टाइम पास

कविता 25.5.2018

कहानी, जो कह न सका – कविता

मैंने पूछा, बता क्या सुनेगी ?
तेरे मन की व्यथा कैसे मिटेगी ?
अमर कोषों का व्याख्यान सुनाऊं
या शकुंतला की प्रेम व्यथा,
कथा सुनाऊं, उस युवा की,
जो शेरों से खेला बचपन में,
या फिर सुनाऊं उस राजा को,
राजमहल नहीं था जिसके मन में,
जो बैठा करता था महलों में,
किन्तु ऋषियों सा चिंतन था
या फिर सुनाऊं उस राजा को,
जिसने अपने बीवी बच्चों को बेचा था
तेरे प्रश्नों के उत्तर मैं
कथाओं में दिखला दूंगा,
तू बोल तो मुख से अपनी व्यथा,
मैं क्षण में उसे सुलझा दूंगा ।

बोली सुकुमारी, चिंतित सी
नहीं सुननी मुझे यशोगाथा,
तुम मौन सुनाओ उस मां का,
जिसने अपने बेटे को मरवाया था,
कहाँ कथा है उस नारी की,
जिसने हवनकुंड में स्वयं को आहूत किया,
कहाँ व्यथा है उस राजपूतानी की
जिसने छलदूतों संग छद्म रचा

क्या सुना पाओगे उस विरह व्यथा को,
जो राधा के हिस्से में आई थी,
या फिर उस वेदना को जो,
उर्मिला ने पाई थी ।
मुझे सुनाओ वही कथा,
जिसमें ऐसी अमर कहानी हो,
जो लिखी गयी हो न कभी,
और न कभी कही गयी जुबानी हो

मेरा सिर शर्म से झुक सा गया
जिह्वा होठों से चिपक गयी,
सारा गर्व पलों में क्षीण हुआ,
धरती नीचे से दरक गयी ।
वो उठी, निर्विकार सी, उदासीन सी,
बोली – तुम कहानी कहना रहने दो
लिखो अघोरी बाबा को,
बाकी कुछ लिखना तुम रहने दो ।

कविता 1 (27 सितम्बर, २०१४)

बहुत जी लिए खुद के लिए, अब थोडा मरना भी सीखो,
कहा किसी ने बहुत किसी से, अब थोडा सुनना भी सीखो,
लिखे गए इतिहास बहुत से, अब खुद इतिहास बनाना सीखो,
घर बीवी बच्चे से ऊपर, देश के लिए कुछ करना सीखो |

मर गए कुछ लोग अमर हो गए, तुम जैसो की साँसों में,
बिक गए तुम एक नोट में, किसी भ्रष्ट के हाथो में,
खुद को दीप बना करके तुम, कभी रस्ता दिखाना सीखो,
न जाने वो कौन मर गए, उनकी याद में रोना सीखो,

बहुत जी लिए खुद के लिए, अब थोडा मरना भी सीखो |

कविता २ (२५ सितम्बर २०१४)

मैं हूँ निशाचर, व्याप्त तम में, लीलता हर भाष्य को मैं,
कपर्दसदृश कालिमा मैं, मैं अह्म्मति, मैं ही मेचक,
मैं तिमिर सा हूँ भयंकर, मैं गरल सा, मैं ही विद्रप,
मैं अघोरी, मैं ही अहंस, मैं दुरित हूँ और मैं ही दुष्कृत,
काल सरिता बह रही है, ग्लौ से लेकर द्यौ परन्तक,
शब्द कलकल आज करते, मैं सुनाऊं तार सप्तक,
अंडकटाह मैं ले के बैठा और काल का कड़छा लिए मैं,
आलोढित करता निरंतर, समस्त सृष्टि को बन के अन्तक,
सुप्तावस्था में तू रहता और सोचे कि जागता हूँ !
चल खडा हो अब चिता से, तेरे रथ का सारथि मैं,
मैं हूँ निशाचर, व्याप्त तम में, लीलता हर भाष्य को मैं |

1. तम – अँधेरा २. कपर्द – शिव की बंधी हुई जटा ३ अहम्मति – अज्ञान, ४. मेचक – रात्रि ५. गरल – विष ६. अहंस, दुरित, दुष्कृत – बुरा 7. ग्लौ – चंद्रमा 8. अंडकटाह – ब्रह्माण्ड ९. आलोढित – हिलाना १०. अन्तक – यमराज

१७ दिसम्बर २००९ –

कलसती हुई दीवारों से परेशान, झूठ बोलते कंगूरों से हैरान,
मैं जब भी उस घर से गुजरता हूँ, ठिठक जाता हूँ ।
शून्य की ओर जाती हुई वो दो आखें,
उनको हमेशा खिडकियों में ही उलझे देखा,
सूरज जो रोज आता और रोज जाता, उसे देखती,
उन आँखों को घर से निकलते हुए कभी नहीं देखा,
ऐसा लगता जैसे पंख होते तो आसमान में उड़ जाती,
होती पतवार तो लहरों से लड़ जाती
पर हमेशा उन्हें खिड़की से ही लड़ते देखा,
कभी सोचता हूँ कि कैसे आज भी ये होता है,
उसके बाप से जब भी पूछो तो यही कहता,
मेरे बेटी नहीं बेटा है
जब भी पूछो यही कहता, मेरे बेटी नहीं बेटा है !!!

#त्रिलोचन_तिवारी_जी कृत (२ जनवरी, २०१८)

कृतिका, रोहिणि, मृगशिरा, आर्द्र, पुनर्वसु, पुष्य|
आश्लेषा, मघ, फाल्गुनी-पूर्वोत्तर अरु हस्त||
चित्रा, स्वाति, विशाख, पुनि अनुराधा अरु ज्येष्ठ|
मूल, पूर्वोत्तरषाढ़, श्रव, धनिष, शतभिषा श्रेष्ठ||
पूर्व-उत्तरा-भाद्रपद, रेवति, अश्विनि अरु भरिणि|
सत्ताईस नक्षत्र ये, सब के सब चतुरश्चरणि||

अभिजित एक नक्षत्र परम शुभदाम|
राशि बहिर्गत किन्तु, प्राच्य-ध्रुव नाम||

3 Jan, 2013
अभी तो पथ पर पग भरा है, अब इस पल का कल कहाँ है ।

ज्ञान की ज्योति जल कर, अब वो कस्तूरी मृग कहाँ है ।

अब जलाना है खुद ही को, अब तपाना है खुद ही को,

ज्ञान के सागर में नहा कर, कस्तूरी बनाना है खुद ही को ।

अब न डर है तम से मुझ को, अब न शंका जरा सी,

नाप डालूँगा धरा को, अब न छोड़ूंगा भू ज़रा सी ।

पूछा मुझ से जो कल कलि ने, इतना विश्वास आया कहाँ से,

आवाज आयी ये अंतर्मन से, अहम् राजासी, अहम् ब्रह्मास्मि ।

अहम् राजासी, अहम् ब्रह्मास्मि ।।

 

One thought on “टाइम पास

  1. Dear Sir
    कुंडली देख कर कोई ग्रह किस नक्षत्र में है कैसे जान सकते हैं? कृपया नियम बताऐ।
    धन्यवाद
    शैलेश शंकर
    8989849829

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