जीवन के संदेहों का निवारण

शोकस्थान शस्त्राणी हर्ष स्थानि शतानि च | दिवसे दिवसे मूढ़माविशन्ति न पंडितम || अर्थात – मूर्ख मनुष्य को ही प्रतिदिन शोक के सहस्त्रों और हर्ष के सैकड़ो स्थान प्राप्त होते हैं, विद्वान पुरुष को नहीं | नारद जी कहते हैं – तदनन्तर परम बुद्धिमान नंदभद्र बहूदक कुण्ड के तट पर वर्तमान कपिलेश्वर लिंग की पूजा…

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संसार सृष्टि

मस्तकस्थापिनम मृत्युम यदि पश्येदयम जनः । आहारोअपि न रोचते किमुताकार्यकारिता ।। अहो मानुष्यकं जन्म सर्वरत्नसुदुर्लभम । तृणवत क्रियते कैश्चिद योषिन्मूढ़ेर्नराधमै ।। सन्दर्भ – जब अर्जुन पांच तीर्थों में स्नान  करने के लिए गए और जब उन्होंने पांच ग्राहों को श्राप मुक्त कराया और उन पांचो सुंदर स्त्रियों से ग्राह्स्वरूप में श्रापग्रस्त होने का कारण पुछा तब…

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युद्ध फल

सन्दर्भ – जब इंद्र का युद्ध वृत्तासुर से प्रारंभ हुआ और देवताओं ने दधिची की हड्डियों से बनाये हुए अस्त्र शस्त्रों से दैत्यों का नाश करना प्राम्भ कर दिया तब सभी राक्षस भयभीत हो कर भागने लगे । तब वृत्तासुर ने समझाया “वीरो ! युद्ध स्वर्ग का द्वार है, उसका त्याग कदापि नहीं करना चाहिए…

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काशी – निषेध क्षेत्र ?

पापमेव ही कर्तव्यं मतिरस्ती याठेद्रशी सुखेनान्यात्रा कर्तव्यं मही ह्वास्ति महीयसी । अपि कामातुरो जन्तुरेकाम रक्षति मातरम, अपि पाप्क्रता काशी रक्ष्या मोक्षर्थिनैकिका ।। परापवादाशीलेन परदाराभिलाशिणा, तेन काशी न संसेव्यं क्व काशी निरयः क्व सः । अभिल्ष्यन्ति ये नित्यं धनं चात्र प्रतिग्रहे, परस्त्रम कपटैवार्पि काशी सैव्या न तैर्नरै । पर्पीडाकारम कर्म काश्याम नित्यं विवर्जयेत, तदेव चेत किमत्र…

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