May 24, 2024
द्रौपदी के कितने पति थे

खंडन 5 : द्रौपदी के पांच ही पति थे , न कि एक पति युधिष्ठिर !


पोस्ट (युधिष्ठिर को ही द्रौपदी का एकमात्र पति कहने वाली, इस भ्रामक पोस्ट की डिटेल्स नीचे दी गयी हैं |) पोस्ट बनाने वाले ने, सर्वप्रथम अंग्रेजों के भाषांतरण को गलत बताते हुए, ब्राह्मण, पुजारी, पुरोहित अदि को दोषी ठहराते हुए, आर्यसमाजियों को हीरो बनाने की घोषणा की है और बताया है कि वे आर्यसमाजी हैं, जिनकी वजह से द्रौपदी के पांच नहीं 1 पति (युधिष्ठिर) के होने का प्रमाण मिलता है और आर्यसमाजियों ने इस बात को सिद्ध किया, जिसके लिए, हमने उनका ऋणी होना चाहिए और जागना चाहिए और इस पोस्ट को कम से कम 10 लोगों को फॉरवर्ड करना चाहिए 😊 |


मैंने पहले भी बताया है कि किसी भी भ्रामक पोस्ट को तैयार करने में एक मनोवैज्ञानिक नियम का पालन लगभग किया जाता है कि पहले से ही किसी को दोषारोपित कर दिया जाता है (जैसे कि कुछ मूर्ख कहेंगे, कुछ देशद्रोही कहेंगे, कुछ सेकुलर कहेंगे अदि मतलब किसी के कुछ भी वितर्क को, पहले ही खारिज किया जा चुका है, उनके ऊपर दोषारोपण करके) वही विधि इस पोस्ट में प्रयोग की गयी है कि पहले ही आपकी नज़रों में एक को दोषी और दुसरे को हीरो बता दिया गया है ताकि आपकी नजर में, आर्यसमाज की एक अच्छी इमेज बने | जबकि होना इसके उलट चाहिए था कि पहले अपनी बात कहे, सही अथवा गलत, फिर बताये कि ऐसे कैसे हुआ | हम मात्र, कंटेंट की चर्चा करेंगे कि इसमें कहाँ गडबड है और निष्कर्ष, पढने वाले के ऊपर छोड़ देंगे, जैसा कि मैं अक्सर करता हूँ | फिर पढने वाला decide करे, कि उसे क्या सही लगता है | (आगे के लिए, इस नियम को याद रखें, बार बार लिखने में समस्या होगी |)


आगे बढ़ते हैं, कंटेंट पर | पहला घोषित वाक्य – अर्जुन विवाह के लिए कुंती तैयार नहीं थी ? किन्तु पोस्टकर्ता ने इसका कोई प्रमाण महाभारत से नहीं दिया है ! पूरी महाभारत में ऐसा कोई वक्तव्य नहीं है, जहाँ ऐसा प्रकट हो कि कुंती ने अर्जुन के विवाह का विरोध किया हो !!! फिर, इस प्रकार के मनमाने विचार का उद्देश्य ? कारण ? – एक भ्रम पैदा करना कि हाँ, यार कुंती शादी के लिए तैयार नहीं थी |


अगले भाग में कहा गया कि अर्जुन ने विवाह से इनकार कर दिया ! हाँ, कर दिया क्योंकि पांडव सदैव धर्म में ही स्थित रहते थे | बड़े भाई से पहले छोटे भाई के विवाह को नर्क में जाने वाला बताया गया है किन्तु इसमें कुंती इस विवाह के लिए राजी नहीं थी, ऐसा लक्षण कहाँ मिलता है ? क्या कोई वाक्य है, इस के प्रमाण में ? – नहीं ! अतः, अर्जुन के वाक्य को जबरन कुंती से जोड़ा गया कि कुंती राजी नहीं थी |


उसके आगे पोस्ट कहती है कि भीम का विवाह हो गया था, अर्जुन का भी हो जाता तो युधिष्ठिर पर दोष आता कि उसमें कुछ कमी थी इसलिए कुंती द्रौपदी से अर्जुन का विवाह नहीं करना चाहती थी ! अब मजेदार बात ये है कि भीम का जो विवाह हुआ था, वो गन्धर्व विवाह हुआ था, न कि अग्नि को साक्षी रखकर, वेदमंत्रों के साथ | गन्धर्व विवाह को मनमाना आचरण कहते हुए, उसकी कहीं भी श्रेष्ठता नहीं है किन्तु चूंकि माता का आदेश था, इसलिए भीम ने उस गन्धर्व विवाह को स्वीकार किया | किन्तु उसकी तुलना वैदिक विवाह से नहीं की जा सकती और न ही ये कहा जा सकता है, भीम का विवाह पहले हो गया था | जब अर्जुन के वैदिक विवाह की बारी आई तो अर्जुन ने धर्म को आगे रखकर बड़े भाई के विवाह की बात की क्योंकि यहाँ वैदिक विवाह होना था | इसमें कहीं भी युधिष्ठिर पर कोई दोषारोपण नहीं होता बल्कि ये दर्शाया गया है कि धर्म को आगे रखा गया है कि बड़े भाई का विवाह पहले होगा और छोटे का बाद में | इसमें कुंती की इच्छा कही नहीं है |


किन्तु अगले भाग में, एक नयी कहानी जोड़ दी गयी कि माँ तो माँ है, वो कैसे ये सह लेती कि उसके बड़े बेटे पर आक्षेप आये कि उसमें कोई कमी तो नहीं है | जबकि ये सर्वविदित था, कि युधिष्ठिर, धर्मनिष्ठ, सत्यवादी, धर्म को जानने वाले थे | पूरी प्रजा, पांडवों को पसंद करती थी अतः इस प्रकार के मनगढ़ंत आक्षेप की तो जगह ही नहीं थी किन्तु यदि अर्जुन पहले विवाह कर लेते तो धर्म के बेसिस पर अर्जुन की भर्त्सना अवश्य होती कि बड़े भाई से पहले, छोटे ने विवाह कर लिया जो कि धर्मविरुद्ध था और इसीलिए अर्जुन ने निषेध किया | इस प्रकरण को जबरन कुंती से जोड़ा जा रहा है, जो कहीं भी लक्षित और वर्णित नहीं है |


आगे प्रमाण देते हुए, पोस्टकर्ता ने, कीचकवध को प्रमाण बताया है कि वहां द्रौपदी ने स्वयं कहा है कि वो युधिष्ठिर की पत्नी थी | देखिये भ्रम कैसे बुना जाता है | प्रमाण लिया उस वर्ष का जिस वर्ष युधिष्ठिर ही द्रौपदी के पति थे, एक वर्ष के लिए | नारद जी ने, पांडवों के लिए पहले ही यह नियम बना दिया था कि पाँचों पांडवों में से प्रत्येक एक वर्ष के लिए, द्रौपदी के साथ रहेगा | जिस वर्ष कीचक वध हुआ, उस वर्ष युधिष्ठिर द्रौपदी के पति थे, उस वर्ष पांडवों में, वह उसी की पत्नी कहलाई | यहाँ पोस्टकर्ता, बड़ी चालाकी से, जहाँ जहाँ, अन्य स्थानों पर द्रौपदी को पांचो पांडवों की पत्नी कहा गया है, उन सभी संदर्भो को गायब कर देता है और आपको नहीं बताता है | जैसे कि वेदव्यास ने ही, द्रुपद को द्रुपदी के पांचो से विवाह कराने को कहा, सन्दर्भ और आख्यान भी दिए | दुर्योधन, धृतराष्ट्र को बताते हैं, कि द्रौपदी ने पाँचों पांडवों का वरण किया है (क्योंकि सबसे से विधिवत, वैदिक विवाह हुआ था तो कुछ भी छिपा हुआ नहीं था अतः ये बात सभी को पता थी) भरी सभा में, कर्ण कहता है कि कुंती तेरे तो पांचो पति नपुंसक हैं और बीते हुए तिलों की सामान व्यर्थ हैं अतः अब कौरवों में से किसी एक को पति चुन ले, ताकि तुम्हें वनवास जैसे दरिद्रता न भोगनी पड़े | पूरे सभा पर्व में, बारम्बार द्रौपदी को पाँचों पांडवों की पत्नी कहा गया है (द्रौपदी और पांडवों के सामने) | इसके अलावा वेदव्यास जी ने, पाँचों पांडवों की पृथक संतानों के नाम बताये हैं, जो द्रोपदी से उत्पन्न हुई थी | युधिष्ठिर की अलग, भीम की अलग, नकुल की अलग, सहदेव की अलग, अर्जुन की अलग | ये सभी बातें पोस्टकर्ता ने छुपा ली और एकमात्र प्रमाण दिया, उस वर्ष का, जब युधिष्ठिर ही द्रौपदी के पति थे | इसे कहते हैं, भ्रम को पैदा करना, भ्रम को बुनना और पढने वाले को (जिसने असली सन्दर्भ ग्रन्थ न पढ़ा हो) उसे मूर्ख बनाना |


इसके बाद उसने एक अन्य प्रमाण देने की चेष्टा की, जब जयद्रथ ने द्रौपदी को वन में देखा | और यहीं पोस्टकर्ता फंस गया | वहां पोस्टकर्ता कहता है कि द्रौपदी ने कहा कि युधिष्ठिर उसके पति हैं जबकि सत्य ये है कि जयद्रथ ने पहले अपने सेवक (कोटिकास्य) को द्रौपदी का परिचय लेने भेजा | तब द्रौपदी उससे कहती है – “शिबि देश के राजकुमार! मैं राजा द्रुपद की पुत्री हूँ। मनुष्‍य मुझे कृष्णा के नाम से जानते हैं। मैंने पाँचों पाण्‍डवों का पतिरूप में वरण किया है, जो खाण्‍डवप्रस्‍थ में रहते थे। उनका नाम तुमने अवश्‍य सुना होगा। युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीपुत्र नरवीर नकुल और सहदेव – ये ही मेरे पति हैं।“ जबकि पोस्टकर्ता ने पूर्व में कहा है कि क्या कहीं ऐसा सन्दर्भ है, जहाँ द्रौपदी ने स्वयं युधिष्ठिर के अलावा किसी और की पत्नी कहा हो, तो ये रहा वो सन्दर्भ | (महाभारत: वन पर्व: षट्षष्‍टयधिकद्विशततम (266) अध्‍याय: श्लोक 1-9 )


अब अगर आपके पास ये पोस्ट घूमती हुई आ जाये, तो ये सन्दर्भ और ये पोस्ट, फेंक कर मारिएगा, ऐसे दुष्ट लोगों पर, जो शास्त्रों में इस प्रकार की घालमेल करके, आधी अधूरी बातें दिखाकर, भ्रम फैलाते हैं और समाज में ये प्रतिष्ठा होती है कि हमारे शास्त्रों में तो बहुत सी बातें गलत लिखी हैं | उनमें तो बहुत मिलावट है, पता ही नहीं चलता कि क्या सही है और क्या गलत | बिलकुल गलत धारणा है, सबकुछ स्पष्ट है, बशर्ते कि कोई उन्हें पढ़े |


इस एक सन्दर्भ के बाद, उस पोस्ट की कोई सत्ता नहीं रहती है और ये स्पष्ट हो जाता है कि पोस्टकर्ता ने, सनातन ग्रंथों में भ्रम फैलाने के उद्देश्य से, इस पोस्ट की रचना की है | आप भी इस बात को अधिकाधिक ग्रुप्स और फेसबुक पर शेयर करें, अपनी पोस्ट बनाएं ताकि अन्य लोगों के पास, जिनके पास ये फेक पोस्ट पहुची हो, उनको भी ये स्पष्ट हो जाए |


पोस्ट का खंडन किया जा चुका है | अब अगली बार में, उस भ्रामक पुस्तक, जिसमें युधिष्ठिर को ही द्रौपदी का एकमात्र पति होने के विभिन्न उद्धरण दिए है, के विभिन्न भ्रामक और झूठे कथ्यों का खंडन किया जाएगा, जो कपोल काल्पनिक हैं |

पं अशोकशर्मात्मज अभिनन्दन शर्मा

भ्रामक पोस्ट, जिसका खंडन ऊपर दिया गया है –

कौन कहता है कि द्रौपदी के पांच पति थे 200 वर्षों से प्रचारित झूठ का खंडन -👇👇👇
द्रौपदी का एक ही पति था- युधिष्ठिर

जर्मन के संस्कृत जानकार मैक्स मूलर को जब विलियम हंटर की कमेटी के कहने पर वैदिक धर्म के आर्य ग्रंथों को बिगाड़ने का जिम्मा सौंपा गया तो उसमे मनु स्मृति, रामायण, वेद के साथ साथ महाभारत के चरित्रों को बिगाड़ कर दिखाने का भी काम किया गया। किसी भी प्रकार से प्रेरणादायी पात्र – चरित्रों में विक्षेप करके उसमे झूठ का तड़का लगाकर महानायकों को चरित्रहीन, दुश्चरित्र, अधर्मी सिद्ध करना था, जिससे भारतीय जनमानस के हृदय में अपने ग्रंथो और महान पवित्र चरित्रों के प्रति घृणा और क्रोध का भाव जाग जाय और प्राचीन आर्य संस्कृति सभ्यता को निम्न दृष्टि से देखने लगें और फिर वैदिक धर्म से आस्था और विश्वास समाप्त हो जाय। लेकिन आर्य नागरिको के अथक प्रयास का ही परिणाम है कि मूल महाभारत के अध्ययन बाद सबके सामने द्रोपदी के पाँच पति के दुष्प्रचार का सप्रमाण खण्डन किया जा रहा है। द्रोपदी के पवित्र चरित्र को बिगाड़ने वाले विधर्मी, पापी वो तथाकथित ब्राह्मण, पुजारी, पुरोहित भी हैं जिन्होंने महाभारत ग्रंथ का अध्ययन किये बिना अंग्रेजो के हर दुष्प्रचार और षड्यंत्रकारी चाल, धोखे को स्वीकार कर लिया और धर्म को चोट पहुंचाई।
अब ध्यानपूर्वक पढ़ें—

विवाह का विवाद क्यों पैदा हुआ था:–

(१) अर्जुन ने द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। यदि उससे विवाह हो जाता तो कोई परेशानी न होती। वह तो स्वयंवर की घोषणा के अनुरुप ही होता।

(२) परन्तु इस विवाह के लिए कुन्ती कतई तैयार नहीं थी।

(३) अर्जुन ने भी इस विवाह से इन्कार कर दिया था। “बड़े भाई से पहले छोटे का विवाह हो जाए यह तो पाप है। अधर्म है।” (भवान् निवेशय प्रथमं)

मा मा नरेन्द्र त्वमधर्मभाजंकृथा न धर्मोsयमशिष्टः (१९०-८)

(४) कुन्ती मां थी। यदि अर्जुन का विवाह भी हो जाता,भीम का तो पहले ही हिडम्बा से (हिडम्बा की ही चाहना के कारण) हो गया था। तो सारे देश में यह बात स्वतः प्रसिद्ध हो जाती कि निश्चय ही युधिष्ठिर में ऐसा कोई दोष है जिसके कारण उसका विवाह नहीं हो सकता।

(५) आप स्वयं निर्णय करें कुन्ती की इस सोच में क्या भूल है? वह माता है, अपने बच्चों का हित उससे अधिक कौन सोच सकता है? इसलिए माता कुन्ती चाहती थी और सारे पाण्डव भी यही चाहते थे कि विवाह युधिष्ठिर से हो जाए।

प्रश्न:-क्या कोई ऐसा प्रमाण है जिसमें द्रौपदी ने अपने को केवल एक की पत्नी कहा हो या अपने को युधिष्ठिर की पत्नी बताया हो ?

उत्तर:-

(1)-#द्रौपदी को कीचक ने परेशान कर दिया तो दुःखी द्रौपदी भीम के पास आई। उदास थी। भीम ने पूछा सब कुशल तो है? द्रौपदी बोली जिस स्त्री का पति राजा युधिष्ठिर हो वह बिना शोक के रहे, यह कैसे सम्भव है?

आशोच्यत्वं कुतस्यस्य यस्य भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि कि मां त्वं परिपृच्छसि ।।-(विराट १८/१)

द्रौपदी स्वयं को केवल युधिष्ठिर की पत्नि बता रही है।

(2)- वह भीम से कहती है- जिसके बहुत से भाई, श्वसुर और पुत्र हों,जो इन सबसे घिरी हो तथा सब प्रकार अभ्युदयशील हो, ऐसी स्थिति में मेरे सिवा और दूसरी कौन सी स्त्री दुःख भोगने के लिए विवश हुई होगी-

भ्रातृभिः श्वसुरैः पुत्रैर्बहुभिः परिवारिता ।
एवं सुमुदिता नारी का त्वन्या दुःखिता भवेत् ।।-(२०-१३)

द्रौपदी स्वयं कहती है उसके बहुत से भाई हैं, बहुत से श्वसुर हैं, बहुत से पुत्र भी हैं,फिर भी वह दुःखी है। यदि बहुत से पति होते तो सबसे पहले यही कहती कि जिसके पाँच-पाँच पति हैं, वह मैं दुःखी हूँ,पर होते तब ना ।

(3)-और जब भीम ने द्रौपदी को,कीचक के किये का फल देने की प्रतिज्ञा कर ली और कीचक को मार-मारकर माँस का लोथड़ा बना दिया तब अन्तिम श्वास लेते कीचक को उसने कहा था, *”जो सैरन्ध्री के लिए कण्टक था,जिसने मेरे भाई की पत्नी का अपहरण करने की चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचक को मारकर आज मैं अनृण हो जाऊंगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।”

अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम् ।
शांति लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रीकण्टकम् ।।-(विराट २२-७९)

इस पर भी कोई भीम को द्रौपदी का पति कहता हो तो क्या करें? मारने वाले की लाठी तो पकड़ी जा सकती है, बोलने वाले की जीभ को कोई कैसे पकड़ सकता है?

(4)-द्रौपदी को दांव पर लगाकर हार जाने पर जब दुर्योधन ने उसे सभा में लाने को दूत भेजा तो द्रौपदी ने आने से इंकार कर दिया। उसने कहा जब राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं अपने को दांव पर लगाकर हार चुका था तो वह हारा हुआ मुझे कैसे दांव पर लगा सकता है? महात्मा विदुर ने भी यह सवाल भरी सभा में उठाया। #द्रौपदी ने भी सभा में ललकार कर यही प्रश्न पूछा था -क्या राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं को हारकर मुझे दांव पर लगा सकता था? सभा में सन्नाटा छा गया।* किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तब केवल भीष्म ने उत्तर देने या लीपा-पोती करने का प्रयत्न किया था और कहा था, *”जो मालिक नहीं वह पराया धन दांव पर नहीं लगा सकता परन्तु स्त्री को सदा अपने स्वामी के ही अधीन देखा जा सकता है।”-

अस्वाभ्यशक्तः पणितुं परस्व ।स्त्रियाश्च भर्तुरवशतां समीक्ष्य ।-(२०७-४३)

“ठीक है युधिष्ठिर पहले हारा है पर है तो द्रौपदी का पति और पति सदा पति रहता है, पत्नी का स्वामी रहता है।”

यानि द्रौपदी को युधिष्ठिर द्वारा हारे जाने का दबी जुबान में भीष्म समर्थन कर रहे हैं। यदि द्रौपदी पाँच की पत्नी होती तो वह ,बजाय चुप हो जाने के पूछती,जब मैं पाँच की पत्नी थी तो किसी एक को मुझे हारने का क्या अधिकार था? द्रौपदी न पूछती तो विदुर प्रश्न उठाते कि “पाँच की पत्नि को एक पति दाँव पर कैसे लगा सकता है? यह न्यायविरुद्ध है।”

स्पष्ट है द्रौपदी ने या विदुर ने यह प्रश्न उठाया ही नहीं। यदि द्रौपदी पाँचों की पत्नी होती तो यह प्रश्न निश्चय ही उठाती।

इसीलिए भीष्म ने कहा कि द्रौपदी को युधिष्ठिर ने हारा है। युधिष्ठिर इसका पति है। चाहे पहले स्वयं अपने को ही हारा हो, पर है तो इसका स्वामी ही। और नियम बता दिया – जो जिसका स्वामी है वही उसे किसी को दे सकता है,जिसका स्वामी नहीं उसे नहीं दे सकता।

(5)- #द्रौपदी कहती है- “कौरवो ! मैं धर्मराज युधिष्ठिर की धर्मपत्नि हूं।तथा उनके ही समान वर्ण वाली हू।आप बतावें मैं दासी हूँ या अदासी?आप जैसा कहेंगे,मैं वैसा करुंगी।”-

तमिमांधर्मराजस्य भार्यां सदृशवर्णनाम् ।
ब्रूत दासीमदासीम् वा तत् करिष्यामि कौरवैः ।।-(६९-११-९०७)

द्रौपदी अपने को युधिष्ठिर की पत्नी बता रही है।

(6)- #पाण्डव वनवास में थे दुर्योधन की बहन का पति सिंधुराज जयद्रथ उस वन में आ गया। उसने द्रौपदी को देखकर पूछा -तुम कुशल तो हो?द्रौपदी बोली सकुशल हूं।मेरे पति कुरु कुल-रत्न कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर भी सकुशल हैं।मैं और उनके चारों भाई तथा अन्य जिन लोगों के विषय में आप पूछना चाह रहे हैं, वे सब भी कुशल से हैं। राजकुमार ! यह पग धोने का जल है। इसे ग्रहण करो।यह आसन है, यहाँ विराजिए।-

कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः
अहं च भ्राताश्चास्य यांश्चा न्यान् परिपृच्छसि ।-(१२-२६७-१६९४)

द्रौपदी भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव को अपना पति नहीं बताती,उन्हें पति का भाई बताती है।

और आगे चलकर तो यह एकदम स्पष्ट ही कर देती है। जब युधिष्ठिर की तरफ इशारा करके वह जयद्रथ को बताती है—

एतं कुरुश्रेष्ठतमम् वदन्ति युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे ।-(२७०-७-१७०१)

“कुरू कुल के इन श्रेष्ठतम पुरुष को ही ,धर्मनन्दन युधिष्ठिर कहते हैं। ये मेरे पति हैं।”

क्या अब भी सन्देह की गुंजाइश है कि द्रौपदी का पति कौन था?

(7)- कृष्ण संधि कराने गए थे। दुर्योधन को धिक्कारते हुए कहने लगे”– दुर्योधन! तेरे सिवाय और ऐसा अधम कौन है जो बड़े भाई की पत्नी को सभा में लाकर उसके साथ वैसा अनुचित बर्ताव करे जैसा तूने किया। –

कश्चान्यो भ्रातृभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति ।
आनीय च सभां व्यक्तं यथोक्ता द्रौपदीम् त्वया ।।-(२८-८-२३८२)

कृष्ण भी द्रौपदी को दुर्योधन के बड़े भाई की पत्नी मानते हैं।
द्रौपदी का केवल एक ही पति था – युधिस्ठिर। उनका नाम पांचाली इसलिए था क्योकि वो पांचाल नरेश की पुत्री थी , न की पाँच भाइयों की पत्नी। इसके अन्य प्रमाण भी महाभारत में हैं।

अब सत्य को ग्रहण करें और द्रौपदी के पवित्र चरित्र का सम्मान करें।

कम से कम ईश्वर ने जो बुद्धि ,विवेक दिया है उसका प्रयोग भी कर लीजिए। काहे डब्बे में बंद करके धरती में गाड़ दिए है।
वेदों की ओर चले , मनुष्य बने , तार्किक बने।
बाकि आप खुद ,,,,,,,, समझ लीजिए,,,,,,,

तर्कशील बने।*
विज्ञानवादी बने।
भारत को सामर्थ्यशाली बनाएँ !

पर्दाफाश होगा।
आज नही तो कल निश्चित होगा।।

देश के लोगों का मान सम्मान स्वाभिमान छीनने वाले दुश्मनों का सत्यानाश होगा।
जब शेर जागेगा तो लुटेरा गीदड़ दम दबाकर भागेगा।।

       अंधविश्वास भगाओ
      आत्मविश्वास जगाओ

शिक्षित बनो और शिक्षित करो।

सबेरा और उजाला तब नहीं होता जब सूर्योदय होता है, उसके लिए आंखें भी खोलनी पडती है।

आप ने इसे पढ़ने के लिए समय दिया उसका बहुत बहुत धन्यवाद । अब एक एहसान और करदो इस संदेश को अन्य 10-20 साथियों में और ग्रुप मे भेज दो। बस यही तरीका है अपने साथियों को जागरूक करने का।

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वाटसप वाल से साभार🙏🌺🙏

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