राम ने वनवास ही क्यों चुना ? पांडवों की तरह अपना राज्य क्यों नहीं माँगा ?

रामायण में राम के वनवास का क्या मतलब है ! शास्त्रों को कैसे पढना चाहिए ! रामायण में राम की पितृ आज्ञा का पालन |

Read More

कैकयी को वरदान, सही या गलत ?

राजा दशरथ ने कैकयी के तीनों वचन क्यों माने ? नहीं मानते तो कैकयी क्या कर लेती ? ऐसी क्या मजबूरी थी दशरथ की, जो उसे कैकयी के तीनों वर मानने ही पड़े ? रामायण को कैसे पढ़ें ? शास्त्रों को कैसे पढ़ें ? अपने शास्त्रों को पढ़ें, हम नहीं पढेंगे तो कौन पढ़ेगा ?…

Read More

नारद जी इतने चपल क्यों ?

अर्जुन एक बार नारद जी से इस प्रकार प्रश्न किया – देवर्षि ! आप सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाले, जितेन्द्रिय तथा राग-द्वेष रहित हैं | तथापि आप में जो कलह करने की प्रवृत्ति है, उसके कारण कई हजार देवता, गन्धर्व, राक्षस, दैत्य तथा मुनि नष्ट हो गए | विप्रवर ! आपकी ऐसी…

Read More

धर्म क्या है ?

नेत्युवाच ततो वैश्यः सुखं धर्मे प्रतिष्ठितं | पापे दुखं भयं शोको दारिद्रयं क्लेश एव च | यतो धर्मस्ततो मुक्तिः स्वधर्मं किं विनश्यति | (१७०/२६) धर्ममेव परम् मन्ये यथेच्छसि तथा कुरु | ब्रह्मणाश्च गुरून देवान वेदान धर्मं जनार्दंनं || यस्तु निन्द्यते पापो नासौ स्पृश्यते पापकृत् | उपेक्ष्णीयो दुर्वृतः पापात्मा धर्मदूषकः || (१७०/४५-४६) —     ब्रह्म  पुराण अर्थ…

Read More

कमठ द्वारा शरीर वर्णन

भगवान् सूर्य बोले – वत्स कमठ ! तुम्हारी बुद्धि तो वृद्धों जैसी है | तुम बहुत अच्छा प्रतिपादन कर रहे हो | अब मैं तुमसे शरीर का लक्षण सुनना चाहता हूँ; उसे बताओ | कमठ ने कहा – विप्रवर ! जैसा यह ब्रह्माण्ड है, वैसा ही यह शरीर भी बताया गया है | पैरों का…

Read More

तीर्थ क्या, क्यों और कैसे ?

महतां दर्शनं ब्रह्मज्जायते न हि निष्फलं | द्वेषादज्ञानतो वापि प्रसन्गाद्वा प्रमादतः || अयसः स्पर्शसंस्पर्शो रुक्मत्वायैव जायते | — ब्रह्म पुराण अर्थ – महापुरुषों का दर्शन निष्फल नहीं होता, भले ही वह द्वेष अथवा अज्ञान से ही क्यों न हुआ हो | लोहे का पारसमणि से प्रसंग या प्रामद से भी स्पर्श हो जाय तो भी…

Read More

“मैं पानी में हूँ, पर गीला नहीं हूँ |”

यस्याज्ञया जगतस्रष्टा विरंचिः पालको हरिः | संहर्ता कालरुद्राख्यो नमस्तस्यै पिनाकिने || —- स्कन्द पुराण अर्थ – जिनकी आज्ञा से ब्रह्मा जी इस जगत की सृष्टि तथा विष्णु भगवान् पालन करते हैं और जो स्वयं ही कालरूद्र नाम धारण करके इस विश्व का संहार करते हैं, उन पिनाकधारी भगवान् शंकर को नमस्कार है | अंतर्ध्यान –…

Read More

आत्मा का भोजन और भोजन के प्रकार

ये कथा नारद जी के महिसागर संगम तीर्थ के ब्राह्मणों के विषय में हैं, जिन्हें नारद जी, सूर्य जी को बहुत ही उत्तम कुल के और श्रेष्ठ ब्राहमण बता रहे हैं | सूर्य भगवान ब्राहमण का रूप रख कर खुद ही उन ब्राह्मणों के ज्ञान की परीक्षा लेने के लिए चल पड़े | अतिथि (भगवान्…

Read More

जीवन के संदेहों का निवारण

शोकस्थान शस्त्राणी हर्ष स्थानि शतानि च | दिवसे दिवसे मूढ़माविशन्ति न पंडितम || अर्थात – मूर्ख मनुष्य को ही प्रतिदिन शोक के सहस्त्रों और हर्ष के सैकड़ो स्थान प्राप्त होते हैं, विद्वान पुरुष को नहीं | नारद जी कहते हैं – तदनन्तर परम बुद्धिमान नंदभद्र बहूदक कुण्ड के तट पर वर्तमान कपिलेश्वर लिंग की पूजा…

Read More

भगवान् है या नहीं ?

बुद्धिश्च हायते पुंसां नाचैत्तगह समागमात | मध्यस्थेमध्यताम याति श्रेष्ठताम याति चौत्तमे || नारद जी कहते हैं – नन्दभद्र नाम का एक वणिक था | धर्मों के विषय में जो कुछ कहा गया है, उसमें कोई भी ऐसी बात नहीं थी, जो नन्दभद्र को ज्ञात न हो | किसी के साथ उसका द्वेष नहीं था, न…

Read More

You cannot copy content of this page