अध्याय 2

ज्योतिष सीखें, आसान शब्दों में योजनानि शतान्यष्टो भूकर्णों द्विगुणानि तु |तद्वर्गतो दशगुणात्पदे भूपरिधिर्भवते || अर्थात पृथ्वी का व्यास 800 के दूने 1600 योजन है, इसके वर्ग का 10 गुना करके गुणनफल का वर्गमूल निकालने से जो आता है, वह पृथ्वी कि परिधि है | इस श्लोक को विस्तार से आगे चर्चा करेंगे किन्तु इस श्लोक…

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नवग्रहों की स्थिति एवं विभिन्न पातालों का वर्णन

नारद जी ने कहा – कुरुश्रेष्ठ ! भूमि से लाख योजन ऊपर सूर्य मंडल है । भगवान् सूर्य के रथ का विस्तार नौ सहस्त्र योजन है । इसकी धुरी डेढ़ करोड़ साढ़े सात लाख योजन की है । वेद  के जो सात छंद हैं वे ही सूर्य के रथ के सात अश्व हैं । उनके नाम सुनो –…

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ब्रह्माण्ड और पृथ्वी की परिकल्पना

स्कन्द जी ने अर्जुन को ब्रह्माण्ड के बारे में ऐसा कहा है कुंतीनंदन ! सृष्टि से पहले यहाँ सब कुछ अव्यक्त एवं प्रकाश शून्य था । उस अव्याकृत अवस्था में प्रकृति और पुरुष – ये दो अजन्मा (जन्मरहित) एक दूसरे से मिल कर एक हुए, यह हम सुना करते हैं । तत्पश्चात अपने स्वरूपभूत स्वभाव …

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