पास जाकर उनकी योग्य परिचर्या करते हुए जिज्ञासु बने रहना वृद्ध सेवा कहलाती हैं। ज्ञानवृद्धो के पास बार बार जाते रहने से उनकी विद्या,तपस्या तथा उनके दीर्घकालीन अनुभवों से लाभ उठाने का अवसर मिल जाता हैं। ज्ञानवृद्ध लोग पात्र से बाहर बहना त्यागकर भंडार में आ जाने वाली शरत्कालीन नदियों के सामान मर्यादापालक तथा कार्याकार्यविवेकसम्पन्न होते हैं। दंडनीति तथा व्यवहारकुशलता के पाठ ऐसे ज्ञानवृद्ध से ही सीखे जा सकते हैं। ज्ञानवृद्धो की सेवा विनीत राजा से ही प्रजा को विनय का पाठ सिखा जा सकता हैं और राज्य भोग्य सकता हैं।

    *सूत्र_०७*    *वृद्धसेवाया विज्ञानम्।।०७।।*

अर्थ- विजिगीषु मनुष्य वृद्धो के सेवा से व्यव्यहार कुशलता या कर्तव्याकर्तव्य पहचानना सीखे।

विवरण- विज्ञान अर्थात ज्ञान की परिपक्ववस्था अर्थात यथार्थ ज्ञान की प्रप्ति किवां अपने ज्ञान की व्यव्हारभूमि में ला खड़ा करने की कला अर्थात कार्यकुशलता या कर्तव्याकर्तव्य का समुचित परिचय तब प्रपात हैं, जब मनुष्य आग्रह और श्रद्धा से ज्ञानवृद्धो के पास निरन्तर उठता बैठता रहता,उनके वातावरण का अंग बनकर रहता ,उन्हें अपनी भूले बताने और उनपर निशंक टोकते रहने का अप्रतिहृत असीम अधिकार देकर रखता है। ज्ञानवृद्धो की श्रद्धामयी सेवा से जहाँ विनय प्राप्त होता हैं वहां विज्ञानं अर्थात कार्यकुशलता भी आ जाती हैं।

 *न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा*
     *न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।*
 *नासो धर्मो यत्र न सत्यमस्ति*
     *न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्।।*

जिन सभाओं या समाजो में अनुभवी वृद्ध न होकर अवृद्धसेवी तथा अनुभवहीन लोग भर लिए जाते या उन्ही का बोलबाला हो जाता है, वे सभायें सभा, और वे समाज सभ्य समाज नहीं कहे जा सकते। वे वृद्ध, वृद्ध नहीं होते, जो (आत्मविक्रय करके, दलगत राजनीती के भाग बनकर अपनी स्वार्थकलुषित महत्वकांक्षा परितृप्त करने की दुरभिसंधि से, व्यवस्थापरिषदो में व्वयस्थानिर्माता और सामाजिक विवाद प्रसंगों में निर्णायक बनकर जा बैठते है परन्तु ) धर्म या न्याय की बात मुँह पर नहीं ला सकते। (जो धर्म के निःशेक वक्ता नहीं होते, वे किसी प्रकार वृद्ध विद्वान् या विवेकी नहीं कहे जा सकते) वह धर्म, धर्म नहीं हैं, जिसमे सत्य नहीं हैं, (अर्थात जिस धर्म में मनुष्य की अंतरात्मा नहीं बोल रही है, जिसे मनुष्य किसी संसारी प्रभाव में आकार ऊपरवाले मन से कहता हैं वह धर्म नहीं होता ) वह सत्य, सत्य नहीं ,जिसमे छल का मिश्रण होता हैं ( और जिसमे बातो को तोड-मरोडकर घुसा-फिराकर कहा जाता हैं।)

      *सूत्र_०८*   *विज्ञानेनात्मानम् सम्पादयेत्।।०८।।*

अर्थ- राज्यभिलाषी लोग विज्ञान (व्यव्यहारकुशलता या कर्तव्याकर्तव्य का परिचय) प्राप्त करके ( अर्थात सत्य को व्यव्यहार भूमि में लाकर या अपने व्यव्यहार को परमार्थ का रूप देकर ) अपने आप को योग्य शासक बनाये।

विवरण- आदर्शशासक तथा चतुरशासक बनना राज्यभिलाषियो का मुख्य कर्तव्य हैं। अपने को ऐसा बनाना राज्योपार्जन से भी अधिक महत्व रखता हैं। इसलिए शासकीय विभाग में जाने के इच्छुक लोग शाषन विभाग योग्यता संपादन के महत्वपूर्ण काम में प्रमाद न करें। यदि ये इसमें प्रमाद करेंगे तो न तो स्वयं कही के रहेंगे औ न राज्यसत्ता को स्थिर रहने देंगे।
यदि राजकीय विभागों में जाने वाले लोग जिनेंद्रियंता को अपना आदर्श बना ले, योग्य बने, अपने आप को प्रजा के सामने अनुकरणीय चरित, आदर्श पुरुष के रूप में रखे, तो अनुकरणीयमार्गी संसार राजचरित का अनुसरण करके धर्मारूढ हो जाय और तब दुश्चरित्र देश से स्वयमेव निर्वासित हो जाय। राज्यधिकरी लोगो ले धर्म को पालने लगने पर प्रजा में अपने आप धर्म की रक्षा होने लगती है।

भारत में ठीक कहा है–

  *आत्मनमात्मना रक्षन् चरिष्यमि विशांपते।* 

मैं अपने विज्ञानी विवेकी मन से अपनी रोक-थाम करता हुआ राज्य से व्यव्हार चलाया करूँगा।

भादप्रद कृष्ण पक्ष अष्टमी ,परिधावी संवत्सर (२४/०८/२०१९) 🙏💐💐
24/08/19, 6:41 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

जयमध्येऽपि संदेहे नाडीमध्ये तु लक्षयेत्।
सुषुम्नायां गते प्राणे समरे शत्रुसङ्कटम्।२५५।

यस्यां नाड्यां भवेच्चारस्तां दिशं युधि संश्रयेत्।
तदाऽसौ जयमाप्नोति नात्रकार्या विचारणा।२५६।

यदि सङ्ग्रामकाले तु वामनाडी सदा वहेत्।
स्थायिनो विजयं विद्याद्रिपुवश्यादयोऽपि च।२५७।

यदि सङ्ग्रामकाले च सूर्यस्तु व्यावृतो वहेत्।
तदा यायी जयं विद्यात् सदेवासुरमानवे।२५८।

अर्थ- विजय में यदि किसी प्रकार का संदेह हो, तो देखना चाहिए कि क्या सुषुम्ना स्वर प्रवाहित हो रहा है। यदि ऐसा है, तो समझना चाहिए कि शत्रु संकट में पड़ेगा।२५५।

यदि कोई योद्धा युद्ध के मैदान में अपने क्रियाशील स्वर की ओर से दुश्मन से लड़े तो उसमें उसकी विजय होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।२५६।

यदि युद्ध के समय बायीं नाक से स्वर प्रवाहित हो रहा हो, तो जहाँ युद्ध हो रहा है, उस स्थान के राजा की विजय होती है, अर्थात् जिस पर आक्रमण किया गया है, उसकी विजय होती है और शत्रु पर काबू पा लिया जाता है।२५७।

पर यदि युद्ध के समय लगातार सूर्य स्वर प्रवाहित होता रहे, तो समझना चाहिए कि आक्रमणकारी राजा की विजय होती है, चाहे देवता और दानवों का युद्ध हो या मनुष्यों का।२५८।
24/08/19, 6:54 pm – +91 …………: (१)मानवीय जीवने संस्कृतस्य महत्वम्।
(२)संस्कृते व्यवसायानां अवसर:।
(३)संस्कृते पर्यावरणस्य रक्षणोपाय:।

किसी के पास तीनों में से कोई भी संस्कृत निबंध होगा तो भेजें।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
24/08/19, 7:48 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: इसे और आसान समझाने का कष्ट करें🙏
24/08/19, 10:42 pm – Shastra Gyan Maniah Patiala: निष्काम यज्ञ यज्ञ की अग्नि के तीन भेद होते हैं —

(१)
गार्हपत्य अग्नि = गृहपति की अग्नि,जिसमें पाकयज्ञ आदि सारे गृहकर्म होते हैं । यह अग्नि सदैव प्रज्जवलित रखनी पड़ती है ।
पुत्र जब गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है तो पिता उसे गार्हपत्य अग्नि सौंपता है जिसे अगली पीढ़ी को सौंपने के लिये बचाकर रखना पुत्र का कर्तव्य है । घर में इसे सुरक्षित रखने का पवित्र स्थल नियत रहता है । वेदों और कल्पसूत्रों में इसका विस्तार से वर्णन है ।

(२)
आहवनीय अग्नि =देवकर्म की अग्नि ।
यज्ञ के हवन कुण्ड वाली अग्नि ।
गृहस्थों के सामान्य यज्ञों में गार्हपत्य अग्नि द्वारा ही आहवनीय अग्नि प्रज्जवलित की जाती है किन्तु कई विशिष्ट यज्ञों के लिये विशेष लकड़ी अरणि एवं अधर द्वारा आहवनीय अग्नि को प्रज्जवलित करते हैं । अरणि एवं अधर एक ही प्रकार की लकड़ी से बनते हैं,ऊपर वाले को अरणि तथा नीचे वाले को अधर कहते हैं जिनको आपस में रगड़कर हवन की अग्नि प्रज्जवलित की जाती है ।

(३)
दक्षिणाग्नि = पितृकर्म की अग्नि ।
गार्हपत्य अग्नि द्वारा ही इसे प्रज्जवलित करते हैं । दक्षिणाग्नि यज्ञशाला के दक्षिणभाग में स्थापित की जाती है ।
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दो अतिरिक्त अग्नियों को मिलाकर “पञ्चाग्नि” कहलाती है —
(४)सभ्याग्नि तथा
(५)आवसथ्याग्नि

जो क्रमशः सभा और गृह के विशेष कर्मों में प्रयुक्त होते हैं । इन पाँचों अग्नियों के समुचित प्रयोग की विद्या “पञ्चाग्नि−विद्या” कहलाती है ।

गार्हपत्य अग्नि के नियम आदि का विधान कल्पसूत्रों में है ।

सभ्याग्नि तथा आवसथ्याग्नि की विद्यायें गूढ़ हैं । अपहरण होने पर जानकी जी ने आवसथ्याग्नि की आराधना की थी ।

गार्हपत्य अग्नि द्वारा गृह और वासियों का पालन होता है अतः वह पिता है ।

दक्षिणाग्नि पितरों को तुष्ट करके वंशरक्षा करता है अतः माता है ।

आहवनीय अग्नि सांसारिक दायित्वों के निर्वाहन हेतु साधन भी देता है और मुक्ति हेतु ज्ञान भी,अतः गुरु है ।

आज भी दक्षिण भारत में बहुत से लोग गार्हपत्य अग्नि बचाकर रखते हैं और दैनिक अग्निहोत्र करते हैं जो सभी ब्राह्मणों का अनिवार्य दैनिक कर्म है । किन्तु उत्तर भारत में म्लेच्छों का उत्पात अधिक मचा जिस कारण ब्राह्मणों और अन्य हिन्दुओं का रहन−सहन अस्तव्यस्त हो गया और वैदिक कर्म छूट गये
24/08/19, 10:50 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏
24/08/19, 10:50 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
24/08/19, 11:48 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: 🙏🏻🙏🏻
25/08/19, 11:01 am – Pitambar Shukla: सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी ।
रौरव नरक परहिं ते प्रानी ।।

होहिं उलूक संत निंदा रत।
मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।

जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते है,
वे रौरव नरक में पड़ते हैं।

संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं,
जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया ) रहता है ।।120-13।।

सब कै निंदा जे जड़ करहीं।
ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।

सुनहु तात अब मानस रोगा।
जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।।

जो मूर्ख मनुष्य सबकी निंदा करते हैं,
वे चमगादड़ हो कर जन्म लेते हैं।

हे तात! अब मानस रोग सुनिए,
जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं।।120-14।।
25/08/19, 11:03 am – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

रणे हरति शत्रुस्तं वामायां प्रविशेन्नरः।
स्थानं विषुवचारेण जयः सूर्येण धावता।२५९।

युद्धे द्वये कृते प्रश्न पूर्णस्य प्रथमे जयः।
रिक्ते चैव द्वितीयस्तु जयी भवति नान्यथा।२६०।

पूर्णनाडीगतः पृष्ठे शून्याङ्गं च तदाग्रतः।
शून्यस्थाने कृतः शत्रुर्म्रियते नात्र संशयः।२६१।

वामाचारे समं नाम यस्य तस्य जयी भवेत्।
पृच्छको दक्षिणभागे विजयी विषमाक्षरः।२६२।

अर्थ- जो योद्धा बाएँ स्वर के प्रवाहकाल में युद्ध भूमि में प्रवेश करता है, तो उसका शत्रु द्वारा अपहरण हो जाता है। सुषुम्ना के प्रवाहकाल में वह युद्ध में स्थिर रहता है, अर्थात् टिकता है। पर सूर्य स्वर के प्रवाहकाल में वह निश्चित रूप से विजयी होता है।२५९।

यदि कोई सक्रिय स्वर की ओर से युद्ध के परिणाम के विषय में प्रश्न पूछे, तो जिस पक्ष का नाम पहले लेगा उसकी विजय होगी। परन्तु यदि निष्क्रिय स्वर की ओर से प्रश्न पूछता है, तो दूसरे स्थान पर जिस पक्ष का नाम लेता है उसकी विजय होगी।२६०।

जब कोई सैनिक सक्रिय स्वर की दिशा में युद्ध के लिए प्रस्थान करे, तो उसका शत्रु संकटापन्न होगा। पर यदि निष्क्रिय स्वर की दिशा में युद्ध के लिए जाता है, तो शत्रु से उसका सामना होने की संभावना होगी। यदि युद्ध में शत्रु को निष्क्रिय स्वर की ओर रखकर वह युद्ध करता है, तो शत्रु की मृत्य अवश्यम्भावी है।२६१।

यदि प्रश्नकर्त्ता स्वरयोगी से उसके चन्द्र स्वर के प्रवाहकाल में बायीं ओर या सामने से प्रश्न करता है और उसके नाम में अक्षरों की संख्या सम हो, तो समझना चाहिए कि कार्य में सफलता मिलेगी। यदि वह दक्षिण की ओर से प्रश्न करता है और उसके नाम में वर्णों की संख्या विषम हो, तो भी सफलता की ही सम्भावना समझना चाहिए।२६२।
25/08/19, 6:42 pm – +91 ………: चाणक्य_सूत्राणि

     *सूत्र_०९*

सम्पादितात्मा जितात्मा भवति।।०९।।

अर्थ- शासकोचित्त सत्य व्यव्यहार करना सीख लेनेवाला ही जितेंद्रिय हो सकता है।

विवरण- मनुष्य की सत्यनिष्ठा या कर्तव्यपरायणता ही उसके जितेन्द्रियता होती है। मनुष्य के अंतरात्मा की प्रसन्नता निर्मलता स्वच्छता या निष्कामता ही उसके जितात्मता है। जितात्मता होना ही संसार विजय है। नीति तथा विज्ञान से युक्त मानव को सम्पादितात्मा कहा गया है। सत्य ही नीति का सार या सर्वस्व है। सत्य के बिना मनुष्य का आत्मविकास नहीं होता। सत्यदर्शन के बिना समस्त प्रजागण में राज्याधिकारियों की वह आत्मबुद्धि (अर्थात समस्त प्रजावर्ग को अपना ही रूप में देखने की वह उदात्त भावना) नहीं हो सकती जो एक अच्छा लोककल्याणी राज्य चलाने वाले राजाओ या राज्याधिकारियों की अनिवार्य आवश्यकता है। जितात्मा का अर्थ सुपरिष्कृत मन तथा सुपरिष्कृत इंद्रियों वाला बन जाना हैं। जितात्मा मानव न्यायान्यायविवेक करके अपनी क्षुद्र प्रवित्तियों को ,विष को अपने गले में रोक रखने वाले विषकंठ महादेव के सामान; कभी न उभरने देने के लिए अपने मानस में दाबकर बैठ जाता हैं। राजा को प्रजा की दृष्टि में पूज्य बुद्धि मिलने से राजकाज अपने आप हल्का होता चला जाता हैं। तब राजा का आदर्श चरित्र ही प्रजापर शाषन करने लगता हैं। यदि राजा लोग न्यायान्याया तथा कर्तव्याकर्तव्य विवेक न रखकर केवल लोलुप होकर उत्तरदायित्वविहीन मन से राज्यशासन जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण काम में हाथ डाल देते हैं ,तो वे अपने साथ राज्यसत्ता को भी ले डूबते हैं। राजनीती के आचार्य बृहस्पति कह गए हैं- ” आत्मवान् राजा” – राजा लोग अच्छे शासक बनने के लिए प्रजा पर शासन करने से पहले अपने उपर शासन करना सीखे। राजा या राज्यधिकरी लोग राजसत्ता हाथ में सम्भालने से पहले अपने जीवनो को वेद-वेदांतो की मूर्तिमती टीका तथा भाष्यो का रूप देकर रखे। राजकीय विभागों में जानेवाले लोग को सोचना चाहिए की दुष्टनिग्रह और शिष्टपालन ही राज्य का मुख्य कर्तव्य हैं। सोचिये तो सही की जो राजकर्मचारी अपनी ही दूष्ट अभिलाषाओं पर शासन नहीं कर सकता वह शासनदंड का उचित प्रयोग कैसे कर सकता हैं????? जिससे अपना अकेला मन में वश में नहीं रखा जाता वह विशाल राष्ट्र को कैसे वश में रख सकता हैं???

एकस्यैव हि यो$शक्तो मनसः सन्निबर्हणे।
महीम् सागरपर्यंताम् स कथ ह्यवजेष्यति।।

जो सबसे पहले अपनी दूष्ट अभिलाषओ पर शासन कर सकेगा वही प्रजा की दूष्ट प्रवित्तियो को पकड और रोक सकेगा। जैसे अपनी संतान को सुधारना पिता के आत्मसुधा से अलग वस्तु नहीं हैं इसी प्रकार प्रजा पर शासन करना राजा के आत्मसम्मान से अलग कोई वस्तु नहीं हैं। राज्याधिकार संभालना बहुत बड़ा उत्तरदायित्व हैं। आदर्श मनुष्य ही राज्याधिकार संभाल सकता हैं। राजा राज्य संस्था रूपी तपोवन का कुलपति हैं। समस्त प्रजा के कल्याण अकल्याण से सम्बन्ध रखने वाली राज्य जैसे सार्वजानिक संस्था को अपने व्यक्तिगत क्षुद्र स्वार्थो से बिगाड डालना देशद्रोह तथा आत्मनाश हैं। अपने को बिना सुधारे राज्याधिकार संभाल बैठना अगारुडिक ( सर्प विद्या को न जानने वाले) का साँप से खेलने जैसा भयंकर अनिष्ट कर डालने वाला व्यापार हैं।
25/08/19, 9:23 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु प्रथम श्लोक

न भूमिर्न तोयं न तेजो न वायुर्न खं नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः ।
अनैकान्तिकत्वात्सुषुप्त्येकसिद्धस्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। १ ।।

‘अहं’ अहमर्थ का अवलम्बन, न भूमि है, न जल है, न तेज है, न वायु है, न आकाश है, न प्रत्येक इन्द्रिय है, न भूमि आदि का समूह है; क्योंकि ये सब व्यभिचारी(विनाशी) हैं । सुषुप्ति में एक साक्षीरूप से सिद्ध, अद्वितीय, अविनाशी, निर्धर्मक, शिव जो है, वही मैं हूँ।
25/08/19, 10:57 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १२५,१२६,१२७,१२८,१२९

पक्वं सुदुर्जरं बिल्वं दोषलं पूतिमारूतम्॥१२५॥

दीपनं कफवातघ्नम् बालं ग्राह्युभयं च तत्। कपित्थमामं कण्ठघ्नं दोषलं, दोषघाति तु॥१२६॥

पक्वं हिध्मावमथुजित् , सर्वं ग्राहि विषापहम्। जाम्बवं गुरु विष्टिम्भि शीतलं भृशवातलम्॥१२७॥

सङ्ग्राहि मूत्रशकृतोरकण्ठयं कफपित्तजित्। वातपित्तास्रकृद्वालं, बद्धास्थि कफपित्तकृत्॥१२८॥

गुर्वाम्रं वातजित्पक्वं स्वाद्वम्लं कफशुक्रकृत्। वृक्षाम्लं ग्राहि रुक्षोष्णं वातश्लेष्महरं लघु॥१२९॥

बिल्व का पका फल- पका हुआ बेल का फल बड़ी कठिनता से पचता है, दोषकारक होता है तथा इसका सेवन करने से अपान वायु दुर्गन्धयुक्त निकलता है। कच्चा बेल का फल अग्नि प्रदिप्त करता है, कफ तथा वातदोष का नाश करता है। ये दोनों प्रकार के बेल ग्राहि(मल को बांधने वाले होते हैं।

कैथ का कच्चा फल- यह कण्ठ (स्वरयन्त्र) को हानि पहुंचाता है, दोषकारक होता है।कैर का पका फल दोषशामक, हिचकी तथा वमन का विनाश करता है। ये दोनो प्रकार के कैथ ग्राहि होते हैं और विषविकार को नष्ट करते हैं।

  • जामुन का फल-* यह गुरु (देर मे पचने वाला), विष्टम्भी, शीतवीर्य, वातविकार को अत्यन्त बढ़ाने वाला, मल मूत्र को रोकने वाला, स्वरयन्त्र के लिए अहितकर, कफ तथा पित्त विकार को जीतने वाला होता है।

वक्तव्य- राजजम्बू को संस्कृत में ‘फलेन्द्रा’ तथा हिन्दी में ‘फरेना’ कहते है। इसके अतिरिक्त जामुन के ये भेद पाये जाते हैं।— शूद्रजम्बू, काकजम्बू, भुमिजम्बू तथा जलजम्बू। राजजम्बू का ही वर्णन महाकवि कालिदास जी ने मेघदूत में इस प्रकार किया है— ‘श्यामजम्बूवनान्ताः’। (पूर्वमेघ)

आम का वर्णन- जिसमें अभी गुठली नहीं पड़ी हो ऐसा बाल(छोटा) आम वातकारक, पित्तकारक तथा रक्तधातु को दूषित करता है।गुठली पड़ जाने पर अर्थात कुछ बड़ा होने पर वह कफकारक तथा पित्तकारक होता है। पका हुआ आम पाक में गुरु, वातनाशक, स्वाद में मधुर होता है। पका हुआ खट्टा आम कफकारक तथा शुक्रवर्धक होता है।

वृक्षाम्ल का वर्णन- वृक्षाम्ल(विषांविल, कोकम) का फल ग्रा
ही, रूक्ष, उष्णवीर्य वात तथा कफदोषनाशक तथा पाचन मे लघु होता है।

वक्तव्य- इसकी उत्पत्ति कोकण, कनारा आदि दक्षिण प्रान्तों में होती है।बीज निकाल कर सुखाये हुए फल को अमसूल या कोकम कहते है। इनके बीजों का तेल निकाला जाता है। इसे कोकम का घी या तेल कहते है। यह तेल स्तम्भन एवं व्रणरोपण होता है। इसके छिलकों की चटनी बनायी जाती है। अतिसार, रक्तातिसार आदि में इसका फाण्ट(चाय) बनाकर दिया जाता है तथा पित्तजनित विकारों में इसे घोलकर इसका शरबत बनाकर दिया जाता है। इससे लाभ भी होता है।
26/08/19, 6:23 am – Abhinandan Sharma: You deleted this message
26/08/19, 6:25 am – Abhinandan Sharma:
26/08/19, 6:32 am – Abhinandan Sharma: बहुत सुंदर ।
26/08/19, 6:56 am – Abhinandan Sharma:
26/08/19, 7:10 am – Abhinandan Sharma: वाह, अद्भुत व्याख्या ।
26/08/19, 7:10 am – Abhinandan Sharma: 🙏
26/08/19, 7:18 am – Abhinandan Sharma: आजकल ऐसे किसी सन्त, बाबा को जानते हैं ?
26/08/19, 7:20 am – Abhinandan Sharma: 😊 सांस लेते समय मनोकामना । नयी बात !
26/08/19, 7:24 am – Abhinandan Sharma: 👏👏
26/08/19, 8:18 am – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : बहुत अच्छा है अगर मंत्रोच्चार गायन भी डाला जाए।
अच्छा लगा अभिनंदन जी
26/08/19, 9:02 am – Abhinandan Sharma: जब हम विभिन्न शास्त्रों को पढ़ते हैं तो ज्ञात होता है कि तर्कशास्त्र कितना महत्वपूर्ण है | इसको पढ़े बिना, धर्म को जानना नितांत असम्भव है | तर्क ही धर्म की रक्षा करता है क्योंकि यही वो चीज है, जो धर्म को कुतर्कों और दुराग्रहों से बचा सकता है | भारतीय मनीषियों ने समय समय पर तर्कशास्त्र को बचा कर रखा और उसकी बारम्बार व्याख्या की ताकि आने वाली पीढ़ी भी धर्म की रक्षा कर सके किन्तु अब लोग शास्त्र पढ़ते ही नहीं हैं, सो धर्म को समझते भी नहीं है और बाबाओं के चक्कर में पड़ जाते हैं |

लोग ईश्वर के न होने, पुनर्जन्म न होने पर बचकाने कुतर्क रखते हैं और समझते हैं कि उनसे पहले तो किसी ने ये सब विचारा ही नहीं । लेकिन वौद्ध भी तो यही मानते थे, वो भी अनीश्वरवादी हुए और स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म नहीं मानते थे किंतु जब आदिशंकराचार्य से शास्त्रार्थ हुआ तो बौद्ध धर्म के बड़े बड़े धुरंधर पराजित हुए !! कैसे ? तर्क से !!! क्या आपको अभी भी ये भरम है कि आपने उनसे भी ज्यादा शास्त्र पढ़ लिये हैं ? आपकी तर्कशीलता, उनसे भी अधिक है ? वो भी बिना कुछ अध्ययन किये !

इस बार के वीडियो में हम बात करेंगे, तर्कशास्त्र की आवश्यकता पर | तर्क, वितर्क और कुतर्क के कुछ उदाहरणों से उसे समझने का प्रयास करेंगे | तर्क के कितने भाग और विषय होते हैं, तर्क कैसे स्थापित किया जाता है, विज्ञान और धर्म, दोनों तर्क के बिना जानने असम्भव हैं ! ये सभी इस वीडियो में बताया गया है | वीडियो में क्वालिटी थोड़ा खराब है फिर भी विषय इतना महत्वपूर्ण है कि उसे कान मे इयर फोन लगाकर पूरा सुना जाना चाहिए ।

https://youtu.be/xaiCInXDENY
26/08/19, 9:10 am – Abhinandan Sharma: पढ़कर, अपना रिव्यु अवश्य शेयर करें ।
26/08/19, 9:11 am – Vaidya Ashish Kumar: जी सर,जरूर
26/08/19, 9:17 am – Abhinandan Sharma: अब देखिये कितनी इम्पोर्टेन्ट बातें हैं पट हम शास्त्रीय अर्थ की गहराई को नहीं समझ पाते और मात्र अर्थ पढ़कर समझते हैं कि हमने तो पढ़ लिया । सोचिये जरा, युद्ध के समय कुम्भक क्यों अच्छा है ?
26/08/19, 9:50 am – Abhinandan Sharma: ये इसलिये नहीं डाला ही कि ग्रुप पर हर कोई बोलकर रिकॉर्डिंग डाले अपितु एक आईडिया दिया है कि जब संस्कृत के श्लोक, छंद पढ़ें तो उन्हें गाकर देखा जाना चाहिए । इससे संस्कृत को पढ़ने का भय समाप्त हो जाता है और छंदों में मजा आने लगता है । लयइन जब लिखे गये हैं तो लय में पढ़ा क्यों न जाये, कोशिश लॉरेन, सभी लोग अपने स्तर पर, बस उसके लिये एक उदाहरण है ।
26/08/19, 10:31 am – Pitambar Shukla: मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।

काम बात कफ लोभ अपारा।
क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

सब रोगों की जड़ मोह ( अज्ञान ) है।
उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं।
काम वात है,
लोभ अपार ( बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है।।120-15।।

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई ।
उपजइ सन्यपात दुखदाई ।।

बिषय मनोरथ दुर्गम नाना।
ते सब सूल नाम को जाना।

यदि कहीं ये तीनों भाई
( वात पित्त और कफ) प्रीति कर लें ( मिल जायँ) तो दुःख दायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है ।
कठिनता से प्राप्त ( पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं,
वे ही सब शूल ( कष्ट दायक रोग ) हैं;
उनके नाम कौन जानता है ( अर्थात् वे अपार हैं)।।120-16।।
26/08/19, 10:33 am – +91 ………: क्या प्रतिदिन एक छन्द गायन हो सकता हैं ????
26/08/19, 10:34 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
26/08/19, 10:36 am – Dr PL Sharma White Cottege Ghaziabad Shastr Gyan: सनातन वैदिक धर्म विज्ञान सम्मत है, समझने के लिए अध्ययन आवश्यक है।
27/08/19, 10:16 am – Pitambar Shukla: ममता दादु कंडु इरषाई।
हरष बिषाद गरह बहुताई।।

पर सुख देखि जरनि सोइ छई।
कुष्ठ दुष्टता मन कुटिलई।।

ममता दाद है,
ईर्ष्या (डाह ) खुजली है,
हर्ष – बिषाद गले के रोगों की अधिकता है( गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं),
पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है।
दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है।।120-17।।

अहंकार अति दुखद डमरुआ।
दंभ कपट मद मान नेहरुआ।।

तृस्ना उदर बृद्धि अति भारी।
त्रिबिधि ईषना तरुन
तिजारी।।

अहंकार अत्यंत दुःख देनेवाला डमरू(गाँठ का) रोग है।
दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ ( नसों का) रोग है।
तृष्णा बड़ा भारी उदर बृद्धि ( जलोदर) रोग है।
तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं।।120-18।।

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका।
कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका।।

मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं।
इस प्रकार अनकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूं।।120-19।।
27/08/19, 1:00 pm – +91 : 🙏🏻
27/08/19, 1:01 pm – +91 : (१)मानवीय जीवने संस्कृतस्य महत्वम्।
(२)संस्कृते व्यवसायानां अवसर:।
(३)संस्कृते पर्यावरणस्य रक्षणोपाय:।

किसी के पास तीनों में से कोई भी संस्कृत निबंध होगा तो भेजें।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

27/08/19, 8:18 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु द्वितीय श्लोक

न वर्णा न वर्णाश्रमाचारधर्मा
न मे धारणाध्यान योगादयोऽपि।
अनात्माश्रयाहंममाध्यासहानात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। २ ।।

न वर्ण हैं, न वर्णो के आचार-धर्म हैं, न आश्रमों के आचार-धर्म हैं, न मेरी धारणा है, न ध्यान है, न योगादि ही है; क्योंकि अविद्या से उत्पन्न अहङ्कार और ममकार अध्यास का तत्वज्ञान से नाश हो जाता है, इसलिए तत्प्रयुक्त वर्णाश्रम आदि व्यवहार भी नहीं रहते। सब प्रमाणों के बाढ़ होने पर भी अबाधित, अद्वितीय, निर्धर्मक, शिव मैं हूँ ।
27/08/19, 8:30 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

यदा पृच्छति चन्द्रस्य तदा संधानमादिशेत्।
पृच्छेद्यदा तु सूर्यस्य तदा जानीहि विग्रहम्।२६३।

पार्थिवे च समं युद्धं सिद्धिर्भवति वारुणे।
युद्धेहि तेजसो भङ्गो मृत्युर्वायौ नभस्यपि।२६४।

निमित्ततः प्रमादाद्वा यदा न ज्ञायतेऽनिलः।
पृच्छाकाले तदा कुर्यादिदं यत्नेन बुद्धिमान्।२६५।
निश्चलं धरणं कृत्वा पुष्पं हस्तान्निपातयेत्।
पूर्णाङ्गे पुष्पपतनं शून्यं वा तत्परं भवेत्।२६६।

अर्थ- यदि प्रश्न पूछते समय चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो संधि की सम्भावना समझनी चाहिए। लेकिन यदि उस समय सूर्य स्वर चल रहा हो, तो समझना चाहिए कि युद्ध के चलते रहने की सम्भावना है।२६३।

चन्द्र स्वर या सूर्य स्वर प्रवाहित हो, लेकिन यदि प्रश्न के समय सक्रिय स्वर में पृथ्वी तत्त्व प्रवाहित हो, समझना चाहिए कि युद्ध कर रहे दोनों पक्ष बराबरी पर रहेंगे। जल तत्त्व के प्रवाह काल में जिसकी ओर से प्रश्न पूछा गया है उसे सफलता मिलेगी। प्रश्न काल में स्वर में अग्नि तत्त्व के प्रवाहित होने पर चोट लगने की सम्भावना व्यक्त की जा सकती है। किन्तु यदि वायु या आकाश तत्त्व प्रवाहित हो, तो पूछे गए प्रश्न का उत्तर मृत्यु समझना चाहिए।२६४।

इन श्लोकों में भी कुछ पिछले अंकों की भाँति ही नीचे के प्रथम दो श्लोकों में प्रश्न का उत्तर जानने की युक्ति बतायी गयी है। शेष तीन श्लोकों में कार्य में सफलता प्राप्त करने के कुछ तरीके बताए गए हैं।
समझने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए नीचे के प्रथम दो श्लोकों को एक साथ लिया जा रहा है-

यदि किन्हीं कारणों से प्रश्न पूछने के समय यदि स्वर-योगी सक्रिय स्वर का निर्णय न कर पाये, तो सही उत्तर देने के लिए वह निश्चल हो बैठ जाय और ऊपर की ओर एक फूल उछाले। यदि फूल प्रश्नकर्त्ता के पास उसके सामने गिरे, तो शुभ होता है। पर यदि फूल प्रश्नकर्त्ता के दूर गिरे या उसके पीछे जाकर गिरे, तो अशुभ समझना चाहिए।२६५-२६६।
27/08/19, 8:43 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: ममकार अध्यास?
27/08/19, 8:51 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: अध्यास – एक वस्तु में दूसरी वस्तु का ज्ञान अध्यास कहलाता है ।

ममकार -> ममत्व
27/08/19, 8:52 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
27/08/19, 8:53 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: बाढ़❌
बाध✅
27/08/19, 9:00 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: अध्यास के दो भाग माने जाते हैं – सत्य और मिथ्या।
अँधेरे में हम रस्सी को सांप समझ लेते हैं तो वहाँ सांप होने का ज्ञान मिथ्या है ।
यहाँ रस्सी सत्य है और सर्प का ज्ञान मिथ्या है ।
27/08/19, 9:10 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: जी
27/08/19, 9:11 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : काम = वात
लोभ = कफ
क्रोध = पित्त
27/08/19, 9:15 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 👌🏼
28/08/19, 9:48 am – Pitambar Shukla: एक ब्याधि बस नर मरहिं
ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुं
सो किमि लहै समाधि।।

एक ही रोग के वश हो कर मनुष्य मर जाते है,
फिर ये तो बहुत – से असाध्य रोग हैं।
ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते है,
ऐसी दशा में वह समाधि( शांति) को कैसे प्राप्त करे?।।121-क।।

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह
नहिं रोग जाहिं हरिजान ।।

नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण),तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ो औषधियां हैं,
परन्तु हे गरुड़ जी!
उनसे ये रोग नही जाते।।121-ख।।
28/08/19, 1:11 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
🙏श्री मनुस्मृति🙏

तेषां अनुपरोधेन पारत्र्यं यद्यदाचरेत् ।
तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः । । २.२३६ । ।

त्रिष्वेतेष्वितिकृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते ।
एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते । । २.२३७ । ।

श्रद्दधानः शुभां विद्यां आददीतावरादपि ।
अन्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि । । २.२३८ । ।

विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।
अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि काञ्चनम् । । २.२३९ । ।

स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् ।
विविधानि च शील्पानि समादेयानि सर्वतः । । २.२४० । ।

अर्थ

 इसके सिवा जो कर्म करे वो इनको निवेदन कर देवे , उन तीनों की सेवा से पुरुष के कर्तव्य पूरे पड़ जाते हैं। यह मुख्य धर्म है और गौण धर्म माना जाता है

श्रद्धामय पुरुष उत्तम विद्याओं को हीनजाति से भी सीखे और चण्डाल से भी लोक मर्यादा सीखे व हीनकुल से भी सुशील स्त्रियों से विवाह करे, विष से भी अमृत और बालक से भी हितवचन ग्रहण कर ले । शत्रु से भी सदाचार व अपवित्र से भी सुवर्ण निकाल लेवे,

            स्त्री,रत्न,विद्या,धर्म,शौच, व अच्छे वचन और भांति भांति  की शिल्पकला आदि सब से सिख लेवे।।

28/08/19, 1:34 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: मुख्य धर्म है औऱ गौण धर्म माना जाता है????
28/08/19, 1:35 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: हीनजाति???
हीनकुल समझ आया पर,,,,🤔
28/08/19, 1:36 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: शौच???
28/08/19, 1:37 pm – Ashu Bhaiya: स्वछता
28/08/19, 1:41 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: जी पर इसमें हीनकुल से सीखने जैसा क्या है🙏
28/08/19, 1:44 pm – Ashu Bhaiya: “स्त्री,रत्न,विद्या,धर्म,शौच, व अच्छे वचन और भांति भांति की शिल्पकला आदि सब से सिख लेवे।”
28/08/19, 1:44 pm – Ashu Bhaiya: सब से
29/08/19, 9:46 am – Pitambar Shukla: एहि बिधि सकल जीव जग रोगी।
सोक हरष भय प्रीति बियोगी ।।

मानस रोग कछुक मैं गाए।
हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।।

इस प्रकार जगत् में समस्त जीव रोगी हैं,
जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दुःख से और भी दुखी हो रहे हैं।
मैंने ये थोड़े से मानस रोग कहे हैं।
ये हैं तो सबको, परन्तु इनको जान पाए हैं बिरले ही।।121-1।।

जाने ते छीजहिं कछु पापी।
नास न पावहिं जन परितापी।।

बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे।
मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।

प्राणियों को जलाने वाले ये पापी( रोग) जान लिए जाने से कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं,
परन्तु नाश को नहीं प्राप्त होते।
विषय रूप कुपथ्य पा कर ये मुनियों के हृदय में अंकुरित हो उठते हैं,
तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं।।121-2।।
29/08/19, 9:59 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सत्य वचन 🙏🏼🙏🏼
29/08/19, 12:50 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
29/08/19, 4:47 pm – +91 ………: उपपद विभक्ति या विभक्ति (धातव:) के कोई भी नोट्स हो तो भेजें।
29/08/19, 4:53 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: Group में ऐसी कोई request मान्य नहीं है। कृपया अलग से किसी से पूछ लें 🙏🏼🙏🏼
29/08/19, 4:54 pm – +91 ………..: OK
29/08/19, 5:52 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु तृतीय श्लोक

न माता न पिता वा न लोका न देवा
न वेदा न यज्ञा न तीर्थं ब्रुवन्ति ।
सुषुप्तौ निरस्ताति शून्यात्मकत्वात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। ३ ।।

न माता है, न पिता है, न लोक हैं, न वेद हैं, न यज्ञ हैं, न तीर्थ हैं । सुषुप्ति में निरस्त अति शून्यात्मक होने से एक, अविशेष, केवल, शिव, मैं हूँ ।
29/08/19, 6:00 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
29/08/19, 9:39 pm – Omprakash Singh LE C-105: 🙏🙏
29/08/19, 9:59 pm – Karunakar Tiwari Kanpur Shastra Gyan: 🙏🙏🙏🙏
29/08/19, 10:00 pm – Omprakash Singh LE C-105: सामान्यत: प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ श्री रामचरितमानस के लंकाकांड को असुरों के साथ संग्राम और अंत में रावण वध की कथा से संबंधित माना जाता है और सुंदरकांड की तरह इसका बारंबार पाठ नहीं किया जाता लेकिन इसमें उच्च जीवन मूल्यों को प्रेरित करने वाला एक प्रभावी अंश है जो नीचे हिंदी भावार्थ के साथ प्रस्तुत है।

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि विभीषन भयउ अधीरा।।

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।।

नाथ न रथ नहीं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।।

सुनहु सखा कह कृपा निधाना। जेहिं जय होइ सो स्‍यंदन आना।।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्‍य सील दृढ़ ध्‍वजा पताका।।

बल बिवेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।।

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिज्ञान कठिन कोदंडा।।

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जन नियम सिलीमुख नाना।।

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाके अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।

इसका हिन्‍दी अनुवाद इस प्रकार से है-

रावण को रथ पर ओर श्री रधुवीर को बिना रथ के देख कर विभीषण अधीर हो गये। प्रेम अधिक होने से उनके मन में संदेह हो गया कि वे बिना रथ के, रावण को कैसे जीत सकेंगे। श्रीराम जी के चरणों की वंदना करके वे स्‍नेह पूर्वक कहने लगे- हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जायेगा। कृपानिधान श्री रामजी ने कहा हे सखे। सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है। शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिये हैं। सत्‍य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्‍वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंन्द्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं। ईश्‍वर का भजन ही उस रथ को चलाने वाला चतुर सारथि है। वैराग्‍य ढाल है और सन्‍तोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्‍ड शक्ति है, श्रेष्‍ठ विज्ञान कठिन धनुष है। निर्मल (पाप रहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम, ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरू का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है। हे सखे। ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतने को कहीं शत्रु ही नहीं है। हे धीर बुद्धि वाले सखा। सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्‍म-मृत्‍यु) रूपी महान् दुर्जय शत्रु को भी जीता जा सकता है, (रावण की तो बात ही क्‍या है)।
29/08/19, 10:36 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 🙏🙏
29/08/19, 11:08 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १३०,१३१

शम्या गुरुष्णम् केशघ्नं रुक्षम् पीलु तु पित्तलम्। कफवातहरं भेदि प्लीहार्शःकृमिगुल्मनुत्॥१३०॥

सतिक्तम् स्वादु यत्पीलु नात्युष्णं तत्त्रिदोषजित्। त्वक्तिक्तकटुका स्निग्धा मातुलुङ्गस्य वातजित्॥१३१॥

बृंहणं मधुरं मांसं वातपित्तहरं गुरु। लघु तत्केसरं कासश्वासहिध्मामदात्ययान॥१३२॥

आस्यशोषानिलश्लेष्मविबन्धच्छर्द्यरोचकान्। गुल्मोदरार्शःशूलानि मन्दाग्नित्वं च नाशयेत॥१३३॥

शमी का फल– यह पाक में गुरु, उष्णवीर्य, केशनाशक‌ तथा रुक्ष होता है।

वक्तव्य- शमी को हिन्दी में छोकर कहते है। इषका वर्णन भवप्रकाश तथा धनवन्तरि निघण्टुओं मेभी आया है। यह छोटी व बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है। धार्मिक कार्यों में इसका बड़ा महत्व है। इसकी कच्ची फलियों का शाक बनाकर मारवाड़ तथा पंजाब में खाया जाता है, दशहरे के पुण्य पर इसके वृक्ष की पूजा की जाती है। विशेष देखें— च.सू.२७/१४९ सु.सू. ४६/१९३

पीलु का फल- यह पित्तकारक, कफ तथा वातनाशक, मलभेदक (दस्तावर), प्लीहारोग, अर्शोरोग, क्रिमिरोग तथा गुल्मरोग नाशक होता है। जो पीलु कुछ तीता एवं मधुर होता है, वह अधिक उष्ण नहीं होता और वह त्रिदोषनाशक भी होता है।

वक्तव्य- इसके वृक्ष राजस्थान, बिहार, कोंकण, दक्षिणप्रदेश, कर्नाटक, बलूचिस्तान आदि सूखे प्रान्तों में पाये जाते हैं। यह पीलु छोटा बड़ा भेद से दो प्रकार का होता है।

मातुलुंग(बिजौरा) नींबू की त्वचा- यह तिक्त एवं कटु होती है और स्निग्ध तथा वातनाशक होती है। उसका मांस(गूदा) बृंहण, मधुर, वात तथा पित्त नाशक और गुरु होता है। बिजौरानींबू का केशर लघु, कास, श्वास, मदात्यय, हिचकी, मुखशोष, वातरोग, कफरोग, विबन्ध(कब्जियत), वमन, अरोचक, गुल्मरोग, उदररोग, अर्शोरोग, शूलरोग एवं मन्दाग्नि का विनाश करता है।

वक्तव्य- नैनीताल अल्मोड़ा आदि पर्वतीय स्थानों में बिजौरानींबू पर्याप्त रूप में पाया जाता है।इसका छिलका बाहरी और भीतरी भेद से दो प्रकार का कहा गया है। बाहरी छिलका को त्वक्, भीतरी छिलका को मांस और भीतर मिलने वाले अम्ल पदार्थ को केसर कहा गया है। अब आप इसका अर्थ इस प्रकार लगाये— बाहरी छिलका को अत्यन्त पतला छीलकर फेक दिया जाता है, उसके गुण है त्वक्तिक्ता…..वातजित्। इस बाहरी छिलका में तेल का अंश पाया जाता है जो छीलने वाले के हाथ में लग जाता है। इसका वह भाग जिसे वाग्भट ने मांस कहा है, इसे मित्रमण्डली या परिजनों के साथ बैठकर खाया जाता है, जिसे सौगात = स्वागत कहा जाता है। यह अत्यन्त कोमल तथा मधुर होता है।

इसी का एक भेद मतकाकड़ी भी है, जिसे आयुर्वेद में मधुकर्कटी कहा है। इसके विपरीत जो निघण्टु ग्रन्थों में इसे चकोतरा कहा है, यह भ्रम है। आप देखें— मधुकर्कटी और मतकाकड़ी शब्दों में कितना साम्य है? इसी प्रकार बिजौरानींबू और मतकाकड़ी में छोटे-बड़े मात्र का अंतर है। इसी बहाने आप पर्वतीय यात्रा करें और देखें— इन दोनों फलों को। चकोतरा जिसे कहते है उसका बाहर का छिलका फेक दिया जाता है और भीतर का केशर मीठा होने के कारण खाया जाता है।उक्त बिजौरानींबू तथा मतकाकड़ी का केशर खट्टा होता है। ये दोनों के परस्पर विभेदक लक्षण है।
29/08/19, 11:08 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
29/08/19, 11:08 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
29/08/19, 11:09 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
29/08/19, 11:09 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
30/08/19, 7:01 am – Abhinandan Sharma: 👌
30/08/19, 7:05 am – Abhinandan Sharma: तभी मैं सोचूं कौवे इतने क्यों बढ़ते जाता रहे हैं 😊
30/08/19, 7:11 am – Abhinandan Sharma: 👌
30/08/19, 8:00 am – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 👍
30/08/19, 8:01 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏🙏🙏
30/08/19, 8:50 am – Shyam Sunder Fsl: This message was deleted
30/08/19, 9:40 am – Shyam Sunder Fsl: 🙏 sorry By mistake
30/08/19, 9:55 am – Pitambar Shukla: राम कृपा नासहिं सब रोगा।
जौं एहि भाँति बनै संजोगा।।

सदगुर बैद बचन बिस्वासा ।
संजम यह न बिषय कै आसा।।

यदि श्री राम जी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायँ।
सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो।
विषयों की आशा न करे,
यही संयम ( परहेज) हो।।121-3।।

रघुपति भजन सजीवन मूरी।
अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं।
नाहीं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।

श्री रघुनाथ जी की भक्ति संजीवनी जड़ी है।
श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान ( दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है।
इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायं,
नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से नहीं जाते।।121-4।।
30/08/19, 10:19 am – LE Onkar A-608 left
30/08/19, 2:58 pm – LE Onkar A-608 joined using this group’s invite link
30/08/19, 5:47 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: This message was deleted
30/08/19, 5:50 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु चतुर्थ श्लोक

न सांख्यं न शैवं न तत्पाञ्चरारात्रं
न जैनं न मीमांसकादेर्मतं वा ।
विशिष्टानुभूत्या विशुद्धात्मकत्वात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। ४ ।।

न सांख्य का मत श्रेष्ठ है, न शैव, न पाञ्चरात्र, न जैन, न मीमांसकों का ही मत उचित है, विशिष्टानुभूति से विशुद्धात्मक होने से एक, अविशिष्ट, अद्वितीय, शिव मैं हूँ ।
30/08/19, 8:27 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

तिष्ठन्नुपविशंश्चापि प्राणमाकर्षयन्निजम्।
मनोभङ्गमकुर्वाणः सर्वकार्येषु जीवति।२६७।

न कालो विविधं घोरं न शस्त्रं न च पन्नगः।
न शत्रु व्याधिचौराद्याः शून्यस्थानाशितुं क्षमाः।२६८।

जीवेनस्थापयेद्वायु जीवेनारम्भयेत्पुनः।
जीवेन क्रीडते नित्यं द्युते जयति सर्वदा।२६९।

खड़े होकर अथवा बैठकर अपने प्राण (श्वास) को एकाग्र चित्त होकर अन्दर खींचते हुए यदि कोई व्यक्ति जो कार्य करता है उसमें उसे अवश्य सफलता मिलती है।२६७।

यदि कोई व्यक्ति सुषुम्ना के प्रवाहकाल में ध्यानमग्न हो, तो न कोई शस्त्र, न कोई समर्थ शत्रु और न ही कोई सर्प उसे मार सकता है।२६८।

यदि कोई व्यक्ति सक्रिय स्वर से श्वास अन्दर ले और अन्दर लेते हुए कोई कार्य प्रारम्भ करे तथा जूआ खेलने बैठे और सक्रिय स्वर से लम्बी साँस ले, तो वह सफल होता है।२६९।
30/08/19, 11:20 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: This message was deleted
30/08/19, 11:22 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १३०,१३१

शम्या गुरुष्णम् केशघ्नं रुक्षम् पीलु तु पित्तलम्। कफवातहरं भेदि प्लीहार्शःकृमिगुल्मनुत्॥१३०॥

सतिक्तम् स्वादु यत्पीलु नात्युष्णं तत्त्रिदोषजित्। त्वक्तिक्तकटुका स्निग्धा मातुलुङ्गस्य वातजित्॥१३१॥

बृंहणं मधुरं मांसं वातपित्तहरं गुरु। लघु तत्केसरं कासश्वासहिध्मामदात्ययान॥१३२॥

आस्यशोषानिलश्लेष्मविबन्धच्छर्द्यरोचकान्। गुल्मोदरार्शःशूलानि मन्दाग्नित्वं च नाशयेत॥१३३॥

शमी का फल– यह पाक में गुरु, उष्णवीर्य, केशनाशक‌ तथा रुक्ष होता है।

वक्तव्य- शमी को हिन्दी में छोकर कहते है। इषका वर्णन भवप्रकाश तथा धनवन्तरि निघण्टुओं मेभी आया है। यह छोटी व बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है। धार्मिक कार्यों में इसका बड़ा महत्व है। इसकी कच्ची फलियों का शाक बनाकर मारवाड़ तथा पंजाब में खाया जाता है, दशहरे के पुण्य पर इसके वृक्ष की पूजा की जाती है। विशेष देखें— च.सू.२७/१४९ सु.सू. ४६/१९३

पीलु का फल- यह पित्तकारक, कफ तथा वातनाशक, मलभेदक (दस्तावर), प्लीहारोग, अर्शोरोग, क्रिमिरोग तथा गुल्मरोग नाशक होता है। जो पीलु कुछ तीता एवं मधुर होता है, वह अधिक उष्ण नहीं होता और वह त्रिदोषनाशक भी होता है।

वक्तव्य- इसके वृक्ष राजस्थान, बिहार, कोंकण, दक्षिणप्रदेश, कर्नाटक, बलूचिस्तान आदि सूखे प्रान्तों में पाये जाते हैं। यह पीलु छोटा बड़ा भेद से दो प्रकार का होता है।

मातुलुंग(बिजौरा) नींबू की त्वचा- यह तिक्त एवं कटु होती है और स्निग्ध तथा वातनाशक होती है। उसका मांस(गूदा) बृंहण, मधुर, वात तथा पित्त नाशक और गुरु होता है। बिजौरानींबू का केशर लघु, कास, श्वास, मदात्यय, हिचकी, मुखशोष, वातरोग, कफरोग, विबन्ध(कब्जियत), वमन, अरोचक, गुल्मरोग, उदररोग, अर्शोरोग, शूलरोग एवं मन्दाग्नि का विनाश करता है।

वक्तव्य- नैनीताल अल्मोड़ा आदि पर्वतीय स्थानों में बिजौरानींबू पर्याप्त रूप में पाया जाता है।इसका छिलका बाहरी और भीतरी भेद से दो प्रकार का कहा गया है। बाहरी छिलका को त्वक्, भीतरी छिलका को मांस और भीतर मिलने वाले अम्ल पदार्थ को केसर कहा गया है। अब आप इसका अर्थ इस प्रकार लगाये— बाहरी छिलका को अत्यन्त पतला छीलकर फेक दिया जाता है, उसके गुण है त्वक्तिक्ता…..वातजित्। इस बाहरी छिलका में तेल का अंश पाया जाता है जो छीलने वाले के हाथ में लग जाता है। इसका वह भाग जिसे वाग्भट ने मांस कहा है, इसे मित्रमण्डली या परिजनों के साथ बैठकर खाया जाता है, जिसे सौगात = स्वागत कहा जाता है। यह अत्यन्त कोमल तथा मधुर होता है।

इसी का एक भेद मतकाकड़ी भी है, जिसे आयुर्वेद में मधुकर्कटी कहा है। इसके विपरीत जो निघण्टु ग्रन्थों में इसे चकोतरा कहा है, यह भ्रम है। आप देखें— मधुकर्कटी और मतकाकड़ी शब्दों में कितना साम्य है? इसी प्रकार बिजौरानींबू और मतकाकड़ी में छोटे-बड़े मात्र का अंतर है। इसी बहाने आप पर्वतीय यात्रा करें और देखें— इन दोनों फलों को। चकोतरा जिसे कहते है उसका बाहर का छिलका फेक दिया जाता है और भीतर का केशर मीठा होने के कारण खाया जाता है।उक्त बिजौरानींबू तथा मतकाकड़ी का केशर खट्टा होता है। ये दोनों के परस्पर विभेदक लक्षण है।
30/08/19, 11:23 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १३४,१३५

भल्लातकस्य त्वङ्गमांसं बृंहणं स्वादु शीतलम्। तदस्थ्यग्निसमं मेध्यं कफवातहरं परम्॥१३४॥

स्वाद्वम्लं शीतमुष्णम् च द्विधा पालेवतं गुरु। रुच्यमत्यग्निशमनं रुच्यं मधुरमारुकम्॥१३५॥

पक्वमाशु जरां याति नात्युष्णगुरुदोषलम्।

भिलावा का वर्णन- भिलावा का छिलका तथा गूदा बृंहण(शरीर को स्थूल करने वाला), रस में मधुर तथा शीतवीर्य होता है।भिलावा की गुठली अग्नि के समान तीक्ष्ण(दाहक), बुद्धिवर्धक एवं अत्यन्त कफ एवं वातनाशक होती है।

वक्तव्य- भिलावा के फल हृदयाकृति होने पर भी ये दो भागों में मूलतः विभक्त होते है। जब इसका ऊपरी भाग दाहक होता है और नीचे का भाग पकी नारंगी के सदृश हो जाता है, तब उसे खाया जाता है। इसी का वर्णन ऊपर प्रथम पंक्ति द्वारा किया गया है।

पारेवत का वर्णन- पारेवत मधुर तथा अम्ल भेद से दो प्रकार का होता है। मीठा पारेवत शीतवीर्य होता है तथा अम्ल पारेवत उष्णवीर्य होता है। ये दोनों पारेवत पाचन में गुरु, रूचिकारक तथा अत्यग्नि(भस्मक रोग) का शमन करते हैं।

वक्तव्य- उक्त गुण-धर्मों से युक्त द्रव्य को चरक ने “पारावत” कहा है। देखें— च.सू.२७/१३४। यह फल कामरूप(आसाम) आदि देशों में पाया जाता है।(चक्रपाणि)

आरुक फल का वर्णन- आडुफल रुचिकारक तथा रस मे मधुर होता है। यह पका हुआ शीघ्र पच जाता है। यह अधिक गरम नहीं होता किन्तु गुरु तथा दोषकारक होता है।

वक्तव्य- यह पर्वतीय क्षेत्रों का फल है। इसके अनेक भेद- उपभेद होते हैं। तदानुसार यह बैशाख से पकना प्रारम्भ होते और जातिभेद से आश्विन तक पकते रहते हैं। अब इसकी कुछ जातियां मैदानी भागों में भी पायी जाने लगी है, फिर भी पर्वतीय जलवायु का स्वाद कुछ और ही होता है।
30/08/19, 11:25 pm – Shastragyan Abhishek Sharma:
30/08/19, 11:25 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: This message was deleted
30/08/19, 11:28 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: भिलावा फल
31/08/19, 6:47 am – LE Nisha Ji : इस फल का क्या नाम है,इसे मैंने चिकमंगलूर में लोगों को खाते देखा है।
31/08/19, 10:53 am – Shastragyan Abhishek Sharma: चकोतरा
31/08/19, 11:03 am – Pitambar Shukla: जानिय तब मन बिरुज गोसाँई।
जब उर बल बिराग अधिकाई।।

सुमति छुधा बाढ़इ नित नई ।
बिषय आस दुर्बलता गई ।।

हे गोसाईं! मन को नीरोग हुआ तब जानना चाहिये,
जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाय,
उत्तम बुद्धि रूपी भूख नित नई बढ़ती रहे और विषयों की आशा रूपी दुर्बलता मिट जाय।।121-5।।

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई।
तब रह राम भगति उर छाई।।

सिव अज सुक सनकादिक नारद।
जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।

( इस प्रकार सब रोगों से छूट कर ) जब मनुष्य निर्मल ज्ञान रूपी जल में स्नान कर लेता है,
तब उसके हृदय में राम भक्ति छा रहती है।

शिव जी, ब्रह्मा जी, शुक देव जी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्म विचार में परम निपुण जो मुनि हैं।।121-6।।
31/08/19, 7:53 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु पञ्चम श्लोक

न चोर्ध्वं न चाधो न चान्तर्न बाह्यं
न मध्यं न तिर्यङ् न पूर्वापरा दिक् ।
वियद्वयापकत्वादखण्डैकरूप –
स्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। ५ ।।

न उर्ध्व है, न अधः है, न अन्दर है, न बाह्य है, न मध्य है न तिर्य्यक है, न पूर्व दिशा है, न पश्चिम दिशा । आकाश के समान व्यापक होने से अखण्डैकरूप, एक, अविशिष्ट, शिव मैं हूँ ।

01/09/19, 12:44 am – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

स्वरज्ञानीबलादग्रे निष्फलं कोटिधा भवेत्।
इहलोके परत्रापि स्वरज्ञानी बली सदा।२७०।

दशशतायुतं लक्षं देशाधिपबलं क्वचित्।
शतक्रतु सुरेन्द्राणां बलं कोटिगुणं भवेत्।२७१।

श्री देवि उवाच

परस्परं मनुष्याणां युद्धे प्रोक्तो जयस्त्वया।
यमयुद्धे समुत्पन्ने मनुष्याणां कथं जयः।२७२।

ईश्वरोवाच

ध्यायेद्देवं स्थिरो जीवं जुहुयाज्जीव सङ्गमे।
इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्य महालाभो जयस्तथा।२७३।

अर्थ– जब एक करोड़ बल निष्फल हो जाते हैं, तब भी स्वरज्ञानी बलशाली बना सबसे अग्रणी होता है, अर्थात् भले ही एक करोड़ (हर प्रकार के) बल निष्फल हो जायँ, लेकिन स्वरज्ञानी का बल कभी निष्फल नहीं होता। स्वरज्ञानी इस लोक में और परलोक या अन्य किसी भी लोक में सदा शक्तिशाली होता है।२७०।

एक मनुष्य के पास दस, सौ, दस हजार, एक लाख अथवा एक राजा के बराबर बल होता है। सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्र का बल करोड़ गुना होता है। एक स्वरयोगी का बल इन्द्र के बल के तुल्य होता है।२७१।

इसके बाद माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा
कि हे प्रभो, आपने यह तो बता दिया कि मनुष्यों के पारस्परिक युद्ध में एक योद्धा की विजय कैसे होती है। लेकिन यदि यम के साथ युद्ध हो, तो मनुष्यों की विजय कैसे होगी?२७२।

यह सुनकर भगवान शिव बोले-
हे देवि, जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर तीनों नाड़ियों के संगम स्थल आज्ञा चक्र पर ध्यान करता है, उसे सभी अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, महालाभ होता है (अर्थात् ईश्वरत्व की प्राप्ति होती है) और सर्वत्र सफलता मिलती है।२७३।
01/09/19, 9:07 am – Abhinandan Sharma: 👌
01/09/19, 9:08 am – Abhinandan Sharma: ऐसा तो कोई नेता ही नहीं है अब हमारे देश में, जो संसद में बैठकर पोर्न देखते हों और फिर किसी राज्य के उपमुख्यमंत्री बन जाएं, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा इस देश का !!! हतोभाग्य भारत ।
01/09/19, 9:10 am – Abhinandan Sharma: स्तम्भन समझ रहे हैं ना 😊
01/09/19, 9:20 am – Abhinandan Sharma: काम – वात, लोभ को कफ और क्रोध कक पित्त की उपमा क्यों दी गयी है ?
01/09/19, 9:37 am – Abhinandan Sharma: वाह क्या उत्तम उपमाएं दी गयी हैं, इससे बेहतर उपमा हो ही नाहिं सकती ।
01/09/19, 9:39 am – Abhinandan Sharma: 👍
01/09/19, 9:39 am – Abhinandan Sharma: कैसे ?
01/09/19, 9:49 am – LE Onkar A-608: वात प्रकोप होने पर हमें यह नहीं पता चलता कि समस्या कहां है, अभी कष्ट एक जगह है थोड़ी देर बाद कहीं अनयत्र। जैसे वात में चञ्चलता होती है, जितनी वातकारक परिस्थिति होती है यह बढ़ते बढ़ते व्यक्ति को असहाय कर देता है वैसा ही काम भी होता है अनंग रहकर भी कष्ट देते हुए अंततः अशक्त कर देता है।वात का सवाद फीका और कामान्त भी फीका।

कफ की प्रकृति मधुर एवं स्निग्ध होती है ऐसे ही लोभ भी हमें अत्यन्त प्रिय होता है और धीरे धीरे करके हमें सबका अप्रिय बना देता है।
पित्त और क्रोध सबकुछ, जो भी उसके सम्पर्क में आता है उसे जला देता है।
01/09/19, 9:58 am – Pitambar Shukla: सब कर मत खगनायक एहा।
करिअ राम पद पंकज नेहा।।

श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं।
रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।।

हे पक्षिराज! उन सबका मत यही है कि श्री राम जी के चरणों में प्रेम करना चाहिए ।
श्रुति, पुराण और सभी ग्रंथ कहते हैं कि श्री रघुनाथजी की भक्ति के बिना सुख नही है ।।121-7।।

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा।
बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।।

फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला।
जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।।

कछुए की पीठ पर भले ही बाल उग आवें,
बांझ का पुत्र भले ही किसी को मार डाले,
आकाश में भले ही अनेक प्रकार के फूल खिल उठें;
परन्तु श्री राम से विमुख हो कर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता ।।121-8।।
01/09/19, 10:01 am – Pitambar Shukla: 🙏🙏
01/09/19, 10:02 am – Abhinandan Sharma: इसमें कुछ और भी ध्यान देनेंयोग्य है जैसे वात की स्थिति शरीर में कहां बतायी गयी है ? कफ की तो तुलसीदास जी ने खुद ही कफ को छाती बता दिया है ऐसे ही सभी की शरीर में स्थिति को तुलसीदास जी ने माना है बाकी जो आपने गुण बतायें हैं, वो भी मान्य हैं ।

01/09/19, 10:03 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: इन श्लोकों में वशीकरण के तरीके बताए गए हैं। इनपर लिखते समय यह विचार आया कि इसे छोड़ दिया जाय, पर ऐसा करने से यह अधूरा रह जाता जो अनुचित होता।
श्लोक संख्या 285 तक स्त्रियों को वश में करने के तरीके बताए गए हैं और श्लोक संख्या 286 से 300 तक गर्भाधान के तरीके बताए गए हैं।
कृपया इसे पढ़कर अन्यथा न लें, यह एक ग्रन्थ है इसे इसी रूप में ही पढ़ें।
01/09/19, 10:04 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

निराकारात्समुत्पन्नं साकारं सकलं जगत्।
तत्साकारं निराकारं ज्ञाने भवति तत्क्षणात्।२७४।

श्रीदेव्युवाच

नरयुद्धं यमयुद्धं त्वया प्रोक्तं महेश्वर।
इदानीं देव देवानां वशीकारणकं वद।२७५।

ईश्वरोवाच

चन्द्रं सूर्येण चाकृष्य स्थापयेज्जीवमंडले।
आजन्मवशगा रामा कथितं यं तपोधनैः।२७६।

जीवेन गृह्यते जीवो जीवो जीवस्य दीयते।
जीवस्थाने गतो जीवो बाला जीवान्तकारकः।२७७।

अर्थ- यह सम्पूर्ण दृश्य साकार जगत निराकार सत्ता से उत्पन्न है। जो व्यक्ति साकार जगत से ऊपर उठ जाता है, अर्थात् भौतिक चेतना से ऊपर उठकर सार्वभौमिक चेतना को प्राप्त कर लेता है, तभी उसे पूर्णत्व प्राप्त हो जाता है।२७४।

माँ पार्वती भगवान शिव से कहती हैं
कि हे देवाधिदेव, आपने हमें बताया कि मनुष्यों और यम के साथ युद्ध में विजय कैसे पाया जाय। साथ ही मोक्ष आदि के सम्बन्ध में भी बताया। अब आप कृपा कर बताएँ कि दूसरों को अपने वश में किस प्रकार किया जाता है।२७५।

भगवान शिव कहते हैं
कि हे देवि, तपस्वी लोगों का कहना है कि यदि पुरुष अपने सूर्य स्वर से स्त्री के चन्द्र स्वर को ग्रहण कर अपने अनाहत चक्र में धारण करे, तो वह स्त्री आजीवन उसके वश में रहेगी।२७६।

पुरुष यदि स्त्री के प्रवाहित स्वर को अपने प्रवाहित स्वर के द्वारा ग्रहण करे और पुनः उसे स्त्री के सक्रिय स्वर में दे, तो वह स्त्री सदा उसके वश में रहती है।२७७।
01/09/19, 10:17 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ग्रन्थ नहीं शास्त्र की तरह पढ़ें।
01/09/19, 11:59 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
🙏 श्री मनुस्मृति 🙏
अब्राह्मणादध्यायनं आपत्काले विधीयते ।
अनुव्रज्या च शुश्रूषा यावदध्यायनं गुरोः । । २.२४१ । ।

नाब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासं आत्यन्तिकं वसेत् ।
ब्राह्मणे वाननूचाने काङ्क्षन्गतिं अनुत्तमाम् । । २.२४२ । ।

यदि त्वात्यन्तिकं वासं रोचयेत गुरोः कुले ।
युक्तः परिचरेदेनं आ शरीरविमोक्षणात् । । २.२४३ । ।

आ समाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् ।
स गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्म शाश्वतम् । । २.२४४ । ।

न पूर्वं गुरवे किं चिदुपकुर्वीत धर्मवित् ।
स्नास्यंस्तु गुरुणाज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थं आहरेत् । । २.२४५ । ।

क्षेत्रं हिरण्यं गां अश्वं छत्रोपानहं आसनम् ।
धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिं आवहेत् । । २.२४६ । ।

अर्थ
आपत्ति काल में क्षत्रिय, वैश्य से भी सीखने का विधान है,पर ऐसे गुरु की सेवा अध्ययन काल तक ही करनी चाहिए।

 जो गुरु ब्राह्मण ना हो या सामवेद का ज्ञाता ना हो तो मोक्षार्थी ब्रह्मचारी जीवन भर गुरुकुलवास ना करे।।
      यदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी जीवन भर गुरुकुलवास चाहे तो देहांत तक सावधानी से गुरुसेवा में लगा रहे।।

जो ब्राह्मण देहांत तक गुरु की सेवा सुश्रूभा करता है वह मोक्ष को पाता है, धर्मज्ञ ब्रह्मचारी अध्ययन के पहले दक्षिणा आदि से गुरु का कुछ भी उपकार ना करे। किन्तु समावर्तन के बाद गुरु की आज्ञा से शक्तिअनुसार गुरुदक्षिणा देनी चाहिए।।
खेत,सोना,गौ,घोड़ा,छतरी,जुटा,आसन,अन्न,शाक व वस्त्र आदि अर्पण करके गुरु को प्रसन्न करें


02/09/19, 4:12 am – Abhinandan Sharma: ये वैसे भी स्वर योगी के लिए हैं, आमजन के लिये नहीं सो चलने दीजिये, कोई इनका प्रयोग तब ही कर पायेगा, जब स्वर को साधना सीख पायेगा 😊
02/09/19, 4:53 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏
02/09/19, 7:33 am – FB Mukesh Sinha Pathalgaon CG Shastra Gyan: भगवान गणेश जी आप के घर धन वैभव ऐश्वर्य के साथ पधारे
गणेश चतुर्थी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

   *🙏🙏🙏🙏🙏*

02/09/19, 9:29 am – Pitambar Shukla: तृषा जाइ बरु मृग जल पाना।
बरु जामहिं सस सीस बिषाना।।

अंधकार बरु रबिहि नसावै।
राम बिमुख न जीव सुख पावै

हिम ते अनल प्रगट बरु होई।
बिमुख राम सुख पाव न कोई ।।

मृगतृष्णा के जल को पीने से भले ही प्यास बुझ जाए,
खरगोश के सिर पर भले ही सींग निकल आवें,
अंधकार भले ही सूर्य का नाश कर दे;
परन्तु श्री राम से विमुख हो कर जीव सुख नहीं पा सकता ।।

बर्फ से भले ही अग्नि प्रकट हो जाय,( ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जायँ),
परन्तु श्री राम से विमुख हो कर कोई भी सुख नही पा सकता ।।121-9/10।।
02/09/19, 9:54 am – Mummy Hts:
02/09/19, 2:05 pm – Dinesh Arora Gurgaon Shastra Gyan joined using this group’s invite link
02/09/19, 3:56 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

रात्र्यन्तयामवेलायां प्रसुप्ते कामिनिजने।।
ब्रह्मजीवं पिबेद्यस्तु बालाप्राणहरो नरः।२७८।

अष्टाक्षरं जपित्वा तु तस्मिन् काले गते सति।
तत्क्षणं दीयते चन्द्रो तु मोहमायाति कामिनी।२७९।

शयने वा प्रसङ्गे वा युवत्यालिङ्गनेऽपि वा।
यः सूर्येण पिबेच्चन्द्रं स भवेन्मकरध्वजः।२८०।

शिव आलिङ्ग्यते शक्त्या प्रसङ्गे दक्षिणेऽपि वा।
तत्क्षणाद्दापयेद्यस्तु मोहयेत्कामिनीशतम्।२८१।

अर्थ- रात्रि में सो रही महिला के ब्रह्म-जीव (सक्रिय स्वर से निकलने वाली साँस) को यदि पुरुष अपने सक्रिय स्वर से अन्दर खींचता है, तो वह स्त्री उसके वश में हो जाती है।२७८।

यदि पुरुष अष्टाक्षर मंत्र का जपकरके अपने चन्द्र स्वर को स्त्री के भीतर उसके सक्रिय स्वर में प्रवाहित करे, तो वह स्त्री उसके वश में हो जाती है।२७९।

यदि पुरुष लेटकर आलिंगन के समय अपने सूर्य स्वर से स्त्री के चन्द्र स्वर का पान करे, तो वह स्त्री उसके वश में हो जाती है।२८०।

संभोग के समय यदि स्त्री का चन्द्र स्वर और पुरुष का सूर्य स्वर प्रवाहित हो और दोनों के स्वर परस्पर संयुक्त हो जायँ, तो पुरुष को सौ स्त्रियों को वश में करने की शक्ति मिल जाती है।२८१।
02/09/19, 8:24 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु षष्ठ श्लोक

न शुक्लं न कृष्णं न रक्तं न पीतं
न कुब्जं न पीनं न ह्रस्वं न दीर्घम् ।
अरूपं तथा ज्योतिराकारकत्वात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। ६ ।।

न शुक्ल है, न कृष्ण है, न लाल है, न पीला है, न कुब्ज है, न पीन है, न ह्रस्व है और न दीर्घ है, स्वप्रकाश ज्योतिस्वरूप होने से अप्रमेय एक अवशिष्ट अद्वितीय शिव मैं हूँ ।
02/09/19, 8:27 pm – Shastra Gyan Kartik: जय शिव 🙏

02/09/19, 10:51 pm – +91 11637: कालियकृत स्तुति

वयं खलाः सहोत्पत्या तामसा दीर्घन्यवः।
स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसद्ग्रहः।।

हे नाथ! हम जन्म से ही दूसरों को दुःख देने वाले तामसी और बड़े क्रोधी हैं। प्राणियों के लिए स्वभाव छोड़ना अति कठिन है। इसी (स्वभाव) से प्राणियों को असत् देह आदि में अहन्ता, ममतादि रूप दुराग्रह होता है।।

त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातर्गुणविसर्जनम्।
नानास्वभाववीर्योजोयोनिबीजाशयाकृति।।

हे विधातः! विविध प्रकार के स्वभाव (घोर शान्त वृत्ति) वाले तथा देहशक्ति, इंद्रियशक्ति, मातृशक्ति, पितृशक्ति और वासनास्वरूप वाले इस विश्व को विविध प्रकार के गुणों से आपने उत्पन्न किया है।।

वयं च तत्र भगवन् सर्पा जात्युरुमन्यवः।
कथं त्यजामस्त्वन्मायां दुस्त्यजां मोहिताः स्वयम्।।

इस सृष्टि में हम जन्म से ही अति क्रोधी सर्प हैं। हे भगवान्! हम आपकी माया से मोहित हैं। पकी माया का त्याग कैसे कर सकते हैं (जिसका कि ब्रह्मादि भी त्याग नहीं कर सके। अर्थात् आपके अनुग्रह के बिना हम उसका त्याग कैसे कर सकते हैं)।।

भवान् हि कारणं तत्र सर्वज्ञो जगदीश्वरः।
अनुग्रहं निग्रहं वा मन्यसे तद्विधेहि नः।।

हे जगदीश्वर! हे सर्वज्ञ! आप ही उस माया का त्याग कराने में कारण हैं। (यदि हमें परतंत्र समझते हैं) तो हमारे ऊपर अनुग्रह कीजिए। (यदि हमें स्वतंत्र मानते हैं) तो हमको जो दंड देना उचित हो वह दीजिए।।
02/09/19, 10:52 pm – Manvendra Singh Bilaspur joined using this group’s invite link
02/09/19, 11:34 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १३६,१३७,१३८,१३९

द्राक्षापरुषकं चार्द्रमम्लं पित्तकफप्रदम्॥१३६॥

गुरुष्णवीर्य वातघ्नं सरं सकरमर्दकम्। तथाऽम्लं कोलकर्कन्धुलकुचाम्रातकारुकम्॥१३७॥

ऐरावतं दन्तशठं सतूदं मृगलिण्डिकम्। नातिपित्तकरं पक्वं शुष्कं च करमर्दकम्॥१३८॥

दीपनं भेदनं शुष्कमम्लीकाकोलयोः फलम्। तृष्णाश्रमक्लमच्छेदि लीघ्विष्टं कफवातयो॥१३९॥

कच्चै दाख आदि के फल- द्राक्षा (मुनक्का) एवं परूषक (फालसा) के कच्चे फल स्वाद मे खट्टे होते है। ये पित्त तथा कफवर्धक होते है।

करमर्द (करौंदा) के कच्चे फल- यह पाचन मे गुरु उष्णवीर्य वातनाशक तथा सर होते है।

कोल-कर्कन्धु-वर्णन- कोल(बड़ा बेर) तथा कर्कन्दु(छोटा बेर), वकुच(बड़हल), आम्रातक(आमड़ा), ऐरावत(नारंगी- वै॰नि॰), दन्तशठ(जम्बीरीनीबू), तूद(शहतूत), मृगलिण्डिक ( बड़े शहतूत) ये सभी फल कच्ची दाख के समान गुणधर्म वाले होते हैं। इनमें सूखा तथा पका हुआ करौंदा अधिक पित्तकारक नहीं होता।

ईमली तथा बेर के सूखे फल- ये अग्नि को प्रदिप्त करने वाले तथा मलभेदक (दस्तावर) होते हैं। ये दोनों प्यास, शारीरिक एवं मानसिक थकावट को दूर करते हैं, कफ एवं वातविकार मे लाभदायक तथा पाचन में लघु होते हैं।
03/09/19, 12:37 am – FB Rahul Gupta Kanpur: क्या इतनी ही स्तुति है?
03/09/19, 9:50 am – Pitambar Shukla: बारि मथे घृत होइ बरु
सिकता ते बरु तेल ।
बिनु हरि भजन न भव तरिय,
यह सिद्धांत अपेल।।

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु
अजहि मसक ते हीन।
अस बिचारि तजि संसय
रामहि भजहिं प्रबीन।।

जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू( को पेरने) से भले ही तेल निकल आवे;
परन्तु श्री हरि के भजन बिना संसार रूपी समुद्र से नही तरा जा सकता;
यह सिद्धांत अटल है।।122-क।।

प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी तुच्छ बना सकते हैं।
ऐसा विचार कर चतुर पुरुष सब सन्देह त्याग कर श्रीराम जी को ही भजते हैं।।122-ख।।

विनिश्चितं वदामि ते
न अन्यथा वचांसि मे।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।

मैं आपसे भली-भांति निश्चित किया हुआ सिद्धांत कहता हूं—–
मेरे वचन अन्यथा ( मिथ्या ) नही है कि जो मनुष्य श्री हरि का भजन करते हैं;
वे अत्यंत दुस्तर संसार सागर को( सहज ही) पार कर जाते हैं।।122-ग।।

समाप्तमिदं प्रकरणम्।
🙏🙏🙏🙏
03/09/19, 11:18 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: This message was deleted
03/09/19, 11:18 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १४०,१४१,१४२

फलानामवरं तत्र लकुचं सर्वदोषकृत। हिमानलोष्णदुर्वातव्याललालादिदूषितम्॥१४०॥

जन्तुजुष्टम् जले मग्नमभुमिजमनार्तवम्। अन्यधान्ययुतं हीनवीर्यं जीर्णतयाऽति च॥१४१॥

धान्यं त्यजेत्तथा शाकं रुक्षसिद्धमकोमलम। असञ्जातरसं तद्वच्छुष्कं चान्यत्र मूलकात्॥१४२॥

बड़हर के फल- फलों मे बड़हर का फल अधम गुणों वाला होता है तथा यह वात आदि सभी दोषों को उभाड़ने वाला होता है।

त्याज्य धान्य, शाक एवं फल- हिम(बरफ) गिरने से,ओले पड़ने से, कड़ी धूप लगने से या आग से झुलस जाने से, जल में डूब जाने से, विपरीत(अपने प्रतिकूल) गुणों वाली भुमि में उत्पन्न होने से, विपरीत ऋतु में उत्पन्न होने से, विपरीत गुण वाले धान्य(अनाज) के साथ मिला देने से, शक्तिहीन हो जाने से अथवा अधिक पुराने हो जाने से धान्य अपने गुणों से रहित हो जाते हैं। ऐसे धान्यों का सेवन न करें। इसी प्रकार के शाक भी त्याज्य होते हैं तथा जो शाक घी-तेल स्नेहों से बिना ही बनाये गये हो और जो कोमल न हों वे भी अखाद्य होते हैं। जिन शाकों मे स्वाभाविक रस, गुण आदि की उत्पत्ति न हुई हो अथवा जो शाक सूख गये हो वेभी खाने योग्य नहीं होते।

सुखाये गये कन्दशाक(मूली आदि) खाये जा सकते हैं। जैसा कि इसी अध्याय के १०५वें पद्य के पूर्वार्द्ध में कहा गया है। इसी प्रकार के फल भी खाने योग्य नहीं होते, किन्तु सुखाया गया कच्चा बेल का फल खाया जा सकता है, अन्य कच्चे फलों को नहीं खाना चाहिए।
इति फलवर्गः॥

         *अथौषधवर्गः*

03/09/19, 11:20 pm – Dinesh Arora Gurgaon Shastra Gyan: Jai ho Prabhu!!! 🙏🙏🙏🙏
04/09/19, 7:47 am – Abhinandan Sharma: चलिये, अब शक की कोई गुंजाइश नहीं है । पार्ट 2 में किशोर जी से सीखने की बात पर ये सन्दर्भ दिया जा सकता था ।
04/09/19, 10:33 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 😊🙏

04/09/19, 12:42 pm – Abhinandan Sharma: नास्तिक
मेरे एक मित्र ने नास्तिकता पर एक पोस्ट की | उसमें नास्तिक होने की एक परिभाषा उन्होंने दी | आजकल वैसे भी सोशल मीडिया पर ये सबसे आम टॉपिक है | मैंने कहा कि वो परिभाषा गलत है | उनकी दी हुइ परिभाषा के अनुसार, नास्तिक लोग, किसी स्पष्ट प्रमाण के अभाव में, ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते हैं |

मैं बार बार कहता हूँ, कि किसी भी बात को लिखने और कहते समय आपको ये पता होना चाहिए कि आप क्या कह और लिख रहे हैं | इसीलिए पढ़ना चाहिए, बहुत पढना चाहिए वरना बिना पढ़े लिखे लोग, मत (मनमानी बात) तो बना सकते हैं लेकिन जब बात तर्क की आएगी तो मुंह की खायेंगे | जब हम लिखते हैं कि किसी प्रमाण के अभाव में तो हमें पता होना चाहिए कि प्रमाण क्या होता है ? किसे प्रमाण कहते हैं ? ईश्वर की बात तो बाद में करेंगे, पहले ये तो पता चले कि जिस प्रमाण के बेसिस पर हम उस ईश्वर को ढूँढने चले हैं, वो प्रमाण क्या होता है ?

प्रमाण शब्द बनता है, प्रमा से | अब प्रमा माने क्या ? प्रमा माने होता है, कोई चीज जैसी है, वैसे ही उसका ज्ञान प्राप्त होना | एक तरह से जो सत्य है, उसका ज्ञान होना, ये प्रमा है | ये भैंस है, काली है, दो सींग है, चार पैर है, दूध देती है, मुझे दिख भी रही है – ये प्रमा है | अप्रमा इसका ठीक उल्टा होता है, जो दीखता हो, पर हो नहीं | दुसरे शब्दों में कहें तो – भ्रम | जैसे मृग मरीचिका | रेगिस्तान में जायेंगे तो दूर पानी दिखेगा तो सही, पर होगा नहीं | जैसे गर्मी में कई बार, सड़क पर पेड़ की छाया, दूर से पानी जैसी दिखती है | ये अप्रमा है | रस्सी में सांप और साप में रस्सी का भ्रम, अप्रमा है | वो दीखता है कुछ और, पर होता है कुछ और | बिना कारण के कार्य नहीं हो सकता है (नोट, ये बहुत इम्पोर्टेन्ट लाइन है, इस अकेली लाइन पर १० पेज की व्याख्या लिखी जा सकती है और इसको समझने के लिए, बहुत पढने की आवश्यकता है) इसी प्रकार, बिना प्रमाण के प्रमा नहीं हो सकती है |

अब फिर से वापिस आते हैं प्रमाण पर | प्रमाण क्या है ? – “प्रमाता येनार्थे प्र्मि्णोंति तत् |” अर्थात जिस साधन के द्वारा प्रमाता (जानने वाले को) को प्रमेय (सम्बंधित विषय) का ज्ञान होता है, वो प्रमाण कहलाता है | जैसे तराजू से किसी भी वस्तु के भार का ज्ञान होता है, वैसे ही प्रमाण से, किसी भी विषय के सत्य होने का मूल्यांकन किया जाता है | प्रमाण कितने प्रकार का होता है ? किसको माने कि वो प्रमाण है ? ये जानना आवश्यक है, तब तो आप ईश्वर को जान पायेंगे | जब प्रमाण को ही नहीं जानेगे तो ईश्वर को कैसे जानेगे ! अतः अब आते प्रमाण कितने प्रकार का होता है |

इसमें सबसे घटिया और बेकार परिभाषा, चार्वाक ने दी | जिसे आजकल लोग मानते हैं | चार्वाक कहता है, जो दिखाई देता है, वही प्रमाण होता है | यही परिभाषा आजकल ज्यादातर खुद को नास्तिक मानने वाले लोग मानते हैं | जो दिखाई नहीं देता, वो नहीं होता | लेकिन दिखाई तो हवा भी नहीं देती , लेकिन हवा तो है | पत्ते उड़ते हैं, हम सांस लेते हैं, धुल उडती है, आंधी आती है तो हम कहते हैं कि हवा है पर दिखाई नहीं देती | दिखाई तो परमाणु भी नहीं देता, इलेक्ट्रान भी नहीं देता, लेकिन वैज्ञानिकों ने इनको बिना देखे ही, थ्योरी बेस (तर्क और प्रमाण के आधार पर) पर माना कि ये हैं | (उठा कर इनकी खोज का इतिहास पढ़ लें) | मान लीजिये आप किसी जंगल से जा रहे हैं, आपने सुन रखा है कि जंगल में शेर है | अब अगर आपको शेर की दहाड़ सुनाई दे तो भी क्या आप नहीं मानेंगे कि शेर है ? यहाँ आकर चार्वाक का सिद्धांत फेल हो जाता है और हमें वापिस आना पड़ता है, तर्कशास्त्र /प्रमाणशास्त्र के रचियता गौतम ऋषि के पास |

उनके अनुसार, प्रमाण चार प्रकार के होते हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द | पोस्ट लम्बी होती जा रही है ! इसके आगे पढना है या बस करें ? ध्यान रखिये नास्तिक बनिए या आस्तिक, इससे भगवान् के सेहत पर चवन्नी का भी फर्क नहीं पड़ता | पर जो भी बनिए, उसके लिए केवल मनगढ़ंत मत बन बनाइये और न ही उस मनगढ़ंत मत के गुलाम बनिए | बल्कि उस मत के पक्ष और विपक्ष दोनों को गहराई से जानिये | बिना जाने तो जो भी मानेंगे वो क्या होगा – अप्रमा अर्थात भ्रम | पास जाइए और फिर बताइए, सड़क पर पेड़ की छाँव है या पानी ? ऐसे ही पहले पढ़िए, फिर बताइये, ईश्वर है या नहीं ? (ये लेख जानबूझ कर आधा छोड़ा गया है 😁)
04/09/19, 12:55 pm – G B Malik Delhi Shastra Gyan: बहुत ही बढ़िया लेख👌🏻👏🏻👍🏻
04/09/19, 1:00 pm – Sachin Tyagi Shastra Gyan: 👌👌👌👏👏👏
04/09/19, 1:02 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: बाकी का भी लिख डालिये , जितना ज्यादा पढ़ो उतना अच्छा, सत्र में प्रमाण के बारे में जानने के बाद दोबारा पढ़ने से और ज्यादा समझ आने लगता है। 🙂
04/09/19, 1:09 pm – Pitambar Shukla: लेख के शेषांश की प्रतीक्षा रहेगी ।
04/09/19, 1:20 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: Pura padna hai🙏
04/09/19, 1:22 pm – Pitambar Shukla: मैं एक-एक अक्षर पढ़ता हूं, यदि विषय मेरी रुचि के अनुरूप है ।🙏
04/09/19, 1:27 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: बहुत सुंदर संदर्भ सहित
आगे भी लिखिये प्रतीक्षा है
04/09/19, 1:37 pm – Shastra Gyan Ranjana Prakash: आगे सुधाकर लिखने की कोशिश करें तो कैसा रहे?
04/09/19, 1:40 pm – Abhinandan Sharma: अभी नहीं ! सुधाकर जी उसमें हाथ आजमायें, जो वो पढ़ चुके हैं | जो नहीं पढ़ा है, उसमें कोशिश नहीं करनी चाहिए 😌
04/09/19, 2:12 pm – Abhinandan Sharma: पूरा लेख – नास्तिक

मेरे एक मित्र ने नास्तिकता पर एक पोस्ट की | उसमें नास्तिक होने की एक परिभाषा उन्होंने दी | आजकल वैसे भी सोशल मीडिया पर ये सबसे आम टॉपिक है | मैंने कहा कि वो परिभाषा गलत है | उनकी दी हुइ परिभाषा के अनुसार, नास्तिक लोग, किसी स्पष्ट प्रमाण के अभाव में, ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते हैं |

मैं बार बार कहता हूँ, कि किसी भी बात को लिखने और कहते समय आपको ये पता होना चाहिए कि आप क्या कह और लिख रहे हैं | इसीलिए पढ़ना चाहिए, बहुत पढना चाहिए वरना बिना पढ़े लिखे लोग, मत (मनमानी बात) तो बना सकते हैं लेकिन जब बात तर्क की आएगी तो मुंह की खायेंगे | जब हम लिखते हैं कि किसी प्रमाण के अभाव में तो हमें पता होना चाहिए कि प्रमाण क्या होता है ? किसे प्रमाण कहते हैं ? ईश्वर की बात तो बाद में करेंगे, पहले ये तो पता चले कि जिस प्रमाण के बेसिस पर हम उस ईश्वर को ढूँढने चले हैं, वो प्रमाण क्या होता है ?

प्रमाण शब्द बनता है, प्रमा से | अब प्रमा माने क्या ? प्रमा माने होता है, कोई चीज जैसी है, वैसे ही उसका ज्ञान प्राप्त होना | एक तरह से जो सत्य है, उसका ज्ञान होना, ये प्रमा है | ये भैंस है, काली है, दो सींग है, चार पैर है, दूध देती है, मुझे दिख भी रही है – ये प्रमा है | अप्रमा इसका ठीक उल्टा होता है, जो दीखता हो, पर हो नहीं | दुसरे शब्दों में कहें तो – भ्रम | जैसे मृग मरीचिका | रेगिस्तान में जायेंगे तो दूर पानी दिखेगा तो सही, पर होगा नहीं | जैसे गर्मी में कई बार, सड़क पर पेड़ की छाया, दूर से पानी जैसी दिखती है | ये अप्रमा है | रस्सी में सांप और साप में रस्सी का भ्रम, अप्रमा है | वो दीखता है कुछ और, पर होता है कुछ और | बिना कारण के कार्य नहीं हो सकता है (नोट, ये बहुत इम्पोर्टेन्ट लाइन है, इस अकेली लाइन पर १० पेज की व्याख्या लिखी जा सकती है और इसको समझने के लिए, बहुत पढने की आवश्यकता है) इसी प्रकार, बिना प्रमाण के प्रमा नहीं हो सकती है |

अब फिर से वापिस आते हैं प्रमाण पर | प्रमाण क्या है ? – “प्रमाता येनार्थे प्र्मि्णोंति तत् |” अर्थात जिस साधन के द्वारा प्रमाता (जानने वाले को) को प्रमेय (सम्बंधित विषय) का ज्ञान होता है, वो प्रमाण कहलाता है | जैसे तराजू से किसी भी वस्तु के भार का ज्ञान होता है, वैसे ही प्रमाण से, किसी भी विषय के सत्य होने का मूल्यांकन किया जाता है | प्रमाण कितने प्रकार का होता है ? किसको माने कि वो प्रमाण है ? ये जानना आवश्यक है, तब तो आप ईश्वर को जान पायेंगे | जब प्रमाण को ही नहीं जानेगे तो ईश्वर को कैसे जानेगे ! अतः अब आते प्रमाण कितने प्रकार का होता है |

इसमें सबसे घटिया और बेकार परिभाषा, चार्वाक ने दी | जिसे आजकल लोग मानते हैं | चार्वाक कहता है, जो दिखाई देता है, वही प्रमाण होता है | यही परिभाषा आजकल ज्यादातर खुद को नास्तिक मानने वाले लोग मानते हैं | जो दिखाई नहीं देता, वो नहीं होता | लेकिन दिखाई तो हवा भी नहीं देती , लेकिन हवा तो है | पत्ते उड़ते हैं, हम सांस लेते हैं, धुल उडती है, आंधी आती है तो हम कहते हैं कि हवा है पर दिखाई नहीं देती | दिखाई तो परमाणु भी नहीं देता, इलेक्ट्रान भी नहीं देता, लेकिन वैज्ञानिकों ने इनको बिना देखे ही, थ्योरी बेस (तर्क और प्रमाण के आधार पर) पर माना कि ये हैं | (उठा कर इनकी खोज का इतिहास पढ़ लें) | मान लीजिये आप किसी जंगल से जा रहे हैं, आपने सुन रखा है कि जंगल में शेर है | अब अगर आपको शेर की दहाड़ सुनाई दे तो भी क्या आप नहीं मानेंगे कि शेर है ? यहाँ आकर चार्वाक का सिद्धांत फेल हो जाता है और हमें वापिस आना पड़ता है, तर्कशास्त्र /प्रमाणशास्त्र के रचियता गौतम ऋषि के पास |

उनके अनुसार, प्रमाण चार प्रकार के होते हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द |

इसके आगे – मान लीजिये, किसी जंगल में बाघ है, ये ज्ञान आपको ४ प्रकार से हो सकता है |

१. अपनी आँख से बाघ को देखकर – ये प्रत्यक्ष प्रमाण हुआ |
२. मान लीजिये कि आप बाघ को देखते नहीं है लेकिन उसके गुर्राने की आवाज आपको सुनाई देती है, इससे आपको निश्चित हो जाता है कि जंगल में बाघ है | यह अनुमान प्रमाण है |

  1. मान लीजिये कि आपने बाघ को पहले कभी देखा नहीं है, लेकिन इतना सुना है कि वो चीते के समान होता है, अब आपको जंगल में ऐसा जंतु विशेष दिखाई देता है, जो देखने में चीते से मिलता जुलता है तो भी आपको बाघ के होने का ज्ञान हो जाएगा | इसे उपमान प्रमाण कहते हैं |
    ४. अगर कोई जानकार और विश्वस्त आदमी जिसने अपनी आँखों से जंगल में बाघ को देखा है, आपसे आकर कहे तो बिना देखे और अनुमान किये भी, आपको जंगल में बाघ के होने का ज्ञान प्राप्त हो जाएगा | इसे शब्द प्रमाण कहते हैं |

अतः ये समझना कि केवल आँखों से देखना ही प्रमाण है, ये बचकानी और कम जानी हुई बात है | प्रमाण और भी प्रकार के होते हैं किन्तु इतना काफी है, ये समझने के लिए, कि कोई चीज, भले ही दीखे या न दिखे, हो सकती है | ऐसे ही ईश्वर और आत्मा को जानने के लिए भी बहुत से प्रमाण उपलब्ध हैं | बशर्ते कि आप जानते हों, क्या प्रमाण है और क्या नहीं है | केवल सनातन धर्म में ही ये ख़ास बात है कि यहाँ तर्कशास्त्र/प्रमाणशास्त्र नामक ग्रन्थ लिखा गया (अन्य धर्मों की भांति केवल कहा नहीं गया कि एक परम शक्ति होती है, एक soul होती है, एक ईश्वर होता है, बल्कि तर्कों से उसे सिद्ध भी किया गया है |) जिसमें बाकयदा ईश्वर और आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म को, प्रमाणों से सिद्ध किया गया है | जिसने तर्कशास्त्र नहीं पढ़ा है, उसे बच्चा कहा गया है | क्योंकि बच्चे का बालसुलभ मन तर्क-वितर्क नहीं कर पाता | अतः अगली बार जब आप कहें कि नास्तिक कौन है तो बताइयेगा कि न+अस्ति = नास्तिक | न माने नहीं और अस्ति माने है | क्या है और क्या नहीं है ?

जो ये मानता है कि जो मैं जानता हूँ, उसके आगे भी कुछ है – वो आस्तिक है | अस्ति+क = है + प्रत्यय | जो ये मानता है कि जो मैं जानता हूँ, उसके आगे कुछ नहीं है | जो मेरी नोलेज है, thats all. उसके आगे कुछ नहीं है, वो नास्तिक है – न+अस्ति | आस्तिक आदमी सदैव पॉजिटिव होगा, क्योंकि वो ये मानता है कि अभी बहुत कुछ है, जो मुझे नहीं पता है और नास्तिक आदमी सदैव नेगेटिव होगा क्योंकि वो ये मानता ही नहीं कि मेरी नोलेज के आगे भी कुछ है | जो ये कहता है कि सितारों के आगे जहाँ और भी है – वो आस्तिक है | कोई वैज्ञानिक, बिना आस्तिक हुए, वैज्ञानिक हो ही नहीं सकता क्योंकि उसे ये मानना पड़ेगा कि जो अभी तक खोज हुई है, उसके आगे भी कुछ है |

जब वेद लिखे गए तो ऋषियों ने कहा कि जो हम जानते हैं, उसके आगे वेद हैं और नास्तिकों ने कहा, वेद कुछ भी नहीं है केवल कागजों की पोटली है | अतः वेदों को मानने वाले, और ये समझने वाले कि हमें जो पता है , उसके आगे भी संभावना है, ज्ञान की, वो आस्तिक हैं और जो वेदों को नहीं मानते, जो कहते हैं कि जो हमें पता है, वही अंतिम सत्य है, वो नास्तिक हैं |
04/09/19, 2:26 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
04/09/19, 2:42 pm – Pitambar Shukla: 🙏🙏
04/09/19, 2:50 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सुन्दर और सुलझा हुआ लेख।
04/09/19, 2:52 pm – Shastra Gyan Ranjana Prakash: 😃,एक सत्र में यह चर्चा हुई थी।
04/09/19, 2:56 pm – Abhinandan Sharma: जी !
04/09/19, 5:50 pm – FB Rajesh Singhal Ghaziabad Shastra Gyan: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻अद्भुत
04/09/19, 11:09 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १४३,१४४

विष्यन्दि लवणं सर्वं सूक्ष्मं सृष्टमलं मृदु॥१४३॥

वातघ्नं पाकि तीक्ष्णोष्णम् रोचनं कफपित्तकृत्। सैन्धवं तत्र सस्वादु वृष्यं हृद्यं त्रिदोषनुत्॥१४४॥

लघ्वनुष्णं दृशः पथ्यमविदाह्यग्निदीपनम्।

फलों का वर्णन करने के बाद अब यहां से विविध प्रकार के लवणों का वर्णन प्रारम्भ होता हैं।

लवण-सामान्य के गुण- ये विष्यन्दनकारक अर्थात अभिष्यन्दि, सूक्ष्म, मल को सरकाने वाले, मृदु, वातविकारनाशक, भोजन को पचाने वाले, तीक्ष्ण, उष्ण, रुचि को बढ़ाने वाले और कफ तथा पित्तकारक होते हैं।

वक्तव्य- सूक्ष्म लवण(नमक) छोटे से भी छोटे स्रोतों मे प्रवेश कर जाते है, यही कारण है कि नाड़ी व्रणविनाशक मलहमों मे घृत, मधु तथा लवण आदि द्रव्यों का प्रमुख रूप से प्रयोग होता है।
पाकि— बनते हुए भोजन(दाल आदि) को शीघ्र गला देता है, पकने के बाद आहार को पचाता है और व्रणशोथ(फोड़े) को भी पका देता है।

सेंधानमक के गुण- सभी नमकों मे सेंधानमक तीक्ष्णता की कमी के कारण कुछ मधुर, वीर्यवर्द्धक, हृदय के लिए हितकर, त्रिदोषशामक, लघु , कुछ उष्णवीर्य वाला, नेत्रों के लिए हितकारी, अविदाही(यह विदाहकारक नहीं होता) होने पर भी जठराग्नि को प्रदिप्त करता है।
04/09/19, 11:56 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: उत्तम
04/09/19, 11:56 pm – Shastra Gyan Rajesh Pandey Ankleshwar: ।ॐ। शिव स्वरोदयः ।ॐ।

सप्त नव त्रयः पञ्च वारान्सङ्गस्तु सूर्यभे।
चन्द्रे द्विचतुःषट्कृत्वा वश्या भवति कामिनी।२८२।

सूर्यचन्द्रौ समाकृष्य सर्वाक्रान्त्याSधरोठयोः।
महापद्म मुखं स्पृष्ट्वा बारम्बारमिदं चरेत्।२८३।

आप्राणामिति पद्मस्य यावन्निद्रावशं गता।
पश्चाज्जागृति वेलायां चोष्यते गलचक्षुषी।२८४।

अनेन विधिना कामी वशयेत्सर्वकामिनीः।
इदं न वाच्यमस्मिन्नित्याज्ञा परमेश्वरि।२८५।

अर्थ- सूर्य स्वर के प्रवाह काल में यदि पुरुष का किसी स्त्री के साथ पाँच बार, सात बार या नौ बार संयोग हो अथवा चन्द्र स्वर के प्रवाह काल में दो बार, चार बार या छः बार संयोग हो, तो वह स्त्री सदा के लिए उस पुरुष के वश में होती है।२८२।

पुरुष के सूर्य स्वर तथा चन्द्र स्वर सम हों, तो उस समय पुरुष को अपनी साँस अन्दर खींचकर अपना पूरा ध्यान स्त्री के निचले होठ पर केन्द्रित करना चाहिए और जैसे ही सूर्य स्वर प्रधान हो, स्त्री के चेहरे को बार-बार स्पर्श करना चाहिए।२८३।

जब स्त्री गहरी निद्रा में सो रही हो, उस समय पुरुष को उसके होठों को बार-बार उसके जगने तक चुम्बन करना चाहिए और उसके बाद उसके नेत्रों और गरदन का चुम्बन करना चाहिए।२८४।

हे पार्वती, इस प्रकार प्रेमी समस्त कामिनियों को अपने वश में कर सकता है। स्त्रियों को वश में करने का अन्य कोई उपाय नहीं है।२८५।
05/09/19, 12:22 am – +91 98259 18791: अदभुत, श्रीमान्!! जेसे आपने बताया, ईश्वर और आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म को प्रमाणो से सिध्द किया गया है। कृपया ईस पर भी सविस्तार लेख दीजीए।
05/09/19, 4:09 am – Abhinandan Sharma: महोदय, इसके ऊपर 300 पेज की तर्कशास्त्र की पुस्तक है, उसे पढ़ना पड़ेगा जो यहा व्हाट्सएप्प पर डालना सम्भव नहीं है अतः क्षमा ।
05/09/19, 6:52 am – Abhinandan Sharma: You deleted this message
05/09/19, 6:53 am – Abhinandan Sharma:
05/09/19, 6:54 am – Abhinandan Sharma:
05/09/19, 6:55 am – Abhinandan Sharma: गाकर देखिये, बड़ा अच्छा लगेगा 😊
05/09/19, 6:55 am – Abhinandan Sharma: ये एक दूसरे से लिंक का आईडिया बड़ा अच्छा है, तुरन्त पहले के श्लोक भी मिल जाए रहे हैं 👍
05/09/19, 6:56 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सुन्दर, पढ़ते समय मैंने भी गाया था, बहुत ही बढ़िया लगा 🙂
05/09/19, 7:04 am – Abhinandan Sharma: इसमें पहली लाइन में मात्रा पूरी नहीं हो रही क्योंकि गाने में असुविधा है, क्या आप चेक करेंगे, पहली लाइन में कोई टंकण त्रुटि तो नहीं है !
05/09/19, 7:06 am – Ashu Bhaiya: “रा” एक्स्ट्रा है |
05/09/19, 7:06 am – Ashu Bhaiya: न सांख्यं न शैवं न तत्पाञ्चरात्रं
05/09/19, 7:07 am – Abhinandan Sharma: सुधाकर जी, इससे क्या बात समझ आयी ?
05/09/19, 7:09 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: Keypad कभी कभी धोखा दे देता है। 🙂
05/09/19, 7:10 am – Abhinandan Sharma: ध्यान देने वाली बात है कि यदि आप किसी भी छंद को गाते हैं तो आप उस श्लोक में मिलावट, टंकण त्रुटि, बिना संस्कृत जाने भी पकड़ सकते हैं । है ना कमाल की बात 😋
05/09/19, 7:12 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: ये तो सही कहा, अब से पढ़ने की जगह गा कर चेक करूँगा ☺
05/09/19, 7:16 am – Abhinandan Sharma:
05/09/19, 7:21 am – Abhinandan Sharma:
05/09/19, 7:26 am – Abhinandan Sharma: किसी न इस पर विचारा ?
05/09/19, 7:30 am – Abhinandan Sharma: वाह ! अतिसुन्दर । क्या ये इतनी ही है या इसके आगे भी है ?
05/09/19, 7:34 am – +91 11637: प्रभू भागवत मे इतनी ही है ,
05/09/19, 7:35 am – Abhinandan Sharma: 🙏 बड़ी जल्दी खत्म हो गयी, और होती तो पढ़ने में और मजा आता ।
05/09/19, 7:38 am – Shastra Gyan Saurabh Muzaffarpur Bihar: Sir Book ka naam bhi bata dijiye
तर्कशास्र ke basic pustak ka naam bhi bata dijiye
05/09/19, 7:46 am – Abhinandan Sharma: सोमवार शाम को पूछियेगा, तब दे पाऊंगा ।
05/09/19, 7:47 am – Shastra Gyan Saurabh Muzaffarpur Bihar: Ji
05/09/19, 5:53 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु सप्तम् श्लोक

न शास्ता न शास्त्रं न शिष्यो न शिक्षा
न च त्वं न चाहं न वाऽयं प्रपञ्चः।
स्वरूपावबोधो विकल्पासहिष्णु-
स्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।। ७ ।।

न शास्ता है, न शास्त्र है, न शिष्य है, न शिक्षा है, न तुम हो, न मैं हूँ, न यह प्रपञ्च है, स्वरूपज्ञान विकल्प का सहन नहीं करता इसलिए एक अवशिष्ट अद्वितीय शिव मैं हूँ ।

शास्ता– उपदेश करनेवाला गुरु
शास्त्र – जिसके द्वारा उपदेश किया जाता है
शिष्य – उपदेश-भाजन
शिक्षा – उपदेश-क्रिया
तुम – श्रोता
मैं – वक्ता

सब प्रमाणों के सन्निधापित देह, इन्द्रिय आदि रूप, यह प्रपञ्च परमार्थतः नहीं हैं ।
05/09/19, 6:08 pm – Abhinandan Sharma: 🙏

05/09/19, 9:17 pm – Abhinandan Sharma: https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.271983/page/n41 – Bharatiya Darshan Parichay Nyay Darshan
05/09/19, 9:24 pm – +91 11637: नारद ऋषि भगवान के हृदय हैं। सब क्रियाएँ हृदय (मन) की प्रेरणा से होती हैं।
यही कारण है कि भगवान के कार्य सिद्ध करने के लिए नारद जी कभी राक्षसों को सलाह देते हैं और कभी देवताओं को प्रेरणा करते हैं।

इस समय नारद जी भगवान् की स्तुति करते हुए आगे कार्य की सूचना करते हैं…..

कृष्ण कृष्णाप्रमेयात्मयोगेश जगदीश्वर।
वासुदेवाखिलावास सात्वतां प्रवर प्रभो।।
त्वामात्मा सर्वभूतानामेको ज्योतिरिवैधसाम्।
गूढो गुहाशयः साक्षी महापुरुष ईश्वरः।।

हे कृष्ण! हे कृष्ण! हे अपरिच्छिन्नरूप! हे योगेश्वर! हे जगदीश्वर! हे वासुदेव! हे जगन्निवास! हे यादवश्रेष्ठ! हे प्रभो! आप जीवों की भाँति परिच्छिन्न नहीं हैं, किन्तु घट-घट-व्यापी एक आत्मा हैं। जैसे कष्ठों में अग्नि रहती है वैसे ही सब प्राणियों में आप स्थित हैं, तो भी अतिगूढ़ होने के कारण आपको वे नहीं देख पाते; क्योंकि आप बुद्धिरूप गुहा में रहने वाले सबके साक्षी महापुरुष ईश्वर हैं।

आत्मनात्माश्रयः पूर्वं मायया ससृजे गुणान्।
तैरिदं सत्यसंकल्पः सृजस्यत्स्यवसीश्वरः।।

(शंका- मैं ईश्वर हूँ और सब ईशितव्य है यह कैसे जाना? समाधान-) आपको किसी साधन की आवश्यकता नहीं, आप स्वतंत्र सत्यसंकल्प और ईश्वर हैं। आप पहले अपनी मायाशक्ति से गुणों (सत्त्व, रज, तम) को उत्पन्न करते हैं, फिर उनसे संपूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।।

स त्वं भूधरभूतानां दैत्यप्रमथरक्षसाम्।
अवतीर्णो विनाशाय सेतूनां रक्षणाय च।।

वही आप राजारूपी दैत्य, प्रमथ और राक्षसों का संहार करने के लिए और धर्म मर्यादा की रक्षा के लिए प्रकट हुए हैं।।

दिष्ट्या ते निहतो दैत्यो लीलयायं हयाकृतिः।
यस्य हेषितसन्त्रस्तास्त्यजन्त्यनिमिषा दिवम्।।

इस घोड़े के रूप को धारण करने वाले केशी दैत्य को आपने अनायास मार डाला, यह अच्छा ही हुआ। जिसके हिनहिनाने से भयभीत देवता स्वर्ग को छोड़कर भाग जाते थे।।

चाणूरं मुष्टिकं चैव मल्लानन्यांश्च हस्तिनम्।
कंसं च निहतं द्रक्ष्ये परश्वोऽहनि ते विभो।।

हे प्रभो! मैं परसो चाणूर, मुष्टिक, अन्यान्य योद्धाओं, कुवलयापीड हाथी और कंस को आपके हाथ से मारे हुए देखूंगा।।

तस्यानु शंखयवनमुराणां नरकस्य च।
पारिजातपहरणमिन्द्रस्य च पराजयम्।।

इसके पश्चात् शंखासुर, कालयवन, मुर और नरकासुर का वध, पारिजातवृक्ष का हरण तथा इन्द्र की पराजय देखूँगा।।

उद्वाहं वीरकन्यानां वीर्यशुल्कादिलक्षणाम्।
नृगस्य मोक्षणं पापाद् द्वारकायां जगत्पते।।

फिर पराक्रमादि ही जिनका मूल्य है अर्थात पराक्रम से पायी हुई राजकन्याओं के साथ विवाह देखूंगा और हे जगत्पते! तदनन्तर द्वारका में राजा नृग का पाप से (गिरगिटयोनि से) छुटकारा पाना देखूँगा।।

स्यमन्तकस्य च मणेरादानं सह भार्यया।
मृतपुत्रप्रदानं च ब्राह्मणस्य स्वधामतः।।

जाम्बवती के साथ स्यमन्तक मणि को लाना और ब्राह्मण के मरे हुए पुत्रों को महाकाल से लाकर उसे देना।।

पौण्ड्रकस्य वधं पश्चात्काशिपुर्याश्च दीपनम्।
दन्तवक्त्रतस्य निधनं चैद्यस्य च महाक्रतौ।।

पौण्ड्र का वध, काशीपुरी का दहन, दन्तवक्त्र का वध, राजसूय यज्ञ में शिशुपाल का वध।।

यानि चान्यानि वीर्याणि द्वारकामावसन्भवा।
कर्ता द्रक्ष्याम्यहं तानि गेयानि कविभिर्भुवि।।

और द्वारका में रहते हुए पृथ्वी पर कवियों द्वारा गाये जाने योग्य आप जो-जो पराक्रमपूर्ण कार्य करेंगे उन सबको मैं देखूंगा।।

अथ ते कालरूपस्य क्षपयिष्णोरमुष्य वै।
अक्षौहिणीनां निधनं द्रक्ष्याम्यर्जुनसारथेः।।

फिर पृथ्वी के भार को हरने वाले कालरूप आपको अर्जुन के सारथि के रूप में अक्षौहिणी सेनाओं का संहार करते हुए देखूँगा।।

विशुद्धविज्ञानघनं स्वसंस्थाया समाप्तसर्वार्थममोघवाञ्छितम्।
स्वतेजसा नित्यनिवृत्त
मायागुणप्रवाहं भगवन्तमीमहि।।

(इस प्रकार विज्ञापन करके फिर दो श्लोक से भगवान को नमस्कार करते हैं-) केवल शुद्धज्ञानमूर्ति परमानन्द रूप, अपनी स्थिति से आप्तकाम, सत्यसंकल्प तथा अपनी चेतनशक्ति से रची हुई माया के कार्यरूप गुणप्रवाह से सदा निवृत्त आपको नमस्कार है।।

त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम्।
क्रीडार्थमद्यात्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि
धुर्यं यदुवृष्णिसात्वताम्।।

आप ईश्वर हैं और दूसरे के वश में नहीं रहने वाले हैं। अतएव आपने अपने अधीन रहने वाली माया से संपूर्ण विशेषों की (यादवों की) रचना की है और इस समय क्रीड़ा के लिए मनुष्य शरीर धारण किया है। मैं, यादव, वृष्णि और सात्वतों में सर्वश्रेष्ठ आपको नमस्कार करता हूँ।।
05/09/19, 11:09 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १४५,१४६

लघु सौवर्चलं हृद्यं सुगन्ध्युग्दारशोधनम्॥१४५॥

कटुपाकं विबन्धघ्नं दीपनीयं रुचिप्रदम्। ऊर्ध्वाधःकफवातानुलोमनं दीपनं विडम्॥१४६॥

विबन्धानाहविष्टम्भशूलगौरवनाशनम्।

सौवर्चलनमक के गुण- इसी को सज्जीखार कहते है। यह लघु, हृदय के लिए हितकर, सुगन्धित, उद्गार(डकार) को शुद्ध करने वाला, विपाक मे कटु, मल-मूत्र की रुकावट को हटाने वाला, जठराग्नि को प्रदिप्त करने वाला तथा रुचिकारक होता है।

विड(विरिया) नमक के गुण- इसका सेवन करने से कफ ऊपर की ओर से निकलने लगता है और अपान वायु नीचे की ओर से निकलता है अर्थात यह कफ एवं वायु की गति का अनुलोमन करता है, अग्नि को प्रदिप्त करता है, मल-मूत्र की रुकावट, आनाह, विष्टम्भ(आंतो की गति की रुकावट को), शूल तथा भारीपन का नाश करता है।

वक्तव्य- सुश्रुत ने इसे कफ का अनुलोमक नहीं कहा है, केवल वातानुलोमक ही कहा है। देखें—४६/३१६। आचार्य डल्हण कहते है— यह नमक स्रोतों की शुद्धि करता है, अतएव रुका हुआ वातदोष अनुलोम हो जाता है

कालानमक निर्माण विधि- ४० सेर सेंधानमक, हरड़ के छिलके, आंवला का सूखा गूदा और सज्जीखार— ये द्रव्य प्रत्येक आधा-आधा सेर लेकर किसी लोहे या मिट्टी के पात्र में लेकर पकाते हैं। जब हरड़ और आंवला गलकर मिल जाता है तो शीतल होने पर नमक निकाल लिया जाता है। इसी को मराठी में ‘ पादेलोण’ कालानमक कहते है।

सौवर्चल लवण- कुछ विद्वानों ने इसे कालालवण माना है। फारसी में सौंचरनमक को ही नमकस्याह कहते है। कुछ लोगों का मत है कि सौवर्चल नमक गंधरहित होता है। वह “कालालवण” है। डा॰ देसाई कहते है कि रसग्रन्थों मे सौवर्चल शोरे को कहते है। श्री द.अ. कुलकर्णी जी कहते है— जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त होता है उसे लुणिया मिट्टी कहते है, इसमें कुछ मात्रा नमक की भी रहती है। शोरा के साथ प्राप्त होने के कारण इसे सौंचर या सौवर्चल कहते है। अस्तु।
06/09/19, 7:51 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु अष्टम् श्लोक

न जागन्न मे स्वप्नको वा सुषुप्तिः
न विश्वो न वा तैजसः प्राज्ञको वा।
अविद्यात्मकत्वात्त्रयाणां तुरीय-
स्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। ८ ।।

न मेरा जागरण है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति है, न मैं विश्व हूँ, न तैजस हूँ, न प्राज्ञ । ये तीनों अविद्या के कार्य हैं, अतः इनमें चतुर्थ, एक, अवशिष्ट, अद्वितीय, शिव मैं हूँ ।
06/09/19, 7:51 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: इस बार गाकर check कर लिया है श्लोक को 🙂
06/09/19, 8:08 pm – Abhinandan Sharma: शास्त्र ज्ञान का सत्र (बड़ों के लिये) कल दोपहर 12 बजे से आदित्य वर्ल्ड सिटी, गाजियाबाद में होगा ।
06/09/19, 9:09 pm – +91 11637: कुन्तीकृत स्तुति
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नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम्।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्।

कुन्ती भगवान की बुआ थीं, अतः रिस्ते में और अवस्था में बड़ी थीं तो उन्होंने क्यों नमस्कार किया?
समाधान- आप प्रकृति से पर आद्यपुरुष हैं, आपको नमस्कार है; क्योंकि आप ईश्वर हैं (प्रकृति के नियन्ता हैं) और परिपूर्ण होने से सकल जीवों के भीतर और बाहर व्याप्त हैं तथापि आपको कोई नहीं देख सकता है।।

मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम्।
न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाट्यधरो यथा।।

(इसका हेतु कहती हैं-) आप मायारूप परदे से ढके हुए हैं, इन्द्रियों से नहीं जाने जाते हैं, इस कारण अपरिच्छिन्न हैं। जिस प्रकार साधारण पुरुष बहुरूपियों के स्वरूपों को नहीं पहचान सकते हैं कि वे एक ही व्यक्ति के हैं- या भिन्न-भिन्न व्यक्ति के। वैसे ही देहाभिमानी पुरुष आपको नहीं देख सकते। (अतः मै भक्तियोग को न जानने वाली मूढ नारी केवल आपको प्रणाम करती हूँ)।।

तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्।
भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः।।

तथा आत्मानात्म विचार करने वाले मननशील और रागादि से निवृत्त पुरुष भी अपनी अलौकिक महिमा से आपको नहीं देख सकते हैं। (जब उनकी यह दशा है) तो भक्तियोग का आचरण करने के लिए या भक्तियोग का स्थापन करने के लिए अवतीर्ण हुए आपको हम स्त्रियाँ कैसे जान सकती हैं?।।

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः।।

(ज्ञान और भक्तियोग करने में अपनी अशक्ति बतलाकर केवल नमस्कार ही करती हैं-) आप कृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नन्दगोपकुमार, गोविन्द को नमस्कार है।।

नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने।
नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाङ्घ्रये।।

जिनके नाभि में पंकज है, जो पकंजों की माला धारण करने वाले हैं, जिनके पंकज के समान प्रसन्न नेत्र हैं और जो पंकज से अंकित चरण वाले हैं, ऐसे आपको नमस्कार है।।

यथा हृषीकेश खलेन देवकी
कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता।
विमोचिताहं च सहात्मजा विभो त्वयैवनाथेनमुहुर्विपदग्णात्।।

(अब यह कहती हैं कि आपकी मेरे ऊपर अपनी माता से भी अधिक प्रीति है; क्योंकि) हे हृषीकेश! आपने जिस प्रकार दुष्ट कंस के बन्दीगृह में पुत्रशोक से चिरसन्तप्त देवकी को विपत्ति से छुड़ाया, उसी प्रकार हे विभो! पुत्रों के साथ मेरी आपही ने बार-बार विपत्तियों से रक्षा की है।

विषान्महाग्नेः पुरुषाददर्शनादसत्सभाया
वनवासकृच्छ्रतः।
मृधे मृधेऽनेकमहारथास्रतो द्रौण्यस्रतश्चास्म हरेऽभिरक्षितः।।

(अपनी विपत्तियों को गिनती हैं-) हे हरे! दुर्योधन द्वारा खिलाये विष से, लाह के घर में लगी हुई अग्नि से, हिडम्बादि राक्षसों के भयानक दर्शन से, द्यूतस्थान से, वनवास के दुखों से, प्रत्येक युद्ध में भीष्म आदि के अस्त्रों से और अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से आपने सदा हमारी रक्षा की है।।

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।

हे जगद्गुरो! हमें सर्वत्र ही बार-बार विपत्तियाँ प्राप्त हों; क्योंकि उस समय आपका दर्शन मिलता है जिससे फिर जन्म-मरणरूप संसार प्राप्त नहीं होता।।

जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान्।
नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्।।

(अब कहती हैं कि संपत्तियाँ तो मोक्षमार्ग में बाधा डालती हैं-) जिसका मद उत्तम कुल में जन्म लेने से, ऐश्वर्य से, विद्या से और संपत्ति से बढ़ गया है, वह पुरुष धन आदि में आसक्त न रहने वाले पुरुषों को प्रत्यक्ष दर्शन देने वाले आपके राम, कृष्ण, गोविन्दादि नामों का उच्चारण नहीं कर सकता।।

नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये।
आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः।।

जिसके अकिञ्चन (भक्त) ही सर्वस्व हैं, जिनकी धर्म, अर्थ और काम-विषयिणी वृत्तियाँ निवृत्त हो गयी हैं, जो आत्मा में रमण करने वाले हैं, जो रागादि दोषों से रहित हैं और कैवल्यपद (मोक्ष) के देने को समर्थ हैं, ऐसे आपको मैं नमस्कार करती हूँ।।

मन्ये त्वां कालमीशानमनादिनिधनं विभुम्।
समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः।।

शंका- मैं तो देवकी का पुत्र हूँ, इस प्रकार मेरी स्तुति क्यों करती हो?
समाधान- मैं आपको कालरूप समझती हूँ, देवकी का पुत्र नहीं समझती क्योंकि आप सबके नियन्ता, आदि अंत रहित, विभु, सर्वत्र समभाव रखने वाले हैं (मैं तो अर्जुन का सारथी हूँ मुझ में समभाव कैसे बन सकता है?
समाधान-प्राणियों में जो कलह होता है वह उनकी विपरीत बुद्धि से होता है, उसका आप से कोई संबंध नहीं है।।

न वेद कश्चिद्भगवंश्चिकीर्षितं
तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम्।
न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद्-
द्वेष्यश्च यस्मिन्विषमा मतिर्नृणाम्।।

हे भगवान! आपका कोई प्रिय या शत्रु नहीं है इससे मनुष्यों में आपकी विषम बुद्धि नहीं है (अर्थात आप पाण्डवों के मित्रों पर अनुग्रह और शत्रुओं का निग्रह नहीं करते)। अवतार लेकर मनुष्यों के अनुसार आपके कर्म करने पर भी यह समझ में नहीं आता कि आपके मन में क्या करने की इच्छा है?।।

जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्त्तुरात्मनः।
तिर्यङ्नृषिषु यादस्सु तदत्यन्तविडम्बनम्।।

हे विश्वात्मन! सबके आत्मा, अज और अकर्ता आपका पशुओं में वाराहादि रूप से, मनुष्यों में रामादि रूप से, ऋषियों में वामनादि रूप से, जलचरों में मत्स्यादि रूप से जन्म लेना और तत्संबंधी कर्म करना विडम्बना मात्र ही तो है, अर्थात आपका शुद्ध स्वरूप आत्मा है और कर्म केवल लीलामात्र है।।

गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम ताव-
द्या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसभ्रमाक्षम्।
वक्त्रं निनीय भय भावनया स्थितस्य
सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति।।

आपका मनुष्यों की नकल करना अत्यंत आश्चर्यजनक है, आपने जिस समय यशोदा का अपराध किया था अर्थात दही के बर्तन फोड़ डाले थे और यशोदा ने आपको बाँधने के लिए रस्सी ली थी उस समय आपने जो अपनी दशा उसको दिखायी थी वह मुझे अत्यंत मोह में डालती है। यद्यपि आपसे भय भी डरता है तथापि उस समय भय के मारे आपने मुँह नीचा किया था और आपके नेत्र कज्जलसहित अश्रुजल से भरे व्याकुल हो रहे थे।।

केचिदाहुरजं जातं पुण्यश्लोकस्य कीर्त्तये।
यदोः प्रियस्यान्ववाये मलयस्येव चन्दनम्।।

आप दुर्जय हैं, क्योंकि जगत् को मोहित करते हैं इस हेतु आपके जन्म के अनेक कारण कहे जाते हैं, इसी विषय का चार श्लोकों से प्रतिपादन करती हैं,कोई कहते हैं कि जैसे मलयगिरि की कीर्ति बढ़ाने के लिए चन्दन उत्पन्न होता है, वैसे ही अजन्मा होकर भी आपने पुण्यकीर्ति युधिष्ठिर का यश फैलाने के लिए यदु के वंश में जन्म लिया है।।

अपरे वसुदेवदस्य देवक्यां याचितोऽभ्यगात्।
अजस्त्वमस्य क्षेमाय वधाय च सुरद्विषाम्।।

दूसरे कहते हैं कि अजन्मा होकर भी आपने देवकी और वसुदेव जी की पूर्व प्रार्थना को पूर्ण करने के लिये, वसुदेव जी की पत्नी देवकी के गर्भ से जन्म लिया।।
( देवकी और वसुदेव जी पूर्व जन्म में पृश्नि और सुतपा थे। उन्होंने प्रार्थना की थी कि भगवान हमारे पुत्र हों। इसीलिए भगवान ने इनके यहाँ पुत्ररूप से जन्म लिया )

भारावताराणायान्ये भुवो नाव इवोदधौ।
सीदन्त्या भूरिभारेण जातो ह्यात्मभुवार्थितः।।

कोई कहते हैं कि दैत्यों के अतिभार से समुद्र में डूबती हुई नाव के समान क्लेश पाती हुई पृथ्वी का भार हरने के लिए ब्रह्मा जी की प्रार्थना से भगवान ने अवतार लिया। (यह अवतार का प्रधान कारण प्रतीत होता है)।।

भवेऽस्मिन् क्लिश्यमानानामविद्याकामकर्मभिः।
श्रवणस्मरणार्हाणि करिष्यन्निति केचन।।

और कोई दूसरे कहते हैं कि आप ऐसे चरित्र करने के लिए जन्म लेते हैं जिनका वे पुरुष श्रवण और स्मरण करें जो अविद्या काम कर्म से दुख पा रहे हैं (परमानन्द स्वरूप का अज्ञान अविद्या है उससे काम (देहाभिमान) होता है और तब मनुष्य शुभाशुभ कर्म करता है)।।

श्रृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः
स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं
भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम्।।

जो पुरुष आपके चरित्रों का सर्वदा श्रवण, गान, कीर्तन, स्मरण और आदर करते हैं, वे ही भय के प्रवाह से (जन्म-मरण रूप प्रवाह से) बचाने वाले आपके चरण कमलों का शीघ्र दर्शन पाते हैं।।

अप्यद्य नस्त्वं स्वकृतेहित प्रभो
जिहाससि स्वित्सुहृदोऽनुजीविनः।
येषां न चान्यद्भवतः पदाम्बुजा-
त्परायणं राजसु योजितांहसाम्।।

हे प्रभो! हे भक्तकामद! आपकी ही कृपा से जीवित रहने वाले भक्तों को, जो राज्य छीन लेने के कारण झंझट में पड़े हैं और जिनको आपके चरण कमल से अन्य का भरोसा नहीं है, आप अभी मत छोड़िये।।

के वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः।
भवतोऽदर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः।।

यदि हमारे ऊपर आपका कृपाकटाक्ष न हो तो ख्याति और समृद्धि से प्रसिद्ध होकर भी पाण्डव यदुओं के सहित दीन ही हैं, जैसे कि इन्द्रियों के स्वामी जीव के देह से निकल जाने पर नेत्र आदि इन्द्रियाँ निरर्थक हो जाती हैं।।

नेयं शोभिष्यते तत्र तथेदानीं गदाधर।
त्वत्पदैरंकिता भाति स्वलक्षणविलक्षितैः।।

हे गदाधर! इस समय यहाँ की भूमि आपके वज्र, अंकुशादि चरणचिह्नों से जैसी विलक्षण शोभा पा रही है, आपके द्वारका चले जाने पर वैसी शोभित नहीं होगी।।

इमे जनपदाः स्वृद्धाः सुपक्वौषधिवीरुधः।
वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षितैः।।

आपके दर्शनमात्र से हमारे देश की व्रीहि-यवादिक औषधियाँ और द्राक्षादि लताएँ उत्तम प्रकार से हुई हैं। हमारे देश, वन, नदी और समुद्र सकल संपत्तियों से वृद्धि पा रहे हैं।।

अथ विश्वेश विश्वात्मन्विश्वमूर्ते स्वकेषु मे।
स्नेहपाशमिमं छिन्धि दृढ़ पाण्डुषु वृष्णिषु।।

हे विश्ववेश! हे विश्वात्मन्! हे विश्वमूर्ते! यादव और पाण्डवों के प्रति मेरे स्नेहरूपी दृढ़ पाश को काट डालिये। (भाव यह है यदि आप द्वारका गये तो पाण्डवों को दुख होगा, यदि न गये तो यादवों को दुख होगा, इस कारण यह प्रार्थना है)।।

त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत्।
रतिमुद्वहतादद्धा गंगेवौघमुदन्वति।।

हे मधुपते! जैसे गंगा जी सब रूकावटों को हटाती हुई समुद्र की ओर बहती जाती हैं, इसी प्रकार मेरी बुद्धि किसी दूसरे विषय में न लगकर निरन्तर अनन्य भाव से आपमें अखण्डित प्रीति करे।।

श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिध्रु-
ग्राजन्यवंशदहनानपरवर्गवीर्य।
गोविन्द गोद्विजसुरार्तिहरावतार
योगेश्वरखिलगुरोभगवन्नमस्ते।।

हे श्रीकृष्ण! हे अर्जुन सखा! हे यादवों में श्रेष्ठ! हे पृथ्वी के भारभूत दुष्ट राजाओं के वंश को अग्नि के समान ध्वस्त करने वाले! हे अक्षीणप्रभाव! हे गोविन्द! हे गौ, ब्राह्मण और देवताओं का दुख दूर करने के लिए अवतार धारण करने वाले! हे योगेश्वर! हे अखिलगुरो! हे भगवान! आपको नमस्कार है।।
07/09/19, 4:48 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
श्री मनुस्मृति
🙏 द्वितीय अध्याय🙏

आचार्ये तु खलु प्रेते गुरुपुत्रे गुणान्विते ।
गुरुदारे सपिण्डे वा गुरुवद्वृत्तिं आचरेत् । । २.२४७ । ।

एतेष्वविद्यमानेषु स्थानासनविहारवान् ।
प्रयुञ्जानोऽग्निशुश्रूषां साधयेद्देहं आत्मनः । । २.२४८ । ।

एवं चरति यो विप्रो ब्रह्मचर्यं अविप्लुतः ।
स गच्छत्युत्तमस्थानं न चेह जायते पुनः । । २.२४९ । ।

अर्थ
गुरु के मर जाने पर विद्वान गुरुपुत्र,गुरुस्त्री या गुरु के सहोदर भाई आदि हो तो उनको गुरु समान समझना चाहिए।।
और ये मौजूद ना हो तो गुरुस्थान में उनकी अग्नि की सेवा करें और उपासना से निज देह को ब्राह्मालय के लायक किया करें।।

 इस प्रकार जो ब्राह्मण अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करता है वह परमात्मा में लय को पाकर फिर इस लोक में जन्म नही पाता ।।

🙏
दूसरा अध्याय समाप्त 🙏
07/09/19, 12:00 pm – Abhinandan Sharma: शास्त्र ज्ञान सत्र 38 लाइव – थोड़ी देर में शुरू होगा |

https://youtu.be/XxyoqZCe3N0
07/09/19, 12:21 pm – Shastra Gyan Saurabh Muzaffarpur Bihar: Thank u sir
09/09/19, 11:45 am – ABKG Shastragyan Avnish Dubey, Bharuch joined using this group’s invite link
09/09/19, 7:40 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु नवम् श्लोक

अपि व्यापकत्वाद्धितत्वप्रयोगात्
स्वतःसिद्धभावादनन्याश्रयत्वात् ।
जगत्तुच्छमेतत्समस्तं तदन्यत्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ।। ९ ।।

साक्षी से अन्य समस्त जगत तुच्छ है । साक्षी तुच्छ नहीं है, क्योंकि वह व्यापक है, पुरुषार्थरूप है, स्वतःसिद्ध भाव पदार्थ है, स्वतंत्र है । एक अवशिष्ट, अद्वितीय, शिव मैं हूँ ।
10/09/19, 8:59 am – Ravi CA Known: द्वारे ठाडे हैं द्विज बामन।
चारों वेद पढत मुख आगर,
अति सुकंठ-सुरगावन ।
बानी सुनी बलि पूछन लागे,
इहा बिप्र कत आवन ?
चरचित चंदन नील कलेवर,
बरषत बूँदनि सावन।
चरन धोई चरनोदक लीनौ,
कह्यौ बिप्र मन-भावन ।
तीनि पँड बसुधा हाँ चाहोँ,
परनकुटी कोँँ छाबन ।
इतनौ कहा बिप्र तुम माँग्यौ,
बहुत रतन देउँ गावँन।
” सूरदास ” प्रभु बोलि,छले बलि,
धर्यौ पीठी पग पावन ।।५।।
…….भावार्थ….

बलि राजा के द्वार पर,श्रीवामन भगवान ब्राह्मण रुप में,प्रभु खडे हैं।
वे मुख से चार वेद अति मधुर कंठ से सस्वर उच्चारित कर रहे हैं। उनकी वाणी सुन,बलि पूछने लगे,आप यहाँ कैसे पधारे ?
प्रभु का श्याम बदन चंदन से लिप्त है जो श्रावण की बूंद समान बरस रहा हैं,बलिने उनके चरण धोकर चरणामृत लिया-वह कहा कुछ मांगो । बलि का यह कहने पर प्रभुने बलि से त्रण पग भूमि माँ दो,जिस पर मैं पर्णकुटी बनाऊँ,-
बलिराजा बोले,” ईतना सा क्या माँगा ? मैं तुम्हें कई गाँव व रत्न दूंगाँ।
श्रीसूरदासजी कहते हैं प्रभु ने बलि को छल कर,उसकी पीठ पर पवित्र पाँव रख दिया ।
10/09/19, 9:44 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
🙏 श्री मनुस्मृति 🙏
तृतीय अध्याय

षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् ।
तदर्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकं एव वा । । ३.१ । ।

वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम् ।
अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रमं आवसेत् । । ३.२ । ।

तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः ।
स्रग्विणं तल्प आसीनं अर्हयेत्प्रथमं गवा । । ३.३ । ।

गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि ।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् । । ३.४ । ।

असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने । । ३.५ । ।

महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसंबन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् । । ३.६ । ।

हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् ।
क्षयामयाव्यपस्मारि श्वित्रिकुष्ठिकुलानि च । । ३.७ । ।

अर्थ

गुरुकुल में तीनों वेद छत्तीस वर्ष या अठारह वर्ष या नौ वर्षो तक ब्रह्मचारी पढ़े या जितने काल में हो सके उतने काल तक ही पढ़े व ब्रह्मचर्य का पालन करे।।

तीन या दो नहीं तो कम से कम एक वेद ही पढ़कर ब्रह्मचर्य की रक्षा करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करे
ऐसे वेदज्ञ ब्रह्मचारी को आसन पर बैठा कर पिता या आचार्य पुण्यमाला पहनाकर मधुपर्क विधि से पूजा करे।
फिर गुरु की आज्ञा से स्न्नान,समावर्तन करने के बाद ,अपने वर्ण की शुभ लक्षण वाली कन्या से विवाह कर।।
जो माता की सपिण्ड सात पीढ़ी में ना हो और पिता के गोत्र में ना हो,ऐसी कन्या द्विजों के लिए विवाह योग्य होती है।

यदि गौ,बकरी, भेड़, धन और धान्य से खूब धनी हो तब भी विवाह सम्बन्ध जात कर्म संस्कार रहित,कन्यामात्र पैदा करने वाला,वेदपाठ रहित,शरीर में बहुत बाल वाला,बवासीर वाला,क्षय रोगी,मन्दाग्नि,मृगी,श्वेतकुष्ठ,और गलित कुष्ठ इन दस कुलों में नही करना चाहिए।।
10/09/19, 10:43 am – Pitambar Shukla: 🙏🙏
10/09/19, 9:02 pm – +91 joined using this group’s invite link
10/09/19, 9:35 pm – +91 वसुदेव कृत स्तुति……..
…………………….

विदितोऽसि भवान्साक्षात्पुरुषः प्रकृतेः परः।
केवलानुभवानन्दस्वरूपः सर्वबुद्धिदृक्।।

स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाग्रे त्रिगुणात्मकम्।
तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्ट इव भाव्यसे।।

वसुदेव जी ने पहले पुत्रबुद्धि से देखा फिर उस बुद्धि को त्यागकर वे कहने लगे-
हे ईश्वर! मैंने आपको जान लिया- आप प्रकृति से पर साक्षात पुरुष हैं, केवल अनुभव तथा आनन्द स्वरूप हैं और संपूर्ण प्राणियों की बुद्धि के साक्षी (अन्तर्यामी) हैं।।

शंका- देवकी के उदर में प्रविष्ट होने वाले की अधिक स्तुति क्यों करते हो
समाधान-हे भगवान! वही आप सृष्टि के आरंभ में अपनी माया द्वारा इस त्रिगुणात्मक जगत को उत्पन्न करके तदनन्तर इसमें प्रविष्ट न होकर भी प्रत्यक्ष अथवा सद्रूप से भी प्रविष्ट हुए- से प्रतीत होते हैं। (श्रुति भी प्रतिपादन करती है ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ इस प्रकार देवकी के उदर में प्रविष्ट से भासते हैं)।।

प्रथेमेऽविकृता भावास्तथा ते विकृतैः सह।
नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं जनयन्ति हि।।

संनिपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव।
प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह संभवः।।

इसमें दृष्टान्त देते हैं-
जिस प्रकार से महत् अहंकार पञ्चतन्मात्रा, (महदादि विकार) अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूत जब तक एक से एक भिन्न होकर रहते हैं तब तक किसी विशेष कार्य को उत्पन्न नहीं करते; फिर जब ये विकृत होकर सोलह तरह के विकार पृथिव्यादि (पाँच महाभूत और ग्यारह इंद्रियों) को प्राप्त होकर मिलते हैं तो ब्रह्माण्ड को उत्पन्न कर देते हैं और उत्पन्न होने के अनन्तर उसमें प्रविष्ट हुए- से दीखते हैं परंतु उसमें प्रविष्ट नहीं होते हैं, क्योंकि कार्य की उत्पत्ति के पूर्व कारण रूप से विद्यमान होने के कारण फिर उनका प्रवेश करना संभव नही है। (यहाँ ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ श्रुति का अर्थ यही हुआ कि ईश्वर ने प्रवेश सा किया, जैसे मृत्पिण्ड से जब घट बनता है तब आकाश उसमें प्रवेश नहीं करता। आकाश व्यापक होने के हेतु पहले से ही है। कपाल को जोड़ दिया घटाकाश बन गया। आकाश ने प्रवेश नहीं किया। ऐसे ही ईश्वर जब सृष्टि करता है तब शरीर- निर्माण करने पर साक्षात् प्रवेश नहीं करता है किन्तु प्रवेश सा करता है। इसी प्रकार भगवान् ने देवकी के गर्भ में प्रवेश सा किया, वास्तविक प्रवेश नहीं किया। जो जन्म दीखा वह सब माया का कार्य था।।

एवं भवान् बुद्धय्नुमेयलक्षणैर्ग्राह्यैर्गुणैः सन्नपि तद्नुणाग्रहः।
अनावृतत्त्वाद्वहिरन्तरं न ते सर्वस्व सर्वात्मन् आत्मवस्तुनः।।

य आत्मनोदृश्यगुणेषु सन्निति व्यवस्यते स्वव्यतिरेकतोऽबुधः।
विनानुवादं न च तन्मनीषितं सम्यग्यतस्त्यक्तमुपाददत्पुमान्।।

यहाँ सिद्ध किया कि ……
भगवान अप्रविष्ट होकर भी प्रविष्ट से भासते हैं, फिर यह शंका होती है कि यदि भगवान का अच्युत स्वरूप है और कारण रूप से कार्यों में रहते हैं तो जब कार्यों का ग्रहण इंद्रियों से होता है तब भगवान का ग्रहण क्यों नहीं होता?

अतः समाधान करते हैं-
इस प्रकार यद्यपि आप, बुद्धि से जिनके स्वरूपों का ज्ञान होता है, ऐसे इंद्रियग्राह्य गुणों (विषयों) के साथ वर्तमान रहते हैं, तथापि उन गुणों के साथ आपका ग्रहण नहीं होता।
क्योंकि ग्रहण करने योग्य वस्तु के साथ रहने से ही अन्य वस्तुओं का भी ग्रहण हो जाता है- ऐसा नियम नहीं है। गुणों के ग्रहण में इंद्रियों की शक्ति कारण है और उस शक्ति का ज्ञान एकमात्र कार्य के द्वारा ही होता है; तात्पर्य यह कि कार्य के अनुसार ही शक्ति की कल्पना होती है। अतः जिस प्रकार फलादि में रूप, रसादि साथ-साथ रहते हैं पर नेत्र से केवल रूप का ज्ञान होता है, रसादि का नही होता, जिह्वा से केवल रस का ज्ञान होता है, रूपादि का नहीं होता। उसी प्रकार हे प्रभो! आप विषयों के साथ वर्तमान रहते हैं, परंतु विषयों के ज्ञान के साथ आपका ज्ञान नहीं होता।
आप सर्वरूप सर्वात्मा और परमार्थ वस्तु हैं अतः आवरणरहित हैं, इसीलिए आपमें बाहर या भीतर का विभाग नहीं है। अतः आपका प्रवेश नहीं बन सकता। फिर देवकी के गर्भ में प्रविष्ट हुए यह कहना तो बनता ही नहीं।।

शंका- ऊपर के श्लोक में कहे गये अनावृतत्त्वादि चार हेतु प्रपञ्च के अवस्तुरूप होने पर घट सकते हैं किन्तु प्रपञ्च की असत्यता संभव नहीं है क्योंकि उसका सत्यत्वरूप से ज्ञान होता है ।
अतः- समाधान… जो पुरुष आत्मा के दृश्य गुण- देहादि में आत्मा से पृथक अस्तित्व का निश्चय करता है वह अविद्वान है क्योंकि विचार करने से देखा गया है कि वे सत मान गये देहादि संपूर्ण पदार्थ केवल वाणी से उच्चारणमात्र करने के लिए हैं; इसके सिवा उनमें कुछ तथ्य नहीं है। इसीलिए अवास्तविक रूप से बाधित वस्तु का वस्तुरूप से स्वीकार करने वाला पुरुष अज्ञानी है। मृत्ति का गोलाकार बनायी गयी तो उसका नाम घट हो गया। विचार करके देखा जाय तो घट केवल मृत्तिका ही है, ‘घट’ नाम केवल कहने के लिए है;

श्रुति भी कहती-
“‘वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्”।।

त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान्विभो वदन्त्यनीहाद्गुणादविक्रियात्।
त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते
त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुणैः।।

हे व्यापक! यद्यपि आप निष्काम, निर्गुण और निर्विकार हैं तो भी वेदादि कहते हैं कि इस जगत् के जन्म, स्थिति और नाश आपही से होते हैं।
यहाँ शंका होती है कि भगवान व्यापार शून्य हैं अतः उनका कर्तृत्व किस प्रकार बन सकता है? यदि कर्तृत्व हुआ तो निर्विकारत्व किस प्रकार हो सकेगा?
इसका समाधान करते हैं- निर्गुण होने से आप में निर्विकारित्व है और माया शबल होने से कर्तृत्व है इस कारण विरोध नहीं है।
यथा- अयस्कान्तमणि (चुम्बक) में विकार के बिना कर्तृत्व होता है।
आपमें कर्तृत्व कहने का अभिप्राय इतना ही है कि आप गुणों के आश्रय हैं। जिस प्रकार सेवक द्वारा किये गये कार्यों का कर्तृत्व राजा में माना जाता है उसी प्रकार गुणों से किए गये सृष्ट्यादि कार्यों का कर्तृत्व आप में माना जाता है।
तथापि वास्तव में आप अकर्ता और निर्विकार हैं।।

सत्त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया
बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः।
सर्गाय रक्तं रजसोबृंहितं
कृष्णं च वर्ण तमसा जनात्यये।।

वही आप परमेश्वर अपनी माया के द्वारा त्रिलोकी की रक्षा करने के लिए अपना शुभ्र वर्ण, (सत्त्वगुणात्मक विष्णुमूर्ति) उत्पत्ति के लिए रक्तवर्ण (रजोगुणात्मक ब्रह्मरूप) और संपूर्ण सृष्टि का प्रलय करने के लिए कृष्णवर्ण (तमोगुणात्मक रुद्रमूर्ति) धारण करते हैं ,इससे यह स्पष्ट हो गया कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ये तीन पृथक देवता नहीं है किन्तु परमेश्वर के ही कार्य के अनुसार पृथक्-पृथक् रूप हैं।।

त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषुर्गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर।
राजन्यसंज्ञासुरकोटियूथपैर्निर्व्यूह्यमाना निहनिष्य से चमूः।।

हे व्यापक! हे अखिलेश्वर! इस लोक के रक्षण की इच्छा से आप इस समय मेरे गृह में (श्रीकृष्णमूर्ति धारणकर) अवतीर्ण हुए हैं, इस कारण (साधुओं की रक्षा करने के लिए) आप राजा नामधारी जो कोटिशः दैत्यसमूह के सेनापति हैं, उनसे इधर-उधर नियत करके भेजी जाने वाली सेनाओं का संहार करेंगे।।

अयं त्वसभ्यस्तव जन्म
नौ गृहे श्रुत्वाग्रजांस्ते न्यवधीत्सुरेश्वर।
स तेऽवतारं पुरुषैः समर्पितं
श्रुत्वाधुनैवाभिसरत्युदायुधः।।

वसुदेव जी इतना जानते हुए भी प्रेम से मोहित होकर कहते हैं-
हे सुरेश्वर! आपका जन्म हमारे घर में होगा, यह सुनकर इस खल कंस ने आपके छः बड़े भाई मार डाले, वह इसी समय अपने अनुचरों से आपके अवतीर्ण होने का हाल सुनकर हाथ में शस्त्र लेकर आ ही पहुँचेगा। (इस कारण आप सावधान हो जाइये।)।।
10/09/19, 11:05 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १४७,१४८,१४९

विपाके स्वादु सामुद्रं गुरु श्लेष्मविवर्धम्॥१४७॥

सतिक्तकटुकक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्भिदम्। कृष्णे सौवर्चलगुणा लवणे गन्धवर्जितः॥१४८॥

रोमकं लघु, पांसूत्थं सक्षारं श्लेष्मलं गुरु। लवणानां प्रयोगे तु सैन्धवादी प्रयोजयेत॥१४९॥

सामुद्र लवण के गुण- समुद्रलवण(समुद्र के जल को सुखाकर बनाया गया नमक) रस में नमकीन किन्तु विपाक मे मधुर, गुरु तथा कफदोष को बढ़ाता है।

औद्भिदलवण के गुण- औद्भिदलवण( रेह या ऊषर नमक), कुछ तिक्त एवं कटु रस वाला, क्षार गुण युक्त, तीक्ष्ण तथा क्लेदकारक होता है।

वक्तव्य- रेह मिट्टी को जल में घोलकर, उस पानी को सुखाकर जो नमक तैयार किया जाता है, उसे औद्भिदलवण कहते हैं। जिससे धोबी कपड़े धोते हैं, वही रेह मिट्टी है।

कृष्णलवण के गुण- इसमें सौंचर नमक के समान गुण होते हैं किन्तु उसके जैसी गंध इसमें नहीं होती है।

रोमकलवण के गुण- इसकी उत्पत्ति धूलि से होती है। यह लघु, कुछ खारा, कफकारक तथा गुरु होता है।

वक्तव्य- इसी वर्ग मे सज्जीखार तथा सोराखार भी आते हैं। इसी को संस्कृत में सुवर्चिकाखार (कलमीसोरा)भी कहते हैं।

सामान्य निर्देश- जहां केवल इस प्रकार का शास्त्र निर्देश हो कि इस योग में लवण का प्रयोग करें वहां निश्चिन्त होकर सैन्धवलवण का प्रयोग करना चाहिए।

वक्तव्य- जहां एक लवण का प्रयोग करना हो वहां सैन्धवलवण का, जहां दो नमकों का प्रयोग करना हो, जैसे- हिंग्वष्टक चूर्ण मे द्विपटु, यहां १. सैन्धव तथा २. सौवर्चल का, जहां तीन लवण का प्रयोग करना हो वहां— १. सैन्धव, २.सौवर्चल, ३. विड का प्रयोग करना चाहिए। इसी प्रकार चतुर्लवण तथा पंचलवण का भी प्रयोग करना चाहिए। चरक ने “सैन्धवं लवणानां हिततमम्” । (च.सू. – २५/३८) तथा “ऊषरं लवणानाम्हिततमम्” ।(च.सू.-२५/३९) अर्थात सभी नमकों में सेंधानमक उत्तम होता है और ऊषर नमक अहित होता है।
10/09/19, 11:06 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: ” ऊषरं लवणानामहिततमम्”
12/09/19, 8:01 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: सिद्धान्तबिन्दु दशम् श्लोक

न चैकं तदन्यद् द्वितीयं कुतः स्याद्
न वा केवलत्वं न चाऽकेवलत्वम् ।
न शून्यं न चाशून्यमद्वैतकत्वात्
कथं सर्ववेदान्तसिद्धं ब्रवीमि ।। १० ।।

एक भी नहीं है, उससे अन्य द्वितीय कहाँ से होगा ? आत्मा में केवलत्व (एकत्व) भी नहीं है । अकेवलत्व (अनेकत्व) भी नहीं है । न शून्य है, न अशून्य है । अद्वैत होने से सब वेदान्तों से सिद्ध को मैं कैसे कहूं ?

——इति सिद्धान्तबिन्दु——-

13/09/19, 8:22 pm – LE Onkar A-608: This message was deleted
13/09/19, 8:24 pm – LE Onkar A-608: This message was deleted
13/09/19, 8:31 pm – LE Onkar A-608: इतनी चुप्पी क्यों शान्ति यहाँ,
सबको अनन्त का का ज्ञान मिला?
या ढूंढ़ रहे उस सीपी को,
जिसे स्वाति बिन्दु का पान मिला?
13/09/19, 8:32 pm – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
13/09/19, 9:56 pm – LE Onkar A-608: प्रलयकाल के बाद जब परमात्मा जाग कर जम्हाई लेते हैं तो जो अनुनाद होता है वही बिग बैंग है?
13/09/19, 10:52 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १५०,१५१

गुल्महृद्ग्रहणीपाण्डुप्लीहानाहग्रलामयान्। शश्वासार्शः कफकांसाश्च शमयेद्यवशूकजः॥१५०॥

क्षारः सर्वश्च परमं तीक्ष्णोष्णः कृमिजिल्लघु। पित्तासृग्दूषणः पाकी छेद्यहृद्यो विदारणः॥१५१॥

अपथ्य कटुलावण्याच्छुक्रौजः केशशचक्षुषाम्।

यवक्षार के गुण- यवक्षार(जौखार) गुल्मरोग, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, प्लीहारोग, आनाह(आफरा रोग), स्वरयन्त्र के रोग, श्वासरोग, अर्शोरोग, कफरोग तथा कासरोग को नष्ट करता है।

सभी प्रकार के क्षार- सभी क्षार अत्यन्त तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, कृमानाशक तथा लघु होते हैं। यह पित्त तथा रक्त को दूषित करते हैं। आहार तथा व्रणशोथ(फोड़े) को पका देते हैं। छेदक(अर्श के मस्सों एवं बालों की जड़ों को काट देते) हैं, हृदय के लिए अहितकर है, पके हुए व्रणशोथ को फ़ाड़ दैते है, कटु तथा लवण रस प्रधान होने के कारण ये शुक्र, ओजस, केश तथा नेत्रों के लिए अहितकर होते है।

वक्तव्य- पलाश (ढाक) तथा अर्क (मदार) की सूखी लकड़ियों को जला दे। उस भस्म को लेकर चौगुना जल डालकर मिट्टी के पात्र में रातभर रहने दें। इस प्रकार राख नीचे जम जायेगी और क्षारयुक्त जल ऊपर रहेगा, इसे सावधानी के साथ एक दूसरे पात्र में ले लें। इस जल को अग्नि पर रखकर सुखायें। सूखने पर सफेद रंग का क्षार मिलेगा, उसे खुरचकर रख ले, क्षार तैयार है। यह दो प्रकार का होता है— १. प्रतिसारणीय क्षार चूर्ण के रूप में,। २. पानीय क्षार क्वाथ के रूप में। विशेष देखें सु.सू. ११ पूर्ण। क्षारों का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। देखें— च.वि. १/१५। और भी देखें “क्षारः पुंस्त्वोपघातिनां श्रेष्ठः” । (च.सू. २५/४०) इनका अधिक सेवन करने से पुरुष नपुंसक हो जाता है।
14/09/19, 1:00 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
श्री मनुस्मृति
🙏 तृतीय अध्याय🙏 नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् । । ३.८ । ।

न र्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषननामिकाम् । । ३.९ । ।

अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीं उद्वहेत्स्त्रियम् । । ३.१० । ।

यस्यास्तु न भवेद्भ्राता न विज्ञायेत वा पिता ।
नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया । । ३.११ । ।

अर्थ

जिसके देह में लाल बाल हो,अधिक अंग वाली,रोगी,जिसके देह में बाल ना हो या अधिक बाल हो,अधिक बोलने वाली,या पिले आंखों वाली से कदापि विवाह ना करें।

नक्षत्र,वृक्ष, नदी,म्लेच्छ, पर्वत,पक्षी,सांप,शुद्र नाम वाली व भयदायक नाम वाली स्त्री से विवाह ना करें।।

  सुंदर अंग वाली,सुंदर नाम वाली, हंस व गज सी चाल वाली,पतले रोम वाली बाल व दांत वाली,कोमल शरीर वाली कन्या से विवाह करना चाहिए।।

जिसका भाई ना हो,जिसके पिता का पता ना हो,ऐसी कन्या से पुत्रिकाधर्म से डरकर विवाह नही करना चाहिए।।

   🙏 *हरी ॐ* 🙏

14/09/19, 1:00 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: बाल व दांत वाली????
14/09/19, 1:01 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: पुत्रिका धर्म????
14/09/19, 7:36 am – Karunakar Tiwari Kanpur Shastra Gyan: 🙏🙏🙏🙏☝
14/09/19, 2:48 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: पुत्रिकाधर्म – जिस पिता के कोई पुत्र नहीं होता वो अपनी पुत्री का विवाह इस वचन के साथ करता है कि पुत्री से होने वाला पुत्र, पिता का हो जायेगा ।
14/09/19, 7:11 pm – LE Onkar A-608: प्रथम् पुत्र
14/09/19, 7:13 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: शायद पहला ही होगा 🙂

14/09/19, 8:28 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: दांत की कोई निश्चित संख्या या क्या???
14/09/19, 9:02 pm – LE Onkar A-608: तनुलोमकेशदशनां
जिसके रोम, केश और दांत पतले हों।
आप संस्कृत का पाठ देखें।
अनुवाद में पतले रोम के बाद वाली शब्द आ जाने से संशय हुआ होगा।
14/09/19, 11:19 pm – Abhinandan Sharma: अर्जुन का विवाह चित्रांगदा से इसी शर्त पर हुआ था, जिसके बेटे द्वारा अर्जुन का वध हुआ था ।

14/09/19, 11:21 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: अर्जुन का वध???

ये पूरी कथा जानने की इच्छा है
14/09/19, 11:23 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: 👌🙏
14/09/19, 11:24 pm – FB Vikas Delhi Shastra Gyan: 🙏🙏
14/09/19, 11:31 pm – Abhinandan Sharma: कल ढूंढता हूँ, मैंने लिखी थी ये कथा कभी, अपनी भाषा में ।
15/09/19, 7:54 am – Binita Kotnala Ghaziabad Shastra Gyan:
15/09/19, 7:58 am – Binita Kotnala Ghaziabad Shastra Gyan:
15/09/19, 8:01 am – Binita Kotnala Ghaziabad Shastra Gyan:
15/09/19, 9:10 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कृपया जो भी post करना है typed form के करें, images डालना मना है ।
15/09/19, 3:35 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १५२,१५३,१५४,१५५,१५६,१५७

हिङ्गु वातकफनाहशूलघ्नं पित्तकोपनम्॥१५२॥

कटुपाकरसं रूच्यं दीपनं पाचनं लघु। कषाया मधुरा पाके रुक्षा विलवणाः लघुः॥१५३॥

दीपनी पाचनी मेध्या वयसः स्थापनी परम्। उष्णवीर्या सराऽऽयुष्या बुद्धिन्द्रियबलप्रदा॥१५४॥

कुष्ठवैवर्ण्यवैस्वर्यपुराणविषमज्वरान्। शिरोऽक्षिपाण्डुहृद्रोगकामलाग्रहणीगदान॥१५५॥

सशोषशोफातिसारमेदमोहवमीक्रिमीन्।श्वासकासप्रसेकार्शः प्लीहानाहगरोदरम्॥१५६॥

विबन्धस्रोतसां गुल्ममूरूस्तम्भमरोचकम्। हरीतकी जयेद्वयाधींस्तांस्तांश्च कफवातजान्॥१४७॥

हींग का वर्णन- वातज रोगों , कफज रोगों, आनाह(आफरा) तथा शूलरोगों को यह नष्ट करती है, पित्त को प्रकुपित करती है एवं विपाक व रस में कटु होती है। हींग रूचिकारक, अग्निप्रदीपक, पाचक, तथा लघु है।

वक्तव्य- हींग अनेक प्रकार की पायी जाती है। उन सबमें १. हीरा हींग और २. तालाब हींग अच्छी होती है। आजकल नकली हींग की प्राप्ति अच्छी हींग की तुलना में अधिक है। हींग के वृक्ष काबुल, फारस, अफगानिस्तान आदि देशों में अधिक पाये जाते हैं। इन वृक्षों की गोंद को ही हींग कहते हैं। देशी हींग की तुलना में काबुली हींग उत्तम होती है। अच्छी हींग को पानी में घिसने से दुधिया घोल बनता है, दूसरों का नहीं, यही इसकी पहचान है।

हरीतकी का वर्णन- यह रस में कसैली, विपाक में मधुर, गुण में रुक्ष, केवल लवण रस से रहित अर्थात लवण के अतिरिक्त इसमें शेष सभी रस रहते हैं। यह लघु, अग्निको दीप्त करती है, भोजन को पचाती है, बुद्धिवर्धक है, दीर्घायु प्रदान करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है, उष्णवीर्य है, सर(रेचक), आयु के लिए हितकर, बुद्धि तथा ज्ञानेन्द्रियों को बल देने वाली है।

यह कुष्ठरोग, विवर्णता, स्वरभेद, जीर्णज्वर, विषमज्वर, शिरोरोग, नेत्ररोग, पाण्डुरोग, हृदयरोग, कामलारोग, ग्रहणीरोग, शोष(राजयक्ष्मा), सूजन, अतिसार, मेदोरोग, मोह(मूर्च्छा), वमन, क्रिमिरोग, श्वास, कास, प्रसेक(लालास्राव तथा योनिस्राव), अर्शोरोग, प्लीहारोग, आनाह(अफरा), गरविष, उदररोग, स्रोतों की रूकावट, गुल्मरोग, उरूस्तम्भ तथा अरोचक आदि कफज एवं वातज रोगों का विनाश करती है।

वक्तव्य- आयुर्वेदशास्त्र में हरीतकी(हरड़), लहसुन तथा शिलाजीत इन तीनों द्रव्यों का विशेष महत्व है। हरीतकी की तो यहां तक प्रशंसा की गई है— “कदाचित् कुप्यति माता नदोरस्था हरीतकी” अर्थात माता तो अपने बालक पर कभी रूष्ट भी हो सकती है, परन्तु पेट के भीतर गयी हुयी हरीतकी कभी कुपित नहीं होती। सचमुच यह इसके गुणों की वास्तविकता है, न कि अतिशयोक्ति।
16/09/19, 5:35 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: This message was deleted
16/09/19, 5:39 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: This message was deleted
16/09/19, 5:42 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏🙏, कुछ शब्दों के अर्थ कम समझ आये किन्तु आशा है आगे के प्रेषित्रों से स्पष्ट हो जायेंगे।
आनन्द आएगा।कोटिशः आभारः
16/09/19, 5:45 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: ।। श्री गणेशाय नमः ।।

भारवि कृत
किरातार्जुनीय महाकाव्य


भूमिका

किरातार्जुनीय संस्कृत के सुप्रसिद्ध महाकाव्यों में से अन्यतम है जो छठी शताब्दी या उसके पहले लिखा गया है । इसको महाकाव्यों की ‘बृहत्त्रयी’ में प्रथम स्थान प्राप्त है । महाकवि कालिदास की कृतियों के अनन्तर संस्कृत साहित्य में भारवि के किरातार्जुनीय का ही स्थान है । बृहत्त्रयी के दुसरे महाकाव्य ‘शिशुपाल वध’ तथा ‘नैषध’ हैं । किरातार्जुनीय राजनीति प्रधान महाकाव्य है । राजनीति वीररस से अछूती क्योंकर हो सकती है ? फलतः इसका प्रधान रस ‘वीर’ है ।

इसके नायक मध्यम पाण्डव अर्जुन हैं । किरातार्जुनीय में किरात वेषधारी शङ्कर जी और अर्जुन के युद्ध का प्रमुख रूप से वर्णन है । यह कथा महाभारत के वन पर्व से ली गयी है । महाकाव्य का आरम्भ इस प्रकार से हुआ है, जैसे किसी नाटक का रंगमंच पर अभिनय आरम्भ हो रहा हो । कौरवों की कपट द्यूतक्रीड़ा से पराजित पाण्डव जब द्वैतवन में निवास कर रहे थे तब उन्हें यह चिन्ता हुई कि दुर्योधन का शासन किस प्रकार चल रहा है, इसका पता लगाना चाहिए । क्योंकि अवश्य ही वह अपने क्रूर और कपटी स्वभाव वाले सहयोगियों के कारण प्रजाजन का विद्वेषी सिद्ध हुआ होगा । प्रजा के आन्तरिक असन्तोष के कारण किसी भी राजा का शासन दीर्घ-कालव्यापी नहीं हो सकता । अतः किसी प्रकार से हस्तिनापुर के लिए एक गुप्तचर भेजकर वहां की स्थिति की जानकारी प्राप्त करनी ही चाहिए । इसी उद्देश्य से उन्होंने एक वनवासी किरात को चुना, जो ब्रह्चारी का वेश धारण कर हस्तिनापुर गया और वहां कुछ काल तक रहकर सब बातें अपनी आँखों से देखकर लौट आया ।

भारवि के विकट चित्रबन्धों में यद्यपि काव्य की आत्मा रस का पूर्ण परिपाक नहीं हुआ है, तथापि तात्कालिक संस्कृतज्ञ-समाज की अभिरुचि के आग्रह से उन्हें ऐसा करना पड़ा होगा । क्योंकि इन विकट चित्रबन्धों की रचना किसी सामान्य काव्य-कौशल की बात नहीं है । भारवि के अर्धभ्रमक, सर्वतोभद्र, एकाक्षर पाद, एकाक्षर श्लोक, द्वयक्षर श्लोक, निरौष्ठव, पादान्तादियमक, पदादि यमक, प्रतिलोमानुलोमपाद, प्रतिलोमानुलोमार्द्ध आदि विकट बन्धों को देखकर सामान्य बुद्धि को विस्मित हो जाना पड़ता है । किरातार्जुनीय का समूचा पन्द्रहवाँ सर्ग मानो इसी अद्भुत पाण्डित्य-प्रदर्शन के ही लिए रचा गया हो । एक श्लोक ऐसा भी दिया है जिसके भिन्न भिन्न तीन अर्थ होते हैं तथा इसी प्रकार एक श्लोक ऐसा भी दिया है, जिसमें केवल एक अक्षर ‘न’ का प्रयोग हुआ है । दोनों के नमूने नीचे दिए जा रहे हैं ।

अर्थत्रयवाची श्लोक –
जगती शरणे युक्तो हरिकान्त सुधासित ।
दानवर्षी कृताशसो नागराज इवाबभौ ।।
सर्ग १५, ४५

एकाक्षर श्लोक –
न नोन नुन्नो नुन्नानो नाना नानानना ननु ।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत् ।।
सर्ग १५, २४

इसी प्रकार भारवि के काव्य शिल्प का उत्कृष्ट नमूना हम निम्न लिखित सर्वतोभद्र बन्ध में भी देखते हैं ।

दे वा का नि नि का वा दे
वा हि का स्व स्व का हि वा
का का रे भ भ रे का का
नि स्व भ व्य व्य भ स्व नि

इस सर्वतोभद्र बन्ध की विशेषता यह है कि इसे जिस ओर से भी पढ़िए पूरा श्लोक बन जाता है । श्लोक का वास्तविक स्वरुप निम्नलिखित है जो आठों कोष्ठकों के चतुष्टय के क्रमश चारों ओर से बन जाता है ।

देवकानि निकावादे वाहिकास्व स्वकाहिवा ।
काकारेभभरे काका निस्वभव्य व्यभस्वनि ।।
सर्ग १५, श्लोक २५
16/09/19, 5:46 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: कुछ शब्द गड़बड़ थे जो ठीक कर दिए हैं। 🙂
16/09/19, 5:46 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏
16/09/19, 7:12 pm – FB Mrudul Tiwari Allahabad Shastra Gyan: 🙏🙏🙏🙏🙏👍👍👍👍
17/09/19, 10:58 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १५८,१५९

तद्वदाम्लकं शीतमम्लम् पित्तकफापहम्। कटु पाके हिमं केश्यमक्षमीषच्च तदगुणम्॥१५८॥

इयं रसायवरा त्रिफलाऽक्ष्यामयापहा। रोपणी तग्गदक्लेदमेदोमेहकफास्रजित्॥१५९॥

आमलक के गुण- आंवला के गुण भी हरीतकी(हरड़) के समान ही होते है, परन्तु आंवला शीतवीर्य होता है और रस में अम्ल(खट्टा) होता है। यह पित्त तथा कफ का विनाशक होता है।

बिभीतक का वर्णन- यह भी हरीतकी के समान गुण धर्मो वाला होता है, किन्तु यह विपाक मे कटु, केशो के लिए हितकर होता है, फिर भी हरीतकी तथा आंवला से कुछ कम गुणों वाला होता है।

वक्तव्य- हरड़, बहेड़ा, आंवला का सम्मिलित नाम त्रिफला है। तन्त्रान्तर मे कहा है— ” अभयैका प्रदातव्या द्वावेव तु विभीतकौ। धात्रीफलानि चत्वारि त्रिफलेयं प्रकीर्तिता॥” अर्थात एक हरीतकी, दो बहेड़ा और तीन आंवला— इनको इस अनुपात में मिलाकर त्रिफला का निर्माण होता है।

त्रिफला का वर्णन- उक्त तीनों फलों के विधिवत मिश्रण का नाम त्रिफला है। यह उत्तम कोटि का रसायन है। यह नेत्ररोगों का विनाश करती है, व्रणरोपण , त्वचा में होने वाली सड़न, मेदोदोष, प्रमेह कफजरोग एवं रक्तज रोगों का विनाश करती है।
18/09/19, 12:07 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: प्रतीक्षा में🙏🙏
18/09/19, 12:10 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: किरातार्जुनीय सर्ग 1

श्रियः कुरूणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् ।
स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः ।। १.१ ।।

अर्थ: कुरूपति दुर्योधन के राज्यलक्ष्मी की रक्षा करने में समर्थ, प्रजावर्ग के साथ किये जाने वाले उसके व्यवहार को भली भाँति जानने के लिए जिस किरात को नियुक्त किया गया था, वह ब्रह्मचारी का (छद्म) वेश धारण कर, वहां की सम्पूर्ण परिस्थिति को समझ-बूझकर द्वैत वन में (निवास करने वाले ) राजा युधिष्ठिर के पास लौट आया ।

टिप्पणी: इस महाकाव्य की कथा का सन्दर्भ महाभारत से लिया गया है । जैसा कि सुप्रसिद्ध है, पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर, भीम एवं अर्जुन आदि से धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन कि तनिक भी नहीं पटती थी । एक बार फुसलाकर दुर्योधन ने युधिष्ठिर के साथ जुआ खेला और अपने मामा शकुनि कि धूर्तता से युधिष्ठिर को हरा दिया । युधिष्ठिर न केवल राजपाट के अपने हिस्से को ही गँवा बैठे, प्रत्युत यह दांव भी हार गए कि वे अपने सब भाइयों के साथ बारह वर्ष तक वनवास और एक वर्ष तक अज्ञातवास करेंगे । फल यह हुआ कि अपने चारों भाइयों तथा पत्नी द्रौपदी के साथ यह बारह वर्षों तक जगह-जगह ठोकर खाते हुए घूमते फिरते रहे । एक बार वह सरस्वती नदी के किनारे द्वैतवन में निवास कर रहे थे कि उनके मन में आया की किसी युक्ति से दुर्योधन का राज्य के प्रजावर्ग के साथ किस प्रकार का व्यवहार है, यह जाना जाय । इसी जानकारी को प्राप्त करने के लिए उन्होंने एक चतुर वनवासी किरात को नियुक्त किया, जिसने ब्रह्मचारी का वेश धारण कर हस्तिनापुर में रहकर दुर्योधन की प्रजानीति के सम्बन्ध में गहरी जानकारी प्राप्त की । प्रस्तुत कथा सन्दर्भ में उसी जाकारी को वह द्वैतवन में निवास करने वाले युधिष्ठिर को बताने के लिए वापस लौटा है ।

इस पूरे सर्ग में कवी ने वशस्थ वृत्त का प्रयोग किया है, जिसका लक्षण है – “जतौ तु वशस्थमुदीरित जरौ ।” अर्थात जगण, तगण, जगण और और रगण के संयोग से वशस्थ छन्द बनता है । श्लोक की प्रथम पंक्ति में वने वनेचर” शब्दों में ‘वने’ की दो बार आवृत्ति होने से ‘वृत्यानुप्रास’ अलङ्कार है, महाकवि ने मांगलिक ‘श्री’ शब्द से अपने ग्रन्थ का आरम्भ करके वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण किया है ।
18/09/19, 12:18 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏🙏🙏 द्वैत वन साधारण वन का ही नाम है अथवा कुछ विशिष्ट है इसमें?
साधारण प्रत्युतपन्न जिज्ञासा.🙏
18/09/19, 12:20 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: इसके लिए तो आपको ही मेहनत करनी पड़ेगी, पता कीजिये और हमें भी बताइये 😊
18/09/19, 12:48 am – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: देखते हैं कुछ मिलता है क्या😊🙏
18/09/19, 1:05 am – Shastr Gyan Rajrishi Kumar Bihar: एक तपोवन जिसमें युधिष्ठिर वनवास के समय कुछ समय रुके थे
18/09/19, 7:08 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
श्री मनुस्मृति
तृतीय अध्याय

सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि ।
कामतस्तु प्रवृत्तानां इमाः स्युः क्रमशोऽवराः । । ३.१२ । ।

शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते ।
ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः । । ३.१३ । ।

न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः ।
कस्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते । । ३.१४ । ।

हीनजातिस्त्रियं मोहादुद्वहन्तो द्विजातयः ।
कुलान्येव नयन्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम् । । ३.१५ । ।

अर्थ

  ब्राह्मण,क्षत्रिय,व वैश्य को अपने वर्ण की कन्या से ही विवाह श्रेष्ठ है, पर कामवश होकर जो विवाह होता है वो अधम विवाह है।

 शूद्र पुरूष शूद्र कन्या के साथ,वैश्य पुरूष वैश्य व शूद्र कन्या के साथ,क्षत्रिय पुरूष क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र कन्या के साथ, और ब्राह्मण पुरूष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, व शूद्र कन्या के साथ विवाह कर सकता है यह अधम विवाह है।

  ब्राह्मण व क्षत्रिह को आपत्ति काल में भी शूद्र कन्या से विवाह नही करना चाहिए। जो द्विजाति मोहवश हींन जाती की कन्या से विवाह करता है वह अपने कुल व परिवार को ही शूद्र कर देता है

18/09/19, 10:33 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: This message was deleted
18/09/19, 10:33 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
18/09/19, 10:34 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: अगर किसी को विस्मृति हुई है उस के लिए🙏
18/09/19, 10:34 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: आप तो जानते हैं images मना हैं ग्रुप में 😒
18/09/19, 10:36 am – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: माफ कीजियेगा

पर उपयोगी लगा सो,,,,,🙏😔
18/09/19, 10:37 am – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 🙏🏼🙏🏼
18/09/19, 1:36 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: 🙏

18/09/19, 3:02 pm – +91 : भाईसाहब हमारे एडमिन जी के देखने से पहले आप इसे डिलीट कर दे ।
सादर !
18/09/19, 3:06 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi removed +91 94159 57117
18/09/19, 3:48 pm – Dr PL Sharma White Cottege Ghaziabad Shastr Gyan: वर्ण व्यवस्था जन्म से या कर्म से समझनी चाहिए?
18/09/19, 3:49 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: हीन जाती.??
18/09/19, 3:56 pm – Abhinandan Sharma: कर्म से ।
18/09/19, 3:57 pm – Abhinandan Sharma: You deleted this message
18/09/19, 3:58 pm – Abhinandan Sharma: जो द्विज नहीं है, वो ।
18/09/19, 4:01 pm – Dr PL Sharma White Cottege Ghaziabad Shastr Gyan: 👌🙏🕉
18/09/19, 4:18 pm – LE Ravi Parik C Block Pragati Maidan : गुणों से
18/09/19, 5:46 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: क्या हीन सही शब्द है उनके लिए जो द्विज नहीं?
18/09/19, 5:51 pm – Abhinandan Sharma: हीन माने जिसके पास कोई चीज न हो, द्विज न होने से, दूसरा जन्म नहीं होता, इसलिए हीन कहा गया है ।
18/09/19, 6:03 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: 👍🏼
18/09/19, 6:04 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: फिर क्या विधान है शूद्रों के लिए
18/09/19, 6:05 pm – Abhinandan Sharma: किस चीज के बारे में ?
18/09/19, 6:11 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: जन्म के बारे में
18/09/19, 6:12 pm – Abhinandan Sharma: कुछ नहीं, बस उनका द्विज संस्कार नहीं होता !
18/09/19, 7:35 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: किरातार्जुनीय सर्ग 1 श्लोक 2

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ।। १.२ ।।

अर्थ: उस समय के लिए उचित प्रणाम करने के अनन्तर शत्रुओं (कौरवों) द्वारा अपहृत पृथ्वीमण्डल (राज्य) की यथातथ्य बातें राजा युधिष्ठिर से निवेदन करते हुए उस वनवासी किरात के मन को तनिक भी व्यथा नहीं हुई । (ऐसा क्यों न होता) क्योंकि किसी के कल्याण की अभिलाषा करने वाले लोग (सत्य बात को छिपा कर केवल उसे प्रसन्न करने के लिए) झूठ-मूठ की प्यारी बातें (बना कर) कहने की इच्छा नहीं करते ।

टिप्पणी: क्योंकि यदि हितैषी भी ऐसा करने लगें तो निश्चय ही कार्य-हानि हो जाने पर स्वामी को द्रोह करने की सूचना तो मिल ही जायेगी । इस श्लोक में भी ‘मही मही’ शब्द की पुनरावृत्ति से वृत्यनुप्रास अलङ्कार है और वह अर्थान्तरन्यास से ससृष्ट है ।
18/09/19, 8:12 pm – Abhinandan Sharma: ये नारद जी की स्तुति कहाँ से ली है ,प्रभु । यदि संदर्भ भी दे देंगे तो बड़ी कृपा होगी 🙏
18/09/19, 8:14 pm – Abhinandan Sharma: इन दोनों नमकों के आजकल के नाम क्या हैं ? कृपया स्पष्ट करें ।
18/09/19, 8:20 pm – Abhinandan Sharma: 🙏🙏
18/09/19, 8:29 pm – +91: श्रीमद्भागवत से उद्धृत है प्रभू 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
18/09/19, 8:30 pm – +91 : 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
18/09/19, 8:48 pm – Abhinandan Sharma: सेंधा नमक और काला नमक में कौन सा श्रेष्ठ है ? सफेद नमक से कोई तुलना ?
18/09/19, 10:28 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: This message was deleted
18/09/19, 10:28 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १६०,१६१,१६२

सकेसरं चतुर्जातं त्वक्पत्रैलं त्रिजातकम्। पित्तप्रकोपि तीक्ष्णोष्णं रूक्षं रोचनदीपनं॥१६०॥

रसे पाके च कटुकं कफघ्नं मरिचं लघु। श्लेष्मला स्वादुशीताऽऽर्द्रा गुर्वो स्निग्धा च पिप्पली॥१६१॥

सा शुष्का वितरीताऽतः स्निग्धा वृष्या रसे कटुः। स्वादुपाकाऽनिलश्लेष्मश्वासकासापहा सरा॥१६२॥

न तामत्युपयुञ्जीत रसायनविधिं बिना।

त्रिजात का वर्णन- दालचीनी, तेजपत्ता और बड़ी इलायची इन तीन द्रव्यों के संयोग का नाम त्रिजात या त्रिजातक है। ये दोनों शब्द शास्त्रीय प्रयोगों में पाये जाते हैं।

चातुर्जात का वर्णन- उक्त त्रिजात में नागकेसर द्रव्य को मिला देने से इसे चातुर्जात या चातुर्जातक कहा जाता है। उक्त योगों के गुण धर्म— ये पित्तवर्धक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रूक्ष, अग्नि को प्रदिप्त कर भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाते है।

पिप्पली के गुण- हरी पिप्पली, कफकारक, स्वाद मे मधुर, शीतवीर्य, देर में पचने वाली तथा कुछ स्निग्ध होती है। वही पिप्पली जब सूख जाती है तो उक्त गुणों से विपरीत हो जाती है। तब यह स्निग्ध, वीर्यवर्द्धक, रस में कटु और विपाक मे मधुर होती है। यह वातनाशक, कफनाशक, श्वास तथा कास नाशक एवं सर(मलभेदक) है। ‘पिप्पलीरसायन’ विधि के अतिरिक्त पिप्पली का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए।

वक्तव्य- चरक में भी इसके अधिक सेवन का निषेध किया है। देखें —च.वि. १/१५
18/09/19, 10:32 pm – Sushant: सेंधा नमक एवं काला नमक दोनो ही उत्कृष्ट हैं और आम सफेद नमक (जिसे जहर भी कहा जा सकता है) से गुणवत्ता एवं स्वाथ्य के दृष्टिकोण से सरवोत्तम है.
18/09/19, 10:33 pm – Sushant: हालांकि मैं आयुर्वेद का ज्ञानी नहीं हूँ, फ़िर भी नमक के विषय पर व्यक्तिगत रुचि होने की वजह से विस्तार में अध्ययन किया है.
18/09/19, 10:34 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: सौवर्चल नमक को सज्जीखार भी कहते हैं। इसे पापड़खार भी कहते हैं।
18/09/19, 10:34 pm – Shastragyan Abhishek Sharma: विड नमक – नौसादर
18/09/19, 10:36 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: क्या नौसादर व सुहागा 1 ही है
18/09/19, 10:36 pm – Ashu Bhaiya: अलग अलग
18/09/19, 11:06 pm – FB Mukul Allahahabd Shastra Gyan Iit Roorkee Physics Quantum Mech: अब नमक पर बात चल रही है तो सैन्धव शब्द पर भी प्रकाश डालें🙏
19/09/19, 7:11 am – LE Onkar A-608: समुद्र लवण आज का प्रचलित सफेद नमक है।
19/09/19, 7:39 am – Sushant: सैन्धव शब्द की उत्पत्ति इस लवण के स्रोत (सिंध प्रांत-पाकिस्तान) से है
19/09/19, 7:42 am – Sushant: थोड़ा इतिहास देखें तो इस प्रकार का लवण भारतवर्ष में सन 1930 (नमक सत्याग्रह) से पहले बिल्कुल प्रचलन में नहीं था.
19/09/19, 8:44 am – Shastra Gyan Vaidhya US Prasad: नहीं
19/09/19, 11:23 am – Shastragyan Abhishek Sharma: This message was deleted
19/09/19, 11:51 am – Abhinandan Sharma: आप लोगों को बता दूं कि सुशांत जी, ISRO में, वैज्ञानिक पद पर प्रतिष्ठित हैं | ये ग्रुप में शायद पिछले १ साल से हैं, लेकिन इनकी पहली टिप्पणी देखकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ है और मुझे ये भी नहीं पता था कि इन्हें नमक के बारे में इतना पता होगा ! बढ़िया सुशांत भाई 😁
19/09/19, 12:16 pm – Sushant: 🙏🏻. इस अद्भुत ग्रुप की सदस्यता पाकर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूँ. श्री अभिनंदन जी को आभार.

व्यक्तिगत रूप के खुद को धनी कृष्णों के बीच विपन्न सुदामा सरीखा ही पाता हूँ.

ग्रुप में सक्रिय भागीदारी का पुरजोर प्रयास करूंगा.
19/09/19, 12:24 pm – Abhinandan Sharma: 😯😯 इतनी शुद्ध हिंदी !!! घनघोर आश्चर्य सुशांत भाई ! सबको जानकार आश्चर्य होगा कि सुशांत जी की अंग्रेजी बेहतरीन है | मैंने खुद इनको कभी इतनी शुद्ध हिंदी में बात करते हुए नहीं सुना और देखा.. good चेंज यार 👍👍
19/09/19, 12:30 pm – ABKG Reader FB Sudarshan Ibm Delhi: वाह, क्या बात है 👌🏼
19/09/19, 12:37 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: 🙏
19/09/19, 12:41 pm – Sushant: 😊 इस मित्रवत हास्य के अल्पविराम को यहीं पूर्ण करना ही बेहतर होगा.

अन्य सदस्य ‘बोर’ हो सकते हैं.
19/09/19, 12:43 pm – Sushant: वैसे भी इस ग्रुप के कठोर नियमों का मैं डरपूर्वक अनुपालन करता हूँ. 🙏🏻
19/09/19, 12:46 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: नियम पालन डरपूर्वक की जगह सहजतापूर्ण हो तो ज्यादा प्रसन्नता होती है सभी को🙏
19/09/19, 12:48 pm – Sushant: 😊
19/09/19, 12:50 pm – Poornima Singh Ghaziabad Shastra Gyan: Ji ha edhar bhi yahi hai 🙏🙏🙏🙏🙏
19/09/19, 1:06 pm – Alok Dwivedi Ghaziabad Shastra Gyan joined using this group’s invite link
19/09/19, 1:08 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG: This message was deleted
19/09/19, 1:09 pm – Shastra Gyan Prakash Chopda Bhilai, CG:
श्री मनुस्मृति
तृतीय अध्याय

शूद्रावेदी पतत्यत्रेरुतथ्यतनयस्य च ।
शौनकस्य सुतोत्पत्त्या तदपत्यतया भृगोः । । ३.१६ । ।

शूद्रां शयनं आरोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ।
जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते । । ३.१७ । ।

दैवपित्र्यातिथेयानि तत्प्रधानानि यस्य तु ।
नाश्नन्ति पितृदेवास्तन्न च स्वर्गं स गच्छति । । ३.१८ ।

        *अर्थ*

 शूद्र कन्या के साथ विवाह करने वाला ब्