
कविताएँ
ए बादल बरस जा टूट कर, ए बिजली कड़क कर टूट पड़,
पड़ने दे छींटे खून के, बहने दे दरिया खून का.
जो गिनाते थे उँगलियों पर, जिंदगी का लब्बो लुआब,
आज उनकी सीरतों से, एक खंजर बन गया,
जो हमारी दुहाई दे दे, थकते नहीं थे रात दिन,
आज पूछते हैं थप्पड़ दिखा के, बता तेरी औकात क्या
तोड़ दो अपनी लाठी मुझ पर, और आँखों में लहू तुम देख लो,
इन आँखों से वो अक्स मिटा दो, जो ‘सेवक’ बना था अवाम का
मैं कौन था पूछेगा ‘कल’ तुम्हारा, और दुत्कारेगा तुम्हे,
आईना देखोगे जब जब, अक्स पे खून मेरा नजर आएगा |
ये ना समझना मैं मर गया, तो कौन खड़ा हो पायेगा,
हर बूँद से पैदा होंगे विरोधी, हर आँख में तू मुझे पायेगा |
जब सड़ जायेगी जिन्दगी तुम्हारी और लोग धिक्कारेंगे तुम्हें,
उस दिन तू बचने की कोई जगह न पायेगा |
——
अभिनन्दन शर्मा
31 जुलाई 2014
अहम् राजसि, अहम् ब्रह्मास्मि
अभी तो पथ पर पग भरा है, अब इस पल का कल कहाँ है ।
ज्ञान की ज्योति जल कर, अब वो कस्तूरी मृग कहाँ है ।
अब जलाना है खुद ही को, अब तपाना है खुद ही को,
ज्ञान के सागर में नहा कर, कस्तूरी बनाना है खुद ही को ।
अब न डर है तम से मुझ को, अब न शंका जरा सी,
नाप डालूँगा धरा को, अब न छोड़ूंगा भू ज़रा सी ।
पूछा मुझ से जो कल कलि ने, इतना विश्वास आया कहाँ से,
आवाज आयी ये अंतर्मन से, अहम् राजासी, अहम् ब्रह्मास्मि ।
अहम् राजासी, अहम् ब्रह्मास्मि ।।
अभिनन्दन शर्मा
3 जनवरी 2013
महाभारत – चीर हरण
बात पुरानी लेकिन फिर भी नई नई सी लगती है ।
जितना समझो, जितना जानो, फिर भी कम ही पड़ती है ।
सत्ता के लालच ने कैसे परिवारों को तोड़ा था
एक राज्य के राजपाट ने, कितनों का घर तोड़ा था ।
बड़ा भाई जन्मांध हुआ, तो छोटे को राज्य मिला
लेकिन ईर्ष्या बीज वहीं से, परिवारों के बीच खिला
छोटा पांडु राजा होकर, था प्रजा का हितकारी
बड़ा भाई धृतराष्ट्र राज्य में, बोता बेलें विष वाली।
पांडु के थे पांच पुत्र, पांचों हीरे से चकमक थे
धृतराष्ट्र के हुए पूरे 101, लेकिन ईर्ष्या से लथपथ थे ।
पांडव में युधिष्ठिर धर्मराज और कुल के उज्जवल दीपक थे
अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव, उनके सदा सहायक थे ।
बड़े भाई, युधिष्ठिर को जैसे ही पूरा राज्य मिला,
दुर्योधन की कपटी बुद्धि ने, शकुनि संग षड्यंत्र रचा ।
कैसे युधिष्ठिर से राज्य छीन लूं, कैसे उसे करूं अपदस्थ
इसी विचार से, कर्ण, शकुनि, दुश्शासन में रहा व्यस्त ।
शकुनि बोला द्यूत क्रीड़ा में, युधिष्ठिर को तुम बुलवा लो,
मेरे पास है पांसों की शक्ति, खेल में मुझसे भिड़वा दो ।
क्षत्रियों का धर्म युद्ध और क्रीड़ा में अव्वल रहना
लेकिन युधिष्ठिर नहीं आएगा, इतने भर से ये कहना ।
वो आएगा बस एक शर्त पर, धृतराष्ट्र से निमंत्रण भिजवाना
भाइयों का भरोसा देना और बस एक बार उसे ले आना ।
हुआ वही जिसका डर था, युधिष्ठिर सीधे थे, मान गए ।
द्यूत क्रीड़ा को भाइयों का खेल समझ बाशान गए ।
शुकुनि को किया आगे और पांसे शकुनि से फिंकवाए
एक एक कर हारे सब धन, हाथी घोड़े तक दे आए ।
हुआ समाप्त खेल द्यूत का, पांडव पांचाल राज्य गए
अब न खेलूंगा द्यूत कभी, ये निश्चय करके राज्य गए ।
किंतु दुर्योधन को राज्य चाहिए, न कि धन, हीरे मोती,
फिर से द्यूत निमंत्रण भेजा, धृतराष्ट्र नाम से फिर पाती ।
चाचा विदुर ने समझाया, युधिष्ठिर चाल में मत फंसना
ठुकरा दो आज निमंत्रण को, ये गलती फिर से मत करना
युधिष्ठिर बोले, राज निमंत्रण है, ऊपर से हैं ताऊ मेरे ।
पिता से ऊपर ताऊ हैं, धर्म सबंद्धों बंधे हैं हाथ मेरे ।
बाकी भाई भी क्या कहते, बड़ा भाई पिता ही होता है
उसकी आज्ञा पिता तुल्य, यही धर्म मय होता है ।
फिर से सजी चौसर द्यूत में, फिर से शकुनि के पांसे
इस बार तो हारे भाई खेल में, और दांव में पत्नी भी हारे ।
वहां नराधम नीच कर्ण ने, कृष्णा का उपहास किया
भरी सभा में दुर्योधन से, लाने का आह्वाहन किया ।
दुर्योधन ने जांघ दिखाई, बोले यहां बिठलाऊंगा,
होगी पटरानी तेरी पर मैं दासी उसे बनाऊंगा ।
कौन है डूबा आकंठ पाप में, किसकी मृत्यु आई है ।
किसने नारी की अस्मत पर अपनी आंख उठाई है।
भीम गरज कर बोले जब तो अर्जुन ने उनको थाम लिया
बोले भैया, अब दास हैं हम और स्वामी को सम्मान दिया।
भीम गरज कर बोले तब, आजीवन दास नहीं हूंगा
दुर्योधन तेरी जांघ तोड़ कर, 14 वर्ष बाद यहीं हूंगा ।
दुश्शासन को भेजा सभा से, कृष्णा को बुलवाने को,
जो न आए तो आज्ञा दी, केश पकड़ कर लाने को ।
भरी सभा में पांचाली को, निर्वस्त्र करने को बोल दिया
लेकिन प्रभु कृष्ण ने रक्षा की, और कृष्णा को चीर दिया ।
बोली द्रौपदी चिल्लाती और गरजी काली की भांति ।
आंखों में अग्नि की ज्वाल लिए,क्रोध गरल को खाती ।
दुस्शासन तैने केश छुए, जो मैले हो गए तेरे मैल से,
अब बांधूंगी सिर्फ तभी जब धोऊंगी, तेरे रक्त के तैल से ।
भीम ने तभी प्रतिज्ञा ली, छाती फाडूंगा दुस्शासन की मैं,
रक्त से पहले प्यास बुझाऊंगा, फिर धुलवाऊंगा केश भी मैं ।
सुन कृष्णा की तीक्ष्ण प्रतिज्ञा, धृतराष्ट्र ने अपना मुंह खोला
अंदर से था कांप रहा और माफी मांग के ये बोला ।
वर मांग द्रौपदी मनमाने, गलती हो गई मुझ पापी से,
पाप भयंकर बड़ा हुआ है, मेरे कुल के घाती से ।
बोली द्रौपदी,दो दास से मुक्ति, मेरे पांचों पतियों को,
धृतराष्ट्र ने दास धर्म से मुक्त किया, कृष्णा के सारे पतियों को ।
बोला धृतराष्ट्र मांगो एक बार, और मनचाहा कोई वर
बोली स्वाभिमानी पांचाली, लालच से दूषित होता धर्म, इसका है मुझको डर ।
Abhinandan Sharma
4 August 2025



