नवग्रहों की स्थिति एवं विभिन्न पातालों का वर्णन

नारद जी ने कहा – कुरुश्रेष्ठ ! भूमि से लाख योजन ऊपर सूर्य मंडल है । भगवान् सूर्य के रथ का विस्तार नौ सहस्त्र योजन है । इसकी धुरी डेढ़ करोड़ साढ़े सात लाख योजन की है । वेद  के जो सात छंद हैं वे ही सूर्य के रथ के सात अश्व हैं । उनके नाम सुनो –…

Read More

युद्ध फल

सन्दर्भ – जब इंद्र का युद्ध वृत्तासुर से प्रारंभ हुआ और देवताओं ने दधिची की हड्डियों से बनाये हुए अस्त्र शस्त्रों से दैत्यों का नाश करना प्राम्भ कर दिया तब सभी राक्षस भयभीत हो कर भागने लगे । तब वृत्तासुर ने समझाया “वीरो ! युद्ध स्वर्ग का द्वार है, उसका त्याग कदापि नहीं करना चाहिए…

Read More

प्रदोष व्रत एवं शिव पूजा

सन्दर्भ – ये उस समय की बात  है जब विश्वकर्मा ने इंद्र से बदला लेने के लिए कठोर तप कर के ब्रह्मा जी से वृत्तासुर नामक पुत्र का  आशीर्वाद लिया । वह असुर प्रतिदिन सौ धनुष (चार सौ हाथ) बढ़ता था । उसने सम्पूर्ण भूमंडल ढक लिया और इंद्र को युद्ध  के लिए ललकारने लगा । तिस…

Read More

ब्रह्म हत्या

धर्मो हि मह्ताभेष शरणागतपालनम । शरणागतम च विप्रं च रोगिणं वृद्धमेव च ।। सन्दर्भ – यह उक्ति उस समय की है जब इंद्र बलि के पास समुन्द्र मंथन का प्रस्ताव ले कर जाते हैं । क्योंकि बलि राक्षसराज थे और उनका देवताओ से बैर था अतः वह इंद्र से मिलने के लिए भी अग्रसर नहीं…

Read More

You cannot copy content of this page